BSEB 12 ECO PT 02 CH 06

BSEB Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार

Bihar Board Class 12 Economics प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
माँग वक्र का आकार क्या होगा ताकि कुल संप्राप्ति वक्र –
(a) a मूल बिन्दु से गुजरती हुई धनात्मक प्रवणता वाली सरल रेखा हो।
(b) a समस्तरीय रेखा हो।
उत्तर:
(a) माँग वक्र का ढाल नीचे की ओर या ऋणात्मक होगा।
(b) माँग वक्र का ढाल x – अक्ष (क्षैतिज अक्ष) के समान्तर होगा।

प्रश्न 2.
नीचे दी गई सारणी से कुल संप्राप्ति माँग वक्र और माँग की कीमत लोच की गणना कीजिए।
उत्तर:

फर्म का माँग वक्र व उद्योग का माँग वक्र एकदम समान होंगे।

इकाई 1 से 3 तक माँग वक्र ऋणात्मक ढाल वाला है। इकाई 3 से 5 तक माँग क्षैतिज अक्ष के समांतर है इकाई 5 से 6 तक माँग वक्र पुनः ऋणात्मक ढाल वाला है। 5 वीं इकाई के बाद वस्तु की कोई माँग नहीं है।
माँग की लोच

प्रश्न 3.
जब माँग वक्र लोचदार हो तो सीमांत संप्राप्ति का मूल्य क्या होगा?
उत्तर:
जब माँग पूर्णतया लोचदार होती है तो सीमांत आगम का मूल्य शून्य होता है। जब माँग वक्र लोचदार अर्थात् माँग की लोच इकाई से अधिक होती है तब सीमांत आगम धनात्मक होता है।

प्रश्न 4.
एक एकाधिकारी फर्म की कुल स्थिर लागत 100 रुपये और निम्नलिखित माँग सारणी है –

अल्पकाल में संतुलन मात्रा, कीमत और कुल लाभ प्राप्त कीजिए। दीर्घकाल में संतुलन मात्रा क्या होगी? जब कुल लागत 1000 रुपये हो तो अल्पकाल और दीर्घकाल में संतुलन का वर्णन करें।
उत्तर:

अल्पकालीन संतुल उस बिन्दु पर होता है जहाँ एकाधिकारी फर्म को अधिकतम आगम प्राप्त होता है। अनुसूची में उत्पादन स्तर 6 पर अधिक आगम 300 फर्म को प्राप्त हो रहा है।
अतः अल्पकालीन साम्य मात्रा = 6
कीमत = 50
कुल लाभ = कुल आगम – कुल लागत
= 300 – 0 = 300
जब कुल लागत 1000 रुपये है तो अल्पकाल में संतुलन उस बिन्दु पर होता है जहाँ एकाधिकारी फर्म की कुल आगम व कुल लागत का अंतर अधिक होता है।
अधिकतम लाभ = कुल आगत – कुल लागत
= 300 – 1000 = -700 रुपये
उपरोक्त सूचना यह दर्शाती है कि फर्म को 700 रुपये की हानि हो रही है। अतः संतुलन अवस्था का प्रश्न ही नहीं उठता है। दीर्घकाल के लिए भी एकाधिकारी फर्म के संतुलन की वही शर्त लागू होती है।

प्रश्न 5.
यदि अभ्यास 3 का एकाधिकारी फर्म सार्वजनिक क्षेत्र का फर्म हो, तो सरकार इसके प्रबंधक के लिए दी हुई सरकारी स्थिर कीमत (अर्थात् वह कीमत स्वीकार करता है और इसलिए पूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक बाजार के फर्म जैसा व्यवहार करता है) स्वीकार करने के लिए नियम बनाएगी और सरकार यह निर्धारित करेगी कि ऐसी कीमत निर्धारित हो, जिससे बाजार माँग और पूर्ति समान हो। उस स्थिति में संतुलन कीमत, मात्रा और लाभ क्या होंगे?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत संतुलन स्थापित वहाँ होता है जहाँ वस्तु की बाजार माँग व बाजार पूर्ति समान होती है। संतुलन बिन्दु पर कीमत को साम्य कीमत तथा बेची व खरीदी गई मात्रा को साम्य मात्रा कहते हैं। साम्य कीमत एवं मात्रा को नीचे चित्र में दिखाया गया है।
माँग वक्र DD, पूर्ति वक्र SS, साम्य बिन्दु E, साम्य कीमत Op, साम्य मात्रा Oq

पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत एक फर्म को शून्य लाभ प्राप्त होता है। इसका अभिप्राय है कि प्रतियोगी फर्म को सामान्य लाभ प्राप्त होता है।

प्रश्न 6.
उस स्थिति में सीमांत संप्राप्ति वक्र के आकार पर टिप्पणी कीजिए, जिसमें कुल संप्राप्ति वक्र –

  1. धनात्मक प्रवणता वाली सरल रेखा हो।
  2. समस्तरीय सरल रेखा हो।

उत्तर:
1. कुल आगम वक्र धनात्मक ढाल वाली सीधी रेखा है –
नीचे बताई गई तीन स्थितियाँ हो सकती हैं –

  • यदि कुल आगम वक्र धनात्मक ढाल वाला होता है लेकिन उसमें समान दर से वृद्धि होती है तो सीमांत आगम वक्र क्षैतिज अक्ष (x – अक्ष) के समांतर होगा।
  • यदि कुल आगम वक्र धनात्मक ढाल वक्र है और बढ़ती हुई दर से बड़ता है तो सीमांत आगम वक्र का ढाल धनात्मक होता है।
  • यदि कुल वक्र का ढाल धनात्मक परंतु कम दर से बढ़ता है तो सीमांत का ढाल ऋणात्मक होता है।

प्रश्न 7.
नीचे सारणी में वस्तु की बाजार माँग वक्र और वस्तु उत्पादक एकाधिकारी फर्म के लिए कुल लागत दी हुई है। इनका उपयोग करके निम्नलिखित की गणना करें –

  1. सीमांत संप्राप्ति और सीमांत लागत सारणी।
  2. वह मात्रा जिस पर सीमांत संप्राप्ति और सीमांत लागत बराबर है।
  3. निर्गत की संतुलन मात्रा और वस्तु की संतुलन कीमत।
  4. संतुलन में कुल संप्राप्ति, कुल लागत और कुल लाभ।

उत्तर:
1.
सीमांत संप्राप्ति।

सीमांत लागत अनुसूची

2. उत्पादन स्तर c फर्म की सीमांत लागत व सीमांत आगम दोनों समान हैं। इस उत्पादन स्तर पर MR = MC = 4

3. संतुलन बिन्दु वहाँ स्थापित होता है जहाँ MR = MC इस शर्त में निम्नलिखित सूचना प्राप्त होती है –
साम्य मात्रा = 6
इकाइयाँ साम्य कीमत = 19

4. साम्य उत्पाद स्तर = 6 इकाई
साम्य उत्पादन स्तर पर
कुल आगम = 114
कुल लागत = 109
कुल लाभ = कुल आगाम – कुल लागत
= 114 – 109 = 5

प्रश्न 8.
निर्गत के उत्तम अल्पकाल में यदि घाटा हो, तो क्या अल्पकाल में एकाधिकारी फर्म उत्पादन को जारी रखेगी?
उत्तर:
यदि अल्पकाल में किसी फर्म को हानि उठानी पड़ती है तो वह उत्पादन जारी रखेगी इसका निर्धारण निम्न प्रकार से किया जाता है –
1. यदि उत्पादन के इस स्तर पर सीमांत लागत वक्र सीमांत आगम वक्र को ऊपर से काटता है अथवा सीमांत लागत वक्र का ढाल ऋणात्मक होता है तो फर्म हानि की स्थिति में भी उत्पादन जारी रखेगी क्योंकि उत्पादन के इस स्तर के बाद फर्म को लाभ प्राप्त होगा ऐसा इसलिए संभव होता है कि सीमांत लागत घट रही है।

2. यदि उत्पादन के इस स्तर पर सीमांत लागत वक्र, सीमांत आगम वक्र को नीचे से काटता है अथवा सीमांत लागत वक्र धनात्मक ढाल का है तो फर्म इस उत्पादन स्तर से आगे उत्पादन नहीं करेगी। इस उत्पादन स्तर से आगे उत्पादन करने पर सीमांत लागत में वृद्धि होती है और फर्म की हानि में और बढ़ोतरी होगी।

प्रश्न 9.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में किसी फर्म की माँग वक्र की प्रवणता ऋणात्मक क्यों होती है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता में एक फर्म वस्तु की कीमत घटाकर ही ज्यादा इकाइयाँ बेच सकती है। क्योंकि कीमत घटने पर माँग बढ़ जाती है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि सीमांत आगम वक्र का ढाल ऋणात्मक होगा। एकाधिकारात्मक प्रतियोगी फर्म का औसत आगम, माँग वक्र के समान होता है। अतः इस बाजार में फर्म का माँग वक्र ऋणात्मक ढाल वाला होता है।

