BSEB 12 HIS CH 15

BSEB Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरूआत
Bihar Board Class 12 History संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरूआत Textbook Questions and Answers
उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
उद्देश्य प्रस्ताव में किन आदर्शों पर जोर दिया गया था?
उत्तर:
उद्देश्य प्रस्ताव के मुख्य आदर्श –

प्रभुता सम्पन्न स्वतन्त्र भारत की स्थापना और उसके सभी भू-भागों और सरकार के अंगों की सभी प्रकार की शक्ति और अधिकारों का स्रोत जनता का रहना।
भारत के सभी लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, पद अवसर और कानून के समक्ष समानता, कानून और सार्वजनिक नैतिकता के अंतर्गत विचार अभिव्यक्ति के अधिकार, विश्वास, निष्ठा, पूजा, व्यवसाय, संगठन और कार्य की स्वतंत्रता की गारंटी देना।
अल्पसंख्यकों, पिछड़े और जनजाति वाले क्षेत्रों, दलित और अन्य वर्गों के लिए सुरक्षा के समुचित उपाय करना।

प्रश्न 2.
विभिन्न समूह ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को किस तरह परिभाषित कर रहे थे?
उत्तर:

कुछ लोग आदिवासियों को मैदानी लोगों से अलग देख कर उन्हें विशेष आरक्षण देना चाहते थे।
अन्य प्रकार के लोग दमित वर्ग के लोगों को हिंदुओं से अलग करके देख रहे थे और वह उनके लिए अधिक स्थानों का आरक्षण चाहते थे।
कुछ विद्वान मुसलमानों को ही अल्पसंख्यक कह रहे थे। उनके अनुसार उनका धर्म रीति-विाज आदि हिन्दुओं से बिल्कुल अलग है।
सिक्ख लीग के कुछ सदस्य सिक्ख धर्म के अनुयायियों को अल्पसंख्यक का दर्जा देने और अल्पसंख्यकों को सुविधायें देने की मांग कर रहे थे।
मद्रास के बी. पोकर बहादुर ने 27 अगस्त, 1947 के दिन संविधान सभा में अल्पसंख्यकों को पृथक् निर्वाचिका देने की मांग की और कहा कि मुसलमानों की जरूरतों को गैर-मुसलमान अच्छी तरह नहीं समझ सकते हैं।
प्रश्न 3.
प्रांतों के लिए ज्यादा शक्तियों के पक्ष में क्या तर्क दिए गए?
उत्तर:

मद्रास के सदस्य के. सन्तनम ने कहा कि न केवल राज्यों को बल्कि केन्द्र को मजबूत बनाने के लिए भी शक्तियों का पुनर्वितरण आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि केन्द्र के पास जरूरत से ज्यादा उत्तरदायित्व होंगे तो वह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पायेगा। उसके कुछ दायित्वों में कमी करके उन्हें राज्यों को सौंप देने से केन्द्र ज्यादा मजबूत हो सकता है।
सन्तनम ने केन्द्र को अधिक राजकोषीय अधिकार देने का भी विरोध किया। उनके अनुसार ऐसा करने से राज्यों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो जायेगी और वे विकास कार्य नहीं कर सकेंगे। उन्होंने संघीय व्यवस्था को समाप्त करके एकल व्यवस्था को स्थापित करने की वकालत की।
प्रांतों के अन्य अनेक सदस्य भी इसी प्रकार की आशंकाओं से परेशान थे। उनका कहना था कि समवर्ती सूची और केन्द्रीय सूची में कम से कम विषय रखे जाएँ एवं राज्यों को अधिक अधिकार दिए जाएँ।

प्रश्न 4.
महात्मा गाँधी को ऐसा क्यों लगता था कि हिन्दुस्तानी राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए?
उत्तर:
हिन्दुस्तानी राष्ट्रीय भाषा –

  1. महात्मा गाँधी का मानना था कि हिंदुस्तानी भाषा में हिंदी के साथ-साथ उर्दू भी शामिल है और दो भाषाएँ मिलकर हिंदुस्तानी भाषा बनाती हैं।
  2. वह हिंदू और मूसलमान दोनों के द्वारा प्रयोग में लाई जाती हैं और दोनों की संख्या अन्य सभी भाषा-भाषियों की तुलना में अधिक है। यह हिन्दू और मुसलमानों के साथ-साथ उत्तर और दक्षिण में भी खूब प्रयोग में लाई जा सकती है।
  3. गाँधी जी यह जानते थे कि हिंदी और उर्दू में संस्कृत के साथ-साथ अरबी और फारसी के शब्द भी मध्यकाल से प्रयोग हो रहे हैं। जब ऐसा है तो हिन्दुस्तानी भाषा सभी लोगों के लिए समझने में सहज है।
  4. गाँधी जी हिंदुस्तानी भाषा को देश के हिंदू और मुसलामनों में सद्भावना और प्रेम बढ़ाने वाली भाषा मानते थे। उनको कहना था कि इससे दोनों सम्प्रदायों के लोगों में परस्पर मेल-मिलाप, प्रेम, सद्भावना ज्ञान का आदान-प्रदान बढ़ेगा और यही भाषां देश की एकता को मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
  5. महात्मा गाँधी का कहना था जो लोग हिंदी को हिंदुओं की और उर्दू को केवल मुसलमानों की भाषा बनाकर भाषा के क्षेत्र में धार्मिकता और साम्प्रदायिकता का घृणित खेल खेलना चाहते हैं वे वस्तुतः संकीर्ण मनोवृत्ति के हैं।

प्रश्न 5.
वे कौन-सी ऐतिहासिक ताकतें थीं जिन्होंने संविधान का स्वरूप तय किया?
उत्तर:
संविधान का स्वरूप तय करने वाली ऐतिहासिक ताकतें निम्नलिखित हैं:

संविधान का स्वरूप तय करने वाली प्रथम ऐतिहासिक ताकत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस थी जिसने देश के संविधान को लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।
मुस्लिम लीग ने देश के विभाजन को बढ़ावा दिया परन्तु उदारवादी और विभाजन के बाद भी विभिन्न दबाव समूहों या राजनैतिक दलों से जुड़े रहने वाले मुसलमानों ने भी भारत को धर्म निरपेक्ष बनाए रखने तथा सभी नागरिकों की अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाये रखने में सक्षम सांविधिक प्रावधानों को समर्थन दिया।
समाजवादी विचारधारा या वामपंथी विचारधारा वाले लोगों ने संविधान में समाजवादी ढाँचे की सरकार बनाने, भारत को कल्याणकारी राज्य बनाने और समान काम के लिए समान वेतन, बंधुआ मजदूरी समाप्त करने, जमींदारी उन्मूलन करने के प्रावधानों को प्रविष्ट कराया।
एन. जी. रांगा और जयपाल सिंह जैसे आदिवासी नेताओं ने संविधान का स्वरूप तय करते समय इस बात की ओर ध्यान देने के लिए जोर दिया कि संविधान में आदिवासियों की सुरक्षा तथा उन्हें आम आदमियों की दशा में लाने के प्रावधान प्रविष्ट किए जाएँ।

प्रश्न 6.
दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावें:

अस्पृश्यों (अछूतों) की समस्या को केवल संरक्षण और बचाव से हल नहीं किया जा सकता बल्कि इसके लिए जाति भेदभाव वाले सामाजिक नियमों, कानूनों और नैतिक मान्यताओं को समाप्त करना जरूरी है।
हरिजन संख्या की दृष्टि से अल्पसंख्यक नहीं हैं। आबादी में उनको हिस्सा 20-25 प्रतिशत है। उन्हें समाज और राजनीति में उचित स्थान नहीं मिला है और शिक्षा और शासन में उनकी पहुँच नहीं है।
डा. अम्बेडकर ने संविधान का द्वारा अस्पृश्यता का उन्मूलन करने, तालाबों, कुओं और मंदिरों के दरवाजे सभी के लिए खोले जाने और निम्न जाति के लोगों को विधायिकाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिये जाने का समर्थन किया।
मद्रास के नागप्पा ने दमित जाति के लोगों हेतु सरकारी नौकरियों और विधायिकाओं में आरक्षण का दावा किया।
मध्य प्रांत के दमित जातियों के एक प्रतिनिधि श्री के जे खाण्डेलकर ने दलित जातियों के लिए विशेष अधिकारों का दावा किया।
प्रश्न 7.
संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने उस समय की राजनीतिक परिस्थिति और एक मजबूत केन्द्र सरकार की जरूरत के बीच क्या संबंध देखा?
उत्तर:

