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नेत्र संरचना, दोष एवं संशोधन

नेत्र एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण ज्ञानेन्द्री है। यह हमारा नेत्र ही है जो हमें अपने चारों तरफ फैले रंग विरंगे संसार को देखने के योग्य बनाता है।

नेत्र एक कैमरा की तरह कार्य करता है, बल्कि कैमरे का आविष्कार हमारी आँखों को देखकर ही किया गया है और यह कहना ज्यादा उचित होगा कि एक कैमरा हमारी आँखों की तरह ही कार्य करता है।

मानव नेत्र (The Human Eye)

मानव नेत्र की संरचना (Structure of the human eye)

नेत्र की संरचना एक गोले के आकार की होती है। किसी वस्तु से आती हुई प्रकाश की किरण हमारी आँखों में आँखों के लेंस के द्वारा प्रवेश करती है तथा रेटिना पर प्रतिबिम्ब बनाती है। दृष्टि पटल (रेटिना (Retina)) एक तरह का प्रकाश संवेदी पर्दा होता है, जो कि आँखों के पृष्ट भाग में होता है। दृष्टि पटल (रेटिना (Retina)) प्रकाश सुग्राही कोशिकाओं द्वारा, प्रकाश तरंगो के संकेतों को मस्तिष्क को भेजता है, और हम संबंधित वस्तु को देखने में सक्षम हो पाते हैं। कुल मिलाकर आँखों द्वारा किसी भी वस्तु को देखा जाना एक जटिल प्रक्रिया है।

नेत्र गोलक (Eye Ball)

पूरा नेत्र, नेत्र गोलक कहलाता है। मानव नेत्र गोलक का आकार एक गोले के समान होता है। नेत्र गोलक का ब्यास लगभग 2.3 cm2.3 cm के बराबर होता है। नेत्र गोलक कई भागों में बँटा रहता है।

स्वच्छ मंडल या कॉर्निया (Cornea)

स्वच्छ मंडल या कॉर्निया (Cornea) एक पारदर्शी पतली झिल्ली होती है, तथा यह नेत्र गोलक के अग्र पृष्ट पर एक पारदर्शी उभार बनाती है। किसी भी वस्तु से आती प्रकाश की किरण स्वच्छ मंडल या कॉर्निया (Cornea) होकर ही आँखों में प्रवेश करती है। स्वच्छ मंडल या कॉर्निया (Cornea) आँखों की पुतली (pupil), परितारिका (Iris) तथा नेत्रोद (aqueous humor) को ढ़कता है। स्वच्छ मंडल या कॉर्निया (Cornea) का पारदर्शी होना बहुत ही महत्वपूर्ण तथा मुख्य गुण है। स्वच्छ मंडल या कॉर्निया (Cornea) में रक्त वाहिका नहीं होती है। स्वच्छ मंडल या कॉर्निया (Cornea) को बाहर से अश्रु द्रव के विसरण द्वारा तथा भीतर से नेत्रोद (aqueous humor) के विसरण से पोषण मिलता है।

नेत्र में प्रवेश करने वाली प्रकाश की किरणों का अधिकांश अपवर्तन स्वच्छ मंडल [कॉर्निया (Cornea)] के बाहरी पृष्ठ पर होता है।

परितारिका (Iris)

irisपरितारिका (Iris) एक पतला, गोलाकार तथा गहरे रंग का पेशीय डायफ्राम होता है, जो स्वच्छ मंडल [कॉर्निया (Cornea)] के पीछे रहता है। परितारिका (Iris) पुतली के आकार (size) को नियंत्रित करता है ताकि रेटिना तक प्रकाश की आवश्यक एवं सही मात्रा पहुँच सके। परितारिका (Iris) के रंगों के द्वारा ही किसी व्यक्ति की आँखों का विशेष रंग होता है या निर्धारित होता है।

पुतली (Pupil)

pupilपरितारिका (Iris) के बीच में एक गोल छेद के जैसा होता है, जिसे पुतली (Pupil) कहते हैं। पुतली (Pupil) आँखों में प्रवेश करने वाली प्रकाश की किरणों को नियंत्रित करता है, ताकि प्रकास की सही मात्रा रेटिना (दृष्टिपटल) तक पहुँच सके। मनुष्य की पुतली गोलाकार होती है।

अभिनेत्र लेंस या लेंस या क्रिस्टलीय लेंस (Lens or Crystalline Lens)

आँखों का लेंस (अभिनेत्र लेंस) अन्य लेंसों की तरह का ही होता है। आँखों में पारदर्शी द्वि–उत्तल लेंस होता है, जो रेशेदार अवलेह (fibrous jelly) जैसे पदार्थ से बना होता है। अभिनेत्र लेंस परितारिका (Iris) के ठीक नीचे अवस्थित होता है। अभिनेत्र लेंस किसी भी वस्तु से आती हुई प्रकाश की किरणों को अपवर्तित कर उसका उलटा तथा वास्तविक प्रतिबिम्ब रेटिना (दृष्टिपटल) पर बनाता है।

दृष्टिपटल (Retina)

दृष्टिपटल (Retina) आँखों के पिछ्ले भाग में होता है, या आँखों के अंदर के पिछ्ले भाग को दृष्टिपटल (Retina) कहते हैं। दृष्टिपटल (Retina) एक सूक्ष्म झिल्ली होती है, जिसमें बृहत संख्यां में प्रकाश सुग्राही कोशिकाएँ (Light sensitive cells) होती हैं। ये प्रकाश सुग्राही कोशिकाएँ (Light sensitive cells) बिद्युत सिग्नल उत्पन्न करती हैं। किसी वस्तु से आती हुई प्रकाश की किरणें अभिनेत्र लेंस द्वारा अपवर्तन के पश्चात रेटिना पर प्रतिबिम्ब बनाता है। दृष्टिपटल (Retina) पर प्रतिबिम्ब बनते ही उसमें वर्तमान प्रकाश सुग्राही कोशिकाएँ (Light sensitive cells) प्रदीप्त होकर सक्रिय हो जाती हैं तथा विद्युत संकेतों को उत्पन्न करती हैं। ये विद्युत संकेत दृक तंत्रिकाओं द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचा दिये जाते हैं। मस्तिष्क इन संकेतों की व्याख्या करता है तथा अंतत: इस सूचना को संसाधित करता है जिससे कि हम किसी वस्तु को जैसा है, वैसा ही देख पाते हैं।

