tenth history 5

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science History Solutions Chapter 5 अर्थव्यवस्था और आजीविका

Bihar Board Class 10 History अर्थव्यवस्था और आजीविका Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

नीचे दिये गए प्रश्नों के उत्तर के रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। जो आपको सर्वाधिक उपयुक्त लगे उनमें सही का चिह्न लगायें।

प्रश्न 1.
स्पिनिंग जेनी का आविष्कार कब हुआ ?
(क) 1769
(ख) 1770
(ग) 1773
(घ) 1775
उत्तर-
(ख) 1770

प्रश्न 2.
सेफ्टी लैम्प का आविष्कार किसने किया?
(क) जेम्स हारग्रीब्ज
(ख) जॉन के
(ग) क्राम्पटन
(घ) हम्फ्री डेवी.
उत्तर-
(घ) हम्फ्री डेवी.

प्रश्न 3.
बम्बई में सर्वप्रथम सूती कपड़े के मिलों की स्थापना कब हुई ?
(क) 1851
(ख) 1885
(ग). 1907
(घ) 1914
उत्तर-
(क) 1851

प्रश्न 4.
1917 ई० में भारत में पहली जूट मिल किस शहर में स्थापित हुआ?
(क) कलकत्ता
(ख) दिल्ली
(ग) बम्बई
(घ) पटना
उत्तर-
(क) कलकत्ता

प्रश्न 5.
भारत में कोयला उद्योग का प्रारम्भ कब हुआ?
(क) 1907
(ख) 1914
(ग) 1916
(घ) 1919
उत्तर-
(ख) 1914.

प्रश्न 6.
जमशेदजी टाटा ने टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी की स्थापना कब की?
(क) 1854
(ख) 1907
(ग) 1915
(घ) 1919
उत्तर-
(ख) 1907

प्रश्न 7.
वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन किसने किया?
(क) राबर्ट ओवन
(ख) लुई ब्लांक
(ग) कार्ल मार्क्स
(घ) लाला लाजपत राय
उत्तर-
(ग) कार्ल मार्क्स

प्रश्न 8.
इंगलैंड में सभी स्त्री एवं पुरुषों को वयस्क मताधिकार कब प्राप्त हुआ?
(क) 1838
(ख) 1881
(ग) 1885
(घ) 1932
उत्तर-
(ग) 1885

प्रश्न 9.
‘अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन काँग्रेस’ की स्थापना कब हुई?
(क) 1848
(ख) 1881
(ग) 1885
(घ) 1920
उत्तर-
(घ) 1920

प्रश्न 10.
भारत के लिए पहला फैक्ट्री एक्ट कब पारित हुआ?
(क) 1838
(ख) 1858
(ग) 1881
(घ) 1911
उत्तर-
(ग) 1881

निम्नलिखित में रिक्त स्थानों को भरें:

प्रश्न 1.
सन् 1838 ई. में………..चार्टिस्ट आन्दोलन की शुरूआत हुई।
उत्तर-
लंदन म

प्रश्न 2.
सन्…………. में मजदूर संघ अधिनियम पारित हुआ।
उत्तर-
1926

प्रश्न 3.
न्यूनतम मजदूरी कानून, सन् ……….ई. में पारित हुआ।
उत्तर-
1948

प्रश्न 4.
अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ की स्थापना…………….ई. में हुई।
उत्तर-
1920

प्रश्न 5.
प्रथम फैक्ट्री एक्ट में महिलाओं एवं बच्चों की…………………एवं………………….. को निश्चित किया
उत्तर-
आयु, काम का घंटा

सुमेलित करें

उत्तर-
1. (ङ), 2. (घ), 3. (ख), 4. (ग), 5. (क)।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (20 शब्दों में उत्तर दें)

प्रश्न 1.
फैक्ट्री प्रणाली के विकास के किन्हीं दो कारणों को बतायें।
उत्तर-
(i) मशीनों एवं नये-नये यंत्रों का आविष्कार।
(ii) मानव की आवश्यकता।

प्रश्न 2.
बुर्जुआ वर्ग की उत्पति कैसे हुई ?
उत्तर-
औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप ब्रिटिश सहयोग से भारत के उद्योग में पूँजी लगाने वाले उद्योगपति पूँजीपति बन गए। अतः समाज में तीन वर्गों का उदय हुआ- पूँजीपति, बुर्जुआ वर्ग (मध्यम वर्ग) एवं मजदूर वर्ग।

प्रश्न 3.
अठारहवीं शताब्दी में भारत के मुख्य उद्योग कौन-कौन से थे?
उत्तर-
भारतीय हस्तकला, शिल्प उद्योग।

