नेहरू रिपोर्ट

नेहरु रिपोर्ट

नेहरू रिपोर्ट भारत के लिए प्रस्तावित नए अधिराज्य के संविधान की रूपरेखा थी। 28 अगस्त, 1928 को जारी यह रिपोर्ट ब्रिटिश के बर्केन हेड नामक अंग्रेज के द्वारा भारतीयों के संविधान को बनाने के अयोग्य बताने की चुनौती का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में दिया गया सशक्त प्रत्युत्तर था। मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में गठित इस प्रारूप निर्मात्री समिति में अली इमाम,सुभाषचंद्र बोस, एम एस एनी, मंगल सिंह,शोएब कुरैशी, जी आई प्रधान, तेजबहादुर सप्रू सहित कुल 9 सदस्य थे जिसमें 2 मुस्लिम सदस्य भी शामिल थे। जवाहरलाल नेहरु इसके सचिव थे। रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि शरारतभरी साम्प्रदायिक चुनाव पद्धति त्याग दी जाय ताकि उसके स्थान पर अल्पसंख्यकों के लिए उनकी जनसंख्या के आधार पर स्थान आरक्षित कर दिया जाए। इसने समस्त भारत के लिए एक इकाई वाला संविधान प्रस्तुत किया जिसके द्वारा भारत को केंद्र तथा प्रांतों में पूर्ण प्रादेशिक स्वायत्तता मिले। ब्रितानी सरकार ने इसे मानने से इनकार कर दिया था। नेहरू रिपोर्ट को भारतीय संविधान का नीलाप्रपत्र कहा जाता है!


नेहरू रिपोर्ट की सिफारिशें —

नेहरू रिपोर्ट ने औप निवेशिक स्वराज्य तथा उत्तरदायी सरकार की स्थापना की मांग की। सम्पूर्ण रिपोर्ट 3 भागो मे विभक्त थी –भारत की भावी स्थिति, नागरिकों के मूल अधिकार और हिन्दू मुस्लिम सम्बद्ध इनकी सिफारिशें अग्रलिखित थी।

•अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों के ही सामान भारत को भी औपनिवेशिक स्वराज मिले।

•केंद्र मे द्विसदनात्मक प्रणाली कायम हो सीनेट के सदस्यों की संख्या 200 और प्रतिनिधि सभा की सदस्य की संख्या 500 रखी जाय ।

•कार्यकारणी पूर्णरूप से व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी हो सिर्फ विदेशी मामले और सुरक्षा ब्रिटिश नियत्रण मे रहे।

•भारत में संघीय प्रणाली स्थापित की जाए अवशिष्ट अधिकार केंद्र के पास रहे लेकिन प्रांतों में भी उत्तरदाई शासन स्थापित किया जाए ।

•प्रांतों में एक ही सदन की व्यवस्था होनी चाहिए देसी नरेशों के विशेष अधिकारों की सुरक्षा की भी बात कही गई लेकिन यह भी कहा गया कि जब तक वे अपने राज्यों में उत्तरदाई शासन की स्थापना नहीं करेंगे उन्हें भारतीय संघ में शामिल नहीं किया जाएगा।

नेहरू रिपोर्ट पर भारतीय नेताओं की प्रतिक्रिया

नेहरू रिपोर्ट पर विचार करने के लिए 1928 में पहले लखनऊ और फिर दिल्ली में सर्वदलीय सम्मेलन हुए इन सम्मेलनों में भारतीय नेताओं का विरोध उभरकर सामने आया सम्मेलन में मोहम्मद अली ने रिपोर्ट की आलोचना की तथा नाराज होकर सभा से चले गए जिन्ना ने संसद के दोनों सदनों तथा बंगाल और पंजाब की विधायिका सभाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग रखी आगाँ खाँ ने देश के हर प्रांत को स्वाधीनता दिए जाने की मांग की परंतु भारत की स्वाधीनता के प्रस्ताव पर वह चुप रहे मुसलमानों के रंग लगाए जाने के कारण हिंदू सांप्रदायिक वादी भी अकड़ गए सिखों ने भी पंजाब में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक होने के अधिकार से विशेष प्रतिनिधित्व की मांग की कांग्रेस ने इन मांगों को ठुकरा दिया इससे जिन्ना और सिख सम्मेलन से बाहर हो गए।

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