प्रश्न 10.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में दीर्घकाल के लिए किसी फर्म का संतुलन शून्य लाभ पर होने का क्या कारण है?
उत्तर:
एकाधिकारात्मक प्रतियोगी बाजार में फर्मों की अधिक संख्या होती है। फर्मों का प्रवेश व गमन स्वतंत्र होता है। इस बाजार में फर्म विभेदीकृत वस्तु का उत्पादन करती है। अल्पकाल में फर्मों की संख्या कम होने के कारण प्रतियोगिता कम पायी जाती है। अतः फर्मों को असामान्य लाभ प्राप्त हो सकता है। असामान्य लाभ से आकर्षित होकर नई फमें बाजार में प्रवेश कर सकती है।

वस्तु का उत्पादन बढ़ेगा। इससे वस्तु की कीमत घटेगी। नई फर्मों का प्रवेश, उत्पादन में बढ़ोतरी, वस्तु की कीमत में गिरावट का सिलसिला उस सीमा तक रहता है जब तक फर्म का लाभ शून्य नहीं हो जाता है। इस स्तर पर बाजार में प्रवेश पाने के लिए नई फर्मों के पास कोई आकर्षण नहीं रहता है।

इसके विपरीत यदि अल्पकाल में कोई फर्म हानि उठा रही है तो नुकसान उठाने वाली कुछ फर्म उत्पादन बंद करक बाजार छोड़कर बाजार से बाजार जा सकती है। उत्पादन में संकुचन होगा जिससे बाजार कीमत में बढ़ोतरी होगी। फर्मों का प्रवेश, उत्पादन में संकुचन आदि तब तक जारी रहेगा जब तक लाभ शून्य नहीं होगा। इस प्रकार फर्मों का प्रवेश व गमन उस समय रुक जाता है जब दीर्घकाल में लाभ शून्य हो जाता है। यह स्थिति ही दीर्घकालीन संतुलन की स्थिति होती है।

प्रश्न 11.
तीन विभिन्न विधियों की सूची बनाइए, जिसमें अल्पाधिकारी फर्म व्यवहार कर सकता है।
उत्तर:
वह बाजार संरचना जिसमें एक अधिक परंतु सीमित फर्म होती है अल्पाधिकार कहलाता है। अल्पाधिकारी में एक फर्म निम्नलिखित तीन प्रकार से व्यवहार कर सकती है –
1. यदि वस्तु बाजार में दो फर्म मौजूद होती हैं तो इस संरचना को द्वैदाधिकार कहते हैं। दोनों फर्म मिलकर विलय कर सकती है और प्रतियोगिता न करने का निर्णय कर सकती है। सामूहिक रूप से दोनों फर्मे अपना लाभ अधिकतम कर सकती है। इस स्थिति में दोनों फर्मे अलग-अलग उत्पादन इकाई के रूप में उत्पादन करती है परंतु अधिक लाभ कमाने के लिए एकाधिकारी फर्म की तरह व्यवहार करती है।

2. यह भी हो सकता है कि दोनों फर्मे आपस में अधिकतम लाभ के लिए उत्पादन की मात्राएँ तय कर सकती हैं। निर्णय के बाद दोनों में से कोई भी फर्म उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन न करने की बात स्वीकार करती है।

3. कुछ अर्थशास्त्री ऐसा भी मानते हैं कि अल्पाधिकार बाजार संरचना में कठोर कीमत नीति काम करती है। अर्थात् बाजार कीमत में बाजार माँग के अनुसार परिवर्तन नहीं होता है। इस संरचना में कीमत परिवर्तन करना कोई भी फर्म विवेकपूर्ण नहीं मानती है। यदि कोई एक फर्म कीमत बढ़ाने का निर्णय लेती है तो वह फर्म अपने लाभ को कम कर सकती है। यदि दूसरी फर्म कीमत नहीं बदलती है तो पूर्व फर्म को कम माँग का सामना करना पड़ेगा।

प्रश्न 12.
यदि द्वि – अधिकारी का व्यवहार कुर्नोट के द्वारा वर्णित व्यवहार के जैसा हो, तो बाजार माँग वक्र को समीकरण q = 200 – 4p द्वारा दर्शाया जाता है तथा दोनों फर्मों की लागत शून्य होती है। प्रत्येक फर्म के द्वारा संतुलन और संतुलन बाजार कीमत में उत्पादन की मात्रा ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
माँग फलन q = 200 – 4p
जब माँग वक्र एक सीधी रेखा होता है और उत्पादन लागत शून्य होती है तो माँग की आधी पूर्ति करना एकाधिकारी के लिए अधिकतम लाभकारी होता है।

माँग वक्र समीकरण q = 200 – 4p = 200 – 4 × 0 (कीमत स्तर शून्य पर अधिकतम माँग)
फर्म व वस्तु की शून्य इकाइयों की पूर्ति करती है –
फर्म अ के लिए माँग = 200 इकाइयाँ
फर्म अ की आपूर्ति = 2002 इकाइयाँ = 100 इकाइयाँ
फर्म ब के लिए माँग = 200 – 2002
फर्म ब की आपूर्ति = 12 (200 – 2002) = 50 इकाइयाँ
फर्म ब की आपूर्ति 0 से 50 इकाइयाँ तक बदल चुकी है। अतः फर्म अ के लिए माँग = 200 – 50 = 150 इकाइयाँ
अतः फर्म अ आपूर्ति करना चाहेगी 1502 = 75 इकाइयाँ
इन चक्रों का क्रम तब तक जारी रहेगा जब तक दोनों फर्मों की आपूर्ति समान नहीं हो जायेगी। इसकी गणना निम्नलिखित तालिका में की गई है –

इस प्रकार अन्त में दोनों फर्म समान मात्रा की आपूर्ति करेंगी।
आपूर्ति = 2002 – 2004 + 2008 – 20016 + 20032 – 20064 + …………. = 2003
बाजार पूर्ति = फर्म अ आपूर्ति + फर्म ब आपूर्ति = 2003 + 2003 = 4003 इकाइया
कीमत निर्धारण q = 200 – 4p
या 4p = 200 – q
= 200 – 4003 (मूल्य प्रतिस्थापित करने पर)
या = 2003
या p = 2003×4 = 503
प्रत्येक फर्म द्वारा की गई आपूर्ति = 2003 इकाइयाँ
दोनों फर्मों द्वारा की गई पूर्ति = 4003 इकाइयाँ
साम्य कीमत = 503 रु.

प्रश्न 13.
आय अनन्य कीमत का क्या अभिप्राय है? अल्पाधिकार के व्यवहार से इस प्रकार का निष्कर्ष कैसे निकल सकता है?
उत्तर:
अल्पाधिकारी बाजार में वस्तु की कीमत में परिवर्तन मुक्त रूप से माँग में परिवर्तन के अनुसार नहीं होता है। यदि एक फर्म अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से वस्तु की कीमत बढ़ा देती है और दूसरी फर्म ऐसा नहीं करती है। कीमत में वृद्धि के कारण पहली फर्म की वस्तु की माँग अधिक मात्रा में घट जायेगी। इससे इस फर्म के कुल आगम में कमी आ जायेगी। अतः कीमत बढ़ाना किसी भी फर्म के लिए विवेकपूर्ण निर्णय नहीं होगा।

दूसरी ओर यदि कोई फर्म कीमत घटाकर कुल लाभ अधिकतम करना चाहती है और दूसरी फर्म इस निर्ण को चुनौती मानकर कीमत को घटा देती है। इस प्रकार कीमत को घटाकर माँग में वृद्धि की हिस्सेदारी दोनों फर्मों को प्राप्त होगी। तरह कीमत घटाकर माँग में वृद्धि का फायदा इस बाजार में कोई फर्म थोड़े समय के लिए उठा सकती है। दूसरी फर्म द्वारा कीमत घटाने पर फम का कुल आगम भी घटेगा और कुल लाभ में भी कमी आयेगी। इसलिए अल्पाधिकार में कीमत स्थिर पाई जाती है।

Bihar Board Class 12 Economics प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एकाधिकार को परिभाषित करो।
उत्तर:
वह बाजार संरचना जिसमें एक वस्तु का बाजार में एक अकेला विक्रेता होता है, एकाधिकार कहलाती है।

प्रश्न 2.
एकाधिकारी फर्म के कुल आगम वक्र की प्रकृति किस बात पर निर्भर करती है?
उत्तर:
कुल आगम वक्र की प्रकृति औसत आगम पर निर्भर करती है।

प्रश्न 3.
एकाधिकारी फर्म का बाजार माँग वक्र क्या होता है?
उत्तर:
एकाधिकारी फर्म का औसत आगम वक्र ही फर्म का माँग वक्र होता है।

प्रश्न 4.
एकाधिकारी फर्म द्वारा पूर्ति की गई वस्तु की कीमत का निर्धारण किस पर निर्भर होता है?
उत्तर:
एकाधिकारी फर्म द्वारा पूर्ति की गई वस्तु की मात्रा के आधार पर वस्तु की कीमत का निर्धारण होता है।

प्रश्न 5.
वह शर्त लिखो जिससे वस्तु बाजार एकाधिकार संरचना रखता है।
उत्तर:
वस्तु बाजार की संरचना एकाधिकारी होती है यदि उस बाजार में केवल एक विक्रेता हो, वस्तु की कोई निकट प्रतिस्थापन वस्तु न हो तथा बाजार बाजार में नई फर्म के प्रवेश पर प्रतिबंध हो।

