STUDY METERIAL GEOGRAPHY IND 05

(अध्ययन सामग्री): भूगोल – भारत का भूगोल “प्रायद्वीपीय पठार “


अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल


 प्रायद्वीपीय पठार

दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश का क्षेत्रफल करीब 9 लाख वर्ग कि.मी. है । इसकी औसत ऊँचाई 500-750 मी. के मध्य है । यह विश्व का सबसे बड़ा प्रायद्वीपीय पठार है । यह विश्व के प्राचीनतम पठारों में से भी एक है । इस पठार की स्थलाकृति पर सभी महत्वपूर्ण भूसंचलन का प्रभाव पड़ा है । यहाँ लंबे समय से अपरदन के दूत कार्य कर रहे हैं । भूसंचलन और जलवायु परिवर्तन के कारण इस प्रदेश में नवोन्मेष के भी प्रमाण हैं । इन प्रभावों के परिणामस्वरूप यह प्रदेश जटिल पठारी स्थलाकृति का प्रदेश बन गया है। यद्यपि यह पठारी स्थलाकृति है, लेकिन यहाँ अनेक अवशिष्ट पर्वत और पहाडि़याँ भी हैं । अधिकतर अवशिष्ट पर्वत पठार के सीमांत पर स्थित हैं । ये पर्वत ही तथा ऊँचाई और संरचना की विषमता इस पठारी क्षेत्र को उप पठारों में विभाजित करती हैं । अतः इसे ‘पठारों का पठार’ भी कहा गया है ।
इस पठारी प्रदेश के पर्वतीय और पहाड़ी श्रृंखलाओं में अरावली पर्वत (उत्तरी-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र), विन्ध्य पर्वत (उत्तरी सीमांत), राजमहल की पहाड़ी (उत्तर-पूर्व सीमांत), गिर पहाड़ी (काठियावाड़ पठार का सीमांत), पश्चिमी घाट पर्वत, नीलगिरी, अन्नामलाइर्, कार्डमम तथा नागर कोल की पहाडि़याँ (पश्चिमी प्रायद्वीपीय सीमांत) तथा पूर्वी घाट पर्वत (पूर्वी प्रायद्वीपीय सीमांत) महत्वपूर्ण पहाड़ी श्रृंखलाएँ हैं । आंतरिक भागों की श्रृंखलाओं में सतपुड़ा, महादेव, मैकाल, अजंता, पारसनाथ और पालनी पहाडि़याँ हैं ।
पर्वतीय पठार को पुनः चार प्रमुख पठारों में विभाजित किया गया है । ये हैं –

1. दक्कन का पठार
2. पूर्वी पठार
3. मध्यवर्ती पठार
4. काठियावाड़ का पठार ।
 

1. दक्कन का पठार –

दक्कन का पठार सतपुड़ा, महादेव तथा मैकाल श्रृंखला से लेकर नीलगिरी पर्वत के बीच अवस्थित है । इसकी औसत ऊँचाई 300-900 मी. के बीच है । इसे पुनः तीन पठारों में विभाजित किया गया है ।
(i) महाराष्ट्र का पठार (काली मृदा),
(ii) आंध्रप्रदेश का पठार, जिसे ‘आंध्रा प्लेटो’ कहते हैं । इसे 2 भागों में बाँटते हैं –
क. तेलंगाना पठार (लावा पठार)
ख. रायलसीमा पठार (आर्कियन चट्टानों की प्रधानता)
(iii) कर्नाटक पठार (मैसूर पठार) – इसमें आर्कियन चट्टानों की प्रधानता है । यह धात्विक खनिजांे के लिए प्रसिद्ध है ।

दक्कन ट्रैप का कारण एवं महत्व (Causes and Singicance of Deccan Trap)

ज्वालामुखी से निकले बेसाल्ट की कई क्रमिक परतों को ट्रैप कहा जाता है । महाराष्ट्र में सर्वप्रथम क्रिटैशियस काल में दरारी उद्गार से बेसाल्ट का जमाव हुआ । इस बेसाल्ट परत के ऊपर अपक्षय के कारण काली मिट्टी बढ़ी, जिस पर वनस्पति एवं जीवों का विकास हुआ । इयोसीन काल में पुनः ज्वालामुखी से निकले बेसाल्ट लावा की दूसरी परत फैल गयी । पहली एवं दूसरी परतों के बीच को अन्तः ट्रैपीय संस्तर

(Inter-Trappean Bed)

कहा जाता है । पुनः तीसरी बार ज्वालामुखी से निकले बेसाल्ट की परत तीसरे एवं नवीनतम ट्रैप का निर्माण किया । दूसरे तथा तीसरे ट्रैप के मध्य भी वनस्पति एवं जीव दबकर जीवाश्मीकृत हो गये । सर्वाधिक मात्रा में लावा का उद्गार इयोसीन काल का है, जो सबसे ऊपर पाया जाता है, इसलिए महाराष्ट्र के इस उद्गार को इयोसीन काल का माना जाता है । लावा के मोटे निक्षेप के कारण महाराष्ट्र में मिलने वाले खनिज दब गये । इस प्रकार महाराष्ट्र में खनिज तो हैं, किन्तु उनका उत्खनन कठिन है ।

दक्कन का अर्थ ‘दक्षिणी’ होता है । विन्ध्याचल के दक्षिण में स्थित होने के कारण इसे दक्कन ट्रैप (Deccan Trap) .

