BSES 11 BIO CH 15

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

Bihar Board Class 11 Biology पादप वृद्धि एवं परिवर्धन Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वृद्धि, विभेदन, परिवर्धन, निर्विभेदन, पुनर्विभेदन, सीमित वृद्धि मेरिस्टेम तथा वृद्धि दर की परिभाषा दें।
उत्तर:
वृद्धि (Growth):
वृद्धि समस्त उपापचयी प्रक्रियाओं (उपचय तथा अपचय) का अन्तिम परिणाम है। इसमें पौधे के आकार एवं आयतन में परिवर्तनीय या चिरस्थायी वर्धन होता है। इसके साथ प्रायः शुष्क भार एवं जीवद्रव्य की मात्रा में भी वर्धन होता है।

विभेदन (Differentiation):
तने या जड़ के शीर्ष पर स्थित अग्रस्थ विभज्योतक (apical meristem) या एधा (cambium) कोशिका से बनने वाले कोशिकाएँ विभिन्न कार्यों के लिए रूपान्तरित या विशिष्टीकृत हो जाती है। इस क्रिया को विभेदन (differentiation) कहते हैं।

परिवर्धन (Development):
बीज के अंकुरण से लेकर मृत्यु तक होने वाले समस्त परिवर्धन जिसके फलस्वरूप पौधे के जटिल शरीर का गठन होता है, जिससे जड़, तना, पत्तियाँ, फूल और फल बनते हैं, परिवर्धन के अन्तर्गत आते हैं। इन क्रियाओं को दो प्रमुख समूह में बाँट लेते हैं –
(क) वृद्धि तथा
(ख) विभेदन

निर्विभेदन : (Dedifferentiation):
जीवित विभेदित स्थायी कोशिकाएँ जिनमें कोशिका विभाजन की क्षमता नहीं होती, उनमें से कुछ कोशिकाओं में पुन: विभाजन की क्षमता स्थापित हो जाती है। इस प्रक्रिया को निर्विभेदन (dedifferentiation) कहते हैं; जैसे-कॉर्क एधा, अन्तरापूलीय एधा।

पुनर्विभेदन (Redifferentiation):
निर्विभेदित कोशिकाओं या ऊतकों से बनी कोशिकाएँ अपनी विभाजन क्षमता पुन: खो देती है और विशिष्ट कार्य करने के लिए रूपान्तरित हो जाती है। इस प्रक्रिया को पुनर्विभेदन (redifferentiation) कहते है।

सीमित वृद्धि (Determinate Growth):
यह पौधों में वृद्धि का खुला स्वरूप होता है। यह पौधे के विभिन्न भागों में पाई जाती है। इसमें विभज्योतक से उत्पन्न कोशिकाएँ पादप शरीर का गठन करती हैं, उसे सीमित वृद्धि कहते हैं।

मेरिस्टेम (Meristem):
जड़ तथा तने के शीर्ष पर स्थित कोशिकाओं का वह समूह जिनमें कोशिका विभाजन की क्षमता होती है, मेरिस्टेम (meristem) कहलाता है। इससे स्थायी ऊतक तथा अन्तर्विष्ट एवं पार्श्व मेरिस्टेम (intercalary & lateral meristem) का निर्माण होता है।

वृद्धि दर (Growth Rate):
समय की प्रति इकाई के दौखन बढ़ी हुई वृद्धि को वृद्धि दर (growth rate) कहते हैं। वृद्धि दर को गणितीय ढंग से (mathematically) व्यक्त किया जा सकता है। एक जीव या उसके अंग विभिन्न तरीकों से कोशिकाओं का निर्माण कर सकते हैं।

प्रश्न 2.
पुष्पित पौधों के जीवन में किसी एक प्राचालिक (parameter) से वृद्धि को वर्णित नहीं किया जा सकता है, क्यों?
उत्तर:
वृद्धि के प्राचालिक (Parameter of Growth):
वृद्धि सभी जीवधारियों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। पौधों में वृद्धि कोशिका विभाजन, कोशिका विवर्धन या दीर्धीकरण तथा कोशिका विभेदन के फलस्वरूप होती है।

पौधे के मेरिस्टेम कोशिकाओं (meristematic cells) में कोशा विभाजन की क्षमता पाई जाती है। सामान्तया कोशिका विभाजन जड़ तथा तने के शीर्ष (apex) पर होता है। इसके फलस्वरूप जड़ तथा तने की लम्बाई में वृद्धि होती है। एधा (cambium) तथा कॉर्क एधा (cork cambium) के कारण तने और जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है।

