पल्लव वंश

पल्लवों के प्रारंभिक इतिहास की रूपरेखा स्पष्ट नहीं है। यह माना जाता है कि पल्लवों का उदय सातवाहनों के बाद हुआ था। लेकिन सातवाहनों और पल्लवों के बीच इक्ष्वाकुओं का अस्तित्व भी है। इनके कई स्मारक नागार्जुनकोंडा और धरणीकोंडा में मिले हैं। संभवत: यह कोई स्थानीय कबीला ही था। अपनी वंश परम्परा की प्राचीनता को प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने इक्ष्वाकु उपनाम ग्रहण कर लिया था। कृष्ण गुंटुर क्षेत्र में उनका उदय हुआ। उनके कई ताम्रपत्र मिले हैं जिनमें भूमि अनुदानों का उल्लेख है; इक्ष्वाकुओं को अपदस्थ कर पल्लव सत्ता में आये। पल्लवों का कार्यक्षेत्र दक्षिणी आध्र और उत्तरी तमिलनाडु था, उनकी राजधानी काँची बनी। पल्लवों का प्रामाणिक इतिहास छठी सदी ई. के लगभग ही मिलता है, तभी से इनका राज्य शीघ्रता से विकसित हुआ। इस प्रदेश का ऐतिहासिक शासक सिंहविष्णु को माना जा सकता है। यह बड़ा शक्तिशाली शासक था जिसने अवनिसिंह की उपाधि धारण की। इसने संपूर्ण चोलमण्डल पर अपना अधिकार कर लिया और अपने राज्य का विस्तार कावेरी तक किया। वह वैष्णव धर्मावलम्बी था।

महेन्द्रवर्मन्- सिंहविष्णु के बाद उसका पुत्र महेन्द्रवर्मन् शासक बना। वह बहुत योग्य था। जिसने कई उपाधियाँ धारण कीं-चेत्थकारिमत्तविलासविचित्रचित आदि। ये विभिन्न उपाधियाँ उसकी बहुमुखी प्रतिभा की प्रतीक हैं। चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय महेन्द्रवर्मन् का समकालीन था। महेन्द्रवर्मन का चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय से युद्ध हुआ था। उत्तर के कई भागों पर चालुक्यों का अधिकार हो गया था। काँची भी पल्लवों के हाथ से गया। गोदावरी दोआब जो वेंगी नाम से प्रसिद्ध था, भी चालुक्यों के पास चला गया। यह कालान्तर में चालुक्यों की दूसरी शाखा का प्रमुख राजनैतिक केन्द्र बना। पल्लवों की शक्ति द्रविड क्षेत्र में जमी रही।

स्थापत्य कला में चट्टानों को काटकर मंदिर निर्माण करवाने का श्रेय महेन्द्रवर्मन् को ही दिया जा सकता है। वह साहित्य, कला, संगीत आदि का संरक्षक था। वह स्वयं भी लेखक था जिसने मत्तविलास प्रहसन की रचना की। इस ग्रन्थ से तत्कालीन धार्मिक संप्रदायों कापालिक, पाशुपति, बौद्ध आदि की बुराइयों पर प्रकाश पड़ता है।

नरसिंहवर्मन् प्रथम- महेन्द्रवर्मन् के बाद् उसका पुत्र नरसिंहवर्मन शासक बना। वह भी बड़ा योग्य और प्रतापी था। 630 ई. से 668 ई. तक उसका शासन-काल है। उसने जैसे ही शासन संभाला वैसे ही उसे पुलकेशिन द्वितीय से युद्ध करना पड़ा। इस युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय की मृत्यु हो गयी। नरसिंहवर्मन् ने वातापी पर अधिकार कर लिया। फलस्वरूप उसने महामल्ल की उपाधि प्राप्त की। इससे उसके निर्माण-कायों का संकेत मिलता है। उसने महामल्लपुरम् (महाबलीपुरम) नगर की स्थापना की, जो एक प्रसिद्ध बंदरगाह भी बना। नरसिंहवमन् ने वहाँ सात रथ मंदिर भी बनवाये जो स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने हैं। उसने लंका के विरुद्ध समुद्री अभियान भी किये। इस अभियान का उद्देश्य मारवर्मन् को सहायता पहुँचा कर उसको लंका का अधिपति बनाना था। नरसिंहवर्मन ने चोल, चेरों, पांड्यों को भी पराजित किया था। चीनी यात्री ह्वेनसांग नरसिंहवर्मन् के समय ही भारत आया था। उसने अपने यात्रा विवरण में पल्लव-राज्य का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग के अनुसार पल्लव राज्य की भूमि उपजाऊ थी व वहाँ की प्रजा सुखी एवं समृद्ध थी, लोग विद्याप्रेमी थे। ह्वेनसांग के अनुसार काँची में 100 से भी अधिक बौद्ध विहार थे जिनमें लगभग दस हजार से भी अधिक बौद्ध भिक्षु रहते थे।