प्रश्न 4.
निरुद्योगीकरण से आपका क्या तात्पर्य है ?
उत्तर-
कल कारखानों की स्थापना के बाद भारत में कुटीर उद्योग बन्द होने की कगार पर पहुँच गया? जिसे इतिहासकारों ने निरुद्योगीकरण की संज्ञा दी है।

प्रश्न 5.
औद्योगिक आयोग की नियुक्ति कब हुई ? इसके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर-
सन् 1916 में औद्योगिक आयोग की स्थापना हुई जिसका उद्देश्य था भारतीय उद्योग तथा व्यापार के भारतीय वित्त से संबंधित प्रयत्नों के लिए सहायक क्षेत्रों का पता लगाना।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (60 शब्दों में उत्तर दें)

प्रश्न 1.
औद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए कृषि क्षेत्र में एवं उद्योग जगत में नई-नई मशीनों को स्थापित करना तथा कल कारखाने स्थापित करना औद्योगीकरण कहलाता है। और इसके कारण मनुष्य के आर्थिक और सामाजिक जीवन में हुए परिवर्तन को औद्योगिक क्रांति कहते हैं।

प्रश्न 2.
औद्योगीकरण ने मजदूरों की आजीविका को किस तरह प्रभावित किया ?
उत्तर-
साधारणतया औद्योगीकरण ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें उत्पादन मशीनों द्वारा कारखानों में होता है जिससे मजदूरों की आजीविका पर बुरा प्रभाव पड़ने लगता हैं क्योंकि मशीनों को संचालित करने के लिए कम संख्या में एवं विशेष मजदूरों की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3.
स्लम पद्धति की शुरुआत कैसे हुई?
उत्तर-
औद्योगीकरण के फलस्वरूप जब मिल मालिकों द्वारा मजदूरों का शोषण होने लगा तो उनकी स्थिति दयनीय होती गयी जिससे वे सुविधाविहीन घरों में रहने को बाध्य हो गये, जिसे ‘स्लम कहा जाने लगा।

प्रश्न 4.
न्यूनतम मजदूरी कानून कब पारित हुआ और इसके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर-
न्यूनतम मजदूरी कानून 1948 में पारित हुआ जिसके द्वारा कुछ उद्योगों में मजदूरी की दरें निश्चित की गई और कहा गया कि मजदूरी ऐसी होनी चाहिए जिससे मजदूर केवल अपना ही गुजारा न कर सके, बल्कि इससे कुछ और अधिक हो, ताकि वह अपनी कुशलता को भी बनाये रख सके।

प्रश्न 5.
कोयला एवं लौह उद्योग ने औद्योगीकरण को गति प्रदान की। कैसे?
उत्तर-
कोयला एवं लोहा दोनों को औद्योगीकरण प्रक्रिया की रीढ़ माने जाते हैं क्योंकि कोयला ईंधन की जरूरत को पूरा करता है और लोहा मशीनों के निर्माण में काम आता है। और कोई भी कारखाना बिना इंधन और मशीन के नहीं चल सकता। अतः कोयला एवं लोहा उद्योग
औद्योगीकरण की गति को तीव्रता प्रदान करता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें)

प्रश्न 1.
औद्योगीकरण क कारणों का उल्लेख करें।
उत्तर-
औद्योगीकरण के कारण निम्न हैं

