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अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल “भूमि-सुधार”


अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल


भूमि-सुधार

भारत सरकार ने कृषि उतपादन बढ़ाने के लिए कई प्रयास किये हैं, जिनमें कृषि का आधुनिकीकरण प्रमुख है । इसके अलावा कुछ संस्थागत प्रयास भी किये गये हैं । संथागत सुधारों का तात्पर्य भूमि सुधारों से है। भूमि-सुधार का तात्पर्य भूमि के स्वामित्व की ऐसी व्यवस्था करना है, जिससे न सिर्फ किसानों को न्याय और लाभ मिल सके, बल्कि कृषि उत्पादन में भी वृद्धि हो सके । भूमि सुधारों के अन्तर्गत सरकार ने निम्न कदम उठाए हैं –

(1) भूस्वामित्व सुधार –

इसके अन्तर्गत सरकार ने पूर्व से चली आ रही जमींदारी, रैयतवाड़ी, महलवाड़ी इत्यादि व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया है इसके अन्तर्गत सरकार ने तीन कार्य किए हैं –

(क) बिचैलिया की समाप्ति करना,

(ख) काश्तकारों को प्रत्यक्ष भू-स्वामित्व प्रदान करना, तथा

(ग) लगान का नियमन

(2) जोतों की चकबंदी –

यत्र-तत्र बिखरे खेतों को एक साथ व्यवस्थित कर सिंचाई के साधनों सहित अन्य प्रकार की सुविधाओं के विकास द्वारा भूमि की उत्पादकता बढ़ाई गई ।

(3) सहकारी कृषि का प्रारम्भ,

(4) जोतों की निम्नतम सीमा का निर्धारण,

(5) कृषि-जलवायु प्रादेशिक नियोजन

(6) बरानी कृषि/शुष्क कृषि का विकास

(7) सीढ़ीनुमा खेतों का विकास

(8) मेड़बन्दी

(9) बीहड़ों का समतलीकरण

(10) ऊसर भूमि (पायराइट अथवा जिप्सम खादों का प्रयोग करके) का विकास

(11) मृदा सर्वेक्षण एवं संरक्षण कार्यक्रम, तथा

(12) सिंचाई का विकास (विशेषकर शुष्क क्षेत्रों में)

जल – संसाधन (Water Resources)

भारत एक कृषि प्रधान देश है, इसलिए यहाँ की अर्थव्यवस्था के विकास में जल की महत्त्वपूर्ण भूमिका है । यद्यपि भारत में पर्याप्त वर्षा होती है एवं जल-संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, तथापि समुचित जल-प्रबंधन के अभाव में देश में उपलब्ध वर्षा जल का 25 प्रतिशत ही सिंचाई कार्यों केलिए उपयोगी हो पाता है ।

जल संसाधन समिति (1995) के अध्यक्ष डाॅ. एम. एस. स्वामीनाथन का कहना था कि ‘तकनीकी घटक के सदृश्य जल प्रबन्धन के सामाजिक आयाम महत्त्वपूर्ण हैं । जल वितरण में जब तक समानता नहीं होगी तब तक जल की बचत में सहयोग संभव नहीं है । जल का बाजार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है और संभव है कि अगली शताब्दी में भू-स्वामित्त्व का स्थान जल-स्वामित्व ले ले ।’’

सिंचाई

वर्षा के अभाव में खेतों को कृत्रिम ढंग से जल उपलब्ध कराने की क्रिया ‘सिंचाई’ कहलाती है । भारत में मानसून की अनिश्चितता तथा अनियमितता देखी जाती है । इतना ही नहीं बल्कि इस वर्षा का वितरण भी बहुत असमान है । फिर जहाँ वर्षा होती भी है, तो वह कुछ महीनों में सीमित है । दूसरी ओर कुछ विशेष फसलों के लिए अधिक जल की आवश्यकता पड़ती है । इन्हीं सब कारणों से जल की आवश्यकता पड़ती है, जिसकी पूर्ति कृत्रिम तरीके से करनी होती है, जो सिंचाई के द्वारा ही संभव है । इस प्रकार खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ व्यावसायिक फसलों में वृद्धि, चारागाहों के विकास तथा सूखा को रोकने के लिए सिंचाई आवश्यक है ।

