चोल साम्राज्य

चोल साम्राज्य

चोल राज्य बहुत प्राचीन राज्य था। इसका उल्लेख महाभारत, मेगास्थनीज के यात्रा-वृत्तांत और अशोक के शिलालेखों से प्राप्त होता है। संगम साहित्य में अनेक चोल शासकों का वर्णन है। इस राज्य में मद्रास, उसके आसपास का क्षेत्र और कर्नाटक के कुछ क्षेत्र सम्मिलित थे। संगम साहित्य में करिकाल को चोलवंश का संस्थापक कहा गया है। उसका अभ्युदय-काल दूसरी शताब्दी मानी जाती है। उसने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए सक्रिय प्रयास किए। उसकी बढ़ती हुई शक्ति से चिन्तित पाण्ड्यों और चेरों आदि ने उसके विरुद्ध संघ बनाया किन्तु करिकाल के सामने वे ठहर न सके। उसने अपनी पुत्री आदिनन्दि का विवाह चेर राजकुमार अति के साथ कर दिया था। करिकाल एक सफल विजेता होने के साथ ही कुशल शासक भी था। उसके शौर्य की गाथाओं को कवियों ने ओजस्वी स्वर दिए हैं। पट्टूपट्टू नामक काव्य-संग्रह में उसके शौर्य की गाथाएं संकलित हैं। करिकाल के बाद उसका पुत्र नेद्युदिकिल्ल राजसिंहासन पर बैठा। वह एक अशक्त शासक था। फलत: उसके शासन-काल में चोल राजवंश पतन के गर्त्त में चला गया। उसे पतन के गर्त्त से निकलने में लम्बा समय लगा। नवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में उस राजवंश का पुन: उत्कर्ष हुआ। इसका श्रेय चोलवंशी शासक विजयालय को है। विजयालय पल्लवों का एक सामन्त था। पल्लवों और पाण्ड्यों के युद्ध के समय उसने तंजौर पर अधिकार करके अपनी राजनैतिक शक्ति स्थापित की और तंजौर को अपनी राजधानी बनाया। वहां उसने निशुम्भसूदनी का मंदिर बनवाया। इस प्रकार 850 ई. के आसपास उसने स्वतन्त्र चोल राज्य की स्थापना की। उसे चोल साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक भी कहा जाता है। विजय के अवसर पर उसने नरकेशरी की उपाधि धारण की थी।

आादित्य प्रथम (871-907)

विजयालय के बाद उसका पुत्र आदित्य प्रथम 871 ई. में राजा बना। उसने चोल राज्य की शक्ति और सीमा का विस्तार किया। उसने कोंदराम की उपाधि ली। आदित्य प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र परान्तक प्रथम शासक बना। उसने 907 ई. से 955 ई. तक राज्य किया और दक्षिणी भारत में चोल शक्ति को बढ़ाया। उसने पाण्ड्य राजा का राज्य जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और इस विजय के उपलक्ष्य में मदुराई कोण्ड की उपाधि धारण की। परान्तक प्रथम को राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय से घमासान युद्ध करना पड़ा और परान्तक प्रथम पराजित हुआ और चोल राज्य के कुछ भागों पर कृष्ण तृतीय का अधिकार हो गया। इस पराजय से चोल शक्ति को आघात पहुंचा। उसका उत्तराधिकारी गुंडारादित्य और फिर परांतक द्वितीय हुआ। परांतक द्वितीय उत्तम चोल के नाम से भी जाना जाता है।

राजराज महान् (985-1014 ई.)

चोल साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली शासक राजराज महान् था जिसने 985 ई. से 1014 ई. तक राज्य किया। राजराज एक महान् विजेता और साम्राज्य निर्माता था। उसने वेगी के पूर्वी चालुक्य राजा, मदुरा के पाण्ड्य राजा और मालाबार तट के सामंतों को हराकर अपने अधीन किया। उसने लंका का उत्तरी भाग जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। उसने उनकी राजधानी अनुराधापुर को नष्ट कर दिया। लंका के जीते भाग का मामुंडीचोल पुरम नाम रखा। इसी विजय की खुशी में जगन्नाथ ने सिरुद धारण किया। उसने नाइ राजधानी पोलोन्नरुवा बनाई जिसका बाद में नाम जन्जत्मंग्लम रखा। उसने कलिंग को विजय किया। उसने एक शक्तिशाली जहाजी बेड़े का निर्माण किया और समुद्र-तट पर अपना अधिकार स्थापित किया। इस बेड़े द्वारा उसने लक्षद्वीप और मालद्वीप टापुओं पर अधिकार किया और पूर्वी द्वीपसमूह पर आक्रमण किया। उसने वेंगी को जीतकर अपने पक्ष के शक्ति वर्मा को वहां का शासक बनाया। ऐसा करने में उसका प्रयोजन यह था कि चोल वंश के विरुद्ध पश्चिमी तथा पूर्वी चालुक्य मिलकर एक न हो। को और घनिष्ठ बनाने के लिए उसने अपनी पुत्री का विवाह शक्ति वर्मा के छोटे भाई से कर दिया।

राजराज के राज्यकाल में चोल साम्राज्य समस्त सुदूर दक्षिण में फैल गया। इसके अतिरिक्त लक्षद्वीप, मालद्वीप और उत्तरी लंका का भाग उसके साम्राज्य में शामिल था। राजराज एक महान् विजेता ही नहीं था, बल्कि एक योग्य प्रशासक भी था। उसने अपने राज्य में स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन दिया। वह कलाप्रेमी था और विद्वानों का आश्रयदाता था। वह शिव का भक्त था और उसने भव्य शिव मन्दिरों का निर्माण कराया। उसने तंजौर में राजराजेश्वर शिव मन्दिर का निर्माण कराया। राजराज प्रथम शैव था जिसने शिवपाद शेखर की उपाधि ली। रविकुलमाणिक्यमुम्माडिचोलदेवचोलमार्तण्ड आदि अन्य उपाधियां थी। अपने शासन के दौरान उसने ऐतिहासिक प्रशस्ति के साथ चोल अभिलेखों का निर्माण करवाने की प्रथा शुरू की। उसने सुमात्रा के विजय साम्राज्य के सम्राट् भार विजयोतुंग वर्मन को नागपट्टम में चूड़ामणि बौद्ध विहार बनाने की आज्ञा दी।

राजेन्द्र प्रथम (1014-1044 ई.)

राजराज महान् के पश्चात् उसका पुत्र राजेन्द्र प्रथम राजा बना। राजराज ने अपने शासन-काल में ही उसे युवराज घोषित कर दिया था और उसने प्रशासन और सैनिक अभियानों का अच्छा अनुभव प्राप्त किया था। उसने 1044 ई. तक राज्य किया और अपने पिता से प्राप्त साम्राज्य को और भी अधिक सुदृढ़ एवं विस्तृत बनाया। राजराज ने उत्तरी लंका को जीतकर अपने राज्य में मिलाया था, परन्तु राजेन्द्र प्रथम ने सन् 1018 ई. में समस्त लंका को जीत कर अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसके राज्यकाल में लक्षद्वीप और मालद्वीप पर चोलों का अधिकार बना रहा। पश्चिमी चालुक्य राजा जयसिंह द्वितीय के साथ उसका संघर्ष हुआ, परन्तु राजेन्द्र प्रथम को कोई निर्णायक सफलता नहीं मिली और तुगभद्रा तट के प्रदेशों पर जयसिंह द्वितीय का अधिकार बना रहा। राजेन्द्र प्रथम ने एक विशाल सेना पूर्वी भारत की ओर भेजी जो उड़ीसा होते हुए बंगाल पहुंची और गंगा प्रदेश में अपनी विजय पताका फहराई। इस विजय की खुशी में उसने गगैकोंड चोलपुरम नामक नई राजधानी की स्थापना कर गंगैकोंडचोल की उपाधि ग्रहण की। उसकी अन्य उपाधियां थीं मुण्डिकोण्ड तथा पण्डित। सिंचाई हेतु चोलगंगम नामक झील बनवायी। उसने मुंडीकोंड चोल, उत्तम चोल एवं पंडित चोल की उपाधि ली। उसने पूर्वी द्वीपसमूह में भी सफल सैनिक अभियान भेजे।