इसे द्वितीयक वृद्धि (Secondary growth) कहते हैं। कोशिकीय स्तर पर वृद्धि मुख्यतः जीवद्रव्य मात्रा में वर्धन का परिणाम है। जीवद्रव्य की बढ़ोत्तरी या वर्धन का मापन कठिन है। वृद्धि पर मापन के कुछ मापदण्ड हैं – ताजे भार में वृद्धि, शुष्क भार में वृद्धि, लम्बाई, क्षेत्रफल, आयतन तथा कोशिका संख्या में वृद्धि आदि

मक्का की जड़ का अग्रस्थ मेरिस्टेम प्रति घण्टे लगभग 17,500 कोशिकाओं का निर्माण करता है। तरबूज की कोशिका के आकार में लगभग 3,50,000 गुना वृद्धि हो सकती है। पराग नलिका की लम्बाई में वृद्धि होने से यह वर्तिकाग्र, वर्तिका से होती हुई अण्डाशय में स्थित बीजाण्ड में प्रवेश करती है।

प्रश्न 3.
संक्षिप्त वर्णित करें –
(अ) अंकगणितीय वृद्धि
(ब) ज्यामितीय वृद्धि
(स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र
(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर।
उत्तर:
(अ) अंकगणितीय वृद्धि (Arithmetic Growth):
समसूत्री विभाजन के पश्चात् बनने वाली दो संतति कोशिकाओं में से एक कोशिका निरन्तर विभाजित होती रहती है और दूसरी कोशिका विभेदित एवं परिपक्व होती रहती है।

अंकगणितीय वृद्धि को हम निश्चित दर पर वृद्धि करती जड़ में देख सकते हैं। यह एक सरलतम अभिव्यक्ति होती है। चित्र में वृद्धि (लम्बाई) समय के विरुद्ध आलेखित की गई है। इसके फलस्वरूप रेखीय वक्र (linear curve) प्राप्त होता है। इस वृद्धि को हम गणितीय रूप से व्यक्त कर सकते हैं –

चित्र – नियत रेखीय वृद्धि (लम्बाई) और समय के विरुद्ध आलेख।
L1 = L0 + rt
(L1 = समय ‘t’ पर लम्बाई,
L0 = समय ‘O’ पर लम्बाई
r = वृद्धि दर। दीर्धीकरण प्रति इकाई समय में)

(ब) ज्यामितीय वृद्धि (Geometrical Growth):
एक कोशिका की वृद्धि अथवा पौधे के एक अंग की वृद्धि अथवा पूर्ण पौधे की वृद्धि सदैव एकसमान नहीं होती। प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (initial lag chase) में वृद्धि की दर पर्याप्त धीमी होती है। तत्पश्चात् यह दर तीव्र हो जाती है और उच्चतम बिन्दु (maximum point) तक पहुँच जाती है। इसे मध्य तीव्र वृद्धि काल (middle logarithmic phase) कहते हैं। इसके पश्चात् यह दर धीरे-धीरे कम होती जाती है और अन्त –

चित्र – (A) अंकगणितीय और (B) ज्यामितिक वृद्धि, (C) भ्रूण विकास के समय अंकगणितीय और ज्यामितिक वृद्धि।

में स्थिर हो जाती है। इसे अन्तिम धीमा वृद्धि काल (last stationary phase) कहते हैं। इसे ज्यामितीय वृद्धि कहते हैं। इनमें सूत्री विभाजन से बनी दोनों संतति कोशिकाएँ एक समसूत्री कोशिका विभाजन का अनुकरण करती हैं और इसी प्रकार विभाजित होने की क्षमता बनाए रखती हैं।

यद्यपि सीमित पोषण आपूर्ति के साथ वृद्धि दर धीमी होकर स्थिर हो जाती है। समय के प्रति वृद्धि दर को ग्राफ पर अंकित करने पर एक सिग्मॉइड वक्र (Sigmoid curve) प्राप्त होता है। यह ‘S’ की आकृति का होता है। ज्यामितीय वृद्धि (geometrical growth) को गणितीय रूप से निम्नलिखित प्रकार व्यक्त कर सकते हैं –
W1 = Wen0
जहाँ (W1 = अन्तिम आकार – भार, ऊँचाई, संख्या आदि
W0 = प्रारम्भिक आकार, वृद्धि के प्रारम्भ में
r = वृद्धि दर (सापेक्ष वृद्धि दर)
t = समय में वृद्धि
e = स्वाभाविक लघुगणक का आधार (base of natural logarithms)
r = एक सापेक्ष वृद्धि दर है। यह पौधे द्वारा नई पादप सामग्री का निर्माण क्षमता को मापने के लिए है, जिसे एक दक्षता सूचकांक (efficiency index) के रूप में संदर्भित किया जाता है; अत: W1 का अन्तिम आकार W0 के प्रारम्भिक आकार पर निर्भर करता है।

