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प्रश्न 1.
क्या कारण है कि कुछ पदार्थ जैव निम्नीकरणीय होते हैं और कुछ अजैव निम्नीकरणीय?
उत्तर:
कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जिन पर सूक्ष्म जीव अपना प्रभाव डालते हैं और उन्हें सरल पदार्थों में बदल देते हैं। सूक्ष्म जीवों का असर केवल कुछ पदार्थों पर ही होता है। अत: कुछ पदार्थ ही जैव निम्नीकरणीय होते हैं। कुछ पदार्थ ऐसे भी होते हैं जिन पर सूक्ष्म जीवों का असर नहीं होता और वे सरल पदार्थों में नहीं टूटते हैं। ऐसे पदार्थों को अजैव निम्नीकरणीय कहते हैं।

प्रश्न 2.
ऐसे दो तरीके सुझाइए जिनमें जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर:
1. जैव निम्नीकरणीय पदार्थ अपघटित होकर दुर्गन्ध फैलाते हैं।
2. जैव निम्नीकरणीय पदार्थ अपघटित होकर बहुत-सी विषैली गैसें वातावरण में मिलाते हैं जिससे वायु प्रदूषण फैलता है।

प्रश्न 3.
ऐसे दो तरीके बताइए जिनमें अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर:
1. अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण में लंबे समय तक रहते हैं और पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। ये पदार्थों के चक्रण में बाधा पहुँचाते हैं।
2. ऐसे बहुत-से पदार्थ जल प्रदूषण व भूमि प्रदूषण का कारण बनते हैं।

अनुच्छेद 15.2 पर आधारित

प्रश्न 1.
पोषी स्तर क्या हैं? एक आहार श्रृंखला का उदाहरण दीजिए तथा इसमें विभिन्न पोषी स्तर बताइए।
उत्तर:
किसी आहार श्रृंखला के विभिन्न चरणों या स्तरों को पोषी स्तर कहते हैं। आहार श्रृंखला का उदाहरण घास → हिरन → शेर इस आहार श्रृंखला में विभिन्न पोषी स्तर निम्नलिखित हैं –

  • प्रथम पोषी स्तर घास है। यह उत्पादक है।
  • द्वितीय पोषी स्तर हिरन है। यह प्रथम उपभोक्ता है। इसे शाकाहारी भी कहते हैं।
  • तृतीय पोषी स्तर शेर है। यह उच्च मांसाहारी है।

प्रश्न 2.
पारितंत्र में अपमार्जकों की क्या भूमिका है?
उत्तर:
अपमार्जकों को प्राकृतिक सफाई एजेन्ट कहते हैं। अपमार्जकों का कार्य जैव निम्नीकरणीय पदार्थों पर होता है। ये उन पदार्थों को सरल पदार्थों में तोड़ते हैं। इस प्रकार अपमार्जक वातावरण में संतुलन बनाने का कार्य करते हैं तथा एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

अनुच्छेद 15.3 पर आधारित

प्रश्न 1.
ओजोन क्या है तथा यह किसी पारितंत्र को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
ओजोन ऑक्सीजन का एक अपररूप है। इसका एक अणु ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बना होता है। इसका अणुसूत्र 0 है। यह ऑक्सीजन के तीन अणुओं की सूर्य के प्रकाश (UV rays) की उपस्थिति में अभिक्रिया द्वारा बनती है।
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ओजोन पृथ्वी की सतह पर एक आवरण बनाती है जो पराबैंगनी विकिरणों से बचाती है। यह पराबैंगनी विकिरण हमारे लिए बहुत हानिकारक है। इस प्रकार यह पारितन्त्र को नष्ट होने से बचाती है।

प्रश्न 2.
आप कचरा निपटान की समस्या कम करने में क्या योगदान कर सकते हैं? किन्हीं दो तरीकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. पदार्थ दो प्रकार के होते हैं – जैव निम्नीकरणीय तथा अजैव निम्नीकरणीय। इनमें से हमें जैव निम्नीकरणीय पदार्थों का अधिक उपयोग करना चाहिए।
2. जैव निम्नीकरणीय पदार्थों को खाद में बदल देना चाहिए तथा अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों को चक्रण के लिए फैक्टरी में भेज देना चाहिए।