प्रश्न 6.
सीमांत आगम वक्र की स्थिति और माँग वक्र के ढाल में क्या संबंध होता है?
उत्तर:
ऋणात्मक ढाल वाला माँग वक्र जितना अधिक ढाल होता है सीमांत आगम वक्र उतना ही नीचे होता है।

प्रश्न 7.
औसत आगम वक्र कब नीचे गिरता है?
उत्तर:
जब सीमांत आगम औसत आगम से कम होती है तब औसत आगम वक्र नीचे गिरता है।

प्रश्न 8.
कुल आगम वक्र का आकार क्या होगा यदि माँग वक्र ऋणात्मक ढाल वाली सीधी रेखा है?
उत्तर:
माँग ऋणात्मक ढाल वाली रेखा होने पर कुल आगम वक्र उल्टे परवलय की तरह का होता है।

प्रश्न 9.
कुल आगम से औसत आगम वक्र की गणना किस प्रकार की जाती है?
उत्तर:
उत्पादन के किसी भी स्तर पर कुल आगम वक्र पर स्थित संबंधित बिन्दु से मूल बिन्दु को मिलाने वाली रेखा के ढाल के आधार पर औसत आगम की गणना की जाती है।

प्रश्न 10.
कुल आगम से सीमांत आगम ज्ञात करने की विधि लिखो।
उत्तर:
उत्पादन के किसी भी स्तर कुल आगम वक्र के संबंधित बिन्दु से स्पर्श खींची गई, स्पर्श रेखा के द्वारा सीमांत आगम की गणना की जाती है।

प्रश्न 11.
साम्य कीमत किससे प्राप्त होती है?
उत्तर:
वह माँग वक्र जिससे साम्य मात्रा प्राप्त होती है साम्य कीमत प्रदान करता है।

प्रश्न 12.
साम्य मात्रा की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
साम्य कीमत पर खरीदी व बेची गई मात्रा को साम्य मात्रा कहते हैं।

प्रश्न 13.
यदि फर्म की लागत शून्य हो तो एकाधिकारी फर्म द्वारा आपूर्ति की गई मात्रा कितनी होती है?
उत्तर:
साम्य की अवस्था में पूर्ति की गई मात्रा उस बिन्दु पर प्राप्त होती है जहाँ सीमांत आगम शून्य होती है।

प्रश्न 14.
प्रतियोगी फर्म द्वारा पूर्ति की गई साम्य मात्रा किस प्रकार प्राप्त होती है?
उत्तर:
प्रतियोगी फर्म द्वारा पूर्ति की गई साम्य मात्रा उस बिन्दु पर प्राप्त होती है जहाँ औसत आगम शून्य होती है।

प्रश्न 15.
वस्तु बाजार में अल्पाधिकार की स्थिति कब उत्पन्न होती है?
उत्तर:
जब कम संख्या में फर्म एक समान वस्तु का उत्पादन करती है।

प्रश्न 16.
अपूर्ण प्रतियोगी बाजार में दीर्घकाल में लाभ का स्तर क्या होता है?
उत्तर:
अपूर्ण प्रतियोगी वस्तु बाजार में दीर्घकाल में लाभ का स्तर शून्य होता है।

प्रश्न 17.
अपूर्ण प्रतियोगी वस्तु बाजार में फर्म का लाभ शून्य क्यों होता है?
उत्तर:
अपूर्ण प्रतियोगी बाजार में फर्मों का प्रवेश स्वतंत्र होता है। फर्मों की संख्या बढ़ने पर अल्पकाल फर्मों के बीच पूर्ण प्रतियोगिता हो जाती है इसलिए लाभ का स्तर शून्य हो जाता है।

प्रश्न 18.
पूर्ण प्रतियोगिता एवं अपूर्ण प्रतियोगिता के अल्पकालीन साम्य की तुलना करो।
उत्तर:
अल्पकाल में अपूर्ण प्रतियोगिता में पूर्ण प्रतियोगिता की तुलना में उत्पादन मात्रा कम व कीमत ऊँची होती है।

प्रश्न 19.
वस्तु बाजार में एकाधिकार प्रतियोगिता उत्पन्न होने का कारण लिखो।
उत्तर:
वस्तु विभेद के कारण एकाधिकार प्रतियोगिता वस्तु बाजार में उत्पन्न होती है।

प्रश्न 20.
कौन से बाजार में दीर्घकाल में भी लाभ का धनात्मक स्तर प्राप्त होता है?
उत्तर:
एकाधिकार में दीर्घकाल में भी लाभ का धनातमक स्तर होता है।

प्रश्न 21.
एकाधिकारी फर्म के संतुलन को परिभाषित करो।
उत्तर:
सीमांत आगम वक्र जहाँ सीमांत लागत वक्र को काटता है उसे फर्म का संतुलन बिन्दु कहते हैं।

प्रश्न 22.
एकाधिकार प्रतियोगिता की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
वह बाजार संरचना जिसमें अनेक क्रेता व विक्रेता होते हैं। विभिन्न फर्म विभेदीकृत वस्तु को बेचती हैं, फर्मों का प्रवेश स्वतंत्र होता है, एकाधिकार प्रतियोगिता कहलाती है।

प्रश्न 23.
पूर्ण प्रतियोगिता की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
वह बाजार संरचना जिसमें विशाल संख्या में क्रेता व विक्रेता होते हैं, सभी विक्रेता समांगी वस्तु बेचते हैं, फर्मों का प्रवेश व गमन स्वतंत्र होता है।

प्रश्न 24.
बाजार की परिभाषा दो।
उत्तर:
वह संरचना जिसमें वस्तु के क्रेता व विक्रेता निकट संपर्क में रहकर विनिमय का कार्य करते हैं, बाजार कहलाती है।

प्रश्न 25.
जब सीमांत आगम का मूल्य धनात्मक हो तो माँग की लोच क्या होती है?
उत्तर:
जब सीमांत आगम का मूल्य धनात्मक होता है तो माँग लोचदार होती है।

प्रश्न 26.
एकाधिकारी फर्म के लिए माँग कब बेलोचदार हो जाती है?
उत्तर:
जब सीमांत आगम का मूल्य ऋणात्मक होता है तो एकाधिकारी फर्म के लिए माँग बेलोचदार होती है।

प्रश्न 27.
उस बाजार का नाम लिखो जिसमें फर्म स्वयं ही उद्योग होती है?
उत्तर:
एकाधिकार वह बाजार है जिसमें फर्म स्वयं ही उद्योग होती है।

प्रश्न 28.
समांगी वस्तु की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
समांगी उत्पाद से अभिप्राय उद्योग की सभी फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तु शक्ल, आकार, स्वाद आदि गुणों में एक समान हों।

प्रश्न 29.
विभेदीकृत वस्तु की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
विभेदीकृत उत्पाद से अभिप्राय उद्योग की विभिन्न फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तुएँ जो ‘शक्ल, आकार, स्वाद आदि गुणों में भिन्न हों।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कुल आगम वक्र से औसत आगम ज्ञात करने की विधि लिखो।
उत्तर:
ज्यामितीय रूप से औसत आगम का मूल्य उत्पाद के किसी भी स्तर पर कुल आगम वक्र से ज्ञात किया जा सकता है। इसकी विधि नीचे लिखी गई है –

  1. कुल आगम वक्र (TR) खींचिए।
  2. उत्पाद का कोई भी स्तर लेकर क्षैतिज अक्ष से लम्ब खींचो।
  3. क्षैतिज अक्ष से लम्ब कुल आगम वक्र को जिस बिन्दु पर काटता है उसको a लिखो।
  4. बिन्दु a को मूल बिन्दु से मिलाओ।
  5. किरण Oa का ढाल ही औसत आगम होता है।

प्रश्न 2.
अन्य बाजार संरचनाओं की तुलना में एकाधिकारी फर्म के साम्य निर्धारण की विभिन्नता की मान्यताएँ लिखिए।
उत्तर:
एकाधिकारी फर्म की मान्यताएँ –

  1. माँग पक्ष की तरफ से बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता है। इसका अभिप्राय है कि उपभोक्ता इस बाजार में कीमत स्वीकारक होते हैं।
  2. वस्तु के उत्पादन में प्रयुक्त साधन बाजार में माँग पक्ष व पूर्ति पक्ष दोनों पूर्ण प्रतियोगिता होती है।

प्रश्न 3.
वे शर्ते लिखो जिनके आधार पर पूर्ण प्रतियोगी बाजार की संरचना का अनुमान लगाया जाता है।
उत्तर:
वह बाजार संरचना जो निम्नलिखित शर्तों को पूरा करती है, पूर्ण प्रतियोगी बाजार कहलाता है –

  1. इस बाजार में एक वस्तु के क्रेताओं एवं विक्रेताओं की भारी संख्या होती है। एक फर्म द्वारा पूर्ति की मात्रा कुल बाजार पूर्ति की तुलना में नगण्य होती है। इसी प्रकार एक उपभोक्ता की वस्तु के लिए माँग बाजार माँग की तुलना में नगण्य होती है।
  2. बाजार में फर्मों को प्रवेश व बाहर जाने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।
  3. उद्योग में सभी फर्मों का उत्पाद समांगी होता है। दूसरे उद्योग की कोई फर्म प्रतियोगी वस्तु की पूर्ति नहीं करती है।
  4. क्रेता व विक्रेताओं को उत्पाद व उसकी कीमत की पूर्ण जानकारी होती है।