(स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र (Sigmoid Growth Curve):
ज्यामितिक वृद्धि को तीन प्रावस्थाओं में विभक्त कर सकते हैं –

  • प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (Initial lag phase)
  • मध्य तीव्र वृद्धि काल (Middle lag phase)
  • अन्तिम धीमा वृद्धि काल (Last stationary phase)
  • यदि वृद्धि दर का समय के प्रति ग्राफ बनाएं तो ‘S’ की आकृति का वक्र प्राप्त होता है। इसे सिग्मॉइड वृद्धि वक्र कहते है।

(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर (Absolute and Relative Growth Rate):

  • मापन और प्रति यूनिट समय में कुल वृद्धि को सम्पूर्ण या परम वृद्धि दर (absolute growth rate) कहते हैं।
  • किसी दी गई प्रणाली की प्रति यूनिट समय में वृद्धि को सामान्य आधार पर प्रदर्शित करना सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) कहलाता है।

चित्र – सम्पूर्ण और सापेक्ष वृद्धि दर। पत्ती A तथा B को देखें। दोनों ने अपने क्षेत्रफल दिए गए समय में A से A’ और B से B’ तक 5 सेमी-2 बढ़ा लिए हैं। दोनों पत्तियों ने एक निश्चित समय में अपने सम्पूर्ण क्षेत्रफल में समान वृद्धि की है, फिर भी A की सापेक्ष वृद्धि दर अधिक है।

प्रश्न 4.
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामकों के पाँच मुख्य समूहों के बारे में लिखिए। इनके आविष्कार, कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी में इनके प्रयोग के बारे में लिखिए।
उत्तर:
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामक (Natural Plant Growth Regulators):
पौधों की विभज्योतकी कोशिकाओं (Meristematic cells) और विकास करती पत्तियों एवं फलों में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले विशेष कार्बनिक यौगिकों को पादप हार्मोन्स (Phytohormones) कहते हैं।

ये अति सूक्ष्म मात्रा में परिवहन के पश्चात् पौधों के अन्य अंगों (भागों) में पहुँचकर वृद्धि एवं अनेक उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित एवं नियन्त्रित करते हैं। अनेक कृत्रिम कार्बनिक यौगिक में पादप हार्मोन्स की तरह कार्य करते हैं। वेण्ट (Went 1928) के अनुसार वृद्धि नियामक पदार्थों के अभाव में वृद्धि नहीं होती।

पादप हार्मोन्स को हम निम्नलिखित पाँच प्रमुख समूहों में बाँट लेते हैं –

  1. ऑक्सिन (Auxins)
  2. जिबरेलिन (Gibberellins)
  3. सायटोकाइनिन (Cytokinins)
  4. ऐब्सीसिक अम्ल (Abscisic acid)
  5. एथिलीन (Ethylene)

1. ऑक्सिन (Auxins):
सर्वप्रथम डार्विन (Darwin, 1880) ने देखा कि कैनरी घास (Phalaris canariensis) के नवोद्भिद् के प्रांकुर चोल (coleoptile) एक तरफा प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं, परन्तु प्रांकुर चोल के शीर्ष को काट देने पर यह एक तरफा प्रकाश की ओर नहीं मुड़ता।

चित्र – प्रांकुर चोल को पार्श्व दिशा से एकतरफा प्रकाशित करने पर प्रांकुर चोल प्रकाश की ओर मुड़ता है।

बायसेन:
जेन्सन (Boysen-Jensen 1910-1913) ने कटे हुए प्राकुंर चोल को अगार (agar) के घनाकार टुकड़े पर रखा, कुछ समय पश्चात् अगार के घनाकार टुकड़े को कटे हुए प्रांकुर चोल के स्थान पर रखने के पश्चात् एकतरफा प्रकाश से प्रकाशित करने पर प्रांकुर चोल प्रकाश की ओर मुड़ जाता है। वेण्ट (Went, 1928) ने इसी प्रकार के प्रयोग जई (Avena sativa) के नवोद्भिद् पर किए।