समंजन क्षमता (Power of Accommodation)

अभिनेत्र लेंस की वह क्षमता जिसके कारण वह अपनी फोकस दूरी को समायोजित कर लेता है, समंजन या समंजन क्षमता कहलाती है।

दूसरे शब्दों में, अभिनेत्र लेंस की वक्रता (curvature focus or focal length) का किसी खास दूरी पर रखे वस्तु को देखने के लिये बढ़ना या घटना या बढ़ाना या घटाना समंजन क्षमता कहलाती है।

अभिनेत्र लेंस रेशेदार जेली जैसे पदार्थ से बना होता है, जिसके कारण यह लचीला होता है। अभिनेत्र लेंस से जुड़े हुए पक्ष्माभी पेशियों (ciliary muscles) के द्वारा लेंस की वक्रता में कुछ सीमाओं तक रूपांतरण किया जा सकता है। अभिनेत्र लेंस की वक्रता में परिवर्तन से लेंस की फोकस दूरी भी परिवर्तित हो जाती है।

जब पक्ष्माभी पेशियाँ (ciliary muscles) शिथिल (relax) हो जाती है, तो अभिनेत्र लेंस पतला हो जाता है, जिससे लेंस की फोकस दूरी बढ़ जाती है। अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी बढ़ने के कारण हम दूर रखी वस्तुओं को स्पष्ट देखने में समर्थ हो पाते हैं।

तथा जब पक्ष्माभी पेशियाँ (ciliary muscles) सिकुड़ (Contract or Contraction) जाती है तो अभिनेत्र लेंस मोटा हो जाता है, तथा इसकी वक्रता बढ़ जाती है। वक्रता बढ़ने से लेंस की फोकस दूरी घट जाती है। अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी घट जाने से हम नजदीक रखी वस्तुओं को स्पष्ट देखने में समर्थ हो पाते हैं।

लेकिन अभिनेत्र लेंस की समंजन क्षमता एक निश्चित सीमा तक ही होती है। क्योंकि अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी एक निश्चित सीमा से कम नहीं हो सकती। यह न्यूनतम दूरी आँख से 25 cm25 cm है।

सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी या नेत्र का निकट बिन्दु (Least Distance of Distinct Vision or Near Point of Eye)

वह न्यूनतम दूरी जिस पर रखी कोई वस्तु बिना तनाव के अत्यधिक स्पष्ट देखी जा सकती है, उसे सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी या नेत्र का निकट बिन्दु कहते हैं।

किसी समान्य दृष्टि के तरूण वयस्क के लिये निकट बिन्दु की आँख से दूरी लगभग 25 cm25 cm होती है।

नेत्र का दूर– बिन्दु (Far Point of Eye)

वह दूरतम बिन्दु जिस तक कोई नेत्र वस्तुओं को सुस्पष्ट देख सकता है, नेत्र का दूर– बिन्दु (Far Point) कहलाता है।

सामान्य नेत्र के लिये दूर– बिन्दु (Far Point) अनंत दूरी पर होता है।

अत: एक सामान्य नेत्र 25 cm25 cm से अनंत दूरी तक रखी सभी वस्तुओं को सुस्पष्ट देख सकता है।

दृष्टि दोष तथा उनका संशोधन (Defects of Vision and their Correction)

कभी कभी नेत्र धीरे धीरे अपनी समंजन क्षमता खो देते हैं, जिसके कारण व्यक्ति वस्तुओं को आराम से सुस्पष्ट नहीं देख पाता है। नेत्र में अपवर्तन दोषों के कारण दृष्टि धुँधली हो जाती है, इसे नेत्र दोष कहते हैं।

अपवर्तन दोष के कारण होने वाले नेत्र दोष मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं। ये दोष हैं: (i) निकट दृष्टि दोष (Myopia), (ii) दीर्घ दृष्टि दोष (Hypermetropia) तथा (iii) जरा दूरदृष्टिता (Presbyopia)

निकट दृष्टि दोष या निकटदृष्टिता (Myopia or Near Sightedness or Short Sightedness)

निकट दृष्टि दोष को निकट दृष्टिता भी कहा जाता है। निकट दृष्टि दोष से युक्त एक व्यक्ति निकट रखी वस्तुओं को तो स्पष्ट देख सकता है, परंतु दूर रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख पाता है।

निकट दृष्टि दोष या निकटदृष्टिता का कारण (Cause of Myopia or Near Sightedness or Short Sightedness)

(a)अभिनेत्र लेंस की वक्रता का अत्यधिक हो जाना या

(b) नेत्र गोलक का लम्बा हो जाना

अभिनेत्र लेंस की वक्रता का अत्यधिक हो जाने या नेत्र गोलक के लम्बा हो जाने के कारण निकट दृष्टि दोष से युक्त व्यक्ति का दूर बिन्दु अनंत पर न होकर नेत्र के पास आ जाता है। जिसके कारण निकट दृष्टि दोष से युक्त नेत्र में, किसी दूर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब दृष्टिपटल [रेटिना (Retina)] पर न बनकर, दृष्टिपटल [रेटिना (Retina)] के सामने थोड़ा आगे बनता है। तथा निकट दृष्टि दोष से युक्त व्यक्ति दूर रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख पाता है।

