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अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल पीली क्रांति”


अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल


पीली क्रांति (Yellow Revolution)

हरित क्रांति की अगली कड़ी के रूप में यानी हरित क्रांति के द्वितीय चरण में, विकास की योजना बनाई गई, जिसके अन्तर्गत तिलहनों के उत्पादन में वृद्धि लाने के लिए नवीन रणनीति अपनायी गयी । दूसरे शब्दों में, खाद्य तेलों और तिलहन फसलों के उत्पादन के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास की रणनीति को पीली क्रान्ति का नाम दिया गया । हमारे यहाँ तिलहन के अन्तर्गत 9 प्रकार के निम्नलिखित बीज आते हैं –

1. सरसों और तोरिया, 2. सोयाबीन 3. सूरजमुखी 4. अरण्डी 5. अलसी 6. कुसुम्ब 7. मूँगफली 8. तिल और 9. नाइजर ।

भारतीय भोजन में प्रति व्यक्ति वसा एवं तेल की वार्षिक उपलब्धता केवल 6 किलोग्राम है, जबकि विश्व की उपलब्धता औसतन 18 किलोग्राम है । भारत में कुल कृषि उत्पादक क्षेत्र में लगभग 10 प्रतिशत क्षेत्र में इसकी खेती की जाती है । देश के कुल कृषि उतपाद का लगभग 10 प्रतिशत भाग तिलहन फसलों से प्राप्त होता है।

साठ के दशक तक भारत तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर था । किन्तु सिंचित क्षेत्र में कम प्रतिशत और मौसम की अनिश्चितता के कारण बढ़ती आबादी के साथ देश में तेलों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता कम होती गई, जबकि भारत की जलवायु तिलहन उत्पादन के सर्वथा उपयुक्त है ।

तिलहन उत्पादन कम होने के कारण

1. कुल कृषि भूमि में तिलहनी फसलों का कम क्षेत्रफल ।

2. घरेलू बीजों का उपयोग, जिसके कारण तेल की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव ।

3. खाद्य एवं उर्वरकों का नगण्य उपयोग ।

4. फसल सुरक्षा एवं वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग न किया जाना ।

5. मिश्रित फसली खेती में दलहन उत्पादन को प्राथमिकता देना ।

तिलहन उत्पादन बढ़ाने हेतु सरकारी प्रयास

1. ‘तिलहनों’ का तकनीकी मिशन  (Technology Mission on oil-seeds) की स्थाना – 1987-88 में भारत सरकार ने एक टेक्नोलॉजी  मिशन की शुरूआत की, जिसने सहकारी समितियों, कृषि अनुसन्धानों तथा ऋण प्रदान करने वाली संस्थाओं की मदद से तिलहन के उत्पादन में वृद्धि के लिए भरसक प्रयास किए हैं । टेक्नोलॉजी मिशन ने उत्पादन तकनीकों में विकास करने के साथ-साथ उत्पादन के बाद की प्रक्रियाओं  जैसे – बीज प्रोसेसिंग, सम्भरण आदि को भी बेहतर बनाने का प्रयास किया ।

2. न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि – तिलहन के उतपाद का आकर्षक बनाने के लिए सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी पर्याप्त वृद्धि की है । 1989 में कृषि लागत एवं कीमत आयोग ने तिलहन की वसूली कीमतों में भारी वृद्धि की ।

3. उन्नत किस्म के बीज – सरकार ने किसानों को उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराकर देश की तिलहन उत्पादकता को बढ़ाने का प्रयास किया है ।

4. भण्डारण और वितरण की सुविधाएँ

5. राष्ट्रीय कृषित सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (नेफेड) की स्थापना ।

6. राष्ट्रीय तिलहन एवं वानस्पतिक विकास बोर्ड (NOBOD)  की स्थापना ।

इस प्रकार इस क्षेत्र में अपनाए गए समन्वित प्रयासों के बाद भारत तिलहन उत्पादन में न केवल आत्मनिर्भर हुआ है, बल्कि तिलहन उत्पादों का निर्यात भी करने लगा है । सन् 1987 ई. में तिलहन का कुल उत्पादन 1.27 करोड़ था जो 1998-99 में बढ़कर 2.5 करोड़ टन हो गया । तिलहन के इस उत्पादन वृद्धि में सर्वाधिक योगदान मूंगफली का है, जो कुल उत्पादन का लगभग 35 प्रतिशत है ।

 मूंगफली के अतिरिक्त सरकार ने सोयाबीन तथा सूर्यमुखी फसल को किसानों के बीच एक मुख्य आकर्षक तिलहन उत्पादन के रूप में स्थापित किया है । विदित हो भारत में सोयाबीन का सबसे बड़ा उत्पादक ‘मध्य-प्रदेश’ है । इसलिए इसे ‘सोया-प्रदेश’ के नाम से भी जाना जाता है । सभी तिलहनों के सम्मिलित उत्पादन में, भारत में राजस्थान का प्रथम स्थान है इसलिए इसे ‘सुनहरा राज्य (Golden States) भी कहते हैं । इसके अतिरिक्त, उत्तर-प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार आदि में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है ।

राष्ट्रीय कृषि नीति (National Agriculture Policy)

केन्द्र सरकार द्वारा 28 जुलाई, 2000 को नई राष्ट्रीय कृषित नीति की घोषणा की गई । यदि हम 21वीं सदी में आने वाली चुनौतियों का सक्षम रूप से सामना करना चाहते हैं, तो कृषि क्षेत्र के विकास कार्यक्रम पर सर्वाधिक ध्यान देना होगा । अतः नई राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा सही समय पर लिया गया उचित फैसला है ।

