STUDY METERIAL GEOGRAPHY IND 16

अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल “संरक्षण”


अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल


संरक्षण

संरक्षण

ऐसा अनुमान किया जाता है कि स्थानान्तरित कृषि यहाँ लगभग 40 लाख हेक्टेयर भूमि पर की जाती है । सरकार ने झूमिंग कृषि को हतोत्साहित करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए हैं –

1. बागवानी कृषि पर बल –

 इसके तहत् उत्तर-पूर्वी राज्यों में रबड़, चाय आदि बगानी कृषि को प्रोत्साहित किया गया है । नागालैण्ड में रबड़ की खेती प्रारम्भ हुई है। उड़ीसा में काजू तथा केरल में गर्म मसालों के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है ।

2. सीढ़ीदार कृषि (Terrace farming)

स्थायी तथा पारिस्थितिकीय कृषि के लिए पहाड़ी ढ़ालों को सीढ़ीनुमा खेतों में बदल दिया जाता है । हिमालय पर्वत के ढ़ालों पर इस प्रकार की कृषि को बड़े पैमाने पर अपनाया जा रहा है । इन खेतों में चावल, आलू, चाय आदि की खेती की जाती है ।

3. ढ़ाल अनुरुप कृषि –

 उबड़-खाबड़ क्षेत्रों में ढ़ाल अनुरुप कृषि को अपनाया गया है । इसके लिए उड़ीसा राज्य में साल्ट ;(SALT – Slope Agriculture Land Technology)  कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके अन्तर्गत भूमि के समतलीकरण का कार्य किया जाता है तथा समतल खेतों पर खाद्यान्न सहित अन्य फसलों का उत्पादन किया जाता है । साथ ही दो खेतों के मध्य के कगारों पर मृदा-अपरदन नियंत्रण हेतु वृक्षारोपण किया जाता है ।

उपरोक्त विधियों तथा विभिन्न विकास कार्यों के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों में स्थानान्तरीय अथवा झूमिंग कृषि में संलग्न कृषकों को स्थायी कृषि कार्य में लगाने में सरकार ने बहुत सफलता पाई है । इसी का परिणाम है कि आज बदलते हुए समय में विकास कार्यों के साथ इस कृषि का महत्त्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है ।

शुष्क कृषि (Dry Farming)

‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (ICAR) के अनुसार 110 सेमी. से कम वर्षा का क्षेत्र शुष्क कृषि का क्षेत्र है । यह वह कृषि है, जिसमें सिंचाई जल (आयातित जल) का उपयोग नहीं होता । मृदा नमी पर आधारित कृषि ही शुष्क कृषि है । (ICAR)  ने भारतीय कृषि को दो भागों में बाँटा है – वर्षा आधारित, तथा सिंचित कृषि ।

शुष्क कृषि की प्रमुख विशेषताएँ

भारत के शुष्क कृषि प्रदेश की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

1. यह मृदा की नमी पर आधारित कृषि का क्षेत्र है। यहाँ सिंचाई के लिए पानी का अभाव रहता है ।

2. यह जीवन-निर्वाह कृषि का क्षेत्र है ।

3. यह श्रम सघन कृषि है ।

4. प्रति हेक्टेयर उत्पादकता कम है । मृदा में नमी के अभाव के कारण बीज अंकुरण तथा पौधे के विकास की समस्या रहती है ।

5. मानसून की अनिश्चितता रहती है ।

6. मोटे अनाज, दलहन, तिलहन और कपास जैसी फसलों की प्रधानता है ।

7. यहाँ उत्पादन में अत्यधिक उतार एवं चढ़ाव देखा जाता है ।

8. कृषि की विधि परंपरागत विधि, जिसके अंतर्गत कृषक वर्षा ऋतु के आगमन के पूर्व अपने खेतों की गहरी जुताई करते हैं । मूंग, तिल जैसी फसल लगाते हैं, जो संचित नमी के आधार पर 45 से 50 दिन के अंदर तैयार हो जाती हैं । लेकिन किसी प्रकार की संरचनात्त्मक निवेश न होने के कारण उत्पादकता कम होती है ।