राजेन्द्र प्रथम को अपने शासन-काल के अन्तिम चरण में आन्तरिक विद्रोहों का सामना करना पड़ा। लंका ने अपनी स्वतंत्रता के लिए विद्रोह कर दिया। पाण्ड्य और केरल राज्यों में भी विद्रोह हो गया परन्तु राजेन्द्र प्रथम के पुत्र राजाधिराज प्रथम ने इन विद्रोहों को कुचल दिया।

राजेन्द्र प्रथम के समय में चोल साम्राज्य का बहुत विस्तार हुआ। 1044 ई. में उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र राजाधिराज प्रथम शासक बना। उसने 1052 ई. तक राज्य किया। चालुक्य शासक सोमेश्वर को पराजित कर उसने विजय राजेन्द्र तथा वीराभिषेक की उपाधि ली। उसने अश्वमेध यज्ञ किया जो प्राचीन भारत में यज्ञ का अंतिम उदाहरण है। 1052 ई. में राजाधिराज तथा सोमेश्वर चालुक्य नरेश सोमेश्वर की सेनाओं से कोप्पम में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में राजाधिराज वीरगति को प्राप्त हुआ किन्तु उसके अनुज राजेन्द्र द्वितीय ने चालुक्यों के साथ युद्ध जारी रखा और अन्त में सोमेश्वर को परास्त करने में सफल हुआ। राजेन्द्र द्वितीय (1052-1063 ई.) का संघर्ष चालुक्यों से चलता रहा। सिंहल द्वीप के शासन से भी उसका संघर्ष हुआ। राजेन्द्र द्वितीय अपने साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा करने में सफल रहा। वीर राजेन्द्र प्रथम (1063-1070 ई.) राजेन्द्र द्वितीय का उत्तराधिकारी हुआ। उसने चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम को पराजित किया। चोलों और चालुक्यों का दूसरा संघर्ष कुण्डलशरगम नामक स्थान में हुआ। वीर राजेन्द्र ने इस विजय के उपलब्धि में तुंगभद्रा नदी के तट पर अपना विजय-स्तम्भ स्थापित किया। उसने चालुक्यों पर विजय के उपलक्ष्य में आइवभल्लकुलकाल की उपाधि धारण की। उसने भूमिदान द्वारा चालीस हजार विद्वानों तथा वेदशास्त्री ब्राह्मणों को सन्तुष्ट किया। उसके समय में बुद्ध भित्त ने वीर सोवियम नामक तमिल ग्रन्थ की रचना की। 1070 ई. में वीर राजेन्द्र की मृत्यु के उपरान्त अधिराजेन्द्र सिंहासन पर बैठा।

वीर राजेन्द्र की मृत्यु के उपरान्त अधिराजेन्द्र सिंहासन पर बैठा किन्तु उसकी विद्रोहियों ने हत्या कर दी। इस प्रकार उसकी हत्या से चोल नरेशों की प्रधार परम्परा का अन्त हो गया। उसकी मृत्यु के उपरान्त राजराज प्रथम का प्रपौत्र कुलोत्तुंग प्रथम (1070-1118 ई.) राज सिंहासन पर बैठा। उसने पाण्ड्य राज्य और केरल के नरेश को पराजित किया। उसने अपनी पुत्री का विवाह सिंहल युवराज से किया। इसके साथ ही उसने कन्नौज, कम्बोज, चीन तथा वर्मा से अपने कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित किए। उसने 1077 ई. में 72 व्यापारियों को चीन भेजा था। उसके शासन में चोल साम्राज्य की समृद्धि को नए आयाम मिले। उसने दो  बार भूमि की, पैमाइश कराई। उसने करों को हटाकर शुंगतविर्त्त (करों को हटाने वाला) की उपाधि धारण की। उसके समय में कांची की भी बडी उन्नति हुई। उसके समय में गंगकोड चोलपुरम् चोल राज्य की राजधानी थी।

कुलोत्तुंग प्रथम के उपरान्त क्रमशः विक्रम चोल कुलोत्तुंग द्वितीय, राजराज द्वितीय, राजाधिराज द्वितीय कुलोत्तुंग तृतीय, राजराज तृतीय तथा राजेन्द्र तृतीय सिंहासन पर बैठे। इनका राजत्वकाल लगभग सौ वर्षों तक रहा। परन्तु चोल साम्राज्य उत्तरोत्तर पतन के गर्त्त में गिरता गया। इसका मुख्य कारण आन्तरिक कलह तथा काकतीयों, होयसलों और पाण्ड्यों के आक्रमण थे। अन्त में 1258 ई. में पाण्ड्य शासक सुन्दर ने चोल नरेश राजेन्द्र तृतीय को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। इस प्रकार चोल राज्य के स्वतंत्र अस्तित्व का अन्त हो गया।

चोल साम्राज्य में साहित्य, कला एवं धर्म

साहित्य

तमिल साहित्य में कंबन ने रामायण, पुगालिंदी ने नलबेंबा, ज्ञानगोंदुर ने कल्लादानर की रचना की। जयागोंदान कुलोत्तुंग प्रथम के राजकवि थे। इनकी रचना कलिंगन्तुपणीं थी। सेक्कीललार कुलोत्तुंग प्रथम के दरबार में रहता था। उसने पेरीयापुराणम की रचना की। वेंकट माधव ने परांतक प्रथम के संरक्षण में ऋग्र्थदीपिका की रचना की। चोल शासक वीर राजेन्द्र को भी महान् तमिल विद्वान् बताया गया है।

धर्म

इस काल में बौद्ध धर्म का ह्रास होने लगा। पाल शासक बौद्ध धर्म के थे और उनके काल में बंगाल में इस धर्म का प्रभाव बना रहा। पाल राजाओं के पतन के बाद बौद्ध धर्म का भी पतन हो गया और बौद्ध धर्म अपने देश से ही समाप्त हो गया।

जैन धर्म की स्थिति, बौद्ध धर्म की अपेक्षा अच्छी थी। यद्यपि उत्तर भारत में इसकी लोकप्रियता कम हो गई परन्तु पश्चिम और दक्षिण भारत में यह लोकप्रिय बना रहा और इसे राजाश्रय प्राप्त हुआ। चालुक्य शासकों ने जैन धर्म को प्रोत्साहन दिया और आबू पर्वत पर मंदिरों का निर्माण कराया। नवीं और दसवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जैन धर्म का बड़ा प्रचार हुआ। कर्नाटक के गांग शासकों ने जैन धर्म को प्रोत्साहन दिया। जैन धर्म की एक विशेषता यह रही है की समय के अनुसार वन अपने को ढालता रहा है और ब्राह्मण धर्म के काफी निकट आ गया। यही कारण है की बौद्ध धर्म अपने देश में भी मृत हो गया, जबकि जैन धेम आज भी जीवित-जागृत धर्म है।

इस काल में हिन्दू धर्म की उन्नति हुई। शिव और विष्णु प्रमुख देवता बन गए। शिव और विष्णु के अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया। इसी काल में शक्तिपूजा का प्रचलन भी बढ़ा। शक्ति की चंडी, महाकाली, दुर्गा आदि विभिन्न रूपों में उपासना की गयी और इन मंदिरों का निर्माण किया गया। त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) गणेश और सूर्य मंदिरों का भी निर्माण किया गया। विभिन्न देवी-देवताओं का प्रचलन होते हुए भी धार्मिक क्षेत्र में सहिष्णुता की भावना बनी रही। अलवार और नयनार संतों ने भक्ति आंदोलन प्रारम्भ किया। विष्णु उपासक अलवार एवं शिव उपासक नयनार कहलाते थे।