निकट दृष्टि दोष या निकटदृष्टिता का संशोधन (Correction of Mypoia Near Sightedness or Short Sightedness)

निकट दृष्टि दोष या निकटदृष्टिता को उपयुक्त क्षमता का अवतल लेंस (अपसारी ताल (concave lens)) के उपयोग द्वारा संशोधन किया जा सकता है। अवतल लेंस (अपसारी ताल (concave lens)) दूर से आती प्रकाश की किरणों को अपसरित कर वस्तु का प्रतिबिम्ब थोड़ा पीछे अर्थात सही जगह पर दृष्टिपटल [रेटिना (Retina)] पर बनाता है, जिससे निकट दृष्टि दोष या निकटदृष्टिता से पीड़ित व्यक्ति दूर रखे वस्तु को स्पष्ट देखने में सक्षम हो जाता है।

दीर्घ–दृष्टि दोष या दूर–दृष्टिता (Hypermetropia or Far Sightedness)

दीर्घ–दृष्टि दोष को (Hypermetropia) दूर–दृष्टिता (Far Sightedness) भी कहा जाता है। दीर्घ–दृष्टि दोष (Hypermetropia) या दूर–दृष्टिता (Far Sightedness) से पीड़ित व्यक्ति दूर रखे वस्तु को तो स्पष्ट देख पाता है परंतु निकट रखी वस्तु को सुस्पष्ट नहीं देख पाता है। इस तरह इस दोष से पीड़ित व्यक्ति नजदीक रखे वस्तु को धुंधला देखता है।

दीर्घ–दृष्टि दोष या दूर–दृष्टिता का कारण(Cause of Hypermetropia or Far Sightedness)

(a)अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी का अत्यधिक हो जाना अथवा

(b)नेत्र गोलक का छोटा हो जाना

अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी का अत्यधिक हो जाने अथवा नेत्र गोलक के छोटा हो जाने के कारण दीर्घ–दृष्टि दोष या दूर–दृष्टिता से युक्त व्यक्ति का निकट बिन्दु सामान्य निकट बिन्दु (25 cm25 cm) से दूर हट जाती है। इसके कारण वस्तु से आने वाली प्रकाश किरणें दृष्टिपटल के पीछे फोकसित होती है, तथा वस्तु का प्रतिबिम्ब दृष्टिपटल पर नहीं बनकर उससे थोड़ा पीछे बनता है। वस्तु का प्रतिबिम्ब दृष्टिपटल से थोड़ा पीछे बनने के कारण दीर्घ दृष्टिदोष से पीड़ित व्यक्ति नजदीक रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख पाता अर्थात धुंधला देखता है।

इस दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति को आराम से सुस्पष्ट पढ़ने के लिये पठन सामग्री को नेत्र से 25 cm25 cm से काफी दूरी पर रखना पड़ता है, इस कारण से इस दोष को दीर्घ दृष्टिदोष या दूर दृष्टिता कहते हैं

दीर्घ–दृष्टि दोष या दूर–दृष्टिता का संशोधन (Correction of Hypermetropia or Far Sightedness)

इस दोष को उपयुक्त क्षमता के अभिसारी लेंस [उत्तल लेंस या ताल (Convex lens)] के उपयोग से संशोधित किया जा सकता है। उत्तल ताल [अभिसारी लेंस (Convex lens)] नजदीक रखी वस्तु से आती प्रकाश की किरणों को अभिसरित कर (थोड़ा अंदर की ओर झुका कर) वस्तु का प्रतिबिम्ब सही जगह अर्थात दृष्टिपटल पर बनाता है, तथा इस दोष से पीड़ित व्यक्ति नजदीक रखे वस्तुओं को सुस्पष्ट देख पाता है।

जरा–दूरदृष्टिता (Presbyopia)

आयु में वृद्धि के साथ नेत्र की समंजन क्षमता घटने से उत्पन्न दोष को जरा–दूरदृष्टिता (Presbyopia) कहते हैं। आयु में वृद्धि होने के साथ साथ मानव नेत्र की समंजन क्षमता भी घट जाती है, तथा अधिक उम्र के व्यक्ति पास रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख पाते।

जरा–दूरदृष्टिता का कारण (Cause of Presbyopia)

पक्ष्माभी पेशियों (Ciliary muscles) का धीरे धीरे दुर्बल हो जाने के कारण जरा–दूरदृष्टिता (Presbyopia) उत्पन्न हो जाता है। पक्ष्माभी पेशियों (Ciliary muscles) का धीरे धीरे दुर्बल हो जाने के कारण अधिकांश व्यक्तियों के नेत्र का निकट बिन्दु दूर हट जाता है तथा उनके अभिनेत्र लेंस की समंजन क्षमता घट जाती है, जिसके कारण इस दोष से पीड़ित व्यक्ति प्राय: पास रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख पाता है।

जरा–दूरदृष्टिता का संशोधन (Correction of the eye defect of Presbyopia)

जरा–दूरदृष्टिता (Presbyopia) का संशोधन उपयुक्त क्षमता का अभिसारी लेंस (Convex lens) लगाकर किया जाता है। उपयुक्त क्षमता का अभिसारी लेंस (Convex lens) पास रखी वस्तुओं से आती प्रकाश की किरणों को सही स्थान पर फोकस कर वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर बनाता है, जिससे जरा–दूरदृष्टिता से पीड़ित व्यक्ति पास रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट देख पाता है।

द्विफोकसी लेंस (Bifocal Lens)

