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एनसीईआरटी पाठ्यनिहित प्रश्नों के उत्तर

प्रश्न संख्या (1)

हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों में ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने में विसरण क्यों अपर्याप्त है?

उत्तर

बहुकोशिकीय जीव बड़े तथा अधिक जटिल होते हैं जबकि एक कोशिकीय जीव अत्यधिक छोटे तथा सरल बनावट वाले होते हैं। बहुकोशिकीय जीवों के एककोशिकीय जीवों की तुलना में अधिक जटिल होने के कारण अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। विसरण से ऑक्सीजन प्राप्त करने की गति काफी धीमी तथा कम होती है, जिसके कारण बहुकोशिकीय जीवों में यदि विसरण से ऑक्सीजन की पूर्ति हो, तो ऑक्सीजन की मात्रा उसके लिए अपर्याप्त होगी। अत: हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों में ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने में विसरण अपर्याप्त है।

प्रश्न संख्या (2)

कोई वस्तु सजीव है, इसका निर्धारण करने के लिए हम किस मापदंड का उपयोग करेंगे?

उत्तर

कोई वस्तु सजीव है इसका निर्धारण विभिन्न जैव प्रक्रम में होने वाली प्रक्रियाओं के आधार पर किया जा सकता है। अत: पोषण, श्वसन और उत्सर्जन, आदि जो जैव प्रक्रम के अंतर्गत होने वाली प्रक्रियाएँ हैं, को मापदंड के रूप में उपयोग कर इस बात का निर्धारण किया जा सकता है कि कोई वस्तु सजीव है या निर्जीव। सजीव में जैव प्रक्रम की प्रक्रियाएं होंगी जबकि निर्जीव में नहीं।

प्रश्न संख्या (3)

किसी जीव द्वारा किन कच्ची सामग्रियों का उपयोग किया जाता है?

उत्तर

जीवों द्वारा जल, खनिज एवं लवण तथा ऑक्सीजन का उपयोग कच्चीसामग्रियों ग्रियों के रूप में किया जाता है। इन सामग्रियों का उपयोग कर जीव शरीर में होने वाली सभी जैव प्रक्रमों को पूरा करते हैं।

प्रश्न संख्या (4)

जीवन के अनुरक्षण के लिए आप किन प्रक्रमों को आवश्यक मानेंगे?

उत्तर

जीवन के अनुरक्षण के लिए जैव प्रक्रमों की आवश्यकता होती है। पोषण, श्वसन, प्रजनन, उत्सर्जन जैव प्रक्रम के अंतर्गत होने वाली प्रक्रियाएँ हैं इसके साथ ही गति भी जीवन के अनुरक्षण के लिए आवश्यक मानी गई है।

प्रश्न संख्या (5)

स्वयंपोषी पोषण तथा विषमपोषी पोषण के क्या अंतर है?

उत्तर

स्वयं के द्वारा वातावरण से कच्ची समाग्रियों को प्राप्त कर भोजन संश्लेषित कर पोषण प्राप्त करना स्वयंपोषी पोषण कहलाता है। जबकि स्वयंपोषी द्वारा संश्लेषित भोजन से पोषण प्राप्त करना विषमपोषी पोषण कहलाता है।

हरे पेड़ पौधे वातावरण से कच्ची सामग्रियोंमग्रियों को प्राप्त कर प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वार भोजन का संश्लेषण करते हैं तथा उससे पोषण प्राप्त करते हैं। अत: हरे पेड़ पौधों द्वारा स्वयं भोजन का संश्लेषण कर पोषण प्राप्त करना स्वयंपोषी पोषण कहलाता है। जबकि हरे पेड़ पौधों के अतिरिक्त अन्य सभी जीव जंतु हरे पेड़ पौधों द्वारा बनाये गये भोजन पर निर्भर होते हैं तथा उनसे पोषण प्राप्त करते हैं। अत: वैसे सभी जीव द्वारा, जो कि हरे पेड़ पौधे द्वारा बनाये गये भोजन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पोषण प्राप्त करते हैं, पोषण प्राप्त करने की प्रक्रिया विषमपोषी पोषण कहलाता है।

प्रश्न संख्या (6)

प्रकाशसंश्लेषण के लिये आवश्यक कच्ची सामग्री पौधा कहाँ से प्राप्त करता है?