प्रारम्भ में सन्तनम जैसे सदस्यों ने केन्द्र के साथ राज्यों को भी मजबूत करने की बात कही। अनेक शक्तियाँ केन्द्र को सौंप देने से वह निरंकुश हो जायेगा और ज्यादा उत्तरदायित्व रहने के कारण वह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पायेगा।
ड्राफ्ट कमेटी के चेयरमेन डॉ. बी. आर अम्बेडकर ने कहा कि वे एक शक्तिशाली और एकीकृत केन्द्र सरकार की स्थापना करना चाहते हैं।
1946 और 1947 में देश के विभिन्न भागों में सांप्रदायिक दंगे और हिंसा के दृश्य दिखाई दे रहे थे। इससे सामाजिक तनाव बढ़ रहा था और देश अनेक टुकड़ों में विभाजित हो रहा था। इसका संदर्भ देते हुए अनेक सदस्यों ने सुझाव दिया कि केन्द्र को अधिक अधिकार देकर उसे मजबूत बनाना चाहिए जिससे वह इन दंगों का दमन कर सके और साम्प्रदायिकता समाप्त कर सके।
संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) के एक सदस्य बालकृष्ण शर्मा ने इस बात पर जोर दिया कि शक्तिशाली रहने पर ही केन्द्र सरकार सम्पूर्ण देश के हित की योजना बना पाएगी और आर्थिक संसाधनों को जुटा पाएगी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देश के विभाजन के पूर्व इस बात से सहमत थी कि प्रांतों को पर्याप्त स्वायत्तता दी जायेगी परन्तु लीग द्वारा विभाजन कराए जाने के पश्चात् कांग्रेस का विचार बदल गया क्योंकि यदि केन्द्र सरकार अधिक शक्तिशाली रहती तो लीग ऐसा नहीं कर सकती थी।
औपनिवेशिक शासन व्यवस्था समाप्त होने के तुरंत बाद नेताओं ने यह महसूस किया कि केन्द्र ही अव्यवस्था पर अंकुश लगा सकता है और देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा दे सकता है।

प्रश्न 8.
संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकाला?
उत्तर:
संविधान सभा द्वारा भाषा के विवाद को हल करने के लिए किये गए उपाय:

  1. संविधान की भाषा के मुद्दे पर कई महीनों तक बहस होती रही और कई बार तनाव भी उत्पन्न हुआ। वस्तुत: यह देश अनेक भाषाओं और संस्कृतियों का देश था ऐसे में इसे भाषा की दृष्टि से सूत्रबद्ध करने की समस्या थी।
  2. गांधी जी का मानना था कि हिंदी और उर्दू के मेल से बनी हिंदुस्तानी भारतीय जनता के एक बहुत बड़े भाग और यह विविध संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई एक साझी भाषा है। वह हिन्दुओं और मुसलमानों को, उत्तर और दक्षिण के लोगों को एकजुट कर सकती है।
  3. भाषा को लेकर भी संविधान सभा में गर्मागर्म बहस हुई। कोई स्पष्ट हल न निकलने की दशा में एक भाषा समिति बनाई गई तथा उसकी संस्तुति के अनुसार देवनागरी को राज्यभाषा का दर्जा देने की बात सभी सदस्यों ने स्वीकार की ली। राष्ट्रभाषा के रूप में उसके वर्चस्व को नकार दिया गया जबकि उत्तर भारत के लगभग सभी नेता इसको राष्ट्रभाषा को दर्जा दिलाने के लिए बहुत व्यग्र थे।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 9.
वर्तमान भारत के राजनीतिक मानचित्र पर यह दिखाइए कि प्रत्येक राज्य में कौन-कौन सी भाषाएँ बोली जाती हैं। इन राज्यों की राजभाषा को चिन्हित कीजिए। इस मानचित्र की तुलना 1950 के दशक के प्रारंभ के मानचित्र से कीजिए। दोनों मानचित्रों में आप क्या अंतर पाते हैं? क्या इन अंतरों से आपको भाषा और राज्यों के आयोजन के संबंधों के बारे में कुछ पता चलता है? वर्तमान भारतीय राज्यों में भाषाओं में परिवर्तन-1950 के पश्चात् कई राज्यों का पुनर्गठन हुआ और उनके भाषायी चरित्र में कुछ उल्लेखनीय परिवर्तन आए हैं –

अरुणाचल: अरुणाचल के कई लोगों ने गत 60 वर्षों में प्रमुख भाषाओं के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी सीखी है ।
असम में: असमी के साथ हिंदी और अंग्रेजी का प्रभाव ज्यादा बढ़ा है। अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ कम हुई हैं।
आंध्र प्रेदश में तेलुगू भाषा अधिक प्रमुख हुई है। शहरों में हिंदी और अंग्रेजी भाषा का विकास हुआ है।
उड़ीसा में उड़िया के साथ-साथ आदिवासियों की स्थानीय भाषाएँ बोली जाती हैं। हिंदी, अंग्रेजी का प्रचार-प्रसार अधिक हुआ है।
उत्तर प्रदेश में हिंदी के साथ-साथ अवधी, ब्रजभाषा, भोजपुरी, उर्दू और अंग्रेजी का प्रचार-प्रसार है।
कर्नाटक में कन्नड़ के साथ-साथ दक्षिण भारत की तमिल, तेलुगू, हिंदी और अंग्रेजी भाषा शहरी क्षेत्रों में अधिक बढ़ी है।
केरल में मलयालम के साथ-साथ उर्दू, तमिल, कन्नड़, मलयालम और कुछ शहरों में हिंदी और अंग्रेजी का प्रचार-प्रसार बढ़ा है।
गुजरात में गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है और मराठी का कम हुआ है।
गोवा में पुर्तगाली भाषा का प्रभाव कम हुआ है, हिंदी और अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है।
जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी, ढोंगरी, लद्दाखी के साथ-साथ उर्दू और अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है।
तमिलनाडु में तमिल, कन्नड़, तेलुगू के साथ हिंदी, अंग्रेजी शहरों में बढ़ी है।
त्रिपुरा में अंग्रेजी, हिंदी का प्रभाव बढ़ा है और बंगला का प्रभाव कम हुआ है।
पंजाब में पंजाबी और अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है।
पश्चिमी बंगाल में बंगला और अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है।
बिहार में हिंदी, उर्दू, संथाली और भोजपुरी का प्रभाव बढ़ा है।
मणिपुर में मणिपुरी, थाडो, कंगकुल और शहरों में अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है।
मध्य प्रदेश में हिंदी, गॉडी, भीली और शहरों में अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है।
मिजोरम में लुशाई, बंगला और अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है।
मेघालय में खासी, गारो और बंगला का प्रभाव कम हुआ है।
राजस्थान में हिंदी, भीली, उर्दू और शहरों में अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है।
सिक्किम में नेपाली, भोटिया, हिंदी और अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा है।
हरियाणा में हिंदी, उर्दू और पंजाबी का प्रभाव कम हुआ है।
हिमाचल प्रदेश में हिंदी, किन्नौरी और पंजाबी का प्रभाव कम हुआ है।
छत्तीसगढ़ में भीली, गाँडी, और शहरों में हिंदी का प्रभाव बढ़ा है।
दिल्ली में हिंदी, पंजाबी, हरियाणवी का प्रभाव बढ़ा है।
परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 10.
हाल के वर्षों के किसी एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तन को चुनिए। पता लगाइए कि यह परिवर्तन क्यों हुआ, परिवर्तन के पीछे कौन-कौन से तर्क दिए गए और परिवर्तन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या थी? अगर संभव हो, तो संविधान सभा की चर्चाओं को देखने की कोशिश कीजिए। (http:/parliamenttofindia.nic.in/is/debases/debates.htm) यह पता लगाइए कि मुद्दे पर उस वक्त कैसे चर्चा की गई। अपनी खोज पर संक्षिप्त रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरूआत

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान की तुलना संयुक्त राज्य अमेरिका अथवा फ्रांस अथवा दक्षिणी अफ्रीका के संविधान से कीजिए। ऐसा करते हुए निम्नलिखित में से किन्हीं दो विषयों पर गौर कीजिए-धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकार और केन्द्र एवं राज्यों के बीच संबंध। यह पता लगाइए कि इन संविधानों में अंतर और समानताएँ किस तरह से उनके क्षेत्रों के इतिहासों से जुड़ी हुई हैं।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