Bihar Board Class 10 Science हमारा पर्यावरण Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्न में से कौन-से समूहों में केवल जैव निम्नीकरणीय पदार्थ हैं?
(a) घास, पुष्प तथा चमड़ा
(b) घास, लकड़ी तथा प्लास्टिक
(c) फलों के छिलके, केक एवं नींबू का रस
(d) केक, लकड़ी एवं घास
उत्तर:
(a), (c) और (d)

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन पर्यावरण-मित्र व्यवहार कहलाते हैं?
(a) बाजार जाते समय सामान के लिए कपड़े का थैला ले जाना
(b) कार्य समाप्त हो जाने पर लाइट (बल्ब) तथा पंखे का स्विच बंद करना
(c) माँ द्वारा स्कूटर से विद्यालय छोड़ने के बजाय तुम्हारा विद्यालय तक पैदल जाना
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

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प्रश्न 4.
क्या होगा यदि हम एक पोषी स्तर के सभी जीवों को समाप्त कर दें (मार डालें)?
उत्तर:
खाद्य श्रृंखला के सभी पोषी स्तरों के जीव भोजन के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। यदि किसी एक पोषी स्तर के सभी जीव मार दिए जाएँ तो पूरी खाद्य श्रृंखला नष्ट हो जाएगी। ऐसा इसलिए होता है; क्योंकि इससे खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह रुक जाता है।

प्रश्न 6.
जैविक आवर्धन (biological magnification) क्या है? क्या पारितंत्र के विभिन्न स्तरों पर जैविक आवर्धन का प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होगा?
उत्तर:
जब कोई हानिकारक रसायन जैसे डी०डी०टी० किसी खाद्यशंखला में प्रवेश करता है तो इसका सांद्रण धीरे-धीरे प्रत्येक पोषी स्तर में बढ़ता जाता है। इस परिघटना को जैविक आवर्धन कहते हैं। इस आवर्धन का स्तर अलग-अलग पोषी स्तरों पर भिन्न-भिन्न होगा। जैसे –
जल → शैवाल/प्रोटोजोआ → मछली → मनुष्य 0.02ppm 5ppm 240ppm 1600 ppm
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प्रश्न 7.
हमारे द्वारा उत्पादित अजैव निम्नीकरणीय कचरे से कौन-सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
अजैव निम्नीकरणीय कचरे के ढेर पर्यावरण में बहुत लंबे समय तक रहते हैं और नष्ट नहीं होते। अत: वे बहुत-सी समस्याएँ उत्पन्न करते हैं; जैसे –

  • ये जल प्रदूषण करते हैं जिससे जल पीने योग्य नहीं रहता।
  • ये भूमि प्रदूषण करते हैं जिससे भूमि की सुन्दरता नष्ट होती है।
  • ये नालियों में जल के प्रवाह को रोकते हैं।
  • ये वायुमंडल को भी विषैला बनाते हैं।

प्रश्न 8.
यदि हमारे द्वारा उत्पादित सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय हो तो क्या इनका हमारे पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा?
उत्तर:
जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट लंबे समय तक नहीं रहते हैं। अतः उनका हानिकारक प्रभाव वातावरण पर पड़ता तो है पर केवल कुछ समय के लिए ही रहता है। ये पदार्थ लाभदायक पदार्थों में बदले जा सकते हैं तथा सरल पदार्थों में तोड़े जा सकते हैं। अतः हमारे वातावरण पर इनका भी प्रभाव पड़ता है लेकिन केवल कुछ समय तक ही रहता है।

प्रश्न 9.
ओज़ोन परत की क्षति हमारे लिए चिंता का विषय क्यों है? इस क्षति को सीमित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
उत्तर:
ओजोन परत की क्षति हमारे लिए अत्यंत चिंता का विषय है क्योंकि यदि इसकी क्षति अधिक होती है तो अधिक-से-अधिक पराबैंगनी विकिरणें पृथ्वी पर आएँगी जो हमारे लिए निम्न प्रकार से हानिकारक प्रभाव डालती हैं –