उत्तर

प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाइअऑक्साइड, जल, तथा खनिज लवण की कच्ची समाग्री के रूप में आवश्यकता होती है। इसके अलावे पौधे को उर्जा की आवश्यकता होती है।

प्रकाशसंश्लेषण के लिए पौधा कच्ची सामग्री के रूप में कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल से, जल तथा खनिज लवण मिट्टी से प्राप्त करता है। इसके अलावे सूर्य की प्रकाश से उर्जा प्राप्त कर पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया संपन्न करते हैं। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा पौधे स्वयं के भोजन का संश्लेषण करते हैं।

प्रश्न संख्या (7)

हमारे आमाशय में अम्ल की भूमिका क्या है?

उत्तर

हमारे आमाशय में अम्ल की भूमिका निम्नांकित है:

(अ) भोजन के साथ आये हुए खतरनाक जीवाणुओं को मारना।

(ख) भोजन को सड़ने गलने से बचाना।

(ग) भोजन का विघटन कर पाचन में मदद करना।

प्रश्न संख्या (8)

पाचक एंजाइमों का क्या कार्य है?

उत्तर

एमाइलेज, पेप्सीन, ट्रिप्सीन, अग्नयाशयिक रस, तथा लाइपेज पाचन तंत्र में स्त्रावित होने वाले पाचक एंजाइम हैं।

एमाइलेज, लाला–रस (लार) में पाया जाता है। एमाइलेज भोजन में उपस्थित कार्बोहाइड्रेट को स्टार्च में बदलता है।

पेप्सीन जो कि एक पाचक एंजाइम है, आमाशय के भीतरी दीवार द्वारा स्त्रावित होती है। पेप्सीन भोजन में उपस्थित प्रोटीन को एमीनो एसिड में बदलने में मदद करता है।

ट्रिप्सीन, जो कि एक पाचक एंजाइम है, अग्नाशयिक रस में पाया जाता है। ट्रिप्सीन भोजन में उपस्थित प्रोटीन को एमिनो एसिड में बदलता है।

अग्नाशयिक रस भी एक पाचक रस है, अग्नाशय द्वारा स्त्रावित होता है। अग्नाशयिक रस कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में बदल देता है तथा भोजन के पाचन में मदद करता है।

लाइपेज, जो कि एक पाचक एंजाइम है, अग्नाशयिक रस में पाया जाता है। लाइपेज वसा को वसा अम्ल तथा ग्लिशरॉल में बदलता है।

इस प्रकार सभी पाचक एंजाईम विभिन्न कार्य तथा प्रक्रियाओं द्वारा भोजन को सरल पदार्थ में बदल कर पाचन में मदद करता है।

प्रश्न संख्या (9)

पचे हुए भोजन को अवशोषित करने के लिए क्षुद्रांत्र को कैसे अभिकल्पित किया गया है?

उतर

पचे हुए भोजन का अवशोषण क्षुद्रांत्र की भित्ति द्वार होता है। क्षुद्रांत्र की आंतरिक भित्ति (दीवार) पर अँगुली के समान अनेक प्रवर्ध होते हैं। क्षुद्रांत्र की दीवार अँगुली जैसी निकली हुई इन रचनाओं को दीर्धरोम या रसांकुर (villi) कहते हैं। दीर्घरोम (रसांकुर) अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं। इन दीर्घरोमों में रूधिर वाहिकाएँ बहुतायत में होती है। दीर्घरोमों की ये रूधिरवाहिकाएँ पचे हुए भोजन में उपस्थित पोषक़ तत्वों को अवशोषित कर शरीर के प्रत्येक कोशिकाओं तक पहुँचा देती हैं, जहाँ इन पोषक तत्वों का उपयोग उर्जा प्राप्त करने, नए ऊतकों के निर्माण और पुराने ऊतकों के मरम्मत में होता है।

प्रश्न संख्या (10)

श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने की दिशा में एक जलीय जीव की अपेक्षा स्थलीय जीव किस प्रकार लाभप्रद है?

उत्तर

जल में ऑक्सीजन की घुली हुई मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। इस घुली हुई ऑक्सीजन को जलीय जीव श्वास द्वारा लेते हैं तथा उस ऑक्सीजन का उपयोग श्वसन के लिए किया जाता है।

जबकि वायु में ऑक्सीजन की प्रचुरता होती है। स्थलीय जीव वायु से श्वास लेकर वायु में उपस्थित ऑक्सीजन का उपयोग श्वसन के लिए करते हैं।

श्वसन के लिए ऑक्सीजन जलीय जीव की अपेक्षा स्थलीय जीव को अधिक मात्रा में तथा आसानी से उपलब्ध है। अत: श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करना एक जलीय जीव की अपेक्षा अधिक आसान तथा लाभप्रद है।

प्रश्न संख्या (11)

ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से भिन्न जीवों में उर्जा प्राप्त करने के विभिन्न पथ क्या हैं?