Bihar Board Class 12 History संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरूआत Additional Important Questions and Answers
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संविधान से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
संविधान उन नियमों तथा सिद्धांतों के संचित समूह या पुस्तक को कहते हैं जिनके अनुसार किसी देश का शासन चलाया जाता है। इसमें वे सर्वोच्य कानून होते हैं जिन्हें नागरिक व सरकार दोनों को मानना पड़ता है। इसी में ही सरकार की शक्तियों तथा नागरिकों के अधिकारों व कर्त्तव्यों का वर्णन होता है। किसी भी देश का शासन चलाने के लिए कुछ मौलिक कानूनों या नियमों की आवश्यकता होती है। इन मौलिक कानूनों या नियमों को देश के संविधान में लिख दिया गया है। संविधान प्रत्येक अधिकारी की शक्तियों की व्याख्या करता है। उदाहरण के लिए-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल, राज्यपाल आदि की शक्तियों का वर्णन।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान का निर्माण कब हुआ?
उत्तर:
भारत के संविधान का निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया गया। 9 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा बुलाई गई। डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा इसके अस्थायी अध्यक्ष थे। 11 दिसम्बर, 1946 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया। इस संविधान सभा के द्वारा 2 वर्ष 11 मास 18 दिन के अथक प्रयास द्वारा 26 नवम्बर, 1949 को यह संविधान संपूर्ण हुआ और ऐतिहासिक दिवस 26 जनवरी, 1950 को इसे लागू किया गया।

प्रश्न 3.
किसी देश के लिए संविधान का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
संविधान सरकार की शक्ति का स्रोत है। सरकार के विभिन्न अंगों की शक्तियाँ क्या हैं-वे क्या कर सकते हैं आदि संविधान में वर्णित है। संविधान के दो मुख्य उद्देश्य होते हैं:

सरकार के विभिन्न अंगों के आपसी संबंधों की व्याख्या करना।
सरकार और नागरिकों के सम्बन्धों का वर्णन करना। संविधान की सबसे अधिक उपयोगिता इस बात में है कि यह सरकार द्वारा सत्ता के दुरुपयोग को रोक सकता है। इस दृष्ट्रि से संविधान प्रत्येक देश का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रलेख होता है।
प्रश्न 4.
संविधान में प्रस्तावना की आवश्यकता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
संविधान में प्रस्तावना की आवश्यकता इसलिए है ताकि संविधान के लक्ष्यों, उद्देश्यों तथा सिद्धांतों का संक्षिप्त और स्पष्ट वर्णन किया जा सके। सरकार के मार्गदर्शक सिद्धांतों का वर्णन भी प्रस्तावना में ही किया जाता है। इसके अतिरिक्त संविधान का आरंभ एक प्रस्तावना से करने की एक संवैधानिक परम्परा बन गयी है। अमेरीका, स्विट्जरलैण्ड, आयरलैण्ड, जापान, जर्मनी और चीन तथा बांग्लादेश के संविधान का आरंभ प्रस्तावना से ही होता है। भारत में भी संविधान निर्माताओं ने संविधान का आरम्भ प्रस्तावना से ही किया है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्रस्तावना समूचे संविधान की विषय-वस्तु का दर्पण है।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1950 को क्यों लागू किया गया?
उत्तर:
पं. जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस के 31 दिसम्बर 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता की मांग का प्रस्ताव पारित कराया था और 26 जनवरी, 1930 का दिन सारे भारत में ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाया गया था। इसके बाद प्रति वर्ष 26 जनवरी को इसी रूप में मनाया जाने लगा। इसी पवित्र दिवस की यादगार को ताजा रखने के लिए संविधान सभा ने संविधान को 26 जनवरी, 1950 से लागू किया।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त बन्धुत्व की भावना का अर्थ बताइए।
उत्तर:
डॉ. अम्बेडकर के अनुसार बन्धुत्व का अर्थ सभी भारतीयों में भ्रातृ-भाव है। उनके शब्दों में यह एक ऐसा सिद्धांत है जो सामाजिक जीवन को एकत्व एवं सुदृढ़ता प्रदान करता है।

प्रश्न 7.
भारत के संविधान में किन विषयों में संशोधन करने के लिए साधारण प्रक्रिया अपनायी जाती है?
उत्तर:

राज्यों के नाम परिवर्तन करना।
राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करना।
राज्यों में विधान परिषद् की स्थापना या समाप्ति आदि।

प्रश्न 8.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वर्णित दो मार्गदर्शक सिद्धांतों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:

  1. सम्प्रभुता (Sovereignty):
    भारतीय संविधान में भारत की जनता को सम्प्रभु (sovereign) बताया गया है । संविधान की प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ से अभिप्राय भारत की जनता से है।
  2. समाजवाद (Socialist):
    यद्यपि समाजवादी शब्द भारत के संविधान की प्रस्तावना में 42वें संशोधन द्वारा 1976 में जोड़ा गया था परन्तु इस व्यवस्था को आरम्भ से ही अपनाया गया है।

प्रश्न 9.
भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने में भारतीय संविधान में क्या व्यवस्था है?
उत्तर:
भारतीय संविधान ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द 42 वें संशोधन द्वारा 1976 में जोड़ा गया है। राज्य का अपना कोई धर्म नहीं और न राज्य नागरिकों को कोई धर्म विभेद अपनाने की प्रेरणा देता है। वह सभी धर्मों का आदर करता है तथा नागरिकों को अपनी इच्छानुसार धर्म मानने की स्वतंत्रता है। धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मौलिक अधिकारों में से एक है।

प्रश्न 10.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना स्पष्ट रूप से किन तीन बातों पर प्रकाश डालती है?
उत्तर:

संवैधानिक शक्ति का स्रोत क्या है?
भारतीय शासन व्यवस्था कैसी है? तथा
संविधान के उद्देश्य क्या हैं?
प्रश्न 11.
राजनैतिक और आर्थिक न्याय से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  1. राजनैतिक न्याय:
    राजनैतिक न्याय का अर्थ है कि सभी व्यक्तियों को धर्म, जाति, रंग आदि भेदभाव के बिना समान राजनीतिक अधिकार (सत्ता में भागीदारी) प्राप्त हों। सभी नागरिकों को समान मौलिक अधिकार प्राप्त हों।
  2. आर्थिक न्याय:
    आर्थिक न्याय से अभिप्राय है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आजीविका कमाने के समान अवसर प्राप्त हों तथा उसके कार्य के लिए उचित वेतन प्राप्त हो।

प्रश्न 12.
प्रभुतासम्पन्न राज्य से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

प्रभुतासम्पन्न राज्य से तात्पर्य एक ऐसे राज्य से है जो सभी दृष्टियों से आजाद हो। वह राष्ट्र के हित में युद्ध कर सकता है, शांति समझौता कर सकता है और राज्य किसी बाहरी हस्तक्षेप के बिना प्रशासन तथा अर्थव्यवस्था चला सकता है।
ऐसे राज्य में जनता की प्रतिनिधि सरकार बनाते हैं और राज्य के मुखिया का निर्वाचन होता है।
प्रश्न 13.
देशी रियासतों का एकीकरण किसने किया तथा एकीकरण की प्रक्रिया कैसे हुए।
उत्तर:

  1. देशी रियासतों का एकीकरण सरदार वल्लभ भाई पटेल (लौह पुरुष) ने किया।
  2. एकीकरण की प्रक्रिया से उन्होंने छोटी रियासतों को पड़ोसी राज्यों में मिला दिया। कई अन्य छोटी रियासतों को मिलाकर उनका एक संघ बनाया। कुछ बड़ी-बड़ी रियासतों को राज्य के रूप में मान्यता दी। कुछ पिछड़े हुए तथा शासन व्यवस्था ठीक न होने वाले राज्यों को केन्द्र की देख-रेख में रखा गया।

प्रश्न 14.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में दिए गए ‘हम भारत के लोग’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
इसका अर्थ यह है कि भारत की सर्वोच्य सत्ता भारत के लोगों में केंद्रित है और भारतीय संविधान के स्त्रोत कोई और नहीं बल्कि भारत की जनता है।

प्रश्न 15.
भारतीय शासन व्यवस्था की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