9. वर्षा की कमी के कारण परती भूमि में तेजी से वृद्धि हुई है ।

10. यह पशुपालन का क्षेत्र भी है । परती भूमि अधिक होने के कारण पशुपालन जैसी अर्थव्यवस्था का विकास हुआ है ।

11. यहाँ पेयजल का संकट रहता है ।ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के शुष्क कृषि क्षेत्र में परंपरागत कृषि अपनाने के कारण कृषि पिछड़ेपन की अवस्था है । अतः यह खाद्य संकट, गरीबी, जीवन निर्वाह, कृषि और पिछड़ेपन का क्षेत्र बन चुका है । सरकार ने इस ‘शुष्क कृषि क्षेत्र’ के विकास पर विशेष ध्यान दिया है, ताकि इन क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाया जा सके । इन क्षेत्रों के विकास से पर्यावरण संतुलन तो कायम होगा ही, ग्रामीणों के लिए रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होंगे । इससे ग्रामीण श्रमिकों का गाँव से शहर की ओर स्थानान्तरण भी रुकेगा ।

इन लाभों को देखते हुए सरकार ने इन क्षेत्रों के विकास को उच्च प्राथमिकता दी है । इसके तहत 1989 के सूखे के बाद इस क्षेत्र में आधुनिक कृषि विकास का प्रयास प्रारंभ किया गया । हरित क्रांति के दूसरे चरण में दलहन और तिलहन जैसे फसलों के उत्पादन में वृद्धि के लिए इस क्षेत्र को प्राथमिकता दी गयी ।

पाँचवी पंचवर्षीय योजना में ही DPAP (Drounght Prone Area Programme), DDP (Desert Development Programme) क्रमशः 1973 तथा 1977-78 में प्रारंभ किये गये । प्रथम अप्रैल 1995 से ये दोनों कार्यक्रम जल संभर परियोजनाआ (Watershed Project) के आधार पर चल रहे हैं । लेकिन वृहत् स्तर पर नियोजित ढ़ंग से कृषि विकास का कार्य सातवीं पंचवर्षीय योजना से प्रारंभ किया गया ।

शुष्क प्रदेश में कृषि विकास के दिशा में कार्यक्रम

– भारत के शुष्क प्रदेशों में कृषि विकास की योजनाएँ मुख्यतः पाँचवी पंचवर्षीय योजना से शुरू हुई है । वर्तमान समय में विकास कार्य को टिकाऊ तथा पारिस्थितिकी के अनुरुप बनाने के लिए निम्नलिखित कार्यक्रमों को प्राथमिकता से प्रारंभ किया गया है –

1. राजस्थान, पश्चिमी मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में लकड़ी के हल के बदले लोहे के हल को प्राथमिकता दी जा रही है । समन्वित ग्रामीण विकास योजना ;प्त्क्च्द्ध के अंतर्गत इसके लिए किसानों को ऋण भी दिया जा रहा है । कमजोर वर्ग को विशेष आर्थिक छूट दी जा रही है। इस प्रकार के हल के प्रयोग से गहरी जुताई होती है जो वर्षा के जल को अधिक गहराई तक ले जाता है । यह मृदा में नमी की मौजूदगी तुलनात्त्मक दृष्टि से अधिक दिनों के लिए रखता है, जो फसल के लिए बहुत लाभकारी होता है ।

2. वर्षा की अनिश्चितता के कारण पशुपालन को वैकल्पिक अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित किया जा रहा है । पश्चिमी भारत में तुलनात्मक दृष्टि से कम कड़ी स्टेपी घास उगाई जाती है, जो पशुओं के लिए ज्यादा अनुकूल है । इन्हीं परिस्थितियों के कारण इस प्रदेश को श्वेत-क्रांति के लिए उपयुक्त माना गया है । वर्तमान समय में महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश अपनी आवश्यकता से अधिक दूध का उत्पादन कर रहे हैं ।

