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अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल ” कृषि”

अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल


कृषि

भारतीय कृषि का महत्त्व

भारत अब भी कृषि प्रधान देश है । यहाँ की लगभग दो-तिहाई आबादी (64:) कृषि पर आश्रित है। भारतीय अर्थव्यवस्था में भी कृषि का महत्त्वपूर्ण योगदान है । सकल राष्ट्रीय आय का 26: कृषि पर आधारित है । कृषि उत्पादों का पर्याप्त मात्रा में निर्यात भी होता है, जिससे विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है । भारत के कुल निर्यात में 37: योगदान कृषि एवं उससे बनी वस्तुओं का है । इतना ही नहीं कृषि के माध्यम से खाद्यान्न तो मिलता ही है, अनेक प्रमुख कृषि आधारित उद्योगों जैसे – सूती वस्त्र उद्योग, जूट उद्योग, चीनी उद्योग, चाय उद्योग, सिगरेट तथा तम्बाकू उद्योग आदि को कच्चा-माल भी उपलब्ध होता है ।
भारत उष्ण एवं समशीतोष्ण; दोनों कटिबंधों में स्थित होने के कारण जहाँ यह एक ओर चावल, गन्ना, मूँगफली, तिल, केला, नारियल, गर्म मसाले, रबर जैसी उष्ण कटिबंधीय फसलें उत्पन्न करता है, वहीं दूसरी ओर कपास, गेहूँ, चना, सरसों, सोयाबीन तथा तम्बाकू जैसी समशीतोष्ण फसलें भी । इस प्रकार कृषि यहाँ के जीवन का एक आधारभूत तत्त्व है ।

भारत उष्ण एवं समशीतोष्ण; दोनों कटिबंधों में स्थित होने के कारण जहाँ यह एक ओर चावल, गन्ना, मूँगफली, तिल, केला, नारियल, गर्म मसाले, रबर जैसी उष्ण कटिबंधीय फसलें उत्पन्न करता है, वहीं दूसरी ओर कपास, गेहूँ, चना, सरसों, सोयाबीन तथा तम्बाकू जैसी समशीतोष्ण फसलें भी । इस प्रकार कृषि यहाँ के जीवन का एक आधारभूत तत्त्व है ।

फसलों के मौसम –

भारत में फसलों के मौसम को मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है:- (I) खरीफ या गर्मी/बरसाती मौसम, जिसमें फसल के विकास के लिए अधिक जल जरूरी होता है; तथा
(II)रबी या ठंडे मौसम की फसल, जिसे पानी की कम जरूरत होती है । इन मौसमों की समयावधि के कारण सामान्यतः साल में दो फसलों की ही कटाई हो पाती है । कुछ मामलों में साल में तीन फसलों की कटाई भी होती है ।

खरीफ फसल:- इन फसलों के लिए अधिक जल और लंबे गर्म मौसम की जरूरत होती है। इन्हें दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के आगमन के समय (जून या प्रारंभिक जुलाई) बोया जाता है और मानसून की समाप्ति पर (सितंबर/अक्टूबर) काट लिया जाता है । मुख्य खरीफ फसलें हैं:- चावल, ज्वार, मक्का, कपास, मूँगफली, जूट,तंबाकू, बाजरा, गन्ना, दाल, हरी-सब्जियाँ, मिर्च, भिंडी, गांजा, कद्दू तथा चारा वाली घास आदि ।

रबी फसल:-

ये फसलें जाड़े के मौसम में होती हैं । पहले इसके बीज के अंकुरण तथा उसके बाद कुछ समय तक शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है । उसके बाद वृद्धि के लिये इन्हें अपेक्षाकृत ठंडे मौसम की जरूरत होती है । इसलिये फसलों की बोआई नवंबर में तथा कटाई अप्रैल-मई में होती है । मुख्य रबी फसलें हैं – गेहूँ, चना तथा तिलहन आदि ।