प्रश्न 16.
भारत एक गणराज्य कैसे है?
उत्तर:
भारत में कार्यपालिका का अध्यक्ष राष्ट्रपति, अप्रत्यक्ष रूप से एक निर्वाचक मंडल द्वारा 5 वर्ष के लिए चुना जाता है और यह पद आनुवंशिक नहीं है। इसलिए भारत एक गणराज्य है।

प्रश्न 17.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना को ‘राजनीतिक जन्मपत्री’ किसने कहा है? क्या वे संविधान बनाने वाली समिति के सदस्य थे?
उत्तर:
के. एम. मुंशी ने प्रस्तावना को राजनीतिक जन्मपत्री कहा है। के. एम. मुंशी संविधान सभा के सदस्य थे।

प्रश्न 18.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत को क्या घोषित किया गया था?
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक प्रभुत्व सम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था।

प्रश्न 19.
क्या प्रस्तावना न्यायसंगत है?
उत्तर:
प्रस्तावना न्यायसंगत है क्योंकि –

प्रस्तावना को संविधान के भाग के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है।
प्रस्तावना में वर्णित उद्देश्यों को यदि सरकार पूरा नहीं करती तो हम इसके लिए न्यायालय में उसे चुनौती नहीं दे सकते।
प्रश्न 20.
भारत के संविधान की प्रस्तावना में दिए गए शब्द ‘प्रतिष्ठा और अवसर की समता’ का अर्थ बताइए।
उत्तर:
इससे अभिप्राय यह है कि भारतीयों को प्रत्येक स्थिति में सदैव एक समान समझा जाएगा। किसी के साथ धर्म, जन्म स्थान, छोटे या बड़े के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।

प्रश्न 21.
संविधान सभा की पहली और अंतिम बैठक कब हुई थी?
उत्तर:

संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को हुई।
इसकी अंतिम बैठक 24 जनवरी, 1950 को हुई थी।
पश्न 22.
संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष कौन थे? इस सभा में प्रारूप समिति ने अपनी संस्तुतियां कब प्रस्तुत की थी?
उत्तर:

संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ० बी० आर० अम्बेडकर थे।
इस समिति ने संविधान सभा में अपनी संस्तुतियाँ 4 नवम्बर, 1948 को प्रस्तुत की थीं।
प्रश्न 23.
राज्य के नीतिनिर्देशक तत्त्व न्याय निर्योग्य हैं। क्यों?
उत्तर:

भारत के संविधान के भाग 4 में नागरिकों के कल्याण के लिए राज्यों को कुछ निर्देश दिये गये हैं, परन्तु ये न्याय योग्य (Enforceable) नहीं हैं।
न्याय निर्योग्य से तात्पर्य यह है कि यदि सरकार इन्हें लागू नहीं करती थी, इनके विरुद्ध कोई कार्य करती है तो नागरिक उन्हें करवाने के लिए न्यायालय की शरण नहीं ले सकते हैं। राज्य के नीतिनिर्देशक तत्त्वों को लागू कराने के लिए न्यायालय सक्षम नहीं हैं।
लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संविधान सभा की क्या भूमिका थी? इस सभा के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर:
संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में हुई परंतु 11 दिसम्बर को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान का स्थायी चेयरमैन चुन लिया गया। इस संविधान सभा ने संविधान निर्माण का कार्य 2 वर्ष 11 मास 18 दिन में अर्थात् 26 नवम्बर, 1949 को पूरा किया। ऐतिहासिक महत्त्व के कारण यह संविधान 26 जनवरी, 1950 को ही लागू किया गया। संविधान सभा की महत्त्वपूर्ण भूमिका भारत के लिए एक नये संविधान को तैयार करने की थी।

प्रश्न 2.
संविधान सभा में ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ किसने प्रस्तुत किया? इसके मुख्य उपबन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उद्देश्य प्रस्ताव (Objective Resolution):
संविधान सभा के सामने 13 दिसम्बर, 1946 को पं. जवाहर लाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस उद्देश्य प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया कि “संविधान सभा भारत के लिए एक ऐसा संविधान बनाने का दृढ़ निश्चय करती है जिसमें –

(क) भारत के सभी निवासियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त हो; विचार, भाषण, अभिव्यक्ति और विश्वास की स्वतंत्रता हो; अवसर और कानून के समक्ष समानता हो और उनमें परस्पर भाईचारा हो।

(ख) अल्पसंख्यक वर्गों, अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था हो।”

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान के मौलिक ढाँचे से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
1973 में ‘केशवानन्द भारती’ नामक विवाद में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि संसद संविधान में संशोधन करके मूल अधिकारों में कमी कर सकती है परन्तु संविधान में ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती जिससे संविधान का मौलिक ढाँचा ही बदल जाए। सरकार को इससे संतोष नहीं हुआ और 1976 में 42 वां संशोधन पास करके यह व्यवस्था की गई कि संविधान संशोधनों को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। मिनर्वा मिल्स विवाद (1980) में उच्चतम न्यायालय ने इस धारा को अवैध घोषितं कर दिया। वर्तमान स्थिति यह है कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है परन्तु इसके मौलिक ढाँचे को नष्ट करने का उसे कोई अधिकार नहीं है। मुख्य न्यायाधीश श्री सीकरी ने निम्न बातों को मौलिक ढाँचे में शामिल माना था –

संविधान की सर्वोच्चता का सिद्धांत।
शासन का लोकतांत्रिक और गणतंत्रीय स्वरूप।
धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत।
कार्यपालिका, विधानमंडल और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का बंटवारा।
संविधान का संघात्मक ढाँचा।
प्रश्न 4.
संविधान को प्रस्तावना की क्या आवश्यकता है?
उत्तर:
संविधान को प्रस्तावना की आवश्यकता:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना का महत्त्व निम्न प्रकार है:

  1. इससे संविधान के दर्शन का बोध होता है। संविधान की प्रस्तावना एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रलेख है। यह संविधान के मुख्य उद्देश्यों, विचारधाराओं, लक्ष्यों तथा सरकार के उत्तरदायित्वों पर प्रकाश डालती है। इसके द्वारा यह पता लगता है कि संविधान निर्माता देश में किस प्रकार का सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक ढाँचा तैयार करना चाहते थे।
  2. प्रस्तावना का कानूनी महत्त्व भी है। डॉ. डी. डी. बसु ने लिखा है कि जहाँ संविधान का कानूनी भाग अस्पष्ट है वहाँ उसकी व्याख्या करने के लिए तथा उसे स्पष्ट करने के लिए प्रस्तावना की सहायता ली जा सकती है। प्रस्तावना संविधान के अंतर्गत स्थापित संस्थाओं व अधिकारियों के लिए मार्गदर्शन का कार्य करती है और जब भी किसी उपबन्ध के बारे में कोई मतभेद उत्पन्न होता है तो उसे हल करने में सहायता करती है।
  3. संविधान की प्रस्तावना से संवैधानिक शक्ति का बोध होता है। प्रस्तावना यह स्पष्ट करती है कि संविधान को बनाने, स्वीकार करने तथा भारत पर लागू करने वाली अंतिम सत्ता जन इच्छा या जनादेश है। भारत का प्रत्येक नागरिक प्रभुसत्ता का अभिन्न अंग है।
  4. प्रस्तावना में भारतीय शासन के ढाँचे को प्रजातांत्रिक घोषित किया गया है। प्रस्तावना अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का निर्देशन और उसके कार्यों का नियमन भी करती है।

प्रश्न 5.
राजकोषीय संघवाद क्या है? इससे केन्द्र और राज्यों में राजकोष का बंटवारा कैसे हुआ?
उत्तर:
राजकोषीय संघवाद –

  1. संविधान सभा में कुछ सदस्यों के विरोध के बावजूद अन्य सदस्यों ने केन्द्र को शक्तिशाली बनाने पर जोर दिया। राजकोष में भी केन्द्र को अधिक हिस्सा देने पर जोर दिया गया। इसी को राजकोषीय संघवाद कहा गया।
  2. कुछ करों जैसे-सीमा शुल्क और कम्पनी कर से होने वाली आय केन्द्र सरकार के पास रखी गई।
  3. कुछ अन्य मामलों जैसे-आयकर और आबकारी शुल्क से होने वाली आय राज्य और केन्द्रीय सरकारों के बीच बाँट दी गई तथा अन्य मामलों में होने वाली आय (जैसे राज्य स्तरीय) पूरी तरह राज्यों को सौंप दी गई।
  4. राज्य सरकारों को अपने स्तर पर भी कुछ अधिभार और कर वसूलने का अधिकार दिया गया। उदाहरण के लिए वे जमीन और संपत्ति कर, बिक्रीकर तथा बोतल-बंद शराब पर अलग से कर वसूल कर सकते थे।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान की विशालता के कारण बताइए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की विशालता के कारण:
भारतीय संविधान निम्नलिखित तथ्यों के कारण विशाल है:

भारत में केन्द्र और राज्यों के लिए एक संयुक्त संविधान की व्यवस्था की गई है। प्रांतों के लिए कोई पृथक् संविधान नहीं है।
संविधान के तृतीय भाग में मौलिक अधिकारों की विस्तृत व्याख्या की गई है।
संविधान के चौथे भाग में राजनीति के निर्देशक सिद्धांत शामिल किए गए हैं।
संविधान में 18वें भाग में अनुच्छेद 352 से लेकर 360 तक राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों की व्यवस्था की गई है।
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प्रश्न 7.
कौन से चार देशों के संविधान का भारतीय संविधान पर प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
संविधान निर्माताओं का लक्ष्य एक अच्छे संविधान का निर्माण करना था, इसलिए उन्होंने भारत की तथ्य और परिस्थितियों के अनुकूल विदेशी संविधानों के जो हिस्से/नियम या उपबंध दिखाई दिए, उन्हें भारत के संविधान में अन्तःस्थापित कर लिया। भारतीय संविधान पर निम्नलिखित देशों के संविधानों का प्रभाव पड़ा:

  1. ब्रिटिश संविधान:
    भारत में संसदीय शासन प्रणाली भारत की देन है। भारत के मंत्रिमंडल की शक्तियाँ व स्थिति लगभग वही है जो ब्रिटिश मंत्रिमंडल की है।
  2. अमेरिकन संविधान:
    अमेरिकन संविधान की प्रस्तावना से भारतीय संविधान की प्रस्तावना मिलती-जुलती है। भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट की शक्तियाँ, उप-राष्ट्रपति का पद इत्यादि अमेरिकन संविधान से मिलते-जुलते हैं।
  3. कनाडा का संविधान:
    कनाडा के संविधान का भी भारत के संविधान पर काफी प्रभाव पड़ा है। कनाडा के संघीय राज्य की भांति भारत को ‘राज्यों का संघ’ (Union of States) कहा गया है।
  4. जर्मन संविधान:
    नए संविधान में राष्ट्रपति को जो संकटकालीन शक्तियाँ दी गई हैं, वे जर्मनी के वाइमर संविधान से ली गई हैं।

प्रश्न 8.
भारतीय संविधान में न्यायिक पुनरावलोकन की क्या व्यवस्था थी?
उत्तर:
भारतीय संविधान में न्यायिक पुनरावलोकन या न्यायिक पुनर्निरीक्षण:
न्यायिक पुनरावलोकन या न्यायिक पुनर्निरीक्षण वह शक्ति है जिसके द्वारा विधानमंडल के कानूनों तथा कार्यपालिका के आदेशों की जांच की जा सकती है और यदि ये कानून अथवा आदेश संविधान के विरुद्ध हों तो उनको असांविधिक या अवैध घोषित किया जा सकता है। न्यायालय कानून की उन्हीं धाराओं को अवैध घोषित करते हैं, जो संविधान के विरुद्ध होती हैं न कि समस्त कानून को। भारत में सर्वोच्च न्यायालय को न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति प्राप्त है। 1967 में सर्वोच्च न्यायालय ने गोलकनाथ बनाम भारत सरकार के मुकद्म में यह निर्णय दिया कि संसद को मौलिक अधिकारों में परिवर्तन करने का अधिकार नहीं है।

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प्रश्न 9.
राज्य सूची के बारे में आप क्या जानते हैं? संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राज्य सूची में 66 विषय दिए गए हैं। भारतीय संविधान में केन्द्र और राज्यों में शक्तियों का विभाजन किया गया है। राज्य सूची के विषयों पर साधारण स्थिति में राज्य को कानून बनाने का अधिकार है। इस सूची में सार्वजनिक स्वास्थ्य, पुलिस, न्याय, प्रशासन, जेल, सफाई, स्थानीय शासन, मादक पेय, सार्वजनिक निर्माण कार्य, गैस व गैस निर्माण, आयकर, मनोरंजन कर, विलासिता की वस्तुओं पर कर, विज्ञापन पर कर, व्यापार एवं वाणिज्य तथा कृषि एवं बिक्री कर आदि सम्मिलित हैं।

सामान्यतः उन सभी विषयों को राज्य सूची में रखा गया है जिनका सम्बन्ध जन-कल्याण से है, परन्तु 42 वें संशोधन के बाद राज्य सूची के विषयों की संख्या घटकर 62 रह गई है क्योंकि शिक्षा, जंगली जानवर (वन्य जीव), पक्षियों की रक्षा और नाप तौल समवर्ती सूची में रख दिए गए हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची पर संसद कानून बना सकती है। ये विशेष परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं –

देश में संकटकाल की घोषणा होने पर।
किसी राज्य में संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न होने पर।
राज्य सभा द्वारा इस आशय का प्रस्ताव पारित किए जाने पर।
दो या दो से अधिक राज्यों के विध निमंडल की इच्छा पर।
प्रश्न 10.
भारतीय संविधान की किन्हीं चार विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

भारत का संविधान लिखित तथा विस्तृत है। इसमें 395 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियाँ हैं और उन्हें 24 भागों में बांटा गया है।
भारत का संविधान सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना करता है। भारत पूर्ण रूप से आन्तरिक तथा बाहरी मामलों में प्रभुसत्ता सम्पन्न है । इसका उद्देश्य समाजवादी समाज की स्थापना करना है।
भारत का संविधान अनेक स्रोतों से तैयार किया गया संविधान है।
भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है।
भारत का संविधान लचीला और कठोर है।
प्रश्न 11.
केन्द्रीय संघवाद से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भारतीय संघवाद को केन्द्रीय संघवाद भी कहा जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि भारत में संघात्मक शासन होते हुए भी केन्द्र सर्वाधिक शक्तिशाली है। वे बातें जिनके कारण केन्द्र अधिक शक्तिशाली बन गया है, निम्नलिखित हैं –

केन्द्रीय सरकार की शक्तियाँ बहुत व्यापक हैं। उदाहरणार्थ-केन्द्र सूची में 97 विषय रखे गए हैं।
संसद किसी नए राज्य का निर्माण या उसके आकार को घटा या बढ़ा सकती है।
राज्यों के अपने संविधान नहीं हैं।
संविधान दोहरी नागरिकता के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता है।
भारत में एकीकृत न्यायपालिका है।
अखिल भारतीय सेवाओं तथा राज्यपालों पर केन्द्र का नियंत्रण है।
आर्थिक दृष्टि से राज्य सरकारें केन्द्र पर निर्भर हैं।
आपातकाल की घोषणा हो जाने पर केन्द्रीय सरकार का स्वरूप एकात्मक हो जाता है।
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प्रश्न 12.
भारत में संघात्मक व्यवस्था के साथ-साथ शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना क्यों की गई है?
उत्तर:
भारतीय संविधान में जहाँ एक ओर संघात्मक शासन की स्थापना की गई है वहीं दूसरी ओर केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  1. विदेशी आक्रमण का मुकाबला करने के लिए (Toresist the foreighattacks):
    हमारे संविधान निर्माताओं ने देश के इतिहास से पाठ सीखा कि जब भी केन्द्र निढाल हुआ तब-तब विदेशी आक्रमण हुए । इसलिए उन्होंने शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना का निर्णय लिया ।
  2. राष्ट्रीय एकता की स्थापना के लिए (For establishment of National Integ rity):
    भारत शताब्दियों तक छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त रहा परन्तु ब्रिटिश शासन काल में यहाँ एकता का प्रादुर्भाव हुआ। संविधान निर्माता उस राष्ट्रीय एकता को बनाए रखना चाहते थे अतः उन्होंने शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना की।
  3. भारतीय रियासतों की समस्या (The problem of Indian States):
    1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो यहाँ 500 से अधिक देशी रियासतें थीं। इन रियासतों को भारतीय संघ में विलय करने के लिए भी केन्द्र को शक्तिशाली बनाना अनिवार्य था।
  4. देश की विभिन्न समस्याओं का सामना (To face the multipleproblems):
    देश के सामने कई समस्याएँ और चुनौतियाँ खड़ी थीं। साम्प्रदायिक दंगे, कश्मीर की समस्या, विस्थापितों की पुनर्स्थापना, देश की बाह्य आक्रमणों से रक्षा आदि समस्याओं का मुकाबला करने
    के लिए शक्तिशाली केन्द्र बनाना अनिवार्य था।
  5. आर्थिक उन्नति के लिए (For economic progress):
    भारत जब 1947 में स्वतंत्र हुआ तो भारत की आर्थिक व्यवस्था बहुत खराब थी। देश के लोगों का जीवन स्तर ऊँचा उठाने के लिए आर्थिक योजनाओं का आरम्भ करना आवश्यकं था। इस कार्य को अच्छी प्रकार संपन्न करने के लिए भी एक शक्तिशाली केन्द्र स्थापित करने की आवश्यकता थी।