3. पर्यावरण को ध्यान में रखकर सातवीं पंचवर्षीय योजना में शुष्क प्रदेश के कृषि विकास हेतु तिलहन, दलहन, ज्वार, बाजरा, सब्जी, फल और फूल की कृषि को प्राथमिकता दी गयी है । इनमें से अधिकतर फसल 30 से 45 दिन के अंदर तैयार हो जाती है, जो मृदा नमी की मदद से संभव है । पुनः आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय जल संसाधन से हल्की सिंचाई भी की जा सकती है ।

4. सिंचाई की नवीन तकनीक को विकसित किया गया है । नहर सिंचाई को हतोत्साहित किया गया है । स्थानीय जल की मदद से कृषि विकास की योजना बनाई गई है । इसके लिए प्राकृतिक गड्ढ़ों में सतह के जल के संचयन, को प्राथमिकता दी गयी है । ऐसे गड्ढ़ों में संचित जल आस-पास की मृदा की नमी में वृद्धि करता है । नमी की यह वृद्धि मुख्यतः हरी-सब्जी और फूलों की कृषि के लिए बहुत अनुकूल है ।
भारत के शुष्क प्रदेश में टपक (Drip Irrigation)  और छिड़काव सिंचाई ;(Sprinkle Irrigation)  भी विकसित की गई है । इससे मृदा संरक्षण होता है, पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है । साथ ही फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होती है । प्रारंभ में इस सिंचाई के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्र राजस्थान में था । लेकिन वर्तमान में यह कर्नाटक में है । कर्नाटक के बीजापुर और धारवाड़ जिला ड्रिप और स्प्रिंकल सिंचाई के लिए प्रसिद्ध हैं । कर्नाटक के बाद क्रमशः महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और राजस्थान का स्थान आता है । इस सिंचाई के उपकरणों को खरीदने के लिए सामान्य कृषकों को 5000 तथा अनुसूचित जाति और जनजाति को 7,000 रू. की विशेष छूट भी दी गयी है ।

5. जलापूर्ति के लिए राष्ट्रीय जल ग्रिड योजना प्रारम्भ की गई है ।

6. शुष्क कृषि विकास के लिए Watershed प्रबंध नीति अपनायी गयी है । इसके अंतर्गत संपूर्ण नदी बेसिन प्रदेश को लघु प्रवाह के आधार पर Watershed प्रदेशों में विभाजित किया जा रहा है । यह कार्य विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय की देखरेख में हो रहा है । इस कार्य में स्वयंसेवी संस्थाओं को भी लगाया गया है । इसके लिए विश्व बैंक से भी सहायता मिली है । अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का प्रमुख कारण इस प्रबंध की टिकाऊ प्रवृत्तियाँ हैं । राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इसे प्राथमिकता से लागू किया जा रहा है ।

7. शुष्क कृषि के लिए नये संकर बीजों के विकास पर जोर दिया जा रहा है । इस दिशा में कुछ सफलता भी मिली है । रागी, गेहूँ, कपास, सरसों और चना के संकर बीज शुष्क कृषि प्रदेश में हरित क्रांति जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं । कर्नाटक के वृष्टि छाया प्रदेश में रागी के संकर बीज के प्रयोग के द्वारा हरित क्रांति की स्थिति आ गई है । इसी प्रकार राजस्थान में कल्याण गेहूँ तथा गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान और सौराष्ट्र में कपास के उत्पादन में क्रांति जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है ।