जैद फसल:-

 उपर्युक्त दो मुख्य फसलों के अतिरिक्त हाल में भारत में फसल का एक छोटा-सा मौसम शुरू किया गया है, जो मार्च से जून के बीच होता है । इन्हें जैद फसल कहा जाता है । इन्हें विशेषकर अच्छी सिंचाई सुविधा वाले प्रदेशों में लगाया जा रहा है, जहाँ फसलें जल्दी पक जाती हैं । मुख्य जैद – फसलें हैं उरद, मूँग, तरबूज, खीरा तथा कन्द वाली सब्जियाँ, आदि ।

भारतीय कृषि की समस्याएँ एवं समाधान

भारत कृषि प्रधान देश है, परन्तु कृषि की दशा सन्तोषप्रद नहीं है । यहाँ की कृषि आज भी परम्परावादी है । भारतीय किसान कृषि को एक व्यवसाय के रूप में नहीं अपितु जीवनयापन की प्रणाली के रूप में लेते हैं । स्वाभाविक है कि इससे वांछनीय मात्रा में उत्पादन नहीं हो पाता । भारत का प्रति हेक्टेयर उत्पादन विश्व के अन्य विकसित देशों की तुलना में काफी कम है । इस कम उत्पादकता के लिए भारतीय कृषि की अनेक समस्याएँ जिम्मेदार हैं ।
इन समस्याओं को हम तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं –
(क) सामान्य समस्याएँ
(ख) संस्थागत समस्याएँ तथा
(ग) तकनीकी समस्याएँ

(क) सामान्य समस्याएँ (General Problems)

(1) भाग्यवादी तथा रूढि़वादी अशिक्षित कृषक ।
(2) भूमि पर जनसंख्या का निरन्तर भार – सीमित भूमि पर लगातार बढ़ रहा जनसंख्या का दबाव। 1991 की जनसंख्या के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति कृषित भूमि केवल 0.21 हेक्टेयर थी ।
(3) जीविका आधारित कृषि – इसके कारण कृषि निम्न आय वाला व्यवसाय हो जाती है । जिससे बचत कम होती है । फलस्वरूप कृषि में निवेश कम होता है ।
(4) पशुओं की हीनावस्था – भारतीय कृषि में पशुओं को अधिक महत्त्व दिया जाता है, परन्तु इनकी सामान्य स्थिति अच्छी नहीं है ।
(5) अनिश्चित मौसम स्थिति – भारतीय किसान को आए दिन कभी बाढ़ तो कभी सूखा का सामना करना पड़ता है ।
(6) मिट्टी में ह्यूमस की कमी – बेतहाशा वनों की कटाई से मिट्टी में ह्यूमस की कमी हो जाती है। ह्यूमस की कमी से मिट्टी की नमी सोखने की क्षमता घट जाती है ।
(7) मृदा अपरदन – वनों की कटाई तथा अनेक मानवीय क्रिया-कलापों से मृदा अपरदन में तीव्र गति से वृद्धि हुई है ।
(8) भूमि की निम्न उर्वरा शक्ति – शताब्दियों से निरन्तर प्रयोग में आने के कारण भारतीय कृषि-भूमि की उर्वरता का हृास हो गया है ।
(9) कीट और बीमारियों का प्रकोप ।

(ख) संस्थागत समस्याएँ –

1. भूमि का असन्तुलित वितरण – भूमि कुछ सीमित वर्गों के हाथों में केन्द्रित है । स्वतंत्रता के बाद मध्यस्थों को समाप्त करने के लिए बनाये गये कानूनों के बावजूद भूमि का थोड़े से व्यक्तियों के हाथ में केन्द्रीकरण बना रहा और वास्तविक खेती करने वालों को जमींदारों से कोई खास भूमि नहीं मिली । आज भी अधिकांश काश्तकारों की पट्टेदारी सुरक्षित नहीं है। उन्हें अनुचित रूप से लगान देना होता है ।
2. पूँजी तथा साख की कमी – सस्ता ऋण तथा अन्य गैर-कृषिगत सुविधाओं के अभाव में किसानों की गरीबी कम नहीं होती ।
3. विपणन सुविधा की कमी – इसके कारण उत्पादन की तकनीक का भी विकास नहीं हो पाता । अपर्याप्त विपणन व्यवस्था के कारण अनाज का उचित ढंग से मूल्य निर्धारण भी नहीं हो पाता ।
4. भंडारण-क्षमता की कमी – गोदामों के अभाव में किसानों को अपनी फसल तुरंत बेचनी पड़ती है । उससे बाजार में अनाज का दाम कम हो जाता है । इस प्रकार किसान उचित दाम पाने से वंचित रह जाता है।
5. छोटा जोत आकार – यह अनार्थिक एवं कम उत्पादकता का मुख्य कारण होता है । यहाँ खेत का औसत आकार केवल 1.69 हेक्टेयर है । हमारे यहाँ लगभग 78 प्रतिशत जोत 2 हेक्टेयर से कम थी । केवल 2 लोगों के पास 10 हेक्टेयर या उससे अधिक की जोत-भूमि है। इस प्रकार की भूमि पर केवल काम प्रधान तकनीकी से खेती हो सकती है। इससे उत्पादकता स्तर में कमी आती है ।

