करगिल पर फतह के लिए जंग 84 दिन लेकिन पेंशन के लिए 19 साल

 26 July, 2020

पूर्व लांस नायक सतवीर बाउजी ने युद्ध के 21 सालों बाद एक TV चैन से अपना दर्द बांटते हुए बताया, ‘युद्ध के 19 सालों बाद भी मुझे तर पेंशन मिलनी शुरू हुई, जब मैंने आवाज उठाई, धरना दिया, प्रदर्शन किया, संसद में मेरा सवाल उठा, रक्षा मंत्री से पत्रों के जरिए बात हुई तब जाकर पूरे 19 सालों बाद 2019 में पेंशन मिलनी शुरू हुई|

'करगिल तो 84 दिन में जीत गए, पेंशन के लिए 19 साल लड़नी पड़ी जंग'
सतवीरबाउजी
  • करगिल विजय दिवस पर पूर्व सैनिक ने साझा किया दर्द
  • युद्ध के 19 साल बाद पेंशन मिलनी शुरू हुई

करगिल युद्ध के 21 साल पूरे होने पर देश आज विजय दिवस मना रहा है और शहीदों को नमन कर रहा है| ऐसे में करगिल युद्ध के दौरान सबसे दुर्गम टोलोलिंग पहाड़ी को जीतने वाले 2 राष्ट्रीय राजपूताना रायफल्स टुकड़ी का हिस्सा रहने वाले पूर्व लांस नायक सतवीर बाउजी ने हमें अपनी वीरता की गाथा सुनाई| हालांकि घायल होने और फिर सेना से रिटायर होने के बाद घायल सैनिकों को लेकर सरकारों की उपेक्षाओं से वो बेहद दुखी नजर आए|

उन्होंने कहा कि सरकारें शहीदों के मंच पर जाकर बस फूल चढ़ाकर देश के लोगों का दिल जीत लेती हैं लेकिन सैनिकों के लिए मन में कोई आदर-सम्मान नहीं है|उन्होंने कहा उन्हें अपनी पेंशन के लिए 19 सालों तक एक लड़ाई लड़नी पड़ी|

पूर्व लांस नायक सतवीर बाउजी ने युद्ध के 21 सालों बाद आज तक से अपना दर्द बांटते हुए बताया, युद्ध के 19 सालों बाद भी मुझे पेंशन मिलनी तब शुरू हुई, जब मैंने आवाज उठाई, धरना दिया, प्रदर्शन किया, संसद में मेरा सवाल उठा, रक्षा मंत्री से पत्रों के जरिए बात हुई तब जाकर पूरे 19 सालों बाद 2019 में पेंशन मिलनी शुरू हुई|

घायल सैनिकों को लेकर सरकार की उपेक्षाओं से बेहद दुखी बाउजी ने कहा कि, जो युद्ध में घायल सैनिक बच जाते हैं उन्हें तो सरकार रुला-रुला कर मार देती है क्योंकि उनका कोई भी काम नहीं होता है| न तो बच्चों को कोई नौकरी दी जाती है और न ही घायलों के लिए कुछ किया जाता है जिससे वो अपना घर चला सकें| बच्चों की जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं, उनकी स्कूल फीस नहीं दे पाते, जिससे वो भी नाराज रहते हैं|

उन्होंने कहा जो भी थोड़े-बहुत पैसे मिले वो भी काफी धक्के खाने के बाद मिले| सतवीर बाउजी ने कहा, जो युद्ध में घायल हो जाते हैं वो अपने घर में लोगों पर बोझ बन जाते हैं| उनके बच्चे न तो पढ़ पाते हैं और न ही नौकरी कर पाते हैं क्योंकि घायल सैनिक उन पर आश्रित हो जाता है |हमें हर चीज से वंचित रखा जाता है|

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