प्रश्न 4.
एकाधिकारी फर्म के लिए कुल आगम वक्र सीधी रेखा नहीं होता इसकी आकृति माँग वक्र की आकृति पर निर्भर करती है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कुल आगम वक्र बेची गई मात्रा का फलन होता है।
TR = p × q माँग फलन …………….. (i)
q = a – bp ………… (ii)
सभी (i) व (ii) से
TR = p(a – bp)
= ap – bp2
अतः एकाधिकारी फर्म का कुल आगम द्विघात समीकरण है जिसका वर्ग वाला पद ऋणात्मक है। इस प्रकार की समीकरण का चित्र उल्टा परवलय होता है। इसे नीचे चित्र में दर्शाया गया है –

प्रश्न 5.
एकाधिकारी फर्म की कीमत बेची गई मात्रा का घटता हुआ फलन है, संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
एकाधिकारी फर्म उत्पाद की अधिक मात्रा की बिक्री कीमत घटाकर ही कर सकती है। दूसरी ओर उत्पाद की कम मात्रा बेचकर फर्म ऊँची प्राप्त कर सकती है। इस प्रकार एकाधिकारी बाजार कीमत पूर्ति की गई मात्रा पर निर्भर करती है। इसलिए एकाधिकारी के लिए कीमत बेची गई मात्रा का घटता प्रतिफल होता है। बाजार माँग वक्र आपूर्ति की गई विभिन्न मात्राओं के लिए उपलब्ध बाजार कीमत को दर्शाता है। एकाधिकार फर्म का माँग वक्र ही बाजार माँग वक्र होता है।

प्रश्न 6.
एकाधिकारी फर्म के संतुलन को समझाइए जब फर्म को लागत वहन करनी पड़ती है।
उत्तर:
फर्म की कुल आगम एवं कुल लागत के अंतर को लाभ कहते हैं। कुल आगम वक्र व कुल लागत वक्र के मध्य ऊर्ध्वाधर अंतर एकाधिकारी फर्म के लाभ को दर्शाता है। जब कुल लागत वक्र कुल आगम वक्र से ऊपर स्थित होता है तो इसका अभिप्राय है कि कुल लागत, कुछ आगम से अधिक है। अर्थात् फर्म को ऋणात्मक लाभ या हानि हो रही है।

जिस उत्पादन स्तर पर कुल आगम वक्र, कुल लागत वक्र से ऊपर होता है तो कुल आगम, कुल लागत से अधिक होती है। इसका अभिप्राय है फर्म को लाभ प्राप्त हो रहा है। एकाधिकारी फर्म हमेशा उस उत्पाद स्तर तक उत्पादन करती है जहाँ लाभ अधिकतम होता है। यह उत्पादन स्तर वह स्तर होता है जिस पर कुल आगम वक्र व कुल लागत वक्र के बीच ऊर्ध्वाधर दूरी अधिकतम होती है। फर्म का लाभ उल्टे परवलय द्वारा दर्शाया जाता है।

उत्पादन स्तर Oq2 से कम स्तर फर्म को हानि होती है।
उत्पादन स्तर 0q2 से 0q3 के मध्य फर्म को लाभ प्राप्त होता है।
उत्पादन स्तर Oq0 पर अधिकतम लाभ प्राप्त होगा। फर्म उत्पादन स्तर Oq0 कीमत स्तर पर वस्तु का विक्रय करेगी।

प्रश्न 7.
शून्य लागत की स्थिति में एकाधिकारी फर्म के अल्पकालीन संतुलन को समझाइए।
उत्तर:
एकाधिकारी फर्म स्टॉक नहीं बनाती है। यह फर्म जितना उत्पादन करती है उतनी ही मात्रा में बाजार में बेच देती है। कुल आगम व कुल लागत के अंतर को लाभ कहते हैं।
लाभ = कुल आगम – कुल लागत लाभ = कुल आगम (कुल लागत 30) कुल लाभ जब अधिकतम होता है जब फर्म का कुल आगम अधिकतम होता है। जिस उत्पाद स्तर पर कुल आगम अधिकतम होता है उसे साम्य उत्पादन स्तर तथा उस उत्पाद स्तर की कीमत को साम्य कीमत कहते हैं।

प्रश्न 8.
एकाधिकारी फर्म के लिए औसत आगम व सीमांत आगम में संबंध लिखों उत्तर-औसत आगम एवं सीमांत आगम में संबंध –

  1. उत्पादन के सभी स्तरों पर सीमांत आगम वक्र औसत आगम वक्र के नीचे स्थित रहता है।
  2. यदि औसत आगम वक्र अधिक ढालू होता है तो सीमांत आगम वक्र तथा औसत आगम वक्र में ज्यादा अंतर होता है।
  3. यदि औसत आगम वक्र कम ढालू होता है तो सीमांत आगम वक्र तथा औसत आगम वक्र के मध्य अंतर कम होता है।

प्रश्न 9.
एकाधिकारी फर्म के लिए सीमांत आगम तथा माँग लोच में संबंध लिखो।
उत्तर:
एकाधिकारी फर्म के लिए सीमांत आगम तथा कीमत माँग लोच में संबंध –

  1. जब सीमांत आगम का मान धनात्मक होता है तो माँग की कीमत लोच इकाई से अधिक होती है।
  2. जब सीमांत आगम का मान ऋणात्मक होता है तो माँग की कीमत लोच इकाई से कम होती है।
  3. जब सीमांत आगम का मूल्य शून्य होता है तो कीमत माँग, लोच इकाई के बराबर होती है।

प्रश्न 10.
अपूर्ण प्रतियोगी बाजार संरचनाओं के नाम लिखो तथा पूर्ण प्रतियोगी बाजार की दीर्घकाल में अधिकतम लाभ की शर्त लिखो।
उत्तर:
अपूर्ण प्रतियोगी बाजार संरचनाओं के नाम –

  1. एकाधिकार
  2. अपूर्ण प्रतियोगिता तथा
  3. अल्पाधिकार

पूर्ण प्रतियोगी बाजार संरचना की दीर्घकाल में लाभ की शर्त-वस्तु की कीमत तथा दीर्घकाल सीमांत लागत दोनों बराबर होनी चाहिए। यह फर्म का दीर्घकाल औसत आगम तथा दीर्घकाल सीमांत लागत दोनों बराबर हों।

प्रश्न 11.
एकाधिकार के बारे में कुछ आलोचनात्मक विचार लिखो।
उत्तर:
1. यह माना जाता है कि एकाधिकारी फर्म उपभोक्ताओं की लागत पर लाभ कमाती है। एकाधिकारी फर्म दीर्घकाल में भी लाभ कमाती है। उपभोक्ता भुगतान ज्यादा करते हैं और संतुष्टि कम प्राप्त करते हैं। कुछ अर्थशास्त्री ऐसा भी मानते हैं कि व्यवहार में एकाधिकारी फर्म नहीं होती है क्योंकि सभी वस्तुओं का प्रतिस्थापन इस या उस वस्तु से हो जाता है।

अतः सभी फर्मों को उपभोक्ताओं के हाथ से आय प्राप्त करने के लिए प्रतियोगिता करनी पड़ती है। प्रत्येक अर्थव्यवस्था स्थैतिक होने की बजाय गतिशील होती है इसलिए शुद्ध एकाधिकारी फर्म भी प्रतियोगिता से नहीं बचती है। नई खोजों व तकनीक के प्रयोग से उत्पादित नई वस्तुओं के कारण एकाधिकारी फर्म को प्रतियोगिता के लिए बाध्य कर सकती है।

2. एकाधिकार के बारे में दूसरा पक्ष भी है। कुछ अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि एकाधिकारी समाज के लिए भी उपयोगी हो सकता है। एकाधिकारी फर्म को अधिक लाभ प्राप्त होता है। अतः यह फर्म अनुसंधान व विकास के लिए अधिक कोष जुटा सकती है। प्रतियोगी फर्मों के अनुसंधान व विकास कार्यों के लिए फंड जुटाना मुश्किल होता है। आर्थिक समृद्धता के कारण एकाधिकारी उन्नत एवं आधुनिक उत्पादन तकनीक का प्रयोग करके उत्पादन लागत को कम कर सकती है। कम उत्पादन लागत वाले उत्पाद को यह प्रतियोगिता की तुलना में नीची कीमत पर उपभोक्ताओं को बेच सकती है।

प्रश्न 12.
औसत व सीमांत आगम तथा औसत व सीमांत लागत वक्रों सहायता से एकाधिकारी फर्म के साम्य को समझाइए।
उत्तर:

उत्पादन स्तर Oq0 से कम पर MR का मान MC से अधिक है। इसका अभिप्राय है प्रत्येक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन से फर्म को अतिरिक्त लाभ प्राप्त होगा। फर्म उस स्तर तक उत्पादन बढ़ाने का प्रयास करती है जब तक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन से फर्म के अतिरिक्त लाभ में बढ़ोतरी होती है। उत्पादन स्तर बढ़ाने का सिलसिला Oq0 उत्पाद स्तर बंद हो जायेगा क्योंकि इस उत्पादन स्तर पर MR व MC समान हैं।