महेन्द्रवर्मन द्वितीय (668-670 ई.)- नरसिंह वर्मन की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र महेन्द्रवर्मन द्वितीय सिंहासन पर बैठा किन्तु 670 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार उसका शासन-काल दो वर्ष तक ही रहा।

परमेश्वरवर्मन् प्रथम (670-695 ई.)- महेन्द्रवर्मन् द्वितीय के उपरान्त उसका पुत्र परमेश्वरवर्मन् गद्दी पर बैठा। परमेश्वरवर्मन् प्रथम के समय चालुक्य नरेश विक्रमादित्य से प्रथम ने पल्लव राज्य पर आक्रमण कर कांची पर अधिकार कर लिया और कावेरी नदी तक अपनी सत्ता स्थापित कर ली। किन्तु बाद में परमेश्वरवर्मन् ने चालुक्यों को अपने प्रदेश से निकाल बाहर कर दिया। परमेश्वरवर्मन् प्रथम शैव मतावलम्बी था। उसने भगवान शिव के अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया। ममल्लपुरम् का गणेश मन्दिर सम्भवत: परमेश्वरवर्मन ने ही बनवाया था। परमेश्वरवर्मन् प्रथम ने चित्त मायगुणभाजनश्रीमार और रणजय विस्द धारण किए थे।

नरसिंहवर्मन् द्वितीय (695-722 ई.)- नरसिंहवर्मन परमेश्वर वर्मन प्रथम का पुत्र और उत्तराधिकारी था। नरसिंहवर्मन का शासन-काल अपेक्षाकृत शान्ति और व्यवस्था का था। नरसिंहवर्मन ने अपने शान्तिपूर्ण शासन का सदुपयोग समाज और संस्कृति के विकास में लगाया। उसने अपने राज्य में अनेक भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया। इन मन्दिरों में कांची का कैलाशनाथ मन्दिर, महाबलिपुरम् का तथाकथित शोर मन्दिर कांची का ऐरावत मन्दिर और पनामलई के मन्दिर मुख्य हैं। इन सभी मन्दिरों में नरसिंहवर्मन के अभिलेख अंकित है। उसे अपने पिता तथा पितामहा की भाँति विस्दों से विशेष लगाव था। केवल कैलाश मन्दिर की दीवारों पर ही उसकी 250 से अधिक उपाधियाँ उत्कीर्ण हैं। श्री शंकर मल्डश्रीवाद्य विद्याधरश्री आगमप्रियशिवचूडामणि तथा राजसिंह उसके कुछ मुख्य विस्द हैं। कला के साथ उसने साहित्यकारों को भी संरक्षण दिया।

परमेश्वरवर्मन द्वितीय (722-730 ई.)- नरसिंहवर्मन का उत्तराधिकारी परमेश्वरवर्मन् द्वितीय था। दशकुमारचरित के रचयिता महाकवि दण्डी उसका दरबारी कवि था। चीन के साथ उसने संबंध स्थापित किये और अपना दूत वहाँ भेजा था। शासन-काल के समय चालुक्य शासक विक्रमादित्य द्वितीय ने काँची पर आक्रमण किया। युद्ध में परमेश्वरवर्मन् द्वितीय पराजित हुआ। गंग नरेश श्री पुरुष से युद्ध करते समय उसकी मृत्यु हो गयी। परमेश्वरवर्मन् द्वितीय के कोई पुत्र न था। मंत्रियों ने पल्लवों की एक अन्य शाखा के राजकुमार नन्दिवर्मन् पल्लवमल्ल को शासक बनाया। नन्दिवर्मन् द्वितीय पल्लवमल (730-795 ई.) शासनकाल के लगभग माना गया है। नन्दिनवर्मन् साहसी एवं उत्साही शासक था जिसने पल्लव शक्ति का पुनर्गठन किया। इसके शासनकाल में भी पल्लव-चालुक्य संघर्ष हुए। चालुक्य नरेश विक्रमादित्य द्वितीय ने कांची पर अधिकार कर लिया था लेकिन नंदिवर्मन ने पुन: उस पर अधिकार जमाया। विक्रमादित्य द्वितीय ने काँची पर तीन बार आक्रमण किया था और सुदूर दक्षिण में पल्लवों का अधिपत्य समाप्त कर दिया।

