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अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल “जैविक कृष”


अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल


जैविक कृषि (Bio-Agriculture)

जैविक कृषि एक प्रकार की प्राकृतिक कृषि है । इसमें जुताई और निराई नहीं की जाती । कृत्रिम खाद और कीटनाशकों का भी प्रयोग नहीं किया जाता । फसल को केवल बोया और काटा जाता है । मृदा की उर्वरता की वृद्धि जैविक तरीके से की जाती है । यह पद्धति ऊँची गुणवत्ता तथा मात्रा के लिये जैविक विधियों पर निर्भर है, जो आधुनिक कृषि तकनीक की तरह ही बेहतर है ।
जैविक कृषि के लाभ

1. प्रदूषण रहित
2. ऊर्जा की कम खपत
3. चूँकि रासायनिक खाद तथा कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता है, अतः इनके उत्पादों में किसी प्रकार के हानिकारक तत्त्व नहीं होते ।
4. यन्त्रों का कम प्रयोग किया जाता है ।
5. इसमें लागत कम और उत्पादन उत्कृष्ट कोटि का होता है ।

जैविक कृषि की समस्यायें

1. भूमि संसाधन जैविक कृषि से परम्परागत कृषि की ओर तीव्रता से स्थानान्तरित हो रहे हैं।
2. यदि परम्परागत खेती से जैविक खेती अपनाते हैं, तो शुरूआती फसलों की हानि होती है।
3. रासायनिक खादों के प्रयोग से जैविक नियंत्रण कमजोर पड़ गया है या समाप्त हो गया है। इन रसायनों से मुक्ति के लिये कम से कम तीन या चार वर्षों का समय लगता है ।
4. कृषक नई पद्धति अपनाने में बिना सरकारी सहायता के संकोच करते हैं ।वर्तमान कृषि पद्धति की अनुपयोगिता के कारण कृषि के सामने एक गंभीर चुनौती है । वर्तमान कृषि पद्धति में बड़ी मात्रा में रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों का प्रयोग किया जाता है, जो कि मृदा उर्वरता और संरचना के लिये बहुत अधिक हानिकारक है । अत्यधिक रसायनों के प्रयोग से जैविक संतुलन बिगड़ रहा है । कृषि उत्पादों में भी हानिकारक तत्त्व पहुँच गये हैं । फलतः मनुष्यों को कैंसर जैसी भयानक बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है । कृषि उत्पाद पूरी तरह से प्रदूषित हो गये हैं ।

साथ ही कुछ समय बाद कृषि भूमि की उत्पादकता भी कम हो जाती है । अतः आज जैविक कृषि पद्धति को अपनाना मनुष्य तथा जैविक सन्तुलन को बनाये रखने के लिये अत्यंत आवश्यक है । कृषि में स्थायित्त्व लाने का एकमात्र रास्ता यही है कि ‘पर्यावरण के अनुकूल कृषि प्रणाली’ जो ‘प्राकृतिक कृषि प्रणाली’, अथवा ‘जैविक कृषि’ कही जाती है, को सुरक्षित आहार एवं स्वच्छ वातावरण प्राप्त करने के लिए अपनाया जाए ।

स्थानान्तरीय/झूमिंग कृषि (Shifting Cultivation)

सामान्यतः जंगली अथवा पर्वतीय क्षेत्रों में जनजातियों द्वारा वनों की सफाई करके की जाने वाली खेती ‘स्थानान्तरीय कृषि (Shifting Cultivation)  अथवा ‘चलवासी कृषि’ (Migratory agriculture) कहलाती है । इस कृषि को ‘बुश एवं फैलो Bush and Fallow) तथा ‘स्वीडेन कृषि’ जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है । कृषक परिवार चूंकि जंगल काटकर तथा झाडि़यों एवं छोटे-मोटे पेड़-पौधों को जलाकर खेत तैयार करता है, इसलिए इसे ‘स्लैश एवं बर्न कृषि’ Slash and Burn agriculture) द्ध भी कहते हैं । इस प्रकार तैयार किए गए खेत की राखयुक्त मिट्टी में पहली वर्षा के बाद मोटे अनाज बिखेर कर बो दिए जाते हैं।

इस प्रकार के खेतों से 2 या 3 वर्षों तक फसल प्राप्त की जाती है । उसके बाद पुनः नई भूमि साफ कर ली जाती है । सामान्यतः इस कृषि में खाद्यान्न (चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि) फसलों की प्रधानता रहती है । इसके बावजूद इस कृषि-पद्धति द्वारा इतना भी उत्पादन नहीं होता कि किसान अपना भरण-पोषण पूरी तरह से कर सके । जबकि विडम्बना यह है कि ऐसी कृषि प्रायः कम जनसंख्या वाले आदिवासियों के क्षेत्र में होती है, जहाँ भूमि बहुतायत रूप से उपलब्ध होती है । वस्तुतः इस कृषि की विशेषता यह है कि इसमें न्यूनतम श्रम तथा पूँजी लगती है ।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है । भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में इसे ‘झूम’ (Jhum)  अथवा ‘जून कृषि’, आन्ध्रप्रदेश तथा उड़ीसा में ‘पोडू’ (Podu), ‘दाबी’, ‘कमान’ एवं ‘ब्रिंगा’, मध्य प्रदेश के विभिन्न भागों में ‘बीरा’(Beera), ‘पेंडा’, ‘दाह्या’;Dahy छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर जिले में ‘दीपा’;Deepaकेरल में ‘पोनम’;(Ponam)], हिमाचल प्रदेश में ‘खील’;*(Khil, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में ‘वालरा’ ;(Valara) तथा प.घाट में ‘कुमारी’(Kumari)   कहते हैं ।
झूमिंग कृषि अथवा स्थानान्तरीय कृषि द्वारा निम्न रूप में परिस्थितिकी असन्तुलित हो रहे हैं-

1. निर्वनीकरण,
2. प्रदूषण – (वृक्षों को जलाने से),
3. मृदा अपरदन,
4. भूस्खलन,
5. जैव का हृस

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