द्विफोकसी लेंस (Bifocal Lens) का अर्थ है दो तरह के फोकस वाला लेंस। द्विफोकसी लेंस (Bifocal Lens) अवतल तथा उत्तल लेंसों को मिलाकर बनाया जाता है। द्विफोकसी लेंस (Bifocal Lens) में अवतल लेंस को उपरी भाग में तथा उत्तल लेंस को निचले भाग में लगाया जाता है, जिससे व्यक्ति आँखों को उपर करके दूर की वस्तुओं को तथा आँखों को नीचे करके नजदीक की वस्तुओं को देख पाता है।

कभी कभी किसी व्यक्ति के नेत्र में में दोनों ही प्रकार के दोष निकट दृष्टि तथा दूर दृष्टि दोष हो सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों को वस्तुओं को सुस्पष्ट देख सकने के लिये प्राय: द्विफोकसी लेंस (Bifocal Lens) की आवश्यकता होती है।

ये सभी प्रकार के दृष्टि दोषों को अपवर्तन दोष कहते हैं क्योंकि इन दोष के कारण अभिनेत्र लेंस द्वारा वस्तुओं से आती हुई प्रकाश का अपवर्तन सही तरीके से नहीं हो पाता है।

आज आधुनिक तकनीकों के विकसित हो जाने से नेत्रों के अपवर्तन दोष का संशोधन संस्पर्श लेंस (Contact lens) अथवा शल्य चिकित्सा द्वारा भी संभव हो पाया है।

संस्पर्श लेंस (Contact lens) चश्मों में लगाये जाने वाले लेंसों की तरह ही होते हैं। परंतु ये विशेष रेशेदार जेलीवत पदार्थों से बने होते हैं तथा सामान्य लेंस की तुलना में काफी छोटे होते हैं। संस्पर्श लेंस (Contact lens) को सीधा आँखों की सतह पर लगाया जाता है।

मोतियाबिन्द (Cataract)

कभी कभी अधिक आयु के कुछ व्यक्तियों के नेत्र का क्रिस्टलीय लेंस दूधिया तथा धुँधला हो जाता है। इस स्थिति को मोतियाबिन्द (Cataract) कहते हैं। मोतियाबिन्द (Cataract) के कारण नेत्र की दृष्टि में कमी हो या पूर्ण रूप से दृष्टि क्षय हो जाता है। मोतियाबिन्द (Cataract) का संशोधन शल्य चिकित्सा के द्वारा किया जाता है।

प्रिज्म से प्रकाश का अपवर्तन

Refraction of Light through a prism

जब प्रकाश की किरण विरल माध्यम से सघन माध्यम में तिरछा प्रवेश करती है, तो अभिलम्ब की ओर मुड़ जाती है या झुक जाती है तथा जब सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है, तो अभिलम्ब से दूर हट जाती है। प्रकाश के विरल माध्यम से सघन माध्यम में प्रवेश करने के बाद अभिलम्ब की ओर मुड़ना तथा सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करने के बाद अभिलम्ब से दूर मुड़ने की प्रक्रिया को प्रकाश का अपवर्तन कहते हैं।

प्रिज्म (Prism)

पारदर्शी पदार्थ, जैसे सीसा, प्लास्टिक आदि से बनी वैसी वस्तु जिसमें कम से कम आयताकार पार्श्व पृष्ठ आपस में न्यूनकोण (90 डिग्री से कम का कोण) बनाते हों, प्रिज्म कहलाते हैं।

एक प्रिज्म के दो त्रिभुजाकार आधार तथा तीन आयताकार पृष्ठ होते हैं। ये पृष्ठ एक दूसरे पर झुके होते हैं तथा न्यूनकोण (90 डिग्री से कम का कोण) बनाते हैं। इसके दो पार्श्व फलकों के कोण को प्रिज्म कोण कहते हैं।

प्रिज्म के द्वारा प्रकाश का अपवर्तन (Refraction of Light through a Prism)

जब प्रकाश की किरण हवा से काँच के प्रिज्म में प्रवेश करता है, तो अभिलम्ब की तरफ झुक जाता है। पुन: जब ये प्रकाश की किरण प्रिज्म से बाहर हवा में निकलता है तो अभिलम्ब से दूर झुक जाते हैं।

प्रिज्म से प्रकाश का यह अपवर्तन भी स्नेल के नियम का पालन करते हैं। स्नेल के नियम के अनुसार

(i) आपतित किरण (incident ray), अपवर्तित किरण (refractive ray) तथा दोनों माध्यमों को पृथक करने वाले पृष्ठ के आपतन बिन्दु (point of incidence) पर अभिलम्ब (normal) सभी एक ही तल में होते हैं।

(ii) प्रकाश के किसी निश्चित रंग तथा निश्चित माध्यमों के युग्म (pair of medium) के लिये आपतन कोण (angle of incidence) की ज्या (sine) तथा अपवर्तन कोण (angle of refraction) की ज्या (sine) का अनुपात (ratio) स्थिर (constant) होता है

इस नियम को स्नेल का अपवर्तन नियम (Snell’s Law of Refraction) भी कहते हैं।

यदि ii आपतन कोण (angle of incidence) हो तथा rr अपवर्तन कोण (angle of refraction) हो तब

sinisinr=sinisinr= स्थिरांक (constant)

इस स्थिरांक मान को दूसरे माध्यम का पहले माध्यम के सापेक्ष अपवर्तनांक (refractive index) कहते हैं।

मान लिया कि एक प्रकाश की किरण PQ काँच के एक प्रिज्म ABC में बिन्दु E से प्रवेश करती है। हवा से प्रिज्म में प्रवेश करने पर प्रकाश की किरण अभिलम्ब NN’ की तरफ मुड़ जाती है तथा प्रिजम में EF पथ पर आगे बढ़ती है। जब प्रकाश की किरण EF प्रिज्म से बाहर आती है और हवा में प्रवेश करती है तो अभिलम्ब MM’ से दूड़ मुड़ जाती है तथा RS पथ पर हवा में आगे जाती है।

