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अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल “वन्य प्राणी “


अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल


वन्य प्राणी

वन्य प्राणी संरक्षण तथा प्रबन्धन के उपाय

सामान्यतः प्राकृतिक पर्यावरण जिसे ‘वन’ कहते हैं, में पाये जाने वाले विभिन्न जीवों को – ‘वन्य प्राणी’ कहा जाता है । भारत में जैसे प्राकृतिक वनस्पति के वितरण में विविधता मिलती है, उसी प्रकार यहाँ वन्य प्राणियों में भी विभिन्नता देखी जा सकती है। परन्तु देष में बढ़ते हुए औद्योगिकीकरण, गहन कृषिकरण, नगरीकरण इत्यादि विकास कार्य से मूल वनों का जिस तेजी से हृास हो रहा है, उसी अनुपात में वन्य-प्राणियों की संख्या भी घटती जा रही है । इसलिए सरकार को वन्य प्राणियों के अवनयन को रोकने के लिए विभिन्न कदम उठाने पड़े –

1. आखेट को प्रतिबंधित कर दिया – आखेट या षिकार को प्रतिबंधित करने के लिए सरकार ने कानून बनाया है ।

2. कृत्रिम संग्रहण द्वारा – लुप्तप्राय जीव को कृत्रिम संग्रहण के द्वारा रक्षा प्रदान की गई है।

3. जन्तुओं के आवास स्थल की रक्षा – सरकार ने ‘वन नीति’ के अन्तर्गत वनों को वर्गीकृत करके अलग-अलग वनों को विभिन्न दर्जा प्रदान किया एवं उसकी सुरक्षा सुनिष्चित की।

4. जैविक-भण्डार की स्थापना की गई।

5. राष्ट्रीय पार्कों की स्थापना की गई।

6. राष्ट्रीय समुद्री पार्कों की स्थापना की गई।

7. मैंग्रोव का संरक्षण किया गया, तथा

8. जलीय कृषि (Aqua Culture)  एवं मुक्त कृषि (Pearl Culture)  का प्रबन्धन किया गया ।

राष्ट्रीय बाघ परियोजना

बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है । बाघों की संख्या में हो रही कमी हमारे पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट पैदा कर सकता है । इससे पारिस्थितकीय का संतुलन बिगड़ जायेगा । इसी बात को ध्यान में रखते हुए 1969 में ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रकृत एवं प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ (IUCN)  के 10वें अधिवेषन में यह निर्णय लिया गया कि बाघों को संपूर्ण सुरक्षा दी जाए ।

भारत में बाघों के संरक्षण की दिषा में प्रथम बार 70 के दषक में गंभीरतापूर्वक विचार किया गया । ‘भारतीय वन्यपशु समिति’ के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ कर्ण सिंह ने 1 अप्रैल 1973 कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान में बाघ परियोजना का शुभारंभ किया । प्रारंभ में इसके लिए 9 राज्यों में एक-एक अभ्यारण्य को चुना गया ।

बाघ परियोजना के प्रारंभिक उद्देष्य:-

1. बाघों को समूल नष्ट होने से बचाकर इनकी संख्या में वृद्धि तथा संरक्षण करना ।

2. राष्ट्रीय धरोहर के रूप में इन उद्यानों को संरक्षण प्रदान करना तथा उन्हें पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करना ।

बाघ परियोजना के लागू होने के बाद बाघों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है । 1972 में, जब यह परियोजना शुरू की गई थी, तब बाघों की संख्या मात्र 1872 रह गई थी । किंतु वर्तमान में यह संख्या बढ़कर लगभग 6500 हो गई है । सबसे अधिक बाघ संरक्षित क्षेत्र मध्य प्रदेष में होने के कारण इसे ‘टाइगर राज्य’ कहा जाता है ।

बाघ संरक्षण परियोजना के द्वितीय चरण में बाघों के संरक्षण के साथ-साथ भारत की समृद्ध जैव-विविधता को भी बनाये रखने पर जोर दिया गया है । ‘बाघ-संकट कोष’ का गठन किया है ।

राष्ट्रीय हाथी परियोजना

आजादी के बाद कृषि क्षेत्र में वृद्धि, वाणिज्यिक कृषि, उत्खनन, सड़क निर्माण आदि कारणों से एषियाई हाथी का भविष्य अब खतरे में पड़ चुका है, क्योंकि बहुमुखी विकास से हाथी के प्राकृतिक आवास क्षेत्र और उसकी संख्या में काफी कमी आ चुकी है । वनों की तेजी से हो रही कटाई एवं विष्व बाजार में हाथी के दाँतों की एवं अन्य अंगों के ऊँचे मूल्य के कारण तस्करों द्वारा हाथी की हत्या भी इनकी संख्या में कमी का एक प्रमुख कारण है । 1990 में जब भारतीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने संरक्षण परियोजना का निर्माण करने के उद्देष्य से खतरे में पड़ चुकी प्रजातियों को पहचानने के लिए अध्ययन कराया, तो हाथियों की लुप्तप्राय स्थिति का पता चला ।

इसी सर्वेक्षण के प्रतिवेदन पर 7 दिसम्बर, 1992 में सभी हाथी वाले राज्यों में हाथी संरक्षण परियोजना का शुभारम्भ हुआ एवं इस परियोजना का नाम ‘गजात्मा ;ळंरंजउंद्धष् रखा गया । इस परियोजना का प्रारम्भ केन्द्र सरकार द्वारा बिहार के सिंहभूमि जिले से की गई तथा इसके अन्तर्गत विभिन्न राज्यों में हाथी उद्यानों को प्राथमिकता दी गई ।
हाथी परियोजना के तहत निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा गया है –

(1) हाथी के विचरण में कोई बाधा न हो । इसलिए इसके संरक्षित क्षेत्र को काफी विस्तृत कर सड़क, नहर और कृषि भूमि से रहित बनाया गया है । इस प्रकार हाथियों के स्वतंत्र विचरण का प्रबन्ध करना इस परियोजना का महत्त्वपूर्ण अंग है ।

(2) हर वर्ष हाथी द्वारा करोड़ों रूपये की फसलों की बर्बादी और लगभग 200 लोगों की जान जाती है । अतः मानव और हाथी के बीच होने वाले टकराव के समाधान पर भी जोर दिया गया है ।

(3) हाथियों की चिकित्सा, रखरखाव तथा प्रजनन की व्यवस्था के साथ-साथ उनके महावतों के कल्याण का भी ध्यान रखा गया है ।

(4) हाथी दाँत अवैध व्यापार और अवैध ढंग से हाथी के षिकार को नियंत्रित करने का लक्ष्य है तथा

(5) वनों के संरक्षण पर बल दिया गया है ।

संविधान तथा वन्य-जीवन

भारतीय संविधान में राज्य के नीति निदेषक तत्त्व वाले अध्याय में अनुच्छेद 48 में उपबंधित है कि ‘राज्य पर्यावरण को सुधारने तथा देष के वनों और वन्य प्राणियों को बचाने का प्रयत्न करेगा ।’’ पुनः ‘मूल कत्र्तव्य’ के अंतर्गत भी वन्य-जीवन की सुरक्षा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है । अनुच्छेद-51-‘ए’ में वर्णित है कि ‘भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कत्र्तव्य होगा कि वह अपने प्राकृतिक आवेष्टन यथा – वनों, झीलों, नदियों तथा वन्य प्राणियों की रक्षा करे तथा जीवों के प्रति दया का भाव रखे ।

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