  • इनका प्रभाव त्वचा पर पड़ता है जिससे त्वचा के कैंसर की संभावना बढ़ जाती है।
  • पौधों में वृद्धि दर कम हो जाती है।
  • ये सूक्ष्म जीवों तथा अपघटकों को मारती हैं इससे पारितंत्र में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है।
  • ये पौधों में पिगमेंटों को नष्ट करती हैं।

ओजोन परत की क्षति कम करने के उपाय –

  • एरोसोल तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन यौगिक का कम-से-कम उपयोग करना।
  • सुपर सोनिक विमानों का कम-से-कम उपयोग करना।
  • संसार में नाभिकीय विस्फोटों पर नियंत्रण करना।

Bihar Board Class 10 Science हमारा पर्यावरण Additional Important Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पर्यावरण के कितने घटक होते हैं?
(a) एक
(b) दो
(c) तीन
(d) चार
उत्तर:
(b) दो

प्रश्न 3.
पृथ्वी के चारों ओर स्थित गैसीय आवरण को कहते हैं –
(a) स्थलमण्डल
(b) जलमण्डल
(c) (i) व (ii) दोनों
(d) वायुमण्डल
उत्तर:
(d) वायुमण्डल

प्रश्न 4.
अमोनियम आयन को नाइट्रेट में बदलने की क्रिया को कहते हैं –
(a) अमोनीकरण
(b) नाइट्रीकरण
(c) विनाइट्रीकरण
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) नाइट्रीकरण

प्रश्न 5.
मिट्टी में उपस्थित नाइट्रेट तथा अमोनिया को स्वतन्त्र नाइट्रोजन में बदलने की क्रिया को कहते हैं –
(a) विनाइट्रीकरण
(b) नाइट्रीकरण
(c) अमोनीकरण
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a)विनाइट्रीकरण

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पारितन्त्र में कौन-कौन से घटक हैं? पारितन्त्र में आप खरगोश को कहाँ रखेंगे?
उत्तर:
पारितन्त्र में मुख्यत: दो प्रकार के घटक होते हैं- जैवीय घटक तथा अजैवीय घटक। खरगोश एक जैवीय घटक है। शाकाहारी खरगोश प्रथम श्रेणी का उपभोक्ता होता है।

प्रश्न 3.
हरे पौधों को उत्पादक क्यों कहा जाता है? कुकुरमुत्ता ऊर्जा कैसे प्राप्त करता है?
उत्तर:
हरे पौधे अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संश्लेषण करते हैं; अतः इन्हें उत्पादक कहते हैं। कुकुरमुत्ता मृत कार्बनिक पदार्थों का विघटन करके ऊर्जा प्राप्त करता है।

प्रश्न 4.
जन्तु स्वपोषी क्यों नहीं होते?
उत्तर:
जन्तुओं में पर्णहरिम नहीं पाया जाता (यूग्लीना को छोड़कर); अत: जन्तु अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते और भोजन के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से पौधों पर निर्भर रहते हैं।

प्रश्न 5.
बैक्टीरिया तथा कवक का पारितन्त्र में क्या कार्य है?
या किन्हीं दो अपघटकों के नाम लिखिए और स्पष्ट कीजिए कि ये किस प्रकार हमारे लिए लाभदायक हैं?
उत्तर:
बैक्टीरिया तथा कवक पारितन्त्र में अपघटक (decomposer) का कार्य करते हैं अर्थात् ये कार्बनिक पदार्थों को उनके अवयवों में तोड़कर विभिन्न पदार्थों के चक्रीय प्रवाह को बनाए रखते हैं।

प्रश्न 6.
किन-किन प्रमुख स्त्रोतों से कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होकर वायुमण्डल में पहुँचती है?
उत्तर:
कार्बन डाइऑक्साइड जीवधारियों के द्वारा श्वसन के अतिरिक्त पदार्थों के जलने से, विभिन्न चट्टानों (कार्बोनेट्स) के ऑक्सीकृत होने से, जीवाणु एवं कवक आदि के द्वारा कार्बनिक पदार्थों के अपघटन से तथा ज्वालामुखी के फटने आदि से वायुमण्डल में पहुँचती है।