उत्तर

ग्लूकोज से उर्जा प्राप्त करना श्वसन कहलाता है। श्वसन दो तरह के होते हैं: वायवीय श्वसन तथा अवायवीय श्वसन।

वायु की उपस्थिति में होने वाले श्वसन को वायवीय श्वसन तथा वायु की अनुपस्थिति में होने वाले श्वसन को अवायवीय श्वसन कहते हैं।

हमारे शरीर की कोशिकाओं वायु की उपस्थिति में ग्लूकोज के विघटन से उर्जा प्राप्त होती है। चूँकि यह वायु की उपस्थिति में होता है, अत: यह वायवीय श्वसन है। वायवीय श्वसन में ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है, तथा हमें अधिक उर्जा प्राप्त होती है।

कुछ जीवों जैसे बैक्टीरीया आदि में वायु की अनुपस्थिति में श्वसन होता है, तथा ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से उर्जा प्राप्त होती है। चूँकि यह वायु की अनुपस्थिति में होता है, अत: यह अवायवीय श्वसन है। अवायवीय श्वसन में ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण नहीं हो पाता है तदनुसार कम उर्जा प्राप्त होती है।

कभी कभी हमारे पेशियों में अधिक कार्य करने के क्रम में यथा दौड़ने आदि से ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, तथा वायु की अनुपस्थिति में श्वसन होने लगता है। इस अवायवीय श्वसन में ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण नहीं होकर उर्जा के साथ साथ लैक्टिक एसिड का निर्माण भी होता है। इस लैक्टिक एसिड बनने के कारण हमारे पेशियों में ऐंठन होने लगती है।

प्रश्न संख्या (12)

मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है जो संबंधित है

(a) पोषण

(b) श्वसन

(c) उत्सर्जन

(d) परिवहन

उत्तर (c) उत्सर्जन

ब्याख्या: मनुष्यों में दो वृक्क (किडनी) होते हैं जो रक्त में उपस्थित नाइट्रोजन युक्त शरीर के लिए अनावश्यक पदार्थों का छनन कर उसे मूत्र के रूप में उत्सर्जित कर देते हैं।

प्रश्न संख्या (13)

पादप में जाइलम उत्तरदायी है

(a) जल का वहन

(b) भोजन का वहन

(c) अमीनो अम्ल का वहन

(d) ऑक्सीजन का वहन

उत्तर: (a) जल का वहन

ब्याख्या: पादप जल तथा अन्य खनिज लवण मिट्टी से जड़ों के द्वारा अवशोषण कर प्राप्त करता है। जाइलम पादपों के पूरे भाग में, जड़ से लेकर तने तथा पत्तियों तक, फैला हुआ महीन केशिकाओं का जाल होता है। जाइलम के द्वारा पादप मिट्टी से जल का अवशोषण कर सभी भागों तक पहुँचाता है। जाइलम में जल आदि का परिवहन एक ही ओर अर्थात नीचे से ऊपर की ओर होता है।

प्रश्न संख्या (14)

स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है

(a) कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल

(b) क्लोरोफिल

(c) सूर्य का प्रकाश

(d) उपरोक्त सभी

उत्तर (d) उपरोक्त सभी

ब्याख्या: स्वपोषी पोषण पादपों में होता है। पादप की पत्तियों में क्लोरोफिल पाया जाता है। क्लोरोफिल एक हरे रंग का पदार्थ होता है, जिसके कारण पत्तियों का रंग हरा होता है। पादप वायुमंडल से पत्तियों में उपस्थित रन्ध्रों (स्टोमाटा) द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड तथा मिट्टी से जल जड़ों के द्वारा अवशोषण कर जल प्राप्त करते हैं। इसके बाद सूर्य की प्रकाश से उर्जा प्राप्त कर भोजन का संश्लेषण करते हैं। पादपों में भोजन के संश्लेषण की यह प्रक्रिया प्रकाश संश्लेषण कहलाती है। पादपों द्वारा स्वंय भोजन का संश्लेषण कर पोषक तत्व प्राप्त करना स्वपोषी पोषण कहलाता है।

प्रश्न संख्या (15)

पायरूवेट के विखंडन से यह कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा उर्जा देता है और यह क्रिया होती है