यहाँ,

  • ∠A प्रिज्म कोण है।
  • PQ या PQE या PE आपतित किरण है।
  • बिन्दु E प्रिज्म की सतह पर आपतन बिन्दु है।
  • NN’ आपतन बिन्दु E पर अभिलम्ब है।
  • ∠ i आपतन कोण है।
  • EF अपवर्तित किरण है।
  • PS निर्गत किरण है।
  • ∠ e निर्गत कोण है।
  • MM’ निर्गत बिन्दु F पर अभिलम्ब है।
  • FS या RS या FRS निर्गत किरण है।
  • GH जिसे बिन्दु रेखा द्वारा दिखाया गया है, प्रकाश की किरण PQ का मूल पथ है।
  • GS विचलन के बाद प्रकाश की किरण क पथ है।
  • ∠D विचलन कोण है।

अत: प्रकाश की किरण प्रिज्म के प्रवेश करने के बाद अपवर्तन के पश्चात ∠D पर विचलित होती है, जिसे विचलन कोण कहते हैं। ऐसा प्रिज्म के द्वारा बनाये गये न्यून कोण, जिसे प्रिज्म कोण कहते हैं के कारण होता है। जबकि प्रकाश की एक किरण सीसे के आयताकार पट्टी से परावर्तन के बाद बाहर आती है, तो यह आपतित किरण के समानांतर जाती है।

श्वेत प्रकाश का विक्षेपण (Dispersion of white light)

प्रकाश के अवयवी वर्णों में विभाजन को विक्षेपण कहते हैं।

काँच के प्रिज्म द्वारा श्वेत प्रकाश का विक्षेपण (Dispersion of While Light By a Glass Prism)

जब श्वेत प्रकाश की किरण का एक प्रिज्म से अपवर्तन होता है, तो यह सात रंगों में टूट जाता है तथा एक सात रंगों की पट्टी का निर्माण करता है। प्रकाश के इन अवयवी वर्णों के बैंड को स्पेक्ट्रम कहते हैं। प्रकाश के ये सात रंग एक खास क्रम में होते हैं, यह क्रम है: बैंगनी (violet), जामुनी (indigo), नीला (blue), हरा (green), पीला (yellow), नारंगी (orange) तथा लाल (red)। स्पेक्ट्रम के इन रंगों को अंगरेजी के परिवर्णी शब्द VIBGYOR से याद रखा जा सकता है। परिवर्णी शब्द VIBGYOR का प्रत्येक अक्षर क्रम से एक एक रंगों के नाम को बतलाता है। यथा: V – Violet, I- indigo, B – blue, G – green, Y – yellow, O – orange, R – Red.

प्रकाश के इन अवयवी वर्णों के बैंड के रंगों को क्रमानुसार हिन्दी के एक शब्द बैनीआहपीनाला से भी याद रखा जा सकता है। बैनीआहपीनाला शब्द में बै – बैगनी, नी – नीला, आ – आसमानी, ह – हरा, पि – पीला, ना – नारंगी तथा ला – लाल रंग को सूचित करता है।

संक्षिप्त शब्द VIBGYOR का पूर्ण रूप

  • V – सूचित करता है Violet (बैगनी) को
  • I – सूचित करता है Indigo (जामुनी) को
  • B – सूचित करता है Blue (नीला) को
  • G – सूचित करता है Green (हरा) को
  • Y – सूचित करता है Yellow (पीला) को
  • O – सूचित करता है Orange (नारंगी) को
  • R – सूचित करता है Red (लाल) को

प्रकाश की किरण का अपवर्तन क्यों होता है?

प्रकाश की किरण बिभिन्न माध्यमों अलग अलग गति से चलती है। प्रकाश किरण की निर्वात मंा गति अधिकतम होती है। माध्यम के सघन होने के साथ साथ प्रकाश की गति कम होती जाती है। जैसे कि हवा पानी की तुलना में विरल माध्यम है, अत: प्रकाश की गति हवा में ज्यादा तथा पानी में कम होती है।

अत: जब प्रकाश की किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करती है, तो गति में परिवर्तन के कारण एक खास कोण पर झुक जाती है, जिसे प्रकाश का अपवर्तन कहते हैं।

प्रकाश के किरण के मुड़ने या झुकने का कोण निम्नांकित बातों पर निर्भर करता है:

(i) आपतन कोण तथा

(ii) दिये गये माध्यम युग्म के अपवर्तनांक का अनुपात

प्रकाश की श्वेत किरण से हमें ये वर्ण क्यों प्राप्त होते हैं?

विभिन्न तरह के प्रकाश के तरंगों या रंगों का अपवर्तनांक अलग अलग माध्यम में अलग अलग होता है। प्रकाश के अलग अलग तरंगों या रंगों के अपवर्तनांक में दिये गये माध्यम युग्म में अंतर प्रकाश का विक्षेपण कहलाता है।

यह कारण है कि प्रकाश की श्वेत किरण जब एक काँच के प्रिज्म में प्रवेश करती है तथा बाहर निकलती है, तो प्रकाश में वर्तमान अलग अलग रंग की गति अलग अलग होने के कारण अपवर्तन के क्रम में अलग अलग कोणों से विचलित होती है। तथा प्रिज्म से बाहर निकलने पर अवयवी वर्णों का एक बैंड अर्थात स्पेक्ट्रम बनाती है।

आइजैक न्यूटन तथा स्पेक्ट्रम

पूर्व में प्रकाश की किरणों को रंगहीन माना जाता था तथा ऐसा माना जाता था कि प्रिज्म ही प्रकाश के सात रंगों को बनाता है। परंतु आइजैक न्यूटन ने सर्वप्रथम ने सर्वप्रथम सूर्य का स्पेक्ट्रम प्राप्त करने के लिए काँच के प्रिज्म का उपयोग किया तथा एक दूसरा प्रिज्म उपयोग करके उन्होंने श्वेत प्रकाश के किरण का पूँज प्राप्त किया, तथा बतलाया कि सूर्य का प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना है, एवं यह बतलाया कि कोई भी प्रकाश जो सूर्य के प्रकाश के स्दृश स्पेक्ट्रम बनाता है, प्राय: श्वेत प्रकाश कहलाता है।