शंकराचार्य ने हिन्दू दर्शन की पुनर्व्याख्या की और अद्वैतवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उन्होंने बौद्ध और जैन धर्म को चुनौती दी और अनेक बार शास्त्रार्थ किये। शांकराचार्य के वेदान्त का दर्शन जनसाधारण की समझ में न आ सका। ग्यारहवीं शताब्दी में रामानुज ने अद्वैतवाद के स्थान पर द्वैतवाद के सिद्धांत का प्रचार किया और दक्षिण भारत में भक्ति-आन्दोलन का सूत्रपात हुआ। यह आन्दोलन आगे चलकर उत्तरी भारत में बड़ा लोकप्रिय हुआ। बारहवीं शताब्दी में एक और आन्दोलन आरम्भ हुआ जिसे लिंगायत कहते हैं। लिंगायत संप्रदाय की स्थापना बासव ने की। इस संप्रदाय का वर्णन बासव पुराण में किया गया। लिंगायत शिव के उपासक थे और मुक्ति प्राप्त करने के लिए भक्ति को आवश्यक मानते थे। इन्होंने जातिप्रथा की आलोचना की और उपवास तथा बलिप्रथा को निरर्थक बताया।

शैव धर्म- माना जाता है कि कुल 63 नैयनार सन्त हुए। प्रथम नैयनार सन्त अप्पर थे। इनके बाद नानसंबंदर आये। ये तंजौर जिले के सिजली नामक स्थान पर पैदा हुए थे। ये कौन्डिन्य गोत्रीय ब्राह्मण थे। ये राजराज एवं राजेन्द्र चोल के समकालीन थे। तिरूमूलर एक महत्त्वपूर्ण सन्त थे। उन्होंने तेवारम और तिरूव्राचलर की रचना थी। सुन्दर मूर्ति एक महत्त्वपूर्ण सन्त थे। इनको शिव के प्रति वैसी ही भक्ति थी जैसे किसी घनिष्ठ मित्र के प्रति होती है। इसलिए उन्हें तम्बिरानतोलन (ईश्वर मित्र) की उपाधि दी गई। नबिअंडारनबि भी एक महत्त्वपूर्ण सन्त थे उन्होंने तिरुमुराई का संकलन किया। तिरुमुराई को पंचम वेद भी कहा जाता है और नबिअंडारनबि को तमिल व्यास कहा जाता है। अधिकतर चोल शासक कट्टर शैव थे। आदित्यचोल ने कावेरी नदी के दोनों किनारे शैव मंदिर स्थापित करवाये थे। राजाराम प्रथम ने वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था और शिवपाद शेखर की उपाधि ली थी। राजाराज प्रथम एवं राजेन्द्र प्रथम के समय इशानशिव और सर्वशिव जैसे शैव मंत्री नियुक्त हुए।

वैष्णव धर्म- इस आन्दोलन के भावनात्मक पक्ष का प्रतिनिधित्व 12 अल्वार संतों ने किया। अल्वार का अर्थ होता है ईश्वर के गुणों में डूबाने वाला।

महत्त्वपूर्ण सन्त- प्रारम्भिक अल्वार संत पोयगई था। दूसरे तिरूमलिशई, तीसरे तिरूमंगई एवं चौथे पेरिपालवार हुए। केरल के शासक कुलशेखर भी अलवार थे। अलवारों में एक मात्र महिला अंदाल थी। आचायों ने अलवारों की व्यक्तिगत भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया। भक्ति का समन्वय कर्म एवं ज्ञान से हो गया।

सबसे पहला आचार्य नाथमुनी थे जिन्होंने न्याय तत्व की रचना की। परम्परा के अनुसार, वे श्रीरंग मंदिर में भगवान की मूर्ति में प्रवेश कर गए। यमुनाचार्य ने आगमों की महत्ता को प्रतिष्ठित किया और उन्हें वेदों का समकक्ष माना।

रामानुज- ये यमुनाचार्य के शिष्य थे। इनका जन्म कांची के पास पेरम्बदुर में हुआ। उन्होंने श्री भाष्य नामक ग्रन्थ की रचना की और विशिष्टताद्वैत का दर्शन दिया। रामानुज पूर्व मीमांसा एवं उत्तर मीमांसा में कोई अन्तर नहीं समझते थे। उनके विचार में उत्तर मीमांसा के अध्ययन से पहले पूर्व मीमांसा का अध्ययन आवश्यक है। वे सामान्य एवं विशेष भक्ति में अन्तर स्थापित करते हैं और ऐसा कहते हैं कि सामान्य भक्ति ईश्वर का निरन्तर ध्यान है एवं विशेष भक्ति ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान है। माना जाता है कि चोल शासकों से उनका मतभेद हो गया (कुलोत्तुंग प्रथम एवं कुलोत्तुंग द्वितीय), इन्हें कुलोत्तुंग प्रथम के विरोध का सामना करना पड़ा, उन्हें श्रीरंगम् छोड़ना पड़ा। माना जाता है जब कुलोत्तुंग द्वितीय ने गोविन्दराज की मूर्ति को फिकवा दिया था तो रामानुज ने उसे तिरुपति के मंदिर में स्थापित किया। रामानुज ने भक्ति संप्रदाय एवं हिन्दू धर्म के बीच सेतु का कार्य किया। यद्यपि रामानुज उच्चवर्ग के लिए विशेषाधिकार चाहते थे किन्तु वे शूद्रों को मंदिर प्रवेश से वर्जित नहीं करते थे।

निम्बाकाचार्य- रामानुज के समकालीन थे, उनका जन्म बेलारी जिला के निम्बापुर गाँव में हुआ था। वे तेलुगु ब्राह्मण थे किन्तु उनका अधिकांश समय वृन्दावन में बीता।

माधवाचार्य- इनका जन्म दक्षिणी कन्नड़ जिले के उदिची तालुक में हुआ था। इन्हें वायु का अवतार माना गया है। तेरहवीं एवं चौदहवीं सदी में रामानुज के अनुयायियों में फूट पड़ गई। उत्तरी शाखा बडगलई एवं दक्षिणी शाखा तेंगलई कहलायी। वडगलई-तमिल भाषा का प्रयोग करते थे जबकि तेंगलई-संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे। वैष्णव एवं शैव मतों का व्यापक प्रचार हुआ। इसमें अलवारों एवं नयनारों की प्रबल भूमिका थी। अधिकतर चोल कट्टर शैव थे। चोल नरेश आदित्य प्रथम ने कावेरी के किनारे शिव मंदिर का निर्माण कराया। शैव संत नंबी अंदाल नंबी ने शैवमंत्रों को धार्मिक ग्रंथों में शामिल किया। ये राजराज प्रथम एवं राजेन्द्र के समकालीन थे। परांतक प्रथम ने दभ्रसभा का निर्माण किया। वैष्णव मत के प्रमुख आचार्य काफी समय तक श्रीरंग मंदिर में रहे, उन्होंने विशिष्टाद्वैत मत का प्रचार किया। कुलोत्तुंग द्वितीय चिदम्बरम मंदिर से गोविन्दराज विष्णु की मूर्ति को समुद्र में फिंकवा दिया। इसे रामानुज ने पुन: उठाकर इसे तिरुपति के विशाल वैष्णव मंदिर में स्थापित कराया। रामानुजाचार्य ने भक्तिसंप्रदाय एवं हिन्दू धर्म के मध्य सेतु का काम किया। 13वीं सदी में कन्नड़ में धर्मोपदेश देने वाले माधव ने भी धर्म के साथ भक्ति का संतुलन बैठने की कोशिश की। माधव के अनुसार, विष्णु अपने भक्तों पर अनुग्रह अपने पुत्र वायु देवता द्वारा करते हैं। रामानुजाचार्य उच्च वेर्न हेतु विशेष सुविधा स्वीकार करते हुए भी इस बात के विरुद्ध थे की शूद्रों को मंदिर में प्रवेश से वंचित किया जाए। धवलेश्वरम से चोलों के स्वर्ण सिक्के के ढेर मिलें हैं।