(a) कोशाद्रव्य

(b) माइटोकॉंड्रिया

(c) हरित लवक

(d) केन्द्रक

उत्तर (b) माइटोकॉंड्रिया

ब्याख्या: जटिल जीव, यथा मनुष्य, भोजन से प्राप्त ग्लूकोज के विखंडल से उर्जा प्राप्त करते हैं। उर्जा प्राप्त करने के लिए प्रथम चरण में ग्लूकोज का विघटन पायरूवेट में होता है। पायरूवेट का विघटन उष्माक्षेपी (Exothermic) है। अत: इसमें उर्जा निकलती है। तथा इससे प्राप्त उर्जा ATP (Adenosine triphosphate) के रूप में संरक्षित हो जाती है, जिसे आवश्यकतानुसार छोड़ा जाता है। श्वसन का यह प्रक्रम माइटोकॉन्ड्रिया में संपन्न होता है। चूँकि माइटोकॉन्ड्रिया, जो कोशिका (cell) के अंदर होती है, तथा इससे उर्जा प्राप्त होती है, अत: इसे कोशिका का उर्जा घर (पावर हाऊस) [Power house of cell] कहा जाता है।

प्रश्न संख्या (16)

हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रम कहाँ होता है?

उत्तर

क्षुद्रांत्र में भोजन के पहुँचने पर अग्नाशय से अग्नाशयिक रस प्राप्त करता है। अग्नाशयिक रस में एक प्रकार पाचक एंजाइम, जिसे लाइपेज कहलाता है, पाया जाता है। लाइपेज वसा पर क्रिया कर वसा को वसा अम्ल तथा ग्लिशरॉल में बदल देता है। इस प्रकार वसा का पाचन होता है।

वसा के पाचन का प्रक्रम क्षुद्रांत्र में होता है।

प्रश्न संख्या (17)

भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है?

उत्तर: भोजन को चबाने के क्रम में मुँह में उपस्थित लाला–ग्रंथियाँ, लाला रस का स्त्रावण करती है। लाला रस को लार या स्लाइवा भी कहा जाता है।

लार या स्लाइवा भोजन में मिलकर भोजन को लसलसा बना देता है, जिससे भोजन को निगलने में आसानी होती है। लार या स्लाइवा भोजन में उपस्थित ग्लूकोज पर क्रिया कर उसे स्टार्च में बदल कर भोजन के पाचन में सहयोग करता है।

प्रश्न संख्या (18)

स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन सी हैं और उसके उपोत्पाद क्या हैं?

उत्तर स्वयं के द्वारा बनाये गये भोजन से पोषक तत्वों की प्राप्ति, स्वपोषी पोषण कहलाता है। हरे पेड़ पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा स्वयं के भोजन का संश्लेषण करते हैं।

स्वपोषी पोषण के लिए क्लोरोफिल, सूर्य का प्रकाश, कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल एवं खनिज लवण का होना आवश्यक है। किसी एक की भी अनुपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया संपन्न नहीं होती है।

स्वपोषी पोषण के लिए भोजन के संश्लेषण में ऑक्सीजन एक उपोत्पाद (बाइप्रोडक्ट) होता है, जिसे प्रकाश संश्लेषण के समय पादपों द्वारा बाहर हवा में उत्सर्जित कर दिय जाता है।

प्रश्न संख्या (19)

वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में क्या अंतर हैं? कुछ जीवों के नाम लिखिए जिनमें अवायवीय श्वसन होता है।

उत्तर जंतु श्वसन की प्रक्रिया द्वारा पोषक तत्वों में उपस्थित ग्लूकोज से उर्जा प्राप्त करते हैं।

वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में अंतर
वायवीय श्वसनअवायवीय श्वसन
(क) हवा की उपस्थिति में होने वाला श्वसन वायवीय श्वसन कहलाता है।हवा की अनुपस्थिति में होने वाला श्वसन अवायवीय श्वसन कहलाता है।
(ख) वायवीय श्वसन में अधिक उर्जा निकलती है।अवायवीय श्वसन में वायवीय श्वसन की तुलना में काफी कम उर्जा निकलती है।
(ग) वायवीय श्वसन में ग्लूकोज का पूर्ण विघटन होता है।अवायवीय श्वसन में ग्लूकोज का आंशिक विघटन होता है।
(घ) वायवीय श्वसन में जल एक उत्पाद होता है।हमारे पेशियों में कभी कभी होने वाले अवायवीय श्वसन में लैक्टिक अम्ल एक उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है। तथा यीस्ट में होने वाले अवायवीय श्वसन में इथेनॉल एक उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।

अवायवीय श्वसन यीस्ट में तथा कुछ बैक्टीरीया में होता है। अवायवीय श्वसन कभी कभी हमारी पेशियों में हवा के आभाव में होता है।

प्रश्न संख्या (20)

गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ किस प्रकार अभिकल्पित हैं?