उन्होंने प्रयोग से यह निष्कर्ष निकाला की प्रांकुर चोल के शीर्ष पर बना रासायनिक पदार्थ अगार के टुकड़ों (block) में आ गया था। वेण्ट ने प्रांकुर चोल के कटे हुए शीर्ष को दो अगार के टुकड़ों पर रखा जिनके मध्य अभ्रक (माइका) की पतली प्लेट लगी थी, एकतरफा प्रकाश डालने पर रासायनिक पदार्थ के 65% भाग अप्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र हो जाता है और केवल 35% रासायनिक पदार्थ प्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र होता है।

वेण्ट ने इस रासायनिक पदार्थ को ऑक्सिन (auxin) नाम दिया। ऑक्सिन की सान्द्रता तने में वृद्धि को प्रेरित करती है और जड़ में वृद्धि का संदमन करती है। ऑक्सिन के असमान वितरण के फलस्वरूप ही प्रकाशानुवर्तन (phototropism) और गुरुत्वानुवर्तन (geotropism) गति होती है। केनेथ थीमान (Kenneth Thimann) ने ऑक्सिन को शुद्ध रूप में प्राप्त करके इसकी आण्विक संरचना ज्ञात की।

चित्र – वेण्ट द्वारा जई के प्रांकुर चोल के शीर्ष पर किया गया प्रयोग।

ऑक्सिन के कार्यिकी प्रभाव एवं उपयोग (Physiological effects & Uses of Auxins):

1. प्रकाशानुवर्तन एवं गुरुत्वानुवर्तन (Phototropism and Geotropism):
ऑक्सिन की अधिक मात्रा तने के लिए वृद्धिवर्धक (promotional) तथा जड़ के लिए वृद्धिरोधक (inhibition) प्रभाव रखती है।

2. शीर्ष प्रभाविता (Apical dominance):
सामान्तया पौधों के तने या शाखाओं के शीर्ष पर स्थित कलिका से स्रावित ऑक्सिन पाश्वीय कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि का संदमन (inhibition) करते हैं। शीर्ष कलिका को काट देने से पाश्र्वीय कलिकाएँ शीघ्रता से वृद्धि करती है। चाय बागान में तथा चाहरदीवारी के लिए प्रयोग की जाने वाली हैज को निरन्तर काटते रहने से झाड़ियाँ घनी होती हैं।

3. विलगन (Abscission):
परिपक्व, पत्तियाँ, पुष्प और फल विलगन पर्त के बनने के कारण पौधे से पृथक् हो जाते हैं। ऑक्सिन; जैसे – IAA, IBA की विशेष सान्द्रता का छिड़काव करके अपरिपक्व फलों के विलयन को रोका जा सकता है। इससे फलों का उचित मूल्य प्राप्त होगा।

4. अनिषेकफलन (Parthenocarpy):
अनेक फलों में बिना परागण और निषेचन के भी फल का विकास हो जाता है; जैसे-अंगूर, केला, सन्तरा आदि में। ये फल बीजरहित होते हैं। ऑक्सिन का वर्तिकान पर लेपन करने से बिना निषेचन के फल विकसित हो जाते हैं, इस प्रक्रिया को अनिषेकफलन कहते हैं। बीजरहित फलों में खाने योग्य पदार्थ की मात्रा अधिक होती है।

5. खरपतवार निवारण (Weed Destruction):
खेतों में प्रायः अनेक जंगली पौधे उग आते हैं, इन्हें खरपतवार कहते हैं। ये फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करके पैदावार को प्रभावित करते हैं। परम्परागत तरीके से निराई-गुड़ाई, फसल चक्र अपनाकर खरपतवार नियन्त्रण किया जाता है। 2, 4-D नामक संश्लेषी ऑक्सिन का उपयोग करके एकबीजपत्री फसलों में उगने वाले द्विबीजपत्री खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है।

6. कटे तनों पर जड़ निभेदन (Root differentiation on Stem cutting):
अनेक पौधों में कलम लगाकर नए पौधे तैयार किए जाते हैं। ऑक्सिन; जैसे – IBA का उपयोग कलम के निचले सिरे पर करने से जड़ें शीघ्र निकल आती है। अतः ऑक्सिन का उपयोग मुख्यतया सजावटी पौधों को तैयार करने में किया जाता है।

