औरंगजेब

औरंगजेब: 1658-1707 ई.

शाहजहाँ के चार पुत्र थे। चारों उस समय बालिग थे। दारा शुकोह की आयु तेंतालीस वर्ष की थी, शुजा की इक्तालीस, औरंगजेब की उनतालिस तथा मुराद की तेंतीस वर्ष की आयु थी। सभी भाइयों को उस समय तक प्रांतों के शासकों तथा सेनाओं के सेनापतियों के रूप में गैर-सैनिक एंव सैनिक को लेकर भेद था। उनमें सबसे बड़े भाई दारा शुकोह पर उसका पिता विश्वास करता था तथा उसे अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था। दारा शुकोह सब दर्शनों के सार का संग्रह करने वाला विचार रखता था। वह उदार स्वभाव तथा पंडितोचित प्रवृत्तियों का था। वह अन्य धर्मावलम्बियों के साथ मिलता था। उसने वेदान्त, तालमुद एंव बाइबल के सिद्धांतों तथा सूफी लेखकों की रचनाओं का अध्ययन किया था। उसने कुछ ब्राह्मण पंडितों की सहायता से अथर्ववेद एवं उपनिषदों का फारसी में अनुवाद करवाया। उसका लक्ष्य था बाहरी तौर पर विरोधी मालूम पड़ने वाले धमों के बीच सामंजस्य का आधार खोजना। इसके लिए उसके सहधर्मियों के कट्टर सदस्यों का उससे अप्रसन्न हो जाना स्वाभाविक था तथा वे उसके विरुद्ध हो गये। परन्तु वह पांखडी नहीं था उसने कभी इस्लाम के सारभूत सिद्धातों का परित्याग नहीं किया। उसने केवल सूफियों की, जो इस्लाम-धर्मावलम्बियों की एक स्वीकृत विचारधारा थी, सर्वदर्शन सार संग्रहकारी प्रवृत्ति दिखलायी। दूसरा भाई शुजा, जो उस समय बंगाल का सूबेदार था, बुद्धिमान तथा एक वीर सैनिक था। पर अत्यंत आरामतलब होने के कारण वह दुर्बल, आलसी, असावधान और निरन्तर चेष्टा, चौकस,सावधानी तथा दूसरे से मिलकर काम करने के अयोग्य बन गया था। सबसे छोटा मुराद, जो उस समय गुजरात का सूबेदार था, निस्सन्देह स्पष्ट वक्ता, उदार एंव वीर था, परन्तु वह भारी पियक्कड़ था। अत: वह नेतृत्व के लिए आवश्यक गुणों का विकास नहीं कर सका। तीसरा भाई औरंगजेब सबसे योग्य था। वह असाधारण उद्योग और गहन कूटनीतिक तथा सैनिक गुणों से सम्पन्न था। उसमें शासन करने की असंदिग्ध रूप में योग्यता थी। और भी, एक उत्साही सुन्नी मुसलमान के रूप में उसने स्वभावत: कट्टर सुन्नियों का समर्थन प्राप्त कर लिया था। प्रतिद्वन्द्वी शाहज़ादों के चरित्र की भिन्नता का युद्ध की गति पर बहुत प्रभाव पड़ा। दारा शुकोह, जो एक उदार मनुष्य परन्तु अयोग्य सेनापति तथा राजनीतिज्ञ था, धूर्त एंव बुद्धिमान औरंगजेब की बराबरी में तुच्छ था। शुजा तथा मुराद को भी औरंगजेब के उच्चतर सेनापतित्व एवं चतुराई के समक्ष अपनी अयोग्यता के कारण घाटा उठाना पड़ा।

जब सितम्बर, 1657 ई. में शाहजहाँ बीमार पड़ा, तब चारों भाइयों में केवल दारा शुकोह ही आगरे में उपस्थित था। रोग वास्तव में भयानक था। तीनों अनुपस्थित भाइयों को संदेह हुआ कि उनका पिता वास्तव में मर चुका है तथा दारा शुकोह ने इस समाचार को दबा दिया है। एकतंत्री राज्य की स्थिति इतनी संकटपूर्ण होती है कि बादशाह की बीमारी तक से राज्य में गड़बड़ी एवं अव्यवस्था फैल गयी, जो भाइयों के बीच युद्ध छिड़ने पर और भी प्रचण्ड हो गयी। शुजा ने बंगाल की तत्कालीन राजधानी राजमहल में अपने को बादशाह घोषित कर लिया तथा साम्राज्य की राजधानी की ओर सेना लेकर बढ़ा। परन्तु बनारस के निकट पहुँचने पर वह दारा शुकोह के पुत्र सुलेमान शुकोह के अधीन अपने विरुद्ध भेजी गयी एक सेना द्वारा हरा दिया गया। वह बंगाल लौट जाने को विवश हो गया। मुराद ने भी अहमदाबाद में अपना राज्याभिषेक किया (5 दिसम्बर, 1657 ई.) उसने मालवा में औरंगजेब से मिलकर उससे एक संधि कर ली। उन्होंने, साम्राज्य का विभाजन करने का इकरारनामा किया, जो अल्लाह एवं पैगम्बर के नाम पर स्वीकृत किया गया। उस इकरारनामें की शर्तें इस प्रकार थीं-

1. लूट के माल की एक तिहाई मुराद बख्श को तथा दो तिहाई औरंगजेब को मिलेगी।

2. साम्राज्य की विजय के बाद पंजाब, अफ़गानिस्तान, कश्मीर एवं सिंध मुराद को मिलेंगे, जो वहाँ बादशाहत का झंडा गाड़ेगा, सिक्के चलाएगा तथा बादशाह के रूप में अपना नाम घोषित करेगा।

औरंगजेब एवं मुराद की मिलीजुली फौज उत्तर की ओर बढ़ी तथा धरमत पहुँची, जो उज्जैन से चौदह मील दक्षिण-पश्चिम में है। बादशाह ने उनका बढ़ना रोकने के लिए जोधपुर के राजा जसवन्त सिंह तथा कासिम खाँ को भेजा। 15 अप्रैल, 1658 ई. को धरमत में विरोधी सेनाओं की मुठभेड़ हुई जहाँ शाही दल असाधारण रूप से पराजित हुआ। इसका कारण कुछ अंशों में विभाजित परामर्श की बुराइयाँ तथा हिन्दू एवं मुस्लिम सैनिकों में द्वेष था और कुछ अंशों में औरंगजेब की, जिसकी उम्र लड़ाई में ही बीती थी, सैनिक कुशलता की तुलना में जसवन्त सिंह की निम्नतर कोटि की सैनिक कुशलता थी। राठौरों ने नैराश्यजनित वीरता के साथ युद्ध किया तथा उन्होंने भारी क्षति उठायी, जबकि कासिम खाँ ने अपने स्वामी के लिए करीब-करीब कुछ भी नहीं किया। जब जसवन्त सिंह जोधपुर भाग आया, तब उसकी गर्विणी पत्नी ने, उसके रणक्षेत्र से पीठ दिखाकर भागने के कारण उसके लिए दुर्ग के द्वार बन्द करवा दिये। धरमत के युद्ध से औरंगजेब के साधनों तथा उसकी प्रतिष्ठा में बहुत वृद्धि हुई। जैसा डाक्टर यदुनाथ सरकार लिखते हैं- दक्कन के युद्धों का सूरमा तथा धरमत का विजेता केवल बिना हानि के ही नहीं, बल्कि भारत में सर्वथा प्रतिद्वंद्विताहीन सैनिक प्रसिद्धि के साथ विश्व के सम्मुख उपस्थित हुआ।