उत्तर

श्वास मार्ग फुफ्फुस के अंदर जाकर छोटी छोटी नलिकाओं में विभाजित हो जाती हैं, इन नलिकाओं के अंत में छोटे छोटे गुब्बारे जैसी कई आकृतियाँ होती हैं, जो कूपिकाएँ (Alveoli) कहलाती हैं। ये कूपिकाएँ (Alveoli) श्वास के साथ जाने वाली हवा तथा फुफ्फुस में आने वाले रक्त को अधिक क्षेत्रफल उपलब्ध कराती हैं ताकि गैसों का विनिमय अधिकतम हो सके।

प्रश्न संख्या (21)

हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं?

उत्तर

हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन युक्त रक्त का परिवहन करता है।

हीमोग्लोबिन की कमी होने से

(क) ऑक्सीजन युक्त रक्त पर्याप्त मात्रा में सभी कोशिकाओं तक नहीं पहुँच पायेगा।

(ख) ऑक्सीजन युक्त रक्त पर्याप्त मात्रा में सभी जगह नहीं पहुँचने के कारण हमारे शरीर में श्वसन अच्छी तरह नहीं हो पायेगा और हमें आवश्यकता के अनुरूप पर्याप्त उर्जा प्राप्त नहीं हो पायेगी।

(ग) पर्याप्त उर्जा नहीं मिलने से हमारा शरीर किसी भी कार्य को पूरी दक्षता से नहीं कर पायेगा और हमें हमेशा थकान महसूस होगी।

(घ) हीमोग्लोबीन की शरीर में कमी होने की स्थिति को एक बीमारी अनिमिया (रक्त की कमी या लाल रक्त की कमी) कहा जाता है।

प्रश्न संख्या (22)

मनुष्य में दोहरा परिसंचरण की ब्याख्या कीजिए। यह क्यों आवश्यक है?

उत्तर

मानव तथा अन्य स्तनपायी एवं जटिल जंतुओं में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रक्त अलग अलग रक्त नलिकाओं द्वारा हृदय में जाता है, अर्थात दो बार में हृदय में पहुँचता है। रक्त के अगल अलग अर्थात दो बार में हृदय में पहुँचने के कारण इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं।

चूँकि मानव तथा अन्य जटिल जंतुओं को अधिक उर्जा की आवश्यकता होती है, अत: दोहरा परिसंचरण के कारण अधिक मात्रा में ऑक्सीजन कोशिकाओं में पहुँचता है जिससे वायवीय श्वसन होता है तथा ग्लूकोज का पूर्ण विघटन होने से अधिक उर्जा प्राप्त होती है।

अत: मानव सहित अन्य वार्म ब्लड जंतुओं के लिए दोहरा परिसंचरण आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न संख्या (23)

जाइलम तथा फ्लोएम में पदार्थों के वहन में क्या अंतर है?

उत्तर

जाइलम तथा फ्लोएम मे पदार्थों के वहन में अंतर
जाइलमफ्लोएम
(क) जाइलम पादपों में जल का परिवहन जड़ से लेकर पादप के अन्य भागों तक करता है।फ्लोएम पत्तियों जहाँ पादप द्वारा भोजन का संश्लेषण किया जाता है से पोषक़ तत्वों का परिवहन अन्य सभी भागों तक करता है।।
(ख) जाइलम में परिवहन एक ही ओर अर्थात केवल नीचे से ऊपर की ओर होता है।।फ्लोएम के द्वारा पादपों में पोषक तत्वों का परिवहन आवश्यकता के अनुसार दोनों दिशाओं में होता है।

प्रश्न संख्या (24)

फुफ्फुस में कूपिकाओं की तथा वृक्क में वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि की तुलना कीजिए।

उत्तर

फुफ्फुस में कूपिकाओं की तथा वृक्क में वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि की तुलना
कूपिकाएँवृक्काणु
(क) फुफ्फुस में पायी जाती हैं।वृक्क में पाये जाते हैं ।
(ख) केवल एक नलिकाओं द्वारा गैसों का आदान प्रदान होता है।अशुद्ध रक्त एक नलिका द्वारा जाती हैं तथा वर्ज्य पदार्थ दूसरी नलिका द्वारा मूत्र के रूप में मूत्राशय में पहुँचती हैं, अर्थात दो प्रकार की नलिकाओं से जुड़ी रहती हैं।
(ग) गोल गुब्बारे जैसी आकृति कूपिकाएँ (Alveoli) कहलाती हैं।गोल गुबारे जैसी आकृति बोमन संपुट (Bowmans Capsule) कहलाती हैं।
(घ) रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड को अलग करती हैं।रक्त से नाइट्रोजन युक्त वर्ज्य पदार्थों को अलग करता है।
(च) रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड को विसरण द्वारा अलग किया जाता है।रक्त से नाइट्रोजन युक्त वर्ज्य पदार्थों को छनन द्वारा अलग करता है।
(ज) रक्त से वर्ज्य पदार्थ कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन गैस के रूप में होता है।रक्त से नाइट्रोजन युक्त वर्ज्य पदार्थों का छनन तरल के रूप में होता है।