  • आवश्यकता आविष्कार की जननी-नई-नई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तत्कालीन समय में उद्योगों का विकास प्रारंभ हुआ।
  • नये-नये मशीनों का आविष्कार-18वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में ब्रिटेन में नये-नये यंत्रों एवं मशीनों के आविष्कार ने उद्योग जगत में ऐसी क्रांति का सूत्रपात किया, जिससे औद्योगीकरण एवं उपनिवेशवाद दोनों का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  • कोयले एवं लोहे की प्रचुरता–किसी भी उद्योग की प्रगति कोयले एवं लोहे के उद्योग पर बहुत अधिक निर्भर करती है। ब्रिटेन में लोहे एवं कोयले की खानें थीं जिससे औद्योगीकरण
    को बढ़ावा मिला।
  • फैक्ट्री प्रणाली की शुरूआत-मशीनों एवं नये-नये यंत्रों के आविष्कार ने फैक्ट्री प्रणाली को विकसित किया, फलस्वरूप उद्योग तथा व्यापार के नये-नये केन्द्रों का जन्म हुआ।
  • सस्ते श्रम को उपलब्धता–18वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में बड़ाबन्दी प्रथा की शुरूआत हुई, जिसमें जमींदारों ने छोटे-छोटे खेतों को खरीदकर बड़े-बड़े फार्म स्थापित कर लिये। अपनी जमीन बेच देने वाले छोटे किसान मजदूर बन गए। ये आजीविका उपार्जन के लिए काम धंधों की खोज में निकटवर्ती शहर चले गए। इस तरह मशीनों द्वारा फैक्ट्री में काम करने के लिए असंख्य मजदूर कम मजदूरी पर भी तैयार हो जाते थे। सस्ते श्रम ने उत्पादन के क्षेत्र में सहायता पहुँचाई।
  • यातायात की सुविधा-फैक्ट्री में उत्पादित वस्तुओं को एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाने तथा कच्चा माल को फैक्ट्री तक लाने के लिए ब्रिटेन में यातायात की अच्छी सुविधा उपलब्ध थी। जहाजरानी उद्योग में यह विश्व में अग्रणी देश था और सभी देशों के सामानों का आयात निर्यात मुख्यतः ब्रिटेन के व्यापारिक जहाजी बेड़े से ही होता था, जिसका आर्थिक लाभ औद्योगीकरण की गति को तीव्र करने में सहायक बना।
  • विशाल औपनिवेशक स्थिति-औद्योगीकरण की दिशा में ब्रिटेन द्वारा स्थापित विशाल उपनिवेशों ने भी योगदान दिया। इन उपनिवेशों से कच्चा माल सस्ते दामों में प्राप्त करना तथा उत्पादित वस्तुओं को वहाँ के बाजारों में महंगे दामों पर बेचना ब्रिटेन के लिए आसान था।

प्रश्न 2.
औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप होनेवाले परिवर्तनों पर प्रकाश डालें।
उत्तर-

  • नगरों का विकास-सन् 1850 से 1950 ई. के बीच भारत में वस्त्र उद्योग, लौह उद्योग, सीमेन्ट उद्योग, कोयला उद्योग जैसे कई उद्योगों का विकास हुआ। जिससे जमशेदपुर, सिन्दरी, धनबाद, डालमिया नगर इत्यादि नये व्यापारिक नगरों का विकास हुआ।
  • कुटीर उद्योग का पतन जैसे-जैसे बड़े-बड़े मशीनों और यंत्रों का विकास हुआ वैसे-वैसे शिल्प उद्योग, बुनकर उद्योग इत्यादि कुटीर उद्योगों का पतन हो गया।
  • साम्राज्यवाद का विकास औद्योगीकरण के परिणाम-स्वरूप बड़े पैमाने पर उत्पादन होना शुरू हुआ, जिसकी खपत के लिए यूरोप में उपनिवेशों की होड़ शुरू हो गयी और आगे चलकर इस उपनिवेशवाद ने साम्राज्यवाद का रूप ले लिया।
  • समाज में वर्ग विभाजन एवं बुर्जुआ वर्ग का उदय औद्योगीकरण के फलस्वरूप ब्रिटिश सहयोग से भारत के उद्योग में पूंजी लगाने वाले उद्योगपति पूँजीपति बन गये। अतः समाज में तीन वर्गों का उदय हुआ – पूँजीपति वर्ग, बुर्जुआ (मध्यम) वर्ग एवं मजदूर (वर्ग)।
  • फैक्ट्री मजदूर वर्ग का जन्म बड़े-बड़े उद्योगों में कार्य करने वाले मजदूरों का उद्योगपतियों द्वारा शोषण होने लगा जिससे उनका जीवन स्तर काफी निम्न होता गया, फलस्वरूप मजदूर वर्ग का जन्म हुआ।
  • स्लम पद्धति की शुरूआत छोटे-छोटे घरों में जहाँ किसी तरह की सुविधा उपलब्ध नहीं थी, वहाँ मजदूर वर्ग के लोग रहने को बाध्य थे, ऐसे ही घरों को स्लम कहा जाता है।

प्रश्न 3.
उपनिवेशवाद से आप क्या समझते हैं ? औद्योगीकरण ने उपनिवेशवाद को जन्म दिया। कैसे?
उत्तर-
उपनिवेशवाद की व्याख्या विभिन्न कालों में विभिन्न विद्वानों द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से की गई है। पर, इतिहास की दृष्टि से उन्नत एवं शक्तिशाली देशों द्वारा पिछड़े और निर्बल देशों के राजनीतिक तथा आर्थिक आधिपत्य की स्थिति को उपनिवेशवाद कहते हैं।