प्रश्न 7.
पौधे नाइट्रोजन को किस रूप में ग्रहण करते हैं?
उत्तर:
पौधे नाइट्रोजन को सरल यौगिकों; जैसे-नाइट्रेट्स के रूप में ग्रहण करते हैं।

प्रश्न 8.
दो नाइट्रोजनकारी जीवाणुओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
1. नाइट्रोसोमोनास (Nitrosomonas) ये जीवाणु अमोनिया को नाइट्राइट में बदल देते हैं।
2. नाइट्रोबैक्टर (Nitrobactor) ये जीवाणु नाइट्राइट को नाइट्रेट्स में बदल देते हैं।

प्रश्न 9.
जैव आवर्धन क्या है? अजैव विकृतीय रसायन द्वारा जैव आवर्धन किस प्रकार होता
उत्तर:
कुछ अजैव विकृतीय रसायन; जैसे – डी०डी०टी० हमारी खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करते हैं तथा जीवों के अंगों में प्रत्येक स्तर पर प्रभाव डालते हैं तथा उनमें मात्रा में वृद्धि के साथ संचित हो जाते हैं। इसको जैव आवर्धन कहते हैं।

प्रश्न 10.
प्रदूषक किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह पदार्थ या कारक जिसके कारण वायु, भूमि तथा जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक लक्षणों में अवांछित परिवर्तन हो, प्रदूषक कहलाता है।

प्रश्न 11.
प्रदूषण की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
वायु, जल तथा भूमि में उन अवांछित और अत्यधिक पदार्थों का इकट्ठा हो जाना जिनसे प्राकृतिक पर्यावरण में प्रतिकूल परिवर्तन आ जाते हैं, प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 12.
पर्यावरणीय प्रदूषण क्या होता है? मानव के लिए हानिकर अजैव निम्नीकरणीय तीन प्रदूषकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
वायु, जल तथा भूमि में उन अवांछित अत्यधिक पदार्थों का एकत्रित हो जाना, जिनसे प्राकृतिक पर्यावरण में प्रतिकूल परिवर्तन आ जाते हैं, पर्यावरणीय प्रदूषण कहलाता है।
अजैव निम्नीकरणीय –

  • कीटनाशी तथा पीड़कनाशी
  • प्लास्टिक तथा
  • रेडियोऐक्टिव अपशिष्ट पदार्थ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवमण्डल की परिभाषा दीजिए। जीवमण्डल के कौन-से तीन प्रमुख भाग हैं?
उत्तर:
जीवमण्डल स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल का वह क्षेत्र जिसमें जीवधारी पाए जाते हैं जीवमण्डल कहलाता है। जीवमण्डल में ऊर्जा तथा पदार्थों का निरन्तर आदान-प्रदान जैविक तथा अजैविक घटकों के मध्य होता रहता है। जीवमण्डल का विस्तार लगभग 14-15 किमी होता है। वायुमण्डल में 7-8 किमी ऊपर तक तथा समुद्र में 6-7 किमी गहराई तक जीवधारी पाए जाते हैं।

हमारा पर्यावरण 329 जीवमण्डल के तीन प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं –
1. स्थलमण्डल (Lithosphere):
यह पृथ्वी का ठोस भाग है। इसका निर्माण चट्टानों, मृदा, रेत आदि से होता है। पौधे अपने लिए आवश्यक खनिज लवण मृदा से घुलनशील अवस्था में ग्रहण करते हैं।

2. जलमण्डल (Hydrosphere):
स्थलमण्डल पर उपस्थित तालाब, कुएँ, झील, नदी, समुद्र आदि मिलकर ‘जलमण्डल’ बनाते हैं। जलीय जीवधारी अपने लिए आवश्यक खनिज जल से प्राप्त करते हैं। जल जीवन के लिए अति महत्त्वपूर्ण होता है। यह जीवद्रव्य का अधिकांश भाग बनाता है। पौधे जड़ों के द्वारा या शरीर सतह से जल ग्रहण करते हैं। जन्तु जल को भोजन के साथ ग्रहण करते हैं तथा आवश्यकतानुसार इसकी पूर्ति जल पीकर भी करते हैं।

3. वायुमण्डल (Atmosphere):
पृथ्वी के चारों ओर स्थित गैसीय आवरण को वायुमण्डल कहते हैं। वायुमण्डल में विभिन्न गैसें सन्तुलित मात्रा में पाई जाती हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में अन्तर लिखिए –