8. भारत के शुष्क प्रदेश में सामाजिक वानिकी को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है । इसे दो भागों में बाँटा गया है । 1/ गर्म शुष्क प्रदेश – यहाँ खेतों के विभाजक रेखा पर वृक्ष लगाये जा रहे हैं । इसके दो उद्देश्य हैं । प्रथमतः खेतों को छाया प्रदान करना, जिससे वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया धीमी हो । दूसरा जलावन तथा अन्य आवश्यकताओं के लिए लकड़ी की प्राप्ति । राजस्थान इस कृषि में अग्रणी है । 2/ शीतोष्ण शुष्क प्रदेश (जम्मू कश्मीर, लद्दाख, हिमालय का उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र) । यहाँ मुख्यतः वानिकी को प्राथमिकता दी गयी है । इसमें शहतूत के वृक्ष लगाये जा रहे हैं, जो आर्थिक दृष्टि से अधिक उपयोगी हैं ।
9. मल्शिंग( (Mukching) . इस विधि के द्वारा वृक्षों की छाया में खेती की जाती है । शुष्क प्रदेश में इस विधि से भी खेती की जाती है ।

10. फसल चक्र नीति को भी प्राथमिकता दी गयी है । कृषि पदाधिकारियों द्वारा कृषकों को सलाह दी जाती है कि मक्का तथा ज्वार में से कोई एक ही फसल लगायें और इन्हें काटने के बाद दलहन अथवा चना को प्राथमिकता दें । इस प्रक्रिया से मृदा के पोषक तत्त्व संतुलित रहते हैं।

यद्यपि शुष्क प्रदेश के कृषि विकास हेतु अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं, लेकिन कुछ नवीन कायक्रमों को भी चलाने की जरूरत है । जैसे –

1. अनेक क्षेत्रों में और मुख्यतः मध्य प्रदेश में भूमि को समतल करने की जरूरत है । इससे मृदा क्षरण कम होगा, भूमिगत जल स्तर में सुधार होगा तथा मृदा नमी का अधिक सरंक्षण होगा । मध्यप्रदेश में Badland Topography Development Authority का गठन किया गया है । इसका मूल उद्देश्य है-चंबल की भूमि को समतल बनाना । शुष्क प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी इस प्रकार के कार्यक्रमों की जरूरत है ।

2. इस प्रदेश में कृषि का मशीनीकरण संभव है, क्योंकि जनसंख्या दबाव कम होने के कारण तुलनात्मक दृष्टि से जोत का आकार बड़ा है । अतः लोहे के हल के बदले यदि ट्रेक्टर से जुताई होती है, तो मृदा संरक्षण की अवधि और भी अधिक हो सकती है ।

3. इस प्रदेश के कृषक आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से कम विकसित हैं । अतः उन्हें सरलीकृत प्रक्रिया से ऋण देने की आवश्यकता है ।

4. कृषकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाने की जरूरत है । इससे कृषकों में नयी कृषि प्रौद्योगिकी के प्रति जागरूकता आयेगी ।

5. शुष्क क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले संकर बीज के संदर्भ में और अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है।

ट्रांसजैनिक कृषि (Transgenic Agriculture)

पौधों की उत्पादकता तथा उसमें इच्छित गुणों को प्राप्त करने के लिए जैव-प्रौद्योगिकी ;ठपव.जमबीदवसवहलद्ध के माध्यम से जीन में हेर-फेर करके जो पौधा प्राप्त किया जाता है, वह ‘ट्रांसजैनिक पौधा’ कहलाता है । कृषि उत्पादन में वृद्धि लाने की दिशा में यह एक आधुनिकतम तथा क्रांतिकारी कदम है।
ट्रांसजैनिक पौधों को विकसित करना एक जटिल प्रक्रिया है । ऐसे पौधों के विकास में डी.एन.ए. एक प्रमुख सूत्रधार की भूमिका निभाता है । दरअसल इच्छित गुण वाले ट्रांसजैनिक पौधों को प्राप्त करने के लिए उस पौधे में किसी असंबद्ध जीव (unrelated species) के डी.एन.ए. का एक या एक से अधिक जीन को निकालकर अति सूक्ष्म शल्य-क्रिया द्वारा, रोपित किया जाता है । इसे ‘रिकम्बेंट डी.एन.ए. (Recombent DNA Technology )  तकनीक कहते हैं । इस प्रकार टांसजैनिक पौधा एक जीन रूपांतरित पौधा होता है, जिसे जी.एम.ओ. (GMO-Geneticaly Modified Organism) के नाम से भी जाना जाता है। ध्यान देने की बात है कि ट्रांसजैनिक पौधा और संकर पौधा दो भिन्न अवधारणाएँ हैं । संकर पौधा, (Hybrid Plant)  वह होता है, जो दो अथवा दो से अधिक प्रकार के एक ही प्रजाति के मिश्रण से प्राप्त किया जाता है तथा जिनमें दोनों जाति के गुण विद्यमान होते हैं । जबकि ट्रांसजैनिक पौधे के जीन में परिवर्तन किसी भी आवश्यकतानुसार प्रजाति के चयन की मदद से किया जा सकता है । ट्रांसजैनिक पौधे प्राप्त करने के मूल उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