छठी से आठवीं शताब्दियों के बीच चालुक्यों व पल्लवों में संघर्ष चलता रहा। दोनों के संघर्ष का कारण शासकों की राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाओं के साथ-साथ आर्थिक लाभ था। दोनों ने कृष्णा और तुगभद्रा के दोआब पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश की। नन्दिवर्मन ने पाण्ड्यों से भी संघर्ष किया और उन्हें पराजित किया। उसका समकालीन पाण्ड्य नरेश भारवर्मन राजसिंह प्रथम था। नन्दिवर्मन को गंगों के विरुद्ध भी विजय प्राप्त हुई। गंगनरेश श्री पुरुष पराजित हुआ। इस विजय से उसे आर्थिक लाभ हुआ। नरसिंहवर्मन ने अपनी सुरक्षा के लिए पाण्ड्यों के विरुद्ध एक संघ का निर्माण किया था। लेकिन इसे पाण्ड्य राजा राजसिंह ने नष्ट कर दिया। चालुक्यों के शासक कीर्तिवर्मन से नन्दिवर्मन को पराजय मिली। दक्षिण में उसी दौरान एक और सत्ता का उदय हो रहा था, वे थे राष्ट्रकूट। नन्दिवर्मन कलाप्रिय शासक था, जिसने कांची में बैकुण्ठ, पेरुमाल तथा मुक्तेश्वर मन्दिर का निर्माण करवाया। बहुत से पुराने मंदिरों का भी उसने जीर्णोद्धार करवाया। वह वैष्णव था, आचार्य तिरुमंग अलवार उसका समकालीन था।

दन्तिवर्मन (795-845 ई.)- 795 ई. से 845 ई. तक दन्तिवर्मन का काल है। इसके समय पल्लवों का पाण्ड्यों से संघर्ष हुआ। पल्लव राज्य के कुछ भाग पाण्ड्यों के हाथ में चले गये। दन्तिवर्मन के समय आन्दोलन का भी विकास हुआ। प्रसिद्ध संत सुन्दरमूर्ति व चरुभान पेरुमाल उसके समकालीन थे। प्रसिद्ध दार्शनिक शंकराचार्य का भी यही काल था। दन्तिवर्मन के बाद उसका पुत्र नन्दिवर्मन तृतीय शासक बना जिसका काल 545 ई. से 856 ई. है। उसने तेलेलार का युद्ध किया जिसमें पांडयों, गंगा, चोलों की सम्मिलित पराजय हुई। नन्दिवर्मन तृतीय के पुत्र ने इस पराजय का बदला पाण्ड्य राजा श्रीमाल को हराकर लिया। अपराजित वर्मन इस वंश का अंतिम राजा था। इसने पाण्ड्यों को पराजित किया लेकिन चोलराज आदित्य प्रथम से इसका अंतिम युद्ध हुआ और प्रशस्ति प्राप्त की। पल्लवों के राज्य (कोण्डमण्डलम) को शक्ति धीरे-धीरे समाप्त हो गयी। नन्दिवर्मन द्वितीय के बाद से ही पल्लवों का चालुक्यों, राष्ट्रकूटों, पाण्ड्यों व चोलों से बराबर संघर्ष चला। पल्लव शासक सामंतों की स्थिति में आ गये उनका राज्य चोल साम्राज्य में मिला लिया गया।