प्रकाश की श्वेत किरण बिभिन्न आवृति के किरणों का समिश्रण है। अत: जब प्रकाश की श्वेत किरण एक प्रिज्म से गुजरती है, तो अलग अलग आवृति की किरणें की गतियाँ अलग अलग तरीके से कम होने के कारण अलग अलग कोणों पर झुक जाती है, तथा प्रकाश का एक स्पेक्ट्रम बनाती है।

लाल रंग के किरण की आवृति सबसे ज्यादा होती है, अत: यह सबसे कम कोण पर मुड़ती है, जबकि बैगनी रंग के किरण की आवृति सबसे कम होती है, और यह अधिकतम कोण पर मुड़ती है।

लाल रंग तथा बैगनी रंगों की आवृति अर्थात गति में इस अंतर के कारण स्पेक़्ट्रम में लाल रंग सबसे उपर तथा बैगनी रंग सबसे नीचे रहता है या दिखाई देता है।

लाल रंग को यातायात को सुचारू रूप से चलाने के लिये क्यों रूकने के संकेत के लिये क्यों उपयोग किया जाता है?

लाल रंग के प्रकाश की आवृति अर्थात गति सबसे ज्यादा होती है, जिसके कारण लाल रंग अन्य रंगों की अपेक्षा ज्यादा दूरी तय करता है, जिसके कारण लाल रंग दूर से ही आसानी से दिख जाता है। तथा वाहनों को दूर से ही रूकने का संकेत या खतरे की सूचना मिल जाती है। इसी कारण से यातायात में लाल रंग का उपयोग रूकने या खतरे के संकेत के लिये उपयोग किया जाता है।

इंद्रधनुष (Rainbow)

इंद्रधनुष (Rainbow) एक प्राकृतिक स्पेक़्ट्रम है, जो कि आकाश में प्राय: बर्षा के तुरंत बाद दिखाई देता है। इंद्रधनुष (Rainbow) वायुमंडल में उपस्थित जल की सूक्ष्म बूंदों द्वारा सूर्य के प्रकाश के परिक्षेपण के कारण प्राप्त होता है। बर्षा के बाद वायुमंडल में वर्तमान जल की सूक्ष्म बूँदें छोटे प्रिज्मों की तरहा कार्य करती है। सूर्य से आपतित किरणों को ये बूंदें अपवर्तित तथा विक्षेपित तथा परावर्तित करती हैं। प्रकाश के परिक्षेपण तथा आंतरिक परावर्तन के कारण बिभिन्न वर्ण प्रेक्षक के नेत्रों तक पहुँचते हैं, जिसे इंद्रधनुष (Rainbow) कहा जाता है।

इंद्रधनुष (Rainbow) सदैव सूर्य के विपरीत दिशा में बनता है।

कृत्रिम इंद्रधनुष (Rainbow) कैसे बनायें?

  • सीसे का एक ग्लास या बीकर लिजिए।
  • ग्लास को साफ जल से भरिये
  • किवाड़ या खिड़की के किसी छिद्र से आती प्रकाश की तिरछी पतली पुँज को ग्लास होकर गुजरने दिजिये। इसके लिये ग्लास को सही जगह पर सामंजित किजिये।
  • ग्लास के दूसरी तरफ प्रकाश के किरण के विपरीत दिशा में कागज का एक पर्दा या श्वेत वस्त्र का पर्दा रखिये।
  • आप देखेंगे कि पर्दे पर इंद्रधनुष (Rainbow) की तरह ही सात रंगों का स्पेक्ट्रम बनता है।

वायुमंडलीय अपवर्तन

Atmospheric Refraction

वायुमंडलीय घनत्व में उँचाई में अंतर के कारण प्रकाश की तरंगों या किरणों के अपवर्तनांक में होने वाले परिवर्तन को वायुमंडलीय अपवर्तन कहते हैं।

उँचाई में परिवर्तन के कारण वायु के तापमान में भी परिवर्तन होता है। यह तापमान में परिवर्तन बिभिन्न घटकों पर निर्भर करता है, जिसमें से उँचाई (altitude) एक प्रमुख घटक है। उँचाई बढ़ने के साथ साथ हवा का तापमान कम होता जाता है।

गर्म हवा ठंढ़ी हवा की तुलना में कम सघन होती है। जिसके कारण अपवर्तक माध्यम (वायु) की भौतिक अवस्थाएँ अस्थिर होती हैं। अत: तापमान में अंतर के कारण अपवर्तक माध्यम की अस्थिरता के कारण गर्म वायु से होकर देखने पर वस्तु की आभासी स्थिति परिवर्तित होती रहती है, तथा वस्तु हिलती हुई प्रतीत होती है।

उदारण:

किसी अलाव (जलती हुई आग) या के दूसरी तरफ रखी वस्तुओं को देखने पर वह वस्तु हिलती हुई अर्थात अस्थिर नजर आती है। ऐस इसलिये होता है क्योंकि अलाव के उपर की गर्म वायु, ठंढ़ी वायु से हल्की होने के कारण उपर की ओर उठती रहती है, जो कि आग के उपर स्थित वायु को अस्थिर कर देती है, तथा उस स्थान के दूसरी ओर रखी वस्तु को देखने पर वह हिलती हुई नजर आती है।

तारों का टिमटिमाना, अग्रिम सूर्योदय, बिलंबित सूर्यास्त, रेगिस्तान में बनने वाली मृगमरीचिका, आदि वायुमंडलीय अवपर्तन का ही परिणाम है।