विजयी शाहजादों ने एक उपेक्षित छिछले भाग से होकर चम्बल को पार किया तथा सामूगढ़ के मैदान में पहुँचे, जो आगरे के दुर्ग से आठ मील पूर्व है। दाराशुकोह भी मई के अन्त में अपने विरोधियों से मुठभेड़ करने के लिए पचास हजार सैनिकों की एक फौज लेकर वहाँ पहुँच गया। यह फौज केवल देखने में ही भयानक लगती थी। यह विभिन्न वर्गों एवं स्थानों की एक विविध सेना थी, जो शीघ्रता से एकत्रित की गयी थी तथा जिसे उचित रूप से सम्बद्ध नहीं किया गया था और न मिलकर काम करना ही सिखलाया गया था। 29 मई को युद्ध आरम्भ हुआ। इसमें प्रचण्डता के साथ संघर्ष हुआ। दोनों दल वीरता से लड़े। मुराद के चेहरे पर तीन घाव लगे। दारा शुकोह की ओर से युद्ध करने वाले राजपूत अपनी जाति की परम्परा के प्रति सच्चे थे। उन्होंने अपने वीर युवक नेता, रामसिंह के नेतृत्व में वीरतापूर्वक मुराद की टुकड़ी पर निराशाजनित वीरता के साथ आक्रमण किया। उनका एक-एक आदमी मर मिटा। दारा शुकोह दुर्भाग्य से अपने हाथी के, एक तीर से बुरी तरह घायल हो जाने के कारण उस पर से उतर कर एक घोडे पर चढ़ गया। अपने स्वामी के हाथी का हौदा खाली देख बची हुई फौज उसे मरा समझ कर अत्यन्त घबड़ाहट के साथ मैदान से तितर-बितर हो गयी। निराशा में भरा हुआ दारा शुकोह, अपने पड़ाव एवं बन्दूकों को अपने शत्रु अकथनीय रूप से दीन व्यवस्था में पहुँचा। दारा शुकोह की हार वास्तव में उसके सेनापतियों की युद्ध कौशल सम्बन्धी कुछ भूलों तथा उसकी तोपों की दुर्बल अवस्था के कारण हुई, न कि उसकी सेना के दाहिने अंग के अधिकारी खलीलुल्लाह के कपटपूर्ण परामर्श के कारण जैसा कि कुछ वृत्तान्त हमें विश्वास दिलाना चाहते हैं।

सामूगढ़ की लड़ाई ने शाहजहाँ के पुत्रों के बीच उत्तराधिकार के युद्ध का व्यवहारिक रूप से निर्णय कर दिया। दारा की पराजय के कारण, जिसमें उसके बहुत-से सैनिक नष्ट हुए, औरंगजेब के लिए अपनी महत्त्वाकांक्षा पूरी करना और भी सुगम हो गया। यह बहुत अच्छी तरह कहा जा सकता है कि हिन्दुस्तान के राजसिंहासन पर औरंगजेब का अधिकार सामूगढ़ में प्राप्त उसकी विजय का तर्कसंगत परिणाम था। इस विजय के शीघ्र बाद वह सेना लेकर आगरे गया। उसने शाहजहाँ के मित्रतापूर्ण समझौते के लिए किये गये सभी प्रयासों का अनादर किया तथा दुर्ग के शाही दलीय प्रतिरक्षकों द्वारा इसका अपहरण रोकने के लिए की गयी सभी चेष्टाओं को विफल कर दिया। 8 जून को औरंगजेब ने अधिकार कर लिया।

आगरे से औरंगजेब 13 जून, 1658 ई. को दिल्ली की ओर रवाना हु में वह मथुरा के निकट रूपनगर में अपने भाई मुराद के, जो भाई की योजना को समझ कर उससे द्वेष करने लगा था, विरोध को कुचलने के लिए ठहर गया। खुले मैदान में उसका सामना करने के बदले औरंगजेब ने उसे एक जाल में फँसा लिया। पहले उस हतभाग्य शाहजादे दुर्ग में बन्दी बनाकर रखा गया। जनवरी, 1659 ई. में उसे वहाँ से ग्वालियर के किले  में ले जाया गया। 4 दिसम्बर, 1661 ई. की दीवान अली नकी की हत्या करने के अभियोग में उसे फाँसी पर लटका दिया गया। मुराद को गिरफ्तार करा लेने के बाद ही औरंगजेब दिल्ली पर अधिकार कर चुका था, जहाँ 21 जुलाई, 1658 ई. को वह बादशाह के रूप में राजसिंहासन पर बैठा। 1659 में पुन: उसका सिंहासनावरोहण किया गया था।

अब औरंगजेब अपने अन्य प्रतिद्वंद्वियों से निपटने चला। धर्मत एवं सामूगढ़ में डरा शुकोह की पराजय से शुजा शक्ति प्राप्त करने की एक बार पुनः चेष्टा करने को प्रोत्साहित हुआ। परन्तु जब 5 जनवरी, 1659 ई. को इलाहाबाद के निकट खजवा में औरंगजेब ने उसे असाधारण ढंग से परास्त कर डाला, तब उसकी आशाएँ चूर हो गयीं। मीर जुमला ने उसका पश्चिम बंगाल होकर ढाका तक और वहाँ से अराकान तक पीछा किया (मई, 1660 ई.)। फिर शुजा के विषय में कुछ नहीं सुना गया। शायद अराकानियों ने परिवार सहित उसका वध कर दिया। औरंगजेब का ज्येष्ठ पुत्र शाहजादा मुहम्मद, मीर जुमला से लड़कर, कुछ समय के लिए शुजा से जा मिला। परन्तु इसका दण्ड उसे आजन्म कारावास के रूप में मिला तथा लगभग 1676 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी।

जब भाग्य दारा शुकोह से विमुख हो गया, तब उसके पुत्र सुलेमान शुकोह को भी उसके सेनापतियों तथा सैनिकों ने छोड़ दिया। उन्होंने समझा कि अब हारते हुए पक्ष का अनुसरण करने से कोई लाभ नहीं है। सुलेमान शुकोह एक स्थान से दूसरे स्थान को भागता फिरा। अंत में उसने अपनी पत्नी, कुछ अन्य स्त्रियों, अपने दूध-भाई मुहम्मद शाह एवं केवल सत्रह अनुगामियों के साथ गढ़वाल की पहाड़ियों के एक हिन्दू राजा के यहाँ शरण ली। वह राजा, विपत्ति पड़े इस शाहज़ादा अतिथि के प्रति बहुत दयापूर्ण एवं सचेत रहा। पर औरंगजेब के दबाव में आकर, उसके मेज़बान के पुत्र ने 27 दिसम्बर, 1660 ई. को उसे धोखा देकर शत्रुओं के हाथ में सौंप दिया। अन्त में मई, 1662 ई. में वह अपने रखवालों के परिश्रम से परलोक भेज दिया गया। दारा शुकोह के कनिष्ठ पुत्र सिपह शुकोह तथा मुराद के पुत्र एजिद् बख्श को भयानक प्रतिद्वन्द्वी नहीं समझा गया तथा उन्हें जीवनदान मिला। बाद में उनका क्रमश: औरंगजेब की तीसरी तथा पाँचवीं पुत्रियों के साथ विवाह कर दिया गया।

दारा शुकोह के अन्त की कहानी उसके भाई मुराद अथवा उसके पुत्र सुलेमान शुकोह के अंत की कहानी से कम विवादपूर्ण तथा मर्मस्पर्शी नहीं है। औरंगजेब द्वारा आगरे की विजय करने तथा शाहजहाँ के बंदी बनाये जाने के बाद, दारा शुकोह दिल्ली से लाहौर भाग गया। वहाँ औरंगजेब का पीछा करने वाली सेना का सामना करने की तैयारियों में लग गया। उसने सतलज के घाटों पर पहरा देने के कुछ उपाय किये तथा आशा की कि वर्षा ऋतु के प्रारम्भ हो जाने के कारण औरंगजेब को लाहौर पहुँचने में कुछ समय लग जायेगा। दारा को बीजापुर तथा गोलकुंडा के शिया सुल्तानों से समर्थन की आशा थी। यह उसके लिए उचित नीति होती। परन्तु जसवन्त सिंह ने, जिसे औरंगजेब पहले ही अपने पक्ष में कर चुका था, उसे सहायता देने का वादा करके अजमेर की ओर बढ़ने के लिए फुसला लिया। राजपूत नायक, जिसका आचरण उत्तराधिकार के लिए युद्ध के समय सन्देह युक्त था, अपने वादों से मुकर गया तथा दारा को अत्यंत अपेक्षित राजपूत सहायता न मिल सकी। उसे विवश होकर औरंगजेब के साथ, जो अजमेर के निकट पहुँच चुका था, युद्ध करना पड़ा। अपने अल्प साधनों को ध्यान में रखते हुए दारा ने लेख के मैदान के व्यवस्थित युद्ध में अपनी शत्रु सेना की अत्याधिक शक्ति से मुठभेड़ करना अनुचित समझा। अत: उसने अजमेर के चार मील दक्षिण देवराई की घाटी में एक प्रबल एवं प्रशंसनीय रूप से चुने हुए स्थान में अपने को दृढ़ कर लिया तथा तीन दिनों तक (12 से 14 अप्रैल, 1659 ई.) लड़ता रहा। परन्तु अन्त में वह पराजित हुआ। उसने शीघ्र भागकर अपनी रक्षा की। जयसिंह एवं बहादुर खाँ के अधीन औरंगजेब की सेना ने दारा का एक स्थान से दूसरे स्थान तक (राजस्थान, कच्छ और सिंध) पीछा किया तथा भारत में उसे कहीं शरण नहीं मिली। जून, 1659 ई. में वह शीघ्रता से उत्तर-पश्चिम सीमा की ओर बढ़ा। उसने दादर (बोलने घाटी से नौ मील पूर्व एक स्थान) के अफ़गान नायक जीवन खाँ से शरण की प्रार्थना की, जिसकी उसने कुछ वर्ष पहले शाहजहाँ के द्वारा मृत्यु दंड दिये जाने पर रक्षा की थी। पर उसके दुर्भाग्य का यहीं अंत नहीं था। अविश्वासी अफ़गान नायक के उसे धोखा दिया तथा उसे अपनी दो पुत्रियों और अपने द्वितीय पुत्र सिपिह शुकोह के साथ बहादुर खाँ के हवाले कर दिया। बहादुर खाँ इन बंदियों को 23 अगस्त, 1659 ई. को दिल्ली ले आया। उसी महीने की 29 तारीख को उन्हें सम्पूर्ण नगर में घुमाया गया। 30 अगस्त की रात को जल्लादों ने सिपिह को अपने पिता के आलिंगन से छीन लिया और दारा का सिर काट डाला। औरंगजेब की आज्ञा से उसके शव को सारे नगर में घुमाया गया जिससे लोगों को मालूम हो जाए कि अब उनका प्रिय नहीं रहा।