(ग) तकनीकी समस्याएँ

1. भूमि सुधार कार्यक्रमों का ठीक ढंग से लागू न हो पाना ।

2. परंपरागत उपकरणों का प्रयोग – अभी भी अधिकांश कृषकों द्वारा परम्परागत तथा अवैज्ञानिक विधि द्वारा कृषि-कार्य किया जाता है ।

3. उत्तम किस्म के बीजों का अभाव,

4. खाद एवं उर्वरकों का अभाव,

5. सिंचाई की अपर्याप्त व्यवस्था – भारत में कृषि के अधीन कुल क्षेत्र के केवल 36 प्रतिशत पर सिंचाई की व्यवस्था है । इसके अलावा सिंचाई की लागत में लगातार वृद्धि के कारण छोटे किसान इसका लाभ उठाने में असमर्थ रहते है । इससे उत्पादकता में कमी आती है।

6. विभिन्न विकास कार्यक्रम कृषि के बाधक के रूप में – डैम, सड़कों, रेलमागोँ तथा नहरों के बढ़ते निर्माण से प्राकृतिक जलनिकास तंत्र बाधित होता है । यह बाढ़ का भी कारण बनता है । साथ ही इस तरह के विकास कार्यक्रमों से कृषिगत भूमि में हृस भी हो रहा है।

उपरोक्त बिन्दुओं के माध्यम से हमने देखा कि भारतीय कृषि अनेक प्रकार की समस्याओं से ग्रसित है । इन्हीं समस्याओं के कारण भारतीय कृषि की उत्पादकता अत्यन्त निम्न है । विश्व के अन्य देशों, जैसे – अमेरिका फ्रांस, जापान, चीन इत्यादि देशों की तुलना में हमारी कृषि काफी पिछड़ी हुई है । परन्तु भारतीय कृषि के इस पिछड़ेपन मं इसका उज्जवल  भविष्य तथा इसकी शक्ति दोनों निहित हैं । आवश्यकता इस बात की है कि कृषि के विकास के लिए एक टिकाऊ तथा निश्चित नीति का निर्धारण हो तथा इसका कार्यान्वयन राजनीतिक तथा प्रशासनिक प्रतिबद्धता के साथ हो । यह सच है कि हम कृषि उत्पादन में कई गुना वृद्धि कर सकते हैं । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के आर्थिक विकास की कुँजी कृषि विकास में निहित है ।

समाधान

कृषि की समस्याओं से निजात पाने के लिए जिससे उत्पादकता बढ़ायी जा सके निम्नलिखित कदम उठाने आवश्यक हैं –

1- भूमि सुधार कार्यक्रमों का सही कार्यान्वयन ।

2- भूमि तथा जल साधनों का समन्वित प्रबन्धन – अर्थात् मृदा-अपरदन, जलरोध  (Waterlogging)  तथा लवणता की समस्या को कम करना । इसके लिए भूमि संरक्षण के उपाय ढूँढने आवश्यक हैं । साथ ही सामाजिक वानिकी को प्रोत्साहन देकर पुनः वृक्ष लगाने से वनों की कटाई से होने वाले नुकसान की भरपाई कर उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है ।