  1. उत्पादक तथा उपभोक्ता
  2. स्थलमण्डल तथा वायुमण्डल
  3. पारिस्थितिक तन्त्र तथा जीवोम
  4. समष्टि तथा समुदाय।

उत्तर:

1. उत्पादक तथा उपभोक्ता में अन्तर –

2. स्थलमण्डल तथा वायुमण्डल में अन्तर –

3. पारिस्थितिक तन्त्र तथा जीवोम या बायोम में अन्तर –

4. समष्टि तथा समुदाय में अन्तर –

प्रश्न 3.
हरे पौधों द्वारा सूर्य-प्रकाश ऊर्जा को किस प्रकार की ऊर्जा में रूपान्तरित किया जाता है? उस प्रक्रम का भी नाम लिखिए जिसके द्वारा हरी वनस्पतियाँ सौर ऊर्जा को ग्रहण कर उसको जैव उपयोगी ऊर्जा में रूपान्तरित करती हैं।
उत्तर:
हरे पौधों द्वारा सूर्य-प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में रूपान्तरित किया जाता है। हरी वनस्पतियाँ प्रकाश संश्लेषण द्वारा सौर ऊर्जा को ग्रहण कर उसको जैव उपयोगी रासायनिक ऊर्जा में रूपान्तरित करके कार्बनिक भोज्य पदार्थों में संचित करती हैं।
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पर्णहरिम इस क्रिया में प्रकाश की गतिज ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होकर भोजन (ग्लूकोज) के रूप में संचित हो जाती है।

प्रश्न 4.
कीटनाशक DDT के प्रयोग को हतोत्साहित किया जा रहा है क्योंकि यह मानव शरीर में पाया गया है। किस प्रकार यह रसायन शरीर के अन्दर प्रवेश करता है?
उत्तर:
DDT अजैव निम्नीकरणीय प्रदूषक है। यह लम्बे समय तक वातावरण और मृदा में विषाक्तता को बनाए रखता है। यह मृदा से वनस्पतियों द्वारा अवशोषित किया जाता है तथा पशुओं और मानव द्वारा वनस्पतियों के उपयोग करने पर उनके शरीर में प्रवेश करता है। पशुओं का उपभोग करने पर यह मनुष्यों के शरीर में पहुँच जाता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए
1. अम्ल वर्षा
2. ओजोन की न्यूनता
उत्तर:
1. अम्ल वर्षा अम्ल वर्षा वायु में उपस्थित नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड के कारण होती है। ये गैसीय ऑक्साइड वर्षा के जल के साथ मिलकर क्रमश: नाइट्रिक अम्ल तथा सल्फ्यूरिक अम्ल बनाते हैं। वर्षा के साथ ये अम्ल भी पृथ्वी पर नीचे आ जाते हैं। इसे ही अम्ल वर्षा या अम्लीय

पारितन्त्र के निम्नलिखित दो प्रमुख घटक होते है –
(I) सजीव या जैविक घटक समस्त जन्तु एवं पौधे जीवमण्डल में जैविक घटक के रूप में पाए जाते हैं। जैविक घटक को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
1. उत्पादक Producers हरे प्रकाश संश्लेषी पौधे उत्पादक कहलाते हैं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में पौधे कार्बन डाइऑक्साइड एवं पानी की सहायता से प्रकाश एवं पर्णहरिम की उपस्थिति में ग्लूकोज का निर्माण करते हैं। ग्लूकोज अन्य भोज्य पदार्थों (प्रोटीन, मण्ड व वसा) में परिवर्तित हो जाता है, जिसको जन्तु भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं।
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2. उपभोक्ता (Consumers) जन्तु पौधों द्वारा बनाए गए भोजन पर आश्रित रहते हैं, इसलिए जन्तुओं को उपभोक्ता कहते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, वसा, विटामिन तथा खनिज तत्व हमारे भोजन के अवयव हैं जो अनाज, बीज, फल, सब्जी आदि से प्राप्त होते हैं। ये सभी पौधों की ही देन हैं। कुछ जन्तु मांसाहारी होते हैं जो अपना भोजन शाकाहारी जन्तुओं का शिकार करके प्राप्त
करते हैं।