जैसे ही इंगलैंड में औद्योगीकरण हुआ वैसे ही वहाँ बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों की स्थापना होने लगी और कारखानों में विभिन्न प्रकार के औद्योगिक वस्तुओं का उत्पादन होने लगा। इन वस्तुओं की खपत के लिए उसे विस्तृत बाजार की आवश्यकता पड़ी। व्यापारिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने विभिन्न देशों की ओर रुख किया। संसाधनों की प्रचुरता ने उसे भारत की तरफ व्यापार करने के लिए आकर्षित किया। धीरे-धीरे उसने भारत में शक्ति का प्रयोग कर अपने उपनिवेश की स्थापना कर ली। इस प्रकार उपनिवेशवाद का जन्म हुआ। अन्य देशों जैसे पुर्तगाल, फ्रांस, अमेरिका इत्यादि देशों ने भी इसी प्रकार से अपने उपनिवेशों की स्थापना की।

प्रश्न 4.
कुटीर उद्योग के महत्व एवं उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
कम पूँजी में घरेलू स्तर पर स्थापित उद्योग को कुटीर उद्योग कहते हैं। कुटीर उद्योग किसी भी राष्ट्र के विकास में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि इसमें देश की अधि कांश आबादी की भागीदारी होती है। इसमें किसी विशेष तकनीकी जानकारी की आवश्यकता नहीं होती। इसमें श्रम, पूँजी और समय तीनों कम लगते हैं तथा घर बैठे लोग अपना-अपना काम पर लेते हैं। इसका सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि इसमें घरेलू महिलाओं का योगदान भी सराहनीय होता है। कुटीर उद्योग के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं -सूत कताई, बुनाई, उनका रंग रोगन करना, अचार बनाना, पापड़ बनाना, सिलाई कढ़ाई करना इत्यादि। भारत में औद्योगीकरण के पूर्व कुटीर उद्योग काफी विकसित था परन्तु औद्योगीकरण के बाद उन्हें कच्चे माल के लाले पड़ने लगे और धीरे-धीरे यह मृतप्राय हो गया।

कुटीर उद्योग की उपयोगिता निम्नलिखित है-

  • यह मध्यम एवं निम्नवर्ग के अधिकांश लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है।
  • यह घरेलू महिलाओं को भी रोजगार का अवसर प्रदान करता है।
  • इसमें रोजगार के तलाश में जाने वाले लोगों के पलायन को रोकने में सहायता मिलती है।
  • यह सामाजिक आर्थिक प्रगति व संतुलित क्षेत्रवार विकास के लिए एक शक्तिशाली औजार का कार्य करता है।
  • यह कौशल में वृद्धि, उद्यमिता में वृद्धि तथा उपयुक्त तकनीक का बेहतर प्रयोग सुनिश्चित करता है।

प्रश्न 5.
औद्योगीकरण ने सिर्फ आर्थिक ढाँचे को ही प्रभावित नहीं किया बल्कि राजनैतिक परिवर्तन का भी मार्ग प्रशस्त किया। कैसे?
उत्तर-
औद्योगीकरण ने आर्थिक ढाँचे को तो परिवर्तित किया ही बल्कि राजनैतिक परिवर्तन का भी मार्ग प्रशस्त किया, क्योंकि औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप कुलीनता का गौरव समाप्तः हो गया। श्रमजीवियों को जमींदारों के शोषण से मुक्ति मिल गई। नए उद्योग-केन्द्रों में उनकी स्थिति पहले से अच्छी थी और उनकी आय भी बढ़ गई थी। उनके जीवनस्तर में भी परिवर्तन हो गया था। शहरों में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं था। इस तरह, व्यक्ति का महत्व बढ़ गया और लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी बढ़ गई।

मिल-मालिक मजदूरों के शोषण के द्वारा अपनी पूँजी बढ़ा रहे थे। अतः मजदूर अपनी संगठन तथा ट्रेड यूनियन बनाकर और हड़ताल करके वे मिल-मालिकों को अपनी मांग पूरी करने के लिए विवश करने लगे। इससे लोगों में नेतृत्व क्षमता का विकास होने लगा।

औद्योगिक क्रांति के कारण समाज में पूँजीवाद का विकास हुआ। फलतः समाज में पूँजीपति वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ। पूँजीपतियों ने शासन और राजनीति को प्रभावित किया। पूँजीवाद से ही साम्राज्यवाद का जन्म हुआ। यूरोपीय राष्ट्रों के द्वारा एशिया, अमेरिका, अफ्रीका के महादेशों में उपनिवेश स्थापित किए गए। यूरोपीय देशों में ही नहीं, बल्कि सारे विश्व में साम्राज्यवादी होड़ के कारण अशांति एवं संघर्ष का वातावरण उत्पन्न हो गया। प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्ध इसी व्यवस्था का अभिशाप था जिसने विश्व की राजनीति को काफी प्रभावित किया।