प्रश्न 13.
समवर्ती सूची किसे कहते हैं? टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान में संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है। एक सूची संघ सूची है जिस पर केन्द्र द्वारा कानून बनाये जाते हैं। दूसरी सूची राज्य सूची है। इसमें दिए गए विषयों पर साधारण परिस्थितियों में राज्य सरकारें नियम बनाती हैं। कुछ विषय ऐसे भी होते हैं जिन पर केन्द्र तथा राज्य दोनों मिलकर कानून बना सकते हैं परन्तु टकराव की स्थिति में केन्द्र द्वारा बनाया गया कानून ही प्रभावी रहता है। इस तीसरी सूची को ही समवर्ती सूची (Concurrent list) कहा जाता है। इस सूची में 47 विषय हैं। इसमें विवाह, तलाक, दण्ड विधि, दीवानी कानून, न्याय, समाचार पत्र, पुस्तकें तथा छापाखाने, आर्थिक-सामाजिक योजना, कारखने इत्यादि आते हैं।

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प्रश्न 14.
ऑपरेशन विजय क्या है? इसका महत्त्व बताइए।
उत्तर:
ऑपरेशन विजय एवं इसका महत्त्व:

भारतीयों के अनुनय-विनय का तिरस्कार करते हुए गोवा में पुर्तगालियों ने राष्ट्रवादियों पर हमले करने शुरू कर दिये और गोवा छोड़ने से इन्कार कर दिया। फलस्वरूप भारत ने गोवा की आजादी के लिए ऑपरेशन विजय (Operation Vijay) नामक सैनिक कार्यवाही की।
ऑपरेशन विजय नामक कार्यवाही 17-18 दिसम्बर, 1961 को शुरू की गई। इस कार्यवाही के कमाण्डर जरनल जे० एन० चौधरी थे। 19 दिसम्बर, 1961 को ‘ऑपरेशन विजय’ नामक कार्यवाही पूरी सफलता के साथ समाप्त हो गयी।
यह कार्यवाही भारतीय स्वतंत्रता को पूर्ण करने वाली कार्यवाही थी।
गोवा, दमन, दीव, हवेली आदि में भारत का तिरंगा फहराया गया। गोवा की स्वतंत्रता से भारतीयों के स्वाभिमान में वृद्धि हुई।
गोवा भारत का अंग बन गया। भारत में विदेशियों की अनधिकृत उपस्थिति और वर्चस्व समाप्त हो गया।
प्रश्न 15.
भारतीय संविधान में ‘आपातकालीन प्रावधान’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान के भाग 18 के अनुसार देश में आंतरिक या बाहरी संकट उत्पन्न हो जाने पर आपातकाल घोषित किए जाने की व्यवस्था है। आपातकाल घोषित करने का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया है। जिन तीन प्रावधानों के अनुसार भारत को आपातकाल की घोषणा की जा सकती है ये निम्नलिखित हैं:

  1. युद्ध, विदेशी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह की स्थिति या इनकी आशंका की अवस्था में उत्पन्न हुआ संकट (अनुच्छेद 352):
    यदि राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि देश में गंभीर संकट विद्यमान है अर्थात् युद्ध या बाहरी आक्रमण या आंतरिक अशांति के कारण भारत या भारत के किसी भाग की सुरक्षा खतरे में पड़ने वाली है तो वह इस आपातकाल की घोषणा कर सकता है। इसके परिणामस्वरूप शासन की सारी शक्तियाँ केन्द्र के हाथों में आ जाती हैं।
  2. किसी राज्य में संवैधानिक शासन की विफलता की अवस्था में उत्पन्न हुआ संकट (अनुच्छेद 356):
    इस अनुच्छेद के अनुसार यदि किसी राज्य में शासन, संविधान के अनुसार न चल रहा हो तो राष्ट्रपति उस राज्य में आपातकाल की घोषणा कर सकता है और वहाँ का शासन अपने हाथों में ले सकता है। राष्ट्रपति शासन लागू होने के दौरान उस राज्य के लिए कानून निर्माण का कार्य संसद द्वारा ही किया जाता है।
  3. वित्तीय संकट (अनुच्छेद 360):
    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 में कहा गया है कि यदि राष्ट्रपति को विश्वास हो जाए कि देश की आर्थिक स्थिरता संकट में पड़ गई है तो वह सम्पूर्ण सत्ता अपने हाथ में ले सकता है।

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प्रश्न 16.
भारतीय समाज द्वारा समाजवाद के आदर्श को प्राप्त करने के मुख्य उपाय बताइए।
उत्तर:

सभी सामाजिक भेदभाव और असमानताएं दूर करनी होंगी। कानून की दृष्टि में कोई भी ऊँचा नीचा, धनी गरीब अथवा छूत-अछूत नहीं होना चाहिए।
ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि का समान बँटवारा होना चाहिए। बेगार का उन्मूलन कर देना चाहिए।
सभी नागरिकों को जाति, धर्म, वर्ण तथा क्षेत्रवाद के बिना मतदान करने तथा चुने जाने के अधिकार देने चाहिए।
महाजनों, पूँजीपतियों को समाज के कमजोर वर्गों का शोषण करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और मजदूरों को कारखानों तथा अन्य संस्थानों के प्रबंध में भागीदार बनाया जाना चाहिए।
प्रश्न 17.
भारतीय संविधान के निर्माताओं को किन समस्याओं का सामना करना पड़ा? अथवा, भारतीय संविधान के निर्माताओं के कार्य किस प्रकार के थे? विवेचन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान के निर्मताओं की समस्यायें:

भारतीय संविधान निर्माताओं के सामने अनेक समस्यायें थीं। उनका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य देश की अखण्डता को बनाए रखना था क्योंकि पाकिस्तान से खतरा था।
दूसरी विकट समस्या देशी रियासतों की थी। उन्हें यह अधिकार दिया गया था कि वे किसी भी देश में शामिल हो सकते हैं।
इसके अतिरिक्त जनजातियों की भी समस्या थी। इसके क्षेत्रों को भारत में पूर्णतया शामिल करना था।
संविधान निर्माताओं के समक्ष नए संविधान के माध्यम से स्वतंत्र भारत का निर्माण करने और गरीबों की आर्थिक स्थिति को सुधारने की चुनौती खड़ी थी।
भारत की स्थिति सुदृढ़ करना और विश्व में अपने सम्मान को बढ़ाना भी संविधान निर्माताओं का विचारणीय मुद्दा था।
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प्रश्न 18.
ब्रिटिश काल में भारत में संवैधानिक सुधारों की क्या सीमायें थीं?
उत्तर:
ब्रिटिश काल में संवैधानिक सुधारों की सीमायें –

ब्रिटिश भारत में संवैधानिक सुधार प्रतिनिध्यात्मक सरकार के लिए बढ़ती मांग के उत्तर में दिए गए थे।
ब्रिटिश भारत के विभिन्न कानूनों (1909, 1919 और 1935) को पारित करने की प्रक्रिया में भारतीयों की कोई प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी। इन्हें औपनिवेशिक सरकार ने ही लागू किया था।
प्रांतीय निकायों का चुनाव करने वाले निर्वाचक मंडल का विस्तार अवश्य हो रहा था परन्तु भारतीयों को कम प्रतिनिधित्व दिया गया।
1935 में भी यह मताधिकार वयस्क जनसंख्या के 10-15% भाग तक ही सीमित था। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था लागू नहीं हुई थी।
1935 के कानून के अंतर्गत निर्वाचित विधायिकाएँ ब्रिटिश शासन के ढांचे में ही काम कर रही थीं। वे अंग्रेजों द्वारा नियुक्त गवर्नर के प्रति उत्तरदायी थीं।
प्रश्न 19.
संविधान सभा का निर्माण कैसे हुआ? क्या यह एक दल का ही समूह था?
उत्तर:
संविधान सभा का गठन –

संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव 1946 के प्रांतीय चुनावों के आधार पर किया गया था। संविधान सभा में ब्रिटिश प्रांतों से भेजे गये सदस्यों के अतिरिक्त रियासतों के प्रतिनिधि भी शामिल थे।
संविधान सभा में पूरे देश के उच्च नेता शामिल थे। पं० जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि कांग्रेस के नेता थे।
अन्य दलों के सदस्यों में डॉ. भीमराव अंबेडकर, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा फ्रेंक एंथनी प्रमुख थे।
श्रीमती सरोजिनी नायडू तथा विजय लक्षमी पंडित इसकी महिला सदस्या थीं।
इस प्रकार संविधान सभा पूरे देश का प्रतिनिधित्व करती थी। मुस्लिम लीग द्वारा इसकी आरंभिक बैठकों का वहिष्कार किया गया। इसलिए संविधान सभा एक ही दल का समूह बनकर रह गई। सभा के 82% सदस्य कांग्रेस के थे।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान एक संविधान सभा द्वारा निर्मित हुआ। इस सभा के प्रधान भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे। संविधान सभा ने इसका प्रारूप बनाने के लिए 7 सदस्यों की एक प्रारूप समिति बनाई। इस समिति के अध्यक्ष डॉ० भीमराव अम्बेडकर थे। यह संविधान 9 दिसम्बर, 1946 से 26 नवम्बर, 1949 तक बन कर तैयार हुआ। इस प्रकार संविधान को पूर्णत: तैयार करने में 2 वर्ष 11 मास 18 दिन लगे। यह संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। इस संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. लिखित एवं विशालतम संविधान (Written and Lengthiest Constituion):
    भारत का संविधान विश्व के अधिकतर संविधानों की तरह एक लिखित संविधान है। यह संसार भर में सबसे विशाल संविधान है। 26 जनवरी, 1950 को भारत में लागू किया गया, संविधान 22 भागों में विभाजित था। इसमें 395 अनुच्छेद और 19 अनुसूचियाँ थीं। आजकल 12 अनुसूचियाँ हैं। संविधान निर्माताओं ने विश्व के विभिन्न संविधानों का अध्ययन करके इसमें अच्छी-अच्छी बातों को प्रविष्ट किया। संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकार और कर्त्तव्य, नीतिनिर्देशक तत्त्व तथा केन्द्र व राज्यों की व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के संगठन तथा कार्यों का भी विस्तृत वर्णन किया गया है।
  2. सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना (Creation of a Sovereign, Socialist, Secular, Democratic Republic): भारतीय संविधान ने भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया है। इसका अर्थ है कि भारत पूर्ण रूप से स्वतंत्र तथा सर्वोच्च सत्ताधारी है और किसी अन्य सत्ता के अधीन नहीं है। भारत का लक्ष्य समाजवादी समाज की स्थापना करना है और भारत धर्म-निरपेक्ष राज्य है। यहाँ पर लोकतंत्रीय गणराज्य की स्थापना की गई है क्योंकि राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक-मंडल द्वारा 5 वर्ष की अवधि के लिए होता है।
  3. जनता का अपना संविधान (People’s own Constitution):
    भारत के संविधान की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह जनता का अपना संविधान है और इसे जनता ने स्वयं अपनी इच्छा से अपने ऊपर लागू किया है। हमारे संविधान में आयरलैण्ड के संविधान की तरह ऐसा कोई अनुच्छेद नहीं है जिससे यह स्पष्ट होता हो कि भारतीय संविधान को जनता ने स्वयं बनाया है तथापि इस बात की पुष्टि संविधान की प्रस्तावना कराती है: “हम भारत के लोग, भारत में एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य स्थापित करते हैं। अपनी इस संविधान सभा में 26 नवम्बर, 1949 को इस संविधान को अंगीकार हैं।”
  4. अनेक स्त्रोतों से तैयार किया हुआ अद्वितीय संविधान (A Unique Constitution Derived from many Sources):
    हमारे संविधान में अन्य देशों के संविधानों के अच्छे सिद्धांतों तथा गुणों को सम्मिलित किया गया है। हमारे संविधान निर्माताओं का उद्देश्य एक अच्छा संविधान बनाना था, इसलिए उनको जिस देश के संविधान में कोई अच्छी बात दिखाई दी, उसको उन्होंने सविधान में शामिल कर लिया। संसदीय शासन प्रणाली को इंग्लैण्ड के संविधान से लिया गया है। संघीय प्रणाली अमेरिका तथा राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत हमने आयरलैण्ड के संविधान से लिए हैं। इस प्रकार भारत का संविधान अनेक संविधानों के गुणों का सार है।
  5. संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution):
    भारतीय संविधान की एक अन्य विशेषता यह है कि यह देश का सर्वोच्च कानून है। कोई कानून या आदेश इसके विरुद्ध जारी नहीं किया जा सकता है। सरकार के सभी अंगों को संविधान के अनुसार कार्य करना पड़ता है। यदि संसद कोई ऐसा कानून पास करती है जो संविधान के विरुद्ध हो या राष्ट्रपति ऐसा आदेश जारी करता है जो संविधान के साथ मेल नहीं खाता तो न्यायपालिका ऐसे कानून और आदेश को अवैध घोषित कर सकती है।
  6. धर्म-निरपेक्ष राज्य (Secular State):
    भारत के संविधान के अनुसार भारत एक धर्म-निरपेक्ष गणराज्य है। 42 वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में धर्म-निरपेक्ष शब्द जोड़ा गया है। धर्म-निरपेक्ष राज्य का अर्थ है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं। नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है और वे अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को अपना सकते हैं, इच्छानुसार अपने इष्ट देव की पूजा कर सकते हैं तथा अपने धर्म का प्रचार कर सकते हैं। अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने के बारे में है।
  7. लचीला तथा कठोर संविधान (Flexible and Rigid Constitution):
    भारत का संविधान लचीला भी है और कठोर भी। यह न तो इंग्लैण्ड के संविधान की भांति अत्यंत लचीला है और न ही अमेरिका के संविधान की भांति कठोर है। संविधान की कुछ बातें तो ऐसी हैं जिनमें संशोधन करना बड़ा सरल है और संसद साधारण बहुमत से उसे बदल सकती है। संविधान के तका कुछ अनुच्छेदों में संशोधन करना बड़ा कठिन है। मि. व्हीयर (Wheare) ने ठीक ही कहा है कि, “भारतीय संविधान के निर्माताओं ने कठोर तथा लचीले संविधान के मध्य का मार्ग अपनाया है।”
  8. संघात्मक-संविधान परंतु एकात्मक प्रणाली की ओर झुकाव (Federal Consti tution with a Unitary Bias):
    यद्यपि हमारे संविधान के किसी अनुच्छेद में ‘संघ’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है फिर भी भारतीय संविधान संघात्मक सरकार की स्थापना करता है। संविधान की धारा 1 में कहा गया है, “भारत राज्यों का एक संघ है” (India is a Union of States) इस समय भारत में 28 राज्य और 7 संघीय क्षेत्र हैं जिसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली भी शामिल है। भारत के संविधान में संघात्मक सरकार की सभी विशेषताएँ पाई जाती हैं, परन्तु इसके बावजूद हमारे संविधान का झुकाव एकात्मक स्वरूप की ओर है। प्रायः ऐसा कहा जाता है कि “भारतीय संविधान आकार में संघात्मक परन्तु भावना में एकात्मक है।”
  9. संसदीय सरकार (Parlimamentary Form of Government):
    भारतीय संविधान ने भारत में संसदीय शासन प्रणाली की व्यवस्था की। राष्ट्रपति राज्य का अध्यक्ष है परन्तु उसकी शक्तियाँ नाम-मात्र की हैं- वास्तविक नहीं। अनुच्छेद 74 के अनुसार, उसके परामर्श तथा सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद् की व्यवस्था की गई है और वास्तव में वही कार्यपालिका है। राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद् की सलाह से ही करता है और इसका संसद के साथ घनिष्ठ संबंध है। अधिकतर मंत्री संसद सदस्यों में से ही लिए जाते हैं और वे अपने कार्यों के लिए संसद के निम्न सदन लोकसभा के प्रति उत्तरदायी हैं। लोकसभा अविश्वास का प्रस्ताव पास करके मंत्रिपरिषद् को जब चाहे अपदस्थ कर सकती है, अर्थात् मंत्रिमंडल लोकसभा के प्रासाद-पर्यन्त ही अपने पद पर रह सकता है।
  10. द्वि-सदनीय विधानमंडल (Bicameral Legislature):
    हमारे संविधान की एक अन्य विशेषता यह है कि इसके द्वारा केन्द्र में द्वि-सदनीय विधानमंडल की स्थापना की गई है। संसद के निम्न सदन को लोकसभा (Lok Sabha) तथा उच्चसदन को राज्यसभा (Rajya Sabha) कहा जाता है। लोकसभा की शक्तियाँ और अधिकार राज्यसभा की शक्तियों और अधिकारों से अधिक हैं।
  11. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights):
    भारतीय संविधान की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि संविधान के तीसरे भाग में अनुच्छेद 14 से 32 तक भारतीयों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। ये अधिकार केवल नागरिकों को ही प्राप्त नहीं हैं बल्कि इनमें कई ऐसे अधिकार भी हैं जो राज्य में रहने वाले सभी व्यक्तियों को प्राप्त हैं। 44 वें संशोधन से पूर्व संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों को सात श्रेणियों में बांटा जाता था परन्तु 44 वें संशोधन के अंतर्गत सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों के अध्याय से निकालकर कानूनी अधिकार बनाने की व्यवस्था की गई है। अत: 44वें संशोधन के बाद 6 मौलिक अधिकार रह गए हैं जो कि इस प्रकार हैं –