सिंचाई के साधन

भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियाँ पाई जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप सिंचाई के साधन भी भिन्न-भिन्न हैं । उदाहरणतः उत्तरी भारत में सिंचाई मुख्यतः नहरों तथा कुओं से होती है । जबकि दक्षिणी भारत में तालाब का प्रयोग किया जाता है । मुख्य रूप से भारत में सिंचाई के लिए निम्नलिखित साधनों का प्रयोग किया जाता है:

I. नहरें

नहरें भारत में सिंचाई का प्रमुख साधन है । भारत की कुल सिंचित भूमि का लगभग 39 प्रतिशत क्षेत्र नहरों द्वारा सींचा जाता है । अधिकांश नहरें उत्तरी-पश्चिमी भारत के मैदानी भाग में है । इस भाग में अधिक नहरों के होने के निम्नलिखित कारण हैं –

(1) यहाँ पर बहने वाली नदियाँ हिमालय के हिमाच्छादित भागों से निकलती हैं, जिनमें सालों भर जल प्रवाहित होता रहता है ।

(2) यहाँ की मिट्टी कोमल व मुलायम है, जिससे आसानी से नहरें खोदी जा सकती हैं ।

(3) यहाँ की मिट्टी बहुत उपजाऊ है, परन्तु वर्षा की मात्रा कम है । अतः कृषि कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए नहरों की आवश्यकता होती है ।

(4) इस भाग में ढ़ाल काफी मन्द है । फलस्वरूप नहरों के जल को ढ़ाल के सहारे दूर-दूर तक ले जाया जा सकता है ।

नहरों द्वारा सिंचाई के गुण

नहरों द्वारा सिंचाई के निम्नलिखित गुण हैं –
1. सालों भर सिंचाई कार्य – नहरों द्वारा वर्ष भर जल प्रदान किया जाता है ।

2. उपजाऊ मृदा का वाहक – नदियों द्वारा पर्वतों से लाई गई मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है, जो नहरों द्वारा खेतों तक पहुँचाई जाती है । इस प्रकार मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनी रहती है । इससे कृषि उत्पाद में वृद्धि होती है ।

3. सुदूर क्षेत्रों में भी सिंचाई संभव – नहरों के द्वारा एक जगह के जल को बहुत दूर भी आवश्यकता के अनुसार ले जाया जा सकता है ।

4. जल विद्युत उत्पादन – नहरों से कहीं-कहीं सिंचाई के साथ-साथ जल-विद्युत का उत्पादन भी होता है ।

5. जल-परिवहन का साधन – नहरों का उपयोग नौ-परिवहन के लिए भी किया जाता है ।

6. सस्ता रख-रखाव – नहरों के निर्माण में आरम्भ में तो अधिक व्यय होता है, परन्तु एक बार बन जाने के बाद नहरें बिना किसी अतिरिक्त व्यय के निरन्तर सिंचाई प्रदान करती रहती हैं।

नहरों द्वारा सिंचाई के अवगुण

1. जलाक्रांतता – नहरों का जल रिस कर आस-पास के क्षेत्रों में भर जाता है । इससे जल की हानि होती है और कई स्थानों पर नहर के साथ-साथ दलदल पैदा हो जाती है जो कृषि के लिए उपयुक्त नहीं रह जाती ।

2. मलेरिया जैसी बीमारियों के होने का खतरा – नहरों के आसपास दलदली भूमि में प्रायः मच्छर पनप जाते हैं जिससे मलेरिया फैलने का भय रहता है । इंदिरा गांधी नहर के आस-पास इस समस्या को देखा जा सकता है ।

3. भूमि में लवणता की मात्रा में वृद्धि – नहरों द्वारा अति सिंचाई से भूमिगत जल का तल ऊपर आ जाता है जिससे भूमि के भीतरी भाग के लवण धरातल पर आ जाते हैं । लवणों की अधिकता के कारण भूमि ऊसर हो जाती है । ऐसी समस्या उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा के कई भागों में उत्पन्न हो गई है । महाराष्ट्र की नीरा नदी की घाटी में नमक की तह जम जाने से लगभग 36 हजार हेक्टेयर भूमि कृषि के लिए अयोग्य हो गई है ।