प्रश्न संख्या (25)

मनुष्यों में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कैसे होता है?

उत्तर

मनुष्य हवा में उपस्थित ऑक्सीजन को श्वास द्वारा खींचता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड को नि:श्वास के क्रम में हवा में छोड़ता है।

मनुष्यों में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड के परिवहन के लिए एक विशेष तंत्र उपलब्ध होता है। इस तंत्र में मुख्य रूप हृदय, फुफ्फुस, धमनी तथा शिराएँ होती हैं जो ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का वहन करती है।

हृदय (हर्ट) : हृदय एक पम्प की तरह कार्य करता है। हृदय पूरे शरीर से आने वाले कार्बन डाइऑक्साइड से युक़्त रूधिर को एकत्रित कर फुफ्फुस (लंग) में भेजता है। तथा फुफ्फुस से आने वाले ऑक्सीकृत रूधिर अर्थात ऑक्सीजन युक्त रूधिर को पूरे शरीर में भेजने का कार्य करता है।

फुफ्फुस (लंग) : हमारा लंग हृदय से आये हुए कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रूधिर को श्वास द्वारा ली हुई हवा में उपस्थित ऑक्सीजन से संयोग कराकर ऑक्सीकृत कर हृदय में वापस कर देता है तथा रूधिर के ऑक्सीकरण के क्रम में निकले हुए कार्बन डाइऑक्साइड को श्वास द्वारा बाहर निकाल देता है।

हमारे शरीर में दो तरह की रक्त वाहिनी नलिकाएँ होती है जो पूरे शरीर में फैली होती हैं। ये धमनी तथा शिराएँ कहलाती हैं।

धमनी : धमनी हृदय से ऑक्सीकृत रूधिर को पूरे शरीर में पहुँचाती हैं।

शिराएँ : शिराएँ पूरे शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रूधिर को हृदय तक पहुँचाती हैं।

प्रश्न संख्या (26)

गैसों के विनिमय के लिए मानव फुफ्फुस में अधिकतम क्षेत्रफल को कैसे अभिकल्पित क्या है?

उत्तर

फुफ्फुस (लंग्स) के अंदर श्वास नली का मार्ग छोटी और नलिकाओं में विभाजित हो जाता है जो अंत में गुब्बारे जैसी रचनाओं में अंतकृत हो जाता है। इन गुब्बारे जैसी रचनाओं को कूपिका कहते हैं। ये कूपिकाएँ गैसों के विनिमय के लिए एक सतह उपलब्ध कराती हैं। श्वास की नलिकाएँ के इस तरह के कूपिकाओं में विभाजन गैसों के विनिमय के लिए मानव फुफ्फुस में अधिकतम क्षेत्रफल उपलब्ध कराती है ताकि गैसों का विनिमय आसानी से हो सके।

प्रश्न संख्या (27)

मानव में वहन तंत्र के घटक कौन से हैं? इन घटकों के क्या कार्य हैं?

उत्तर

मानव में वहन तंत्र के घटक हैं हृदय, फुफ्फुस, धमनी तथा शिराएँ होती हैं जो ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का वहन करती है।

धमनी : धमनी हृदय से ऑक्सीकृत रूधिर को पूरे शरीर में पहुँचाती हैं।

शिराएँ: शिराएँ पूरे शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रूधिर को हृदय तक पहुँचाती हैं।

हृदय (हर्ट) : हृदय एक पम्प की तरह कार्य करता है। हृदय पूरे शरीर से आने वाले कार्बन डाइऑक्साइड से युक़्त रूधिर को एकत्रित कर फुफ्फुस (लंग) में भेजता है। तथा फुफ्फुस से आने वाले ऑक्सीकृत रूधिर अर्थात ऑक्सीजन युक्त रूधिर को पूरे शरीर में भेजने का कार्य करता है।