समानता का अधिकार
स्वतंत्रता का अधिकार
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
सांस्कृतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार
शोषण के विरुद्ध अधिकार
संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
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प्रश्न 2.
भारत में केन्द्र और राज्यों के मध्य विधायी सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
केन्द्र और राज्यों के मध्य व्यवस्थापिका या विधायी सम्बन्धों का तात्पर्य ऐसे सम्बधों से है जो कानून बनाने की शक्ति से सम्बन्धित हैं। भारतीय संविधान में केन्द्र तथा राज्यों में व्यवस्थापिका की शक्तियों का बंटवारा विषयों की तीन सूचियाँ बनाकर किया गया है। ये सूचियाँ हैं:

संघ सूची
राज्य सूची और
समवर्ती सूची। केन्द्र व राज्य की कानून बनाने की शक्ति का विस्तृत वर्णन नीचे दिया गया है।

  1. संघ सूची (Union List):
    संघ सूची में राष्ट्रीय महत्त्व के 97 विषयों का उल्लेख किया गया है। इन विषयों का सम्बन्ध सम्पूर्ण राष्ट्र से है। इनमें प्रमुख विषय है: देश की सुरक्षा, विदेशी सम्बन्ध, युद्ध, सन्धि, रेल, वायुयान, समुद्री जहाज, डाकघर, टेलीफोन, प्रसारण, विदेशी व्यापार, नोट व मुद्रा, रिजर्व बैंक, जनगणना और आयकर इत्यादि। संघ सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद को ही प्राप्त है। राज्यों के विधानमंडल संघ सूची पर किसी भी अवस्था में कानून बनाने का अधिकार नहीं रखते।
  2. राज्य सूची (State List):
    राज्य सूची में ऐसे 66 विषय रखे गये हैं जो स्थानीय महत्त्व के हैं। उदाहरणार्थ-कानून व व्यवस्था, पुलिस, जेल, न्याय, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, स्थानीय स्वशासन, कृषि, सिंचाई, राजस्व और औद्योगिक विकास इत्यादि। इन 66 विषयों पर सामान्य अवस्था में राज्यों के विधानमंडलों को ही कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन विशेष अवस्था या संकटकाल में इनमें से किसी विषय को या सभी विषयों को केन्द्र सरकार को दिया जा सकता है।
  3. समवर्ती सूची (Concurrent List):
    समवर्ती सूची में 47 विषय हैं। ये स्थानीय महत्त्व के विषय हैं, परंतु यदि इन विषयों पर कानून बनाए जाएं तो एकात्मकता की भावना बढ़ेगी और देश का कल्याण होगा। इसी कारण इस सूची पर केन्द्र सरकार व राज्य सरकार दोनों को ही कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। इस सूची के विषय हैं-दण्ड प्रक्रिया, मजदूर हित, कारखाने, नजरबन्दी, विवाह विच्छेद, आर्थिक योजना, सामाजिक योजना, मूल्य नियंत्रण, बिजली, समाचार पत्र, छापेखाने इत्यादि। इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार संघ व राज्य सरकार को प्राप्त है किन्तु इस सूची के किसी भी विषय पर यदि टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो केन्द्र द्वारा बनाया गया कानून ही प्रभावी रहता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान कब अस्तित्व में आया?
(अ) 26 जनवरी, 1930
(ब) 15 अगस्त, 1942
(स) 15 अगस्त, 1947
(द) 26 जनवरी, 1950
उत्तर:
(स) 15 अगस्त, 1947

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन-सा संविधान सभा से संबंधित नहीं है?
(अ) 11 सत्र
(ब) 365 दिन
(स) समितियाँ
(द) उपसमितियाँ
उत्तर:
(ब) 365 दिन

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में किसने भारतीय संविधान के विषय में अपने विचार व्यक्त नहीं किए थे।
(अ) गणेश उत्सव समिति
(स) निम्न जातियों के समूह
(ब) ऑल इंडिया वर्णाश्रम स्वराज्य संघ
(द) विजयनगरम् के जिला शिक्षा संघ
उत्तर:
(अ) गणेश उत्सव समिति

प्रश्न 4.
संविधान सभा का अध्यक्ष कौन था?
(अ) जवाहरलाल नेहरू
(ब) वल्लभ भाई पटेल
(स) राजेन्द्र प्रसाद
(द) बी. आर. अम्बेडकर
उत्तर:
(स) राजेन्द्र प्रसाद

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से केन्द्रीय विधि मंत्री कौन था?
(अ) बी. आर. अम्बेडकर
(ब) के. एम. मुंशी
(स) कृष्णास्वामी अय्यर,
(द) बी. एन. राव
उत्तर:
(अ) बी. आर. अम्बेडकर

प्रश्न 6.
उद्देश्य प्रस्ताव कब पेश किया गया?
(अ) 9 दिसम्बर, 1946
(ब) 13 दिसम्बर, 1946
(स) 16 मई, 1946
(द) 26 जून, 1946
उत्तर:
(ब) 13 दिसम्बर, 1946

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से अंतरिम सरकार का सदस्य कौन नहीं था?
(अ) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
(ब) जवाहरलाल नेहरू
(स) अर्जुन सिंह
(द) सरदार पटेल
उत्तर:
(स) अर्जुन सिंह

प्रश्न 8.
हिन्दू धर्म में सुधार के प्रयास किसने किये?
(अ) राजा राममोहन राय
(ब) विवेकानन्द
(स) मायावती
(द) मुलायम सिंह
उत्तर:
(ब) विवेकानन्द

प्रश्न 9.
अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचिका बनाने का तर्क किसने दिया?
(अ) बी. पोकर बहादुर
(ब) जवाहरलाल नेहरू
(स) महात्मा गांधी
(द) सरदार पटेल
उत्तर:
(अ) बी. पोकर बहादुर

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प्रश्न 10.
संविधान सभा में आदिवासियों के कल्याण के लिए किसने आवाज उठाई?
(अ) पोकर बहादुर
(ब) जयपाल सिंह
(स) जवाहरलाल नेहरू
(द) बी. आर. अम्बेडकर
उत्तर:
(ब) जयपाल सिंह

प्रश्न 11.
केन्द्र सरकार कौन से अनुच्छेद के अधीन राज्य के अधिकार अपने हाथ में ले लेती है?
(अ) अनुच्छेद 351
(ब) अनुच्छेद 352
(स) अनुच्छेद 353
(द) अनुच्छेद 356
उत्तर:
(स) अनुच्छेद 353

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प्रश्न 12.
संविधान सभा में हिंदी का समर्थन किसने किया?
(अ) महात्मा गांधी
(ब) आर. वी. धुलेकर
(स) जी. दुर्गाबाई
(द) शंकरराव देव
उत्तर:
(ब) आर. वी. धुलेकर

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