सांस्कृतिक क्षेत्र में पल्लवों का योगदान अमूल्य है। पल्लव शासक सांस्कृतिक अभिरुचि रखते थे और धार्मिक दृष्टि से सहिष्णुतावादी थे। उनके काल में साहित्य, कला और धर्म का विकास हुआ। पल्लवों ने मंदिर निर्माण की नवीन शैली जिसे मामल्ल शैली कहा जाता है, की शुरुआत की। पल्लवी शासकों ने मंदिर निर्माण में रुचि ली जिसके कारण पल्लव वास्तुकला का विकास हुआ। महेन्द्रवर्मन ने गुफा मंदिर निर्माण शैली विकसित की। शिलाओं को तराश कर मंदिर बनाए गए। प्रमुख मंदिर लक्षितायन-मण्डप, रुद्रवालीश्वर मदिर, पचपाण्डव मदिर, विष्णु-माण्डप आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। गुहा मंदिरों के निर्माण में नरसिंह वर्मन प्रथम ने रुचि ली। इसके अंतर्गत मण्डप तथा रथ मदिरों का निर्माण कराया गया। महाबलिपुरम् में बहुत से मण्डप (वराह, पुलिपुरद, पंचपाण्डव, महिषमर्दिणी आदि) वास्तु सौंदर्य की दृष्टि से अत्यंत उत्कृष्ट हैं। इनमें बहुत से पौराणिक दृश्यों को भी अलंकृत किया गया है। रथ मंदिरों में द्रोपदी रथ, नकुल रथं, सहदेव रथ, अर्जुन रथं, धर्मराज रथ्, भीमरथं, गणेश रथं, पिंडारी रथ आदि उल्लेखनीय हैं। राजसिंह शैली के अंतर्गत बहुत से शैव मंदिरों का निर्माण किया गया। कांचीपुरम का कैलाश मंदिर सर्वाधिक उल्लेखनीय है। यह द्राविड़ कला शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे आठवीं शती के प्रारम्भ में बनवाया गया। इसे राजराजेश्वर मंदिर के नाम से भी संबोधित किया जाता है। पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन द्वितीय ने परम्परागत वास्तु शैलियों से हटकर ईंट, पत्थर आदि के उपयोग से मंदिर निर्माण की नवीन परम्परा आरम्भ की। कैलाश मदिर की परम्परा में ही मुक्तेश्वर और मांगतेश्वर मंदिरों का निर्माण किया गया। पल्लव द्राविड़ कला शैली के विकास का अंतिम रूप अपराजित के शासन काल में प्रकट हुआ। शिवलिंग अपेक्षाकृत और वर्तुलाकार बनाए जाने लगे। स्तंभों व कीर्तिमुखों से निर्माण को और अधिक उत्कृष्टता प्रदान की गयी। गुड्डीभल्लभ मंदिर इसका उदाहरण है। इस शैली के विकास के साथ ही चोल कला का अभ्युदय होने लगा, जिस पर अपराजित शैली का प्रभाव परिलक्षित होता है।

संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केन्द्र पल्लवों की राजधानी काँची थी। पल्लवों का संस्कृत प्रेम उनके अभिलेखों से स्पष्ट होता है जिनकी भाषा संस्कृत है। प्रमुख महाकाव्य किरातार्जुनीयम् के रचयिता भारवि पल्लव सिंहविष्णु (574 ई.-600 ई.) के समय के विद्वान् थे। बहुत से विद्वानों दिमाम, मयूराशर्मन, दण्डी और भानुदत्त आदि ने कांची की यात्रा की थी।

इसी काल में मत्तविलास की रचना भी हुई थी। बहुत से इतिहासकार यह भी मानते हैं कि नरसिंहवर्मन के समय (680 ई. से 720 ई.) भास और शूद्रक के नाटकों को संक्षिप्त किया गया था जिससे उनका अभिनय किया जा सके। पल्लव धार्मिक दृष्टि से उदारवादी शासक थे, फलत: उन्होंने बहुत से मंदिरों का निर्माण करवाया। सन्त अय्यर और तिरुज्ञान सम्बन्दर जैसे संतों को उन्होंने संरक्षण प्रदान किया।

पल्लव वंश

दक्षिण भारत में कृष्णा और गोदावरी नदियों के बीच के प्रदेश में पल्लव वंश के राज्य की स्थापना हुई। पल्लवों ने कांची या कांजीवरम को अपनी राजधानी बनाया। पल्लव वंश में अनेक राजा हुए। सिंह विष्णु इस राजवंश का संस्थापक था। इसे पोत्तरयण एवं अवनिसिंह भी कहा जाता है। महेन्द्र वर्मन् प्रथम इस वंश का एक प्रसिद्ध शासक हुआ है जिसने 600 से 630 ई. तक राज्य किया। वह एक महान् निर्माता था और उसने विशाल चट्टानों को कटवाकर मन्दिर बनवाये। उसने महेन्द्रवाड़ी के निकट महेन्द्र कुंड नामक जलाशय का निर्माण कराया। महेन्द्र विद्वानों का आश्रयदाता था। उसने मत्त विलास प्रहसन नामक परिहास नाटक लिखा। महेन्द्र वर्मा सम्राट् हर्षवर्धन और चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय का समकालीन था। महेन्द्र वर्मा को चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने पराजित किया और उसे वेंगी का प्रदेश पुलकेशिन द्वितीय को देना पड़ा। महेन्द्र वर्मा को कई उपाधियाँ प्राप्त थीं जैसे- विचित्रचित, मत विलास, गुणभर आदि।

नरसिंह वर्मा प्रथम- महेन्द्र वर्मन् प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र नरसिंह वर्मन् प्रथम सिंहासन पर बैठा। उसने 630 से 668 ई. तक राज्य किया। वह पल्लव वंश का महान् शासक था। उसने काँची की ओर बढ़ते हुए पुलकेशिन द्वितीय के आक्रमण को विफल कर दिया। उसने अपने सेनापति सिरू तोंड उपनाम परन्जोति के सेनापतित्व में एक विशाल सेना वातापी पर आक्रमण करने के लिए भेजी। इस सेना ने 642 ई. में चालुक्यों की राजधानी वातापी पर आक्रमण किया। पुलकेशिन द्वितीय अपनी राजधानी की रक्षा करते हुआ मारा गया। वातापी पर नरसिंह वर्मन् प्रथम का अधिकार हो गया। इस विजय की यादगार में नरसिंह वर्मन् कोंड का विरुद धारण किया। चालुक्य साम्राज्य के दक्षिण भाग पर उसका अधिकार हो गया। इस प्रकार उसने अपने पिता की पराजय का बदला लिया। फिर उसने वातापीकोंड की उपाधि ली।