फुफ्फुस (लंग) : हमारा लंग हृदय से आये हुए कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रूधिर को श्वास द्वारा ली हुई हवा में उपस्थित ऑक्सीजन से संयोग कराकर ऑक्सीकृत कर हृदय में वापस कर देता है तथा रूधिर के ऑक्सीकरण के क्रम में निकले हुए कार्बन डाइऑक्साइड को श्वास द्वारा बाहर निकाल देता है।

हमारे शरीर में दो तरह की रक्त वाहिनी नलिकाएँ होती है जो पूरे शरीर में फैली होती हैं तथा रक्त एवं गैसों का वहन करती हैं। ये धमनी तथा शिराएँ कहलाती हैं।

प्रश्न संख्या (28)

स्तनधारी तथा पक्षियों में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रूधिर को अलग करना क्यों आवश्यक है?

उत्तर

स्तनधारी तथा पक्षी गर्म रूधिर वाले जानवर (वार्म ब्लडेड एनिमल) होते हैं। अर्थात स्तनधारी तथा पक्षियों में उनका रक्त मौसम के अनुसार गर्म या ठंढ़ा नहीं होता है, बल्कि मनुष्य को दूसरी युक्तियों द्वारा, जैसे जाड़े के मौसम में गर्म कपड़े पहनकर, अपने ब्लड तथा शरीर के तापक्रम को नियंत्रित करना पड़ता है, तथा दूसरे स्तनधारी जीव, जैसे भालू को ठंढ़ से बचने के लिए शरीर पर रोयें की मोटी परत होती है।

इन तरह के जानवरों को अधिक उर्जा की आवश्यकता होती है। यह उर्जा ग्लूकोज के पूर्ण ऑक्सीकरण अर्थात विघटन से प्राप्त होती है। ग्लूकोज के पूर्ण ऑक्सीकरण के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन की आवश्यकता को ध्यान रखते हुए स्तनधारी तथा पक्षियों का हृदय चार भागों में बँटा होता है, तथा ऑक्सीकृत और विऑक्सीकृत रक्त अलग अलग रक्त नलिकाओं द्वारा पूरे शरीर में दौड़ता है।

चूँकि स्तनधारी तथा पक्षियों को अधिक उर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए इस अधिक उर्जा की पूर्ति के लिए इनके शरीर में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रूधिर को अलग करना आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न संख्या (29)

उच्च संगठित पादप में वहन तंत्र के घटक क्या हैं?

उत्तर

पादपों में वहन के लिए दो तरह के टिशू (ऊतक) होते हैं जिन्हें जाइलम (xylem) तथा फ्लोएम (Phloem) कहा जाता है। ये दोनो ऊतक जाइलम (xylem) तथा फ्लोएम (Phloem) पादपों में जड़ से लेकर विभिन्न भागों तक फैला होता है। ये टिशू विभिन्न पदार्थों को जड़ विभिन्न भागों तक तथा पत्तियों, जहाँ पौधों द्वारा भोजन का संश्लेषण किया जाता है विभिन्न भागों तक पहुँचाते हैं अर्थात परिवहन या वहन करते हैं।

जाइलम (xylem) द्वारा जल का परिवहन जड़ से लेकर विभिन्न भागों तक होता है तथा इसके द्वारा होने वाले वहन की दिशा एक ही ओर होती है।

फ्लोएम (Phloem) द्वारा पौधे द्वारा संश्लेषित भोजन के पोषक तत्वों का परिवहन पत्तियों से पौधों के विभिन्न भागों तक होता है। फ्लोएम में वहन आवश्यकता के अनुसार दोनों दिशाओं में होता है।

प्रश्न संख्या (30)

पादप में जल और खनिज लवण का वहन कैसे होता है?

उत्तर

पादपों के पूरे भाग में एक विशेष प्रकार के ऊतक, जिसे जाइलम (xylem) कहा जाता है, का जाल फैला होता है। जाइलम (xylem) की रचना बहुत महीन केशिकाओं (capillaries) जैसी होती है।

पादपों में जल और खनिज लवण का वहन इन ऊतकों, जाइलम (xylem), के द्वारा जड़ से अवशोषित होकर विभिन्न भागों तक होता है।

प्रश्न संख्या (31)

पादप में भोजन का स्थानांतरण कैसे होता है?