औरंगजेब का राज्याभिषेक दो बार किया गया- पहली बार आगरे पर अधिकार करने के शीघ्र बाद 21 जुलाई, 1658 ई. को तथा फिर खजुवा तथा देवराई की उसकी निर्णयात्मक विजयों के बाद अत्यंत जयजयकार के साथ जून 1559 ई. में उसके नाम से खुत्बा पढ़ा गया। उसने आलनमगीर की उपाधि धारण की जिसमें बादशाह तथा गृाजी भी जोडे गये। कुछ अन्य मुस्लिम शासकों की तरह औरंगजेब ने अपना राज्यकाल लोगों का कष्ट दूर करने की चेष्टाओं से आरम्भ किया। यह कष्ट उत्तराधिकार के लिए युद्ध के समय सामान्यत: प्रशासनिक अव्यवस्थाओं तथा वस्तुओं के अत्याधिक मूल्य के कारण हुआ था। उसने बहुत-सी कष्टप्रद चुगियों और करों को उठा दिया। परन्तु पूर्वगामी शासकों की तरह उसके निषेध का एक या दो बातों को छोड़कर अन्यत्र कोई परिणाम न निकला

मुगल साम्राज्य का भौमिक विस्तार, जो दो सदियों तक चलता रहा, औरंगजेब के राज्य-काल में शीघ्रता से बढ़ा। यदि पिछले शासनकाल की कधार एवं मध्य एशिया की हानियों को अलग कर दें, तो बादशाहों के जीते हुए प्रदेश अखंड रहे तथा दक्षिण में मराठा राज्य के उत्कर्ष के पहले औरंगजेब के महत्त्वाकांक्षी तथा साहसी अफसरों ने सफलतापूर्वक अपने स्वामी के राज्य का विस्तार किया।

बिहार के सूबेदार दाऊद खाँ ने 1661 ई. में पलामू को जीत लिया। साम्राज्य की पूर्वी सीमा पर औरंगजेब के अफसरों को अपनी शक्ति के लिये काफी कार्यक्षेत्र मिला। 1661 ई. में बंगाल का शासक मीर जुमला एक सुसज्जित सेना लेकर अहोमों के आक्रमणों को रोकने के लिए इस सीमा की ओर बढ़ा। यों तो मुग़लों को पहले भी अहोमों के साथ भयंकर युद्ध करना पड़ा था, जब अहोमों ने शाहजहाँ के राज्यकाल में साम्राज्य की पूर्वी सीमा पर आक्रमण कर दिया था तथा 1639 ई. के प्रारम्भ में एक संधि हुई थी। परन्तु उत्तराधिकार के युद्ध से लाभ उठाकर अहोमों ने 1658 ई. में गौहाटी जीत ली। इन आक्रमणकारियों को दण्ड देने के लिए मीर जुमला नवम्बर, 1661 ई. के प्रारम्भ में ढाका से एक प्रबल सेना लेकर चला। उसके प्रारम्भिक सैनिक कार्य सफल रहे। उसने कूचबिहार तथा आसाम, दोनों पर अधिकार कर लिया। उसकी विजय-यात्रा के समय प्रकृति तथा मनुष्य के विरोध ने बहुत कठिनाइयाँ उपस्थित कीं। उन सभी कठिनाइयों को साधारण सेना के साथ झेलते हुए वह 17 मार्च, 1662 ई. को अहोम राज्य की राजधानी गढ़गाँव पहुँचा। इस बार अहोमों ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उन्होंने अपनी राजधानी तथा सम्पत्ति को शाही दल की मजीं पर छोड़ दिया।

परन्तु प्रकृति ने शीघ्र अहोमों की ओर से युद्ध किया। वर्षा ऋतु के आरम्भ हो जाने से अस्वास्थ्यकर जलवायु तथा भोजन की सामग्री एवं औषधि के अभाव के कारण मीर जुमला की सेना को भयानक कष्ट हुआ। इससे प्रोत्साहित होकर अहोमों ने, जो कुचले नहीं गये थे, बल्कि डराकर भगा दिये गये थे, फिर तुरंत आक्रमण करना आरम्भ कर दिया तथा मुग़लों को क्लेश देने लगे। मुग़लों के अपने पड़ाव में महामारी तथा दुर्मिक्ष हो जाने के कारण उनकी तकलीफ बढ़ गयी, परन्तु बाधाओं से भयभीत हुए बिना मुग़ल सूबेदार लड़ता रहा तथा वर्षा ऋतु के बाद पुनः आक्रमण आरम्भ कर दिया। यह विचार कर कि और प्रतिरोध से कोई लाभ नहीं है, अहोमों ने शाही दल के साथ संधि कर ली। इस प्रकार सैनिक पराक्रम की दृष्टि से आसाम पर मीर जुमला का आक्रमण सफल रहा। अहोम राजा जयध्वज ने वार्षिक कर देने तथा युद्ध की विशाल क्षति-पूर्ति करने की प्रतिज्ञा की। क्षति-पूर्ति का एक भाग तुरंत देना था तथा शेष को अगले बारह महीनों में तीन बराबर किश्तों में चुकाना था। मुग़लों को हाथियों से परिपूर्ण दरंग प्रान्त के आधे से अधिक भाग पर अधिकार करना था किन्तु यह सफलता बहुत महँगी पड़ी। इस कारण मुग़लों को बहुत कष्ट हुआ तथा बहुत-से लोगों की जानें गयीं। मीर जुमला की जान भी इसी में गयी। वह औरंगजेब का एक अत्यन्त योग्य सेनापति था। ढाका लौटते समय रास्ते में 30 मार्च, 1663 ई. को उसकी मृत्यु हो गयी। यह सफलता क्षणिक भी थी। कुछ वर्षों के बाद अहोमों ने कामरूप को पुनः जीत लिया। मुग़ल सरकार बहुत समय तक अनियमित रूप से युद्ध चलाती रही, पर कोई स्थायी लाभ न हुआ।

मीर जुमला की मृत्यु के तुरंत बाद एक अस्थायी राजप्रतिनिधि का अल्पकालीन और असफल शासन रहा। उसके बाद आसफ खाँ के पुत्र तथा औरंगजेब के मामा शाइस्ता खाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया गया। वह इस पद पर लगभग तीस वर्षों तक रहा; सिर्फ एक बार तीन से कुछ कम वर्षों के लिए यह सिलसिला टूट गया था। नब्बे वर्षों से अधिक की आयु में आगरे में 1694 ई. में उसकी मृत्यु हुई। उसने पुर्तगीज सामुद्रिक डाकुओं को दण्ड दिया, बंगाल की खाड़ी में स्थित सोनद्वीप पर अधिकार कर लिया, जो सामुद्रिक डाकुओं का गढ़ था, तथा उनके मित्र अराकान के राजा से चटगाँव जीत लिया (1666 ई.)।

परन्तु सामुद्रिक डकैती की बुराई का पूर्णत: निर्मूल नहीं किया जा सका। इससे अठारहवीं सदी में बहुत बाद तक पूर्वी बंगाल के लोग क्लेश पाते रहे।