इसके पश्चात् नरसिंह वर्मम् प्रथम ने सिंहल (श्रीलंका) के राजसिंहासन के एक दावेदार मानवम्म की सहायता के लिए दो बार सिंहल-विजय के लिए सेना भेजी। मानवम्म ने नरसिंह वर्मा प्रथम की उसके युद्धों में सहायता की थी और इसी सहायता के उपहार स्वरूप नरसिंह वर्मन् ने प्रथम मानवम्म को सिंहल का राजसिंहासन प्राप्त करने में सहायता दी। दूसरे अभियान में वर्मन् को सफलता मिली और उसने मानवम्म को सिंहल के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया।

नरसिंह वर्मन् एक महान् विजेता ही नहीं, एक महान् निर्माता भी था। त्रिचनापली जिले और पुड्डुकोट में अनेक मन्दिरों का निर्माण उसने कराया। नरसिंह वर्मन प्रथम महामल्ल ने अपने नाम के अनुकूल महाबलिपुरम् अथवा महामल्लपुरम नामक नगर बसाया और धर्मराज रथ के मन्दिरों से सुशोभित किया। उसके शासनकाल में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग 642 ई. के लगभग कांची आया। पल्लव राज्य और वहाँ के लोगों का वर्णन करता हुआ वह लिखता है- कांची 6 मील की परिधि में है। यहाँ 100 के लगभग बौद्ध मठ हैं जिसमें 10,000 भिक्षु रहते हैं। ये भिक्षु महायान सम्प्रदाय की स्थविर शाखा के अनुयायी हैं। यहाँ 80 मन्दिर हैं जिनमें अधिकांश जैनियों के हैं- भूमि उर्वर है, नियम से जोती जाती है और प्रभूत अन्न उपजाती है। अनेक प्रकार के फल-फूल होते हैं। बहुमूल्य रत्न और अन्य वस्तुएं यहां उत्पन्न होती हैं। जलवायु उष्ण है और प्रजा साहसी है। लोग सच्चे और ईमानदार हैं। वे विद्या का बड़ा आदर करते हैं। ह्वेनसांग के विवरण से यह जानकारी मिलती है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध विद्वान धर्मपाल कांची के ही निवासी थे।

महेन्द्र वर्मन् द्वितीय और परमेश्वर वर्मा प्रथम- नरसिंह वर्मन् प्रथम के बाद उसका पुत्र महेन्द्र वर्मन् द्वितीय (668-670 ई.) और पौत्र परमेश्वर वर्मन् प्रथम (670-695 ई.) राजा बने। कोई विशेष घटना महेन्द्र वर्मन् के अल्प शासन-काल में नहीं घटी। उसकी मृत्यु के पश्चात् परमेश्वर वर्मन् प्रथम सिंहासनरूढ़ हुआ।

पल्लवों और चालुक्यों में संघर्ष परमेश्वर वर्मन् प्रथम के शासन-काल में चलता रहा। इस संघर्ष के बारे में दोनों पक्षों ने अलग-अलग दावे किये हैं। चालुक्य अभिलेखों के अनुसार चालुक्य नरेश विक्रमादित्य प्रथम ने कांची पर अधिकार कर लिया। परन्तु पल्लव अभिलेखों के अनुसार परमेश्वर वर्मन् प्रथम ने पेरूवलनल्लुर के युद्ध में विक्रमादित्य प्रथम की सेना को पराजित किया। इन परस्पर विरोधी प्रमाणों के आधार पर हम निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि किसी भी पक्ष को निर्णायक विजय प्राप्त नहीं हुई। परमेश्वर वर्मन् प्रथम शिव का उपासक था। अपने राज्य में उसने शिव मन्दिरों का निर्माण कराया।