Bihar Board Class 10 History अर्थव्यवस्था और आजीविका Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
फ्लाईंग शटल का आविष्कार किसने किया ?
उत्तर-
जॉन के।

प्रश्न 2.
वाष्पचालित रेल इंजन का आविष्कार किसने किया?
उत्तर-
जॉर्ज स्टीफेंशन ने।

प्रश्न 3.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने गुमाश्तों को क्यों बहाल किया ?
उत्तर-
बुनकरों पर नियंत्रण रखने के लिए।

प्रश्न 4.
जमशेदपुर में पहला लौह इस्पात संयंत्र किसने स्थापित किया ?
उत्तर-
जे. एन. टाटा ने (1912)।

प्रश्न 5.
आदि औद्योगीकरण किसे कहते हैं ?
उत्तर-
यूरोप और इंगलैंड में कारखानों में उत्पादन होने के पूर्व की स्थिति को आदि-औद्योगीकरण कहते हैं।

प्रश्न 6.
चार्टर एक्ट का भारतीय व्यापार पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-
चार्टर एक्ट (1813) के द्वारा भारतीय व्यापार पर से ईस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 7.
कलकत्ता में पहली जूट मिल किसने स्थापित की।
उत्तर-
हुकुम चन्द ने।

प्रश्न 8.
उत्पादन अपने उत्पादों का प्रचार करने के लिए कौन साधन अपनाते थे?
उत्तर-
उत्पादक अपने उत्पादों का प्रचार करने के लिए अपने सामानों पर लेबल लगाते थे। लेबलों से उत्पाद की गुणवत्ता स्पष्ट होती थी। 19वीं सदी के अंतिम चरण से उत्पादकों ने अपने-अपने उत्पाद के प्रचार के लिए आकर्षक कैलेंडर छपवाने आरंभ किए।

प्रश्न 9.
वर्तमान समय में भारत में कितने स्टील प्लांट हैं ? ।
उत्तर-
वर्तमान समय में भारत में 7 स्टील प्लांट कार्यरत हैं।

प्रश्न 10.
पहली देशी जूट मिल कहाँ स्थापित हुई ?
उत्तर-
पहली जूट मिल बंगाल के रिशरा नामक स्थान में 1855 में खोली गई।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर –

प्रश्न 1.
जॉबर कौन थे ?
उत्तर-
कारखानों तथा मिलों में मजदूरों और कामगारों की नियुक्ति का माध्यम जॉबर होते थे। प्रत्येक मिल मालिक जॉबर को नियुक्त करते थे। यह मालिक का पुराना तथा विश्वस्त कर्मचारी होता था। वह आवश्यकतानुसार अपने गाँव से लोगों को लाता था और उन्हें कारखानों में नौकरी दिलवाता था। मजदूरों को शहर में रहने और उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने का काम जॉबर ही करते थे।

प्रश्न 2.
ब्रिटेन में महिला कामगारों ने स्पिनिंग जेनी पर क्यों हमले किए ?
उत्तर-
बेरोजगारी की आशंका से मजदूर कारखानेदारी एवं मशीनों के व्यवहार का विरोध कर रहे थे। इसी क्रम में ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीन का जब व्यवहार होने लगा तब इस उद्योग में लगी महिलाओं ने इसका विरोध आरंभ किया। उन लोगों को अपना रोजगार छिनने की आशंका दिखाई पड़ने लगी। अतः ब्रिटेन की महिला कामगारों ने स्पिनिंग जेनी मशीनों पर आक्रमण कर उन्हें तोड़ना आरंभ किया।

प्रश्न 3.
लंदन को फिनिशिंग सेंटर’ क्यों कहा जाता था?
उत्तर-
इंगलैंड के कपड़ा व्यापारी वैसे लोगों से जो रेशों के हिसाब से ऊन छांटते थे। (स्टेप्लसे) ऊन खरीदते थे। इस ऊन को वे सूत कातने वालों तक पहुँचाते थे। तैयार धागा वस्त्र बुनने वालों, चुन्नटो के सहारे कपड़ा समेटने वालों (पुलजे) और कपड़ा रंगने वालों (रंग साजों) के पास ले जाया जाता था। रंगा हुआ वस्त्र लंदन पहुँचता था। जहाँ उसकी फिनिशिंग होती थी। इसलिए लंदन को फिनिशिंग सेंटर कहा जाता था।