7. प्रसुप्तता नियन्त्रण (Control of Dormancy):
आलू के कन्द तथा अन्य भूमिगत भोजन संचय करने वाले भागों की प्रसुप्त कलिकाओं के प्रस्फुटन को रोकने के लिए इन्हें कम ताप पर संगृहीत किया जाता है। ऑक्सिन का छिड़काव करके इन्हें सामान्य ताप पर संगृहीत किया जा सकता है। ऑक्सिन कलिकाओं के लिए वृद्धिरोधक का कार्य करते हैं।

8. जिबरेलिन (Gibberellins):
धान की फसल में बैकेन (फूलिश सीडलिंग – foolish seedling) नामक रोग एक कवक जिबेरेल फ्यूजीकुरोई (Gibberella fujikuroi) से होता है। इसमें पौधे अधिक लम्बे, पत्तियाँ पीली लम्बी और दाने छोटे होते हैं।

कुरोसावा (Kurosawa, 1926) ने प्रमाणित किया कि यदि कवक द्वारा स्रावित रस को स्वस्थ पौधे पर छिड़का जाए तो स्वस्थ पौधा भी रोगी हो जाता है। याबुता और हयाशी (Yabuta and Hayashi, 1939) ने कवक रस से वृद्धि नियामक पदार्थ को पृथक् किया, इसे जिबरेलिन – A3 (GA) नाम दिया गया। सबसे पहले खोजा गया जिबरेलिन – A3 है। अब तक लगभग 110 प्रकार के GA खोजे जा चुके हैं।

जिबरेलिन का पादप कार्यिकी पर प्रभाव एवं कृषि या बागवानी में महत्त्व (Physiological Effects and Importance of Gibberellins in Agriculture & Horticulture):

I. लम्बाई बढ़ाने की क्षमता (Efficiency of inrease the length):
जिबरेलिन के प्रयोग से आनुवंशिक रूप से बौने पौधे लम्बे हो जाते हैं, लेकिन यह लक्षण उन्हीं पौधों तक सीमित रहता है जिन पर GA का छिड़काव किया जाता है। GA के उपयोग से सेब जैसे फल लम्बे हो जाते हैं। अंगूर के डंठल की लम्बाई बढ़ जाती है। गन्ने की खेती पर GA छिड़कने से तनों की लम्बाई बढ़ जाती है। इससे फसल का उत्पादन 20 टन प्रति एकड़ बढ़ जाता है।

II. पुष्यन पर प्रभाव (Effect of Flowering):
कुछ पौधों को पुष्पन हेतु कम ताप तथा दीर्घ प्रकाश अवधि (long photoperiod) की आवश्यकता होती है। यदि इन पौधों पर GA का छिड़काव किया जाए तो पुष्पन सुगमता से हो जाता है। द्विवर्षी पौधे एकवर्षी पौधों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। GA के इस प्रभाव को बोल्टिंग प्रभाव (Bolting effect) कहते हैं। इसका उपयोग चुकन्दर, गाजर, मूली, पत्तागोभी आदि के पुष्पन के लिए किया जाता है।

(i) अनिषेकफलन (Parthenocarphy):
GA के छिड़काव से पुष्प से बिना निषेचन के फल बन जाता है। फल बीजरहित होते हैं।

(ii) जीर्णता या जरावस्था (Senescence):
GA फलों को जल्दी गिरने से रोकने में सहायक होते हैं।

(iii) बीजों का अंकुरण (Seeds Germination):
GA बीजों के अंकुरण को प्रेरित करते हैं।

(iv) पौधों की परिपक्वता (Maturity of Plants):
GA का छिड़काव करने से अनावृत्तबीजी (gymnosperm) पौधे शीघ्र परिपक्व होते हैं और बीज जल्दी तैयार हो जाता है।

III. सायटोकाइनिन (Cytokinin):
सायटोकाइनिन (Cytokinin) – सायटोकायनिन ऑक्सिन की सहायता से कोशिका विभाजन को उद्दीपित करते हैं। एफ० स्कूग (E Skoog) तथा उसके सहयोगियों ने देखा कि तम्बाकू के तने के अन्तस्पर्व खण्ड से अविभेदित कोशिकाओं का समूह तभी बनता है, जब माध्यम में आक्सिन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन नामक बढ़ावा देने वाला तत्व मिलाया गया। इसका नाम काइनेटिन रखा। लेथम तथा सहयोगियों ने मक्का के बीज से ऐसा ही पदार्थ प्राप्त करके इसका नाम जिएटिन (zeatin) रखा। काइनेटिन और जिएटिन सायटोकाइनिन ही है।

सायटोकाइनिन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Cytokinin):