नई राष्ट्रीय कृषि नीति के उद्देश्य

नई राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा के पीछे निम्नलिखित उद्देश्य निहित हैं –

1. भारतीय कृषि की विशाल अछूती संभावनाओं का पता लगाकर उसका दोहन करना ।

2. ग्रामीण क्षेत्र में ढांचागत सुविधओं को मजबूत बनाना ।

3. वर्ष 1997 से 2007 तक यानि 10 वर्षों की अवधि में अनाज उत्पादन को दोगुना करना ।

4. कृषि का सतत् विकास, रोजगार-सृजन तथा ग्रामीण क्षेत्रों को स्वावलम्बी बनाकर किसानों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना, तथा

5. पर्यावरण को बनाए रखना ।

इस नीति से भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था को आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी । इस कृषि नीति का मुख्य उद्देश्य खाद्यान्न की घरेलू मांग को पूरा करते हुए कृषि उत्पादन के निर्यात में भारत को अग्रणी बनाकर प्रथम पंक्ति में लाना है ।
राष्ट्रीय कृषि नीति के प्रमुख विन्दु निम्नलिखित हैं –

(1) भूमि सुधारों को और अधिक कारगर बनाया जाएगा एवं भूमि सुधारों के जरिए गरीब किसानों को भूमि प्रदान की जायेगी ।

(2) कृषि विनेश में, विशेषकर कृषि अनुसंधान, मानव संसाधन विकास, फसलोपरांत प्रबन्धन व विपणन जैसे क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश के अलावा निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित किया जाएगा ।

(3) कृषि के साथ-साथ पशुपालन, मुर्गीपालन, डेयरी उद्योग तथा जल-कृषि (वाटर हार्वेस्टिंग) के विकास पर पर्याप्त बल दिया जाएगा ।

(4) कृषि विकास के एक प्रमुख संचालक के रूप में ग्रामीण विद्युतीकरण को उच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

(5) किसानों को सामयिक और पर्याप्त ऋण प्रदान करने के लिए ग्रामीण और कृषि ऋण की पुख्ता व्यवस्था की जाएगी ।

(6) व्यवहार्य कृषि और बागवानी फसलों की उन्नत किस्मों के साथ पशुधन प्रजातियों और जलकृषि को उच्च प्राथमिकता प्रदान की जाएगी ।

(7) उत्तर-पश्चिमी राज्यों की तरह पूरे देश में जोतों का समेकन किया जाएगा । निर्धारित सीमा से अधिक और परती भूमि का भूमिहीन किसानों तथा बेरोजगार युवकों में प्रारंभिक पूँजी के साथ पुनः वितरण किया जाएगा ।

(8) पट्टेदारी व्यवस्था में सुधार करते हुए पट्टेदारी तथा फसल हिस्सेदारी के अधिकारों को मान्यता दी जाएगी ।

(9) अप्रयुक्त बंजर भूमि को उपयोग में लाने के उद्देश्य से इसको कृषि और वनोरोपण के लिए प्रयोग में लाया जाएगा ।

(10) प्रौद्योगिकी निर्माण एवं हस्तांतरण तथा कृषि क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए व्यापार शर्तों में सुधार तथा बाह्य एवं आंतरिक मंदी में सुधार आदि पर जोर दिया जाएगा ।

(11) खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के तहत एक राष्ट्रीय पशु-प्रजनन नीति बनाई जाएगी, ताकि दूध, अण्डा, मांस एवं पशु उत्पादों की आवश्यकता की पूर्ति की जा सके ।

(12) प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में 4 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि के लक्ष्य की पूर्ति करने के उद्देश्य से उच्च गुणवत्ता वाले बीज, उर्वरकों, पौध संरक्षण, रसायन, जैव कृमिनाशी, कृषि मशीनरी एवं कर्ज को उचित दरों पर तथा समय से माँग के अनुरूप किसानों तक पहुँचाया जाएगा ।

(13) जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था को जारी रखा जाएगा ।

(14) सरकार कृषि क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए उचित कदम उठाएगी । इसके अन्तर्गत देश की विशाल जैव विविधता की सूची बनाने तथा उसे वर्गीकृत करने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम बनाया जाएगा ।

(15) किसानों के जोखिम प्रबन्ध का पूरा ध्यान रखते हुए कृषि उत्पादों के मूल्यों में उतार-चढ़ाव सहित बुवाई से फसल की कटाई तक किसानों को बीमा पाॅलिसी पैकेज उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा।

(16) ट्रिप्स समझौते का पालन करते हुए नई पौध किस्मों के प्रजनन और अनुसंधान को प्रोत्साहन देने के लिए पौध किस्मों को संरक्षण दिया जाएगा ।

(17) किसानों को ब्रांडयुक्त बीजों को छोड़कर अपनी कृषि से बचाए हुए बीजों के उपयोग, विनिमय, लेन-देन एवं बिक्री के अधिकार यथावत बने रहेंगे । नौंवी पंचवर्षीय योजना का उद्देष्य दस वर्ष में खाद्यान्न उत्पादन को दोगुना करना और देश को अनाज की कमी के खतरे से मुक्त करना था । इस उद्देश्य को पूरा करने की दिशा में नई कृषि नीति मील का पत्थर साबित होगी । किन्तु किसी भी नीति की सफलता के लिए राजनीतिक व प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जन सहभागिता एवं उचित संसाधनों की आवश्यकता होती है । कृषि नीति की सफलता भी इन्हीं सब बातों पर निर्भर करेगी ।

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