उत्तर

पादप के पूरे भाग में एक विशेष प्रकार के ऊतक, जिन्हें फ्लोएम (Phloem) कहा जाता है, का जाल फैला होता है। फ्लोएम बहुत ही महीन केशिकाओं के रूप में होता है।

फ्लोएम (Phloem) द्वारा पौधे द्वारा संश्लेषित भोजन के पोषक तत्वों का परिवहन पत्तियों से पौधों के विभिन्न भागों तक होता है। फ्लोएम में वहन आवश्यकता के अनुसार दोनों दिशाओं में होता है।

भोजन से प्राप्त पोषक तत्वों का परिवहन स्थानांतरण (Translocation) कहलाता है। इन पोषक तत्वों का स्थानांतरण विशेष रूप से जड़ के भंडारण अंगों, फलों, बीजों तथा बृद्धि वाले अंगों में होता है।

प्रश्न संख्या (32)

वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।

उत्तर

मानव शरीर में रक्त में उपस्थित नाइट्रोजन युक्त वर्ज्य पदार्थों रक्त से अलग करने के लिए दो वृक्क (किडनी) होते हैं। प्रत्येक वृक्क (किडनी) प्रत्येक किडनी (वृक्क) में ऐसे अनेक फिल्टरेशन यूनिट (निश्यंदन एकक) होते हैं, जिन्हें वृक्काणु (नेफ्रान) कहा जाता है। ये वृक्काणु (नेफ्रान) आपस में निकटता से पैक रहते हैं।

वृक्काणु एक बेसिक फिल्टरेशन यूनिट होता है जो अत्यंत पतली दीवार वाली रूधिर कैपिलरी (केशिकाओं) का गुच्छा (cluster) होता है। वृक्क में प्रत्येक केशिका गुच्छ (capillary cluster) एक नलिका के कप के आकार के सिरे के अंदर होता है, यह नलिका बोमन सम्पुट (Bowmans capsule) कहलाता है।

यह नलिका छने हुए मूत्र को एकत्र करती है। यह छना हुआ मूत्र एक लंबी नलिका, जिसे मूत्रवाहिनी कहते हैं, में प्रवेश करता है। यह मूत्रवाहिनी वृक्क को मूत्राशय से जोड़ती है।

प्रश्न संख्या (33)

उत्सर्जी उत्पाद से छुटकारा पाने के लिए पादप किन विधियों का उपयोग करते हैं।

उत्तर

पादपों में प्रकाश संश्लेषण के क्रम में ऑक्सीजन भी एक अपशिष्ट के रूप में निकलता है। इसके अतिरिक्त अधिक जल की मात्रा, कई कोशिकाएँ तथा अन्य कई पदार्थ अपशिष्ट के रूप में निकलते हैं जिनका छुटकारा निम्न तरह से होता है:

(क) पादपों में प्रकाश संश्लेषण के क्रम में ऑक्सीजन एक उत्सर्जी उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है। ऑक्सीजन का उत्सर्जन पत्तियों में वर्तमान रन्ध्रों के द्वारा होता है।

(ख) पौधे में उपस्थित अतिरिक्त जल का उत्सर्जन वाष्पीकरण द्वारा होता है।

(ग) पादपों में धीरे धीरे बहुत सारी कोशिकाएँ मृत हो जाती हैं जो ऊतक के रूप में रहते हैं इनका उत्सर्जी पदार्थों से छुटकारा पात्तियों आदि के क्षय के रूप में होता है।

(घ) पादपों में कुछ अपशिष्ट उत्पादों का छुटकारा गोंद तथा रेजिन के माध्यम से होता है।

(च) पादप के कुछ अपशिष्ट पदार्थ वे आसपास की मृदा में उत्सर्जित करते हैं।

प्रश्न संख्या (34)

मूत्र बनने की मात्रा का नियमन किस प्रकार होता है?

उत्तर

मूत्र मानव शरीर से निकलने वाला एक अपशिष्ट है, इस प्रक्रिया में मूलत: वृक्क (किडनी) में होती है जिसमें रक्त में उपस्थित वर्ज्य पदार्थों का छनन (निस्यंदन) होता है।

रक्त के प्रारंभिक निस्यंदन (फिल्टरेशन) में कुछ पदार्थ जैसे ग्लूकोज, अमीनो एसिड, लवण तथा प्रचुर मात्रा में जल रह जाते हैं। जैसे जैसे मूत्र वृक्काणु वाली नलिका में प्रवेश करता है इन पदार्थों का आवश्यकता के अनुसार चयनित रूप में पुन: अवशोषण हो जाता है। जल की मात्रा का पुन: अवशोषण शरीर में उपलब्ध अतिरिक्त जल की मात्रा पर तथा कितना विलेय वर्ज्य उत्सर्जित करना है, पर निर्भर करता है। इस प्रकार मूत्र बनने की मात्रा का नियमन होता है।


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