राजनैतिक तथा आर्थिक विचारों से औरंगजेब को उत्तर-पश्चिम सीमा पर अग्रगामी नीति का अनुसरण करना पड़ा। वहाँ उपद्रवकारी मुस्लिम जातियाँ सदा से मुग़ल-साम्राज्य के लिए महान् चिन्ता का साधन बनी हुई थीं। उस प्रदेश के खेतों की अल्प उपज के कारण वहाँ की साहसी अफ़गान जातियों की बढ़ती हुई जन-संख्या को आम सड़कों पर डकैती करने तथा उत्तर पश्चिमी पंजाब के समृद्ध नगरों के लोगों को डर दिखलाकर, उनसे धन ऐंठने को विवश होना पड़ा। उत्तर-पश्चिमी दरों को खुला ना रखने तथा उनके नीचे की घाटियों को सुरक्षित रखने के लिए औरंगजेब की सरकार ने पहले रुपये देकर इन पहाड़ी आदमियों को अपनी ओर मिला लेने की कोशिश की। परन्तु राजनैतिक पेशने सदैव आज्ञाकारिता प्राप्त करने में कार्यसाधक नहीं हुई। 1667 ई. के प्रारंभ में गड़बड़ी शुरू हो गयी। यूसुफजाइयों ने भागू नामक अपने एक नेता के अधीन सशस्त्र विद्रोह कर दिया। उनकी एक विशाल संख्या ने अटक के ऊपर सिन्धु को पार कर हजारा जिले पर आक्रमण कर दिया। अन्य गिरोह पश्चिमी पेशावर तथा अटक जिलों को लूटने लगे। फिर भी कुछ ही महीनों के अन्दर यूसुफूजाई विद्रोह दबा दिया गया।

परन्तु 1672 ई. में अफरीदियों ने अकमल खाँ नामक अपने नायक के अधीन मुग़लों को विरुद्ध कर दिया। अकमल खाँ ने सुल्तान के रूप में अपना राज्याभिषेक करवाया और सभी पठानों को एक प्रकार के राष्ट्रीय युद्ध के लिए संगठित करने के लिए बुलाया। मई महीने में विद्रोहियों ने अली मस्जिद में मुहम्मद अमीन खाँ को करारी हार दी। मुहम्मद अमीन तथा उसके कुछ बड़े अफसर निकल भागे, परन्तु मुगल बाकी सब कुछ खो बैठे। इस विजय से अकमल खाँ की प्रतिष्ठा तथा साधन बढ़ गये तथा अधिक रंगरूट उसके पक्ष में प्रलोभित होकर चले आये, जिससे अटक से लेकर कंधार तक के सम्पूर्ण पठान देश ने विद्रोह कर दिया। पठानों की खट्टक जाति भी अफ्रीदियों से मिल गयी। खट्टकों का कवि तथा वीर खुशहाल खाँ राष्ट्रीय विद्रोह का प्रमुख व्यक्ति बन गया तथा कबायिलियों को अपनी लेखनी एंव तलवार दोनों से समान रूप में प्रोत्साहित करने लगा। अप्रैल, 1674 ई. में अफगानों ने एक शाही फौज पर हमला किया। शाही फौज शुजाअत खाँ के अधीन थी, जो मार डाला गया। पर उसकी फौज के शेष भाग का उद्धार एक राठौर दस्ते ने किया जिसे जसवन्त सिंह ने मुगलों के समर्थन के लिए भेजा था।

इस दुर्घटना से औरंगजेब को विश्वास हो गया कि उत्तर-पश्चिम में मुग़लों की प्रतिष्ठा पुन: स्थापित करने के लिए अधिक गम्भीर चेष्टाओं की आवश्यकता है। जुलाई, 1674 ई. के प्रारम्भ में वह स्वयं पेशावर के निकट हसन अब्दाल गया तथा कूटनीति एंव शस्त्रों के चतुर संयोग से बड़ी सफलता प्राप्त की। बहुत सी अफगान जातियों को भेटें, पेंशनें, जागीरें और पद देकर अपने पक्ष में कर लिया गया। अधिक अविनीत जातियों को हथियार से दबा दिया गया। जब परिस्थिति काफी सुधर गयी, तब दिसम्बर, 1675 ई. में बादशाह पंजाब से दिल्ली के लिए रवाना हुआ। औरंगजेब की सफलता अफगानिस्तान के सुयोग्य शासक अमीन खाँ की विवेकपूर्ण नीति से दृढ़ हो गयी, जो इस पद पर 1677 ई. से लेकर 1698 ई. तक रहा। उसने अपनी स्त्री साहिबजी के, जो अली मदर्शन खाँ की पुत्री थी, विवेकपूर्ण परामर्श के अनुसार, चतुराई के साथ मेलजोल वाली नीति का अनुसरण किया। इस प्रकार मुगल बादशाह उत्तर-पश्चिम में अफगान विद्रोहों का दमन और शाही प्रतिष्ठा की पुन: स्थापना करने में समर्थ हुआ। इस काम में उसने आर्थिक सहायता देने अथवा एक जाति को दूसरी के विरुद्ध खड़ा करने अथवा (यदि उसी की उपमा का प्रयोग करें तो कह सकते हैं कि) दो हड्डियों को आपस में टकरा कर उन्हें तोड़ने की नीति का अनुसरण किया। खट्टक वीर खुसहाल और कई वर्षों तक लड़ता रहा। अन्त में उसका अपना ही पुत्र उसका सबसे बुरा शत्रु सिद्ध हुआ तथा उसे मुग़लों के हाथों में सौंप दिया।

इसमें सन्देह नहीं मुगलों के सीमा-युद्धों का अंत सफलता के साथ हुआ। परन्तु उनके अप्रत्यक्ष परिणाम साम्राज्य के लिए अहितकर हुए। जैसा डाक्टर यदुनाथ सरकार कहते है, अफगान युद्ध शाही वित्त के लिए घातक तो था ही, इसका राजनैतिक परिणाम और भी अधिक हानिकारक हुआ। इससे आगामी राजपूत युद्ध में अफगानों का इस्तेमाल असम्भव हो गया, यद्यपि अफगान ठीक उसी कोटि के सैनिक थे, जो उस ऊबड़खाबड़ एंव वीरान देश में विजय प्राप्त कर सकते थे। दक्कन से सर्वोत्तम मुगल फौज को उत्तर-पश्चिम सीमा पर लड़ने के लिए ले जाने के कारण शिवाजी दबाव से मुक्त हो गया। मराठा नायक ने अपने शत्रु की शक्ति के इस विभाजन से लाभ उठाकर दिसम्बर, 1675 ई. के बाद के पंद्रह महीनों के अन्दर गोलकुंडा होकर कर्णाटक तक तथा फिर वापस आकर मैसूर एवं बीजापुर होकर रायगढ़ तक झपट्टा मारा और चकाचौंध कर देने वाली विजयों का ताँता लगा दिया। यह उसके जीवन में उत्कर्ष की पराकाष्ठा थी। परन्तु अफरीदियों तथा खट्टकों ने ही उसकी अटूट सफलता को सम्भव बनाया था।

औरंगजेब की दक्कन नीति

राज्यकाल के प्रथमार्द्ध पूर्वार्द्ध में औरंगजेब का ध्यान उत्तर के मामलों में उलझा हुआ था तथा दक्कन सूबेदारों पर छोड़ा हुआ था। ह्रासोन्मुख दक्षिणी सल्तनतें अब तक अपने ऊपर किये गये आघातों से पूर्णत: नहीं उबर सकी थी। उनसे लाभ उठाकर मराठों का उत्थान हो गया। मुगल-साम्राज्य के लिए चुनौती के रूप में मराठों के उत्थान से दक्कन की राजनैतिक परिस्थिति उलझ गई, जिसका पूरा महत्व बादशाह पहले नहीं समझ सका। उसके राज्य-काल के पहले चौबीस वर्षों में दक्कन में उसके सूबेदार इन सल्तनतों अथवा मराठों के विरुद्ध कोई निश्चित सफलता नहीं प्राप्त कर सके थे।

1680 ई. में शिवाजी की मृत्यु से दक्कन में बादशाह की स्थिति किसी भी तरह नहीं सुधरी थी, यद्यपि औरंगजेब अपनी प्रभुता को दृढ़ करने में कृतसंकल्प था। विद्रोही शाहजादा अकबर के मराठा राजा शम्भूजी के पास जाने तथा दोनों के बीच संधि हो जाने से उसकी दक्कन-नीति में पूर्ण परिवर्तन आ गया। उसने अब साम्राज्य के हित के विरुद्ध उपस्थित इस संकट को रोकने के लिए स्वंय सेना लेकर जाने की आवश्यकता का अनुभव किया और जून, 1681 ई. में मेवाड़ के साथ झटपट संधि कर ली।

8 सितम्बर, 1681 ई. को दक्कन के लिए अजमेर से प्रस्थान कर वह 23 नवम्बर, 1681 ई. को बुरहानपुर तथा 1 अप्रैल, 1682 ई. को अहमदनगर पहुँचा। वह यह नहीं सोच सका कि नियति उसे दक्षिण में उसकी तथा उसके साम्राज्य की कब्रें खोदने के लिए घसीट कर ले जा रही है। पहले चार वर्ष शाहजादा अकबर को पकड़ने की असफल चेष्टाओं तथा मराठों के विरुद्ध विनाशकारी आक्रमणों में व्यतीत हो गये। मराठों के कुछ दुर्ग शाही दल द्वारा जीत लिये गये। किन्तु हट्टे-कट्टे लोग, जिन्हें शिवाजी ने नयी अभिलाषाओं से प्रेरित किया था, पूर्णत: दबाये नहीं जा सके।