उपभोक्ता निम्न प्रकार के होते हैं –
(i) प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता: (Primary consumers) ये शाकाहारी होते हैं। इसके अन्तर्गत वे जन्तु आते हैं जो अपना भोजन सीधे हरे पौधों से प्राप्त करते हैं; जैसे – खरगोश, बकरी, टिड्ढा, चूहा, हिरन, भैंस, गाय, हाथी आदि।

(ii) द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता या मांसाहारी:  (Secondary consumers or Carnivores) ये मांसाहारी होते हैं एवं प्राथमिक उपभोक्ताओं या शाकाहारी प्राणियों का शिकार करते हैं; जैसे – सर्प, मेढक, गिरगिट, छिपकली, मैना पक्षी, लोमड़ी, भेड़िया, बिल्ली आदि।

(iii) तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता या तृतीयक उपभोक्ता: (Tertiary consumers) इसमें द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ताओं को खाने वाले जन्तु आते हैं; जैसे – सर्प मेढक का शिकार करते हैं, बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों का शिकार करती हैं, चिड़ियाँ मांसाहारी मछलियों का शिकार करती हैं। कुछ जन्तु एक से अधिक श्रेणी के उपभोक्ता हो सकते हैं (जैसे – बिल्ली, मनुष्य आदि)। ये मांसाहारी एवं शाकाहारी दोनों होते हैं; अत: ये सर्वभक्षी (omnivore) कहलाते हैं।

3. अपघटनकर्ता या अपघटक (Decomposers) ये जीवमण्डल के सूक्ष्म जीव हैं;
जैसे-जीवाणु व कवक। ये उत्पादक तथा उपभोक्ताओं के मृत शरीर को सरल यौगिकों में अपघटित कर देते हैं। ऐसे जीवों को अपघटक (decomposers) कहते हैं। ये विभिन्न कार्बनिक पदार्थों को उनके सरल अवयवों में तोड़ देते हैं। सरल पदार्थ पुनः भूमि में मिलकर पारितन्त्र के अजैव घटक का अंश बन जाते हैं।

(II) निर्जीव या अजैविक घटक इसके अन्तर्गत निर्जीव वातावरण आता है, जो विभिन्न जैविक घटकों का नियन्त्रण करता है। अजैव घटक को निम्नलिखित तीन उप-घटकों में विभाजित किया गया है।
1. अकार्बनिक: (Inorganic) इसके अन्तर्गत पोटैशियम, कैल्सियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, लोहा, सल्फर आदि के लवण, जल तथा वायु की गैसें; जैसे-ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, अमोनिया आदि; आती हैं।

2. कार्बनिक: (Organic) इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा आदि सम्मिलित हैं। ये मृतक जन्तुओं एवं पौधों के शरीर से प्राप्त होते हैं। अकार्बनिक एवं कार्बनिक भाग मिलकर निर्जीव वातावरण का निर्माण करते हैं।

3. भौतिक घटक: (Physical components) इसमें विभिन्न प्रकार के जलवायवीय कारक; जैसे-वायु, प्रकाश, ताप, विद्युत आदि; आते हैं। वर्षा (acid rain) कहते हैं। इसके कारण अनेक ऐतिहासिक भवनों, स्मारकों, मूर्तियों का संक्षारण हो जाता है जिससे उन्हें काफी नुकसान पहुँचता है। अम्लीय वर्षा के कारण, मृदा भी अम्लीय हो जाती है जिससे धीरे-धीरे उसकी उर्वरता कम हो जाती है। इस कारण वन तथा कृषि उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