प्रश्न 4.
इंगलैंड ने अपने वस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने के लिए क्या किया?
उत्तर-
इंगलैंड में यांत्रिक युग का आरंभ सूती वस्त्र उद्योग से हुआ। 1773 में लंकाशायर के वैज्ञानिक जान के वे फ्लाइंग शट्ल नामक मशीन बनाई। इससे बुनाई की रफ्तार बढ़ी तथा सूत की माँग बढ़ गई। 1765 में ब्लैकबर्न के जेम्स हारग्रीज ने स्पिनिंग जेनी बनाई जिससे सूत की कताई आठ गुना बढ़ गई। रिचर्ड आर्कराइट ने सूत कातने के लिए स्पिनिंग फ्रेम का आविष्कार किया जिससे अब हाथ से सूत कातने का काम बंद हो गया। क्रॉम्पटन ने स्पिनिंग म्युल नामक मशीन बनाई। इन मशीनों के आधार पर इंगलैंड में कम खर्च में ही बारीक सूत अधिक मात्रा में बनाए जाने लगे। इससे वस्त्र उद्योग में क्रांति आ गई। इन संयंत्रों की सहायता से इंगलैंड में वस्त्र उद्योगों को बढ़ावा मिला तथा 1820 तक इंगलैंड सूती वस्त्र उद्योगों का प्रमुख केन्द्र बन गया।

प्रश्न 5.
भारत में निरुद्योगीकरण क्यों हुआ?
उत्तर-
भारत इंगलैंड का सबसे महत्वपूर्ण उपनिवेशों में से श्रम था। सरकार ने भारत से कच्चे , माल का आयात और इंगलैंड के कारखानों से तैयार माल का भारत में निर्यात करने की नीति
अपनाई। इसके लिए सुनियोजित रूप स भारतीय उद्योगों विशेषतः वस्त्र उद्योग को नष्ट कर दिया गया। 1850 के बाद अंगरेजी सरकार की औद्योगिक नीतियाँ मुक्त व्यापार की नीति, भारतीय
वस्तुओं के निर्यात पर सीमा और परिवहन शुल्क लगाने, रेलवे, कारखानों में अंगरेजी पूंजी निवेश, भारत में अंगरेजी आयात का बढ़ावा देने इत्यादि के फलस्वरूप भारतीय उद्योगों का विनाश हुआ। कारखानों की स्थापना की प्रक्रिया बढ़ी जिससे देशी उद्योग अपना महत्व खोने लगे। इससे भारतीय उद्योगों का निरूद्योगीकरण हुआ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
19वीं शताब्दी में यरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों के बजाए हाथ से काम करनेवाले श्रमिकों को प्राथमिकता देते थे। इसका क्या कारण था?
उत्तर-
19वीं शताब्दी में औद्योगीकरण के बावजूद हाथ से काम करनेवाले श्रमिकों की मांग बनी रही। अनेक उद्योगपति मशीनों के स्थान पर हाथ से काम करनेवाले श्रमिकों को ही प्राथमिकता देते थे। इसके प्रमुख निम्नलिखित कारण थे-

(i) इंगलैंड में कम मजदूरी पर काम करनेवाले श्रमिक बड़ी संख्या में उपलब्ध थे। उद्योगपतियों को इससे लाभ था। मशीन लगाने पर आनेवाले खर्च से कम खर्च पर ही इन श्रमिकों से काम करवाया जा सकता था। इसलिए उद्योगपतियों ने मशीन लगाने ‘ में अधिक उत्साह नहीं दिखाया।

(ii) मशीनों को लगवाने में अधिक पूंजी की आवश्यकता थी। साथ ही मशीन के खराब होने पर उसकी मरम्मत कराने में अधिक धन खर्च होता था। मशीनें उतनी अच्छी नहीं थी, जिसका दावा आविष्कारक करते थे।

(iii) एक बार मशीन लगाए जाने पर उसे सदैव व्यवहार में लाना पड़ता था, परंतु श्रमिकों की संख्या आवश्यकतानुसार घटाई-बढ़ाई जा सकती थी। मौसमी आधार पर श्रमिकों की संख्या की आवश्यकता पड़ती थी। उदाहरण के लिए इंगलैंड में जाड़े के मौसम में गैस घटों और शराबखानों में अधिक काम रहता था। बंदरगाहों पर जाड़ा में ही जहाजों की मरम्मत तथा सजावट का काम किया जाता था। क्रिसमस के अवसर पर बुक बाइंडरों और प्रिटरों को अतिरिक्त श्रमिकों की जरूरत पड़ती थी। उद्योगपति मौसम के अनुसार उत्पादन में कमी-बेशी को ध्यान में रखकर आसानी से मजदूरों की संख्या घटा-बढ़ा सकते थे। इसलिए उद्योमपति मशीनों के व्यवहार से अधिक हाथ से काम करनेवाले मजदूरों को रखना ज्यादा पसंद करते थे।

(iv) विशेष प्रकार के सामान सिर्फ कुशल कारीगर ही हाथ से बना सकते थे। मशीन विभिन्न डिजाइन और आकार के सामान नहीं बना सकते थे।