अपक्षय एवं अपरदन के फलस्वरूप महाराष्ट्र के बेसाल्ट पर काली मिट्टी का निर्माण हुआ, जिसमें लौहांश एवं अन्य खनिजों की प्रचुरता पायी जाती है, जिस पर कपास की अच्छी पैदावार होती है। फलस्वरूप इसे कपास मिट्टी (Cotton Soil) या रेगुर मिट्टी (Regur Soil) या काली मिट्टी (Black Soil) कहा जाता है । इस मिट्टी पर अन्य फसलें, जैसे – गन्ना, गेहूँ, फल आदि होते हैं । इन फसलों पर आधारित विभिन्न कृषि-आधारित उद्योग, जैसे – सूती-वस्त्र, चीनी एवं फलोद्योग महाराष्ट्र में विकसित हुए हैं ।
दिलचस्प बात यह है कि यदि महाराष्ट्र के लावा ने एक तरफ खनिजों को ढककर महाराष्ट्र को खनिजों से वंचित किया ह,ै तो दूसरी तरफ उसने उपजाऊ काली मिट्टी देकर महाराष्ट्र को उद्योग प्रधान भी बनाया है।

2. पूर्वी पठार –

यह पूर्वी घाट पर्वत के उत्तर तथा महादेव, मैकाल और कैमूर श्रृंखलाओं के पूर्व में अवस्थित है । इसे 5 भागों में बाँटा गया है, जो निम्न है  –

3. मध्यवर्ती पठार –

मध्यवर्ती भारत में भी चार प्रमुख पठारों का विकास हुआ है । ये चार पठार सतपुड़ा, महादेव तथा मैकाल, श्रृंखला के उत्तर में अवस्थित हैं ।

4. काठियावाड़ का पठार –

यह गुजरात राज्य में अवस्थित है । यह एक प्रायद्वीपीय पठार है, जिसकी औसत ऊँचाई 200-400 मी. के मध्य है । इसी पठार का अंग है गिर पर्वत । इसमें लावा चट्टानों के अतिरिक्त टशियरी काल के जलोढ संरचना के भी प्रमाण हैं । इसका ढ़ाल उत्तर से दक्षिण की तरफ है ।

उत्तर का वृहद् मैदान (Northern Great Plane)

यह विश्व के अत्यंत समतल स्थलाकृतियों में से एक है । इसकी औसत ऊँचाई 200 मी. तक है। कई सीमांत क्षेत्रों में यह 300 मीटर तक भी है । यह स्थलाकृतिक प्रदेश उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र और दक्षिण के पठारी क्षेत्र के मध्य अवस्थित है । स्थलाकृतिक विशेषताओं के आधार पर इसे दो भागों में विभाजित किया जाता हैं-
(1) सिंधु का मैदान, तथा
(2) गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान ।
अरावली पर्वत का उत्तरी क्षेत्र अर्थात् दिल्ली इन दोनों मैदानी क्षेत्रों को विभाजित करता है । सिंधु के मैदान का अधिकतर भाग पाकिस्तान में है । भारत में ये मैदान पंजाब, पश्चिमी हरियाणा तथा पश्चिमी राजस्थान में अवस्थित हंै । इसलिए यह पंजाब-मैदान के नाम से भी जाना जाता है । इसकी औसत ऊँचाई 100-200 मी. के मध्य है ।
गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान को पाँच प्रमुख उप मैदानों में बाँटा जाता है । ये हैं –

(क) उपरी गंगा का मैदान (दिल्ली से इलाहाबाद के मध्य) – इसकी औसत ऊँचाई 100-200 मी. के मध्य है ।
(ख) मध्यवर्ती गंगा का मैदान (इलाहाबाद से राजमहल के बीच) – औसत ऊँचाई 50-100 मी.
(ग) निम्न गंगा का मैदान – (फरक्का से नदी के मुहाने तक।) यह विश्व का सबसे बड़ा डेल्टाई मैदान है । ऊँचाई 0-50 मी. के मध्य है।
(घ) उपरी ब्रह्मपुत्र का मैदान – (दीगापुर से लेकर गुवाहाटी के मध्य) ऊँचाई 150-300 मी. के बीच ।
(ङ) निचली ब्रह्मपुत्र का मैदान – (गुवाहाटी से कुच बिहार के बीच) ऊँचाई 50-100 मी. के मध्य ।

वैज्ञानिकों और भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार भारत का मध्यवर्ती मैदान मूलतः एक गर्त है, जहाँ हिमालय पर्वतीय क्षेत्र और पठारी क्षेत्र से आने वाली नदियों द्वारा अभूतपूर्व निक्षेप के बाद वर्तमान मैदानी स्थलाकृति का विकास हुआ है । यह विश्व के सर्वाधिक गहरे जलोढ़ क्षेत्रों में से एक है । कहीं-कहीं जलोढ़ की मोटाई 3000 मी. से भी अधिक है ।

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