4. बाढ़ का स्रोत –
 वर्षा ऋतु में कई बार नहरों के तट टूट जाते हैं, जिससे नहर के निकटवर्ती क्षेत्र बाढ़ग्रस्त हो जाते हैं । इससे फसलों, पशुओं तथा अन्य जान-माल की हानि होती है ।

5. ऊबड़-खाबड़ धरातल पर सिंचाई संभव नहीं – 
नहरों द्वारा सिंचाई केवल समतल मैदानी भागों में ही सम्भव है । पर्वतीय तथा पठारी भागों में भूमि पथरीली तथा ऊबड़-खाबड़ होती है, जिससे नहरें खोदना कठिन होता है। इसके अतिरिक्त नहर अपने स्रोत से ऊँचे इलाके में जल को ले जाने में असमर्थ होते है । कहीं-कहीं स्पजि प्ततपहंजपवद से उच्च भागों मे नहरों का जल पहुँचाया गया है, परन्तु इस पर अत्यधिक व्यय होता है ।

6. नहर से जल के साथ खर
-पतवार के बीज भी खेतों में खेतों में पहुँच जाते हैं, जो फसल के साथ बढ़कर उसे नुकसान पहुँचाते हैं ।

II कुएं तथा नलकूप

 भू-पृष्ठ के नीचे संचित जलराशि का प्रयोग कुओं तथा नलकूपों की सहायता से किया जा सकता है । कुएँ तथा नलकूप मिलकर भारत की लगभग 46 प्रतिशत भूमि की सिंचाई करते हैं । कुएँ – कुओं से सिंचाई करना एक सस्ता एवं सुगम कार्य है । कुएँ दो प्रकार के होते हैं – (1) कच्चे, (2) पक्के । कच्चा कुआँ अस्थायी होता है और उन प्रदेशों में खोदा जाता है जहाँ भूमिगत जलस्तर 3 से 5 मीटर की गहराई पर होता है । पक्के कुएँ अधिक गहराई तक खोदे जाते हैं ।

उनके निर्माण में अधिक श्रम तथा धन की आवश्यकता होती है । परन्तु लाभ भी अधिक होता है । कुओं में से पानी ढ़ेकली, पुर या चरस तथा रहट की सहायता से निकाला जाता है । सन् 1950-51 में भारत में लगभग 50 लाख कुएँ थे । उनकी संख्या तीन गुनी बढ़कर 150 लाख हो गई है । गुजरात के कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 78 प्रतिशत भाग कुओं द्वारा सींचा जाता है। इसी प्रकार राजस्थान की 62 प्रतिशत, पंजाब व उत्तर प्रदेश की 60 प्रतिशत तथा महाराष्ट्र की 56 प्रतिशत सिंचित भूमि कुओं से ही सींची जाती है । लगभग 50 प्रतिशत कुएँ अकेले उत्तर प्रदेश में हैं ।

नलकूप . यह एक साधारण कुएँ जैसा ही होता है । लेकिन इससे जल अधिक गहराई से नल द्वारा निकाला जाता है । जल प्राप्त करने के लिए बिजली की मोटर, डीजल के इंजन अथवा अन्य किसी शक्ति-स्रोत का प्रयोग किया जाता है ।

नलकूप द्वारा सफल सिंचाई के लिए निम्नलिखित दशाएँ आवश्यक हैं;

(1) भूमि के नीचे पर्याप्त भूमिगत जल होना चाहिए ।

(2) भूमिगत जल का तल 150 मीटर से अधिक गहरा नहीं होना चाहिए ।

(3) सस्ती चालक शक्ति उपलब्ध हो, ताकि बिजली पर व्यय अधिक न हो ।

(4) मिट्टी उपजाऊ होनी चाहिए, ताकि नलकूप के निर्माण तथा चालक शक्ति पर किया गया व्यय अधिक उत्पादन से पूरा हो सके ।

कुओं व नलकूपों द्वारा सिंचाई के गुण

कुओं व नलकूपों द्वारा सिंचाई के निम्नलिखित गुण हैं –

(1) सिंचाई का सस्ता साधन – कुओं के निर्माण में नहरों तथा तालाबों की अपेक्षा बहुत कम व्यय होता है। अतः भारत के निर्धन कृषक के लिए कुआँ सस्ता, सुगम तथा उपयुक्त साधन है ।

(2) जल के साथ आवश्यक तत्व मृदा को प्राप्त होते हैं – कुआं के जल में अनेक रासायनिक तत्त्व, जैसे नाइट्रेट, क्लोराइड, सल्फेट व सोड़ा आदि घुले रहते हैं । जब ये तत्त्व कुएँ के जल के साथ खेत में जाते हैं, तो मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ जाती है । इससे कृषि के उत्पादन में वृद्धि होती है ।

(3) सिंचाई का स्वतन्त्र साधन – कुआँ सिंचाई का एक स्वतन्त्र साधन है । जबकि नहर द्वारा सिंचाई के लिए सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है ।

(4) मृदा के लवणीय होने का खतरा नहीं – नहरों द्वारा सिंचाई करने से रेह उत्पन्न हो जाती है ।इससे भूमि ऊसर हो जाती है । कुओं द्वारा सिंचाई करने से यह भय नहीं रहता ।

(5) कुआँ कहीं भी खोदना संभव – कुआँ कहीं भी खोदा जा सकता है, जबकि नहरों द्वारा सिंचाई हर जगह नहीं की जा सकती है ।

(6) किसान को कर देने से मुक्ति – नहरों द्वारा सिंचाई करने के लिए कृषक को बार-बार कर देना पड़ता है । जबकि कुआँ खोदने के लिए एक ही बार व्यय करना होता है ।

कुओं व नलकूपों द्वारा सिंचाई के अवगुण

यद्यपि कुँओं व नलकूपों द्वारा सिंचाई के कई गुण हैं, तथापि ये पूर्णतः दोषरहित नहीं हैं । इसके निम्नलिखित अवगुण हैं:

(1) सीमित क्षेत्र की ही सिंचाई – कुओं द्वारा केवल सीमित क्षेत्र को ही सिंचाई प्रदान की जा सकती है। सामान्यतः एक कच्चा कुआँ एक से डेढ़ हेक्टेयर तथा पक्का कुआँ 6 से 8 हेक्टेयर भूमि को ही सींच सकता है ।

(2) अधिक जल प्राप्त करना संभव नहीं – लगातार अधिक जल निकलने से कुआँ सूख जाता है और सिंचाई के लिए उपयुक्त नहीं रहता ।

(3) व्यय और परिश्रम अधिक – कुआँ व नलकूपों द्वारा सिंचाई करने में व्यय तथा परिश्रम दोनों ही अधिक होता है । अतः यह सिंचाई केवल उन्हीं फसलों के लिए उपयुक्त है, जिनसे किसान को अधिक आर्थिक लाभ हो, जैसे – गेहूँ, कपास, गन्ना आदि ।

(4) ज्यादा भरोसेमंद नहीं – सूखे की स्थिति में भूमिगत जल नीचा हो जाता है और कई कुएँ सूख जाते हैं । इस प्रकार जब जल की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, तब इन कुओं से जल प्राप्त नही होता ।

(5) टिकाऊ नहीं – कुछ वर्षों के बाद पक्के कुएँ भी अपक्षय के कारण नष्ट हो जाते हैं ।

(6) भूमिगत जल के हृास की संभावना – नलकूप दूर-दूर से भूमिगत जल खींच लेते हैं, जिससे भूमि के सूख कर अनुपजाऊ हो जाने का भय रहता है ।

(7) सभी भूमिगत जल उपयुक्त नहीं  – बहुत से इलाकों में भूमिगत जल ‘खारा’ होता है । वहाँ पर खोदे गए कुओं का जल सिंचाई तथा पीने के लिए उपयुक्त नहीं होता । पश्चिमी राजस्थान तथा पंजाब व हरियाणा के दक्षिण-पश्चिमी भागों में भूमिगत जल प्रायः खारा होता है ।

III तालाब

भूमि का वह निम्न भाग जिसमें जल भरा होता है तालाब कहलाता है । तालाब दो प्रकार के होते हैं-

(1) प्राकृतिक,

(2) कृत्रिम ।

प्राकृतिक तालाब वे निचले स्थान हैं, जो प्राकृतिक रूप से ही चारों ओर से ऊँचे स्थानों द्वारा घिरे होते हैं । कृत्रिम तालाबों का निर्माण गड्ढे़ खोदकर तथा बाँध बनाकर किया जाता है ।भारत के अधिकांश तालाब दक्षिण के पठारी भाग में पाए जाते हैं । इसका कारण यह है कि यहाँ पर प्राचीन कठोर चट्टानों से निर्मित ऊबड़-खाबड़ भूमि है, जहाँ नहरें अथवा कुएं खोदना असम्भव है। कठोर होने के कारण अधिकांश चट्टानें अप्रवेश्य (Impermeable)  हैं, जिनमें जल अवशोषण करने की क्षमता नहीं होती ।

इस प्रकार इन इलाकों में भूमिगत जल का अभाव रहता है । ऐसी परिस्थिति में वर्षा का जल निम्न क्षेत्रों में भर जाता है, एक तालाब का रूप धारण कर लेता है । निम्न क्षेत्र में एकत्रित हुए इस जल का प्रयोग सिंचाई के लिए किया जाता है । यहाँ की नदियाँ शुष्क ऋतु में सूख जाती हैं जिनसे नहरें नहीं निकाली जा सकतीं । इसके अतिरिक्त यहाँ की नदियों की घाटियाँ बहुत पुरानी हैं और अपने आस-पास के इलाकों से काफी नीची हैं । अतः इनका जल नहरों द्वारा खेतों तक नहीं ले जाया जा सकता।

तालाबों का वितरण

भारत में तालाबों द्वारा लगभग 38 लाख हेक्टेयर भूमि (कुल सिंचित भूमि का लगभग 8 प्रतिशत) सींची जाती है । तालाबों द्वारा सिंचाई के राज्य मुख्यतः आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, पश्चिमी बंगाल, महाराष्ट्र, उड़ीसा, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान हैं । भारत में आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु तथा कर्नाटक का तालाब द्वारा सिंचाई में क्रमशः प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान है ।

तालाबों द्वारा सिंचाई के गुण

(1) निर्माण में कम खर्च – दक्षिणी भारत में अधिकांश तालाब प्राकृतिक हैं, जिनके निर्माण में अधिक व्यय नहीं होता । कृत्रिम तालाबों के निर्माण पर भी अधिक व्यय नहीं होता क्योंकि ये तालाब प्रायः तीन ओर से ऊँची भूमि द्वारा घिरे हुए होते हैं और केवल एक ओर ही बाँध बनाकर जल को रोकना होता है ।

(2) अधिक टिकाऊ साधन – तालाब प्रायः कठोर चट्टानी इलाकों में स्थित होते हैं, जिससे वे शीघ्र नष्ट नहीं होते ।

(3) मत्स्य उत्पादन – तालाबों में मत्स्य उत्पादन भी किया जाता है । इससे अतिरिक्त आय होती है और भोजन की समस्या को हल करने में सहायता मिलती है ।

तालाबों द्वारा सिंचाई के अवगुण

तालाबों द्वारा सिंचाई के निम्नलिखित अवगुण हैं:
(1) साल भर सिंचाई संभव नहीं – बहुत से तालाब शुष्क ऋतु में सूख जाते हैं, जिससे सिंचाई कार्य में बाधा पड़ती है ।

(2) रख-रखाब अधिक खर्चिला – तालाबों में प्रतिवर्ष वर्षा के जल के साथ बड़ी मात्रा में अवसाद का निक्षेप हो जाता है । इससे उनकी गहराई कम हो जाती है और जल ग्रहण करने की क्षमता घट जाती है । इसलिए समय-समय पर तालाबों की सफाई करनी पड़ती है, जिस पर धन व्यय होता है।

(3) सीमित क्षेत्र में ही सिंचाई संभव – कुओं की भाँति तालाबों से भी सीमित क्षेत्र को ही सिंचा जा सकता है ।

(4) कठिन सिंचाई कार्य –
 पथरीली भूमि पर तालाब से खेतों तक जल पहुँचाने का कार्य बहुत कठिन होता है ।

IV  सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए सिंचाई की आधुनिक विधियाँ

भारत का लगभग 35 प्रतिशत भाग सूखाग्रस्त है । भारत का सूखाग्रस्त क्षेत्र देश के पश्चिमी तथा उत्तरी-पश्चिमी भाग में स्थित है, जहाँ वर्षा की मात्रा 75 सेमी. से कम होती है । फलस्वरूप इन भागों में शुष्क-मेखला कृषि या वर्षा-पूरित कृषि होती है । शुष्क-मेखला कृषि में सिंचाई के जल का संतुलित प्रयोग करना होता है, जिसके लिए हाल के वर्षों में दो प्रणालियों का विकास किया गया है ।

1. टपक सिंचाई (Drip Irrigation),  तथा

2. छिड़काव सिंचाई Sprinkle Irrigation
 

1. टपक सिंचाई – इसे बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली या माइक्रो सिंचाई भी कहा जाता है । इस विधि का सर्वप्रथम प्रयोग इज्राइल के द्वारा किया गया था । इस प्रणाली का प्रयोग दूर-दूर लगे पौधों की सिंचाई के लिए किया जाता है, जिसमें पाइपलाइन के द्वारा जल को क्षेत्र में पहुंचाया जाता है तथा जल को उत्सर्जकों ;क्पचचमतद्ध द्वारा पौधों की जड़ के समीप धीरे-धीरे बूंदों से डाला जाता है । इस सिंचाई प्रणाली में उत्सर्जक उपकरणों के रूप में स्ट्रिप ट्यूब, एमिटस, जेंट्स या फिर छोटे फब्बारों का इस्तेमाल किया जाता है।

तमिलनाडु तथा कर्नाटक राज्यों में इस सिंचाई द्वारा नारियल का उत्पादन होता । महाराष्ट्र में गन्ना, अंगूर तथा अन्य बागवानी फसलंे पैदा की जाती हैं । टपक सिंचाई प्रणाली द्वारा सिंचाई दक्षता 90 प्रतिशत से अधिक हो जाती है, जबकि छिड़काव प्रणाली में यह लगभग 65 प्रतिशत से 70 प्रतिशत होती है ।इस सिंचाई पद्धति के लाभ हैं – जल की बचत, बेहतर जल-अन्तर्वेशन, ऊर्जा की बचत, बेहतर उपज तथा लवणता नियन्त्रण । यह पद्धति छिड़काव पद्धति की तुलना में सस्ती है ।

2. छिड़काव सिंचाई . इस प्रणाली में जल को वर्षा-जल के रूप में क्षेत्र में पाइप तथा स्प्रिंकलर द्वारा समरूप तरीके से फैलाया जाता है । यह सिंचाई पद्धति, उबड़-खाबड़ धरातल, जहाँ समतलीकरण संभव नहीं है तथा जो जलाभाव से ग्रसित क्षेत्र है, के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है ।छिड़काव पद्धति द्वारा सिंचाई से 25 से 33 प्रतिशत तक जल की बचत होती है । इस पद्धति से सिंचाई द्वारा मूंगफली के उत्पादन में 22 प्रतिशत, मिर्च के उत्पादन में 20 प्रतिशत, प्याज में 18 प्रतिशत, सूर्यमुखी में 17.50 प्रतिशत तथा गोभी के उत्पादन में 11.79 प्रतिशत की वृद्धि पायी गयी ।टपक सिंचाई तथा छिड़काव सिंचाई के इतने लाभों के बावजूद यह कृषकों के मध्य अधिक लोकप्रिय नहीं हो पाया है । इसके निम्नलिखित कारण हैं –

1- इसे लगाने में पूँजी की आवश्यकता पड़ती है ।

2- रख-रखाव खर्चीला ।

3- जटिल संरचना होने के कारण यह अशिक्षित एवं अप्रशिक्षित किसानों के लिए समस्या है।परन्तु शुष्क ग्रस्त इलाकों में सरकार इसे लोकप्रिय बनाने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से निम्न ब्याज दर पर किसानों को कर्ज प्रदान कर रही है तथा इसके उपयोगिता के प्रति किसानों को सजग तथा प्रशिक्षित कर रही है ।