(v) विक्टोरियाकालीन ब्रिटेन में हाथ से बनी चीजों की बहुत अधिक मांग थी। हाथ से बने सामान परिवष्कृत, सुरुचिपूर्ण, अच्छी फिनिशवाली, बारीक डिजाइन और विभिन्न आकार की होती थी। कुलीन वर्ग इसकी उपयोग करना गौरव की बात मानते थे। इसलिए आधुनिकीकरण के युग में मशीनों के व्यवहार के बावजूद हाथ से काम करनेवाली श्रमिकों की मांग बनी रही।

प्रश्न 2.
18वीं शताब्दी तक अंतराष्ट्रीय बाजार में भारतीय वस्त्रों की माँग बने रहने का क्या कारण था?
उत्तर-
प्राचीन काल से ही भारत का वस्त्र उद्योग अत्यंत विकसित स्थिति में था। यहाँ विभिन्न प्रकार के वस्त्र बनाए जाते थे। उनमें महीन सूती (मलमल) और रेशमी वस्त्र मुख्य थे। उनकी माँग अंतर्राष्ट्रीय बाजार में काफी थी। कंपनी सत्ता की स्थापना एवं सुदृढ़ीकरण के आरंभिक चरण तक भारत के वस्त्र निर्यात में गिरावट नहीं आई। भारतीय वस्त्रों की मांग अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बनी हुई थी जिसका मुख्य कारण था कि ब्रिटेन में वस्त्र उद्योग उस समय तक विकसित स्थिति में नहीं पहुंचा था। एक अन्य कारण यह था कि जहाँ अन्य देशों में मोटा सूत बनाया जाता था, वहीं भारत में महीन किस्म का सूत बनाया जाता था जिससे महीन सूती वस्त्र बनाया जाता था। ” इसलिए आर्मीनियम और फारसी व्यापारी पंजाब, अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया के मार्ग से भारतीय सामान ले जाकर इसे बेचते थे। महीन कपड़ो के धान ऊँट की पीठों पर लादकर पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत से पहाड़ी दरों और रेगिस्तानों के पार ले जाए जाते थे। मध्य एशिया में इन्हें यूरोपीय मंडियों में भेजा जाता था।

प्रश्न 3.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय बुनकरों से सूती और रेशमी वस्त्र की नियमित आपूर्ति के लिए क्या व्यवस्था की ?
उत्तर-
बंगाल में राजनीतिक सत्ता की स्थापना के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी को भारतीय बुनकरों से कपड़ा प्राप्त कर उनका निर्यात करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। बुनकरों से वस्त्र प्राप्त करने के लिए यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों में प्रतिद्वंद्विता होती थी। इसका लाभ स्थानीय व्यापारी भी उठाते थे। बुनकरों से वस्त्र खरीदकर वे ऊंची कीमत देनेवाली कंपनी को बेचते थे। कंपनी राज्य की स्थापना से परिदृश्य बदल गया। सूती वस्त्र उद्योग में व्याप्त प्रतिद्वंद्विता को समाप्त कर उसपर अपना एकाधिकार स्थापित करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने नियंत्रण एवं प्रबंधन की नई नीति अपनाई जिससे उसे वस्त्र की आपूर्ति लगातार होती रही। इसके लिए कंपनी ने निम्नलिखित कदम उठाए
(i) गुमाश्तो की नियुक्ति कपड़ा व्यापार परं एकाधिकार स्थापित करने के लिए बिचौलियों को समाप्त करना एवं बुनकरों पर सीधा नियंत्रण रखना आवश्यक था। इसके लिए कंपनी ने अपने नियमित कर्मचारी नियुक्त किए जो गुमाश्ता कहे जाते थे। इनका मुख्य काम बुनकरों पर नियंत्रण रखना, उनसे कपड़ा इकट्ठा करना तथा बुने गए वस्त्रों की गुणवत्ता का जांच करना था।

(ii) बुनकरों की पेशगी की व्यवस्था बुनकरों से स्वयं तैयार सामान प्राप्त करने के लिए कंपनी ने उन्हें अग्रिम राशि या पेशगी देने की नीति अपनाई। अग्रिम राशि प्राप्त कर बुनकर अब सिर्फ कंपनी के लिए ही वस्त्र तैयार कर सकते थे। वे अपना माल कंपनी के अतिरिक्त अन्य किसी कम्पनी या व्यापारी को नहीं बेच सकते थे। बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए ऋण भी उपलब्ध कराया गया। अग्रिम राशि और कर्ज से कपड़ा तैयार कर बुनकरों को माल गुमाश्तों को सौंपना पड़ा।

