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अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल “हरित-क्रांति”


अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल


हरित-क्रांति (Green Revolution)

भारत एक कृषि प्रधान देश है । परन्तु अंग्रेजी शासन के दौरान भारतीय कृषि उपेक्षित रही। परिणाम यह हुआ कि हमारी कृषि-पद्धति पिछड़ती चली गई । ऊपर से सूखा, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने यहाँ की स्थिति बदतर कर दी । अनाज के लिए हम दूसरे देशों पर निर्भर हो गए । देश की तत्कालीन खाद्यान्न समस्याओं को देखते हुए भारतीय नियोजन में द्वितीय पंचवर्षीय योजना को छोड़कर सभी योजनाओं में कृषि को वरीयता प्रदान की गई ।

चीन युद्ध (1962), पाक युद्ध (1965) एवं भयंकर सूखा (1966) से यहां की अर्थव्यवस्था जर्जर हो गई । तीसरी योजना के अंतिम वर्ष 1965-66 में देश के सामने गम्भीर खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो गया । लाचार होकर भारत को अमेरिका के च्स्.480 कानून के अन्तर्गत गेहूं का आयात करना पड़ा । इस आयात ने हमारे देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक तथा राजनीतिक रुप से कमजोर कर दिया । अमेरिका ने इसी आयात की आड़ में हमारे देश की नीतियों तक में हस्तक्षेप करना आरम्भ किया । इन्हीं सब कारणों से चैथी पंचवर्षीय योजना को समय पर शुरू नहीं किया जा सका । इसके स्थान पर शुरु किए तीन वार्षिक योजनाओं – 1966-67, 67-68, 68-69 में खाद्यान्न संकट के समाधान के लिए कृषि-विकास पर सर्वाधिक ध्यान दिया गया ।

 इसके फलस्वरुप कृषि विकास के क्षेत्र में गत्यात्मक परिवर्तन आया, जिसे ‘हरित-क्रांति (Green Revolution) कहा गया । और इसी के साथ भारतीय कृषि में एक नए युग की शुरूआत हुई । अब यह देश खाद्यान्न में न केवल आत्मनिर्भर है, बल्कि अब अनाज का निर्यात तक करने लगा है । इसका जीता-जागता प्रमाण अनाज से ठसाठस भरे यहाँ के सरकारी गोदाम हैं ।

भारत में हरित-क्रांति का आगमन दो चरणों में हुआ –

(1) प्रथम चरण – 1966 के सूखे के बाद तथा
(2) द्वितीय चरण – 1987 के सूखे के बाद

‘हरित-क्रांति’ के प्रथम चरण की पृष्ठभूमि वस्तुतः द्वितीय पंचवर्षीय योजना (56-61) के अन्त से ही तैयार होने लगी थी । दरअसल 1959 में ‘फोर्ड फाउण्डेशन’ की रिपोर्ट – ‘भारत की खाद्य समस्या तथा इससे निबटने के उपाय ;(India’s Food Crisis and steps to Meet it) के आधार पर भारत सरकार ने 1960 में ‘सघन कृषि जिला कार्यक्रम (Intensive Agriculture District Programme)’  भिन्न-भिन्न राज्यों के चयनित 7 जिलों में सर्वप्रथम पायलट योजना के रूप में लागू किया । उत्साहवर्द्धक परिणामों को देखते हुए 1965 में इस योजना के क्षेत्र को विस्तृत कर 114 जिलों में ‘गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (Intensive Agriculture Areas Prog.)  के नाम से लागू किया परन्तु उन्नत बीजों के अभाव में कार्यक्रम सफल नहीं हो पा रहा था । बाद में 1966-67 में उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक पर आधारित ‘नयी कृषि रणनीति (New Agriculture Strategey)’ को एक पैकेज कार्यक्रम के रूप में लागू किया गया । इसलिये इसे ‘हरित क्रांति तकनीक’ अथवा ‘पैकेज टेक्नोलॉजी ’ के नाम से जाना जाता है ।

इस ‘नई कृषि रणनीति (NAS) के दो विशिष्ट पहलू हैं –

1. मुख्य पहलू –

 इसके अन्तर्गत उत्तम किस्म (HYV-SEEDS)  के बीज, अधिक उपज तथा कम समय में पककर तैयार होने वाली फसल, उर्वरक, कीटनाशक औषधि तथा सिंचाई के विकास को प्राथमिकता दी गई।