उत्पादन बढ़ाने से अतिरिक्त लाभ में वृद्धि नहीं होगी। उत्पादन स्तर Oq0 से अधिक पर MR, MC से कम रह जाती है। इसका अभिप्राय है कि उत्पादन से फर्म को हानि होगी। अतः फर्म उत्पादन स्तर को घटाने का प्रयास करेगी जब तक फर्म की हानि शून्य हो जाए या फर्म की MR व MC समान हो जाए। अतः उत्पादन स्तर Oq0 साम्य उत्पादन स्तर है। इस स्तर पर फर्म का लाभ अधिकतम होगा। लाभ उस बिन्दु पर अधिकतम होता है जहाँ MC व MR दोनों समान होते हैं और MC ऊपर की ओर उठती हुई होती है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित का अर्थ लिखो –
(a) विक्रय लागते
(b) विज्ञापन लागतें तथा
(c) विश्वासोत्पादक विज्ञापन
उत्तर:
(a) विक्रय लागत:
एकाधिकार प्रतियोगी संरचना वाले बाजार में विभिन्न फर्मे विभेदीकृत वस्तु का उत्पादन करती हैं। सभी फर्मों की वस्तुएँ एक-दूसरे के लिए निकट प्रतियोगी होती हैं। अत: प्रत्येक फर्म को अपना उत्पाद उपभोक्ताओं के बीच लोकप्रिय बनाने की बहुत आवश्यकता पड़ती है। उत्पाद को उपभोक्ताओं के मध्य लोकप्रिय बनाने अथवा अधिक संख्या में उपभोक्ताओं को उत्पाद की ओर आकर्षित करने के लिए किए गए व्यय को विक्रय लागत कहते हैं।

(b) विज्ञापन लागत:
दूरदर्शन, रेडियो, समाचार पत्रों, मैग्जीन, हैण्ड बिल, पोस्टर आदि के माध्यम से उत्पाद को प्रचारित करने पर किया गया व्यय विज्ञापन लागत कहलाता है।

(c) विश्वासोत्पादक विज्ञापन:
यदि कोई फर्म अधिक क्रय शक्ति वाले उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए खर्च करती है तो इन्हें चित्त आकर्षक लागतें या विश्वासोत्पादक विज्ञापन कहते हैं। इस प्रकार के विज्ञापन किसी नामीगिरामी व्यक्तित्व (खिलाड़ी/कलाकार/संगीतकार) के माध्यम से दिए जाते हैं।

प्रश्न 14.
एकाधिकारी बाजार में औसत आगम तथा सीमांत आगम में क्या संबंध होगा?
उत्तर:
एकाधिकारी बाजार संरचना में फर्म का माँग वक्र ही बाजार माँग वक्र होता है। एकाधिकारी को वह कीमत स्वीकार करनी पड़ती है जिसे उपभोक्ता चुकाने को तैयार होते हैं। दूसरे शब्दों में, एकाधिकारी फर्म उस कीमत पर आपूर्ति करती है जिस पर उपभोक्ता अधिकतम माँग करते हैं। अत: एकाधिकारी फर्म का माँग वक्र ऋणात्मक ढाल का होता है।

फर्म की औसत आगम सदैव कीमत के समान इसलिए होती है क्योंकि औसत आगम वक्र भी ऋणात्मक ढाल वाला होता है। फर्म वस्तु की कीमत घटाकर ही कुल आगम बढ़ोतरी कर सकती है। अतः प्रत्येक अतिरिक्त इकाई के विक्रय से कुल आगम में बढ़ोतरी घटती दर से होती है या सीमांत आगम भी ऋणात्मक ढाल का होता है। सीमांत आगम वक्र सदैव औसत वक्र से नीचे रहता है।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित की परिभाषा लिखो –
(a) असामान्य लाभ तथा
(b) असामान्य हानि। पूर्ण प्रतियोगिता में उपरोक्त दोनों का फर्मों की संख्या पर प्रभाव भी लिखो।
उत्तर:
असामान्य लाभ-जब फर्म को वस्तु के विक्रय से प्राप्त कुल आगम, उसकी कुल लागत से अधिक होता है तो फर्म को असामान्य लाभ प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में वस्तु के उत्पादन में आयी कुल लागत पर उसके विक्रय से प्राप्त कुल आगम के अधिशेष को असामान्य लाभ कहते हैं। असामान्य लाभ की स्थिति में पूर्ण प्रतियोगी बाजार में फर्मों की संख्या बढ़ती है जब तक असामान्य लाभ समाप्त होकर सामान्य लाभ की स्थिति उत्पन्न नहीं होती है।

असामान्य हानि-जब फर्म को वस्तु के विक्रय से प्राप्त कुल आगम, उसकी कुल लागत से कम होता है तो फर्म को हानि होती है। हानि को ऋणात्मक लाभ भी कहते हैं। असामान्य हानि की स्थिति में पूर्ण प्रतियोगी बाजार संरचना में फर्मों की संख्या में कमी आती है। यह कभी उस समय तक जारी रहती है जब जक हानि, शून्य लाभ में नहीं बदल जाती।

प्रश्न 16.

  1. दीर्घकालिक प्रतियोगी संतुलन में सीमांत लागत और औसत लागत का संबंध लिखो तथा इस बिन्दु पर कीमत और सीमांत लागत का संबंध लिखो।
  2. दीर्घकालीन संतुलन की दशा में पूर्ण प्रतियोगी फर्म दीर्घकालीन औसत लागत वक्र के किस बिन्दु पर उत्पादन करेगी?

उत्तर:
1. दीर्घकालीन प्रतियोगी संतुलन में सीमांत लागत और औसत लागत दोनों समान होते हैं और सीमांत लागत ऊपर उठती (बढ़ती) हुई होती है दीर्घकालीन संतुलन या समकारी बिन्दु पर कीमत और सीमांत लागत दोनों समान होते हैं। इस बिन्दु पर सीमांत लागत बढ़ती हुई होती है।
p = MC तथा MC बढ़ रही हो

2. MR > MC तथा MC बढ़ रही हो
उत्तर:
2. MR > MC तथा MC बढ़ रही हो

प्रश्न 17.
बाजारों की संरचना के वर्गीकरण का आधार बताइए।
उत्तर:
बाजार संरचनाओं का वर्गीकरण कई आधार पर किया जाता है। उनमें से कुछ प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं –

  1. वस्तु की प्रकृति-समरूप या वस्तु विभेद।
  2. वस्तु की कीमत-वस्तु की समान या असमान कीमत।
  3. कीमत निर्धारण-कीमत का निर्धारण उद्योग द्वारा, कीमत का निर्धारण फर्म द्वारा अथवा वस्तु की कीमत का निर्धारण फर्म व उद्योग दोनों के द्वारा।
  4. विक्रेताओं की संख्या-बहुत अधिक, बहुत कम, कम या एक विक्रेता।
  5. बाजार का ज्ञान-पूर्ण या अपूर्ण।
  6. माँग वक्र-पूर्ण लोचशील, लोचशील या बेलोचशील।
  7. साधनों की गतिशीलता-पूर्ण गतिशीलता, अपूर्ण गतिशीलता या गतिशीलता का अभाव।
  8. लाभ-सामान्य – या असामान्य लाभ।

प्रश्न 18.
विशुद्ध प्रतियोगिता क्या है? इसकी विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
विशुद्ध प्रतियोगिता की अवधारणा पूर्ण प्रतियोगिता की अवधारणा से संकुचित है। वह बाजार संरचना जिसमें असंख्य विक्रेता एवं क्रेता होते हैं, सभी विक्रेता समरूप वस्तु का विक्रय करते हैं तथा फर्मों को उद्योग में प्रवेश करने व छोड़कर जाने की स्वतंत्रता होती विशुद्ध प्रतियोगिता कहलाती है।

विशुद्ध प्रतियोगिता के लक्षण –
1. फर्मों की अधिक संख्या:
इस बाजार संरचना में क्रेता व विक्रेताओं की बहुत अधिक संख्या होती है। एक विक्रेता, कुल बाजार पूर्ति की तुलना वस्तु की नगण्य मात्रा की पूर्ति करती है इसलिए एक फर्म वस्तु की बाजार कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती है।

2. समरूप:
इस प्रतियोगिता में विभिन्न फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तु समरूप होती है। दूसरे उद्योग में उत्पादित वस्तु/वस्तुओं से एक उद्योग में उत्पादित वस्तु से प्रतिस्थापन नहीं किया जा सकता है। समरूप वस्तु होने के कारण इस बाजार में वस्तु की कीमत समान होती है।

3. फर्मों का उद्योग में प्रवेश व गमन:
इस बाजार में लाभ से प्रभावित होकर कोई भी नई फर्म प्रवेश कर सकती है इसी प्रकार हानि उठाने वाली फर्म बाजार छोड़कर जाने के लिए स्वतंत्र होती है।