तारों की मिथ्या या अवास्तविक स्थिति (Apparent position of Stars)

तारे जब क्षितिज पर होते हैं, तो वे उनकी वास्तिविक स्थिति (जगह) से थोड़ा उपर अर्थात मिथ्या स्थिति (अवास्तिविक) स्थिति में दिखाई देते हैं।

वायुमंडल का घनत्व समान नहीं होता है, बल्कि यह उँचाई के साथ बदलता रहता है। घनत्व बदलने के कारण वायुमंडल का अपवर्तनांक भी बदलता रहता है, जिसके कारण वायुमंडल से आती हुई प्रकाश की किरणें अपवर्तित होती रहती है। जैसे जैसे उँचाई घटती है, वायुमंडल सघन होती जाती है, जिससे तारों से आती हुई प्रकाश की किरणें सघन वायुमंडल में प्रवेश करने पर अभिलम्ब की ओर झुक जाती है और तारे क्षितिज पर वास्तविक स्थिति से थोड़ा उपर दिखाई देते हैं।

तारों के टिमटिमाने का कारण (Cause of Twinkling of Stars)

तारे वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण टिमटिमाते हुए प्रतीत होते हैं। तारों का पृथ्वी से बहुत दूरी पर अवस्थित होने के कारण वे प्रकाश के बिन्दु स्त्रोत के समान प्रतीत होते हैं। तारों से आने वाली प्रकाश की किरणें का पृथ्वी पर पहुँचने के क्रम में वायुमंडल में कई बार असमान तरीके से अपवर्तन होता है। तारों से आने वाली प्रकाश की किरणों के असमान अपवर्तन से उसका पथ लगातार बदलता रहता है, जिसके कारण तारे की आभासी स्थिति भी बदलती रहती है। चूँकि तारे की आभासी स्थिति विचलित होती रहती है तथा आँखों मे प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा झिलमिलाती रहती है, जिसके कारण कोई तारा कभी चमकीला तो कभी धुँधला प्रतीत होता है, और तारे हमें टिमटिमाते हुए प्रतीत होते हैं।

ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते हैं? (Why do Planets not twinkle?)

ग्रह तारों की अपेक्षा पृथ्वी के बहुत पास है, जिसके कारण उन्हें प्रकाश के विस्तृत स्त्रोत की भाँति माना जा सकता है। यदि हम ग्रह को बिन्दु साईज के अनेक प्रकाश स्त्रोतों का संग्रह मान लें तो सभी बिन्दु साइज के प्रकाश स्त्रोतों से हमारे नेत्रों में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा में कुल परिवर्तन का औसत मान शून्य हो जायेगा। चूँकि ग्रहों से आने वाली प्रकाश की मात्रा में कुल परिवर्तन का औसता का मान शून्य हो जाता है, जिससे टिमटिमाने का प्रभाव निष्प्रभावित हो जाता है, और ग्रह टिमटिमाते हुए नहीं प्रतीत होते है।

अग्रिम सूर्योदय तथा विलम्बित सूर्यास्त (Advance Sunrise and Delayed Sunset)

अंतरिक्ष में कोई वायुमंडल नहीं होता है, जबकि पृथ्वी पर एक सघन वायुमंडल है। जब सूर्य से प्रकाश की किरणें पृथ्वी के वायुमंडल, जो कि सघन है, में प्रवेश करती है, तो सूर्य से आने वाली किरणें अभिलम्ब की ओर मुड़ जाती है, जिसके कारण सूर्य अपनी वास्तविक स्थिति से थोड़ा उपर दिखाई देता है। अत: सूर्योदय के समय जब सूर्य क्षितिज पर होता है, सूर्य से आने वाली किरणों के अपवर्तन के कारण, सूर्योदय से थोड़ी देर पहले ही सूर्य दिखाई देने लगता है। सूर्य के दिखाई देने का समय वास्तविक सूर्योदय से दो मिनट पहले होता है। इसे अग्रिम सूर्योदय कहते हैं।

उसी प्रकार, सूर्यास्त के समय भी सूर्य क्षितिज पर होता है, और सूर्य से आने वाली प्रकाश की किरणें पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने पर अभिलम्ब की ओर मुड़ जाती है, जिससे सूर्य अपनी वास्तविक स्थिति से क्षितिज पर थोड़ा उपर दिखाई देता है। इसके कारण सूर्यास्त के लभग दो मिनट बाद तक सूर्य दिखाई देता रहता है। इसे बिलम्बित सूर्यास्त कहते हैं।

इसी परिघटना के कारण ही सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य की चक्रिका चपटी प्रतीत होती है।

प्रकाश का प्रकीर्णन (Scattering of Light)

वायुमंडल में निलंबित सूस्म कणों द्वारा प्रकाश की किरणों का असमान परावर्तन, प्रकाश का प्रकीर्णन कहलाता है।

हमारा वायुमंडल धूलकणों से भरा है, जो कि वायुमंडल में घुलते नहीं बल्कि निलंबित (Suspended) रहते हैं। इनमें कुछ धूलकण अत्यधिक छोटे तथा कुछ धूलकण थोड़ा बड़े होते हैं। इन धूलकणों से टकराने के कारण सूर्य की किरण असमान तरह से परावर्तित होती हैं, जिसे सूर्य की प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं। प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण तरह तरह की अनेक आश्चर्यजनक परिघटनाएँ देखने को मिलतीं हैं, यथा: आकाश का नीला रंग, गहरे समुद्र के जल का रंग, सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य का रक्ताभ दिखाई देना, आदि।

टिंडल प्रभाव (Tyndall Effect)

प्रकाश की किरण के पुंज का वायुमंडल में विलंबित सूक्ष्म कणों से परावर्तित होकर उसका पथ दृश्य होना टिंडल प्रभाव कहलाता है।