(क)
 उत्पादकता तथा गुणवत्ता में वृद्धि लाना,
(ख) विभिन्न प्रतिरोधात्मक क्षमताओं का विकास करना, जैसे – अलग-अलग रोगों के प्रति, शुष्कता के प्रति आदि ।
(ग)
 पौष्टिकता बढ़ाना ।

विश्व में सर्वप्रथम बेल्जियम ने इस तकनीक के प्रयोग से तोरी (repeseed)  की शाक प्रतिरोधी प्रजाति का विकास किया था । इसी प्रकार अमेरिका ने मक्का (Maize)  की कीट प्रतिरोधी प्रजाति का विकास किया ।

भारत ने हाल में ‘बीटी कपास ;Bt Cotton)’  जो उच्च उत्पादकता, रोग प्रतिरोधक क्षमता, शुष्क प्रतिरोधी क्षमता जैसे गुणों से युक्त है, का विकास एक जीवाणु ;(BT-Bacillus Thuringienses)  के जीन की मदद से किया है । यह कपास बाद में बहुत ही विवादास्पद हो गई । कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए इस तकनीक का प्रयोग फल-सब्जी, दलहन, तिलहन, तम्बाकू आदि में भी करने के प्रयास किया जा रहे  हैं । कृषि के अतिरिक्त वानिकी, बागवानी आदि के क्षेत्रों में भी रोग प्रतिरोधी, कीट प्रतिरोधी एवं शाक प्रतिरोधी जैसी किस्म के विकास के प्रयास किए जा रहे हैं । इसकी सफलता में, उत्पादन में वृद्धि की अपार संभावनाएँ छिपी हुई हैं । वहीं इस तकनीक के कुछ संभावित खतरे भी हैं ।

कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जैसे मौनसेंटा एवेंटिस्, होएस्ट आदि का समर्थन करती हैं और पूरे विष्व को अपनाने की सलाह देती है । इसके विपरीत ब्रिटिष वैज्ञानिक अपने प्रयोगों के आधार पर इसे बहुत हानिकारक बता रहे हैं । इसीलिए यह एक बहस का विषय बन गया है । इसके प्क्ष तथा विपक्ष में निम्न तर्क हैं:-

पक्ष – विपक्ष

पक्ष

 – जी. एम. के समर्थन में इसके समर्थकों द्वारा निम्न तर्क दिये जा रहे हैं:-
(1) जी. एम. के द्वारा फसलों के उत्पादन को इतना बढ़ाया जा सकता है कि विष्व की बढ़ती हुई जनसंख्या का पेट भरा जा सकता है अर्थात् इसके द्वारा दुनिया से भुखमरी मिट सकती है ।

(2) जी.एम. फसलों में कीटनाषकों, उर्वरकों व खरपतवार नाषको का कम या लगभग नहीं के बराबर प्रयोग होता है जबकि परंपरागत कृषि में यह दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है ।