  • ये पदार्थ कोशिका विभाजन को प्रेरित करते हैं।
  • ये जीर्णता (senescence) को रोकते हैं।
  • कोशिका विभाजन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन पौधों के अगों के निर्माण को नियन्त्रित करते हैं।

यदि तम्बाकू की कोशिकाओं का संवर्धन शर्करा तथा खनिज लवणयुक्त माध्यम में किया जाए तो केवल कैलस (callus) ही विकसित होता है। यदि माध्यम में सायटोकाइनिनि और ऑक्सिन का अनुपात बदलता रहे तो जड़ अथवा प्ररोह का विकास होता है। संवर्धन के प्रयोग आनुवंशिक इन्जीनियरी के लिए लाभदायक हैं; क्योंकि नई किस्म के पौधे उत्पन्न करने में कोशिका संवर्धन लाभदायक हैं।

IV. ऐब्सीलिक अम्ल (Abscisic Acid : ABA):
कार्स एवं एडिकोट ने कपास के पौधे की पुष्पकलिकाओं से एक पदार्थ ऐब्सीसिन (abscisin) प्राप्त किया। इस पदार्थ को किसी पौधे पर छिड़कने से पत्तियों का विलगन हो जाता है।

वेयरिंग (Wareing, 1963) ने एसर की पत्तियों से डॉरमिन (dormin) प्राप्त किया, यह बीजों के अंकुरण और कलिकाओं की वृद्धि का अवरोधन करता है। इन दोनों पदार्थों को ऐब्सीसिक अम्ल कहा गया।

ऐब्सीसिक अम्ल का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Abscisic Acid):

(i) विलगन (Abscission):
यह पत्तियों के विलगन को प्रेरित करता है।

(ii) कलिकाओं की वृद्धि एरं बीजों का अंकुरण (Growth of buds and germination of seeds):
यह कलिकाओं की वृद्धि और बीजों के अंकुरण को रोकता है।

(iii) जीर्णता (Senescence):
यह जीर्णता को प्रेरित करता है।

(iv) वाष्पोत्सर्जन नियन्त्रण (Control of Transpiration):
यह रन्ध्रों को बन्द करके वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करता है। इसका उपयोग कम जल वाली भूमि में खेती करने के लिए उपुयक्त है।

(v) कन्द निर्माण (Tuber Formation):
आलू में कन्द निर्माण में सहायता करता है।

(vi) कोशिकाविभाजन एवं कोशिका दीर्धीकरण (Cell division and Cell Elongation):
ऐब्सीसिक अम्ल कोशिका विभाजन तथा कोशिका दीर्धीकरण को अवरुद्ध करता है। ऐब्सीसिक अम्ल बीजों को प्रसुप्ति के लिए प्रेरित करने और शुष्क परिस्थितियों में पौधे का बचाव करता है।

V. एथिलीन (Ethylene):
बर्ग (Burge, 1962) ने एथिलीन को पादप हार्मोन सिद्ध किया। यह मुख्यत: पकने वाले फलों से निकलने वाला गैसीय हार्मोन होता है।

एथिलीन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Ethylene):

(i) पुष्पन (Flowering):
यह सामान्यतया पुष्पन को कम करता है, लेकिन अनन्नास में पुष्पन को प्रेरित करता है।

(ii) विलगन (Abscission):
यह पत्ती, पुष्प तथा फलों के विलगन को तीव्र करता है।

(iii) पुष्प परिवर्तन (Flower Modification):
कुकरबिटेसी कुल के पौधों में एथिलीन नर पुष्पों की संख्या को कम करके मादा पुष्पों की संख्या को बढ़ाता है।

(iv) फलों का पकना (Fruit Ripening):
यह फलों को पकाने में सहायक होता है। (आम, केला, अंगूर आदि फलों को पकाने के लिए इथेफोन (ethephon) का प्रयोग औद्योगिक स्तर पर किया जा रहा है। इससे पके फल प्राकृतिक रूप से पके फलों के समान होते हैं। इथेफोन से एथिलीन गैस निकलती है।

प्रश्न 5.
दीप्तिकालिता तथा वसन्तीकरण क्या है? इनके महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
दीप्तिकालिता (Photoperiodism):
पौधों के फलने-फूलने, वृद्धि, पुष्पन आदि पर प्रकाश की अवधि (photoperiod) का प्रभाव पड़ता है। पौधों द्वारा प्रकाश की अवधि तथा समय के प्रति अनुक्रिया को दीप्तिकालिता (photoperiodism) कहते हैं। (अथवा) दिन व रात के परिवर्तनों के प्रति कार्यात्मक अनुक्रियाएँ दीप्तिकालिता कहलाती है। दीप्तिकालिता शब्द का प्रयोग गार्नर तथा एलार्ड (Garmer and Allard, 1920) ने किया।