3- उन्नत बीजों का प्रयोग ।

4- कृषि अनुसंधान पर बल – इसकी मदद से अधिक उत्पादकता वाले बीजों को विकसित किया जाए । साथ ही शुष्क क्षेत्र में कृषि के लिए ड्रिप सिंचाई जैसी अन्य वैकल्पिक प्रणाली को विकसत करने के प्रयास किए जांए ।

5- उर्वरकों का सही प्रयोग – कृषि वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि भारतीय किसान आवश्यक खाद की मात्रा के केवल 1/10 भाग का ही प्रयोग करते हैं । (विशेष तौर पर छच्ज्ञद्ध का उचित अनुपात में प्रयोग कर उत्पादकता में कई गुणा वृद्धि की जा सकती है।

6- सिंचाई की समुचित व्यवस्था – उन्नत किस्म के बीजों और उर्वरकों का प्रयोग तभी संभव है, जब सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था हो । सिंचाई के द्वारा बहुत से क्षेत्रों में दो या दो से अधिक फसलें उगाई जा सकती हैं, जिससे उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है ।

7- खेती में मशीनीकरण – इसकी सहायता से कृषि उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है ।

8- साख व विपणन की सुविधा का विकास करना – साख एवं विपणन की सुविधा का विकास किसान के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है । सहकारी ऋण संस्थाओं को बड़े किसानों के चंगुल से मुक्त कराकर उसे ऐसे ढंग से विकसित किया जाए कि इसका लाभ छोटे एवं सीमांत किसानों को मिल सके ।

9- कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग – यह पौधों के संरक्षण एवं विकास के लिए आवश्यक है ।

10- कृषि को उद्योग का दर्जा प्रदान करना – कृषक को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से मूलभूत सुविधा मुहैया कराने के साथ-साथ कृषि को उद्योग का दर्जा दिया जाना चाहिए ।

11- सूचना-तंत्र को अधिक विकसित करना – कृषक को कृषि के क्षेत्र में होने वाले अनुसंधान से अवगत कराने के लिए सूचना तंत्र को और अधिक सुदृढ़ बनाने एवं प्रचार-प्रसार पर अधिक बल देने की आवश्यकता है ।

उपरोक्त उपायों पर समुचित ध्यान देकर भारत बढ़ती हुई जनसंख्या से उत्पन्न खाद्यान्न समस्या का बेहतर ढंग से सामना कर सकता है । इसके अलावा सरकार द्वारा लाई गई राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना एवं ‘नई कृषि नीति’ की घोषणा उत्पादकता बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होगी ।

हालाँकि भारत ने पिछले 50 वर्षों के दौरान कृषि उत्पादन में काफी प्रगति की है । 1950-51 में खाद्यान्न उत्पादन 5.08 करोड़ टन था, जो 2000-2003 में बढ़कर 20 करोड़ टन तक पहुँच गया है । इस तरह हम खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए हैं । हमारा धान उत्पादन में चीन के बाद दूसरा, मूँगफली उत्पादन में प्रथम, चाय उत्पादन में पहला, गन्ने के उत्पादन में दूसरा, तथा दूध के उत्पादन में प्रथम स्थान है । विश्व की कुल जनसंख्या के अकेले 16 प्रतिशत का योगदान देने एवं जनसंख्या में अरबपति कहलाने वाले भारत के पास विश्व के कुल क्षेत्रफल का मात्र 2.4 प्रतिशत हिस्सा है । अतः सीमित भू-भाग, बढ़ती हुई जनसंख्या में संतुलन कायम करने व खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बने रहने के लिए इसे प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि करना होगा ।