(3) इस तकनीकी के द्वारा फसलों के जीनों में मनमुताबिक फेर बदल कर जी.एम. तकनीक द्वारा खाद्यान्नों में पोषक तत्त्वों को बढ़ाया जा सकता है ।

(4) परंपरागत कृषि में एक बार में (एक मौसम में) कोई एक ही फसल उगायी जा सकती है जबकि जी.एम. की मदद से एक मौसम में दो बार फसल उगायी जा सकती है ।

(5) परंपरागत फसलों की अपेक्षा प्रति एकड़ की उपज भी अधिक होती है । जो सभी के लिए लाभदायक सिद्ध होगी ।

(6) मक्के की संवर्धित फसल ने तीन वर्षों की निगरानी में पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डाला अतः इसे उगाया जा सकता है ।

(7) जेनेटिक इंजीनियरिंग की कला जंगली फसलों, फूलों, फलों को सामान्य और उपयोगी प्रणालियों में तब्दील करने के अलावा फसलों की जैविक अपंगता दूर करने में सक्षम है । इसीलिए इसका मोह छोड़ना आसान नहीं है ।

प्रतिपक्ष –

ब्रिटिष वैज्ञानिकों द्वारा तिलहन, चुकंदर और मक्के की जी.एम. फसलों का तीन साल तक वृहद अनुसंधान किया तथा निष्कर्ष निकाला की जी.एम. फसलें हमारे लिए खतरनाक हैं । अपने निष्कर्ष के संबंध में इन्होंने निम्न तर्क दिए –


(1) तिलहन, चुकंदर व मक्का इन तीनों में से दो फसलें पाइप और कीट प्रजातियों के विनाष का कारण बन रही है । इसीलिए इनके व्यावसायिक उत्पादन की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए ।

(2) जी. एम. फसल वाले खेतों में तितलियाँ नहीं आती हैं जो कि परंपरागत फसल की खेती में कीड़े-मकोड़ों का भोजन कर उसे सुरक्षित बनाती हैं ।

(3) जी. एम. (फसल) की कृषि को अपनाने के बाद इसके लिए हमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ेगा जो कि भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है और धीरे-धीरे परंपरागत खेती की जानकारी भी भूलते जाऐंगे । इससे कृषि प्रधान एषिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के लगभग 104 करोड़ किसानों के लिए खतरा साबित हो सकता है।

(4) जी.एम. की फसल 26 किलोमीटर दूर तक परंपरागत फसल के परागों को नष्ट कर सकती है ।

(5) कीड़े-मकोड़ों के लिए जैविक वातावरण को समाप्त करता है जिससे कीड़े-मकोड़े जी.एम. के क्षेत्र में रह नहीं पाते हैं । अर्थात् इससे जैविक प्रदूषण फेलता है ।
 

निष्कर्ष –

 जब तक जी.एम. की जैविक प्रदूषण रहित होने की पुष्टि नहीं हो जाती तब तक हमें जी.एम. फसलों को नहीं अपनाना चाहिए क्योंकि इसके दुष्प्रभावों को देखते हुए पुष्टि से पहले अपनाना जैविक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर खतरनाक सिद्ध हो सकता है । हमारे देष में इसके लिए जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जी इ एस सी) नाम की संस्था हे, जिसकी इजाजत के बगैर किसी भी तरह की जी.एम. फसल हमारे यहाँ नहीं उगायी जा सकती । लेकिन दुर्भाग्य से यह संस्था इस बारे में जरूरत से कम चैकन्ना है । इसी के तहत गुजरात में कुछ किसानों ने चोरी छिपे बी टी कपास (जी.एम.) के उतपादन को शुरू किया था । इस संस्था को काफी समय बाद इसकी जानकारी मिली थी । अतः इस संस्था को चैकस होने की जरूरत है ।
सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे देष में न तो एकसा कोई कानून है और न ही ऐसी कोई प्रक्रिया है जो जी.एम. फसलों से होने वाले जैविक प्रदूषण का पता लगा सके और दोषी को दण्डित हकया जा सके । ऐसे में चोरी छिपे किसान इसके मोह में पड़कर अपना सकते हैं अतः केन्द्र सरकार को इसे रोकने के कारगर कदम उठाने चाहिए ।
 