नरसिंह वर्मन् द्वितीय और परमेश्वर वर्मन् द्वितीय- परमेश्वर वर्मन् प्रथम के बाद उसका पुत्र नरसिंह वर्मन् द्वितीय (695-722 ई.) राजा बना। उसका शासन-काल शांतिमय था। निर्माण कार्य पर अपने शांतिमय शासन-काल में उसने जोर दिया। उसने कांची में कैलाशनाथ मन्दिर का निर्माण कराया। कांची में ही उसने ऐरावतेश्वर मन्दिर तथा महाबलिपुरम् में तथाकथित शोर मन्दिर का निर्माण कराया। उसके अभिलेख इन मन्दिरों में उत्कीर्ण हैं। नरसिंह वर्मन् द्वितीय विद्वानों का आश्रयदाता था। उसने अनेक उपाधियाँ धारण की-जैसे राजसिंहआगय प्रियशिव चूडामणिशंकर भक्त तथा वाद्यविद्याधर। नरसिंह वर्मन् द्वितीय के बाद उसका पुत्र परमेश्वर वर्मन् द्वितीय (722-730 ई.) शासक बना। उसका चालुक्यों से युद्ध छिड़ गया।

नन्दी वर्मन् द्वितीय- पल्लव वंश का नन्दी वर्मन् द्वितीय महत्वपूर्ण शासक था। वह 730 ई. में सिंहासन पर बैठा और उसने लगभग 65 वर्ष तक राज्य किया। उसके काल में चालुक्य-पल्लव संघर्ष तीव्र हो गया। 740 ई. में चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने नन्दी वर्मन् द्वितीय को पराजित किया और कांची पर अधिकार कर लिया। लेकिन पल्लवों ने काँची पर पुन: अधिकार कर लिया। नन्दी वर्मन् द्वितीय को पाण्ड्यों और राष्ट्रकूटों से भी युद्ध करना पड़ा। राष्ट्रकूट राजा दन्तिदुर्ग ने कांची पर अधिकार कर लिया, परन्तु बाद में दोनों में सन्धि हो गई और दन्तिदुर्ग ने अपनी पुत्री रेवा का विवाह नन्दी वर्मन् द्वितीय के साथ कर दिया। नंदीवर्मन् का शासन-काल यद्यपि संघर्षों, अभियानों, आक्रमणों में बिता था परन्तु उसने निर्माण कायों में भी रूचि ली। उसने अपनी राजधानी कांची में मुक्तेश्वर ओर बैकुन्ठ-पेरूमल मन्दिरों का निर्माण कराया। नन्दी वर्मन् द्वितीय स्वयं विद्वान्, कवि और विद्वानों का आश्रयदाता था। उसके शासन-काल में प्रसिद्द विद्वान एवं वैष्णव संत त्रिरूमनगईम अलवार हुए।

दन्तिवर्मन और उसके उत्तराधिकारी- नंदी वर्मन द्वितीय के पश्चात् उका पुत्र दन्तिवर्मन राजा बना। यह उसकी राष्ट्रकूट रानी रेवा से उत्पन्न पुत्र था। इस विवाह के फलस्वरूप यद्यपि राष्ट्रकूटों और पल्लवों में सम्बन्ध स्थापित हो चुके थे, फिर भी ध्रुव, निरूपम तथा गोविन्द तृतीय नामक राष्ट्रकूट राजाओं ने कांची पर आक्रमण किये। 804 ई. के लगभग गोविन्द तृतीय ने कांची पर आक्रमण करके दन्ति वर्मन् को पराजित किया। दन्ति वर्मन् को पाण्ड्यों से भी युद्ध करना पड़ा। उसके उत्तराधिकारी नन्दी और नृपतुंगवर्मन को भी पाण्ड्यों से लोहा लेना पड़ा। पल्लव राजाओं को चोलों से भी युद्ध करने पडे। 855 ई. के लगभग चोल राजा आदित्य प्रथम ने अन्तिम पल्लव राजा अपराजित वर्मन् को पराजित करके कांची पर अधिकार कर लिया और पल्लव राज्य का अन्त हो गया।

पल्लव साहित्य, कला एवं प्रशासन

साहित्य- कांची शिक्षा का महान् केन्द्र था। माना जाता है कि ह्वेनसांग एवं दिगनाग ने यहां शिक्षा पायी थी। पल्लव काल में साहित्य के क्षेत्र में भी प्रगति हुई। पल्लव शासक साहित्य प्रेमी थे और कुछ स्वयं लेखक और कवि थे। पल्लवों की राजधानी कांची साहित्य और संस्कृति का प्रमुख केन्द्र थी। संस्कृत की इस काल में विशेष उन्नति हुई और उसे राजभाषा का पद प्राप्त हुआ। पल्लव राजा सिंह विष्णु ने महाकवि भारवि को अपने दरबार में निमंत्रित किया था। पल्लव नरेश महेन्द्र वर्मन् ने मत्तविलास प्रहसन नामक परिहाल नाटक लिखा। यह नाटक तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक जीवन पर प्रकाश डालता है। उन्होंने भागवदज्जुक भी लिखी। प्रसिद्ध विद्वान् दंडिन सम्भवतः नरसिंह वर्मन् द्वितीय की राज्य सभा की शोभा बढ़ाते थे। जिन्होंने दशकुमार चरित् की रचना की। मातृदेव भी पल्लवों के दरबार में थे।

