साइमन कमिशन

साइमन कमीशन
जॉन एलसेब्रुक साइमन की अध्यक्षता में संसद के सात ब्रिटिश सदस्यों कासमूह


साइमन आयोग सात ब्रिटिश सांसदो का समूह था, इसको वाइट मैन कमिशन भी कहा जाता है जिसका गठन 8 नवम्बर 1927 में भारत में संविधान सुधारों के अध्ययन के लिये किया गया था और इसका मुख्य कार्य मानटेंग्यु चेम्स्फ़ोर्ड सुधार की जाँच करना था । इसका नााम साइमन आयोग (कमीशन) इसके अध्यक्ष सर जोन साइमन के नाम पर रखा गया था ।


साइमन कमीशन की रिपोर्ट

•प्रांतीय क्षेत्र में विधि तथा व्यवस्था सहित सभी क्षेत्रों में उत्तरदायी सरकार गठित की जाए।

• केन्द्र में उत्तरदायी सरकार के गठन का अभी समय नहीं आया।

•केंद्रीय विधान मण्डल को पुनर्गठित किया जाय जिसमें एक इकाई की भावना को छोड़कर संघीय भावना का पालन किया जाय। साथ ही इसके सदस्य परोक्ष पद्धति से प्रांतीय विधान मण्डलों द्वारा चुने जाएं।

साइमन कमिशन का विरोध

30 अक्टूबर 1928 को संवैधानिक सुधारों की समीक्षा एवं रपट तैयार करने के उद्देश्य से सात सदस्यों वाली साइमन कमीशन लाहौर पहुंचा। इस कमिशन का पूरे भारत में “साइमन गो बैक” के नारे की गूँज के साथ विरोध हुआ क्योंकि इस कमीशन के सारे ही सदस्य अंग्रेज थे, एक भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया था । लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन का नेतृत्व शेर-ए-पंजाब लाला लाजपत राय द्वारा किया जा रहा था। नौजवान भारत सभा के क्रांतिकारियों ने साइमन विरोधी सभा एवं प्रदर्शन का प्रबंध संभाला। जहां से कमीशन के सदस्यों को निकलना था, वहां भीड़ ज्यादा थी। लाहौर के पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दे दिया और उप अधीक्षक सांडर्स जनता पर टूट पड़ा। भगत सिंह और उनके साथियों ने यह अत्याचार देखा, किन्तु लाला जी ने शांत रहने को कहा। एक ओर लाहौर का आकाश ब्रिटिश सरकार विरोधी नारों से गूंज रहा था वहीं दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों के सिर फूट रहे थे। इतने में स्कॉट स्वयं लाठी से लाला लाजपत राय को निर्दयता से पीटने लगा और वह गंभीर रूप से घायल हुए। अंत में उन्होंने जनसभा में गर्जना की, “मेरे शरीर पर जो लाठियां बरसाई गई हैं, वे भारत में ब्रिटिश शासन के कफन की अंतिम कील साबित होंगी।” 18 दिन बाद 17 नवम्बर 1928 को यही लाठियां लाला लाजपत राय की शहादत का कारण बनीं। भगत सिंह और उनके मित्र क्रांतिकारियों की दृष्टि में यह राष्ट्र का अपमान था, जिसका प्रतिशोध केवल “खून के बदले खून” के सिद्धांत से लिया जा सकता था। 10 दिसम्बर 1928 की रात को निर्णायक फैसले हुए। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, जय गोपाल, दुर्गा भाभी आदि एकत्रित हुए। भगत सिंह ने कहा कि उसे मेरे हाथों से मरना चाहिए। आजाद, राजगुरु, सुखदेव और जयगोपाल सहित भगत सिंह को यह काम सौंपा गया।

17 दिसम्बर 1928 को उप-अधीक्षक सांडर्स दफ्तर से बाहर निकला। उसे ही स्कॉट समझकर राजगुरु ने उस पर गोली चलाई, भगत सिंह ने भी उसके सिर पर गोलियां मारीं। अंग्रेज सत्ता कांप उठी। अगले दिन एक इश्तिहार भी बंट गया, लाहौर की दीवारों पर चिपका दिया गया। लिखा था- हिन्दुस्थान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने लाला लाजपत राय की हत्या का प्रतिशोध ले लिया है।

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