इसके बाद अवनतिग्रस्त सल्तनतों की विजय की ओर बादशाह का ध्यान आकृष्ट हुआ। दक्कन की शिया सल्तनतों के प्रति शाहजहाँ की तरह औरंगजेब का रुख भी अंशत: साम्राज्य के हित तथा अंशत: धार्मिक विचारों से प्रभावित था। बीजापुर ने गुटबन्दियों एवं मराठों के उत्कर्ष से दुर्बल हो जाने के कारण आक्रमणकारियों की अधीनता स्वीकार कर ली। नगर का मुग़लों द्वारा अन्तिम घेरा 11 अप्रैल, 1685 ई. को आरम्भ हुआ तथा बादशाह स्वयं वहाँ जुलाई 1687 ई. में पहुँचा। घिरी हुई सेना ने वीरता से सामना किया। परन्तु भोजन की सामग्री के अभाव तथा दुर्मिक्ष के कारण अनगिनत मनुष्यों एवं घोड़ों की मृत्यु से थककर उन्होंने सितम्बर, 1686 ई. में आत्म-समर्पण कर दिया। अन्तिम आदिल शाही सुल्तान सिकन्दर ने बादशाह के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया तथा यूसुफ आदिल शाह के द्वारा स्थापित राजवंश की इतिश्री हो गयी।

इसके बाद गोलकुंडा के कुतुबुशाही राज्य की बारी आयी। फरवरी, 1687 ई. के प्रारम्भ में औरंगजेब स्वयं गोलकुंडा के समक्ष उपस्थित हुआ तथा कुछ दिनों के अन्दर मुग़ल फौज ने स्थानीय गढ़ पर घेरा डाल दिया। परन्तु उस किले में पर्याप्त भोजन एवं युद्ध-सामग्री संचित थी, जिससे घिरे हुए व्यक्ति लगभग आठ महीनों तक वीरतापूर्वक डटे रह सके। इसके बावजूद उन्हें कोई निश्चित सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। बल्कि दुर्मिक्ष एवं महामारी से उन्हें क्लेश ही हुआ तथा अपने शत्रुओं के प्रतिशोध के कार्य से उन्हें भारी हानियाँ हुई। फिर भी औरंगजेब पूरी धुन के साथ डटा रहा तथा उसने और सेना इकट्ठी की। अब्दुल्ला पनी नामक एक अफ़गान सिपाही था, जो उस समय गोलकुंडा के सुल्तान अबुल हसन के यहाँ नौकरी करता था। बादशाह ने उसे घूस दे दी। फलत: उसने किले का प्रमुख द्वार खोलकर मुग़लों को इसमें प्रवेश करने दिया। परन्तु अब्दुर्रज्जाक लारी नामक गोलकुंडा के एक स्वामिभक्त सरदार ने बादशाह द्वारा दिये गये रुपये-पैसे के प्रलोभनों पर लात मारी। वह अकेला लड़ता रहा और सत्तर घाव जाने के बाद ही कहीं उसका लड़ना बंद हुआ। मुग़लों ने उसकी कर उसे स्वस्थ किया तथा उसने अन्त में बादशाह के अधीन एक उच्च पद स्वीकार किया। अबुल हसन को पचास हजार रुपये वार्षिक पेंशन देकर अपने अन्तिम दिन व्यतीत करने की दौलताबाद के किले में भेज दिया गया। गोलकुंडा को मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया गया (सितम्बर, 1687 ई.)।

अपनी दक्कन-नीति के दो उद्देश्यों में एक की प्राप्ति कर लेने के पश्चात् अर्थात् दक्कन की हासोन्मुख सल्तनतों को मिला लेने के बाद, औरंगजेब दूसरे उद्देश्य की ओर मुड़ा, अर्थात नवोदित मराठा शक्ति का दमन करने में संलग्न हुआ। पहले उसके प्रयास सफल हुए। शम्भूजी 11 मार्च, 1889 ईं को फांसी पर चढ़ा दिया गे। उसकी राजधानी रायगढ़ जित ली गयी। यद्यपि उसका भाई राजाराम बच निकला, पर उसके छोटे लड़के शाहू के सहित उसका शेष परिवार बन्दी बना लिया गया। बादशाह ने दक्षिण में अपने प्रभुत्व का विस्तार किया तथा तंजोर एवं त्रिचिनापल्ली के हिन्दू राज्यों पर कर लगाया।

इस प्रकार 1690 ई. तक औरंगजेब अपनी शक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँच गया तथा काबुल से लेकर चटगाँव और कश्मीर से लेकर कावेरी तक फैले हुए लगभग सम्पूर्ण भारत का परम स्वामी बन गया। ऐसा प्रतीत होता था कि औरंगजेब ने अब सब कुछ प्राप्त कर लिया है; परन्तु वास्तव में वह सब कुछ खो चुका था। यह उसकी इतिश्री का श्रीगणेश था। अब उसके जीवन का सबसे दु:खपूर्ण एवं आशाशून्य अध्याय खुला। मुग़ल साम्राज्य इतना विस्तृत हो गया था कि एक व्यक्ति द्वारा अथवा एक केन्द्र से उस पर शासन करना सम्भव नहीं था। उसके शत्रु सब ओर खड़े हो गये। वह उन्हें पराजित कर सकता था, पर सदा के लिए उन्हें नष्ट नहीं कर सकता था।….उत्तरी तथा मध्य भारत के बहुत-से स्थानों में अराजकता फैल गयी। सुदूर दक्कन में बैठे बूढ़े बादशाह का हिन्दुस्तान के अपने अफूसरों पर सारा नियंत्रण जाता रहा। शासन शिथिल एवं भ्रष्टाचारपूर्ण हो गया। नायक एवं जमींदार स्थानीय अधिकारियों की उपेक्षा कर अपनी प्रभुता स्थापित करने लगे। देश में उन्होंने हलचल मचा दी। विशेष रूप से आगरा प्रान्त में अव्यवस्था पुरानी हो चुकी थी। शाही संरक्षण के हट जाने से कला एवं विद्या की अवनति होने लगी। एक भी भवन, सुन्दर लिखावट वाली पांडुलिपि अथवा उत्तम चित्र औरंगजेब के राज्य-काल का स्मरण नहीं दिलाते। दक्कन के अंतहीन युद्ध के कारण उसका कोष रिक्त हो गया। सरकार दिवालिया हो गयी। वेतन बाकी रहने के कारण सैनिक भूख से मरने लगे तथा उन्होंने बलवा कर दिया। उसके राज्य-काल के अन्तिम वर्षों में बंगाल का राजस्व, जो योग्य दीवान मुर्शिद कुली खाँ नियमित रूप से भेजता था, बादशाह के परिवार अथवा उसकी सेना का एकमात्र सहारा बन गया था तथा इसके आने की उत्सुकता से प्रतीक्षा की जाती थी। दक्कन के फोड़े ने औरंगजेब को नेस्तनाबूद कर दिया। बादशाह मराठों को अधीन करने अथवा उनके देश को जीतने में असफल रहा। 1691 ई. तक मराठों की स्थिति में सुधार हुआ और वे मुगलों के विरुद्ध राष्ट्रीय प्रतिरोध का युद्ध फिर करने लगे। पहले यह युद्ध राजाराम तथा कुछ अन्य योग्य मराठा नायकों के अधीन चलाया गया। 1700 ई. में राजाराम की मृत्यु हो गयी। तत्पश्चात् उसकी वीर विधवा ताराबाई ने अपने हाथों में इसकी बागडोर ले ली।

औरंगजेब का राजपूतों के साथ संघर्ष

राजपूतों ने साम्राज्य के विकास में बड़ी सहायता की थी। औरंगजेब उनकी मित्रता का मूल्य समझने में असफल रहा। उसने उनके प्रति राज्य की नीति में परिवर्तन कर दिया। अम्बर के राजा जयसिंह को वह अपनी नीति के विरुद्ध राजपूत विरोध का एक प्रबल नेता समझता था। उसे (राजा जय सिंह को) 1667 ई. में दक्कन में अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा।

इसके बाद एक से अधिक कारणों से मारवाड़ की विजय की ओर उसका ध्यान आकृष्ट हुआ। इसका युद्धकौशल की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण स्थान था, क्योंकि मुग़ल राजधानी से पश्चिमी भारत के समृद्ध नगरों एवं बन्दरगाहों के कुछ सैनिक एवं व्यापारिक रास्तों पर इसका नियंत्रण था। उस समय उत्तर भारत में एक प्रबल सैनिक राज्य के रूप में इसकी स्थिति औरंगजेब को फूटी आँखों भी नहीं सुहाती थी। उसे संदेह था कि इसका प्रधान जसवन्त सिंह, जो पहले दारा शुकोह के दल का था, उसकी नीति के विरोधियों का नेता बनकर खड़ा हो सकता है।

शीघ्र ही बादशाह को मारवाड़ के विरुद्ध अपनी योजनाएँ कार्यान्वित करने का अनुकूल अवसर मिल गया। राजा जसवन्त सिंह खैबर की घाटी और पेशावर जिले में मुगल सीमान्त दस्तों का संचालन कर रहा था। इसी समय 10 दिसम्बर, 1678 ई. को जमरूद में उसकी मृत्यु हो गयी। इस समाचार को सुनते ही औरंगजेब ने तुरंत मारवाड़ को मिला लेने के लिए कदम उठाया। उसने वहाँ अपने अफसरों को फौजदार, किलादार कोतवाल एवं अमीन के रूप में नियुक्त कर लिया तथा उसे सीधे मुग़ल शासन में ले आया। राठौर अपने राजा की मृत्यु से व्यग्र एवं त्रस्त हो जाने के कारण संयुक्त राष्ट्रीय प्रतिरोध उपस्थित करने में असफल रहे। मई के महीने में नागौर के नायक तथा जसवन्त के पोते (भतीजे के बेटे) इन्द्र सिंह राठौर को उत्तराधिकार शुल्क के रूप में छत्तीस लाख रुपये देने पर जोधपुर का राणा मान लिया गया। परन्तु मुग़ल अफूसरों से घिरा हुआ वह केवल नाम का शासक रहा।

इस प्रकार बादशाह की नीति सफल प्रतीत होने लगी। परन्तु मारवाड़ वास्तव में अधीन नहीं किया गया था। उस राज्य का प्रत्येक राजपूत गृह बादशाह के तीव्र आघात का अन्त करने की कृतसंकल्प हो गया। अब शाही नीति को बाधा पहुँचाने तथा अन्त में उसे पराजित करने को एक नया तत्त्व घटनास्थल में आ घुसा। इधर फरवरी, 1679 ई. में जसवन्त की मृत्यु के पश्चात् लाहौर में उसके दो पुत्रों का जन्म हो चुका था। एक तो जन्म के तुरंत बाद मर गया; परन्तु दूसरा, जिसका नाम अजीत सिंह था, जीवित रहा। उसके पिता के प्रमुख अनुगामी उसे दिल्ली ले आये। उन्होंने औरंगजेब से उसे मृतक राजा का उत्तराधिकारी स्वीकार करने का अनुरोध किया। परन्तु बादशाह ने उसका पोषण अपने अन्त:पुर में करने का प्रस्ताव किया अथवा एक अन्य समकालीन विवरण के अनुसार अजीत को जोधपुर का राजसिंहासन उसके मुसलमान बन जाने की शर्त पर देने का वादा किया गया।

बादशाह के इस असाधारण प्रस्ताव से राठौरों की भावनाओं पर कठोर आघात पहुँचा। उन्होंने इन शतों को स्वीकार करने के बदले अपने प्राणों की आहुति देने की प्रतिज्ञा की। परन्तु शाही दल की संगठित शक्ति के विरुद्ध केवल भक्ति एवं अपरिणामदर्शी साहस किसी काम के नहीं हो सकते थे।

संकट के इस क्षण में राठौरों के सौभाग्य से उन्हें दुर्गादास (जसवन्त के मंत्री आसकरन का पुत्र) जैसा योग्य नेता मिल गया। जो राठौर वीरता का पुष्प था। राजस्थान के इतिहास में दुर्गादास को भयानक बाधाओं के होने पर भी अपने देश के प्रति नि:स्वार्थ भक्ति के लिए एक अमर व्यक्ति माना जाता है, जो उचित ही है। उस स्थिर हृदय को मुग़लों का सोना सत्पथ से न डिगा सका, मुग़लों के शस्त्र नहीं डरा सके। उसने एक राजपूत सैनिक के प्रबल आघात एंव संगठन-शक्ति के विरल संयोग का प्रदर्शन किया और राठौरों के प्रति वह करीब-करीब अकेला था।

एक शाही फौज रानियों तथा अजीतसिंह को पकड़ने के लिए भेजी गयी। सत्य का वरण करने वाले राजपूतों की एक टुकड़ी उस पर टूट पड़ी। फैली हुई गड़बड़ी से लाभ उठा कर दुर्गादास इच्छित शिकारों को पुरूषों के परिधान में घोड़े पर लेकर भाग चला। उसके नौ मील जाने पर शाही दल उस तक पहुँच गया। परन्तु यहाँ रणछोड्दास जोधा के अधीन राजपूतों की एक छोटी टुकड़ी ने जब तक हो सका तब तक पीछा करने वालों को रोकने का प्रयत्न किया तथा दुर्गादास रानियों एंव अजीत के साथ 23 जुलाई, 1679 ई. को जोधपुर पहुँचने में समर्थ हुआ। जब औरंगजेब ने विभिन्न प्रांतों से बहुत सी फौजें मॅगवाई और तीनों शहज़ादों-मुअज्जूम, आज़म एंव अकबर-को सेना के भिन्न-भिन्न दस्तों का कमान दे दिया गया। वह स्वंय सैनिक कार्यवाइयों का निर्देशन करने के लिए अगस्त, 1679 ई. में अजमेर गया। जोधपुर को जीत कर वहाँ लूटपाट मचायी गयी।

परन्तु मुग़ल बादशाह की इस आक्रमणकारी नीति के कारण मेवाड़ के वीर सिसोदिया मारवाड़ के निराश राठौरों से जा मिले। औरंगजेब ने तुरंत मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। राणा ने मुग़लों की प्रबलतर शक्ति का सामना करना अनुचित समझा। इसलिए वह मेवाड़ के नगरों तथा पुरवों को त्यागकर अपनी सारी प्रजा के साथ पहाड़ी किलों में चला गया। नीचे के मैदान बंजर पड़ गये। मुग़लों ने सुगमता से चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। सफलता के लिए निश्चित होकर बादशाह अकबर के अधीन एक प्रबल सेना चित्तौड़ में छोड़ अजमेर के लिए चल पड़ा। परन्तु शीघ्र ही उसकी आँखें खुल गयी। राजपूत छिप कर युद्ध करते रहे। वे मुग़लों की चौकियों पर इतने अधिक साहस के साथ टूट पड़ते थे कि मुग़ल चौकियों का कमान स्वीकार करने वाला कोई न रहा; एक-के-बाद दूसरे कप्तान इस खतरनाक सम्मान को बहाने बनाकर अस्वीकार करने लगे। अपनी सफलताओं से प्रोत्साहित होकर राजपूतों ने मई, 1680 ई. में शाहजादा अकबर के अधीन रहने वाली मुगल सेना पर हमला कर दिया। बादशाह ने इस पराजय के लिए शाहजादा अकबर को उत्तरदायी ठहराया। उसने चित्तौड़ की सेना को शाहजादा आजूम के अधीन कर दिया तथा अकबर को मारवाड़ भेज दिया।