2. गौण पहलू –

 मुख्य पहलू के अतिरिक्त कृषि के समुचित विकास के लिए अन्य पहलुओं पर भी विशेष ध्यान दिया गया । इनमें प्रमुख हैं – आधुनिक कृषि उपकरण, आसान शर्तों पर ऋण की उपलब्धता, बुआई के पहले न्यूनतम खरीद मूल्य की घोषणा तथा ग्रामीण विद्युतीकरण ।

इस प्रकार नई कृषि रणनीति’ के अन्तर्गत ही उपरोक्त अपनाए गए विभिन्न पहलओं एवं प्रक्रियाओं से कृषि उत्पादकता तथा कुल उत्पादन में भारी परिवर्तन हुआ, और यही परिवर्तन ‘हरित क्रांति’ है । इस क्रांति में नई उन्नत-बीज के साथ-साथ उर्वरक का भी विशेष योगदान है । इसलिए यह ‘नई बीज उर्वरक तकनीकी’ के नाम से भी जाना जाता है । इन्हीं पृष्ठभूमियों (हरित क्रांति) में ‘भारतीय कृषि का आधुनिकीकरण’ के साथ-साथ ‘पूंजीवादी कृषि का विकास’ प्रारंभ होता है ।

इस हरित-क्रांति की अगुआई में सर्वाधिक अहम भूमिका ‘उन्नत किस्म के बीज (High Yied Variety seeds)ने निभायी है । इसलिए यहाँ इस पर थोड़ा प्रकाश डालना प्रासंगिक होगा । इस उन्नत किस्म के बीज ;(HYV seeds)  का भी अपना एक दिलचस्प इतिहास है ।

बात उन दिनों की है, जब मैक्सिको के वैज्ञानिक डॉ . नारमैन ई. बोरलोग, जिन्हें विश्व में ‘हरित-क्रांति का जन्मदाता’ माना जाता है, जापान के वैज्ञानिक डॉ . एस.सी. साल्मन के द्वारा गेहूँ की खोजी गई बौनी किस्म – ‘Norin-10’  का स्थानीय प्रजाति के साथ संक्रमण कराकर गेहूँ की एक उन्नत किस्म विकसित की । इस खोज ने न केवल 1956 में मैक्सिको को गेहूँ उत्पादन में आत्म-निर्भर बना दिया, बल्कि भारत सहित एशिया के अनेक देशों को भूखमरी से मुक्ति दिलायी।

 डॉ  नारमैन बोरलाग के इन्हीं योगदानों के लिए 1970 में शांति का नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। 1963 में भारत के तात्कालिक केन्द्रीय कृषि मंत्री – सी.सुब्रहमण्यम, जिन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत-रत्न’ से भी नवाजा गया है, तथा जिन्हें भारत में हरित क्रांति का जन्मदाता माना जाता है, ने डॉ . बोरलाग को भारत आमंत्रित किया । डॉ . बोरलाग ने ‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (ICAR) के महानिदेशक डॉ  एम.एस. स्वामिनाथन जो भारत में ‘हरित-क्रांति के सूत्रधार माने जाते हैं, के तत्वावधान में चल रहे ‘गेहूँ अनुसंधान कार्यक्रम’ की समीक्षा की तथा बौनी किस्मों की भारत में सफलता की सम्भावनाओं का पता लगाया ।

 डॉ  बोरलाग ने भारत के प्रमुख गेहूँ उत्पादक क्षेत्रों का भ्रमण करके यह पाया कि भारत की कृषि क्षेत्र की जलवायु काफी कुछ मैक्सिको की जलवायु से मेल खाती है, और इस बात की पूरी उम्मीद की गई कि बौनी मैक्सिकन किस्में भारत में भी सफल हांगी । इसी आशा से उन्होंने अच्छी पैदावार वाली बौनी किस्म – (क) सोनोरा – 63, (ख) सोनोरा-64 (ग) मायो – 64 तथा (घ) लर्मा रोजो 64-ए की किस्में काफी मात्रा में भारत भिजवाईं । किन्तु यहाँ ‘भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) द्वारा 2 किस्मों को बेहतर पाया गया –

1. लर्मा रोजो 64 तथा 2. सोनोरा-64.