प्रश्न 19.
एकाधिकारी प्रतियोगी फर्म का माँग वक्र लोचदार क्यों होता है?
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतियोगी फर्म का माँग वक्र लोचदार होने के कारण –
1. विक्रेताओं की अधिक संख्या:
इस बाजार में छोटे-छोटे विक्रेताओं की अधिक संख्या होती है। एक विक्रेता कुल बाजार पूर्ति का थोड़ा भाग ही पूर्ति करता है। वह बाजार को ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाता है।

2. निकट प्रतियोगी वस्तुएँ:
एकाधिकार प्रतियोगी बाजार विभिन्न फर्म विभेदित वस्तु का उत्पादन करती है परंतु उनकी वस्तुएं एक-दूसरे की निकट प्रतिस्थापक होती है। निकट प्रतिस्थापन्नता के कारण इस बाजार में मांग वक्र लोचशील होता है।

प्रश्न 20.
दो फर्मों के विलय से दक्षता में वृद्धि कैसे संभव है? समझाइए।
उत्तर:
प्रतियोगिता से बचने के लिए या अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए कभी-कभी दो या अधिक फर्म अपने निजी अस्तित्व को कायम रखते हुए उत्पादन की मात्रा व कीमत नीति से इस प्रकार से समन्वय करती हैं कि उनके निर्णय एक फर्म द्वारा लिए गए निर्णय प्रतीत होते हैं। इस प्रक्रिया को फर्मों का विलय कहते हैं। विलय होने के बाद इनकी गतिविधियों का संचालन एकाधिकारी फर्म की तरह होता है। विलय के बाद फर्म विशिष्ट सेवाओं का उपयोग कर सकती है। उनमें नई खोज या विकास की भावना बढ़ जाती है। एकता के कारण उपभोक्ताओं से ऊँची कीमत वसूल सकती है।

प्रश्न 21.
पेटेन्ट अधिकारों का अनुमोदन किस ध्येय से किया जाता है?
उत्तर:
पेटेन्ट अधिकारों का अनुमोदन निम्नलिखित ध्येयों से किया जाता है –

  1. पेटेन्ट अधिकार का अनुमोदन होने पर पेटेन्ट काल में केवल पेटैन्ट अधिकार प्राप्त फर्म वस्तु का उत्पादन/तकनीक का प्रयोग कर सकती है। इससे वस्तु बाजार या उत्पादन तकनीक के क्षेत्र में फर्म का एकाधिकार हो जाता है । एकाधिकार के कारण फर्म उत्पाद के लिए ऊँची कीमत प्राप्त कर सकती है और उसे असामान्य लाभ प्राप्त हो सकता है।
  2. पेटेन्ट अधिकार से फर्मों में नए उत्पाद या नई उत्पादन तकनीक खोजने की प्रवृत्ति प्रबल होती है। इससे आर्थिक विकास को गति प्राप्त होती है।
  3. उत्पादन लागत घटाने वाली तकनीक के प्रयोग से क्रेताओं को सस्ती कीमत पर भी वस्तु प्राप्त हो सकती है।

प्रश्न 22.
पेटेन्ट अधिकार क्या होते हैं? पेटेन्ट का जीवन काल क्या होता है?
उत्तर:
पेटेन्ट अधिकार-इस अधिकार के माध्यम से कानूनी तौर पर यह घोषणा होती है कि जिस फर्म/कंपनी ने नए उत्पाद या नई तकनीक की खोज की है केवल वे फर्म या उससे अनुमति प्राप्त फर्म ही उस वस्तु का उत्पादन या उस उत्पादन तकनीक का प्रयोग कर सकती है। किसी अन्य फर्म के लिए ऐसे उत्पाद या तकनीक का प्रयोग गैर कानूनी करार कर दिया जाता है। पेटेन्ट का कोई सुनिश्चित जीवन काल नहीं होता है। एक पेटेन्ट से दूसरे पेटेन्ट का जीवन काल भिन्न हो सकता है। फिर भी पेटेन्ट का जीवन काल कुछ वर्षों का होता है या जितने वर्ष के लिए फर्म या कंपनी को पेटेन्ट अधिकार प्राप्त होता है उसे पेटेन्ट काल कहते हैं।

प्रश्न 23.
पूर्ण प्रतियोगिता एवं विशुद्ध प्रतियोगिता में अंतर लिखो।
उत्तर:

पहली तीन विशेषताएँ पूर्ण प्रतियोगिता एवं विशुद्ध प्रतियोगिता के लिए समान होती हैं। अंतिम दो विशेषताएँ केवल पूर्ण प्रतियोगिता के लिए आवश्यक होती हैं विशुद्ध प्रतियोगिता के लिए आवश्यक नहीं होती है।

प्रश्न 24.
अल्पाधिकारी की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
अल्पाधिकार बाजार संरचना की विशेषताएँ –

  1. अल्पाधिकार बाजार में फर्मों की संख्या दो से अधिक परंतु कम होती है।
  2. अल्पाधिकारी फर्म का माँग वक्र अनिश्चित होता है। माँग वक्र की आकृति कोनेदार
  3. अल्पाधिकार में फर्मों में कीमत प्रतियोगिता के अलावा गैर कीमत प्रतियोगिता भी पायी जाती है।
  4. फर्म उत्पादन की मात्रा व कीमत के संबंध में आपसी तालमेल से नीति बनाती है। अथवा तालमेल के अभाव में उनमें कठोर प्रतियोगिता हो जाती है।
  5. प्रत्येक फर्म स्वतंत्र कीमत नीति बना सकती है। परंतु इस नीति को दूसरी फर्मों की नीति को भांपकर ही लागू करने का प्रयास करती है।

प्रश्न 25.
पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म का मांग वक्र पूर्णतया लोचशील क्यों होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी संरचना वाले बाजार में फर्मों की व क्रेताओं की संख्या बहुत ज्यादा होती है। एक फर्म बाजार आपूर्ति का बहुत छोटा (नगण्य) भाग ही आपूर्ति करती है। अतः अकेली फर्म बाजार पूर्ति को प्रभावित नहीं कर सकती है। इसलिए फर्म को उद्योग द्वारा तय की गई कीमत पर ही वस्तु की आपूर्ति करनी है। इस बाजार में सभी फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तु समरूप होती है। वस्तु विभेद के आधार पर भी फर्म वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती है। इसी प्रकार एक क्रेता भी वस्तु की पूर्ति तथा कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता है। अर्थात् पूर्ण प्रतियोगी माँग वक्र पूर्णतया लोचशील होता।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वे विभिन्न कारक समझाइए जो एकाधिकार को जन्म देते हैं।
उत्तर:
एकाधिकार के लिए उत्तरदायी कारक –
1. पेटेन्ट अधिकार:
यदि कोई फर्म किसी उत्पाद या उत्पादन तकनीक को खोजने का दावा पेश करती है और उसके दावे की पुष्टि हो जाती है तो उस फर्म को उस उत्पाद या तकनीक के लिए पेटेन्ट अधिकार स्वीकृत किया जा सकता है। पेटेन्ट अधिकार मिलने पर कोई अन्य फर्म उस उत्पाद या तकनीक का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए नहीं कर सकती है। पेटेन्ट अधिकार से फर्मों को अनुसंधान व विकास के कार्यों की प्रेरणा मिलती है।

2. सरकार द्वारा लाइसेंस (अनुज्ञा पत्र):
यदि सरकार कानून के माध्यम से किसी एक वस्तु के उत्पादन का कार्य एक ही फर्म को सौंप देती है तो अन्य फमैं उस वस्तु बजार में कानून की बाध्यता के कारण प्रवेश नहीं कर सकती है। जैसे अंतर राष्ट्रीय दूरभाषा सेवाएं प्रदान कराने का अधिकार वी.एस.एन.एस. (VSNL) कंपनी को भारत सरकार ने प्रदान किया हुआ है।

3. कारटेल का गठन:
यदि कुछ फर्मों का विलय इस प्रकार से हो जाता है कि वे एकाधिकार के लाभ उठायेंगे तो इस गठन को कारटेल कहते हैं। इसके अन्तर्गत फर्म अलग-अलग उत्पादन इकाई के रूप में कार्य करती हैं परंतु उन सभी का निर्णय एक और सामूहिक होता है। जैसे तेल उत्पादक देशों ने OPEC नामक संगठन बनाया हुआ है जो एकाधिकारी की तरह कार्य करता है।

4. बाजार का आकार:
यदि किसी वस्तु की बाजार का आकार इतना छोटा होता है कि मौजूदा एक फर्म के उत्पादन की भी खपत उसमें नहीं हो पाती है तो अन्य फर्मे उसमें प्रवेश नहीं करती हैं।

5. भारी निवेश:
यदि किसी वस्तु के उत्पादन के लिए भारी निवेश की आवश्यकता पड़ती है तो कम वित्तीय संसाधन वाली फम उस वस्तु बाजार में प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा पाती हैं। आदि।

प्रश्न 2.
रेखाचित्रों की सहायता से पूर्ण प्रतियोगिता एवं एकाधिकार के औसत आगम वक्रों का अंतर समझाइए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत औसत आगम वक्र:
पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत औसत आगम वक्र क्षैतिज अक्ष के समांतर एक सीधी रेखा होती है। प्रतियोगी फर्म उद्योग द्वारा निर्धारित की गई कीमत की स्वीकारक होती है। अर्थात् पूर्ण प्रतियोगी बाजार में वस्तु की कीमत उद्योग तय करता है। दी गई कीमत पर वस्तु की कितनी भी मात्रा फर्म बेच सकती है। बिक्री के प्रत्येक स्तर पर कीमत समान रहने के कारण प्रति इकाई बिक्री से प्राप्त आगम समान रहता है। इसलिए पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत फर्म का औसत आगम वक्र क्षैतिज अक्ष के समांतर होता है।