कला- पल्लव काल स्थापत्य कला के क्षेत्र में विशेष प्रगति का काल रहा है। इस काल में अनेक भव्य मन्दिरों का निर्माण किया गया। ये मन्दिर विशाल ठोस चट्टानों को काटकर बनाये गये। सर्वप्रथम त्रिचनापल्ली में दरी मन्दिरों का निर्माण किया गया। महाबलिपुरम् में रथ मन्दिरों का निर्माण कराया गया। महाबलिपुरम् में शोर मन्दिर जैसे विशाल और भव्य मन्दिर का निर्माण किया गया। महेन्द्रवर्मन प्रथम ने महाबलिपुरम् में विशाल ठोस चट्टानों को काटकर मन्दिर बनाने की कला की आधारशिला रखी। ये मन्दिर प्राचीन स्थापत्य कला के सुन्दरतम नमूने हैं। बाराह मन्दिर में स्तम्भों वाला एक बरामदा है और ये स्तम्भ बैठे हुए शेर पर टिके हुए हैं। पल्लव कला की एक विशेषता गंगावतरण का दृश्य है जिसमें गंगा को देवताओं, पशुओं सहित पृथ्वी पर उतरते हुए दिखाया गया है। पल्लव काल में वास्तुकला की कई शैलियां प्रचलित हुई।

महेन्द्र शैली, पल्लव नरेश महेन्द्र प्रथम के शासन-काल और संरक्षण में जन्मी और विकसित पल्लव कला की एक महत्त्वपूर्ण शैली है। वास्तुकला की दृष्टि से महेन्द्र शैली का विकास तीन चरणों में हुआ- प्रथम चरण की शैली की विशिष्टता गुफा-मंडपों का निर्माण है। महेन्द्र वर्मन् ने तोण्डमंलम् में, शिलाओं को तराश कर गुफा-मंडपों के निर्माण की एक अपूर्व परम्परा का प्रवर्त्तन किया। इस चरण में विकसित महेन्द्र शैली के मंडप प्रायः सादे होते थे और उनके अद्धस्तम्भ ऊपर से नीचे तक एक ही प्रकार के हैं। मंडपों के अग्र भाग पर द्वारपालों का अकन किया गया है । इस शैली के अंतर्गत आने वाले मंडपों में मुक्तम का कल भडकम मंडप, वल्लभ का वृहत वसन्तेश्वर मंडप और तिरूचीरपल्ली का ललिताकुर पल्लवेश्वर गृह मंडप अधिक प्रसिद्ध हैं।

महेन्द्र शैली का दूसरा चरण, महेन्द्र वर्मन् की मृत्यु के बाद विकसित हुआ। इस चरण के अन्तर्गत नरसिंह वर्मन् प्रथम मामल्ल, परमेश्वर वर्मन् प्रथम और नरसिंह वर्मन् द्वितीय राजसिंह द्वारा निर्मित मंडप आते हैं। इस चरण की शैलीगत विशेषताएं सामान्यत: प्रथम चरण के अनुरूप हैं। केवल स्तम्भों की बनावट में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। स्तम्भ पहले की अपेक्षा अधिक ऊँचे और पतले हैं। इस चरण के मंडपों में मुख्य हैं- तिरुक्लुक्करनम् का ओरूकुल मंडप, महाबलिपुरम् का कोकिल मंडप, महाबलिपुरम् का धर्मराज मंडप सिलुवंगकुप्पम का अतिरण चंड का मंडप। महेन्द्र शैली के तीसरे चरण के मंडप पूर्ववर्ती मंडपों से कई दृष्टियों से भिन्न हैं। इस चरण के मंडपों में किलमाविलंगै का विष्णु मंडप, वल्लभ के शिव और विष्णु मन्दिर उल्लेखनीय हैं।

