STUDY METERIAL GEOGRAPHY 19

(अध्ययन सामग्री): भूगोल – विश्व का भूगोल “वर्षा के प्रकार”


   अध्ययन सामग्री: विश्व का भूगोल


वर्षा के प्रकार

बादलों के अन्दर मौजूद पानी या हिम के कण जब पृथ्वी पर गिरने लगते हैं, तो उसे वर्षा कहते हैं । वर्षा तब होती है जब बादलों के भीतर बहुत तेजी के साथ संघनन होने लगता है और हवा इन संगठित कणों के वजन को संभाल नहीं पाती ।

किसी स्थान पर वर्षा का होना निम्न परिस्थितियों पर निर्भर करता है –

  • तापमान, जिस पर जलवाष्प का संघनन होता है तथा
  • बादलों के प्रकार आदि ।
  •  वर्षा के निम्न प्रकार होते हैं

वर्षा के प्रकार –

(1) वर्षा – इसके अन्तर्गत जल की बूंदें गिरती हैं । इन जल की बूंदों का निर्माण संघनन की प्रक्रिया से बनी छोटी-छोटी बूंदों के मिलने से होता है । इन बूँदों का आकार 0.5 मिलीमीटर से 1.5 मिलीमीटर हो सकता है ।
(2) फुहार – जब वर्षा की बूँदों का आकार बहुत ही छोटा (आधे मिलीमीटर से भी कम) होता है, तो ऐसी बूँदों को फुहार कहते हैं । फुहार स्तरीय व कपासी मेघों द्वारा ही होती है ।
(3) सहिम वर्षा – जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है, जब वर्षा की बूँदों के साथ हिम के भी कण गिरने लगते हैं, तो उसे सहिम वर्षा कहा जाता है ।
(4) हिमपात – जब संघनन जमाव विन्दु से नीचे चला जाता है, तब जलवाष्प हिम के छोटे-छोटे कणों में परिवर्तित हो जाते हैं । ये ही छोटे-छोटे कण आपस में मिलकर विभिन्न आकारों में गिरते रहते हैं ।
(5) ओलावृष्टि – यदि वर्षण के फलस्वरूप हिम के कण गोले बन जाएं, तो इसके गिरने को ओले की वृष्टि कहा जाता है । सामान्यतया ये कपासी मेघ के वर्षा से बनते हैं ।
(6) बादल फटना – जब एक ही विशेष प्रकार के आवेश कणों वाले बादल एक जगह पर सघनता से इकट्ठे होते हैं, जिनके एक ओर गर्म तो दूसरी ओर ठंडी हवाएं हों, तो इनके परस्पर दबाव के कारण ही बादल  फट जाते हैं । इस दौरान होने वाली बारिश इतनी ज्यादा होती है कि इसे मापना कठिन हो जाता है । एक घंटे में सौ से दो सौ मिलीमीटर यानी चार से आई इंच तक पानी गिरता है । इस दौरान बारिश की बूंदों का आकार पांच मिलीमीटर से भी बड़ा हो सकता है । ये बूँदें 10 मीटर प्रति सेकंड यानी 36 किलोमीटर प्रति घंटे के रफ्तार से धरती पर गिर सकती हैं । पानी का यही वेग अपने रास्ते में आने वाले घरों-आदमियों को बहा ले जाता है और तबाही का कारण बनता है ।
बादल फटने की घटनाएं अक्सर मानसून के दिनों में ही होती हैं, क्योंकि इसी मौसम में गर्म और ठंडी, दोनों तरह की हवाएं मौजूद होती हैं । ये हादसे अक्सर होते भी पहाड़ी के ऊपर से गुजरने वाली गर्म हवाएं और किसी मैदान या नदी के ऊपर से गुजरने वाली ठंडी हवाएं मिलकर इस प्रक्रिया को जन्म देती हैं । लेकन पहले से सही व सटीक जानकारी दे पाने में मौसम विज्ञानी भी असमर्थ हैं ।

वर्षा की दशाएँ –

स्पष्ट है कि वर्षा गर्म और आर्द्र हवाओं के संघनन से होती है । यह संघनन निम्न तीन विधियों द्वारा सम्पन्न होकर वर्षा करती है –

(i) संवहनीय वर्षा  धरातल के निचले स्तर पर नम हवा उपस्थित रहती हैं । यह हवा गर्म होने पर ऊपर उठकर फैलती है । ऊपर जाने के कारण यह ठण्डी होने लगती है । ठण्डी होने के बाद यह अपनी कुछ आर्द्रता नीचे गिरा देती है, जिसे हम संवहनीय वर्षा के नाम से जानते हैं । इस तरह की वर्षा निम्न अक्षांशों में गर्मी के दिनों में अक्सर होती है । यह अक्सर दिन के सबसे गर्म हिस्से के बाद अल्पकाल किन्तु भारी बौछार के रूप में आती है । इस वर्षा के साथ बादल गरजते हैं और बिजलियाँ कड़कती है  । उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में दोपहर के बाद प्रतिदिन होने वाली वर्षा संवहनीय वर्षा ही होती है ।

(ii)  पर्वतीय वर्षा – वैसे तो आर्द्र हवा निचले धरातल पर रहती है । लेकिन जब इसके मार्ग में कोई पर्वत या कोई अन्य ऊँचा भू-भाग आ जाता है, तो यह आर्द्र हवा उस भू-भाग से टकराकर ऊपर उठने के लिए मजबूर हो जाती है । ऊपर उठने से यह ठण्डी होती है । ठण्डी होने के कारण इसमें संघनन होने लगता है, जिससे जलवाष्प भारी हो जाता है । यही भारी जल वाष्प वर्षा के रूप में पहाड़ों पर गिर जाते हैं।

वर्षा के बाद यह हवा प्रतिपवन (Leeward) दिशा में उतरती है यहाँ यह गर्म होने लगती है । यद्यपि इन गर्म हवाओं में आर्द्रता ग्रहण करने की शक्ति आ जाती है, लेकिन इसे आर्द्रता का स्रोत नहीं मिल पाता । इसी कारण प्रतिपवन दिशा में मौसम गर्म और शुष्क हो जाता है । और ये गर्म हवाएँ पर्वत के दूसरी ओर वर्षा नहीं कर पातीं, जिसे ‘वृष्टि छाया’ प्रदेश, (Rain Shedow Area) कहते हैं । विश्व के अनेक मरुस्थल इसी प्रकार के हैं ।

पर्वतीय वर्षा भी अधिकांशतः संवहनीय प्रकार की ही वर्षा होती है, जिसके अंतर्गत गरज-चमक के साथ वर्षा होती है । भारत में खासी पहाडि़यों की ढलानों पर भारी वर्षा मानसूनी एवं संवहनीय वर्षा के सम्मिलित प्रभाव के कारण होती है ।

(iii)चक्रवाती वर्षा – यह वर्षा निम्न दाब वाले क्षेत्रों में होती है । अत्यधिक दाब के कारण इस क्षेत्र में चारों ओर से हवाएँ आकर एक-दूसरे से मिलती हैं । ऐसी स्थिति में ठण्डी हवा नीचे और गर्म हवा ऊपर आ जाती है । जब ये हवाएँ आपस में मिलती हैं तो एक-दूसरे के क्षेत्रों में प्रवेश करने की कोशिश करती हैं इसी से वर्षा होती है ।
डोलड्रमों पर सामान्यतया चक्रवाती वर्षा ही होती हैं, क्योंकि यहाँ व्यापारिक हवाएँ मिलती हैं । ऊष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में भी चक्रवातों के कारण भारी वर्षा होती है । परन्तु यह वर्षा मात्र कुछ घंटे तक ही जारी रहती है ।

(iv) तूफान – यह स्थानीय प्रकृति का तीव्र तूफान होता है । जब जमीन बहुत अधिक गर्म हो जाती है और हवा में बादलों के बनने के लिए पर्याप्त नमी रहती है, तब वर्षा तूफानी गरज और चमक के साथ होती है । यह स्थिति भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में अक्सर आती है।

वर्षा का वैश्विक स्वरूप

विश्व में वर्षा का पैटर्न बहुत जटिल है इसलिए केवल मोटा पेटर्न ही बनाया जा सकता है । इस पैटर्न को निम्न विन्दुओं में देखना अधिक व्यावहारिक होगा –

  •  भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में सूर्य के सीधे चमकने से तापमान अधिक होता है । वायुमण्डल के शुष्क होने के कारण उसकी नमी धारण करने की क्षमता अधिक बढ़ जाती है । चूँकि यह क्षेत्र विस्तृत समुद्र के निकट है, इसलिए यहाँ की शुष्क हवा में आर्द्रता मिलने लगती है । फलस्वरूप भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में वर्षा सबसे अधिक होती है ।
  •  इसके विपरीत चूँकि ध्रुवों में वायु का तापमान कम रहता है, इसलिए वहाँ वर्षा बहुत कम होती है ।
  •  मध्य अक्षांश की स्थिति इन दोनों के बीच की है । इसके बीच में जो विशाल स्थलीय भाग है, उसमें सामान्यतः अन्तर बढ़ने के साथ-साथ वर्षा कम होती जाती है । जबकि हवाओं की दिशा में मौजूद पर्वत के ढालों पर खूब वर्षा होती है । इसके विपरीत स्थल का क्षेत्र वृष्टि छाया में आ जाता है ।
  •  स्थानीय स्थल की ऊँचाई भी वर्षा को प्रभावित करती है । सामान्य तौर पर दो किलोमीटर ऊँचाई तक ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ वर्षण में भी वृद्धि होती है । लेकिन उसके बाद नहीं । अब चूँकि वायु में ठण्डक अधिक हो जाती है, जिसके कारण उसकी आर्द्रता ग्रहण करने की शक्ति भी कम हो जाती है, इसलिए वर्षा भी कम होने लगती है ।
  •  भूमध्यरेखीय प्रदेश, शीतोष्ण कटिबन्ध के पश्चिमी तट,पूर्वोन्मुखी ढाल तथा मानसूनी क्षेत्रों के तटीय भागों में भारी वर्षा होती है । यहाँ वर्षा 200 सेन्टीमीटर वार्षिक से भी अधिक है ।
  •  ऊष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र के मध्य आन्तरिक भागों में वर्षा अपर्याप्त है, जो 50 से 100 सेन्टीमीटर वार्षिक है ।
  •  वृष्टिछाया वाले प्रदेश, महाद्वीपों के भीतर भाग तथा उच्च अक्षांश निम्न वर्षा के क्षेत्र हैं । यहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेन्टीमीटर से भी कम होती है । ऊष्ण कटिबन्ध में स्थित उप महाद्वीपों के पश्चिम भाग तथा शुष्क मरुस्थल इन्हीं के अन्तर्गत आते हैं ।
  •  कुछ क्षेत्रों में वर्षा कुहरा, धुंध  और ओस के रूप में भी प्राप्त होती है जिसका वनस्पति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है । मरुस्थलों में घना कुहरा वनस्पति का पोषण करता है । भारत के भी कुछ भागों में ओस व धुङ  गेहूँ की फसल का पोषण करते हैं ।