चोल कला

चोल कला की विशेषताएं मंडप, विमान, गोपुरम थी। चोल कला द्रविड़ शैली पर आधारित थी। चोल स्थापत्य की प्रशंसा करते हुए फर्ग्युसन ने कहा है की चोल्कलिन कारीगर राक्षस की तरह सोचते थे एवं जौहरी की तरह तराशते थे। प्रारंभिक मंदिरों में तिरुकट्टालाई का सुन्दरेश्वर मंदिर था। रतमलाई में विजयालय चोलेश्वर मंदिर भी स्थापत्य का सुन्दर उदाहरण है। राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर/वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया। पर्सी ब्राउन ने इस वृहदेश्वर मंदिर के विमान को भारतीय वास्तुकला का निकष माना है जबकि गंगैकोंडचोलपुरम के वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण राजेन्द्र प्रथम द्वारा कराया गया। पर्सी ब्राउन ने इस मंदिर को गीतों की तरह संवेदना उत्पन्न करने वाला महान् कलात्मक निर्माण कहा है। अन्य मंदिरों में तंजौर स्थित दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर है। चोलकाल में मूर्तिकला का भी विकास हुआ। तंजौर स्थित नटराज शिव की कांस्य मूर्ति इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। पार्वती स्कंद में कार्तिकेय एवं गणेश आदि देवताओं की कांस्य मूर्तियाँ भी निर्मित की गई। भित्ति चित्रकला में वृहदेश्वर मंदिर के दीवारों पर अजंता की चित्रकला का प्रभाव दिखाई देता है।

इस प्रकार नवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच का यह काल आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से बड़ा महत्त्वपूर्ण है। इस समय देश में सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में महान् परिवर्तन हुए। अनेक मन्दिरों के निर्माण से कला को प्रोत्साहन मिला।

चोल साम्राज्य में समाज

प्राचीन काल में हिन्दू समाज चार वर्गों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित था। इस काल में समाज में अनेक जातियां और उपजातियां हो गयीं। अनेक जातियां पेशों के आधार पर बन गयीं, जैसे लोहे का काम करने वाला लुहार, सोने का काम करने वाला स्वर्णकार, लकड़ी का काम करने वाला बढ़ई और चमड़े का काम करने वाला चर्मकार कहलाया। अनुलोम और प्रतिलोम विवाह के कारण भी मिश्रित जातियां बनीं। अनुलोम विवाह वह विवाह था जिसमे पिता की जाति ऊंची और माता की जाति नीची हो। जब ऊंची जाति की कन्या अपने से नीची जाति के लड़के से विवाह करती थी तो उसे प्रतिलोम विवाह कहते थे।

समाज में ब्राह्मण का ऊँचा स्थान था। दक्षिण भारत में बल्लालो का भी भी स्थान ऊपर था। ब्राह्मण भी अनेक समूह में विभाजित हो गये, जैसे सारस्वत, सरयूपारी, पाठक, शुक्ल, अग्निहोत्री, द्विवेदी, चतुर्वेदी इत्यादि। ब्राह्मणों का मुख्य कार्य पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान कराना और मन्दिरों में पुरोहित का कार्य करना था। ब्राह्मणों के बाद क्षत्रियों का स्थान था जिन्हें राजपूत कहा जाता था। इनका कार्य देश की रक्षा करना, प्रशासन चलाना और युद्ध करना आदि था। वैश्यों का कार्य व्यापार, दुकानदारी और खेती-बाड़ी करना था। इन तीनों वर्गों को द्विज के नाम से जाना जाता था। शूद्रों का क्षेत्र सेवा-कार्य करना था। समाज में इनकी दशा शोचनीय थी। एक नई जाति का उदय हुआ जिसे कायस्थ कहते थे। नवीं शताब्दी के आरम्भ में कायस्थ कर्मचारी के लिये प्रयुक्त होता था। परन्तु बारहवीं शताब्दी में कायस्थ एक जाति के रूप में माने जाने लगे। जाति का विभाजन बलंगै (दायीं भुजा वाले) और इलंगै (बायीं भुजा वाले) में भी होता था। इन दोनों में क्रमश: 98-98 जातियाँ थीं। इन वर्गों में वलंगै के पास विशेषाधिकार थे। इन दोनों के बीच कभी-कभी संघर्ष भी छिड़ जाते थे। ऐसा ही एक संघर्ष कुलोत्तुंग के समय हुआ था। ब्राह्मण और बल्लाल जो समाज में सबसे महत्त्वपूर्ण थे, वलंगै जातियों का समर्थन करते थे क्योंकि ये जातियां किसी न किसी रूप में कृषि उत्पादन से संबंधित थीं। इलंगै जातियों में कम्माल जाति अपनी आर्थिक उपयोगिता के कारण सबसे महत्त्वपूर्ण थी। चोल सम्राटों ने उनकी आर्थिक उपयोगिता देखते हुए उन्हें यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार दिया। इलंगै जातियों को अधिक कर देना पड़ता था। इस तरह हम देखते हैं कि समकालीन दक्षिण भारत में सामाजिक जीवन का आधार आर्थिक था।

हिन्दू समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक संस्कारों का प्रचलन था। इनमें विवाह संस्कार प्रमुख था। आम तौर पर सजातीय विवाह होते थे, परन्तु अन्तर्जातीय विवाह का भी प्रचलन था। एक गोत्र के लोगों में विवाह अमान्य था। आमतौर पर पुरुष एक पत्नी रखते थे, परन्तु राजाओं और सामन्तों में बहु-विवाह का प्रचलन था। लोग शाकाहारी थे, परन्तु राजपूतों में मांस-मदिरा का सेवन होता था। मुसलमानों के सम्पर्क का सामाजिक रीति-रिवाजों और भोजन पर भी प्रभाव पड़ा। आरम्भ में दोनों के सम्बन्ध कटु रहे। मन्दिरों के विनाश और बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन ने एक नयी उथल-पुथल पैदा कर दी। समाज में प्रायश्चित के विधान द्वारा हिन्दू से मुसलमान बने हुए व्यक्तियों को पुन: हिन्दू धर्म में दीक्षित करने के अनेक प्रयास हुए। परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी में पुरोहितों ने शुद्धि को प्रोत्साहन देना बन्द कर दिया और इस कारण हिन्दुओं का इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद पुनः हिन्दू धर्म में लौटना कठिन हो गया।

जीवन-स्तर- राजा, उसके मन्त्री और सामंत शान-शौकत का जीवन बिताते थे। वे विशाल भवनों में रहते थे, बढ़िया वस्त्र धारण करते थे और बहुमूल्य आभूषणों को धारण करते थे। इनके परिवार में अनेक स्त्रियां होती थीं। राज-परिवार और सामन्तों के घरों में बड़ी संख्या में नौकर-चाकर होते थे। व्यापारी वर्ग समृद्ध था।

व्यापारी रहन-सहन में सामन्तों की नकल करते थे। नगरों में रहने वाले लोग भी आमतौर पर खुशहाल थे। परन्तु समाज में निर्धन वर्ग भी था। कृषक जनता की आर्थिक स्थिति साधारण थी। यद्यपि भूमिकर कम था, परन्तु किसान को अन्य कर भी देने पड़ते थे। दुर्भिक्ष भी समय-समय पर पड़ते थे और ऐसे समय अन्य स्थानों से सहायता न पहुँचने पर निर्धन लोगों को भूखों मरना पड़ता था। इस प्रकार धनी और निर्धन व्यक्ति के जीवन-स्तर में महान् अन्तर था।

स्त्रियों की दशा- इस काल में स्त्रियों के सामाजिक स्तर में गिरावट आयी। नारी की स्वतंत्रता पर अनेक अंकुश लग गये। बचपन में उसे पिता पर और युवावस्था में पति पर निर्भर रहना होता था। कन्या को अपना जीवन-साथी चुनने की स्वतंत्रता थी। स्वयंवर का प्रचलन था। इस काल में कन्या के विवाह की आयु कम कर दी गयी और यह कहा गया कि युवावस्था से पूर्व कन्या का विवाह कर देना चाहिए। बारहवीं शताब्दी में तुर्कों द्वारा स्त्रियों के अपहरण को रोकने के लिए कन्या के विवाह की आयु और कम कर दी गई। समाज में पर्दे की प्रथा का प्रचलन नहीं था, परन्तु कालान्तर में मुस्लिम सम्पर्क के कारण पर्दे की प्रथा का प्रचलन हो गया जिससे नारी जाति की उन्नति अवरुद्ध हो गयी।

समाज में सती प्रथा का प्रचलन था। पति की मृत्यु के बाद पत्नी उसकी चिता पर जलकर भस्म हो जाती थी। अरब लेखक सुलेमान के अनुसार, राजा की मृत्यु पर उसकी रानियाँ भी उसकी चिता के साथ सती हो जाती थीं। राजपूतों में जौहर की प्रथा प्रचलित थी। जब राजपूत विजय की आशा नहीं देखते थे, तब केसरिया वस्त्र धारण कर शत्रु पर टूट पड़ते थे और स्त्रियाँ अपने सतीत्व की रक्षा के लिये सामूहिक रूप से जल जाती थीं। इस प्रथा को जौहर कहते थे।

शिक्षा

बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा मन्दिरों में बनी पाठशालाओं में या गुरु के घर पर दी जाती थी। संस्कृत के स्थान पर बोलचाल की भाषा हिन्दी का प्रचलन हो गया था। बच्चों को अक्षरज्ञान के साथ गणित भी सिखाया जाता था। उच्च शिक्षा के लिये बड़े-बड़े नगरों में महाविद्यालय खोले गये, जहाँ पर विद्यार्थी दूर-दूर से पढ़ने आते थे। नालन्दा विश्वविद्यालय अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का विश्वविद्यालय था जहाँ चीन, तिब्बत तथा दक्षिण-पूर्वी द्वीपसमूह से बड़ी संख्या में विद्यार्थी आते थे। विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के भोजन और वस्त्र की व्यवस्था राज्य की ओर से होती थी।

आयुर्वेदविज्ञान की शिक्षा भी दी जाती थी। आयुर्वेद में शल्य-चिकित्सा (सर्जरी) की भी शिक्षा दी जाती थी। मनुष्य-चिकित्सा के अतिरिक्त पशु-चिकित्सा की शिक्षा भी दी जाती थी। राजकुमारों और सामंत-पुत्रों को सैनिक शिक्षा दी जाती थी।

इस काल में स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में गिरावट आयी। लड़की के विवाह की आयु कम कर दिये जाने के कारण उसे शिक्षा मिलना कठिन हो गया। राजघरानों और धनी परिवारों की लड़कियों को घरों पर ही शिक्षा दी जाने लगी। शिक्षा की कमी के कारण नारी का सम्मान भी कम हो गया।

इस काल में विद्वानों का दृष्टिकोण अधिक संकीर्ण हो गया। उन्होंने विदेशों से वैज्ञानिक विचारों को ग्रहण करने का कोई प्रयत्न नहीं किया। नये विचारों को ग्रहण करने के स्थान पर वे अपने प्राचीन विचार पर ही निर्भर थे। प्रसिद्ध विद्वान् अलबेरूनी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि हिन्दू यह समझते हैं कि उनके अलावा किसी को विज्ञान का ज्ञान नहीं है और न उनके समान विदेशों में कोई विद्वान् है। इसी कारण उसने ब्राह्मण को घमण्डी, दम्भी और संकीर्ण प्रवृति का बतलाया है। इस प्रवृति से समाज को हानि हुई। इस समय दक्षिण भारत में ये विश्वविद्यालय प्रसिद्ध थे – इन्नाइरम, त्रिभुवनी, तिरूवादुतुराई और तिरूवरियूरा।

चूंकि शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा तमिल न होकर संस्कृत थी इसलिए महाविद्यालय में अध्ययन करने वाले अधिकांश विद्यार्थियों का दैनिक जीवन से संपर्क टूट जाता था।

चोल साम्राज्य में कृषि, वाणिज्य और व्यापार

भारत आरम्भ से कृषि-प्रधान देश रहा है। देश की अधिकतर जनता ग्रामों में रहती है जिसका प्रमुख उद्यम खेती है। इस काल में भी अर्थ-व्यवस्था का मूलाधार कृषि ही थी। खेती करने का ढंग पुराना था। कृषि में हल-बैल का प्रयोग किया जाता था। नहरों, तालाबों और कुओं से सिंचाई होती थी। किसान कई प्रकार के अन्न की फसलें, जैसे गेहूँ, जौ, चना, चावल, मोटा अनाज और उसके साथ गन्ना, फल एवं सब्जियां भी उगाया करते थे। वर्षा न होने की स्थिति में अकाल पड़ते रहते थे और अकाल के समय जनता को कष्ट उठाना पड़ता था।

भूमि काश्तकारी दो प्रकार की होती थी। भूमि या तो पंचायती राज के अधिकार के अंतर्गत होती थी अथवा भूमिधरों किसान के निजी अधिकार में। ये भूमिधर अपना भुगतान राजा को देते थे। सेवावधि की भी पद्धति थी। जहां कुछ सेवा के बदले आंशिक या पूर्ण राशि माफ कर दी जाती थी। परन्तु साधारणतया ऐसा वहीं होता था जहां भूमि राजस्व की राशि कम होती थी, जैसे देवता के स्नान के लिए जल लाने पर मंदिर के देय से वह व्यक्ति मुक्त हो जाता था। अधिकार पत्रों द्वारा व्यापारी वाणिज्य पर नगरों की स्थापना करते थे तथा अपने भाई के सिपाहियों द्वारा उसकी रक्षा कर सकते थे। विनिमय के रूप में वे चिट्टिरामेलि पेरिपान्डु से कृषि उत्पादों को प्राप्त करतेथे। चिट्टिरामेलि पेरिपान्डु किसानों का एक संगठन था। इसकी उत्पत्ति तमिल क्षेत्र में हुई थी। आगे की शताब्दियों में इस सेवावधि का उपयोग सैनिक सेवा लिए भी खूब होने लगा। इस काल के प्रारंभ में गांव आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर थे। 11वीं सदी से जब चोल काल में व्यापार का विकास हुआ तो नगरों का भी विकास हुआ एवं गांव की स्थिति भी बदली। ग्राम अर्थ-व्यवस्था की पूर्ण इकाई था। किसान के अतिरिक्त गांव में कुम्हार, लुहार, बढ़ई, नाई, धोबी आदि भी होते थे। कुम्हार को कुंभकार कहते थे। गांवों के आर्थिक जीवन में इनका बड़ा महत्त्व था। सामाजिक और धार्मिक जीवन में पुरोहित और नाई का महत्वपूर्ण स्थान था।

वाणिज्य और व्यापार

विदेशी व्यापार- इस काल में व्यापार के क्षेत्र में भी प्रगति हुई। भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। विदेशी व्यापार स्थल और जल मार्गों द्वारा होता था। विदेशी व्यापार चीन, पूर्वी द्वीप समूह, पश्चिम द्वीप समूह, पश्चिम एशिया, यूरोप और अफ्रीका से होता था। स्थल मार्ग से व्यापारी कश्मीर होते हुए लद्दाख के रास्ते मध्य एशिया और चीन को जाते थे। मध्य एशिया में काशगर, यारकंद और खेतान मुख्य व्यापारिक केन्द्र थे, जहां भारतीय व्यापारी पहुंचते थे। चीन जाने के लिए दूसरा स्थल मार्ग आसाम होते हुए दक्षिण चीन को जाता था। स्थल मार्ग द्वारा ही अफगानिस्तान होते हुए पश्चिम एशिया के देशों को माल जाता था।

समुद्री मार्ग द्वारा भी बड़ी मात्रा में विदेशी व्यापार होता था। पश्चिमी भारत से समुद्रतटीय बन्दरगाहों से माल ईरान की खाड़ी होते हुए अरब के बन्दरगाहों और मिस्र को पहुँचता था। वहां से यह माल अफ्रीका और यूरोप तक जाता था। गुजरात में खम्भात (कैम्बे), महाराष्ट्र में थाना और सोपारा, मालाबार तट पर कालीकट और सिंध में देवल प्रसिद्ध बंदरगाह था। इसी प्रकार बंगाल में ताम्रलिप्ति के बन्दरगाह से माल बंगाल की खाड़ी होते हुए पूर्वी द्वीपसमूह के देशों और चीन को पहुँचता था। विदेश व्यापार चोल वणिकों की शक्ति थी। पूर्वीतट पर महाबलिपुरम् कावेरी पट्टनम् शालियुर, कोर्कई महत्त्वपूर्ण बंदरगाह थे तथा मालाबार तट पर क्विलोन में बडे प्रतिष्ठान थे। एक व्यापारिक संघ ऐण्णडूडवार था। इसे आयावोलेपुर (एहोल) के 500 स्वामियों के नाम से भी जाना जाता था। चोल देश में अनेक बस्तियों में वीरपट्टन होते थे। यहाँ पर ये व्यापारी स्थानीय सत्ता और केन्द्रीय सरकार की मंजूरी से व्यापार के मामले में विशेषाधिकार का प्रयोग करते थे। नानादेश-तिसैयायरितु अयन्नुवर नामक एक विशाल व्यापारिक श्रेणी का उल्लेख मिलता है जिसका व्यापार बर्मा, सुमात्रा आदि देशों से होता था। एक अन्य व्यापारिक श्रेणी अंजुवण था। लगभग 1200 ईं तक के मैसूर अभिलेख में 18 देशों में व्यापार करने वाले देशसल्लातुगुंडा नामक एक व्यापारिक संगठन का उल्लेख मिलता है। पश्चिम से व्यापार करने वालों के लिए फारस तथा अरब गंतव्य स्थान था। फारस की खाडी में स्थित सिराफ महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था। इस काल में चीन के साथ व्यापार में वृद्धि हुई। चीन में फारमोसा के सामने मुख्यभूमि में एक भारतीय बस्ती थी। द. भारत कपड़ा, मसाले, औषधियां, जवाहरात, हाथी दांत, सींग, आबनूस की लकडी तथा कपूर चीन को निर्यात करता था। इसी प्रकार की वस्तुएं पश्चिम में भी भेजी जाती थीं। माकोंपोलो अरबों द्वारा घोड़े के व्यापार से अर्जित होने वाली भारी धनराशि तथा द. भारत के उन व्यापारियों पर टिप्पणी करता है जिन्होंने अरबों के साथ मिलकर घोड़ों के व्यापार पर एकाधिकार जमा रखा था।

निर्यात की प्रमुख वस्तुएं कपड़ा, नील, विभिन्न प्रकार के मसाले ( दालचीनी, जायफल, काली मिर्च, लौंग और इलायची इत्यादि), कपूर, चन्दन, केसर, हाथीदाँत थी। भारत में जिन वस्तुओं का आयात होता था, उनमें प्रमुख थीं- अरबी घोड़े, मूंगा, शराब, खजूर और सिल्क। अरबों की बढ़ती हुई समुद्री शक्ति, समुद्र पर उनके एकाधिकार की चेष्टा और समुद्री डकैती के कारण भारतीय व्यापारियों के विदेशी व्यापार पर नियन्त्रण में इस काल में कमी आयी।

आतंरिक व्यापार- सड़कों और नदियों द्वारा देश के एक भाग से दूसरे भाग में माल जाता था। प्रमुख राष्ट्रीय मार्ग देश के विभिन्न भागों को एक दूसरे से जोड़ते थे। नदियों द्वारा नावों में भी माल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाया जाता था।  गंगा नदी इस प्रकार की प्रमुख नदी में से थी। सडकों द्वारा माल बैलगाड़ियों, ऊँटो, बैलों और गधों पर ढोकर ले जाया जाता था। सुरक्षा की दृष्टि से व्यापारी काफिलों में यात्रा करते थे। काफिलों में चलने वाले व्यापारियों को सार्थवाह कहते थे। इनका एक मुखिया होता था जिसका काफीके पर नियन्त्रण होता था। कभी-कभी डाकू काफिलों को लूट लेते थे। डाकुओं से रक्षा के लिए काफिलों के साथ सशस्त्र रक्षक चलते थे। द. भारत में दो प्रकार के सिक्के चलते थे, उद्यान एवं मद्यान। सबसे भारी सोने का सिक्का मद्यान या कल्याणजु था। चोल काल में मानक स्वर्ण सिक्का कलंजु या कल्याणजु था। कलंजु 20 मणजारी के बराबर होता था। काशु भी एक स्वर्ण सिक्का था जो कलजु के आधे के बराबर होता था किन्तु निचले स्तर पर छोटी लेन-देन में वस्तु विनिमय प्रणाली भी प्रचलित थी। विशेषत: ग्रामीण क्षेत्रों में तथा आर्थिक जीवन के केन्द्र मंदिर होते थे। मंदिर के अधिकारियों के लिए नियमित आय का होना आवश्यक था। अत: मंदिर विविध व्यापारिक पूंजी लगाते थे। मंदिर सूद पर रुपये भी उधार देते थे। ब्याज की दर 12 प्रतिशत वार्षिक थी। गोदामों तथा विक्रयकेन्द्रों को एरिविरप्पातन कहा जाता था। विनिमय के रूप में व्यापारी चिट्टिरामेलि पेरिपान्डु से कृषि उत्पादों को प्राप्त करते थे। चिट्टिरामेलि किसानों का एक संगठन था। इसकी उत्पत्ति तमिल क्षेत्र में हुई। वणिक श्रेणियों में मणिग्रामम् तथा वलंजियार महत्त्वपूर्ण थी। नानदेशी भी एक महत्त्वपूर्ण श्रेणी थी।

इस काल में नगरों की संख्या में भी वृद्धि हुई। नगर के लोग विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए थे। व्यवसाय संघों या गिल्डों के रूप में संगठित थे जिन्हें श्रेणियां कहा जाता था। इन श्रेणियों के अपने मुखिया होते थे जो श्रेणी के कार्यों का संचालन करते थे। नगर के प्रशासन में भी यह अपनी श्रेणी के प्रतिनिधि के रूप में भाग लेते थे। कारीगरों, दुकानदारों, गाड़ीवानों और की अलग-अलग श्रेणियां थीं। महाजन ब्याज पर रुपया उधार देते थे और ब्याज की दर 9 से 12 प्रतिशत थी। क्रय-विक्रय में सिक्कों का प्रयोग होता था। सोना चांदी और तांबे के सिक्के बनते थे, परन्तु सोने की अपेक्षा चांदी के का अधिक प्रचलन था। विनिमय में कौड़ियों का भी प्रयेाग होता था विदित होता है कि वस्तुएं सस्ती थीं। बंगाल में कौड़ियों का खूब प्रचलन था।

चोल साम्राज्य में सांस्कृतिक जीवन

समाज में जातिप्रथा प्रचलित थी। ब्राह्मणों का समाज में आदर था और वे सादा जीवन बिताते थे। ब्राह्मणों की अलग बस्ती थी। अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के कारण कुछ मिश्रित जातियां बन गई थीं।

समाज में नारी का उच्च स्थान था। राजपरिवारों एवं सामन्तों की अनेक पत्नियां होती थीं, परन्तु साधारण लोग एक पत्नीव्रत होते थे। सतीप्रथा प्रचलित थी। मन्दिरों में देवदासियां होती थीं और वे नृत्य द्वारा देवता को प्रसन्न करती थीं। शैव और वैष्णव मतों का अधिक प्रचार था। चोल राजा शैव मत के अनुयायी थे। धार्मिक जीवन में मन्दिरों का विशेष स्थान था। इसके अतिरिक्त मन्दिर, बैंक, विद्यालय और औषधालय का कार्य भी करते थे। मन्दिरों के निर्माण द्वारा अनेक लोगों की जीविका चलती थी। मन्दिर सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्र थे-जैसे नाटक, कथा, नृत्य इत्यादि।

इस काल में कला को बडा प्रोत्साहन मिला। चोल राजाओं ने अनेक मन्दिरों और जलाशयों का निर्माण कराया। राजराज महान् ने तंजोर में राजराजेश्वर मन्दिर का निर्माण कराया। इस मन्दिर का निर्माण 1003 ई. में शुरू होकर 1010 ई. में पूर्ण हुआ। राजेन्द्र चोल ने 1025 ई. में अपनी राजधानी गंगई कोण्ड-चोलपुरम् में एक विशाल मन्दिर बनवाया। यहीं पर राजेन्द्र चोल ने एक विशाल झील खुदवाई और इस झील पर जो बाँध बंधवाया, उसकी लम्बाई 16 मील थी। इस काल में अनेक सुन्दर कांस्य-प्रतिमाओं का निर्माण किया गया। नटराज की विशाल और भव्य मूर्तियों का निर्माण कलाकारों ने किया।

इस काल में साहित्य के क्षेत्र में भी प्रगति हुई। यह काल तमिल संस्कृति का स्वर्णयुग कहलाता है। प्रसिद्ध विद्वान् निरूत्कदंवर ने तमिल महाकाव्य जीवक चिन्तामणि की रचना इसी समय हुई। जैन लेखक तोलामुक्ति ने शूलमणि नामक ग्रन्थ लिखा। कुलोत्तुंग तृतीय के काल में कम्बन ने रामावतारम् नामक काव्य की रचना की जिसकी कथावस्तु वाल्मीकि रामायण से ली गई है। बौद्ध विद्वान् बुद्धमित्र ने ग्यारहवीं शताब्दी में सोलियम नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की। इसी प्रकार जैन विद्वान् पवनान्दि ने नन्तमूले नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की। सेक्लिर कृत पेरियापुराणम् भी इसी काल की रचना है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि यह काल सांस्कृतिक उपलब्धियों की दृष्टि से एक सृजनशील युग था जिसमें स्थापत्य कला और मूर्तिकला का विकास हुआ। साहित्य की प्रगति के कारण यह युग तमिल साहित्य का स्वर्णयुग कहलाया। चोलों ने सुदूर दक्षिण के एक बड़े भाग को जीतकर राजनैतिक एकीकरण एवं कुशल प्रशासन प्रदान किया जिसकी प्रमुख विशेषता स्थानीय स्वशासन थी।

चोल साम्राज्य में प्रशासन

चोल शासकों ने भारी भरकम उपाधि लेनी शुरू की जैसे- चक्रवर्तीगल। चोल वंश में मृत राजाओं की प्रतिमाएं पूजी जाती थीं। इससे इस बात का संकेत मिलता है कि चोल शासक राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त में विश्वास थे। चोलों से पूर्व भारतीय इतिहास में कुषाण राजाओं के बीच यह प्रचलित थी। चोल शासकों का राज्याभिषेक निम्नलिखित स्थानों पर होता था- तंजौर, गंगइकोंडचोलपुरम्, चिदम्बरम् और कांचीपुरम्, जबकि चालुक्य शासकों का राज्याभिषेक पत्तादकल में होता था। इस अवधि में पुरोहित का कार्य एवं पद महत्त्वपूर्ण हो गया। पुरोहित न केवल राजगुरु वरन् समस्त धार्मिक एवं आध्यात्मिक बातों में परामर्श देने के अतिरिक्त राजा का विश्वासपात्र एवं पापमोचक था।

चोल प्रशासन- चोल प्रशासन व्यवस्था एक जटिल नौकरशाही पर आधारित थी। राजा प्रशासन का प्रमुख था। चोल राजाओं के अनेक अभिलेख उस समय की प्रशासन-व्यवस्था पर भी प्रकाश डालते हैं। चोल साम्राज्य के विस्तार के साथ राजा की शक्ति और सम्मान में भी वृद्धि हो गई थी। राजा को असीमित शक्तियां प्राप्त थीं, फिर भी राजा प्रशासन में विभागों के प्रमुख से परामर्श लिया करता था। कुछ चोल राजाओं की मूर्तियां भी मन्दिर में स्थापित की गई और कुछ विशेष मन्दिरों का नाम राजा के नाम पर पड़ा, जैसे तंजौर का राजराजेश्वर मन्दिर।

चोल साम्राज्य में उत्तराधिकार का नियम निश्चित था। राजा अपने जीवन-काल में ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देता था जिसे युवराज कहते थे। युवराज को प्रशासन का अनुभव कराया जाता था और शासन-कार्य में वह अपने पिता की सहायता करता था। चोल प्रशासन में हम मन्त्रिमण्डल का उल्लेख नहीं पाते। अभिलेखों से पता चलता है कि सिविल सर्विस का संगठन सुव्यवस्थित था और विभागाध्यक्ष अपने विभाग का कार्य नहीं देखता था। अधिकारियों का उच्च वर्ग पेरुन्द्नम एवं निम्न वर्ग सेरुन्द्नम कहलाता था। अधिकारियों को भू राजस्व में दिया जाने वाला वेतन जीविका कहलाता था। एक विशेष अधिकारी ओलइकुट्टम राजा द्वारा जारी आदेशों को क्रियान्वयन होता देखता था। किसी विशेष क्षेत्र की सुरक्षा के लिए शक्तिशाली अधिकारियों को सुरक्षाकर पाडिकावलकूली देना पड़ता था।

आय के साधन- राजा की आय का प्रमुख साधन भूमि-कर था। भूमि-कर को एकत्र करने का कार्य ग्रामसभाएं करती थीं। किसानों को इस बात की सुविधा थी कि वे भूमिकर चाहे नकद दे अथवा अनाज के रूप में। भूमिकर उपज का 1/3 भाग था। विशेष स्थिति, जैसे अकाल पड़ने पर भूमिकर माफ कर दिया जाता था।

राजा की आय के अन्य स्रोत थे- व्यवसाय कर, आयत कर, चुंगी कर, वनों और कारखानों से आय इत्यादि। व्य्व्व की प्रमुख मदें थीं- राजा, राजपरिवार और उसका दरबार, नागरिक प्रशासन, सेना, मंदिर और सार्वजानिक निर्माण तथा धार्मिक अनुदान इत्यादि। भू-राजस्व को कदमईकहा जाता था। राजस्व कर-आयम, सुपारी कर-कडमई, व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर कर-कढ़ैइरै, द्वारकर-वाशल्पिरम्, आजीवकों पर कर-आजीवक्काशु, नर-पशुधन कर-किडाक्काशु, वृक्षकर-मरमज्जाडि, गृहकर-मनैइरै, ग्राम सुरक्षा कर-पडिकावल, व्यवसाय कर-मगनमै, तेलघानी कर-पेविर।

सैनिक प्रशासन- चोल राजाओं ने एक विशाल सेना का संगठन किया। सेना के प्रमुख अंग थे- पैदल, घुड़सवार, हाथी और नौसेना। सेना में अनुशासन पर बड़ा जोर दिया जाता था। सेना को नियमित रूप से ट्रेनिंग दी जाती थी और विशेष सैनिक शिविर (कडगम) भी लगाये जाते थे। अश्व सेना के लिये बहुमूल्य अरबी घोड़ों को खरीदा जाता था। इनमें अधिकांश घोडे दक्षिण भारत की जलवायु के कारण मर जाते थे और इस प्रकार राज्य का बहुमूल्य धन विदेशों को चला जाता था।

चोल सेना की एक विशेषता जहाजी बेडे का संगठन था। इस शक्तिशाली जहाजी बेड़े के कारण ही चोल राजाओं ने समुद्र पार अनेक द्वीपों को विजय किया था। बंगाल की खाड़ी एक चोल झील बन गई थी। वर्तमान समय की तरह, उस समय भी सेना में अनेक पद (रैंक) होते थे जैसे नायकमहादण्डनायक इत्यादि। विशेष वीरता दिखाने पर परमवीरचक्र की तरह क्षत्रिय शिखामणि की उपाधि दी जाती थी। यद्यपि सेना में अनुशासन पर जोर दिया जाता था, फिर भी चोल सैनिकों का विजित शत्रुओं के प्रति व्यवहार बहुत बर्बर होता था। स्त्रियों और बच्चों पर भी अमानुषिक अत्याचार किये जाते थे। सेना में अलग-अलग हिस्सों के अलग-अलग नाम थे। राजा की व्यक्तिगत सुरक्षा में पैदल सेना- बडेपेर्रकैक्कोलस, गजारोही दल-कुजिरमल्लर, अश्वारोही दल-कुच्चैबगर, धनुर्धारी दल-बल्लिगढ़, पैदल सेना में सर्वाधिक शक्तिशाली- कैककोलर, भाला प्रहार करने वाला दल- सैंगुन्दर, राजा का अति विश्वसनीय अंगरक्षक- वलैक्कार कहलाते थे। सेना गुल्म एवं छावनियों (कड़गम) में रहती थी। सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने वाला नायक तथा सेनाध्यक्ष महादंडनायक कहलाता था।

प्रादेशिक प्रशासन- चोल साम्राज्य प्रान्तों में विभाजित था जिन्हें मण्डलम् कहा जाता था। चोल साम्राज्य में 8 मंडल थे। मण्डल का प्रशासन करने के लिए किसी राजकुमार या उच्च अधिकारी की नियुक्ति की जाती थी जो राजा के वाइसराय के रूप में कार्य करता था। प्रत्येक मंडल कोट्टम में बंटा हुआ था। कोट्टम नादुओं में विभाजित थे। नादु सम्भवत: आधुनिक जिले के समान था। कई ग्रामों के समूह को कुर्रम कहते थे।

स्थानीय स्वशासन- चोल प्रशासन की प्रमुख विशेषता उसका स्थानीय स्वशासन था। ग्राम स्वशासन की पूर्ण इकाई थे और ग्राम का प्रशासन ग्रामवासी स्वयं करते थे। चोल शासकों से इस अभिलेखों से इस व्यवस्था पर विस्तृत प्रकाश पड़ता है।

व्यवस्था- आर्थिक दंड सामाजिक अपमान पर आधारित होते थे। आर्थिक दंड में काशु लिया जाता था जो संभवत: सोने की मुद्रा थी।

अभिलेखों से प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम को 30 भागों में विभाजित कर दिया जाता था। निश्चित योग्यता रखने वाले एक व्यक्ति को चुना जाता था। निम्नलिखित योग्यता आवश्यक थी- (1) वह उस ग्राम का निवासी हो। (2) उसकी आयु 35 और 70 वर्ष के बीच हो। (3) एक-चौथाई वेलि (लगभग डेढ़ एकड़) से अधिक भूमि का स्वामी हो। (4) अपनी ही भूमि पर बनाये मकान में रहता हो। (5) वैदिक मन्त्रों और ब्राह्मण ग्रन्थों का सम्यक ज्ञान हो।

निम्नलिखित बातें सदस्यता के अयोग्य घोषित करती थीं-

  1. जो पिछले तीन वर्षों से किसी समिति का सदस्य रहा हो।
  2. जिसने सदस्य के रूप में आय-व्यय का लेखा-जोखा अपने विभाग को न दिया हो।
  3. भयंकर अपराधों में अपराधी घोषित हो।

इस प्रकार की योग्यता रखने वाले 30 भागों में से प्रत्येक में एक व्यक्ति को घड़े में से निकाले हुए पर्चे के आधार पर चुन लिया जाता था। नाम के ये पर्चे किसी बालक द्वारा निकलवा लिए जाते थे। इन सदस्यों का कार्यकाल 1 वर्ष था। इन सदस्यों में 12 स्थायी समिति के, 12 उपवन समिति के और 7 तालाब समिति के लिए चुने जाते थे। समिति को वारियम कहते थे और यह ग्राम सभा के कार्यों का संचालन करती थी। ग्राम सभा के कार्यों के लिए कई समितियां होती थीं।

ग्राम सभा के अनेक कार्य थे। यह भूमिकर एकत्र करके सरकारी खजाने में जमा करती थी। तालाबों और सिंचाई के साधनों का प्रबन्ध करती थी। ग्राम के मन्दिरों और सार्वजनिक स्थानों की देखभाल, ग्रामवासियों के मुकदमों का फैसला करना, ग्राम की सड़कों को बनवाना, ग्राम में औषधालय खोलना, ग्राम के बाजारों और पेठों का प्रबन्ध करना, इत्यादि ग्राम सभा के कार्य थे।

ग्राम सभा के अधिवेशन मन्दिरों में होते थे। केन्द्रीय सरकार गांव के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती थी। इस प्रकार ग्राम स्थानीय स्वशासन की एक महत्त्वपूर्ण इकाई था।

व्यापारियों से संबंधित हितों की देखभाल हेतु-मणिग्रामम्, वलंजियार, नानादेशी जैसे समूह थे। धार्मिक हित समूहों में मूलपेरूदियार था। यह मंदिरों की व्यवस्था की निगरानी करता था। संपूर्ण साम्राज्य मंडलों (प्रान्तों) में बंटा हुआ था। प्रान्तों का विभाजन वलनाडु या नाडु में होता था। उसके नीचे गांव का समूह कुर्रम या कोट्टम कहलाता था। सबसे नीचे गांव था। ग्राम की स्थिति पट्टे के अनुसार भिन्न प्रकार की होती थी। गांवों की तीन श्रेणियाँ थीं- ऐसे ग्राम सबसे ज्यादा होते थे जिनमें अंतर्जातीय आबादी होती थी एवं जो भू-राजस्व थे। सबसे कम संख्या में ऐसे ग्राम होते थे जो ब्रह्मदेय कहलाते थे एवं इनमें पूरा ग्राम या ग्राम की भूमि किसी एक ब्राह्मण समूह को दी गई होती थी। ब्रह्मदेय से संबंधित अग्रहार अनुदान होता था जिसमें ग्राम ब्राह्मण बस्ती होता था एवं भूमि अनुदान में दी गई होती थी। ये भी कर मुक्त थे, किन्तु ब्राह्मण अपनी इच्छा से नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था कर सकते थे।

देवदान- ऐसे गांव देवदान कहलाते थे जो मदिरों को दान में दिए गए होते थे। ऐसे गांवों में भू-राजस्व वसूला जाता था किन्तु उसकी वसूली सरकारी अधिकारियों के बजाए मंदिर के अधिकारी करते थे। ग्राम स्तर पर 3 प्रकार की संस्थाएं थीं। साधारण गांव में उर नामक संस्था थी जबकि ब्रह्मदेव या अग्रहार गांव में सभा और ऐसी बस्ती जिनमें व्यापारी निवास करते थे, वहां नगरम नामक संस्था गठित होती थी। वैसे गांव जिनमे ब्राह्मणों एवं गैर ब्राह्मण जनसँख्या निवास करती थी – सभा एवं उर दोनों गठित की जाती थी। परान्तक प्रथम के समय के उत्तरमेरु अभिलेख (919-929) से सभा की कार्यवाही पर प्रकाश पड़ता है। सबसे प्राचीन उत्तरमेरू अभिलेख पल्लव शासक दन्तिवर्मन् के काल का है। सभा एक औपचारिक संस्था थी जो ग्रामीणों की एक गैर औपचारिक संस्था उरार के साथ मिलकर काम करती थी। सभा अपनी समितियों के माध्यम से कार्य करती थी। यह वारियम कहलाती थी। समिति में 30 सदस्य चुने जाते थे। इन 30 सदस्यों में से 12 ज्ञानी व्यक्तियों की एक वार्षिक समिति गठित की जाती थी जो समवत्सर वारियम कहलाती थी। तोट्टावारियम (उपवन समिति), एनवारियम (सिंचाई समिति), पंचभार (पंच बनकर झगड़ों का निपटारा), पोनवारियम (स्वर्ण समिति)। सभा को पेरूगुरी कहा गया है। इसके सदस्यों को पेरूमक्कल कहा जाता था। सन्यासियों एवं विदेशियों की समिति को उदासिकवारियम कहा जाता था। उर की कार्यकारिणी समिति को उलुंगनाट्टार कहा जाता था। प्राय: सभी बैठकें मंदिर के अहाते में होती थीं। ढोल बजाकर लोगों को एकत्रित किया जाता था।

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