पल्लव स्थापत्य कला की अन्य प्रमुख शैली मामल्ज शैली है। इसके अन्तर्गत दो शैलियाँ आती हैं- मंडप और रथ। मामल्ल शैली के मंडप महेन्द्र शैली की अपेक्षा अधिक अलंकृत और परिष्कृत हैं। इस शैली के सभी मंडप महाबलीपुरम् में हैं। मामल्ल शैली के मंडप अपनी मूर्ति सम्पदा के लिए सुविश्रुत हैं। मामल्ल शैली के अन्तर्गत आने वाले मंडपों में आदि वराह मंडप, रामानुज मंडप और महिषमर्दिनी मंडप। मामल्ल शैली के अन्तर्गत ही सिंहाधार स्तम्भों की रचना हुई। मामल्ल शैली की सर्वोत्कृष्ट विशिष्टता एकाश्मक रथों का निर्माण है। इसके अनुसार प्रकृत शिला के अनावश्यक अंश को निकाल कर रथ का अपेक्षित स्वरूप उत्कीर्ण करने की परम्परा मामल्ल शैली में ही विकसित हुई। इस शैली में निर्मित रथ आज भी पल्लव कला की उपलब्धियों के मूक साक्षी के रूप में विद्यमान हैं।

महेन्द्रवर्मन् शैली- इस शैली में मंदिर सादे बने हुए थे।

  • बरामदे स्तम्भयुक्त होते थे।
  • अंदर में दो-तीन कमरे बने हुए थे।
  • इस शैली में स्तंभ एवं मंडप का प्रयोग किया जाता था।

मामल्ल शैली या नरसिंहवर्मन् शैली- इस शैली में मंडप एवं रथ का प्रयोग हुआ।

  • मंडप शैली के उदाहरण हैं- वाराहमंदिर, महिषमंदिर, पंचपांडवमंदिर।
  • रथ शैली के उदाहरण है- सप्तपैगोडा मंदिर।

राजसिंह शैली- इस शैली में स्वतंत्र रूप से मंदिर बनाए जाते थे।

  • महाबलिपुरम् का तटीय मंदिर स्वतंत्र मंदिर के उदाहरण हैं।
  • इसके अतिरिक्त कांचीपुरम का कैलाश मंदिर एवं बैकुण्ठ पेरुमल मंदिर भी इसके उदाहरण हैं।

नन्दीवर्मन् शैली- वस्तुत: यह काल पल्लव वास्तुकला शैली के अवसान को रेखांकित करता है।

  • इस शैली में मंदिर छोटे-छोटे आकार के होते थे।
  • मुक्तेश्वर मंदिर और मांग्तेश्वर मंदिर इसके उदाहरण हैं।
  • एक अन्य उदाहरण गुड्डीमालम का परशुरामेश्वर मंदिर है।

पल्लव शासन-पद्धति- पल्लव शासन पद्धति में प्रशासन का केन्द्र बिन्दु राजा था। राजा भारी-भरकम उपाधि लेते थे जैसे अग्निष्टोम, वाजपेय, अश्वमेध यज्ञी राजा को प्रशासन में सहायता और परामर्श देने के लिए मंत्री होते थे। प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्य विभिन्न भागों में विभाजित था जिसका प्रशासन चलाने के लिए अधिकारी नियुक्त थे। साम्राज्य का विभाजन राष्ट्रों (प्रान्त) में किया गया और राष्ट्र के प्रमुख अधिकारी को विषयिक कहा जाता था। राष्ट्र कोट्टम में विभाजित था जिसके अधिकारी को देशांतिक कहा जाता था। सम्राट् का एक निजी मंत्री (प्राइवेट सेक्रेटरी) हुआ करता था जो उसके आदेशों को लिखा करता था और उनकी घोषणा करता था। राजकीय कर एकत्र करने के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त थे जिन्हें मण्डपी कहते थे और वह स्थान जहां कर जमा होता था, उसे, मंडप कहते थे। राजा निम्नलिखित अधिकारियों की सहायता से प्रशासन का संचालन करता था-

मंत्रिपरिषद्- (रहस्यदिकदास), अमात्य, महादंडनायक, जिलाधिकारी-(रतिक), ग्राम मुखिया (ग्राम भोजक), युवराज, महासेनापति, गौल्मिक, चुंगी अधिकारी-मंडवस।

प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्रामवासियों को ग्राम का प्रशासन चलाने में काफी स्वतंत्रता प्राप्त थी। प्रत्येक ग्राम की एक ग्राम सभा होती थी। ग्राम सभा की उपसमितियां होती थीं जो उद्यान, मन्दिर, तालाब इत्यादि का प्रबन्ध करती थी। ग्राम सभाओं को सीमित स्थानीय न्याय-सम्बन्धी अधिकार भी प्राप्त थे। वे सार्वजनिक दानों का प्रबन्ध करती थीं। ग्राम की सीमाएँ साफ तौर पर निश्चित कर दी जाती थीं और किसान की भूमि का माप करके उसका रिकार्ड रखा जाता था। प्रशासनिक विभाजन-मंडल (राज्य)- राष्ट्रिक, नाडू (जिला)-देशातिक- कोट्टम (ग्राम समूह) इसके ऊपर कोई अधिकारी नहीं था।

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *