STUDY METERIAL GEOGRAPHY 20

(अध्ययन सामग्री): भूगोल – विश्व का भूगोल “मौसम एवं जलवायु”


   अध्ययन सामग्री: विश्व का भूगोल


मौसम एवं जलवायु

मौसम किसी भी स्थान विशेष के किसी दिन विशेष पर तापमान, हवा तथा वर्षा आदि की दशाओं का बोध कराता है । यह प्रतिदिन बदलता रहता है । रेडियो और दूरदर्शन समाचार में विभिन्न नगरों के मौसम का दैनिक विवरण दिया जाता है ।
जबकि जलवायु विस्तृत क्षेत्र में कई वर्षों की लम्बी अवधि तक पाई जाने वाली दशाओं का औसत होता है । यह प्रतिदिन नहीं बदलता ।

जलवायु का निर्धारण करने वाले तत्त्व

किसी भी स्थान के मौसम एवं जलवायु को निर्धारित करने वाले प्रमुख भौतिक तत्त्व निम्न हैं –

(1) अक्षांश रेखायें – भूमध्य रेखा पर चूँकि सूर्य सीधा चमकता है, इसलिए वहाँ तापमान सबसे अधिक होता है । हम जैसे-जैसे भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने लगती हैं, जिससे तापमान घटता चला जाता है । चूँकि जलवायु पर तापमान का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है, इसलिए इसके निर्धारण में अक्षांश रेखाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है । यह कहना गलत नहीं होगा कि अक्षांश रेखाएं एक प्रकार से धरातल पर तापमान का वितरण करने वाली रेखाएँ हैं ।

(2) समुद्र तल से ऊँचाई – समुद्र तल से ऊँचाई में वृद्धि के साथ-साथ तापमान घटता जाता है । इसका कारण यह है कि जैसे-जैसे हम समुद्र तल से ऊँचे उठने लगते हैं, वैसे-वैसे वहाँ पदार्थों के कणों की मात्रा कम होने लगती है । हम सूर्य के ताप का अनुभव सीधा नहीं करते, बल्कि उस ऊष्मा का अनुभव करते हैं, जिसे ये कण अवशोषित करके वायुमण्डल को गर्म बना देते हैं । चूंकि ऊँचाई पर इन कणों की मात्रा घटती जाती है, इसलिए स्वाभाविक रूप से तापमान भी घटता  जाता है । सामान्यतः देखा गया है कि लगभग 165 मीटर की ऊँचाई पर 1 डिग्री सेन्टीग्रेट तापमान घट जाता है ।

(3) समुद्र से दूर

जो स्थान समुद्र के नजदीक होते हैं, वहाँ के प्रतिदिन के अधिकतम् एवं न्यूनतम तापमान का अन्तर कम होता है । ठीक इसी प्रकार उनके वार्षिक तापमान का भी अन्तर कम होता है । इसे समशीतोष्ण तापमान कह सकते हैं । इसका मूल कारण उस स्थान का समुद्र के निकट होना है, क्योंकि समुद्र से आने वाली हवाएँ नमी से भरी होती हैं, जो स्थल भाग के तापमान को नियंत्रित करने का काम करती हैं । यही कारण है कि मद्रास और मुम्बई के वार्षिक तापमान में अधिक अन्तर नहीं पाया जाता । जबकि दिल्ली का न्यूनतम तापमान तीन डिग्री तथा अधिकतम तापमान 46 डिग्री तक चला जाता है । इसका कारण दिल्ली का समुद्र तट से काफी दूर होना है ।
इसके अतिरिक्त पर्वतों की दिशा समुद्री धाराएँ, उस क्षेत्र में बहने वाली हवाएँ तथा वन भी स्थानीय मौसम एवं जलवायु को प्रभावित करते हैं ।
हवा के चलने से तापमान घटता-बढ़ता है । तीन बड़ी-बड़ी झीलों के कारण भोपाल का मौसम अपने ही 45 किलोमीटर दूर स्थित सीहोर के मौसम से काफी सुहाना हो गया है, क्योंकि झील से चलने वाली हवाएँ भोपाल के स्थल भाग की उष्णता कम कर देती हैं ।गर्म पानी की धारा (Gulf Stream)  के कारण अमेरीका का पूर्वी तट हमेशा गर्म रहता है और ठण्ड के दिनों में भी जमने नहीं पाता ।
वनों के अपनी पत्तियों की आर्द्रता के कारण तापमान को कम कर देते हैं । इसीलिए वनों के ऊपर अधिक वर्षा होती है, क्योंकि उसके ऊपर से गुजरती हुई हवा वनों की नमी प्राप्त करके भारी होकर पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं ।
रेगिस्तानी मिट्टी तापमान को बढ़ा देती है । ठीक यही काम चट्टाने भी करती हैं ।

जलवायु का वर्गीकरण –

तापक्रम के आधार पर पृथ्वी को तीन प्रमुख कटिबन्धों में विभाजित किया गया है । ये कटिबन्ध हैं –

(1) ऊष्ण कटिबन्ध – जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह गर्म प्रदेश है । विषुवत रेखा से ( शून्य अंश अक्षांश ) 23) अंश उत्तर (कर्क रेखा) से लेकर 23) अंश दक्षिण (मकर रेखा) को ऊष्ण कटिबन्ध कहा गया है ।

(2)  शीतोष्ण कटिबन्ध – एक सामान्य वैज्ञानिक तथ्य यह है कि विषुवत रेखा से धु्रवों की ओर तापमान लगातार कम होता है । शीतोष्ण का अर्थ है – शीत $ ऊष्ण; अर्थात् ठण्डा और गर्म दोनों । 23) अंश उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश से लेकर 66) उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वाले भाग को शीतोष्ण कटिबन्ध कहा गया है । यह पृथ्वी के उत्तरी एवं दक्षिणी; दोनों गोलाद्धोª में स्थित है । यहाँ तापक्रम गर्म भी है और ठण्डा भी है ।

(3) शीत कटिबन्ध – 66) अंश उत्तरी एवं उत्तरी अक्षांश से लेकर 90 अंश उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश तक की पट्टी शीत कटिबन्ध के नाम से जानी जाती है । चूँकि इस क्षेत्र में काफी ठण्डक पड़ती है, इसलिए इसका अधिकांश भाग बारहों महीने बर्फ से ढँका रहता है ।
हालाँकि विश्व की जलवायु का निर्धारण करने वाला सबसे प्रमुख कारक तापमान ही है । किन्तु यही एकमात्र कारक नहीं है । जैसा कि बताया जा चुका है, जलवायु के निर्धारण में उस स्थान की समुद्र तल से ऊँचाई, समुद्र से दूरी, हवा और धाराएँ तथा अन्य भौगोलिक स्थितियों का योगदान होता है । अतः केवल तापक्रम के आधार पर जलवायु का वर्गीकरण करना व्यवहारिक नहीं होगा ।
इसलिए इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर प्रसिद्ध भूगोलविद् जी.टी. ट्रिवार्था ने जलवायु वर्गीकरण का मध्य मार्ग निकाला । उन्होंने पृथ्वी पर लगभग 15 प्रकार के जलवायु की पहचान की और उन्हें 6 बड़े समूहों में बाँटा । ट्रिवार्था के द्वारा प्रस्तुत किया गया वर्गीकरण ही आज अधिक मान्य है । इसे हम प्राकृतिक आधार पर किये गये जलवायु का वर्गीकरण कह सकते हैं ।
प्राकृतिक वर्गीकरण के अनुसार जलवायु का विभाजन इस प्रकार है –

(1) ऊष्ण कटिबन्धीय जलवायु –

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस क्षेत्र में ऊष्णता की अधिकता होगी । इस प्रकार की जलवायु विषुवत रेखा से 25 अंश उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश पट्टियों के बीच पाई जाती है ।
इस समूह को निम्न तीन बड़े समूहों में बाँटा गया है, ताकि जलवायु की विभिन्नता की अच्छी तरह पहचान की जा सके –

(i) विषुवत रेखीय जलवायु – विषुवत रेखा के 5 अंश उत्तर और 5 अंश दक्षिण का क्षेत्र इस जलवायु के अन्तर्गत आता है । नक्शे पर देखने से स्पष्ट हो जायेगा कि इसके अन्तर्गत दक्षिण अमेरीका का अमेजन बेसिन, अफ्रीका का कांगो बेसिन, मलेशिया, श्रीलंका और इण्डोनेशिया के कुछ भाग आते हैं ।
चूँकि यहाँ वर्ष भर सूर्य सीधा चमकता है, इसीलिए वर्ष भर भारी वर्षा होती है – लगभग प्रतिदिन दोपहर के बाद । बहुत अधिक गर्मी पड़ती है, इसलिए तूफान भी आते हैं । चूँकि वर्षा बहुत होती है, इसीलिए यहाँ के जंगल घने होते हैं । चूँकि जंगल घने हैं, इसलिए जंगलों में विषैले एवं भयानक जीव-जन्तु पाये जाते हैं । लगातार वर्षा होने के कारण भूमि दलदली हो जाती है । इसलिए ये जंगल आर्थिक रुप से उपयोगी नहीं रह पाते । यहाँ का वार्षिक तापमान 27 डिग्री सेल्सियस तथा वर्षा लगभग 250 सेन्टीमीटर होती है ।

(ii) मानसूनी क्षेत्र
 – चूँकि इन क्षेत्रों में मुख्य वर्षा मानसूनी हवाओं द्वारा होती है इसलिए इसे मानसूनी क्षेत्र कहा गया है । भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांयामार, थाईलैण्ड, अमेजन घाटी, वेस्टइंडीज तथा दक्षिण पूर्वी-एशिया इसके मुख्य क्षेत्र हैं ।
यहाँ भी हालाँकि वर्षा काफी होती है, लेकिन 90 प्रतिशत वर्षा वर्ष के केवल 3-4 महीनों में हो जाती है । गर्मी काफी पड़ती है, और इसी महीने में वर्षा होती है । शीत ऋतु पूर्णतः शुष्क ही होती है ।
यह क्षेत्र आर्थिक रूप से विकसित होने के कारण घनी जनसंख्या वाला क्षेत्र है । कृषि यहाँ का मुख्य व्यवसाय है । इस क्षेत्र की विशेषता को हम भारत की विशेषता के आधार पर अच्छी तरह समझ सकते हैं ।

(iii) सवानातुल्य जलवायु
 – यह जलवायु विषुवत रेखा के दोनों ओर 5 से 15 अंश अक्षांश तक पाई जाती है । वेनेजुएला, कोलम्बिया, थाईलैण्ड, विएतनाम और उत्तरी आस्ट्रेलिया इसके अन्तर्गत आते हैं । ये क्षेत्र जहाँ एक ओर भूमध्य रेखा की तरफ से विषुवत रेखीय घने वनों से घिरे हुए हैं, वहीं धु्रवों की तरफ से शुष्क जलवायु से घिरे हुए हैं ।
सवाना प्रकार की जलवायु की मुख्य विशेषता ऊष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में पाई जाने वाले घास के विशाल मैदान हैं । यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन तथा कृषि है ।

(2) शुष्क जलवायु –

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह सघन जलवायु वाला क्षेत्र है । संसार के बहुत बड़े हिस्से में वर्षा की कमी के कारण शुष्क जलवायु पाई जाती है । मरुस्थलीय एवं स्टेपी जलवायु इसके दो बड़े समूह हैं, जो इस प्रकार हैं –

(i)मरुस्थलीय जलवायु – यह विषुवत रेखा के दोनों ओर 15 से 30 अक्षांश के मध्य पाई जाती है । इसके अन्तर्गत अफ्रीका के सहारा एवं कालाहारी, उत्तरी अमेरीका कोलोरेडो एवं अरिजोना, दक्षिण अफ्रीका का आटाकामा तथा एशिया के अरब देश एवं थार क्षेत्र आते हैं ।

इन क्षेत्रों में गर्मी बहुत होती है, जिसका वार्षिक औसत 38 डिग्री सेन्टीग्रेड है। यहाँ वार्षिक वर्षा बहुत कम – 25 से 40 सेन्टीमीटर के लगभग होती है । यह वर्षा भी कभी-कभी होती है । और जब होती है, तब इसका स्वरूप गर्ज-तर्ज वाला होता है । आसमान का साफ रहना और धूप की अधिकता इस क्षेत्र की विशेषता है। चूँकि यह रेतीला क्षेत्र है, इसलिए दिन अधिक गर्म किन्तु रातें ठण्डी हो जाती हैं । वर्षा की कमी के कारण कँटीली झााडि़याँ पाई जाती हैं । खजूर और ऊँट का दूध यहाँ के मुख्य भोजन हैं ।

(ii) स्टेपी जलवायु –  यह विषुवत रेखा के उत्तर एवं दक्षिण में मरुस्थल एवं आर्द्र जलवायु के बीच स्थित एक पट्टी है । अरेबिया, दक्षिण आस्ट्रलिया एवं दक्षिणी ईरान, उत्तर-पश्चिम मैक्सिको और उत्तर-पश्चिमी भारत इसके अन्तर्गत आते हैं ।
इन क्षेत्रों में औसत वार्षिक तापमान 21 सेन्टीग्रेड होता है और वार्षिक वर्षा कम होती है । ठण्ड के दिनों में यहाँ चक्रवात आते हैं । शीत ऋतु में अधिक ठण्ड और गर्मी की ऋतु में ज्यादा गर्मी यहाँ की विशेषता है । घास यहाँ की मुख्य प्राकृतिक वनस्पति है । स्वाभाविक है कि ऐसे में पशुपालन ही यहाँ का मुख्य व्यवसाय होगा ।

(3) भूमध्यसागरीय जलवायु 

यह जलवायु 30 अंश से 40 अंश अक्षांश के बीच महाद्वीपों के पश्चिमी भाग में पाई जाती है । जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसका विस्तार भूमध्य सागर के समीपवर्तीय भागों में है, जिसके अन्तर्गत स्पेन, फ्रांस, चीली, यूनान और यूगोस्लाविया आते हैं । इसके अन्तर्गत आस्ट्रेलिया का दक्षिण पश्चिम भाग, मध्य चिली तथा दक्षिण-अफ्रीका का दक्षिणी छोर भी शामिल है ।
इस जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता है – यहाँ शीतकाल में वर्षा का होना । गर्मियों का मौसम गर्म और शुष्क होता है । सेव, अंगूर, संतरे तथा नीबू जैसे साइट्रिक फल यहाँ का मुख्य उत्पादन है । यहाँ के वृक्ष छोटे होते हैं, जिनकी जड़ें लम्बी, पत्तियाँ मोटी – चिकनी और चमकीली होती हैं । यहाँ का मुख्य व्यवसाय कृषि है, और यहाँ आबादी काफी घनी है ।

(4)  चीन सदृश्य जलवायु –

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसका सबसे अधिक विस्तार चीन में है । इसके अतिरिक्त यह जलवायु जापान, दक्षिण ब्राजील तथा आस्ट्रेलिया के दक्षिण-पूर्वी भाग में भी पाई जाती है ।
इस क्षेत्र के सबसे बड़ी विशेषता है – यहाँ वर्ष भर वर्षा का होना । ठण्ड में कड़ी ठण्ड पड़ती है और गर्मियों में हरीकेन और टाइफून नामक भंयकर तूफान आते हैं ।
कृषि यहाँ का मुख्य व्यवसाय है । यहाँ के अधिकांश पर्वत पर्णपाती होते हैं ।
इस जलवायु को हम भूमध्य सागरीय जलवायु का पूर्वी संस्करण भी कह सकते हैं ।

(5) ब्रिटिश सदृश्य जलवायु –

चूँकि ब्रिटेन समुद्र के तट पर स्थित है, इसलिए इसे समुद्र तटीय जलवायु भी कहा जाता है । यह जलवायु मुख्यतः पश्चिमी यूरोप में पाई जाती है, जिसके अन्तर्गत ब्रिटेन, उत्तरी-पश्चिमी फ्रांस, जर्मनी, डेनमार्क, हाॅलैण्ड, बेल्जियम तथा नार्वे आदि देश आते हैं । मौसम साल भर अनिश्चयपूर्ण रहता है ।
यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता है – पछुआ हवाओं से साल भर वर्षा का होना । 45 से 65 अक्षांशों के बीच स्थित होने के कारण यहाँ की जलवायु शीतोष्ण है। इसलिए यह प्रदेश औद्योगिक रूप से काफी उन्नत हो गया है । यहाँ ओक, बांस तथा मैपी जैसे पर्णपाली वृक्ष होते हैं । यहाँ के लोग वैज्ञानिक-कृषि एवं उद्योगों में लगे हुए हैं । गेहूँ, बाजरा और चुकंदर यहाँ के मुख्य उत्पादन हैं ।

(6) टैगा जलवायु –

 इसका नामकरण साइबेरिया क्षेत्र के शंकूधारी पेड़ों के नाम पर किया गया है । धु्रवों के काफी निकट होने के कारण यहाँ का तापमान वर्ष के 7-8 महीने तक शून्य से भी कम रहता है । वैसे भी औसत तापमान 13 डिग्री सेन्टीग्रेड ही है। इसका विस्तार साइबेरिया, कनाड़ा और स्वीड़न आदि में है । यहाँ ठण्ड काफी पड़ती है और ग्रीष्मकाल में साधारण गर्मी होती है । थोड़ी बहुत जो भी वर्षा होती है, वह ग्रीष्मकाल में होती है ।
यहाँ देवदार, फर, चीड़ आदि नुकीले पत्तियों वाले वृक्ष पाये जाते हैं, जिनकी लकडि़याँ मुलायम होती हैं । लकड़ी काटना यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय है । यहाँ जनसंख्या काफी विरल है ।
इस जलवायु को आर्द्र महाद्वीपीय जलवायु तथा हिम जलवायु भी कहा जाता है ।

(7) टूंड्रा सदृश्य जलवायु –

यह क्षेत्र 60 अंश उत्तरी अक्षांश के उत्तर में स्थित है। इसके अंतर्गत उत्तरी यूरोप, उत्तरी एशिया तथा उत्तरी कनाड़ा के प्रदेश शामिल हैं। यह प्रदेश संसार का सबसे ठण्डा स्थान है । यहाँ औसत तापमान 10 डिग्री सेल्सियस और शीतकाल में तो शून्य से भी कम हो जाता है । ये प्रदेश लगभग आठ माह तक बर्फ से ढँके रहते हैं ।
टूंड्रा प्रदेश में काईलिचेन जैसी वनस्पतियाँ पाई जाती हैं । सील, वायरस, रेण्डीयर तथा सफेद भालू यहाँ के मुख्य पशु हैं । यहाँ के निवासियों को एस्किमों कहा जाता है ।

(8) अल्पाइन या उच्च प्रदेशीय जलवायु –

इसे उच्चस्तरीय जलवायु भी कहा जाता है । इसके अन्तर्गत यूरोप के आल्पस और काक्शेस, एशिया का हिमालय, उत्तरी अमेरीका का राॅकीज पर्वत तथा दक्षिण अमेरीका के एंडीज पर्वत शामिल हैं । स्पष्ट है कि इन स्थानों के तापमान और वर्षा का निर्धारण इन स्थानों की ऊँचाई करती है ।
यहाँ तापमान कम होता है । कुछ क्षेत्रों में हमेशा बर्फ जमी रहती है । पर्वतीय ढालों पर पर्याप्त वर्षा होती है । ये स्थान अपने सूर्य की किरणों के कारण चिकित्सा के लिए मूल्यवान हैं । ये सभी प्रदेश संसार के प्राकृतिक प्रदेश कहलाते हैं ।
कुछ परिभाषाएँ –

  •  समुद्री जलवायु – समुद्र के निकट के प्रदेशों की जलवायु को समुद्रीय जलवायु कहते हैं । यहाँ जलवायु सम रहती है ।
  • महाद्वीपीय जलवायु – समुद्र से दूर स्थित स्थानों की जलवायु महाद्वीपीय जलवायु कहलाती है । यहाँ ग्रीष्मकाल में कड़ी गर्मी और शीतकाल में कड़ी ठण्ड पड़ती है ।
  •  तटीय जलवायु – समुद्री जलवायु एवं महाद्वीपीय जलवायु के बीच को तटीय जलवायु कहते हैं ।
  •  पर्वतीय जलवायु – पहाड़ों एवं पठारों की जलवायु पर्वतीय जलवायु कहलाती है। यहाँ ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान कम होता है । अधिक ऊँचाई पर बर्फ जमी होने के कारण ठण्डक काफी होती है ।