पृथ्वी का वायुमंडल सूक्ष्म कणों, यथा धुँआ के कण, जल की सूक्ष्म बूंदें, धूल के कण, वायु के अणु, आदि, का विषमांगी मिश्रण है। जब प्रकाश की किरण का पुंज, वायुमंडल में निलंबित सूक्ष्म कणोंसे टकराती है, तो उस किरण का मार्ग दिखाई देने लगता है, क्योंकि इन कणों से प्रकाश परावर्तित होकर हमारी आँखों तक पहुँचता है। इसे टिंडल प्रभाव कहते हैं।

उदाहरण:

(a) किसी खिडकी या किवाड़ की दरार से प्रकाश की पुंज आती रहती है, तो उसका पथ वातावरण में निलंबित कोलॉइडी कणों से प्रकाश की किरण के टकराने के कारण दृश्य होने लगता है। ऐसा टिंडल प्रभाव के कारण होता है।

(b) इसी तरह जब किसी घने जंगल में पेड़ की पत्तियों से प्रकाश का पुंज नीचे आता रहता है, तो वातावरण में वर्तमान निलंबित सूक्ष्म कणों (suspended small particles) से प्रकाश की किरण का परावर्तन (reflection) होने के कारण प्रकाश पुंज (beam of light) का पथ दृश्य होने लगता है। प्रकाश पुंज के पथ का दृश्य होना टिंडल प्रभाव के कारण होता है।

कणों का आकार एवं प्रकाश का प्रकीर्णन (The Size of Particles and Scattering of Light)

प्रकाश का प्रकीर्णन वायुमंडल या किसी माध्यम में उपस्थित सूक्ष्म कणों के आकार पर निर्भर करता है। बहुत सूक्ष्म कण नीले रंग के प्रकाश, जिनकी आवृति काफी छोटी होती है, को अधिक मात्रा में परावर्तित करते है, जबकि वायुमंडल में निलंबित थोड़े बड़े कण, जिनकी आवृति तथा तरंग की लंबाई थोड़ी ज्यादा होती है, नारंगी तथा लाल रंग के प्रकाश को अधिक मात्रा में परावर्तित करते हैं।

और वायुमंडल में निलंबित कणों का आकार और अधिक बड़ा होने की स्थिति में इनसे परावर्तित किरणिं श्वेत नजर आती है।

स्वच्छ आकाश का रंग नीला क्यों होता है? (Why is the Color of the Clear Sky Blue?)

वायुमंडल में वर्तमान वायु के कण तथा अन्य सूक्ष्म कणों का आकार काफी सूक्ष्म होते हैं। ये कण दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्घ्य के प्रकाश की अपेक्षा नीले रंग की ओर के कम तरंगदैर्घ्य के प्रकाश का प्रकीर्णन अधिक प्रभावी तरीके से करते हैं। लाल रंग के प्रकाश की तरंगदैर्ध्य नीले प्रकाश की अपेक्षा लगभग 1.81.8 गुणी है। अत: जब सूर्य का प्रकाश वायुमंडल से गुजरता है, तो वायु के सूक्ष्म कण लाल रंग की अपेक्षा नीले रंग को अधिक प्रबलता से प्रकीर्ण करते हैं, जिसके कारण प्रकीर्णित नीला प्रकाश हमारी आँखों में पहुँचता है, और हमें स्वच्छ आकाश नीले वर्ण का दिखता है।

यदि पृथ्वी पर कोई वायुमंडल नहीं होता, तो आकाश काला प्रतीत होता। अत्यधिक उँचाई पर उड़ने वाले वायुयान के यात्रियों को प्रकाश का प्रकीर्णन सुस्पष्ट नहीं होने के कारण आकाश का रंग काला दिखाई देता है।

चूँकि अंतरिक्ष में कोई वायुमंडल नहीं होता है, अत: अंतरिक्ष यात्री को अंतरिक्ष का रंग काला दिखाई देता है।

सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य का रंग नारंगी–लाल (रक्ताभ) क्यों प्रतीत होता है? (Why Sun appears red–organe at Sunrise and Sunset?)

सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य क्षितिज पर रहता है। क्षितिज पर स्थित सूर्य सर के उपर स्थित सूर्य से ज्यादा दूरी पर रहता है। क्षितिज से आती हुई सूर्य की किरणों को ज्यादा सघन वायुमंडल से गुजरते हुए ज्यादा दूरी तय करना होता है। क्षितिज के समीप नीले तथा कम तरंगदैर्ध्य वाले प्रकाश का अधिकांश भाग वायुमंडल में निलंबित कणों द्वार प्रकीर्ण हो जाता है। इसलिये हमारे नेत्रों तक पहुँचने वाला प्रकाश अधिक तरंगदैर्ध्य वाला अर्थात नारंगी तथा लाल रंग का होता है।

यही कारण है कि सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य का रंग नारंगी–लाल (रक्ताभ) प्रतीत होता है।

दोपहर के समय सूर्य श्वेत क्यों प्रतीत होता है? (Why Sun appears white in the noon?)

दोपहर के समय जब सूर्य सिर के ठीक उपर (उर्ध्वस्थ) होता है। इस समय सूर्य से आने वाले प्रकाश को पृथ्वी पर आने में क्षितिज की अपेक्षा कम दूरी तय करना होता है तथा अपेक्षाकृत कम सघन वायुमंडल से गुजरना होता है। कम सघन वायुमंडल होकर कम दूरी तय करने के कारण नीले तथा बैंगनी रंग के प्रकाश का बहुत थोड़ा भाग ही प्रकीर्ण हो पाता है। जिस कारण हमारी आँखों में श्वेत रंग पहुँच पाता है।

यही कारण है कि दोपहर के समय सूर्य का रंग श्वेत दिखाई देता है।

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