परन्तु इन गेहूँओं में एक कमी थी । इनके दाने लाल रंग के थे, जिसे भारतीय पसंद नहीं करते थे। डॉ . स्वामीनाथन ने सोनोरा-64 का उपचार गामा और पराबैंगनी किरणों से किया और ऐसी किस्में प्राप्त कीं, जिनमें लाल रंग नहीं था । इतना ही नहीं, बल्कि उनमें प्रोटीन की मात्रा भी सामान्य से अधिक थी । इस किस्म का नाम ‘शर्बती सोनोरा’ रखा गया । इसके अतिरिक्त ‘कल्याण सोना’ तथा ‘सोनालिका’ नामक किस्में भी विकसित की गईं । आज भारत में गेहूँ की कई उन्नत किस्में उपलब्ध हैं । इन्हीं सब कारणों से गेहूँ के उतपादन में भारी वृद्धि हुई और शीघ्र ही भारत न केवल आत्मनिर्भर हो गया, बल्कि निर्यात भी करने लगा ।

गेहूँ की तरह धान की भी अर्ध-बौनी, अधिक उपज, रोग प्रतिरोधी तथा उर्वरक संवेदनशील किस्म – ‘जया’ का विकास किया गया । इसके बाद धान के अन्य उन्नत किस्मों – काॅवेरी, लीला, विजया, रत्ना, कृष्णा, जगन्नाथ आदि विकसित की गईं । इन सबके बावजूद हरित-क्रांति के प्रथम चरण में चावल की कृषि अधिक विकसित नहीं हो पाई । इस काल में गेहूँ ही प्राथमिक फसल बनी रही । अन्य फसलें – तिलहन, दलहन अथवा अन्य व्यापारिक फसलें उपेक्षित ही रहीं । यही कारण है कि हरित-क्रांति के प्रथम चरण को ‘गेहूँ क्रांति काल’ भी कहा जाता है । इस प्रकार भारत में गेहूँ उत्पादन की अप्रत्याशित वृद्धि के साथ 66-67 में ‘हरित क्रांति का प्रादुर्भाव हुआ ।

हरित-क्रांति के दो विभिन्न चरणों में निम्नलिखित आधारभूत भिन्नताएं हैं –

हरित-क्रांति – 1
(1966 के सूखे के बाद)

इस चरण में प्रादेशिक ‘केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति’ है । इस हरित-क्रांति से पंजाब, हरियाणा, प0 उत्तर प्रदेश और राजस्थान के गंगानगर जिले को लाभ मिला था ।

हरित क्रांति उन्हीं क्षेत्रों में प्रारम्भ की गइर्, जहाँ ‘नहर-सिंचाई’ की सुविधाएँ उपलब्ध थीं ।

इसमें गेहूँ प्राथमिक फसल थी । यही कारण है कि इसे ‘गेहूँ क्रांति काल’ भी कहा गया है । हालांकि मक्का तथा ज्वार, बाजरा के ‘संकर बीज’ का भी प्रयोग किया गया ।

इस चरण में कीटनाशक के उपयोग को प्राथमिकता नहीं दी गई । यहाँ तक कि रासायनिक उर्वरक अथवा अन्य प्रकार की सुविधाओं पर सरकार द्वारा कोई छूट नहीं प्रदान की गई ।

प्रथम चरण में फसलों का विविधीकरण नहीं हुआ ।

हरित-क्रांति – 2
(1987 के सूखे के बाद)

जबकि दूसरे चरण में विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति है। इस चरण का हरित-क्रांति 14 राज्यों के 169 जिलों में प्रारम्भ किया गया । इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के 38 जिले, मध्य प्रदेश के 30, बिहार के 18, तमिलनाडु के 9, पश्चिम बंगाल के 7, उड़ीसा के 5 तथा असम के 3 जिलों को सम्मिलित किया गया ।

‘हरित-क्रांति’ उन क्षेत्रों में भी लाई गई, जहां लघु-सिंचाई (ट्यूबवेल, कुँआ आदि) और तालाब सिंचाई जैसी सुविधाएँ उपलब्ध थीं ।

इसने ‘चावल’ को प्राथमिकता दी गई । इसी कारण से इस चरण को श्ळतवू डवतम त्पबम च्तवहतंउउमश् भी कहा गया है ।

इस चरण में कीटनाशक के उपयोग को प्राथमिकता दी गई और इसके उत्पादन पर उत्पाद-शुल्क में छूट दी गई । इतना ही नहीं रासायनिक उर्वरक में छूट में लगातार वृद्धि की गई । संकर बीज तथा रासायनिक

उर्वरक की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि छोटे बंद पैकेटों में भी इनकी आपूर्ति करें । इससे लघु-कृषकों को भी हरित क्रांति का लाभ मिल सकेगा ।

इस काल में फसलों का विविधीकरण हुआ । चावल के अतिरिक्त दलहन और तिलहन को भी प्राथमिकता दी गई ।

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