शाहजादा अकबर ने अपने हटाये जाने के अपमान की पीड़ा का तीव्र अनुभव किया। वह राजपूतों की योग्यता, उनके साथ युद्ध करते समय अच्छी तरह समझ ही गया होगा। अब यह उनके साथ मिलकर अपने पिता से दिल्ली का राजमुकुट छीनने के सपने देखने लगा। राजपूत नायकों ने उसे बतलाया कि किस प्रकार उसके पिता की नीति से मुगलसाम्राज्य की स्थिरता नष्ट हो रही थी। उन्होनें दो सबसे महान् राजपूत जातियों सिसोदिया एंव राठौर, की सैनिक शक्ति से उसकी सहायता करने की प्रतिज्ञा की। इस प्रकार उनकी आशा थी कि दिल्ली के राजसिंहासन पर एक सच्चा राष्ट्रीय राजा बैठा सकेगे। लगभग सत्तर हजार व्यक्तियों की एक सेना लेकर जिसमें राजपूताना का सर्वोत्कृष्ट रक्त था, शाहजादा अकबर 15 जनवरी, 1681 ई. को अजमेर के निकट पहुँचा। उस समय औरंगजेब की स्थिति संकटपूर्ण थी क्योंकि उसकी सेना की दो प्रमुख टुकड़ियां चित्तौड एंव राजसमुद्र झील के निकट थी। यदि शाहजादा तुरंत इस सुअवसर का उपयोग कर लेता, तो बादशाह दिक्कत में पड़ सकता था। परन्तु उसने आलस्य एंव विषय-सुख में अपना समय गंवा दिया और इस प्रकार अपने चतुर पिता को अपनी प्रतिरक्षा के लिए तैयारियाँ करने का अवसर दे दिया। बादशाह ने अपने विद्रोही पुत्र के पास एक पत्र लिखा। उसने ऐसा प्रबंध किया जिसमें वह पत्र राजपूतों के हाथ पड़ जाए। इससे अकबर के मित्रों को यह विश्वास हो गया कि मुग़ल शाहजादा उनके साथ छल कर रहा है। बादशाह की यह चतुराईपूर्ण युक्ति सफल सिद्ध हुई। अकबर के राजपूत मित्रों ने विश्वासघात का संदेह कर, उसे त्याग दिया तथा वह शीघ्रता से अपनी जान बचाकर राजपूतों के पास भाग गया। परन्तु राजपूतों को तुरंत अपने प्रति किये गए छल का पता चल गया। वीर राठौर नायक दुर्गादास को शाहजादे के निर्दोष होने का पता चल गया। उसने वीरता के साथ उसे अपने पिता के प्रतिरोधों से बचाया तथा उसे खानदेश एवं बगलाना होकर मराठा राजा शम्भूजी के दरबार में पहुँचा दिया। पर शिवाजी का विलासी उत्तराधिकारी इस भगोडे मुग़ल शाहजादे को कोई कार्यसाधक सहायता न दे सका। इसका हिन्दू-मुस्लिम सामंजस्य और मेल पर आधारित भारतीय साम्राज्य का स्वप्न निरर्थक ही रहा। लगभग छः वर्षों के बाद निराश मुग़ल शाहजादा फारस चला गया। वहीं 1704 ई. में उसकी मृत्यु हुई।

शाहजादा अकबर के विद्रोह से दिल्ली का बादशाह बदला नहीं जा सका। परन्तु इससे मेवाड़ के राणा को बहुत चैन मिला। किन्तु मुगलों के विरुद्ध उसकी क्षणिक सफलता से उसकी प्रजा को बहुत कष्ट हुआ। मुगलों को भी काफी तकलीफ हुई तथा उन्हे राजपूतों के विरुद्ध किए गए कार्यों से कोई निश्चित लाभ नहीं हो सका। इन विचारों से बादशाह तथा राजसिंह के पुत्र एंव उत्तराधिकारी राणा जयसिंह ने जून, 1681 ई. में संधि कर ली। राणा ने जजिया के बदले कुछ जिले दे दिये तथा मुग़ल मेवाड़ से हट गये। परन्तु मारवाड़ के साथ सम्मानपूर्ण शर्तों पर संधि हुई और उससे तीस वर्षीय युद्ध करते रहे। उन्होंने मुगल चौकियों को तंग किया। इसलिए मुग़ल अफसरों को उसके (दुर्गादास के) आक्रमण से अपनी रक्षा करने के लिए अपने शत्रु को विवश होकर चौथ देना पड़ा। युद्ध चलता ही रहा। अंत में औरंगजेब की मुत्यु के पश्चात् उसके पुत्र तथा उत्तराधिकारी बहादुर शाह प्रथम ने 1709 ई. में अजीत सिंह को मारवाड़ का राणा स्वीकार कर लिया।

औरंगजेब के राजपूत युद्धों के परिणाम, उसके साम्राज्य के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए। हजारों व्यक्तियों की बलि चढ़ायी गयी तथा मरूभूमि पर अपार धन नष्ट किया गया। मगर बादशाह को कोई स्थायी सफलता न मिली। शाही प्रतिष्ठा के लिए यह परिणाम तो हानिकारक था ही, परन्तु इसके भौतिक फल और भी बुरे निकले। औरंगजेब के लिए राजपूतों की शत्रुता को उभाड़ना राजनैतिक अविवेक का काम था। राजपूत अब तक साम्राज्य के मित्र थे। परन्तु औरंगजेब को दक्कन के प्रति ध्वंसकारी युद्धों में अथवा उत्तर-पश्चिम सीमा में रखने के महत्त्वपूर्ण कार्य में वीर नायकों और सैनिकों की अनुरक्त सेवा से हाथ धोना पड़ा।

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब सर्वोपरि एक उत्साही सुन्नी मुसलमान था। उसकी धार्मिक नीति सांसारिक लाभ के किसी विचार से प्रभावित नहीं थी। उदार दारा के विरुद्ध सुन्नी कट्टरता के समर्थक के रूप में राजसिंहासन प्राप्त करने वाले की हैसियत से उसने कुरान के कानून को कठोरता से लागू करने का प्रयत्न किया। इस कानून के अनुसार, प्रत्येक धार्मिक मुस्लिम को अल्लाह की राह में मिहनत करनी चाहिए, या दूसरे शब्दों में, तब तक गैर-मुसलमान देशों (दारुल-हर्ब) के विरुद्ध धर्म-युद्ध (जिहाद) करना चाहिए, जब तक कि वे इस्लाम के राज्य उत्कट कट्टरपंथी बन गया, जिससे उसने जीवन की म्लान गम्भीरता सूक्ष्माचार-प्रधान कट्टरता वाले अपने विचारों को लागू करने के लिए कदम उठाये। उसके अपने जन्मदिन एवं राज्याभिषेक-दिवस के प्रचलित को सरल बना दिया। अपने शासन-काल के ग्यारहवें वर्ष से उसने झरोखा-दर्शन के प्रचलन को बन्द कर दिया। इस प्रथानुसार उसके पूर्वगामी प्रतिदिन सबेरे राज प्रसाद की दीवार के बरामदे पर लोगों का, जो उस समय सामने मैदान में एकत्रित रहते थे, अभिवादन स्वीकार करने की उपस्थित होते थे। उसी वर्ष उसने दरबार में संगीत का निषेध कर दिया तथा पुराने संगीतज्ञों और गायकों को बर्खास्त कर दिया। परन्तु दरबार में प्रतिबन्ध लगाये जाने पर भी संगीत मानवीय आत्मा से निर्वासित नहीं किया जा सका। सरदार गुप्त रूप से इसका अभ्यास करते रहे तथा शाही निषेध का कुछ प्रभाव केवल विख्यात नगरों में ही था। बारहवें वर्ष में बादशाह के शरीर को दो जन्मदिवसों पर सोने, चाँदी एवं अन्य वस्तुओं में तौलने का उत्सव रोक दिया गया तथा शाही मुहूर्तकों एवं ज्योतिषियों को हटा दिया गया। पर ज्योतिष-विद्या में मुसलमानों का विश्वास उनके दिमागों में इतनी गहराई के साथ जमा हुआ था कि किसी शाही आज्ञा से उसे उखाड़ना सम्भव न था। यह अठारहवीं सदी में भी बहुत काल तक सक्रिय रहा। अन्य धर्मावलम्बियों द्वारा सिक्कों पर कलमा के अपवित्र होने से बचाने के लिए उसने इसका व्यवहार निषिद्ध कर दिया। उसने नैरोज को भी उठा दिया, जिसे भारत के मुग़ल बादशाहों ने फारस से अपनाया था। उसने लोगों के जीवन को कुरान के कानून के पूर्णतया अनुरूप बनाने के लिए महतसिबों (सार्वजानिक सदाचार निरीक्षकों) को नियुक्त किया।

औरंगजेब जो कुछ दूसरों पर लागू करना चाहता था, उसका स्वयं अभ्यास करता था। उसके व्यक्तिगत जीवन का नैतिक स्तर ऊँचा था तथा वह अपने युग के प्रचलित पापों से दृढ़तापूर्वक अलग रहता था। इस प्रकार उसके समकालीन उसे शाही दरवेश समझते थे तथा मुसलमान उसे जिन्दा पीर के रूप में पूजते थे। सामान्य नैतिकता की उन्नति के लिए उसने अनेक नियम बनाये। उसने एक कानून द्वारा मदिरा एवं भाँग के उत्पादन की बिक्री तथा सार्वजनिक व्यवहार का निषेध कर दिया। मनूची हम लोगों का बतलाता है कि नर्तकियों एवं वेश्याओं को विवाह कर लेने अथवा राज्य छोड़ देने की आज्ञा दे दी गयी। बादशाह ने कड़ी आज्ञा दी कि अश्लील गीत नहीं गाये जाएँ उसने विशेष धार्मिक त्यौहारों के समय लकड़ी के बोझों का जलाना तथा जुलूसों का चलना रोक दिया। औरंगजेब के राज्यकाल की सरकारी तारीखों में लिखा हुआ है कि उसने सती-प्रथा को उठा दिया (दिसम्बर, 1663 ई.)। परन्तु भारत में आने वाले समकालीन यूरोपीय यात्रियों के प्रमाण से मालूम होता है कि शाही निषेधाज्ञा को शायद ही माना जाता था।