(क) दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों को मुख्य रूप से तीन समूहों में बाँट लेते हैं –

  • अल्प प्रदीप्तकाली पौधा (Short day plant)
  • दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा (Long day plant)
  • तटस्थ प्रदीप्तकाली पौधा (Photo neutral plant)

अल्प प्रदीप्तकाली पौधो को मिलने वाली प्रकाश अवधि को कम करके और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों को अतिरिक्त प्रकाश अवधि प्रदान करके पुष्पन शीघ्र कराया जा सकता है।

(ख) कायिक शीर्षस्थ या कक्षस्थ कलिका उपयुक्त प्रकाश अवधि प्राप्त होने पर ही पुष्प कलिका में रूपान्तरित होती है। यह परिवर्तन फ्लोरिजन (florigen) हॉर्मोन के कारण होता है जो दिन और रात्री के अन्तराल के कारण संश्लेषित होता है।

वसन्तीकरण (Varnalization):
कम ताप काल में पुष्पन को प्रोत्साहन वसन्तीकरण कहलाता है। कुछ पौधों में पुष्पन गुणात्मक या मात्रात्मक तौर पर कम तापक्रम में अनावृत्त होने पर निर्भर करता है। इस गुण को वसन्तीकरण कहते हैं। वसन्तीकरण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम टी० डी० लाइसेन्को (T.D. Lysenko, 1928) ने किया था।

गेहूँ की शीत प्रजाति को वसन्तु ऋतु में बोने योग्य बनाने के लिए इसके भीगे बीजों को 10-12 दिन तक 3°C ताप पर रखते हैं और फिर वसन्ती गेहूँ के साथ बोने से यह बसन्ती गेहूँ के साथ ही पककर तैयार हो जाता है। पौधों में कायिक वृद्धि कम होती है।

कम ताप पर उपचार से पौधे की कायिक अवधि कम हो जाती अनेक द्विवर्षी पौधों को कम तापक्रम में अनावृत कर दिए जाने से पौधों में दीप्तिकालिता के कारण पुष्पन की अनुक्रिया बढ़ जाती है। वसन्तीकरण के फलस्वरूप द्विवर्षी पौधों में प्रथम वृद्धिकाल में ही पुष्पन किया जा सकता है। पौधों में शीत के प्रति प्रतिरोध क्षमता बढ़ जाती है। वसन्तीकरण द्वारा पौधों को प्राकृतिक कुप्रभावों; जैसे-पाला, कुहरा आदि से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 6.
ऐब्सीसिक एसिड को तनाव हॉर्मोन कहते हैं क्यों?
उत्तर:
ऐब्सीसिक अम्ल वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए बाह्य त्वचीय रन्ध्रों को बन्द करने के लिए प्रोत्साहित करत है। वह विपरीत परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार के तनावों को सहन करने में सहायक होता है, इस कारण इसे तनाव हॉर्मोन
कहते हैं।

प्रश्न 7.
उच्च पादपों में वृद्धि एवं विभेदन खुला होता है। टिप्पणी करें।
उत्तर:
पौधों में वृद्धि एवं विभेदन भी उन्मुक्त होता है। विभज्योतक से उत्पन्न कोशिकाएँ/ऊतक परिपक्व होने पर भिन्न-भिन्न संरचनाएँ बनती हैं। कोशिका/ऊतक की परिपक्वता के समय अन्तिम संरचना कोशिका के आन्तरिक स्थान पर भी निर्भर करती है; जैसे – मूल के शीर्ष पर स्थित विभज्योतक से मूलगोप कोशिकाएँ, परिधि की ओर मूलीय त्वचा के रूप में विभेदित होती है।

इसी प्रकार कुछ कोशिकाएँ जाइलम, फ्लोएम, परिरम्भ, वल्कुट आदि के रूप में विभेदित होती है। इसी प्रकार प्ररोह शीर्ष पर स्थित विभज्योतक विभिन्न कोशिकाओं/ऊतकों और अंगों के रूप में विभेदित होती है। इस प्रकार विभज्योतक की क्रियात्मकता से पौधे के शरीर की विभिन्न कोशिकाओं, ऊतक और अंगों के निर्माण को वृद्धि का खुला स्वरूप कहा जाता है।