प्रश्न 4.
प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा? व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
प्रथम विश्वयुद्ध तक भारत का औद्योगिक उत्पादन की धीमा रहा। परंतु युद्ध के दौरान और उसके बाद भारत का औद्योगिक उत्पादन में काफी तेजी आई जिसके निम्नलिखित प्रमुख कारण थे

(i) प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन में सैनिक आवश्यकता के अनुरूप अधिक सामान बनाए जाने लगे जिससे मैनचेस्टर में बनने वाले वस्त्र उत्पादन में गिरावट आई। इससे भारतीय उद्यमियों को अपने बनाए गए वस्त्र की खपत के लिए देश में ही बहुत बड़ा बाजार मिल गया। फलतः सूती वस्त्रों का उत्पादन तेजी से बढ़ा।

(ii) विश्वयुद्ध के लम्बा खींचने पर भारतीय उद्योगपतियों ने भी सैनिकों की आवश्यकता के लिए सामान बनाकर मुनाफा कमाना आरंभ कर दिया। सैनिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए देशी कारखानों में भी सैनिकों के लिए वर्दी, जूते, जूट की बोरियाँ, टेन्ट, जीन इत्यादि बनाए जाने लगे। इससे देशी कारखानों में उत्पादन बढ़ा।

(iii) युद्धकाल में कारखानों में उत्पादन बढ़ाने के अतिरिक्त अनेक नये कारखाने खोले गए। मजदूरों की संख्या में भी वृद्धि की गई। इनके कार्य करने की अवधि में भी बढ़ोतरी हुई। फलस्वरूप प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन ये तेजी से वृद्धि हुई।

Bihar Board Class 10 History अर्थव्यवस्था और आजीविका Notes

  • औद्योगिकीकरण के कारण –
    • आवश्यकता आविष्कार की जननी
    • नये-नये मशीनों का आविष्कार
    • कोयले एवं लोहे की प्रचुरता
    • फैक्ट्री प्रणाली की शुरूआत
    • सस्ते श्रम की उपलब्धता
    • यातायात की सुविधा
    • विशाल औपनिवेशिक स्थिति
  • 18वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में ब्रिटेन ने नये-नये यंत्रों एवं मशीनों के आविष्कार ने उद्योग जगत में ऐसी क्रांति का सूत्रपात किया, जिससे औद्योगिकीकरण एवं उपनिवेशवाद दोनों का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  • सन् 1769 में जेम्सवाट ने वाष्प इंजन का आविष्कार किया।
  • सन् 1815 में हम्फ्री डेवी ने खानों में काम करने के लिए एक सेफ्टी लैम्प का और इसी वर्ष हेनरी वेसेमर ने एक शक्तिशाली भट्ठी को विकसित करके लौह उद्योग को और भी बढ़ाने में सहायता की।
  • भारत में कारखानों की स्थापना 1850 के बाद होने लगी, इसके बाद भारत में कुटीर उद्योग बन्द होने लगे। भारतीय इतिहासकारों ने इसे भारत के लिए निरूद्योगीकरण की संज्ञा दी।
  • सर्वप्रथम सूती कपड़े की मिल 1851 में बम्बई में स्थापित की गयी।
  • 1869 में स्वेनजहर के खुल जाने से बम्बई के बन्दरगाह पर इंगलैंड से आने वाला सूती कपड़ों का आयात बढ़ने लगा।
  • सूती वस्त्र उद्योग ब्रिटेन का सबसे बड़ा उद्योग 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक बन चुका था।
  • लिवरपुल स्थित लंकाशायर सूती वस्त्र उद्योग का बड़ा केन्द्र बन गया।
  • 1805 के बाद न्यू साउथ वेल्स ऊन उत्पादन का केन्द्र बना।
  • अंग्रेज व्यापारी एजेंट की मदद से भारतीय कारीगरों को पेशगी रकम देकर उनसे उत्पादन करवाते थे। ये एजेंट ‘गुमाश्ता’ कहलाते थे।
  • 1835 ई. में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित चार्टर एक्ट के द्वारा व्यापार पर से ईस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिकार समाप्त कर दिया।
  • कारखानों की स्थापना के क्रम में सन् 1830-40 के दशक में बंगाल में द्वारकानाथ टैगोर ने 6 संयुक्त उद्यम कम्पनियाँ लगाई।
  • सर्वप्रथम सूती कपड़े की मिल की नींव 1851 ई. में बम्बई में डाली गई।
  • सन् 1917 में कलकत्ता में देश का पहला जूट मिल एक मारवाड़ी व्यवसायी हुकुम चंद ने स्थापित किया।