चालुक्य राजवंश

चालुक्य वंश

चालुक्य वंश

छठीं से आठवीं शताब्दी ईसवी तथा दसवीं से बारहवीं शताब्दी ईसवी तक चालुक्य वंश दक्षिण में एक शक्तिशाली वंश था। इन चालुक्य राजाओं की तीन शाखाएँ थीं-

1. वातापि के चालुक्य।

2. कल्याणी का उत्तरकालीन चालुक्य वंश।

3. वेगी के पूर्वी चालुक्य वंश।

वातापि के चालुक्य- पुलकेशिन प्रथम इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था। वह रणराज का पुत्र और जयसिंह का पौत्र था। उसने वातापि (वादामी-बीजापुर जिले में) में दुर्ग बनवा कर इसे अपनी राजधानी बनाया। उसने 535 ई. से 566 ई. तक राज्य किया। 567 ई. में कीर्तिवर्मा शासक हुआ। कीर्तिवर्मा के पश्चात् उसका भाई मंगलेश गद्दी पर बैठा। मंगलेश और कीर्तिवर्मा के पुत्र पुलकेशिन द्वितीय के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया। इसमें पुलकेशिन द्वितीय विजयी हुआ और मंगलेश मारा गया।

पुलकेशिन द्वितीय (610-642 ई.)- पुलकेशिन प्रथम इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था। उसका सबसे बड़ा कार्य उत्तर भारत के महान् सम्राट् हर्षवर्धन को पराजित करना था। इस पराजय से हर्ष का राज्यविस्तार दक्षिण में बढ़ने से रुक गया और हर्ष की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। उसने गुर्जरों को भी हराया तथा कलिंग और गुजरात को भी कर देने पर विवश किया। परन्तु पुलकेशिन द्वितीय को पल्लव राजा नरसिंह वर्मा ने तीन युद्धों में पराजित किया और अन्तिम युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय वीरगति को प्राप्त हुआ।

पुलकेशिन द्वितीय के बाद भी कई प्रसिद्ध राजा हुए जिनमें विकम्रादित्य प्रथम (655-681 ई.), विक्रमादित्य द्वितीय (734-757 ई.) उल्लेखनीय हैं। इनका पल्लवों से युद्ध चलता रहा। कीर्तिवर्मा द्वितीय को राष्ट्रकूट राजा दन्तिदुर्ग ने पराजित कर दिया और चालुक्यों के राज्य पर राष्ट्रकूटों का अधिकार हो गया।

कल्याणी का उत्तरकालीन चालुक्य वंश- इस वंश का प्रथम शासक तैल या तैलप द्वितीय (973-997 ई.) था। इसकी राजधानी मान्यखेत थी। इसने चालुक्य वंश की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित किया। अगले शासक सोमेश्वर प्रथम ने अपनी राजधानी मान्यखेत से हटाकर कल्याणी को बनाया और इसी से यह वंश कल्याणी का चालुक्य वंश कहलाया। इसने अपने राज्य का विस्तार किया। कौशल और कलिंग इसके राज्य में शामिल थे। चोल राजा राजेन्द्र द्वितीय ने इसे युद्ध में पराजित किया। अत: उसने 1068 ई. में करूवती के पास तुंगभद्रा नदी में डूबकर महायोग को प्राप्त किया। विक्रमादित्य षष्ठ और सोमेश्वर तृतीय अन्य शासक हुए। विक्रमादित्य ने शक संवत् का प्रयोग बंद करके विक्रम चालुक्य संवत शुरू किया। इसके दरबार में विल्हण ने विक्रमांकदेवचरित् की रचना की। मिताक्षरा का लेखक विज्ञानेश्वर उसी के दरबार में रहता था। सोमेश्वर तृतीय के समय होयसल शासक विष्णुवर्द्धन ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इसने अभिलाषीतार्थ चिन्तामणि या मनसोल्लास की रचना की। अत: इसे सर्वज्ञ के नाम से जाना जाता है। तैलप तृतीय इस वंश का अन्तिम शासक था जिसे उसके सेनापति बिज्जल ने हराकर गद्दी पर अपना अधिकार कर लिया। प्रान्तीय शासकों ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और चालुक्य राज्य के स्थान पर होयसल, यादव तथा काकतीय तीन वंशों ने क्रमशः द्वारसमुद्र, देवगिरि तथा वारंगल में अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित किये।

वेंगी का पूर्वी चालुक्य वंश- पुलकेशिन द्वितीय का भाई विष्णुवर्धन चालुक्य वंश का संस्थापक था। इसने 615 से 633 ई. तक राज्य किया इसकी राजधानी वेंगी थी। इसके पश्चात् जयसिंह प्रथम (633-663 ई.), इन्द्रवर्मा (केवल एक सप्ताह) और विष्णुवर्धन द्वितीय (663-672 ई.) राजा बने। विष्णुवर्धन द्वितीय के पुत्र मेगी युवराज ने (672-696 ई.) तक राज्य किया। जयसिंह द्वितीय (696-709 ई.) उसका उत्तराधिकारी बना। उसके बाद उसका छोटा भाई कोकुलि विक्रमादित्य शासक बना। उसे परास्त कर उसके बड़े-भाई विष्णुवर्धन तृतीय (709-746 ई.) ने राज्य किया। अन्य शासक विजयादित्य प्रथम (746-764 ई.), विजयादित्य द्वितीय (799-843 ई.), विजयादित्य तृतीय (844-888 ई.), भीम प्रथम (888-918 ई.), भीम तृतीय (934-945 ई.), विक्रमादित्य षष्ठ (948-970 ई.) हुए। 973 से 1003 ई. तक पूर्वी चालुक्यों के राज्य का प्रशासन सम्भवत: चोलों ने चलाया। इसके पश्चात् शक्तिवर्मा (1003-1015 ई.), विष्णुवर्धन अष्टम (1020-1063 ई.) और कुलोत्तुंग चोलदेव (1063-1118 ई.) शासक हुए।

चालुक्य राजवंश इतिहास जानने के प्रामाणिक साधन चालुक्यों के अभिलेख हैं। ये शिलाओं, स्तम्भों, ताम्रपत्रों और मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण हैं। इनकी भाषा संस्कृत, कन्नड़ व तेलुगू है। अभिलेखों में शक संवत् का प्रयोग हुआ है। चालुक्यों का महत्त्वपूर्ण अभिलेख एहोल है जो पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा लिखा गया है। अभिलेखों का विवरण परस्पर विरोधी है। चालुक्यों के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। बहुत से साहित्यिक ग्रन्थों से भी चालुक्यों से सम्बन्धित जानकारी मिलती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग व ईरानी इतिहासकार टाबरी के विवरण भी उल्लेखनीय हैं। अजन्ता की गुफा के चित्रों की पहचान करवाने में टाबरी के प्रयास महत्त्वपूर्ण है। विल्हण कृत विक्रमाकदेवचारित चालुक्यों का इतिहास जानने का प्रमुख साहित्यिक साधन है। इससे प्राचीन भारतीयों के इतिहास प्रेम का भी बोध होता है।

वाकाटकों के बाद दक्षिण के इतिहास में चालुक्यों का स्थान आता है। चालुक्यों की उत्पत्ति का प्रश्न काफी विवादास्पद रहा है। कुछ विद्वान् उन्हें शूलिक जाति से उत्पन्न मानते हैं जिसका उल्लेख वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में किया है। कुछ इतिहासकार इनका उद्गम स्थल उत्तरप्रदेश को मानते हैं जो दक्षिण में आकर बस गये। निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि ये उत्तरी भारत के क्षत्रिय थे जो राजस्थान में बस गये थे। छठी शताब्दी में ये दक्षिण में आकर एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरे। कालान्तर में इनकी कई शाखाएँ बनी जैसे वातापी के चालुक्य, कल्याणी के चालुक्य तथा वेंगी के चालुक्य। स्पष्ट साक्ष्य न होने के कारण किसी एक शाखा के मूलवंश को स्वीकारना कठिन है। गोत्र व नामों में भिन्नता होने से इन शाखाओं की वंशगंत भिन्नता स्पष्ट रूप में परिलक्षित होती है। चालुक्य का पहला राजा जयसिंह था। कैरा ताम्रपत्र (472-73 ई.) के अनुसार बादामी के चालुक्य राजवंशों का प्रथम ऐतिहासिक शासक जयसिंह था। अपनी प्रतिभा के बल पर वह आन्ध्र प्रदेश के बीजापुर क्षेत्र का सामंत शासक बन गया। जयदेव मल्ल के दौलताबाद लेख में जयसिंह को कदम्ब नरेशों के ऐश्वर्य का विनाशकत्ता कहा गया है। कोथेम एवं अन्य अभिलेखों में उसे राष्ट्रकूट शासक इन्द्र तथा उसके पुत्र कृष्ण को पराजित करने वाला कहा गया है। उसके पुत्र रणराग के समय में चालुक्यों की शक्ति में वृद्धि हुई। रणराग के शासन काल का कोई अभिलेख तो उपलब्ध नहीं हुआ है फिर भी उसका शासन काल 520 ई. के लगभग माना जा सकता है। छठी शताब्दी के मध्य में तीसरा शासक पुलकेशिन प्रथम था जिसने चालुक्य सत्ता का प्रसार किया। उसके समय में भी वातापीपुर चालुक्यों की राजधानी बनी। उसने अश्वमेध यज्ञ का संपादन किया जिसका उल्लेख 543 ई. के एक वादामि के अभिलेख में हुआ है। वह 540 ई. के लगभग शासक बना। महाकूट सांभलेख के अनुसार पुलकेशिन प्रथम ने अश्वमेघ यज्ञ के अतिरिक्त बाजपेय, अग्निहोम, अग्निचयन, पौंडरीक, बहुसुवर्ण तथा हिरण्यगर्भ आदि यज्ञों का संपादन कराया। स्पष्ट है कि वैदिक धर्म में उसकी गहन आस्था थी। मंगलरसराज के नेरूर-अभिलेख के अनुसार पुलकेशिन प्रथम रामायण, महाभारत, पुराण आदि का ज्ञाता होने के साथ-साथ राजनीति में भी पारंगत था। विभिन्न अभिलेखों से उसके चरित्र की कतिपय विशेषताओं का भी बोध होता है। उसे दृढ़प्रतिज्ञ, सत्यवादी तथा ब्राह्मण कहा गया है। उसके लिए धर्ममहाराज विरुद्ध का प्रयोग हुआ है। पुलकेशिन प्रथम ने रणविक्रम, सत्याश्रय, धर्ममहाराज, पृथ्वीवल्लभराज राजसिंह आदि की उपाधियाँ धारण कीं। विभिन्न चालुक्य शासकों में उसे एक योग्य एवं सफल शासक कहा जा सकता है जिसकी साहित्य एवं धर्म में गहन अभिरुचि थी।

पुलकेशिन प्रथम के बाद उसका पुत्र कीर्तिवर्मन प्रथम शासक बना जिसका काल 566 ई. के लगभग है। महान् विजेता विभिन्न अभिलेखों में उसे कहा गया है, जिसने मगध, बंग, कलिंग, मुद्रक, गंग, मषक, पाण्ड्य, चौलिय, द्रमिल, नल, कदम्ब, मौर्य आदि राज्यों पर विजय पायी। ऐतिहासिक दृष्टि से कहा जा सकता है कि उसने कोंकण, उत्तरी कनारा, उत्तरी दक्षिण के प्रदेशों को विजित किया जिसमें दक्षिण महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु के प्रदेशों तक उसके साम्राज्य का विस्तार हो गया। कोंकण पर अधिकार से गोआ (रेवती द्वीप) भी उसके क्षेत्राधिकार में आ गया था। गोआ एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था जिससे चालुक्यों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। उनका अन्तप्रदेशीय व अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार बढ़ा। अपनी विभिन्न उपलब्धियों के उपलक्ष्य में कीर्तिवर्मन ने पृथ्वीवल्लभ, पुरुरणपराक्रम एवं सत्याश्रय आदि अनेक उपाधियाँ धारण कीं, विभिन्न यज्ञों का संपादन किया। अपने शासन काल में उसने कई कलात्मक निर्माण कायों को प्रोत्साहन दिया।

कीर्तिवर्मन प्रथम की मृत्यु के उपरान्त मंगलेश चालुक्य शासक बना जो कीर्तिवर्मन प्रथम का छोटा भाई था। वह लगभग 597 ई. में मनोनीत किया गया। वह भी शक्तिशाली शासक बना जिसने कलचुरि वंश के राजा से युद्ध किया और खानदेश व उसके आसपास के क्षेत्र को जीत कर चालुक्य राज्य में शामिल किया। ऐहोल अभिलख में उल्लेख हुआ है कि जो विजयश्री अब तक कलचुरि राजवंश को वरण करती थी, वही अब मंगलेश के पौरुष एवं वीरता पर प्रसन्न हो गयी थी। बाद में उसने कदम्बों को उखाड़ फेंका। वातापी के चालुक्यों की शक्ति के कारण ही यह शाखा इतिहास में वातापी चालुक्यों के नाम से प्रसिद्ध हुई।

चालुक्यों के शासन-काल में धर्म और कला

चालुक्य नरेश ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे। उनके शासन-काल में पौराणिक देवताओं की पूजा का प्रचलन बढ़ा। इन नरेशों ने ब्रह्मा, विष्णु और शिव के विशाल मन्दिरों का निर्माण कराया। पूजा में यज्ञों की प्रथा को बढ़ावा मिला। पुलकेशिन द्वितीय ने अश्वमेघ यज्ञ किया। उसके दरबार में कवि रविकीर्ति था जिसने ऐहोल अभिलेख की रचना की। रविकीर्ति ने जिनेन्द्र का मंदिर बनवाया।

यद्यपि चालुक्य राजा ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे, परन्तु वे धार्मिक मामलों में सहिष्णु थे। उनकी धार्मिक सहिष्णुता के कारण दक्षिण में जैन-धर्म को भी प्रोत्साहन मिला। विक्रमादित्य द्वितीय ने जैन-धर्म को राजाश्रय प्रदान किया।

चालुक्यों के शासन-काल में कला को विशेष प्रोत्साहन मिला। चट्टानों को काटकर विशाल मन्दिरों का निर्माण कराया गया। अजन्ता और एलोरा दोनो चालुक्य राज्य में स्थित थे। अजन्ता के कुछ भित्तिचित्र चालुक्य काल के थे। एलोरा में चट्टानों को काटकर बने कुछ मन्दिर चालुक्य स्थापत्य कला की याद दिलाते हैं, जैसे कैलाश पर्वत के नीचे रावण, नृत्य करते हुए भगवान् शिव और नृसिंह भगवान हिरण्यकश्यप का वध करते हुए दिखाये गये हैं। ऐहोल के विष्णु मन्दिर में विक्रमादित्य द्वितीय का एक अभिलेख सुरक्षित है। विक्रमादित्य द्वितीय की पत्नी ने पट्टत्कल में लोकेश्वर नाम से एक शिव मन्दिर का निर्माण कराया जो विरुपाक्ष मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रकार चालुक्यों के शासन काल में स्थापत्य कला को विशेष प्रोत्साहन मिला। चालुक्य शासकों के समय के भित्तिचित्रों में महत्त्वपूर्ण वह चित्र है जिसमें पुलकेशिन द्वितीय को ईरानी राजदूत का स्वागत करते दिखलाया गया है।

पुलकेशिन द्वितीय Pulakeshin II

पुलकेशिन द्वितीय के बारे में हमें ऐहॉल अभिलेख में उसके समकालीन कवि रविकीर्ति द्वारा लिखी गयी प्रशस्ति से जानकारी मिलती है। यह संस्कृत भाषा में है। पुलकेशिन द्वितीय इस राजवंश का पराक्रमी व प्रसिद्ध शासक था जिसका शासन-काल 609-642 ई. है। पुलकेशिन ने गृहयुद्ध में चाचा मंगलेश पर विजय प्राप्त कर राज्याधिकार प्राप्त किया। उसने श्री पृथ्वीवल्लभ सत्याश्रय की उपाधि से अपने को विभूषित किया। वह जीवन भर युद्धों में रत रहा और संपूर्ण दक्षिण भारत पर अपना प्रभुत्व कायम किया। उसने अपनी आंतरिक स्थिति को मजबूत बनाने के लिए विद्रोही सामंतों का दमन किया। बाद में उसने पड़ोसी राजाओं के विरुद्ध अभियान किए। पुलकेशिन ने राष्ट्रकूट राजा गोविन्द को भीमा नदी के तट पर एक युद्ध में परास्त किया। विपरीत परिस्थितियों में बड़े धैर्य के साथ पुलकेशिन द्वितीय ने अपने प्रतिद्वन्द्वियों एवं विद्रोहियों को परास्त किया। बाद में कदम्बों की राजधानी बनवासी पर अपना अधिकार जमा लिया। मैसूर के गंगों व केरल के अलूपों से भी उसका मुकाबला हुआ। पुलकेशिन ने कोंकण की राजधानी पुरी पर भी अधिकार किया। लाट, मालवा व भृगुकच्छ के गुर्जरों को भी उसने पराजित किया। पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन को पराजित कर उसकी राजधानी कांची तक उसने अपने साम्राज्य का विस्तार किया। उसकी विजयों से भयभीत होकर चेर, चोल व पाण्ड्यों ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। समकालीन स्रोतों से विदित होता है कि उसने नर्मदा से कावेरी के तट के सभी प्रदेशों पर अपना आधिपत्य कायम कर लिया था और इस प्रकार दक्षिण के एक बड़े भू-भाग पर राजनैतिक दृष्टि से एकता कायम की। दक्षि में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद उसने उत्तर की ओर प्रयाण किया। पुलकेशिन द्वितीय का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सैनिक संघर्ष उत्तर भारत के सर्वशक्तिमान शासक हर्षवर्धन के विरुद्ध हुआ।

इस सन्दर्भ में ऐहोल अभिलेख से जानकारी मिलती है। युद्ध सर्वथा निर्णायक सिद्ध हुआ एवं हर्षवर्धन को दक्षिण विजय की महत्त्वाकांक्षा सदैव के लिए त्यागनी पड़ी। इस युद्ध से पुलकेशिन द्वितीय के गौरव में वृद्धि हुई, उसने परमेश्वर व दक्षिणापथेश्वर उपाधियाँ धारण कीं। पुलकेशिन ने पूर्व अपने साम्राज्य का विस्तार किया। उसने दक्षिण कोशल, कलिग के शासकों को जीता, वेंगी को विजित कर पल्लवों को जीता। चोल, पाण्ड्य व केरल के राजाओं ने भी उससे संधि की। पुलकेशिन की इन विजयों का उल्लेख एहोल अभिलेख में हुआ है। उसकी गणना भारत के महान् शासकों में की जा सकती है जिसने छोटे से चालुक्य रही को विन्ध्यक्षेत्र से दक्षिण में कावेरी नदी के तट तक विस्तृत करके दक्षिणापथेश्वर की उपाधि धारण की। उसने हर्ष के अहियनों को अवरुद्ध क्र उसकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को अवरुद्ध किया।

महान् विजेता ही नहीं कुशल शासक भी पुलकेशिन था। उसने देश-विदेशों के शासकों से कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित किये। मुस्लिम लेख तवरी में उल्लेख आया है कि प्रमेश नामक राजा जो पुलकेशिन द्वितीय ही था, ने 615-26 ई. के लगभग तत्कालीन पारसी के सम्राट् भुखरी द्वितीय के राजदरबार में अपनादूत बहुत से उपहारों के साथ भेजा। इस सन्दर्भ में अजंता का एक भित्तिचित्र उल्लेखनीय है जिसमें किसी राजपूत को एक भारतीय राजा द्वारा स्वागत करते हुए दिखाया गया हे। इससे भारतीय शासकों की कूटनीतिक सम्बन्धों की परम्परा का बोध हो जाता है। संभव है इस चित्र का निर्माण पुलकेशिन द्वितीय के काल में हुआ हो। उसने बहुत से शासकों के पास अपने राजदूत भेजे। चीनी यात्री ह्वेनसांग स्वयं पुलकेशिन के दरबार में उपस्थित हुआ। चीनी यात्री भी कहता है कि पुलकेशिन के विदेशी राजाओं से मधुर सम्बन्ध थे। ईरानी शासक खुसरो द्वितीय उसका परम मित्र था। ईरानी राजदूत को पुलकेशिन के दरबार में विशेष सम्मान प्राप्त था। ह्वेनसांग के विवरण से पुलकेशिन की बहुत सी योग्यताओं का बोध होता है। चीनी यात्री ने उसके राज्य का पैदल भ्रमण किया था और बहुत सी सूचनाएँ राजा के बारे में उसने दी है। पुलकेशिन के राज्य के अंतिम वर्ष संकटपूर्ण थे। पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने 642 ई. में वातापी पर आक्रमण किया। इसी युद्ध में पुलकेशिन की हार हुई और संभवत: मृत्यु भी। पल्लवों ने उसकी राजधानी को लूटा और उजाड़ दिया।

चालुक्य वंश के अंतिम शासक- पुलकेशिन द्वितीय के बाद उसका पुत्र सत्याश्रय जिसको विक्रमादित्य प्रथम भी कहते हैं का राज्य पर अधिकार हुआ। उसका शासन-काल 655-681 ई. तक अपने पराक्रम और साहस से चालुक्यों की शक्ति और गौरव को पुन:स्थापित किया और उनकी राजधानी को लूटा। कुछ प्रदेशों पर अधिकार भी किया। उसने चोलों, पाण्ड्यों एवं केरलों के विरुद्ध भी युद्ध किया और विजय प्राप्त की। उसका अधिकांश काल पल्लवों से संघर्ष करते हुए व्यतीत हुआ। पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम, महेन्द्रवर्मन द्वितीय, परमेश्वरवर्मन से उसने निरन्तर युद्ध किये। उसका उत्तराधिकारी विनयादित्य था। उसका शासनकाल 681-696 ई. है। अभिलेखों में उसे विजेता कहा गया है, जिसने केरलों, मालवों, चोलों, हैहयों, पाण्डयों आदि पर विजय की। अभिलेखों में उसे फारस, कावेरी की घाटी तथा सिंहल द्वीप के राजाओं से कर वसूल करने वाला बताया गया है। उसने उत्तर के शासक सकलोत्तरापथनाथ को भी पराजित किया। उसने सत्याश्रय व श्री पृथ्वीवल्लभ के विरुद्ध धारण किये।

अभिलेखों का विवरण अतिरंजित हो सकता है। उस समय उत्तर भारत में कोई सम्राट् जिसको सकलोत्तरापथनाथ कह सके, था ही नहीं। उसने उत्तर गुप्तकालीन किसी शासक को पराजित अवश्य किया था।

विजयादित्य (696-735 ई.)- इसने पल्लव नरेश परमेश्वरम् द्वितीय पर विजय प्राप्त की। उसने निर्माण सम्बन्धी कायों को विशेष प्रोत्साहन दिया।

विक्रमादित्य द्वितीय- विक्रमादित्य द्वितीय ने 734 ई. से 744 ई. तक शासन किया। इसके काल में चालुक्यों व पल्लवों के संघर्ष जारी रहे। उसकी दो हैहयवंशीय राजकुमारियों ने दो विशाल शिवमंदिर बनवाये।

कीर्तिवर्मन द्वितीय- कीर्तिवर्मन 745 ई. के लगभग गद्दी पर बैठा। वह एक अयोग्य और विलासी शासक था। उसके काल में साम्राज्य का विघटन प्रारम्भ हो गया था। पल्लवों तथा अन्य राज्य शक्तियों से निरन्तर संघर्ष करते रहने के कारण चालुक्य शक्ति क्षीण हो गयी थी।

चालुक्यों की सांस्कृतिक देन- चालुक्यों की साहित्य और कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण देन रही है। चालुक्य जन शिक्षा के प्रति जागरुक थे। प्राचीन भारतीय विधि से संबंधित याज्ञवल्क्य स्मृति की टीका मिताक्षरा भी विज्ञानेश्वर ने इसी काल में लिखी। प्रभाचन्द्र का न्यायकौमुदी चन्द्रोदय भी इसी दौरान रचित हुआ। गणित से संबंधित गणितसार-समुच्चय की रचना वीराचार्य ने की। जिनसेन ने अमोघवृति लिखी। कन्नड़ भाषा के उल्लेखनीय ग्रन्थ कविराजमार्गशांतिपुराणचामुंडरायपुराणअजितपुराणगदायुद्ध आदि लिखे गये। प्राचीन भारतीय राजनीति का प्रमुख नीति वाक्यामृत की रचना सोमदेव सूरी ने की। उन्होंने  यशस्तिकचम्पू में जैनधर्म व दर्शन की व्याख्या की। इस काल के प्रमुख विद्वानों में उदयदेव का योगदान विशेष उल्लेखनीय है जो एक महान् व्याकरणाचार्य थे। उन्होंने जैन धर्म व दर्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। प्राचीन भारतीयों के इतिहास के प्रति दृष्टिकोण व इतिहास लेखन के तरीकों को दर्शाने वाले प्रमुख ग्रन्थ विक्रमांकदेवचरित भी विल्हण द्वारा रचा गया।

कला का सर्वांगीण विकास चालुक्यों के शासनकाल में हुआ। बहुत से हिन्दू व बौद्ध गुहा मंदिरों का निर्माण करवाया गया। चालुक्य मंदिर वास्तुकला के प्रमुख केन्द्र ऐहोल, तेर, पट्टनकला, बादामि आदि थे। ऐहोल व तेर में उत्तरेश्वर व कालेश्वर मंदिरों का निर्माण हुआ जिनमें ईटों का प्रयोग किया गया है। बादामि का मालेगिती शैव मंदिर वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसका निर्माण 625 ई. में हुआ। पट्टदल के शैव मंदिर भी उल्लेखनीय हैं। मंदिरों का आकार विशाल है, इनका प्रदक्षिणा पथ व मण्डप कांची के कैलाश मंदिर से बहुत साम्यता रखता है। स्तंभों पर प्रतिमाओं का अंकन किया गया है। मंदिर की भित्तियों पर विभिन्न देवी देवताओं, रामायण के दृश्य, नाग आदि का अंकन है। मंदिरों के निर्माण पर पल्लव-द्रविड्-वास्तुशैली का प्रभाव देखा जा सकता है।

बादामि, ऐलोरा, ऐलीफेंटा, औरंगाबाद, अजंता आदि में पर्वतों को काटकर मंदिर बनाये गये। ये गुहा मंदिर हिन्दू-बौद्ध व जैन धर्म से संबंधित हैं। ऐलोरा के मंदिर तीनों संप्रदायों से संबंधित है। प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर दशावतार, रामेश्वर आदि का निर्माण बादामी के चालुक्यों के काल में ही हुआ। औरंगाबाद में बौद्ध मंदिरों की संख्या अधिक है। इस मंदिर की कुछ मूर्तियाँ घुटने टेके हुए हैं, जो सूमान्य स्त्री-पुरुषों की लगती है। संभवतः ये मानव मूर्तियाँ गुहा निर्माताओं की हैं।

चालुक्यों द्वारा अजंता की बहुत-सी प्रमुख गुफायें बनाई गयीं। गुफा संख्या 1 व 2 विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, इनमें बोधिसत्व अवलोकितेश्वर का चित्रण है। अजंता की गुहाओं पर जातक कथाओं के चित्र भी अंकित हैं। ये भित्ति चित्र अत्यंत सजीव व चित्ताकर्षक हैं। गुहा मंदिर निर्माण की परम्परा जो गुप्तकाल में आरम्भ हुई, चालुक्य काल में अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गयी। ऐलोरा के मंदिर दो-दो अथवा तीन-तीन तलों में काटकर बनाये गये हैं, जबकि अजंता के गुफा मंदिर एक तलीय हैं। इस काल में वास्तुकला व शिल्पकला के विकास के साथ-साथ अन्य कलाओं ने भी निश्चित रूप से उन्नति की होगी। चालुक्य शासक स्वयं कलाविद् और संगीत, चित्र, मूर्ति कलाओं आदि के क्षेत्र में गहरी अभिरुचि रखते थे। इस राजवंश के बहुत से व्यक्ति संगीत में अभिरुचि रखते थे। इस संदर्भ में सेनापति रविदेव का नाम उल्लेखनीय है। यह भी माना गया है कि आचार्य भरत की परम्परा पर आधारित नृत्य का निर्माण हुआ।

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