प्रश्न 8.
अल्प प्रदीप्तकाली पौधे और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे किसी एक स्थान पर साथ-साथ फूलते हैं। विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अल्प प्रदीप्तकाली पौधों (short day plants) में निर्णायक दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है जिस पर या इससे कम प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे अधिक प्रकाश अवधि में पौधा पुष्प उत्पन्न नहीं कर सकता।

दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों (long day plants) में निर्णायक दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है जिससे अधिक प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे कम प्रकाश अवधि मे पुष्प उत्पन्न नहीं होते। अतः अल्प प्रदीप्तकाली पौधों और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों में विभेदन उनमें निर्णायक दीप्तिकाल से कम अवधि पर पुष्पन होना अथवा अधिक अवधि पर पुष्प उत्पन्न होने के आधार पर किया जाता है।

दो जातियों के पौधे समान अवधि के प्रकाश में पुष्प उत्पन्न करते हैं; उनमें से एक अल्प प्रदीप्तकाली पौधा तथा दूसरा दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा हो सकता है; जैसे – जैन्थियम (Xanthium) का निर्णायक दीप्तिकाल 1512 घण्टे हैं और हाइओसायमस नाइजर (Hyoscyamus niger) का निर्णायक दीप्तिकाल 11 घण्टे है।

दोनों पौधे 14 घण्टे की प्रकाशीय अवधि में पुष्प उत्पन्न कर सकते हैं। इस आधा पर जैन्थियम अल्प प्रदीप्तकाली पौधा है क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल से कम प्रकाशीय अवधि में पुष्पन करता है तथा हाइओसायमस नाइजर दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा है; क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल में अधिक प्रकाश अवधि में पुष्पन करता है।

प्रश्न 9.
अगर आपको ऐसा करने को कहा जाए तो एक पादप वृद्धि नियामक नाम दीजिए –
(क) किसी टहनी में जड़ पैदा करने हेतु
(ख) फल को जल्दी पकाने हेतु
(ग) पत्तियों की जरावस्था को रोकने हेतु
(घ) कक्षस्थ कलिकाओं में वृद्धि कराने हेतु
(ङ) एक रोजेट पौधे में वोल्ट हेतु
(च) पत्तियों के रन्ध्र को तुरन्त बन्द करने हेतु।
उत्तर:
(क) ऑक्सिन (Auxins)
(ख) एथिलीन (Ethylene)
(ग) सायटोकाइनिन (Cytokinins)
(घ) सायटोकाइनिनि (Cytokinins)
(ङ) जिबरेलिन (Gibberellins)
(च) ऐब्सीसिक अम्ल (Abscisic acid)।

प्रश्न 10.
क्या एक पर्णहरित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया कर सकता है? यदि हाँ या नहीं तो क्यों?
उत्तर:
पौधों में पुष्पन क्रिया प्रतिदिन उपलब्ध प्रकाश अवधि (Photoperiod) से प्रभावित होती है। पर्णहरित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया नहीं करता, क्योंकि पौधे की पत्तियाँ ही प्रकाश को ग्रहण करने की क्षमता रखती हैं। पत्तियों में एक प्रेरक हॉर्मोन फ्लोरिजन (florigen) उत्पन्न होता है। इसकी निश्चित मात्रा पुष्पन को प्रभावित करती है। प्लोरिजन के अभाव में पुष्पन नहीं होता।

प्रश्न 11.
क्या हो सकता है, अगर –
(क) जी ए3 (GA3) को धान के नवोद्भिद् पर दिया जाए।
(ख) विभाजित कोशिका विभेदन करना बन्द कर दें।
(ग) एक सड़ा फल कच्चे फलों के साथ मिला दिया जाए।
(घ) अगर आप संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन्स डालना भूल जाएँ।
उत्तर:
(क) नवोद्भिद् पादप GA3 के प्रभाव में अधिक लम्बे हो जाते हैं। इनकी पत्तियाँ पीली और लम्बी हो जाती हैं। इस लक्षण को बैकेन (फूलिश सीडलिंग) रोग कहते हैं।
(ख) अविभेदित कोशिकाओं का समूह बन जाएगा।
(ग) सड़े फल से एथिलीन हॉर्मोन निकलता है, जिसके प्रभाव से कच्चे फल जल्दी पक जाएँगे।
(घ) सायटोकाइनिन्स मिलाने से अविभेदित कैलस में प्ररोह तथा जड़ का विकास हो जाता है।

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