एकाधिकारी फर्म का औसत आगम वक्र:
एकाधिकारी फर्म के औसत आगम वक्र का ढाल ऋणात्मक होता है। एकाधिकारी फर्म केवल कीमत स्तर को कम करके ही वस्तु की अधिक इकाइयों का विक्रय कर सकती है। निकट प्रतिस्थापन वस्तु न होने के कारण एकाधिकारी द्वारा उत्पादित वस्तु की माँग बेलोचदार होती है। इसलिए औसत आगम वक्र भी बेलोचदार या कम ढाल वाला होता है।

प्रश्न 3.
पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत एक फर्म कीमत स्वीकारक होती जबकि एकाधिकारी फर्म कीमत निर्धारक होती है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत वस्तु की कीमत का निर्धारण बाजार माँग व बाजार पूर्ति के साम्य द्वारा होता है। बाजार में किसी वस्तु के सभी उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं के सामूहिक समूह को उद्योग कहते हैं। दूसरे शब्दों में, बाजार माँग उद्योग की माँग तथा बाजार पूर्ति उद्योग की पूर्ति है। बाजार माँग की तुलना में व्यक्तिगत माँग लगभग नगण्य होती है इसलिए एक उपभोक्ता बाजार माँग को प्रभावित नहीं कर सकता है। इसी प्रकार एक फर्म वस्तु की बाजार पूर्ति को प्रभावित नहीं कर सकती है।

अत: फर्म को उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत स्वीकार करके ही अपना उत्पाद बेचना पड़ता है। इसीलिए पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म को कीमत स्वीकारक कहा जाता है। एकाधिकार में एक वस्तु के उत्पादन पर एक ही फर्म का अधिकार होता है। अकेला विक्रेता होने के कारण फर्म वस्तु की आपूर्ति को पूरी तरह प्रभावित कर सकती है। इसी कारण एकाधिकारी फर्म कीमत निर्धारक होती है। एकाधिकारी फर्म वस्तु की आपूर्ति को प्रभावित करके वस्तु की कीमत को प्रभावित कर सकती है।

प्रश्न 4.
स्वतंत्र प्रवेश व गमन का क्या अभिप्राय है? पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत स्वतंत्र प्रवेश व गमन का बाजार पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
स्वतंत्र प्रवेश व गमन का अभिप्राय है कि कोई भी फर्म उद्योग में स्वतंत्र रूप से प्रवेश कर सकती है और जब चाहे बाजार छोड़कर जा भी सकती है। स्वतंत्र प्रवेश व गमन का बाजार पर प्रभाव –
1. यदि उद्योग में किसी उत्पाद का मूल्य ऊँचा तय कर दिया जाता है तो मौजूदा फर्मों को असामान्य लाभ मिलता है। असामान्य लाभ से आकर्षित होकर नई फमैं बाजार में प्रवेश करेंगी। वस्तु की आपूर्ति में वृद्धि होगी और कीमत का स्तर कम हो जायेगा। फर्मों की संख्या बढ़ने से साधन बाजार में साधनों की माँग बढ़ेगी और साधनों की कीमत भी बढ़ जायेगी। इससे औसत लागत में वृद्धि हो जायेगी। कम कीमत व ऊंची औसत लागत के कारण फर्मों को केवल सामान्य लाभ ही मिल पायेगा।

2. यदि उद्योग में वस्तु की कीमत नीची तय की जाती है तो मौजूदा कुछ फर्मों को हानि उठानी पड़ सकती है। अल्पकाल में फर्म कुछ सीमा तक हानि हो वहन कर सकती है लेकिन दीर्घकाल में हानि की स्थिति में फर्म बाजार छोड़कर चली जाती है। उद्योग में फर्मों की संख्या कम होने से आपूर्ति कम हो जायेगी और वस्तु की कीमत में वृद्धि हो जायेगी। उद्योग को छोड़कर जाने का सिलसिला तब तक जारी रहेगा जब तक मौजूदा सभी फर्मों को सामान्य लाभ नहीं मिलेगा। इस प्रकार मुक्त प्रवेश व गमन का बाजार पर यह प्रभाव होता है कि सभी फर्मों को शून्य लाभ या सामान्य लाभ प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में, शून्य लाभ स्तर पर फर्म संतुलन में होती है। संतुलन की अवस्था LAC, LMC व कीमत समान होते हैं।

प्रश्न 5.
विशेषताओं के आधार पर पूर्ण प्रतियोगिता एवं एकाधिकार में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता तथा एकाधिकार में अंतर:

1. वस्तु की प्रकृति:
पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत सभी फमें समांगी वस्तु का उत्पादन करती हैं। एकाधिकार में वस्तु समांगी हो भी सकती है और नहीं भी।

2. क्रेता-विक्रेताओं की संख्या:
पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत एक वस्तु को बेचने व खरीदने वालों की बहुत विशाल संख्या होती है। जबकि एकाधिकार में एक वस्तु का विक्रय करने वाली केवल एक फर्म होती है लेकिन क्रेता अधिक संख्या में होते हैं।

3. प्रवेश व गमन:
पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत नई फर्म स्वतंत्र रूप से उद्योग में शामिल हो सकती है। उसके प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं होता है। इसी प्रकार हानि उठाने वाली फर्म उद्योग को छोड़कर जाने के लिए भी स्वतंत्र होती है। जबकि एकाधिकार में नई फर्म के प्रवेश पर प्रतिबंध होता है।

4. वस्तु की कीमत:
पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत वस्तु की कीमत का निर्धारण उद्योग द्वारा किया जाता है और उद्योग द्वारा जय की गई कीमत पर फर्म वस्तु का विक्रय करती है। जबकि एकाधिकारी फर्म स्वयं ही कीमत निर्धारक होती है। पूर्ण प्रतियोगिता बिक्री के प्रत्येक स्तर पर कीमत समान रहती है। लेकिन एकाधिकारी कीमत करके ही वस्तु की अधिक मात्रा का विक्रय कर सकता है।

5. आपूर्ति वक्र:
पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत एक फर्म के आपूर्ति वक्र का आंकलन उसकी सीमांत आगम वक्र से किया जाता है। फर्म दी गई कीमत पर उत्पाद का विक्रय करती है इस कीमत पर फर्म केवल उत्पाद की मात्रा में ही समन्वय कर सकती है। जबकि एकाधिकार में फर्म के आपूर्ति वक्र का कोई सुनिश्चित आकार नहीं होता है।

प्रश्न 6.
एकाधिकार एवं एकाधिकारी प्रतियोगिता में अंतर स्पष्ट करो।
उत्तर:

प्रश्न 7.
समझाइए कि दीर्घकाल में निर्बाध प्रवेश/निकासी के कारण एकाधिकारी प्रतियोगी फर्म के असामान्य लाभ शून्य कैसे हो जाते हैं?
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतियोगी बाजार में फर्मों की संख्या पूर्ण प्रतियोगी बाजार की तुलना में कम होती हैं। सभी फर्मे विभेदित वस्तु का उत्पादन करती हैं। अल्पकाल में प्रतियोगिता का स्तर कम होने के कारण एकाधिकारी प्रतियोगी फर्म कुछ अधिक कीमत उत्पादकों से वसूल कर असामान्य लाभ कमाती है। प्रवेश की स्वतंत्रता के कारण नई फर्म असामान्य लाभ से आकर्षित होकर बाजार में प्रवेश करने लगती है। नई फर्मों के प्रवेश से बाजार में फर्मों की संख्या बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप बाजार में वस्तु की आपूर्ति बढ़ने लगती है।

इसके कारण मौजूदा फर्मों में प्रतियोगिता का स्तर बढ़ जाता है। अपने उत्पाद को बेचने के लिए फर्मों को कीमत स्तर घटाना पड़ता है। फर्मों के प्रवेश का क्रम उस स्तर तक चलता है जब तक असामान्य लाभ पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता है। दूसरी ओर यदि प्रतियोगी एकाधिकार बाजार में मौजूदा फर्मों को हानि उठानी पड़ती है तो स्वतंत्रता के कारण वे फर्म बाजार से बाहर होने लगती हैं। उद्योग में फर्मों की संख्या कम होने के कारण मौजूदा फर्मों में प्रतियोगिता का स्तर घटने लगता है। परिणामस्वरूप वस्तु की कीमत बढ़ने लगती है और हानि के स्तर में कमी आ जाती है। फर्मों के बाहर जाने की क्रिया उस समय तक चलती है जब तक हानि समाप्त नहीं हो जाती है।

प्रश्न 8.
एकाधिकारी प्रतियोगिता के लक्षणों को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
एकाधिकारी के लक्षण –
1. क्रेता तथा विक्रेताओं की संख्या:
इस बाजार में फर्मों की संख्या अधिक होती है। एक फर्म कुल उत्पादन के एक छोटे भाग का उत्पादन करती है। इस बाजार में क्रेताओं की संख्या भी अधिक होती है। एक क्रेता बाजार माँग का छोटा हिस्सा ही क्रय करता है।

2. वस्तु विभेद:
एकाधिकारी प्रतियोगी बाजार में सभी फर्म रूप, रंग, आकार, गुणवत्ता. आदि गुणों में अलग-अलग वस्तु का उत्पादन करती हैं। अत: इस बाजार में वस्तु विभेद पाया जाता है।

3. प्रवेश पाने व बाहर जाने की स्वतंत्रता:
इस बाजार में नई फर्मों को बाजार में प्रवेश करने व पुरानी फर्मों को उद्योग से बाहर जाने की स्वतंत्रता होती है। यदि इस बाजार में मौजूदा फर्मों को असामान्य लाभ प्राप्त होता है तो नई फर्म इससे आकर्षित होकर बाजार में प्रवेश कर सकती है। दूसरी ओर यदि फर्मों को हानि होती है तो हानि उठाने वाली फर्म बाजार छोड़कर बाहर जाने के लिए स्वतंत्र होती है।

4. बिक्री लागत:
इस बाजार में वस्तु विभेद होने के कारण बिक्री लागतों का बहुत अधिक महत्त्व होता है। इन लागतों की मदद से एक फर्म अधिक संख्या में उपभोक्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करके लाभ को बढ़ा सकती है।

प्रश्न 9.
पूर्ण प्रतियोगिता तथा एकाधिकारी प्रतियोगिता में अंतर स्पष्ट करो।
उत्तर:

आंकिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसी एकाधिकारी फर्म की MR सारणी नीचे दी जा रही है। उसकी AR तथा TR सारणी बनाइये।

उत्तर:

प्रश्न 2.
प्रौद्योगिकी इस प्रकार की है कि 10 इकाई उत्पादन पर फर्म की दीर्घकालीन औसत लागत न्यूनतम हो जाती है। यह न्यूनतम लागत 15 रुपये है। कल्पना करो कि वस्तु की माँग निम्न सारणी में दी गई है –

  • बाजार में बिक्री की कुल मात्रा क्या होगी तथा दीर्घकाल संतुलन में कितनी फर्म कार्यशील होंगी?
  • माना उत्पादन तकनीक में प्रगति के कारण न्यूनतम औसत लागत 12 रुपये हो जाती है और न्यूनतम लागत संयोजन उत्पाद की 8 इकाइयों पर प्राप्त होता है। अब दीर्घकाल में कितनी फर्म कार्य करेंगी?

उत्तर:
1.

AC = 15
AR = 15 (12000 इकाइयों की माँग पर)
दीर्घकालीन संतुलन की अवस्था में –
AR = AC = 15
फर्मों की संख्या = 120010 फर्म = 120 फर्म
बाजार में बिक्री की मात्रा 12000 इकाइयाँ
बाजार में कार्यशील फर्मों की संख्या = 120 फर्म

2. AC = 12
AR = 12 (1440 इकाइयों की माँग पर)
अतः दीर्घकालीन संतुलन की अवस्था में –
AR = AC = 12
फर्मों की संख्या = 14408 = 180
दीर्घकाल में 180 फर्म कार्य करेंगी।

प्रश्न 3.
एकाधिकारी फर्म का माँग वक्र नीचे सारणी में दिया गया है। इसकी TR,AR तथा MR सारणियाँ बनाओ।

उत्तर:

प्रश्न 4.
निम्नलिखित तालिका से कुल आगम तथा औसत आगम तालिका बनाओ।

उत्तर:

प्रश्न 5.
एक एकाधिकारी फर्म की कुल स्थिर लागत 20 रुपये है। फर्म का माँग वक्र नीचे दिया गया है –

अल्पकालीन साम्य मात्रा, कीमत तथा कुल लाभ ज्ञात करो।
उत्तर:

एकाधिकारी फर्म का अल्पकालीन संतुलन वहाँ होता है जहाँ फर्म को अधिकतम लाभ प्राप्त होता है। तालिका में अधिकतम आगम उत्पादन स्तर 6 पर है।
अल्पकालीन संतुलन उत्पादन स्तर = 6
अल्पकालीन संतुलन कीमत स्तर = 5
कुल लाभ = कुल आगम – कुल लागत
= 30 – 20
= 10
साम्य उत्पादन स्तर = 6
साम्य कीमत = 6
कुल लाभ = 10

प्रश्न 6.
वस्तु की बाजार माँग व कुल लागत एकाधिकारी फर्म के लिए नीचे दिए गए हैं –


निम्नलिखित की गणना करो –

  1. सीमांत आगम व लागत अनुसूची बनाओ।
  2. उत्पाद की वह मात्रा जिस पर MR तथा MC समान हों।
  3. साम्य मात्रा एवं वस्तु की साम्य कीमत।

उत्तर:
1. सीमांत आगम तालिका

2. सीमांत लागत तालिका

3. उत्पादन इकाई 6 के लिए
MR = MC = 4
साम्य कीमत यह स्तर है जिसमें उत्पादन स्तर पर MR = MC

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एकाधिकार के बारे में मान्यता है –
(A) कि एक फर्म उत्पादित वस्तु की मात्रा का स्टॉक नहीं बनाती है
(B) कि एक फर्म उत्पादित सम्पूर्ण मात्रा को विक्रय के लिए पेश करती है
(C) (A) तथा (B) दोनों
(D) (A) तथा (B) में से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) तथा (B) दोनों

प्रश्न 2.
फर्म द्वारा प्राप्त लाभ होता है –
(A) फर्म द्वारा प्राप्त कुल आगम व कुल लागत का अंतर
(B) फर्म द्वारा प्राप्त कुल आगम व कुल लागत का योग
(C) फर्म द्वारा प्राप्त कुल आगम व कुल लागत का गुणनफल
(D) फर्म द्वारा प्राप्त कुल आगम व कुल लागत का भागफल
उत्तर:
(A) फर्म द्वारा प्राप्त कुल आगम व कुल लागत का अंतर

प्रश्न 3.
यदि कुल लागत शून्य होती है तो लाभ अधिकतम होता है जब –
(A) कुल आगम न्यूनतम होता है
(B) कुल आगम अधिकतम होता है
(C) कुल आगम धनात्मक होता है
(D) कुल आगम ऋणात्मक होता है
उत्तर:
(C) कुल आगम धनात्मक होता है

प्रश्न 4.
कुल आगम होता है –
(A) फर्म द्वारा बेची गई मात्रा व औसत आगम का योग
(B) फर्म द्वारा बेची गई मात्रा व औसत आगम का अंतर
(C) फर्म द्वारा बेची गई मात्रा व औसत आगम का गुणनफल
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(C) फर्म द्वारा बेची गई मात्रा व औसत आगम का गुणनफल

प्रश्न 5.
पूर्ण प्रतियोगिता में साम्य स्थापित होता है अधिक मात्रा –
(A) ऊँची कीमत पर बेचकर
(B) कम कीमत पर बेचकर
(C) न तो ऊँची कीमत न ही नीची कीमत पर बेचकर
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(B) कम कीमत पर बेचकर

प्रश्न 6.
यदि कुल लागत वक्र कुल आगम वक्र से ऊपर होता है तो –
(A) लाभ ऋणात्मक होता है और फर्म लाभ कमाती है
(B) लाभ धनात्मक होता है और फर्म लाभ कमाती है
(C) लाभ ऋणात्मक होता है और फर्म को हानि होती है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) लाभ ऋणात्मक होता है और फर्म को हानि होती है

प्रश्न 7.
एकाधिकार का लाभ अधिकतम होता है उस उत्पादन स्तर पर जिस पर –
(A) कुल आगम व कुल लागत वक्रों में से ऊर्ध्वाधर दूरी अधिकतम होती है
(B) कुल आगम वक्र, कुल लागत वक्र से ऊपर होता है
(C) (A) तथा (B) दोनों
(D) (A) तथा (B) में से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) तथा (B) दोनों

प्रश्न 8.
एकाधिकार का लाभ उस उत्पादन स्तर पर अधिकतम होता है जिस पर –
(A) MR = MC तथा MC बढ़ रही हो
(B) MR = MC तथा MC घट रही हो
(C) MR > MC तथा MC बढ़ रही हो
(D) MR > MC तथा MC बढ़ रही हो
उत्तर:
(C) MR > MC तथा MC बढ़ रही हो

प्रश्न 9.
एकाधिकार में उत्पादित की मात्रा का निर्धारण होता है उस कीमत पर जिस पर –
(A) उपभोक्ता खरीदने को तैयार होते हैं
(B) उत्पादक बेचने को तैयार होते हैं
(C) उपभोक्ता प्राप्त करने को तैयार होते है
(D) उत्पादक देने को तैयार होते हैं
उत्तर:
(C) उपभोक्ता प्राप्त करने को तैयार होते है

प्रश्न 10.
पूर्ण प्रतियोगी फर्म होती है –
(A) कीमत निर्धारक
(B) कीमत स्वीकारक
(C) (A) तथा (B) में से कोई नहीं
(D) (A) तथा (B) दोनों
उत्तर:
(B) कीमत स्वीकारक