2. ओजोन की न्यूनता रेफ्रीजरेटर, अग्निशमन यन्त्र तथा ऐरोसॉल स्प्रे में उपयोग किए जाने वाले क्लोरो-फ्लुओरो कार्बन (CFC) से वायुमण्डल में ओजोन परत का ह्रास होता है। हानियाँ ओजोन परत में ह्रास के कारण सूर्य से पराबैंगनी (UV) किरणें अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पहुँचती हैं। पराबैंगनी विकिरण से आँखों तथा प्रतिरक्षी तन्त्र को नुकसान पहुंचता है। इससे त्वचा का कैंसर भी हो जाता है। ओजोन परत के ह्रास के कारण वैश्विक वर्षा, पारिस्थितिक असन्तुलन तथा वैश्विक खाद्यान्नों की उपलब्धता पर भी प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 6.
ग्रीन हाउस प्रभाव पर टिप्पणी लिखिए। या पृथ्वी ऊष्मायन पर टिप्पणी लिखिए। या भूमण्डलीय ऊष्मायन के लिए उत्तरदायी चार कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
CO2 की बढ़ती सान्द्रता ग्रीन हाउस प्रभाव सूर्य की किरण डालती है। आमतौर पर जब CO2 की सान्द्रता सामान्य हो तब पृथ्वी का ताप तथा ऊर्जा का ग्रीन हाउस गैसें सन्तुलन बनाए रखने के लिए ऊष्मा पृथ्वी से परावर्तित हो जाती है, परन्तु CO2 की अधिक सान्द्रता पृथ्वी से लौटने वाली ऊष्मा को परावर्तित होने से रोकती है जिससे पृथ्वी के तापमान में वृद्धि होने लगती है, इसको ग्रीन हाउस प्रभाव (green house effect) कहते हैं। इसके अलावा कुछ ऊष्मा पर्यावरण में उपस्थित पानी की भाप से भी रुकती है।

लगभग 100 वर्ष पहले CO2 की पर्यावरण में सान्द्रता लगभग 110 ppm थी, परन्तु अब बढ़कर लगभग 350 ppm तक पहुँच गई है। आज से करीब 40 वर्ष बाद यह सान्द्रता 450 ppm तक पहुँच जाने की सम्भावना है। इससे पृथ्वी के ऊष्मायन में वृद्धि हो सकती है। पृथ्वी के ऊष्मायन का प्रभाव ध्रुवों पर सबसे अधिक होगा, इनकी बर्फ पिघलने लगेगी। एक अनुमान के अनुसार सन् 2050 तक पृथ्वी का ताप 5°C तक बढ़ सकता है जिससे समुद्र के निकटवर्ती क्षेत्र शंघाई, सेन फ्रान्सिस्को आदि शहर प्रभावित होंगे।

उत्तरी अमेरिका सूखा तथा गर्म प्रदेश बन सकता है। विश्वभर का मौसम बदल जाएगा। भारत में मानसून के समाप्त होने की सम्भावना है। विश्वभर में अनाज के उत्पादन पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। फल, सब्जी आदि के उत्पादन भी प्रभावित होंगे। बढ़ते ताप से पादप तथा जीव-जन्तुओं की जीवन क्रियाएँ भी प्रभावित होंगी।

प्रश्न 7.
जल किस प्रकार प्रदूषित होता है?
उत्तर:

  1. जल स्रोत के निकट बिजली घर, भूमिगत कोयला खदानों तथा तेल के कुओं से प्रदूषक सीधे जल में पहुँचकर उसे प्रदूषित करते हैं।
  2. जल में कैल्सियम या मैग्नीशियम के यौगिकों का घुलकर प्रदूषित करना।
  3. जल में तेल, भारी धातुएँ, घरेलू कचरा, अपमार्जक, रेडियोधर्मी कचरा आदि उसको प्रदूषित करते हैं।
  4. खेतों, बगीचों, निर्माण स्थलों, गलियों आदि से बहने वाला जल भी प्रदूषित होता है।
  5. प्रोटोजोआ, जीवाणु तथा अन्य रोगाणु जल को प्रदूषित करते हैं।

प्रश्न 8.
सुपोषण (eutrophication) क्या होता है? इसके हानिकारक प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जल में मल-मूत्र के अत्यधिक बहाव से जल प्लवकों की वृद्धि होती है। इनकी अत्यधिक संख्या से जल में विलेय ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। जल प्लवकों के मर जाने पर उनके सड़ने के कारण भी जल में घुली अधिकांश ऑक्सीजन की मात्रा में कमी आ जाती है। अतः पोषकों का अत्यधिक संभरण तथा शैवालों की वृद्धि या फलने-फूलने के फलस्वरूप जल में ऑक्सीजन की मात्रा में कमी आने की प्रक्रिया को सुपोषण (eutrophication) कहते हैं। जल में घुली ऑक्सीजन की कमी तथा विषैले औद्योगिक कचरे के प्रभाव से मछलियों की संख्या में कमी आ जाती है। मछली हमारे भोजन का एक स्रोत है। सुपोषण से अलवणीय जल में रहने वाले अन्य जन्तु भी प्रभावित होते है।