कृषकीय प्रादेशीकरण

कृषि प्रदेश वह भौगोलिक प्रदेश है, जिसकी सीमा के अंतर्गत फसलों की समरूपता पायी जाती है । भारत के कृषि प्रादेशीकरण की दिशा में अनेक कार्य किये गये हैं । इन कार्यों को अनुभवाश्रित तथा सांख्यिकी विधियों के माध्यम से किया गया है ।
भारत के कृषि प्रादेशीकरण की दिशा में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य कृषि वैज्ञानिक रन्धावा (Randhava)  तथा सेन गुप्ता (Sen Gupta)  द्वारा किया गया है । इन विद्वानों ने फसलों की समरूपता के साथ-साथ स्थलाकृतिक-विशेषताएँ, जलवायु, मृदा और जनसंख्या जैसे कारकों का विश्लेषण करते हुए भारत को निम्नलिखित 6 प्रमुख कृषि प्रदेशों में विभाजित किया है –
1. फल और सब्जी प्रदेश
2. चावल, चाय और जूट प्रदेश
3. गेहूँ, और गन्ना प्रदेश
4. ज्वार, बाजरा और तिलहन प्रदेश
5. मक्का तथा मोटे अनाज का प्रदेश, तथा
6. कपास प्रदेश

1. फल और सब्जी प्रदेश –

फल एवं सब्जी प्रदेश के अंतर्गत मुख्यतः हिमालय क्षेत्र और पूर्वोंत्तर भारत को रखा जाता है । भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर इस कृषि प्रदेश को पुनः दो भागों में विभाजित किया जाता है –
(क) पूर्वी हिमालय प्रदेश, तथा
(ख) पश्चिमी हिमालय प्रदेश ।

(क) पूर्वी हिमालय प्रदेश –

 इस प्रदेश का औसत तापमान 230 से 290 सेल्सियस है, जबकि वार्षिक वर्षा 200 सेमी. से अधिक होती है । कुल मिलाकर यह एक उष्ण आर्द्र प्रदेश है । इस प्रदेश के अनानास, केला और नारंगी, प्रमुख फल हैं । आलू सबसे प्रमुख सब्जी है । लेकिन पर्वतीय और पठारी क्षेत्रों में विविध प्रकार की हरी सब्जियाँ भी उत्पन्न की जाती हैं ।

(ख) पश्चिमी हिमालय प्रदेश –

 यह शीतोष्ण जलवायु का क्षेत्र है । यहाँ सामान्यतः तापमान 230 सेल्सियस से कम होता है । यहाँ वार्षिक वर्षा 100 सेमी. से कम होती है । कम तापमान और कम वर्षा के कारण यह प्रदेश शीतोष्ण फलों के लिए अनुकूल है । यहाँ उत्पन्न होने वाले फलों में सेब, अंगूर, अखरोट तथा विविध प्रकार के बेरी प्रमुख हैं । यह सही अर्थों में रसदार फलों का क्षेत्र है । भारत का करीब तीन-चैथाई सेब सिर्फ जम्मू एवं कश्मीर राज्य में होता है । भारत का करीब 80 : अखरोट भी जम्मू-कश्मीर में होता है । सेब और अखरोट के उत्पादन में हिमाचल प्रदेश का दूसरा स्थान है ।

जहाँ तक सब्जी के उत्पादन का प्रश्न है, हिमाचल प्रदेश का लाहुल-स्पिति घाटी आलू की कृषि के लिए प्रसिद्ध है । जम्मू क्षेत्र, उधमपुर क्षेत्र तथा कांगड़ा और कुल्लू घाटी का क्षेत्र हरी सब्जियों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है । यद्यपि हिमाचल प्रदेश तथा पूर्वोत्तर भारत फल और सब्जी के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन जब हम इस प्रदेश के कुल कृषि भूमि को देखते हैं, तो मात्र 10 कृषि भूमि पर ही फल और सब्जी की कृषि होती है । किन्तु ये आर्थिक और व्यापारिक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण होने के कारण इस प्रदेश के महत्त्वपूर्ण फसल हो गये हैं । कृषि विकास नीतियों के अंतर्गत भी इन फसलों को प्राथमिकता दी गयी है ।
अन्य फसलों में चावल, चाय, मक्का, गन्ना, केसर और शहतूत प्रमुख हैं । अधिक ऊँचाई के सीढ़ीनुमा खेतों से चावल की कृषि होती है । चाय की कृषि मुख्यतः पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय तथा हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी ढ़ालों पर होती है । मक्का की कृषि मुख्यतः जम्मू एवं कश्मीर और विशेष रूप से लद्दाख के पठारी क्षेत्रों में होती है । गन्ना की कृषि दून की घाटी में होती है । शहतूत और केसर की कृषि मुख्यतः जम्मू एवं कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश में होती है । ये दोनों ही फसलें वाणिज्यिक महत्त्व की हैं । केसर सर्वाधिक कीमती मसाला है । जबकि शहतूत के वृक्षों पर रेशम के कीड़े पाले जाते है।

2. चावल, चाय और जूट प्रदेश –

चावल, चाय और जूट का प्रदेश भारत का वह आर्द्र प्रदेश है, जहाँ वार्षिक वर्षा 400-200 से.मी. के बीच होती है । इसके अंतर्गत भारत के अधिकतर मध्यवर्ती और तटीय मैदानी क्षेत्र आते हैं । चावल यहाँ की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण फसल है । तीन-चैथाई से अधिक कृषि भूमि में चावल की कृषि होती है । यह भारत का जीवन निर्वाह कृषि क्षेत्र है ।
चाय की कृषि दूसरे फसल के रूप में बिहार के उत्तरी-पूर्वी मैदान यानि मुख्यतः किशनगंज जिला, उत्तरी पश्चिमी बंगाल मुख्यतः सिलीगुड़ी और कूच बिहार जिला तथा ब्रह्मपुत्र घाटी के उत्तरी मैदानी क्षेत्र में होती है । जूट की कृषि बिहार के पूर्वी मैदान, पश्चिम बंगाल के मैदान, पश्चिमी ब्रह्मपुत्र मैदान तथा महानदी और गोदावरी के डेल्टाई क्षेत्रों में होती है ।
हाल के वर्षों में कुछ अन्य फसलों के महत्त्व में भी वृद्धि हुई है । जैसे कृष्णा नदी के डेल्टाई और मैदानी क्षेत्र में तम्बाकू दूसरी महत्त्वपूर्ण फसल बन चुकी है । इसी प्रकार केरल, पश्चिमी कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र के पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में नारियल की कृषि दूसरे प्रमुख फसल के रूप में होती है । लेकिन इन सभी क्षेत्रों में चावल प्रथम फसल है । यही कारण है कि इसे चावल संस्कृति का क्षेत्र’ कहा गया है । चावल में उत्तर प्रदेश का प्रथम स्थान है । इसके बाद क्रमशः पश्चिम बंगाल और आंध्रप्रदेश का स्थान आता है ।

3. गेहूँ और गन्ना कृषि प्रदेश –

 यह प्रदेश भारत का नहर सिंचित क्षेत्र है । सही अर्थों में यह प्रथम चरण का हरित क्रांति क्षेत्र है । इसी के अंतर्गत पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के गंगानगर जिलों को रखा जाता है । नहर सिंचाई के विकास के पूर्व इस क्षेत्र में मोटे अनाज तथा तिलहन प्रमुख फसल थी । लेकिन नहर सिंचाई के विकसित होते ही गेहूँ और गन्ना को प्राथमिकता मिली है । इसी प्रदेश में भारत का लगभग 3/4 गेहूँ उत्पन्न होता है । यह प्रदेश भारत का करीब 40  गन्ना भी उत्पन्न करता है । हाल के वर्षों में चावल और कपास भी प्रमुख फसलों के रूप में उभर कर आये हैं । सिंचाई-सुविधा और संकर बीज के प्रयोग से इन फसलों का महत्त्व तेजी से बढ़ रहा है ।

4. ज्वार, बाजरा एवं तिलहन कृषि प्रदेश –

ज्वार, बाजरा एवं तिलहन कृषि प्रदेश पठारी भारत के उन क्षेत्रों की विशेषता है, जहाँ प्रथमतः लेटेराइट अथवा लाल मृदा पाई जाती है । साथ ही वार्षिक वर्षा 75-125 से.मी. के मध्य हो । इन दो परिस्थितियों के अंतर्गत दक्षिणी पठारी भारत के अधिकांश क्षेत्र आते हैं, जो सामान्यतः भारत का सूखा प्रभावित क्षेत्र है । ये मूलतः एकफसली क्षेत्र हैं अर्थात् वर्ष में एक बार वर्षा ऋतु के समय ही फसल उत्पन्न की जाती हैं । सामान्यतः प्रति हेक्टेयर उत्पादकता कम है । अच्छी मानसून की स्थिति में सभी कृषि योग्य भूमि पर फसल लगाई जाती है। लेकिन यदि मानसून अनिश्चित हो, तो परती भूमि में काफी वृद्धि हो जाती है । अधिकतर कृषि-कार्य परंपरागत विधि और उपकरणों की मदद से होता है ।

