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अध्ययन सामग्री: भारत का भूगोल “पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस”


अध्ययन सामग्री भारत का भूगोल


पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस

पेट्रोलियम –

पेट्रोलियम एक ज्वलनशील तरल पदार्थ है, जो मुख्यतः हाइड्रोकार्बन (90-98:) से बना होता है । इसके शेष कार्बनिक यौगिकों में ऑक्सीजन , नाइट्रोजन, सल्फर और कार्बनिक-धातु यौगिक होते हैं ।

भारत में पेट्रोलियम मध्यजीव और तृतीय महाकल्प काल के अवसादी चट्टानों वाले क्षेत्रों में मिलता है, जो कभी छिछले समुद्र में डूबे हुए थे । भारत में अनुमानतः 15 लाख वर्ग कि.मी. तेल-क्षेत्र है । भारत का तेल-क्षेत्र गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी, अपतटीय महाद्वीपीय शेल्फ के साथ-साथ दोनों तटवर्ती प्रदेश, गुजरात के मैदान, थार मरुस्थल और अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में फैला हुआ है ।

1956 में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग ;व्छळब्द्ध की स्थापना के बाद भारत में विस्तृत एवं व्यवस्थित रूप से तेल की खोज एवं उत्पादन की शुरूआत हुई । आजादी के समय तक देश में केवल असम के दिगबोई में ही तेलशोधक कारखाना था ।

 तेल का यह कुआँ छोटा होते हुए भी 100 वर्ष तक लगातार चलनेवाला एकमात्र कुआँ है। आजादी के बाद गुजरात के मैदान और कैम्बे की खाड़ी में पेट्रोलियम का भंडार खोजा गया । लेकिन, तेल का सबसे बड़ा भंडार अप्रत्याशित रूप से बंबई से 115 कि.मी. दूर समुद्र में मिला, जिसे बंबई हाई के नाम से जाना जाता है । यह देश में अब तक प्राप्त सबसे बड़ा तेल का भंडार है ।

वितरण:-

भारत में तेल-भंडार की संभावना वाले 13 बेसिन हैं, जिन्हें तीन वर्गों में रखा जा सकता है:

(1) गुजरात में कैम्बे बेसिन, असम-अराकान पट्टी और बंबई अपतटीय बेसिन, जहाँ व्यावसायिक रूप से तेल का उत्पादन हो रहा है;
(2) राजस्थान, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी बेसिन, अंडमान, बंगाल, हिमालय का तराई क्षेत्र, गंगा घाटी और त्रिपुरा, नागालैंड, जहाँ प्राकृतिक तेल के भंडार हैं, लेकिन व्यवसायिक उत्पादन शुरू नहीं हुआ है;
(3) कच्छ-सौराष्ट्र, केरल-कोंकण और महानदी क्षेत्र; जहाँ प्राकृतिक तेल के भंडार के होने की संभावना है, लेकिन खोज होना अभी बाकी है । अनुमान है कि देष में 13 करोड़ टन तेल के भंडार हैं । सन् 1950-51 में देष में कच्चे तेल का उत्पादन केवल 2.5 लाख टन था, जो अब बढ़कर लगभग 320 लाख टन हो गया है । फिर भी इससे देष की मांग के 30: की ही पूर्ति हो पाती है । शेष का आयात करना पड़ता है, जिसके लिए बड़ी मात्रा में विदेषी मुद्रा देनी पड़ती है ।

तेलशोधक कारखाने –

भारत में तेलशोधक कारखाने इस प्रकार हैं:- बरौनी (बिहार), बोगईगाँव (असम), कोचीन (केरल), दिग्बोई (असम), हल्दिया (प.बंगाल), कोयली (गुजरात), मनाली और नारीमनम (मद्रास), मथुरा (उत्तर प्रदेष), गोहाटी में नूनमाटी (असम), ट्रांबे (बंबई), विशाखापट्टन (आन्ध्र प्रदेश)। संयुक्त क्षेत्र में दो नये तेलशोधक कारखानों का निर्माण मंगलोर (कर्नाटक) और पानीपत (हरियाणा) में किया जा रहा है ।

प्राकृतिक गैस –

प्राकृतिक गैस के भंडार स्वतंत्र एवं प्राकृतिक तेल के भंडार के साथ भी मिलते हैं । किंतु प्राकृतिक गैस का अधिकांश उत्पादन प्राकृतिक तेल के भंडारों के साथ ही हो रहा है ।प्राकृतिक गैस के भंडार त्रिपुरा, राजस्थान के साथ-साथ गुजरात के कैंबे की खाडी, बंबई हाई, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश और उड़ीसा के अपतटीय क्षेत्रों में पाये गये हैं । देष में 647 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस के भण्डार होने का अनुमान है ।

भारत जैसे ऊर्जा की कमी वाले देशों के लिए प्राकृतिक गैस एक प्राकृतिक वरदान है । इसे ऊर्जा के स्रोत के रूप में (ताप-ऊर्जा के रूप में) और पेट्रो-रसायन उद्योग के लिए कच्चा माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है । प्राकृतिक गैस वाले ऊर्जा-संयंत्र को बनाने में समय भी कम लगता है । भारत में प्राकृतिक गैस पर आधारित उर्वरक संयंत्र लगाकर भारतीय कृषि को प्रोत्साहन दिया जा सकता है ।

इन्हें गैस पाईप लाइनों द्वारा आसानी से वितरित भी किया जा सकता है, जिससे इनकी ढुलाई की जरूरत नहीं रह जाती।सन् 1984 में प्राकृतिक गैस के ढुलाई, प्रसंस्करण तथा विपणन के लिए भारतीय गैस प्राधिकार निगम (GAIL) का गठन किया गया ।

 इसे 180 लाख क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस प्रतिदिन आपूर्ति क्षमता वाले 1,730 कि.मी. लंबी हजीरा-बीजापुर-जगदीशपुर (HBJ)  पाईप लाईन बिछाने का कार्यभार सौंपा गया । यह पाईप लाईन हजीरा से शुरू होकर (गुजरात में) बीजापुर (म.प्र.) में जाती है और वहाँ से जगदीशपुर (उ.प्र.) में आकर खत्म हो जाती है । बीजापुर से एक शाखा निकलकर सवाई माधोपुर (राजस्थान) जाती है ।

विद्युत-ऊर्जा –

सन् 1910 में कर्नाटक में शिवसमुद्रम में जल-विद्युत संयंत्र की स्थापना के साथ भारत में ऊर्जा-उत्पादन के विकास की शुरुआत हुई । हालांकि आजादी के बाद भारत ने ऊर्जा-उत्पादन के क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलता पाई है, लेकिन तीव्र औद्योगिकीकरण ओर शहरीकरण तथा आथ्रिक-सामाजिक विकास की तीव्रता के कारण ऊर्जा की मांग में उससे भी अधिक तेजी से वृद्धि हुई है ।

ताप-विद्युत –

ताप-विद्युत संयंत्र मुख्यतः बड़े औद्योगिक क्षेत्रों तथा कोयला के खानों वाले प्रदेशों में हैं । 1975 में ताप-विद्युत उत्पादन के विकास के लिए एक केन्द्रीय निकाय के रूप में नई दिल्ली में राष्ट्रीय ताप-विद्युत कारपोरेशन ;छज्च्ब्द्ध की स्थापना की गई । इसका कार्य सुपर ताप विद्युत संयंत्रों की स्थापना करके विद्युत आपूर्ति की मांग को पूरा करना था।

इस कारपोरेशन के सुपर ताप-विद्युत संयंत्र निम्नलिखित स्थानों पर हैं:- सिंगरौली (उ.प्र.), रामगुंडम (आ.प्र.), फरक्का (प.बंगाल), विन्ध्याचल (म.प्र.), रिहन्द (उ.प्र.), दादरी (उ.प्र.), कहलगाँव (बिहार), तालचर (उड़ीसा) और पाँच संयुक्त गैस विद्युत परियोजनाएँ अन्टा (राजस्थान), औरिया (उ.प्र.) दादरी (उ.प्र.), कावस (गुजरात) और गंधार (गुजरात) ।

जल-विद्युत –

जल-संसाधन से समृद्ध क्षेत्रों में जल ऊर्जा प्राप्त करने का सबसे सस्ता और प्रदूषण-रहित स्रोत है । जल से प्राप्त किये गये विद्युत को जल-विद्युत कहा जाता है । कोयला, तेल और लिग्नाईट के भंडार सीमित होने के कारण जल-विद्युत तथा परमाणु-विद्युत पर अधिक जोर दिया जाने लगा है ।

प्राप्ति क्षेत्र – भारत में जल-संसाधन प्रचुरता से उपलब्ध हैं । भारत के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र हिमाचल की तराई वाले उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश हैं, जहाँ 50,000 मेगावाट जल-विद्युत उत्पादन की क्षमता है;
(2) उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में जल-विद्युत उत्पादन की बहुत क्षमता है;
(3) महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल से गुजरने वाले पश्चिमी घाट वाले प्रदेश में;
(4) मध्य भारत में सतपुड़ा, विन्ध्य, महादेव और मैकाल पर्वत श्रेणी वाले क्षेत्र में;
(5) पूर्व में नागपुर से पश्चिम में गोंडवाना क्षेत्र तक के ताप-विद्युत वाले क्षेत्र में ।

जल-विद्युत की विशेषताएँ – शुरू में जल-विद्युत परियोजना में अधिक लागत लगाने के बावजूद यह अन्य विद्युत परियोजनाओं से कई कारणों से अधिक लाभकारी है । जल-विद्युत सस्ता तो पड़ता ही है, साथ ही यह नवीनीकरण योग्य भी होता है (क्योंकि जल एक नवीनीकरण योग्य संसाधन है) । दूसरे शब्दों में, जल-विद्युत संयंत्र से जल-विद्युत उत्पादन तथा रख-रखाव सस्ता है । जबकि ताप-विद्युत संयंत्रों में भारी मात्रा में कोयले की खपत के कारण विद्युत उत्पादन मंहगा पड़ता है ।

जल-विद्युत निर्माण में न तो कचड़ों को ठिकाने लगाने की समस्या होती है । और न ही प्रदूषण होता है । कोयला, प्राकृतिक तेल और गैस से चलने वाले ताप-विद्युत संयंत्रों के लिए विदेशों से कच्चा माल मंगाना पड़ेगा, जिससे देश के विदेशी-मुद्रा भंडार पर भी दबाव पड़ेगा । जल-विद्युत परियोजना से विद्युत-उत्पादन के साथ-साथ सिंचाई की सुविधा भी प्राप्त होती है ।

भारत में जल विद्युत ढाई लाख मेगावाट की है, जिसमें से केवल दस प्रतिषत का ही दोहन हो पा रहा है । दसवीं पंचवर्षीय योजना में 42 हजार करोड़ रूपये खर्च करके 10432 मेगावाट अतिरिक्त जल विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है ।

परमाणु-ऊर्जा –

कोयला, प्राकृतिक तेल और गैस की कमी के कारण भारत में परमाणु-ऊर्जा के विकल्प को अपनाना जरूरी हो गया है । भारत में 1969 में विदेशी सहयोग से तारापुर में प्रथम परमाणु-ऊर्जा संयंत्र की स्थापना से परमाणु-ऊर्जा के निर्माण का प्रारंभ हुआ । सन् 1983 में मद्रास के निकट कल्पपक्कम में भारत ने स्वनिर्मित परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाकर अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की । उसके बाद परमाणु-ऊर्जा संबंधी हर क्षमता को भारत ने प्राप्त कर लिया है ।

परमाणु ऊर्जा के खनिज – भारत कई परमाणु-खनिज के मामले में समृद्ध है । बिहार के सिंहभूम जिले के जादूगोड़ा के खानों से तथा राजस्थान से यूरेनियम मिलता है । केरल के तट के मोनाजाईंट बालू में थोरियम और यूरेनियम प्रचुरता से मिलते हैं । मालाबार तथा कोरोमंडल तट के बालू से इलमेनाईट और जिरकोनियम मिलता है । मध्यप्रदेश और तमिलनाडु में ग्रेफाईट मिलता है ।

सौर ऊर्जा –

सूरज कभी न खत्म होने वाला ऊर्जा का विशाल स्रोत है, जो आसानी से हर जगह उपलब्ध है। सौर-ऊर्जा का उपयोग खाना बनाने, पानी का खारापन दूर करने, जल-शुद्धीकरण संयंत्र, विद्युत-निर्माण, कमरे को गर्म करने तथा फसल सुखाने में किया जा सकता है । ताप एवं विद्युत बनाने के लिए सौर ऊर्जा को तापीय एवं फोटोवोल्टिक विधि से संचित कर लिया जाता है ।

एक ऊष्णकटिबंधीय देश होने के कारण भारत को वर्ष में लगभग 300 दिन औसत के हिसाब से 5KWH/59m  सौर विकिरण (SRE) मिलता है । शुष्क-क्षेत्रों में सौर-ऊर्जा बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है । उन क्षेत्रों में धूप हमेशा उपलब्ध रहती है, जबकि ऊर्जा के अन्य संयंत्र स्थापित करने में वहाँ भारी खर्च होगा। ऐसा आकलन लगाया गया है कि राजस्थान में 100 हेक्टेयर भूमि से सौर-ऊर्जा द्वारा 35 मेगावाट विद्युत का उत्पादन किया जा सकता है ।

एशिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ सौर-तालाब का निर्माण किया गया है । यह सौर-तालाब परियोजना गुजरात के भुज में (कच्छ) में है ।ग्रामीण क्षेत्रों का सौर-प्रणाली द्वारा विद्युतीकरण भी शुरू हो चुका है । आन्ध्र प्रदेश में सालिजीपल्ली भारत का पहला गाँव है, जहाँ सौर-ऊर्जा से पूर्णतः विद्युतीकरण किया गया है ।

वर्तमान में सौर-फोटोवाल्टिक ;(SPU)  प्रणाली का प्रयोग ग्रामीण तथा सुदूर क्षेत्रों में; जहाँ विद्युत सुविधा नहीं है, प्रकाश, पानी तथा पम्पिंग के लिए किया जा रहा है । इसका उपयोग रेलवे सिग्नल प्रणाली, ग्रामीण दूरसंचार, जल के शुद्धीकरण, सिंचाई और दूरदर्शन प्रसारण के लिए भी किया जा रहा है । भोजन बनाने के लिए विष्व की सबसे बड़ी सौर वाष्प प्रणाली राजस्थान के माउंट आबू में स्थापित की गई है।

पवन ऊर्जा –

हवा में गतिज-ऊर्जा होती है, जो सूर्य की गर्मी के कारण वातावरण के विभिन्न क्षेत्रों में तापमान में भिन्नता के कारण हवाओं के गतिशीलता से पैदा होती है । इस पवन-ऊर्जा का उपयोग कुआँ से पानी निकालकर सिंचाई करने में और बिजली बनाने में किया जा सकता है । भारत की कुल पवन-ऊर्जा के उत्पादन के लिए उपयुक्त प्रदेश तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और केरल हैं ।भारत में पवन उर्जा की कुल सम्भावित क्षमता 45 हजार मेगावाट है ।

 इस क्षमता का अभी मात्र 5: ही उत्पादन हो पा रहा है । पवन उर्जा-उत्पादन की दृष्टि से भारत का विष्व में पाँचवा स्थान है।एशिया का सबसे बड़ा पवन-ऊर्जा केन्द्र गुजरात के कच्छ जिले में माण्डवी में है, जिसकी क्षमता 28 मेगावाट है । एशिया का सबसे बड़ा पवन-फार्म समूह तमिलनाडु में मुप्पनडल में है, जिसकी उत्पादन क्षमता 150 मेगावाट है ।

भू-तापीय ऊर्जा –

पृथ्वी के भीतर प्राकृतिक प्रक्रिया से उत्पन्न ऊर्जा को भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं । इस ऊर्जा का मुख्य स्रोत पृथ्वी के भीतर पिघली गर्म चट्टानों का लावा होता है, जिसे ‘मैग्मा’ कहा जाता है । पृथ्वी की उपरी सतह में मौजूद प्राकृतिक वाष्प, गर्म जल या पिघली चट्टानों से ताप एवं विद्युत उत्पादन के लिए भूतापीय ऊर्जा को अवशोषित किया जाता है । इसके सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत ज्वालामुखी एवं गर्म सोते हैं ।

 लेकिन दूसरे स्थानों से भी नियंत्रित विधि से भूतापीय-ऊर्जा का अवशोषण किया जा सकता है । भारत में 800-1000 ब तापमान वाले 340 गर्म सोतों को भूतापीय ऊर्जा के स्रोत के रूप में खोजा जा चुका है । हिमालय प्रदेश के कुल्लु जिले में मणिकरन नामक स्थान पर 5 किलोवाट क्षमता वाले एक भूतापीय-पायलट विद्युत संयंत्र की स्थापना की गई है ।

बायोमास –

लकड़ी, घास, झाडि़याँ, अनाज तथा खोई बायोमास के उदाहण हैं ।

बायोगैस –

बायोगैस भी ऊर्जा का एक ऐसा स्रोत है, जो प्रचुरता से उपलब्ध प्राकृतिक कार्बनिक अवशिष्टों से बनाया जाता है ।
बायोगैस एक प्रकार का गैसीय मिश्रण (विभिन्न अनुपातों में) है, जिसमें सामान्यतः, 60: मिथेन (अच्छी किस्म का ईंधन), 40: कार्बनडाईऑक्साइड  (एक अक्रिय गैस) तथा नाइट्रोजन और हाइड्रोजन सल्फाईड जैसी कुछ अन्य गैसें भी होती हैं । कार्बनिक कचड़े निम्नलिखित प्रकार के हो सकते हैं –
(1) गोबर और जानवरों के मल-मूत्र,
(2) मानव के मूल-मूत्र,
(3) कृषि-कार्य के बाद बचे कचड़े;
(4) खाद्य-उद्योग, कागज-उद्योग, चर्म-शोधन उद्योग आदि के कचड़े ।

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