प्रश्न 9.
मृदा अपरदन क्या है? इसके कारण तथा प्रभाव क्या हैं? इसे किस प्रकार रोका जा सकता है?
उत्तर:
मृदा अपरदन प्राकृतिक कारक; जैसे-जल तथा वायु मृदा की ऊपरी परत को हटाने के लिए उत्तरदायी होते हैं। इस प्रक्रम को मृदा अपरदन (soil erosion) कहते हैं। कारण

  1. तीव्र वर्षा मिट्टी की अनावृत ऊपरी परत को बहा ले जाती है।
  2. धूल भरी आँधी से भी मृदा अपरदन होता है।
  3. मनुष्य के क्रियाकलापों से मृदा अपरदन होता है।मनुष्य द्वारा बढ़ते आवासों तथा शहरी क्षेत्रों के विकास से बहुत बड़े क्षेत्र वनस्पतिविहीन हो गए हैं। वनस्पति का आवरण हट जाने से नग्न भूमि पर वायु तथा जल का सीधा प्रभाव पड़ता है। इससे मृदा का अपरदन होता है।
  4. भूमि की त्रुटिपूर्ण जुताई से भी मृदा अपरदन होता है।

प्रभाव इसके निम्नलिखित हानिकारक प्रभाव होते हैं –

  1. मृदा अपरदन से हरे जंगल मरुस्थलों में बदल जाते हैं, जिससे पर्यावरण सन्तुलन बिगड़ जाता
  2. इससे फसल ठीक प्रकार से नहीं होती है, जिससे भोजन की कमी हो सकती है।
  3. पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन से भूस्खलन हो सकता है।
  4. इससे भूमि जल धारण नहीं कर सकती है। पानी के तीव्रता से नदियों में बह जाने से बाढ़ आ सकती है। इससे जान-माल का नुकसान हो सकता है। रोकने के उपाय इसके लिए हम

निम्नलिखित विधियों का प्रयोग करते हैं –

  1. वृक्षारोपण तथा घास उगाकर।।
  2. सघन खेती तथा बहाव के लिए ठीक नालियाँ बनाकर।
  3. ढलवाँ स्थानों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाने से जल बहाव की गति कम हो जाती है।

प्रश्न 10.
रेडियोधर्मी प्रदूषण पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
रेडियोधर्मी प्रदूषण रेडियोधर्मी पदार्थों से पर्यावरण में विभिन्न प्रकार के कण और किरणें उत्पन्न होती हैं। परमाणु विस्फोटों, ऊर्जा उत्पादन केन्द्रों तथा आण्विक परीक्षणों से पर्यावरण में रेडियोधर्मिता बढ़ने का खतरा

प्रश्न 2.
खाद्य-श्रृंखला से आप क्या समझते हैं? खाद्य-श्रृंखला तथा खाद्य-जाल में क्या अन्तर है? उचित उदाहरणों की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
खाद्य-श्रृंखला किसी भी पारिस्थितिक तन्त्र में अनेक ऐसे जीव होते हैं जो एक-दूसरे को खाकर (उपभोग करके) अपनी आहार सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। किसी पारिस्थितिक तन्त्र में एक जीव द्वारा दूसरे जीव को खाने (उपभोग करने) की क्रमबद्ध प्रक्रिया को खाद्य श्रृंखला या आहार-श्रृंखला कहते हैं। किसी पारिस्थितिक तन्त्र में खाद्य-श्रृंखला विभिन्न प्रकार के जीवधारियों का वह क्रम है, जिसमें जीवधारी भोज्य एवं भक्षक के रूप में सम्बन्धित रहते हैं और इनमें होकर खाद्य-ऊर्जा का प्रवाह एक ही दिशा (unidirectional) में होता रहता है।