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अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल “पशु-पालन एवं मत्स्य पालन “


अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल


पशु-पालन एवं मत्स्य पालन

श्वेत क्रांति/दुग्ध क्रांति/आपरेषन फ्लड

प्राचीन काल से पशु पालन भारतीय कृषि की एक प्रमुख सहायक क्रिया रही है । दूध के क्षेत्र में क्रांति उत्पन्न करके उत्पादकता बढ़ाने के कार्यक्रमों को ही ‘ष्वेत क्रान्ति’ का नाम दिया गया है। इसके लिए 1964-66 में सघन पशु विकास कार्यक्रम (ICDP – Intensive Cattle Development Programme)  चलाया गया, जिसके अन्तर्गत श्वेत क्रान्ति लाने के लिए पशु मालिक को सुधरे तरीकों को पैकेज प्रदान किया गया डेयरी विकास योजनाओं को प्रोत्साहित तथा विकसित करने के लिए 1965 में आनन्द (गुजरात) में ‘राष्ट्रीय डेयरी विकास परिषद (NDDB-National Dairy Development Board) की स्थापना की गई ।

बाद में श्वेत क्रान्ति की गति को और तेज़ करने के उद्देष्य से 1970 में छक्क्ठ ने ‘आपरेषन फ्लड’ नामक योजना आरम्भ की । आपरेषन फ्लड कार्यक्रम के सूत्रधार ‘डॉ  वर्गीज कूरियन हैं । आपरेषन फ्लड और श्वेत क्रान्ति एक दूसरे के पर्याय और एक ही तथ्य के दो नाम हैं । इस कार्यक्रम को त्रिस्तरीय सहकारिता क्षेत्र में लागू किया गया है –

प्रथम – ग्रामीण स्तर पर दुग्ध उत्पादकों की ‘डेयरी सहकारिता समिति’ के रूप में,

द्वितीय – जिला स्तर पर इन समितियों के ‘दुग्ध संघ’ के रूप में, तथा

तृतीय – राज्य स्तर पर संघ के रूप में ।

आपरेषन फ्लड योजना को अब तक तीन चरणों में लागू किया जा चुका है जिससे किसानों और दुग्ध उत्पादक को काफी लाभ मिला है –

1. आपरेषन फ्लड का प्रथम चरण (OF-I)  – 1971 से 1975 तक रहा । इसका मूल उद्देष्य अमूल आनन्द (गुजरात) जैसे सहकारी संघ का निर्माण करना था ।

2. आपरेषन फ्लड का द्वितीय चरण (OF-II)  – यह 1978 से 1985 तक रहा । इस चरण में यूरोपियन आर्थिक समुदाय के सहयोग से संकर गाय और उन्नत भैंस तैयार करने की योजना बनायी गयी । इस योजना का लाभ देष के 12 राज्यों – उत्तर प्रदेष, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु, मध्य प्रदेष, आन्ध्र प्रदेष, हरियाणा, पष्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, बिहार तथा कर्नाटक को मिला ।

3. आपरेषन फ्लड का तीसरा चरण (OF-III)  – यह 1987 से 1994 तक रहा । इस चरण में दुग्ध के उत्पादन में तेजी से वृद्धि के साथ-साथ विपणन सुविधाओं में वृद्धि का उद्देष्य भी सम्मिलित किया गया, ताकि किसानों एवं दुग्ध उपभोक्ताओं को भी इस योजना का लाभ समान रूप से मिल सके ।

भारत को 168 दुग्ध-क्षेत्र (Milk shed) में विभाजित किया गया है । इस प्रकार देष में एक ‘राष्ट्रीय मिल्क ग्रिड  (National Milk Grid) अस्तित्त्व में आया । इसके दो मुख्य उद्देष्य हैं –
(क) दुग्ध के वितरण में प्रादेषिक असंतुलन  (Regional Imbalance)  को समाप्त करना, तथा
(ख) दुग्ध के मौसमी असंतुलन को समाप्त करना ।

दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में विकास से संबंधित 3 प्रषिक्षण केन्द्र बनाए गए हैं –

1. राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड, आनन्द, गुजरात

2. मानसिंह प्रषिक्षण संस्थान, मेहसाना, गुजरात

3. गल्बाभाई देसाई प्रषिक्षण संस्थान, पालनपुर गुजरात ।

श्वेत क्रांति/दुग्ध क्रांति/आपरेषन फ्लड की सफलताएँ

1. उत्पादन में वृद्धि – इस क्रांति का परिणाम यह हुआ कि भारत में दुग्ध उत्पादन 1970 में जहाँ 3.16 करोड़ टन था, 1998 में बढ़कर 7.2 करोड़ टन हो गया । प्रति व्यक्ति/दिन दूध की उपलब्धता भी 100 ग्राम से बढ़कर लगभग 25 ग्राम हो गई । इस प्रकार इस कार्यक्रम के माध्यम से उत्पादन में आषातीत वृद्धि हुई । आज भारत का दुग्ध उत्पादन में विष्व में प्रथम स्थान है ।

2. सहायक व्यवसाय के रूप में स्थापित – इस कार्यक्रम के माध्यम से ग्रामीण जन-चेतना को भी प्रोत्साहित किया गया, जिससे उन्होंने डेयरी व्यवसाय को एक सहायक व्यवसाय के रूप में अपना लिया है । आज आपरेषन फ्लड योजना के अन्तर्गत लगभग एक करोड़ किसान कार्यरत होकर 70 हजार से अधिक डेयरी सहकारी संस्थाओं से जुड़े हुए हैं ।

3. आय में वृद्धि – पशुपालन से संबंद्ध ग्रामीण निम्न आय वर्ग के कुल आय में लगभग 2000 करोड़ रू. की वृद्धि हुई है ।

नीली-क्रांति (Blue Revolution)

नीली-क्रांति योजना की शुरूआत सातीवं पंचवर्षीय योजना में जापान के सहयोग से की गयी । इसका मूल उद्देष्य भारत के जलीय खाद्य उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना था । भारत परंपरागत रूप से मछली का एक प्रमुख उत्पादक देष रहा है । भारत का भौगोलिक वातावरण, स्वच्छ जल समुद्री मछली के लिए अनुकुल है । यहाँ करीब 2000 नदियाँ, करीब एक लाख तालाब और 24 लाख वर्ग किलोमीटर समुद्रीय क्षेत्र मत्स्य उत्पादन के लिए अनुकुल वातावरण बनाते हैं। खासकर बंगाल की खाड़ी, जहाँ का जल अरब सागर की तुलना में कम लवणीय है, अपेक्षाकृत मत्स्ययन के लिए अधिक अनुकुल है ।

यही कारण है कि पष्चिम बंगाल, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेष तथा तमिलनाडु राज्यों के तटों पर अरब सागर के तटवर्ती राज्यों की अपेक्षा अधिक मत्स्ययन होता है । ज्ञातव्य है कि प0 तटीय राज्यों में केरल में सर्वाधिक मत्स्ययन होता है, जिसका कारण मालाबार अथवा केरल तट पर द0प0 मानसून की अधिक वर्षा होने से अपेक्षाकृत मीठे जल का अधिक पाया जाना है । यह वर्षा वहाँ के समुद्री जल की लवणता को घटा देता है । लेकिन समुद्री खाद्य संसाधन के परंपरागत तथा अवैज्ञानिक दोहन होने के कारण यह मात्र जीवन निर्वाह करने वाली अर्थव्यवस्था है । जबकि इससे अतिरिक्त आय भी अर्जित की जा सकती है । इसीलिए योजना आयोग द्वारा यह अनुभव किया गया कि इसके गत्यात्मक विकास की असीम संभावनाएँ हैं और इसके विकास से निम्नलिखित फायदे हैं –

1. भारतीयों की प्रोटीन उपलब्धता में वृद्धि ।

2. खाद्य समस्या के समाधान में सहयोग ।

3. रोजगार में वृद्धि ।

4. भारत के विदेषी मुद्रा आय में वृद्धि ।

5. मछली की विलुप्त हो रही प्रजातियों को संरक्षण देना ।

इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर हरित क्रांति तथा श्वेत क्रांति के समान नीली-क्रान्ति का कार्यक्रम प्रारंभ किया गया । इस कार्यक्रम को दो भागों में बाँटा गया है ।

i समुद्री मत्स्ययन, तथा
ii स्वच्छ जल/आन्तरिक मत्स्ययन ।

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