फिर भी बादशाह केवल इन्हीं नियमों से सन्तुष्ट होकर नहीं बैठा रहा। उसने अन्य फर्मान तथा आज्ञापत्र जारी किये, जिनसे लोगों के महत्त्वपूर्ण वर्गों के सम्बन्ध में एक नयी नीति का उद्घाटन हुआ। सन् 1679 ई. में काफिरों (गैर-मुसलमानों) पर पुन: जजिया कर लगा दिया गया।

इन नए नियमों और अग्यापत्रों का उन लोगों पर अवश्य ही गहरा प्रभाव पड़ा होगा, जिनके लिए ये जारी लिए गए। इन्होंने वैसी कठिनाईयों को बहुत बाधा दिया होगा, जिनका शाही सरकार को सामना करना था। बादशाह औरंगजेब को अपने धर्म का सच्चा एवं ईमानदार व्याख्याता होने का जो श्रेय था, उसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। पर यह भी सच है कि अपने उत्साह एवं जोश के कारण वह यह भूल गया कि भाग्य ने जिस देश पर उसके शासन करने का विधान रचा था, उसकी आबादी समान जाति की नहीं थी, बल्कि विभिन्न तत्वों की थी, जो अपनी धार्मिक परम्पराओं एवं आदशों में थी और इसे चतुराई एवं सहानुभूति के साथ समझने की आवश्यकता थी। औरंगजेब ने राज्य के हितों का, अपने धर्म के हितों से समीकरण कर तथा इससे मतभेद रखने वालों को अप्रसन्न कर अवश्य ही भूल की। इस नीति से लोगों के कुछ वर्गों में असन्तोष की भावनाएँ उत्पन्न हो गयीं, जिन्होंने उसके राज्यकाल के शेष भाग में उसकी ताकत को दूसरी ओर मोड़ दिया। इस प्रकार यह मुग़ल-साम्राज्य की अवनति एवं पतन का अत्यन्त प्रबल कारण सिद्ध हुआ।

नीति की प्रतिक्रिया- बादशाह के विरुद्ध प्रतिक्रिया का सर्वप्रथम भयानक विस्फोट मथुरा जिले के जाटों के बीच हुआ, जहाँ शाही फौजदार अब्दुन्न्बी ने उन पर बहुत अत्याचार कर रखा था। 1669 ई. में शक्तिशाली जाट किसानों ने तिलपत के जूमींदार गोकला के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। उन्होंने फौजदार को मार डाला और एक वर्ष तक सम्पूर्ण जिले को अव्यवस्था की दशा में रखा। अंत में मथुरा के नये फौजदार हसन अली खाँ के अधीन एक मजबूत शाही सेना ने उनका दमन कर दिया। गोकला मार डाला गया तथा उसके परिवार के सदस्यों को मुसलमान बना दिया गया। परन्तु इससे जाट स्थायी रूप से नहीं कुचले गये। उन्होंने 1685 ई. में पुन: एक बार राजाराम के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया और 1688 ई. में सिकन्दरा में अकबर की कब्र को लूट लिया। राजाराम को परास्त कर मार डाला गया तथा जाटों का प्रधान गढ़ 1691 ई. में अधीन कर लिया गया। परन्तु उन्हें शीघ्र चुरामन नामक एक अधिक उग्र नेता मिल गया। चुरामन ने असंगठित जाटों को एक प्रबल सैनिक शक्ति में परिवर्तित कर दिया तथा औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् मुग़लों के विरुद्ध एक सशस्त्र प्रतिरोध का संगठन किया।

औरंगजेब की नीति के विरुद्ध दूसरे सशस्त्र विरोध का नेतृत्व बुन्देला राजा छत्रसाल ने किया। छत्रसाल के पिता चम्पत राय ने औरंगजेब के राज्यकाल के प्रारम्भिक भाग में उसके विरुद्ध विद्रोह किया था परन्तु बादशाह की ओर से अधिक दबाव पड़ने पर कैद से बचने के लिए उसने आत्म-हत्या कर ली। छत्रसाल ने दक्कन में बादशाह की सेवा की थी, जहाँ शिवाजी के दृष्टान्त से प्रोत्साहित होकर उसने साहस तथा स्वतंत्रता का जीवन व्यतीत करने का स्वप्न देखा। बुन्देलखंड तथा मालवा की हिन्दू प्रजा के असन्तोष ने उसे 1671 ई. तक अपने धर्म तथा बुन्देल स्वतंत्रता के समर्थक के रूप में खड़े होने का अवसर दे दिया। उसने मुगलों पर कई विजयें प्राप्त कीं तथा पूर्वी मालवा में अपने लिए एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने में सफल हुआ। इसकी राजधानी पन्ना में थी। 1731 ई. में उसकी मृत्यु हुई।

एक और विद्रोह मार्च, 1672 ई. में सतनामियों के बीच हुआ। ये मूल रूप में हिन्दू भक्तों का एक अनुपद्रवी सम्प्रदाय था। इसका केंद्र नारनोल (पटियाला में) एवं मेवात (अलवर क्षेत्र) में था। सतनामियों के विद्रोह का तात्कालिक कारण था एक मुग़ल पैदल सैनिक द्वारा उनके एक सदस्य की हत्या। उन्होंने नारनोल पर अधिकार कर लिया। जब परिस्थिति गम्भीर सिद्ध हुई, तब मुग़ल बादशाह ने सैनिकों को अपने तबुओं के बाहर निकलने की आज्ञा दी। अप्रशिक्षित सतनामी किसान शीघ्र एक विशाल शाही फौज द्वारा परास्त हो गये। उनमे से बहुत कम बच पाये तथा देश का वह भाग उनसे साफ हो गया। औरंगजेब की नीति से सिक्खों में भी असंतोष फैला।

आसाम-युद्ध (1668 ई.) में वे मिर्ज़ा राजा जयसिंह के पुत्र राजाराम सिंह से जा मिले। परन्तु वे शीघ्र आनन्दपुर में अपने मूल-निवास को लौट आये। अब शाही सरकार से उनकी शत्रुता ठन गयी। उन्होंने बादशाह के कुछ कामों का विरोध किया तथा कश्मीर के ब्राह्मणों को इनका प्रतिरोध करने को प्रोत्साहित किया। यह औरंगजेब की बर्दाश्त के बाहर था। उसने सिक्ख गुरु को बन्दी बनाकर दिल्ली मंगवाया। वहाँ उसे मृत्यु तथा धर्म-परिवर्तन के बीच एक को चुनने का अवसर दिया गया। तेग बहादुर ने अपने धर्म को जीवन से अधिक पसन्द किया। पाँच दिनों के बाद उनकी फाँसी हो गयी (सन् 1675 ई.)। इस प्रकार उन्होंने अपना सर दियासार न दिया। गुरु की शहादत से सिक्खों की मुग़ल-साम्राज्य के विरुद्ध प्रतिशोध की भावना को प्रेरणा मिली तथा प्रकट रूप से युद्ध अनिवार्य हो गया। आगे की स्मृति में शीशगंज गुरूद्वारा (दिल्ली) का निर्माण किया गया।

तेग बहादुर के पुत्र एवं उत्तराधिकारी गुरु गोविन्द भारतीय इतिहास में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व थे। वे एक यूनानी विधि-निर्माता की संपूर्णता के साथ अपने अनुगामियों के संगठन के काम में कटिबद्ध हो गए। उन्होंने छुरे से चलाए हुए जल द्वारा दीक्षा (पहुल) की प्रणाली कायम की। इस नये प्रकार की दीक्षा को स्वीकार करने वाले खालसा कहलाये। उन्हें सिंह की उपाधि दी गयी। उन्हें पंच ककार को ग्रहण करना पड़ता था- केश, कघा, कृपाण, कच्छा और कड़ा। उन्हें लड़ाई में शत्रु को अपनी पीठे नहीं दिखलानी थी। उन्हें सदा निर्धनों एवं भाग्यहीनों की सहायता करनी थी। गुरु गोविन्द ने एक पूरक ग्रन्थ का संकलन किया। इसका नाम था दसवें बादशाह का ग्रन्थ। उन्होंने कुछ पाश्र्ववर्ती पहाडी राजाओं तथा मुग़ल अधिकारियों के विरुद्ध विलक्षण साहस एवं दृढ़ता के साथ युद्ध किया। कहा जाता है कि उन्होंने बहादुर शाह प्रथम को राजसिंहासन के लिए हुए उसके संघर्ष में सहायता दी तथा आगे चलकर उसके साथ दक्कन के लिए रवाना हुए। एक धर्मोन्मत्त अफ़गान ने 1708 ई. के अंत में गोदावरी के किनारे नान्द नामक स्थान पर उन्हें छुरा मार दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी।

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