5. मक्का तथा मोटे अनाज का कृषि प्रदेश –

मक्का एवं मोटे अनाज की कृषि मुख्यतः उन क्षेत्रों में होती है, जहाँ निम्नलिखित दो शर्तें पूरी होती हैं । प्रथमतः वार्षिक वर्षा 75 सेमी. से कम हो और दूसरा मृदा की विशेषताएँ बलुई, लेटेराइट अथवा लाल प्रकार की हो । इन दोनों ही परिस्थितियों से प्रभावित क्षेत्र भारत के इन चार भौगोलिक क्षेत्रों में पाये जाते हैं – (क) प्रायद्वीपीय पठारी भारत का वृष्टि छाया क्षेत्र, (ख) संपूर्ण राजस्थान, (ग) उत्तरी गुजरात, तथा (घ) तमिलनाडु का दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्र ।

इन प्रदेशों में भी मानसून की अनिश्चितता के कारण कृषि गहनता की कमी है । प्रायः प्रतिवर्ष परती भूमि छोड़ी जाती है। भारत में राजस्थान में सर्वाधिक परती भूमि है । इन प्रदेशों में कम वर्षा के कारण मोटे अनाज और जनसंख्या दबाव कम होने के कारण प्रति व्यक्ति जोत का आकार बढ़ जाता है । जहाँ भी सिंचाई सुविधा उपलब्ध है, वहाँ चावल और कपास जैसी फसल भी उत्पन्न हो जाती है । लेकिन अधिकतर क्षेत्रों में मक्का और मोटे अनाज ही प्रमुख फसल हैं ।

6. कपास कृषि प्रदेश

भारत का कपास क्षेत्र काली मृदा का क्षेत्र है । यह विश्व का सबसे बड़ा कपास क्षेत्र है । कुल बोयी गयी भूमि की दृष्टि से कपास से अधिक क्षेत्र ज्वार के अंतर्गत आते हैं, क्योंकि यही फसल इस प्रदेश का प्रमुख खाद्य पदार्थ है । लेकिन यह एक जीवन निर्वाह फसलहै । इसके विपरीत कपास व्यापारिक और औद्योगिक महत्त्व की फसल है । भारत विश्व के वृहतम् कपास उत्पादक देशों में से है । महाराष्ट्र और गुजरात के औद्योगीकरण का प्रमुख कारण इन प्रदेशों में कपास की कृषि का होना ही है । इन दो राज्यों के अतिरिक्त मालवा का पठार, तेलंगाना-पठार, मैसूर पठार के अंतर्गत बंगलौर तथा मैसूर के बीच का क्षेत्र तथा तमिलनाडु के अंतर्गत कोंयबटूर – मदुरै उच्च भूमि कपास की कृषि के लिए प्रसिद्ध है ।

यद्यपि कपास प्रमुख माली फसल (Cash Crop)  है, लेकिन ट्यूबवेल सिंचाई विकास के कारण इन प्रदेशों में गन्ने की कृषि भी प्रारम्भ हुई है । महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और गुजरात का सूरत जिला गन्ने की कृषि में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं ।

ऊपर वर्णित तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत मानसूनी जलवायु का क्षेत्र होने के बावजूद ‘फसलों की विविधता’ का देश है । विभिन्न प्रदेशों में फसलों के बीच संयोजन की स्थिति भी है । लेकिन परंपरागत जीवन निर्वाह कृषि के कारण संयोजन की प्रवृत्ति सुदृढ़ नहीं हो सकी है । फिर भी अधिकतर कृषि क्षेत्रों में चावल एक महत्त्वपूर्ण फसल है ।