कार्बनिक-कृषि –

कार्बनिक कृषि एक प्रकार की प्राकृतिक-कृषि विधि है, जिसमें उर्वरक, तथा कीटनाशक, आदि किसी भी चीज का प्रयोग नहीं किया जाता । इसमें बस बीज बो दिया जाता है और फसल काट ली जाती है। इसमें जैविक अवशेषों से मिट्टी की उर्वरता को बढ़ने दिया जाता है । अपने विकसित रूप में यह जैविक प्रक्रियाओं द्वारा उच्च गुणवत्ता तथा उत्पादकता लाती है, जो अक्सर आधुनिक कृषि के उत्पादन के बराबर होती है।

  • कार्बनिक-कृषि के लाभ:-

 (I) प्रदूषण में कमी;
(II) ऊर्जा की बचत,
(III)रासायनिक चीजों के प्रयोग न होने से उनके अवशेषों के दुष्प्रभाव से भी मुक्ति;
(IV) मशीनों का अल्प इस्तेमाल;
 (V) उर्वरकों तथा कीटनाशकों की अनुपस्थिति के कारण कीट भी कम लगते हैं;
(VI) आधुनिक कृषि के बराबर उत्पादन ;
(VII) आधुनिक विधि से उत्पादित खाद्यान्न से अधिक पोषक;
(VIII) विकासशील कृषि की एक अच्छी विधि है ।

  •  कार्बनिक-कृषि की समस्या:-

(I) भूमि-संसाधन को कार्बनिक-कृषि से परंपरागत कृषि में आसानी से बदला जा सकता है, लेकिन इसकी उल्टी प्रक्रिया आसान नहीं है;
(II) यदि तेजी से कृषि को कार्बनिक कृषि में बदला जाय, तो प्रारंभिक फसल की हानि होती है;
(III) पहले इस्तेमाल किये गए रसायनों के कारण जैविक नियंत्रण की मिट्टी की शक्ति कमजोर या नष्ट हो सकती है, जिसे प्राप्त करने में तीन से चार वर्ष लग सकते हैं;
(IV) बिना सरकारी सहायता के किसान इस नई विधि को अपनाने में डर सकते हैं ।

  • कार्बनिक-कृषि का महत्व:-

(I)कृषि की वर्तमान प्रणाली (आधुनिक) में अस्थिरता आज कृषि-क्षेत्र की एक बड़ी समस्या है । इस समस्या की प्रकृति एवं विस्तार को हम इसके इन परिणामों से समझ सकते हैं ।
(II) बिना मिट्टी के संरक्षण का उपाय किये गहन कृषि करने से मरुभूमि का विस्तार होगा ।
(III) बिना पर्याप्त जल-निकासी की व्यवस्था के सिंचाई करने से मिटृटी की क्षारीयता या लवणता में वृद्धि होगी।
(IV) कीटनाशकों, खर-पतवार नाशकों, फफूँदी-नाशकों के बेतहाशा प्रयोग से पर्यावरण-संतुलन बिगड़ सकता है। साथ ही, इनसे कैंसर तथा अन्य रोग भी बढ़ सकते हैं । सिंचाई के लिए भूमिगत जल के अवैज्ञानिक प्रयोग से जल-स्तर बहुत नीचे जा सकता है जबकि युगों से प्राकृतिक कृषि के कारण ये जल हमें अब तक मिलते आ रहे हैं । फसलों के स्थानीय प्रकारों का आधुनिक एवं ज्यादा उत्पादन वाली फसलों द्वारा विस्थापन से ऐसी गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं जिनसे पूरी की पूरी फसल ही नष्ट हो जाय ।

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *