मुगलकाल

मुगलकाल में तकनीकी विकास

तकनीकी विकास

भारत में तुकों के साथ ही तकली का आगमन हुआ। वस्तुतः 17वीं शताब्दी के दौरान कोई आमूल परितर्वन या विकास नहीं हुआ। फिर भी इस काल तक दो महत्वपूर्ण तकनीकी विकास हुए। (1) लाहौर, आगरा और फतेहपुर सीकरी में अकबर के संरक्षण में कालीनों की बुनाई और (2) बड़े पैमाने पर रेशम और रेशम के धागों का उत्पादन।। 1770 के दशक में भारत में इतालवी रेशम सूत्रण की शुरूआत हुई।

सैन्य तकनीकी- 15वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में गुजरात, मालवा तथा दक्खन जैसे कुछ प्रदेशों में आग्नेय अस्त्रों का इस्तेमाल किया गया। परन्तु इसका नियमित उपयोग पुर्तगालियों ने दक्षिण भारत में 1498 ई. से शुरू किया और उत्तर भारत में बाबर ने इसका पहली बार उपयोग किया। ये बन्दूके वस्तुत: तोड़ेदार बंदूके थीं। यूरोप में बन्दूक चलाने के लिए दो विधियों का उपयोग किया जाता था-

  1. चक्रतकनीकी (व्हीललॉक) और
  2. चकमकी पत्थर की विधि (फ्लिंटलॉक)। व्हीललॉक का उपयेाग पिस्तौल के लिए होता था।

अबुल फजल लिखता है कि अकबर ने ऐसी यांत्रिकी विकसित की थी जिसकी सहायता से एक घोडा दबाने से एक ही साथ 17 बन्दूकों से गोली दागी जा सकती थी।

जहाज निर्माण तकनीकी- यूरोपवासी जहाजों के निर्माण में लोहे के कील का उपयेाग करते थे। भारतीयों ने इस तकनीकी को शीघ्रता से अपना लिया। 1510 ई. के आस-पास बार्थेमा ने कालिकट में खडे भारतीय जहाजों में लोहे की कीलों का जम कर उपयोग देखा था। इसी प्रकार 17वीं शताब्दी के दौरान लोहे के लंगरों का उपयेाग किया जाने लगा। जहाज से पानी लिए भारतीय बाल्टी का उपयोग करते थे। हालांकि 17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यूरोपवासियों द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले चेन पम्प का भी प्रयोग भारतीय करने लगे।

धातु शोधन तकनीकी- अबुल फजल के अनुसार, अकबर के आयुधशाला लोहे की तोपों और बन्दूकों के नाल बनाये जाते थे। सम्भवत: इस तकनीकी का आविष्कार किया गया था। भारत में जस्ता सम्बन्धी धातुशोधन की तकनीकी की शुरूआत 12वीं शताब्दी के आस-पास हुई थी। अबुल फजल जस्ता उत्पादन के लिए राजस्थान के जाबर क्षेत्र का वर्णन करता है। राजस्थान के खेत्री में ताँबे की खान थी। टिन का उत्पादन नहीं के बराबर होता था। अत: टिन पश्चिमी एशिया से आयात किया जाता था। भारत में और खासकर आध्र प्रदेश में लगभग 400 ई. से ही असली वूट्ज (लोहा) का उत्पादन होता था।

काँच निर्माण तकनीकी- 16वीं एवं 17वीं शताब्दी के दौरान यूरोपवासी अपने साथ काँच के बने कई तरह के सामान लाए जैसे काँच का दर्पण। हम भारतीय केवल भारतीय दर्पण अर्थात् धातुओं के दर्पण से परिचित थे। इसके अतिरिक्त वे कांच के चश्में और लेंस भी ले\ ऐसा प्रतीत होता है की 15वीं शताब्दी के दौरान भारतीयों को रेतघड़ी बनाने का भी ज्ञान था। परन्तु मुग़लकालीन चित्रों में यूरोप निर्मित रेतघड़ी को ही दर्शाया =गया है, जिसे यूरोपवासी अपने साथ भारत लेकर आए थे। इसके अतिरिक्त हमें यूरोप में निर्मित पानी पीने के गिलास, आवर्धक या ज्वलन्त ग्लास और अग्रवर्ती ग्लास की भी जानकारी मिलती है।

मुद्रणालय- 1670 ई. के दशक में, सूरत स्थित कम्पनी के मुख्य दलाल भीम जी पारक ने मुद्रण की तकनीकी में गहरी दिलचस्पी दिखाई।

समयमापन पद्धति- 16वीं एवं 17वीं शताब्दी के दौरान भारत के शहरों में समय पता करने के लिए जलघड़ी का प्रयोग किया जाता था। इसे फारसी में तास और पूरी यांत्रिकी को तास घड़ियाल कहा जाता था। अफीफ के तारिखे शाही में दिल्ली सल्तनत काल में जलघड़ी का उल्लेख मिलता है। यूरोपवासी भारत में यांत्रिक घड़ी लेकर आए थे। सर टॉमस रो ने जहाँगीर को एक यांत्रिक घड़ी भेंट में दी थी।

अन्य तकनीकी- मुगलकाल में भवन का नक्शा बनाने की प्रथा चल पड़ी थी। इसे फारसी में खाका कहते थे। व्यापार में माल को ढोने के लिए बैलगाड़ी का उपयोग आमतौर पर होता था। सर टॉमस रॉ ने जहाँगीर को चार घोड़ों से खींची जाने वाली अंग्रेजी बग्गी उपहार में दी थी। जहाँगीर के समय, नूरजहाँ की माँ ने गुलाब जल से बने इत्र का आविष्कार किया था। अबुल फजल के अनुसार, पानी को ठण्डा करने के लिए शोरे का उपयोग होता था। बताया जाता है कि सम्राट् अकबर ने एक बैलगाड़ी विकसित की थी जो यात्रा करने एवं सामान ढोने के साथ-साथ अनाज भी पीसती थी। अनाज पीसने के लिए एक पवन चक्की अहमदाबाद में लगायी गयी थी।

मुगलकाल में औद्योगिक विकास

मुगलकाल में औद्योगिक विकास की क्या स्थिति थी, इस विषय में विदेशी यात्रियों और तत्कालीन इतिहासकारों के विवरणों से महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

कारखाना का शब्दिक अर्थ है, वह स्थान जहाँ लोगों के प्रयोग के लिए कार्यशालाएँ हों। परन्तु मध्ययुग में इस शब्द की ध्वनि नितान्त भिन्न थी। मध्ययुगीन इतिहासकारों ने इसे व्यापक अर्थ में प्रयुक्त किया है जिसके अनुसार कारखाना के अंतर्गत कार्यशालाओं के अतिरिक्त अन्य चीजे भी सम्मिलित थीं जैसे कि भंडार, शाही दरबार, सुल्तान की निजी सेवाएँ एवं पशुओं के बाडे इत्यादि। मुगल इसके लिए बयूतात शब्द का प्रयोग करते थे जो कि अरबी भाषा के शब्द बैत का द्विवचन/बहुवचन है। बैत का अर्थ है घर। अत: घरबार के संदर्भ में बयूतात का अर्थ मुगल प्रशासकों के लिए पर्याप्त रूप से स्पष्ट था। कारखानों या बयूतात जैसा कि इस विभाग का नाम था, के अंतर्गत वे कारखाने और भंडार आते थे जिनका रखरखाव सरकार राज्य के इस्तेमाल के लिए करती थी। मोती और हीरे-जवाहरात से लेकर तलवारों, तेगों, तोप-बंदूकों और भारी गोला बारूद तक की खरीद-फरोख्त और रखरखाव इसी विभाग की जिम्मेदारी थी। सेना के लिए घोडे और हाथी, सामान ढोने वाले टट्टू, जानवर और शाही शिकार के लिए अन्य पशुओं के रखरखाव की जिम्मेदारी भी बयूतात की ही थी। यह विभाग न केवल सब प्रकार की वस्तुओं की खरीद और भंडारण करता था अपितु युद्ध के लिए अस्त्र-शस्त्र एवं विलास-सामग्रियों के निर्माण का सबसे बड़ा अभिकरण भी था। यद्यपि बयूतात का स्वामित्व एवं प्रबंध राज्य के हाथ में था फिर भी इसे पूर्णत: व्यापारिक ढंग से चलाया जाता था। कारखानों की भूमिका न केवल घरेलू अपितु साम्राज्य के सैन्य एवं वित्तीय क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण थी। इसके अतिरिक्त राज्य की औद्योगिक प्रगति को भी ये प्रभावित करते थे।

मध्ययुगीन शासकों के विलास, उनके दरबारों, अंत:पुरों की साज-सज्जा एवं शानशौकत के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती थी उनका निर्माण सामान्य बाजार में होना कठिन था। अत: शासकों को बाध्य होकर इनके निर्माण के लिए सरकारी कारखाने लगवाने पड़े। कारखानों की व्यवस्था कदाचित् फारस से ली गई हैं किन्तु वास्तव में कारखानों का प्रसंग मौर्य शासकों, अलाउद्दीन खलजी एवं फिरोज तुगलक के समय में भी आता है। मिस्र में भी सरकारी और निजी उद्यमों के बीच स्पष्ट अंतर दर्शाया गया है। सरकारी उद्यम शाही परिवारों के लिए विभिन्न प्रकार की पोशाके बनाते थे।

सल्तनत काल के सभी कारखानों को उचित रूप से कारखाने या कार्यशालाएँ नहीं कहा जा सकता। इनमें से कुछ तो कारखाने थे जबकि अन्य शाही विभागों एवं सुल्तान की निजी सेवाओं और पशुओं के बाड़ों से सम्बन्धित थे।

कारखानों का एक महानिदेशक होता था। जब सुल्तान कोई चीज बनवाना चाहता तो सबसे पहले शाही हुक्म तश्तदारखाना और ख्वाजा जहाँ-ए-सल्तनत के पास भेजा जाता था। मुगल साम्राज्य में सरकारी आवश्यकता की सभी वस्तुएँ शासन स्वयं उपलब्ध कराता था। इसके लिए स्वयं सरकार लगभग सभी वस्तुओं का उत्पादन करती थी। इसके अतिरिक्त बेहतरीन किस्म की चीजें भी वहीं बनाती थीं।

बड़े स्तर पर उत्पादन न होने के कारण सामान्य बाजार सरकार की विभिन्न महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता था। आज जो सरकार बाजार से तैयार वस्तुएँ खरीदती है या ठेकेदारों को बड़ी मात्रा में वस्तुएँ उपलब्ध कराने का आदेश देती है, वह कुटीर उद्योगों के उस काल में सम्भव नहीं था। साथ ही पूँजीपति बिक्री को दृष्टि में रखकर बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं करवाते थे। अत: सरकार के पास इसके अतिरिक्त कोई और चारा नहीं था कि अपनी आवश्यकताओं की वस्तुओं का उत्पादन स्वयं करे। राज्य की वस्तुओं की आवश्यकता कितनी बड़ी होती थी, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल में दो बार, सर्दियों और बरसात के मौसम में, पोशाके तैयार रखनी पड़ती थीं। राज्य स्वयं अनेक कारखाने चलाकर इन वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करता था। ये कारखाने साम्राज्य के प्रमुख शहरों में लगाए गए थे जहाँ कुशल कारीगरों को (कभी-कभी तो दूर-दूर से) लाकर रखा जाता था। ये कारीगर एक सरकारी दरोगा की निगरानी में कार्य करते थे और उन्हें दैनिक मजदूरी दी जाती थी। इनके द्वारा तैयार की गई हस्तशिल्प की वस्तुओं के भंडारण की उचित व्यवस्था की जाती थी। शाही घराने के लिए आवश्यक उपभोक्ता एवं विलास वस्तुओं के उत्पादन एवं आपूर्ति के लिए ऐसी ही व्यवस्था की जाती थी। इसमें संदेह नहीं कि मुगल बादशाह कारखानों में विशेष रुचि लेते थे। इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता था कि शासकीय कारखाने न केवल केद्रीय अपितु प्रान्तीय मुख्यालयों एवं अन्य महत्वपूर्ण औद्योगिक नगरों में भी लगाए जाएँ।

दरबारी इतिहासकारों एवं विदेशी यात्रियों की टिप्पणियों से अनुमान लगाया जा सकता है कि मुगल सम्राट् कारखानों एवं कार्यशालाओं में कितनी रुचि लेते थे- कुशल विशेषज्ञों और कारीगरों को देश में बसाया गया था ताकि वे लोगों को उत्पादन के सुधरे हुए तरीके सिखा सके। लाहौर, आगरा, फतेहपुर, अहमदाबाद, गुजरात में स्थित शाही कार्यशालाएँ कारीगरी के अनेक अनुपम नमूने बनाती हैं, कारीगरों की अच्छी देखभाल की जाती है और इस कारण यहाँ के चतुर कारीगर शीघ्र ही अपने काम में कुशल हो गए हैं- शाही कार्यशालाएँ वे सब वस्तुएँ उपलब्ध कराती हैं जो दूसरे देशों में बनाई जाती हैं। बढ़िया वस्तुओं के प्रति रुचि आम हो गई है और दावतों के समय प्रयुक्त वस्त्रों का तो वर्णन करना कठिन है। अकबर अपने कारखानों एवं उनमें विभिन्न देशों के कारीगरों को भर्ती करने में और स्थानीय लोगों को कला में प्रशिक्षित करने में रूचि लेता था इसका विवरण आइन-ए-अकबरी में मिलता है। फादर मंसरात ने भी इसका उल्लेख किया है। मंसरात का कहना है कि अकबर स्वयं खड़े होकर आम कारीगर को काम करते हुए देखता था और कभी-कभी तो मनबहलाव के लिए स्वयं भी करने से नहीं हिचकिचाता था। जहाँगीर और शाहजहाँ भी कारखानों प्रश्रय देते रहे। जहाँगीर के समय में अनूठी वस्तुएँ बनाने एवं कुशल कारीगरों पारितोषिक दिए जाने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। इनमें से सर्वोत्तम उदाहरण एक छुरी का है जिसकी मूठ काले धब्बों वाले दंदार-ए-माही (मछली दाँत) की बनी हुई थी। इसके अतिरिक्त जहाँगीर ने एक सौ तोले उल्का पत्थर और सामान्य लोहे के मिश्रण से उस्ताद दाऊद द्वारा एक तलवार, एक छुरी और एक चाकू बनवाया था। इस तलवार की धार इतनी तेज थी कि सर्वोत्तम पानीदार तलवार से मुकाबला कर सकती थी। बंगाल का मुगल सूबेदार इस्लाम खान जब राजधानी राजमहल से ढाका ले गया तो उसने बढ़इयों, लुहारों, शस्त्र ढालने वालों एवं अन्य कारीगरों की सहायता से सरकारी जहाजघाटों, भंडारघरों और कारखानों का निर्माण करवाया। शाहजहाँ के काल में कश्मीर और लाहौर का कालीन उद्योग श्रेष्ठता की ऐसी ऊँचाइयों पर पहुँचा कि सौ रुपए प्रति गज के से बनने वाले ऊनी कालीनों की तुलना में ईरान के शाही कारखानों में वाले ऊनी कालीन टाट प्रतीत होती थी। गृह-उद्योगों की ओर शाहजहाँ और कितना प्रश्रय देता था संयोगवश उसके एक दान के उदाहरण है। गद्दी पर बैठने से पहले जब उसकी लाडली बेटी बेगम साहिबा तो उसने पाँच लाख रुपए मक्का भेजने की मन्नत माँगी। जब वह गद्दी पर बैठा और उसकी बेटी ठीक हो गई तो उसने अपनी मन्नत पूरी की। किंतु और जहाँगीर की भाँति उसने रुपया नकद न भेजकर निर्देश दिया कि अहमदाबाद से उतनी धनराशि का माल खरीद कर हेजाज भेजा जाए और उसकी बिक्री से जो राशि प्राप्त हो उसे लाभांश सहित गरीबों और जरुरतमंदों में बाँट दिया जाए। उसने एक तृणमणि निर्मित दीपाधार शाही कारीगरों द्वारा तैयार करवा कर मक्का के पवित्र तीर्थ में भेजा। यह दीपाधार स्वर्णजाली के भीतर बना हुआ था और इसमें बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे। उसकी लागत ढाई लाख रुपए थी।

दक्षिण में अपने उपराजत्व काल में औरंगजेब निरंतर इस प्रयास में रहता था कि मसुलीपट्टम के कुशल कपड़ा-छपाई करने वालों को दिल्ली या आगरा लाकर सरकार कारखानों में कार्य करने के लिए राजी किया जा सके। इसके लिए उन्हें लगभग बाध्य किया जाता था।

प्रांतों में लाहौर, आगरा, अहमदाबाद, बुरहानपुर और कश्मीर में सरकारी कारखाने थे। यहाँ के गवर्नर स्थानीय उत्पादनों को बढ़ावा देते थे क्योंकि उन्हें अपने-अपने प्रांतों की अनूठी चीजें सम्राट् को भेजनी होती थीं। मनूची के अनुसार पादशाह और शहजादे इनमें से प्रत्येक प्रांत में अपने कारिंदे रखते थे जिनका कार्य था इन स्थानों की सर्वोत्तम वस्तुएँ लाकर उन्हें देना। वे निरंतर निगरानी रखते थे कि इस दिशा में इन प्रांतों के शासक क्या प्रयास करते हैं।

गोलकुंडा के सुल्तान की एक कार्यशाला थी। मुगल साम्राज्य के अनेक गवर्नरों के अपने निजी कारखाने थे, जहाँ कुशल कारीगर विलास की वस्तुएँ बनाते थे। यह बात मोरलैंड की धारणा से मेल खाती है कि कुछ लोगों के निजी कारखाने होते थे। कुछ स्थानीय शासकों जैसे कि बनारस के महाराजा की रामनगर में अपनी कार्यशाला थी।

कभी-कभी यूरोपीय कपनियों को भी केंद्रीकृत उत्पादन एवं नियंत्रण की आवश्यकता प्रतीत होती थी और उन्होंने भी अपने कारखाने स्थापित करने के प्रयास किए।

सरकारी कारखानों में बनने वाली वस्तुओं में खिलत विशेष उल्लेखनीय है। खिलत सम्मान की पोशाक होती थी जिसे विशेष अवसरों पर पादशाह विशिष्ट व्यक्तियों को प्रदान करता था। ये अवसर होते थे राज्यारोहण की वर्षगाँठ, दोनों ईदें, उत्सव का कोई भी अवसर इत्यादि।

कारखानेशाही वस्त्रागार के लिए पोशाके भी तैयार करते थे। साथ ही आभूषण, श्रेष्ठ नक्काशीदार वस्तुएँ जिनमें अत्यन्त कुशल कारीगरी होती थी। विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र एवं भारी बंदूके एवं तोपें भी बनाई जाती थीं। तात्पर्य यह कि शाही परिवार के प्रयोग की अधिकांश वस्तुएँ विभिन्न सरकारी कारखानों में ही बनाई जाती थीं।

ये सरकारी कारखाने यद्यपि बड़े पैमाने के उद्योगों के ढरें पर ही चलाए जाते थे जिनमें कच्चा माल, औजार और कर्मशालाएँ सरकार ही मुहैया कराती थी। कारीगर का, जो कि वास्तव में उत्पादन करता था, सम्बन्ध केवल पारिश्रमिक पाने तक ही सीमित था। इन वस्तुओं के उपभोग का वह अधिकारी नहीं था। फिर भी ये उद्योग वास्तविक वाणिज्यिक कारखाने का रूप नहीं ले सके। इन कारखानों में पादशाहों की रूचि के अनुसार ही वस्तुओं का उत्पादन होता था और उनमें कारीगरी का कमाल दिखाई देता था। इन वस्तुओं के उत्पादन लागत का भी ठीक-ठीक हिसाब रखा जाता था कितु वह उत्पादन निर्णायक पहलू नहीं होता था। सरकार के पास धन की कोई कमी नहीं पादशाहों की श्रेष्ठ रूचि और कल्पनाशीलता की भी कोई सीमा न थी। परिस्थितियों में कारखानों का वाणिज्यिक उद्योगों के रूप में विकास सम्भव नहीं था। इसके विपरीत ये कारखाने पादशाहों की रूचियों, पसंद अं सरकारी आवश्यकताओं पर ही निर्भर थे। इसका निश्चित परिणाम मुगल साम्राज्य के पतन के साथ इन कारखानों का भी पतन हो गया। कारखानों का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि व्यवस्था में कारीगर कला को परिष्कृत करने के लिए अत्याधिक प्रोत्साहन मिलता था।

वस्तुओं की गुणवत्ता पादशाहों की परिष्कृत रूचि पर आधारित होती थी और कारीगरों के लिए प्रतिमान स्थापित करती थी। इससे कुशल आदान-प्रदान हुआ। कारीगरी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती थी। इसी कारण जब मुगल साम्राज्य और उसके कारखाने न रहे तब भी देश में कारीगरी बची रही और चलती रही।

ये कारखाने किस प्रकार कार्य करते थे, इसकी जानकारी हमें उन विदेशी यात्रियों के विवरण से मिलती है जो मुगल दरबार में आते थे। अकबर के समय में कारखानों के सम्बन्ध में दीवान-ए-बयूतात बहुत महत्वपूर्ण था। आगे चलकर सारे विभाग का दायित्व ही उसे सौंप दिया गया और प्रशासनिक मशीनरी में उसकी स्थिति स्थिर हो गई। अब उसे मीर-ए-सामान कहा जाने लगा। जहाँगीर के काल में उसके दायित्वों का पर्याप्त उल्लेख मिलता है और उसे मीर-ए-सामान कहा गया है, न कि खान-ए-सामान।

जहाँ तक इस विभाग के अधिकारियों का सम्बन्ध है मीर-ए-सामान इसका मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता था जिस पर विभाग को सुचारू रूप से चलाने और इसकी निगरानी का दायित्व था। अन्य अधिकारी थे-

1. दीवान-ए-बयूतात- जो कि ऊँचे ओहदे का अधिकारी था और मुख्यत: विभाग का वित्तीय दायित्व सँभालता था।

2. मुशनिफ-ए-कुल-ओ-जुज (जिसका शब्दिक अर्थ है अंश का और सारे का लेखापाल) विभाग का मुख्य लेखापाल होता था। विभाग की प्रत्येक शाखा में उसका एक लेखापाल (मुशरिफ) होता था।

3. दरोगा- कारखाने की प्रत्येक शाखा में एक दरोगा होता था जिसका काम अपनी शाखा के कारीगरों से सीधा सम्बन्ध होता था। वही कारीगरों को प्रतिदिन काम बाँटता था और उन्हें दिए जाने वाले कच्चे माल के लिए उत्तरदायी होता था।

4. तहसीलदार- प्रत्येक कारखाने में दरोगा की ही भाँति एक तहसीलदार भी होता था जो अपनी शाखा के लिए आवश्यक माल और रोकड़ का प्रभारी होता था।

5. मुस्तौफी- यह कारखानों के लेखा का परीक्षण करता था, व्यय का मिलान व्यययंत्रों से करता था, वक्तव्य तैयार करके उस पर अपने हस्ताक्षर करता था, उसे विभाग के दीवान के समक्ष प्रस्तुत करता था और अंत में उस पर मीर-ए-सामान की मुहर लगवाता था।

6. दरोगा-ए-कचहरी- उस पर कार्यालय की सामान्य देखरेख का भार था। उसका काम यह सुनिश्चित करना था कि कागजात और रजिस्टर एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी के पास उचित रूप से पहुँचे। वह यह भी देखता था कि कार्यालय के कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ कोई आपत्तिजनक व्यवहार न करे। वह सम्बंधित अधिकारी की मुहर सहित द्वारों पर ताला लगाता था और उस पर अपनी मुहर भी लगाता था।

7. नजीर– इसका ओहदा विभागीय दीवान सेनीचे होता था। वह पुन:रीक्षण अधिकारी होता था जो यह सुनिश्चित करता था कि कार्य अधिक कुशलतापूर्वक और सहीं ढंग से हो सके। जहाँ तक विभाग के वास्तविक कार्य का प्रश्न था, नजीर का सम्बन्ध विभाग के कार्यकारी पक्ष की अपेक्षा वित्तीय पक्ष से ही अधिक था। उसका पद निश्चित रूप से दीवान से नीचे था और भी किसी रूप में वह दीवान का समकक्ष नहीं था। जहाँगीर और शाहजहाँ के शासन-काल में दरोगाओं और तहसीलदारों के अनेक उल्लेख मिलते हैं। जब भी आवश्यकता होती, दरोगा और तहसीलदारों को अपने कारखानों में निर्मित वस्तुएं लेकर पादशाह के सामने जाने का अवसर मिलता था, किन्तु कार्यालय के रोजमर्रा के कामकाज को देखने वाले नजीर का उल्लेख नहीं मिलता, न तो उसके दायित्व ही दरोगा और तहसीलदार की भाँति महत्वपूर्ण थे और न ही उसका पद मीर-ए-सामान या दीवान की भाँति महत्वपूर्ण था।

जहाँ तक इन अधिकारियों के कर्त्तव्यों का सम्बन्ध है विभागाध्यक्ष की हैसियत से मीर-ए-सामान का कार्य था कार्यकारी पक्ष का दायित्व सँभालना। वह प्रत्येक शाखा के आंतरिक कार्य पर आम निगरानी रखता था। दरोगाओं, मुशरिफों और तहसीलदारों की नियुक्ति और बर्खास्तगी में उसे पहल करने का अधिकार था। उसे यह भी अधिकार था कि आवश्यकता पड़ने पर अपने किसी भी मातहत अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही कर सके। वह विभाग के सभी मामलों को देखता था और कारखानों को प्रांतों से मिलने वाले आदेशों को ग्रहण करता था। अत्यन्त महत्वपूर्ण मामले या बड़े सौदे वह पादशाह के सामने रखता था और रोजमर्रा के मामले स्वयं ही निपटाता था। दीवान का कार्य था, विभाग का वित्तीय दायित्व सँभालना। इस रूप में उसे नजीर मुस्तौफी और मुशरिफ से कार्य लेना होता था। अन्य मामलों में भी वह कारखानों की आवश्यकताओं का ध्यान रखता था, किन्तु प्रत्येक मामले की जानकारी पहले वह मीर-ए-सामान को देता था। नियमानुसार उसे मीर-ए-सामान की सलाह पर ही कार्य करना होता था। जिस प्रकार दीवान और मुस्तौफी के जरिए अपने पास आने वाले वित्तीय मामलों से सम्बन्धित कागजात पर मीर-ए-सामान विवरण पढे बिना अपनी मुहर लगा देता था, उसी प्रकार अन्य मामलों में दीवान मीर-ए-सामान के निर्णयों पर भरोसा करता था। नजीर के कोई स्पष्ट अधिकार और दायित्व नहीं होते थे और वह दीवान के साथ मिलकर ही कार्य करता था। उसकी उपस्थिति से लेखों का केंद्रीय लेखा-परीक्षा विभाग के सामने प्रस्तुत करने से पूर्व लेखा के पुन:रीक्षण का कार्य सरल हो जाता था। मुस्तौफी सभी आवश्यक कागजात जुटाता था, विशेष रूप से प्रत्येक शाखा के तहसीलदारों एवं मुशरिफों से दैनिक प्रविष्टि पुस्तिका और दैनिक नगर रसीदों और वितरण का विवरण। वह लेखा में उल्लिखित प्रत्येक विवरण को एक-एक करके मिलाता था और उन पर दीवान के हस्ताक्षर करवाता था। यदि दीवान किसी बात का स्पष्टीकरण चाहता तो मुस्तौफी उसे स्वयं अपनी कलम से लिख लेता था। लेखा के स्वीकृत हो जाने पर वह धन का माँग-पत्र तैयार करता था, उस पर दीवान के हस्ताक्षर लेकर उसे कचहरी के दरोगा को सौंप देता था ताकि धनराशि प्राप्त की जा सके। यह देखना दीवान का दायित्व था कि उसके विभाग में किसी को भी कठिनाई न हो। अपने हाथ से गुजरने वाले सभी सौदों और लेखों के लिए वह उत्तरदायी होता था। प्रत्येक तहसीलदार के अंतर्गत आने वाले विभाग की आय एवं व्यय का विवरण और प्रत्येक कारखाने के आम हालात एवं लेखों के सम्बन्ध में एक रिपोर्ट भी वह तैयार करता था।

शाखा की आवश्यकताओं के लिए आवश्यक धन तहसीलदार के पास रहता था। शाखा विशेष में होने वाले कार्य के लिए आवश्यक कच्चे माल का भंडार भी वही रखता था। उसी से धन या माल लेकर दरोगा अपने मातहत कार्य करने वाले कारीगरों को बाँटता था। शाम के समय दरोगा कारीगरों से वस्तुओं को, वे निर्माण की जिस भी अवस्था में होतीं, वापस ले लेता था और प्रत्येक कारीगर के कार्य की मात्रा का हिसाब लिखकर वस्तुओं को तहसीलदार के पास जमा करवा देता था। अधबनी वस्तुओं को दरोगा अगले दिन फिर जारी करवा कर कारीगरों को दे देता था। यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती रहती थी जब तक कि वह वस्तु पूरी तरह बनकर तैयार नहीं हो जाती थी। कार्य समाप्त हो जाने पर इन नियमित प्रविष्टियों के आधार पर कार्य के कुल दिनों के पारिश्रमिक का और कच्चे माल पर होने वाले व्यय का भी हिसाब लगाया जाता था जिसके आधार पर उस वस्तु की लागत का निर्धारण किया जाता था। अंत में बनने वाली रिपोर्ट में उस वस्तु का लागत मूल्य, कारीगर का नाम और उस दरोगा का नाम भी अंकित होता था जिसकी निगरानी में यह कार्य हुआ था।

प्रत्येक शाखा में यही प्रक्रिया अपनाई जाती थी, भले ही वह रसोई का विभाग हो जहाँ अनाज इत्यादि की आपूर्ति की जाती थी या भवन-निर्माण का विभाग हो जहाँ ईंटों की संख्या, पत्थरों का आकार एवं उस क्षेत्र में प्रतिदिन प्रयुक्त होने वाली अन्य सभी सामग्रियों का विवरण रखा जाता था।

इस प्रकार तहसीलदार और दरोगा का कारीगरों से सीधा सम्पर्क रहता था। तहसीलदार आवश्यक धन और कच्चे माल का भंडार अपने पास रखता था। दरोगा उसे कारीगरों में बाँटता था और कार्य की निगरानी करता था। उसी शाखा का मुशरिफ प्रतिदिन का हिसाब रखता था, प्रतिदिन अग्रिम दिए जाने वाले धन, कच्चे माल और किए गए कार्य की प्रविष्टियाँ करके हिसाब मुस्तौफी को सौंप दिया जाता था और तहसीलदार, दरोगा और मुशरिफ इसके लिए संयुक्त रूप से उत्तरदायी होते थे।

कचहरी का दरोगा इसके एवं अन्य उच्च अधिकारियों के बीच कडी का कार्य करता था। सभी आवश्यक कागजात को प्रत्येक चरण या उनके गतव्यों तक भेजना उसी का उत्तरदायित्व था।

मीर-ए-सामान और दीवान-ए-बयूतात कारखानों के प्रबंध के लिए और सुचारू कार्य-संपादन के लिए संयुक्त रूप से उत्तरदायी होते थे किंतु इसके बावजूद अंदरूनी कामकाज और प्रक्रियागत बारीकियों से ज्ञात होता है कि मीर-ए-सामान की स्थिति विभाग के दीवान से थोड़ी ऊँची थी, किंतु दीवान को उसका मातहत नहीं कहा जा सकता था।

दोनों को ही दरबार में जाने और पादशाह के सामने अपने-अपने दायित्वों से संबंधित मामलों को रखने का अधिकार था, किंतु मीर-ए-सामान को वरीयता प्राप्त थी और उसे यह अधिकार भी था कि अपने विभाग की आवश्यकताओं को पादशाह के सामने रख सके, जबकि प्रतीत होता है कि दीवान का अधिकार पादशाह के सामने आवश्यक कागजात रखने भर तक सीमित था।

मीर-ए-सामान का ओहदा इस कारण भी दीवान से ऊँचा था कि वह फरमानों पर मुहर लगाता था। विभाग के प्रकायाँ एवं कार्यों के विभाजन से भी यही अंतर स्पष्ट होता है। सभी महत्वपूर्ण कागजात पर मीर-ए-सामान के प्रतिहस्ताक्षर आवश्यक थे। पद के अनुसार उनकी हैसियत के सम्बन्ध में अकबर के काल में बहुत कम जानकारी मिलती है, किंतु जहाँगीर और शाहजहाँ दोनों के समय में मीर-ए-सामान पद और हैसियत में निश्चित रूप से दीवान से ऊँचा था।

कारखानों की वित्तीय आवश्यकताओं का विवरण मीर-ए-सामान अर्धवार्षिक आधार पर तैयार करता था और उसे पादशाह की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत करता था। शाही स्वीकृति एक फरमान के रूप में मिलती थी जिसे बरत/बारात कहते थे। रोकड़, बाकी, भंडारों में वस्तुओं की मात्रा की संख्या, उत्पादन की प्रक्रिया में विभिन्न कार्य, उन पर होने वाले व्यय, इन सब का लेखा लेखाकारों को रखना होता था, जो समय-समय पर पादशाह के सामने परीक्षण के लिए रखा जाता था। इसी लेखे में अचानक आ पड़ने वाले व्यय की स्वीकृति के लिए भी व्यवस्था होती थी जो अर्धवार्षिक बजट में पहले स्वीकृत न हुआ हो। ऐसे अवसरों पर पादशाह अपनी रुचि की किसी भी वस्तु के निर्माण की आज्ञा देता था और अन्य विभागों द्वारा या शहजादे और अमीरों द्वारा दी गई आज्ञाओं पर भी स्वीकृति देता था और कारखानों के लेखा विभाग द्वारा वस्तुओं के निर्धारित मूल्यों का अनुमोदन भी करता था।

पादशाह की आज्ञा यह भी होती थी कि राजधानी के प्रांतीय कारखानों में निर्मित बहुमूल्य एवं कलात्मक वस्तुओं को दीवान-ए-आम में उसके सामने पेश किया जाए और प्रदर्शित वस्तु के साथ उसे बनाने वाले कारीगर को भी। युद्ध के शस्त्रास्त्र, विलास या उपभोग की वस्तुएँ ऐसी थीं जो अपने महत्व या कारीगरी के कारण पादशाह की रुचि का विषय हो सकती थीं सामने पेश की जाती थीं। इस व्यवस्था से पादशाह को अपने कारीगरों को व्यक्तिगत रूप से जानने का अवसर मिलता था, ताकि वे सरकारी नौकरी पा सके और पादशाह के सामने पेश होने का फ़ख्र हासिल कर जिसे वे सबसे बड़ा सम्मान समझते थे। इस प्रकार प्रत्येक उपलब्धि का केवल विभाग और इसके उच्चाधिकारियों को ही नहीं अपितु कारीगरों को मिलता था। कभी-कभी तो इन्हें मौलिक नमूनों, श्रेष्ठ काम और अनूठी कारीगरी के लिए इनामो-इकराम से मालामाल कर दिया जाता था।

केंद्रीय सरकार की कारखानों की इस व्यवस्था से न केवल उचित मूल्यों पर राज्य की आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी अपितु इससे देश के विभिन्न भागों के उद्योगों को प्रोत्साहन मिलता था। इन कारखानों की सुधरी हुई कार्य-पद्धति एवं यहाँ निर्मित वस्तुओं को स्थानीय कारीगर अपना आदर्श बनाते थे।

लोगों के आर्थिक जीवन पर इन कारखानों का जो प्रभाव पड़ा उसे नगण्य नहीं का जा सकता। शाही कर्मशालाओं में उत्पादन की श्रेष्ठता के मानक स्थापित होते थे जिनकी नकल की जाती थी। इस प्रकार अन्य कारीगरों की कारीगरी में भी सुधार होता था। शाही कर्मशालाओं में कार्य करने वाले कारीगर बड़ी लगन और मेहनत से कार्य करते थे ताकि वे पादशाह से प्रशंसा और इनाम प्राप्त कर सके।

सोने और चाँदी के काम, ताँबे के पात्र बनाने, कपड़ा और कालीन उद्योग, लुगदी और हाथीदाँत के काम में जो मानक मुगल काल में स्थापित हुए उनकी मिसाल नहीं मिलती। इनमें से कुछ शिल्प तो समाप्त ही हो गया है। ढाका की पारदर्शी मलमल और कश्मीर के हल्के-फुल्के शालों को बनाने का रहस्य सदा के लिए लुप्त हो गया। मुगल काल के थोडे बहुत अवशेषों से ही इन वस्तुओं की सुंदरता का अनुमान लगाया जा सकता है। विदेशी शासन के काम आने वाली अराजकता ने परंपराओं को नष्ट कर दिया। जीवन का आर्थिक ढर्रा ही बदल गया। कोई प्रोत्साहन देने वाला न रहा और बाहर से आने वाली अनुचित प्रतिस्पर्धा ने परंपराओं को नष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, तथापि मुगल काल में ये हस्तशिल्प देश की अर्थव्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण थे और शाही घराने से जुड़ी कर्मशालाओं ने इनके पोषण में बड़ा योगदान किया। कई अन्य क्षेत्रों में भी कारखानों का बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा। शाही फल भंडार, फलों की सुधरी किस्मों की खेती को प्रोत्साहन देता था, शाही बागीचों में फलों की किस्में सुधारने और विदेशों से नई किस्में मंगाकर अपने यहाँ उगाने के प्रयास निरन्तर होते रहते थे, शाही कुतुब खानों में सर्वोत्तम सुलेखकारों और चित्रकारों को नियुक्त किया जाता था। इस प्रकार इन कलाओं और जिल्द बाँधने की कला में नए-नए प्रयोग किए गए।

कारीगर सरकारी कारखानों में कार्य पाने को बड़े लालायित रहते थे। इसका सबसे बड़ा कारण यह थ की अपने बलबूते पर कम करने वालों की स्थिति बड़ी दयनीय रहती थी। मजदूर की अच्छी स्थिति नहीं थी और न ही देहस के सच्चे आर्ह्तिक विकास में सहायक। राजधानी, जो की देश का सबसे बड़ा एवं समृद्ध नगर था, एक भी ऐसा निजी कारखाना या कर्मशाला नहीं थी जिनका प्रबंध कुशल शिल्पी स्वयं करते हों। बर्नियर की टिप्पणी उचित ही है- यदि कारीगरों और उत्पादकों को प्रोत्साहन दिया जाए तो उपयोगी कलाएं और ललित कलाएं फले-फुलेंगी, किन्तु ये अभागे तो तिरस्कृत हैं, इनके साथ बड़ा रुखा रुखा व्यवहार किया जाता है और इन्हें इनके काम का उचित पारिश्रमिक भी नहीं दिया जाता अमीरों को प्रत्येक वस्तु सस्ती दर पर मिलती है। जब किसी उमरा या मनसबदार को किसी कारीगर की आवश्यकता होती है तो वह उसे बाजार से बलपूर्वक बुला भेजता है। उसे कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है औए जब कार्य पूरा हो जाता है, तो हृदयहीन मालिक उसे श्रम के हिसाब से नहीं अपनी इच्छानुसार थोड़ा बहुत पारिश्रमिक दे देता है। कारीगर तो इसी में खैर मनाता है कि उसे मजदूरी के बदले कोड़े नहीं खाने पड़े…….। फिर ऐसी आशा कैसे की जा सकती है कि कारीगर या उत्पादक प्रतिस्पर्धा की भावना से प्रेरित हो…….। केवल वे ही कारीगर अपनी कला के क्षेत्र में कुछ नाम कमा सकते हैं जो या तो पादशाह या किसी बड़े उमरा की सेवा में हों और केवल अपने आश्रयदाता के लिए कार्य करते हों। इस कारण कारीगर यही अच्छा समझते थे कि वे किसी सरकारी कारखाने में नौकरी पा जाएँ ताकि कार्य के अनुसार, दैनिक या मासिक आय सुनिश्चित हो और उन्हें अपने श्रम का उचित पारिश्रमिक मिल सके। जबाबित-ए-आलमगीरी के अनुसार सत्रहवीं शती के अंत तक शाही कारखानों की संख्या 69 थी किन्तु अठारहवीं शती के मध्य शकीर खान के संस्मरणों के अनुसार केवल 36 ही रह गई थी। इससे ज्ञात होता है कि मुगल साम्राज्य के उत्तरार्ध में कारखानों में गिरावट आ गई थी। ये 18वीं शती के आठवें दशक तक चलते रहे।

कारखानों ने शहरी जीवन और गाँवों एवं कस्बों के सम्बन्धों को पर्याप्त रूप से प्रभावित किया। ये श्रमिकों की गाँवों से शहर की ओर गतिशीलता में सहायक हुए। ग्रामीण क्षेत्रों के जाने माने कारीगरों को स्वेच्छा से या बलपूर्वक राज्य के कारखानों में लाया जाता था (जैसा कि दक्षिण में औरंगजेब के काल में मसुलीपतनम नगर के कपडा छपाई करने वालों के साथ हुआ था)। इस प्रकार अपने व्यवसाय में विशेष योग्यता के कारण कारीगरों को हैसियत मिलती थी। इसके अतिरिक्त कारखानों ने जातियों एवं शिल्प संघों के संघटन को सुदृढ़ किया।

शिल्पकला की दृष्टि से अट्टालिकाओं के निर्माण में स्वाभाविक रूप से संगतराशों, शिल्पियों और बढ़ईयों को प्रोत्साहन दिया, साथ ही यह एक मध्यवर्ग का भी उद्यम होने लगा जिसमें दुकानदार, व्यापारी, दलाल, जहाज बनाने वाले जैसे वर्ग सम्मिलित थे। पेलसर्ट का कहना है कि- कर्मकार की तुलना में दुकानदार को अधिक आदर की दृष्टि से देखा जाता है क्योंकि उनमें से कुछ अच्छे खाते-पीते भी हैं किन्तु वे इस तथ्य को प्रकट नहीं होने देते। प्रांतीय गवर्नर और अमीर भी स्थानीय कारीगरों और कर्मकारों को बढ़ावा देते थे…..या तो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के देने के लिए या अपने से बड़े लोगों को उपहार देने के लिए।

कारीगरों की आर्थिक स्थिति के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। इस सम्बन्ध में कुछ छुट-पुट जानकारी बाबर के संस्मरणों, आइन-ए-अकबरी और विदेशी यात्रियों की टिप्पणियों में मिलती है, किन्तु तत्कालीन विवरणों में इसका कोई क्रमबद्ध वर्णन नहीं मिलता। अपने संस्मरणों में बाबर हर तरह के असंख्य कर्मकारों का उल्लेख करता है। उसके अनुसार, विभिन्न शिल्पों और उद्योगों में असंख्य कारीगरों का होना हिन्दुस्तान में लाभप्रद था। अबुल फजल उस्तादों और कारीगरों के देश में बसने की बात कहता है। वह विभिन्न श्रेणी के कुशल और अकुशल श्रमिकों के पारिश्रमिक का भी उल्लेख करता है। दिल्ली में कुशल शिल्पियों की कोई अपनी स्वतंत्र कर्मशाला नहीं थी। अधिकांश कारीगर राजकीय कारखानों में नौकरी पा जाने पर अपने आपको भाग्यवान समझते थे। प्रतीत होता है कि राजकीय कारखानों की व्यवस्था के अंतर्गत कारीगर स्वतंत्रता के बदले सुरक्षा पाते थे। उन्हें दिन भर सामान्य श्रमिकों की भाँति कडी निगरानी में और निरीक्षक के निर्देशों पर काम करना पड़ता था, जैसा कि पेलसर्ट और डीलायट के विवरण में इस बात का उल्लेख है कि एक यूरोपीय कर्मकार तीन या चार भारतीय कर्मकारों के बराबर कार्य करता है, दो सम्भावनों को दर्शाता है…….या तो भारतीय कर्मकार बहुत सुस्त थे या यहाँ की विशेषत: अत्यन्त बढ़ी-चढ़ी थी। सत्रहवीं शती में कारीगरों के निजी कारखानों के अभाव का कारण प्रतिभा का अभाव नहीं था, जैसा कि बर्नियर का कथन है इंडीज के हर भाग में कुशल लोग थे। कारीगरों के सामने अनेक गम्भीर समस्याएँ थीं…….सबसे बड़ी तो यह कि उनका पारिश्रमिक बहुत कम था। पेलसार्ट जो कि आगरा में डच कारखाने का प्रमुख था, अपने सात वर्षों (1620-1627) के अनुभव के आधार पर कहता है कि तीन वर्गों के लोग ऐसे थे जो नाम के लिए तो स्वतंत्र थे किन्तु जिनकी हैसियत वस्तुतः स्वैच्छिक दासता से अधिक भिन्न नहीं थी-कर्मकार, सेवक और छोटे दुकानदार। इनमें भी कर्मकार दोहरे अभिशप्त थे……स्वर्णकार, चित्रकार, कशीदाकार, कालीन बनाने वाले इत्यादि ——-एक तो इनका पारिश्रमिक बहुत कम था, सुबह से रात तक कार्य करने पर केवल 5 या 6 टके या 5 रुपया ही कमा सकते थे। इसकी पुष्टि डीलायट एवं अन्य विदेशी यात्रियों ने भी की है। सत्रहवीं शती में श्रमिकों की स्थिति का अनुमान आइन-ए-अकबरी में दी गई दैनिक पारिश्रमिक की दर से लगाया जा सकता है। मोरलैंड ने आधुनिक मुद्रा (1920) से इसका मिलान किया है- आम मजदूरों को 2 दाम/5आने, थोडे ऊँचे कर्मकारों को 3-4 दाम/8.5 आने, बढ़इयों को 3-7 दाम/8.5 आने-1.5 रुपये, दरबार के गुलामों (निम्म श्रेणी) को बारह आने प्रतिमाह मिलता था। किन्तु महत्व पारिश्रमिक रूप में मिलने वाले पैसे का नहीं अपितु उसकी क्रयशक्ति का था…….जो अनिवार्यतः जीवन स्तर से जुड़ी थी। यूरोपीय कारखानों के अभिलेखों और विदेशी यात्रियों के विवरणों से ज्ञात होता है कि मुगलकालीन भारत में कुशल और अकुशल श्रमिकों पर किस हद तक सरकारी और गैर-सरकारी दबाव थे। पेलसर्ट लिखता है दूसरा (अभिशाप) था गवर्नर, अमीरों, कोतवाल, बक्शी और अन्य सरकारी अधिकारियों द्वारा किया जाने वाला अत्याचार। जब कभी इनमें से किसी को, किसी कर्मकार की सेवाओं की आवश्यकता होती थी तो उससे यह नहीं पूछा जाता था कि वह काम करना चाहता है या नहीं, उसे घर या बाजार से पकड़ कर मंगाया जाता था और यदि वह विरोध करने का प्रयास करता तो उसकी पिटाई की जाती थी और काम करवाने के बाद शाम को आधी मजदूरी या कुछ भी देकर भगा दिया जाता था। मसुलीपतनम के दक्ष कपड़ा छपाई करने वाले कारीगरों को दिल्ली या आगरा में आकर कार्य करने के लिए बाध्य करना लगभग जबरन काम करवाने का एक उदाहरण है। गुजरात प्रान्त के गाँवों और शहरों के कारीगरों को सरकारी अधिकारियों द्वारा जबरन काम लेने से कितना कष्ट होता था इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि इसे समाप्त करने के लिए 1665 में औरंगजेब को एक फरमान निकालना पडा।

कुछ यूरोपीय कपनियाँ न केवल दास श्रमिक ही रखती थीं अपितु जबरन श्रम करवाने जैसे हथकडों का प्रयोग भी करती थीं। एक और बात जो कर्मकारों के विरुद्ध जाती थी वह थी दलाली। मैंडेल्सलो (1638) के अनुसार कारीगरों को अपने लाभांश का पर्याप्त भाग दलालों को देना पड़ता था क्योंकि उपभोक्ता और कारीगर के बीच अनेक स्तरों पर दलाल होते थे। इस बात की पुष्टि बर्नियन ने भी की है- वह धनवान् तो कभी हो नहीं सकता और पेट की भूख मिटाना और मोटे-मोटे कपड़ों से तन ढक सकने का प्रबन्ध कर लेना भी उसके लिए बड़ी बात है। पैसा किसी को मिलता है तो व्यापारी को, कर्मकार को नहीं।

ऐसी परिस्थिति में कारीगरों में गैर-आर्थिक रवैये का होना स्वाभाविक ही था। अधिकांश जनता गरीब थी। अत: उसके बीच उत्तम कारीगरी की वस्तुओं की माँग का तो प्रश्न ही नहीं था। उसको जीवन-यापन के लिए सस्ती वस्तुओं की आवश्यकता थी। दमन के भय से लोग अपना थोड़ा बहुत धन भी छिपाते थे और निम्न कोटि का जीवन बिताने के आदि हो गए थे। आम जनता का निम्नस्तरीय जीवन (जिसकी पुष्टि पेलसर्ट, डीलायट एवं अन्य लेखकों ने की है) और कारीगरों का गैर-आर्थिक दृष्टिकोण कार्य-कारण रूप में परस्पर जुड़े हुए थे। अत: आर्थिक स्तर को ऊँचा उठाने के उद्देश्य से अतिरिक्त काम करने के लिए कोई अभिप्रेरणा नहीं थी।

आकांक्षाओं के अभाव के आशिक कारण हिन्दू और मुसलमानों दोनों में ही, श्रम का विभाजन और कड़े जाति-सम्बन्धी नियम भी थे। पेलसर्ट, डीलायट और बर्नियर इसकी पुष्टि करते हैं। जाति का शिकंजा इतना कठोर था कि व्यक्ति या समूहों को आर्थिक गतिशीलता की छूट नहीं थी। श्रमिकों की गतिशीलता भी अत्यन्त सीमित थी। मुगलकालीन भारत में कारीगरों की कुछ भी गतिशीलता नहीं थी क्योंकि इसके लिए व्यापारिक लाभ का कोई प्रोत्साहन नहीं था।

कच्चे माल की कीमत अधिक होती थी और कर्मकार के पास इतनी पूँजी नहीं होती थी कि स्वयं अपना काम आरम्भ कर सके। उसे दलालों या महाजनों पर आश्रित रहना पड़ता था। जिससे शोषण को बढ़ावा मिलता था। कभी-कभी अकबर, जहाँगीर और औरंगजेब द्वारा करों को माफ या कम करने के उल्लेख मिलते हैं। अकबर ने अनेक प्रकार के करों में छूट देकर कर्मकारों को राहत पहुँचाने का प्रयास किया, उदाहरण के लिए चमड़ा बनाने और चूना उत्पादन जैसे विशिष्ट उद्योगों पर। मीरात-ए-अहमदी में उल्लेख मिलता है कि औरंगजेब ने कारीगरों पर लगने वाले विभिन्न प्रकार के लाइसेंस करों को समाप्त किया। इसके पूर्व कारीगरों को अनेक प्रकार के कर देने पड़ते थे जिससे उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित होती थी।

ऐसी विषम परिस्थितियों में अनेक शिल्पी ऊँचे मानदंड स्थापित करते थे। इस सम्बन्ध में बर्नियर का कहना है- ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ कारीगरों ने सुन्दर शिल्पों की रचना की है और ये कारीगर ऐसे हैं जिनके पास न तो अपने औजार होते हैं और न ही यह कहा जा सकता है कि उन्हें किसी उस्ताद ने प्रशिक्षण दिया है। कभी-कभी तो वे यूरोपीय वस्तुओं की इतनी नकल कर लेते हैं कि असल और नकल में भेद करना कठिन हो जाता है। अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त भारतीय कारीगर बढ़िया बंदूकें, शिकारी बंदूकें और ऐसे सुन्दर स्वर्णाभूषण बनाते हैं कि यूरोपीय स्वर्णकारों के लिए इनकी कारीगरी को मात देना सम्भव प्रतीत नहीं होता। मुझे तो इनकी चित्रकृतियाँ एवं सूक्ष्य कलाकृतियाँ प्राय: मुग्ध करती हैं, विशेष रूप से एक ढाल पर चित्रित अकबर के अभियानों को देखकर तो मैं चकित रह गया। कहा जाता है कि इसे बनाने में एक प्रसिद्ध चित्रकार को 7 वर्ष लगे। मेरे विचार से यह अनूठी कारीगरी है। भारतीय चित्रकारों की कृतियों में मुख्य दोष यह है की उसमे समानुपात का आभाव होता है और चेहरे भावशून्य होते हैं, किन्तु इन दोषों को सरलतापूर्वक दूर किया जा सकता है, बशर्ते उन्हें ऐसे गुरू मिल जाएँ जो उन्हें कला सम्बन्धी नियमों का ज्ञान करा सके। यह धारणा उचित ही है कि यदि परिस्थितियाँ अनुकूल होती तो कला का स्तर और ऊँचा हो सकता था। यह स्तर कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित न रहकर, भारतीय कला का आम स्तर हो सकता था।

वस्तुत: कारीगरों के लिए कतिपय अनुकूल परिस्थितियाँ भी थीं। सबसे महत्वपूर्ण तो यह कि उन्हें पादशाह की ओर से प्रोत्साहन मिलता था। अकबर ने अपने अमीरों की कुछ श्रेणियों को निर्देश दे रखा था कि वे विशेष प्रकार के स्थानीय कपडे ही पहनें। उसने फारस के कालीन बुनकरों को भी आगरा, फतेहपुर सीकरी और लाहौर में आकर बसने के लिए राजी किया था। इस प्रकार के प्रश्रय से देश में रेशम, कालीन और शाल उद्योगों का बड़ा विकास हुआ और इन कार्यों में लगे कारीगरों की स्थिति में भी सुधार हुआ। अकबर ने होशियार कारीगरों को गोवा भेजा ताकि वे वहाँ के तत्कालीन विभन्न कला-कौशलों की प्राप्त करें और उनके सम्बन्ध में पादशाह को बता सके। वहाँ से ज्ञान प्राप्त कर लौटने वाले कारीगरों के हुनर की तारीफ होती थी।

दूसरी अनुकूल बात थी कुछ शक्तिशाली एवं प्रभावशाली अमीर वर्ग द्वारा कारीगरों को प्रोत्साहन देना। किन्तु यह प्रतिकूल परिस्थितियों के दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं था। बर्नियर का कथन है कि कलात्मक हस्तशिल्पों का पतन दो कारणों से धीमा रहा- एक तो शाही कर्मशालाओं के कारण और दूसरे कुछ शक्तिशाली आश्रयदाताओं के प्रभाव के कारण, जो कारीगरों को अपेक्षाकृत अधिक पारिश्रमिक दिलाने में सहायक हुआ। इसकी पुष्टि अन्य लेखकों ने भी की है।

शाही कर्मशालाएँ प्रतिभा का प्रसार करने एवं देश के सांस्कृतिक स्तर को ऊँचा उठाने में सहायक सिद्ध हुई। सभी दक्ष और प्रशिक्षित कारीगरों या नवशिक्षुओं जैसे कि चित्रकार एवं संगीतज्ञ को इन कर्मशालाओं में स्थान नहीं मिलता था। बचे हुए लोगों को अमीर और राजा अपने पास रख लेते थे। इससे कला एवं शिल्प को बढ़ावा मिलता था।

कुल मिलाकर सोलहवीं और सत्रहवीं शती के सूत्रों में तत्कालीन शिल्पियों, कारीगरों और औद्योगिक कर्मकारों की स्थिति को खराब चित्रित किया गया है। मोरलैंड के अनुसार सत्रहवीं शती के मध्य में इन लोगों की स्थिति खराब थी। ये मुख्य रूप से व्यापारियों, खरीदारों और दलालों के फायदे के लिए काम करते थे और अपने रोजमर्रा के खर्चे के लिए उन पर आश्रित रहते थे। आड़े वक्त के लिए उनके पास कुछ भी नहीं रहता था। उनकी एकमात्र आशा थी कि कोई शक्तिशाली एवं धनी आश्रयदाता उन्हें प्रश्रय दे दे। किन्तु ऐसा सुअवसर कुछ ही भाग्यशालियों को मिल पाता था। अधिकांश कर्मकार तो बडी कठिनाई से जीवनयापन के साधन जुटा पाते थे।

मुगल काल में कला, चित्रकला एवं संगीत

भारत में चित्रकला का विकास हुमायूँ के शासन-काल में प्रारंभ हुआ। शेरशाह से पराजित होने के बाद जब वह ईरान में निवास – तारीख-ए-खानदानी तैमुरिया की पाण्डुलिपि को चित्रित करने के लिए इरानी चित्रकारों की सेवा प्राप्त की। ये चित्रकार मीर सैयद अली सिराजी और ख्वाजा अब्दुल समद तबरीजी थे। सिराजी एवं तबरिजी का निर्णायक रूप से पडा। भारतीय चित्रकार अधिकतर धार्मिक विषयों का चित्रण करते थे। जबकि इरानी चित्रकारों ने राजदरबारों के जीवन, युद्ध के दृश्य आदि का चित्रण किया। सल्तनत काल से ही भारत में कागज का प्रयोग लोकप्रिय होने लगा था।

अकबर के समय चित्रकला- मीर सैयद अली और ख्वाजा अब्दुस समद अकबर के दरबार में थे। अबुल फजल के अनुसार अकबर ने उन्हें सीरीन-ए-कलम की उपाधि दी। अकबर के समय सबसे बड़ी योजना हम्जानामा का चित्रण 1562 ई. में प्रारंभ हुआ। इसे ही दास्तान-ए-अमीर-हम्जा कहा जाता है। इसमें अकबर के यौवन काल का सजीव चित्रण है। अबुल फजल, बदायूंनी और शाहनवाज खाँ का मानना है कि इसके चित्रण का कार्य अकबर की प्रेरणा से प्रारंभ हुआ और सबसे पहले मीर सैयद अली के मार्ग निर्देशन में यह प्रारंभ हुआ। फिर इसे ख्वाजा अब्दुससमद के निर्देशन में पूरा किया गया। मुल्ला दाउद कजवीनी का मानना है कि हम्जानामा हुमायूँ की मस्तिष्क की उपज था और यह मीर सैयद अली के मार्ग निर्देशन में संपन्न हुआ। अबुल फजल के अनुसार अकबर के तस्वीरखाना में 17 कलाकार थे परंतु वास्तविक संख्या अधिक भी हो सकती है। इनमें हिन्दुओं की संख्या अधिक थी। इनमें से कुछ हैं- दसबंत, बसाबन, केशव लाल, मुकुंद, मिशिकन, फारूख, कलमक, माधो, जगन, महेश, हेमकरन, तारा, साबल, हरिवंश, राम आदि।

इस काल में चित्रकारी सामूहिक प्रयास था। एक से अधिक कलाकार मिलकर किसी चित्र का निर्माण करते थे। कलाकार नकद वेतन प्राप्त कर्मचारी थे। अकबर के समय चित्रकला के मुख्य रूप से दो विषय थे- 1. दरबार की प्रतिदिन की घटनाओं का चित्रण 2. छवि चित्रण।

अकबर के समय में ही मुगलं चित्रकला पर भारतीय प्रभाव गहरा हो गया। 1562 ई. में जब मुगल दरबार में तानसेन के आगमन का प्रसिद्ध चित्र बनाया गया, हिन्दू एवं फारसी पद्धति का सहयोग दिखने लगा। फतेहपुर सिकरी के दीवारों पर हिन्दू एवं मुसलमान दोनों कलाकारों के संयुक्त परिश्रम से चित्रकारी की गयी। अकबर के दरबार में अब्दुसमद, फरुख बेग, खुसरो कुली एवं जमशेद विदेशी कलाकार थे। अकबर कहा करता था कि मुझे प्रतीत होता है कि मानो चित्रकार को ईश्वर को पहचानने का एकदम विचित्र साधन होता है। अकबर के समय दसबत अपने समय का पहला अग्रणी चित्रकार था। वह एक कहास् का बेटा था। उसने रज्मनामा का चित्रण किया। बाद में वह विक्षिप्त हो गया और 1584 ई. में उसने आत्महत्या कर ली। अब्दुस समद का दरबारी पुत्र मुहम्मद शरीफ ने रज्मनामा का पर्यवेक्षण किया। अकबर के समय कुछ महत्त्वपूर्ण कृतियों की पांडुलिपि तैयार की गयी जो निम्नलिखित है- रामायण, अकबरनामा, अनबर सुहाय, बाबरनामा, खम्सा, तारीख-ए-अल्फी, कालियादमन। इस काल में विशेष कर राजपूत चित्रकला ने मुगल चित्रशैली को प्रभावित किया। इसकी विशेषता चौड़े ब्रश की जगह गोल ब्रश का प्रयोग थी। इसके साथ गहरे नीले  रंग एवं गहरे लाल रंग का अधिक प्रयोग होने लगा। अकबर के शासनकाल में यूरोपीय चित्रकला का प्रभाव भी मुगल चित्रकला शैली पर पड़ा था। यूरोपीय चित्रकला के कुछ नमूने पूर्तगालियों के माध्यम से अकबर के दरबार में पहुँचे। इससे मुगल चित्रकारों ने दो विशेषताएँ ग्रहण कीं- 1. व्यक्ति विशेष का चित्रण 2. दृश्य में आगे दिखने वाली वस्तुओं को छोटे आकार में बनाना (Technique of Foreshortening).

सलीम– शाहजादा सलीम ने आगा रेजा नामक एक हेराती प्रवासी चित्रकार के नेतृत्व में आगरा में एक चित्रणशाला प्रारंभ की।

जहाँगीर– जहाँगीर का शासनकाल मुगल चित्रकला के चर्मोत्कर्ष का युग था। जहाँगीर के काल में चित्रकला की दो महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ थीं-

1. मोरक्का के रूप में 2. डेकोरेटेड मार्जिन।

जहाँगीर के समय छवि-चित्रण की तुलना में पांडुलिपि के चित्रण का महत्त्व कम हो गया। जहाँगीर की चित्रकला में दो नए तत्व जुड़ गए- 1. इसकी चित्रकला शैली में रूपवादी शैली की प्रधानता है। 2. इसने चित्रकला को यथार्थवादी बनाने और चित्रण करने का प्रयास किया।

इस काल के चित्रों में चौड़े हासिए का प्रयोग हुआ। जिन्हें फूल-पत्तियों, पेड़-पौधों और मनुष्यों की आकृतियों से अलंकृत किया जाता था। शिकार, युद्ध तथा राजदरबार के दृश्यों को चित्रित करने के अतिरिक्त जहाँगीर के काल में जानवरों के चित्र बनाने की कला अधिक विकसित हुई। इस क्षेत्र में उस्ताद मंसूर का बहुत नाम था। तुजुक-ए-जहाँगीरी ही एकमात्र पांडुलिपि चित्र का उदाहरण है। जहाँगीर के काल से ही राजा के दैवी अधिकार के सिद्धांतों को चित्रकला का विषय बनाया गया। शाहजहाँ के काल में यह और भी महत्त्वपूर्ण हो गया। जहाँगीर के दरबार में फारसी चित्रकार आगा रेजा, अबुल हसन, मुहम्मद नादिर, मुहम्मद मुराद और उस्ताद मंसूर थे। हिन्दू चित्रकारों में बिशनदास और गोवर्द्धन प्रमुख थे। जहाँगीर के दरबार में चित्रकार दोलत था जिसने बादशाह के आदेश पर अपने साथी चित्रकारों का चित्र तैयार किया। जहाँगीर ने बिशनदास को इरान के दरबार में भेजा था और उससे कहा गया था कि वह फारस के शाह और उसके महत्त्वपूर्ण अमीर और संबंधियों के चित्र उतार कर लाएं। उस्ताद मंसूर तथा अबुल हसन की विशेषता की तारीफ करते हुए उन दोनों को क्रमश: नादिर-उल-असर और नादिर-उज-जमाँ की उपाधि दी गयी।

आरंभ में मनोहर, नन्हा तथा फारूख बेग को छवि चित्र तैयार करने का काम सौंपा गया। तुजुक-ए-जहाँगीरी में मनोहर का नाम नहीं मिलता है। जहाँगीर के काल के एक चित्र में ईरान के शाह अब्बास का स्वागत करते हुए तथा गले लगाते हुए जहाँगीर को दिखाया गया है और पैरों के नीचे एक ग्लोब है परंतु वास्तविकता यह है कि जहाँगीर शाह अब्बास से कभी नहीं मिला था। उसी तरह जहाँगीर के कट्टर शत्रु मलिक अम्बर के कटे सिर पर जहाँगीर को पैर मारते हुए दिखाया गया है जबकि जहाँगीर उसे युद्ध में हरा नहीं पाया था। मनोहर, बिशनदास और मंसूर ये सभी अकबर के शासनकाल के अंतिम वर्षों में आ चुके थे। मनोहर, बसाबन का पुत्र था। जहाँगीर के समय यूरोपीय चित्रकला का प्रभाव और भी गहरा हो गया। यूरोपीय चित्रकला के प्रभाव में जहाँगीर के चित्रकारों ने निम्नलिखित विषय चुने-

1. यीशु का जन्म 2. कुमारी मरीयम और शिशु  3. विभिन्न संतों के शहीद होने का चित्र 4. प्रभामंडल 5. पंख वाले देवदूत 6. गरजते बादल।

किंतु मुगल चित्रकारों ने तैल चित्रकला को नहीं अपनाया। जहाँगीर स्वयं चित्रकला का अच्छा पारखी था। उसने तुजुक-ए-जहाँगीरी में लिखा है कि मैं चित्र देखकर ही बता सकता हूँ कि इसे किसने बनाया है। इसके अलग-अलग हिस्से को किस-किस चित्रकार ने बनाया है। एक बार जहाँगीर के आग्रह पर सर टॉमस रो द्वारा लाए गए चित्र का हुबहू उसके दरबारी चित्रकारों ने बना दिया। इतना तक कि सर टॉमस रो भी मूल चित्र को नहीं पहचान सका।

शाहजहाँ और औरंगजेब- शाहजहाँ के समय चित्रकला में वह सजीवता नहीं है जो जहाँगीर के समय थी। इसमें अलंकरण पर बहुत बल दिया गया है और रंगों के बदले सोने की सजावट पर अधिक बल दिया गया है और औरंगजेब के समय तो चित्रकला का अवसान ही हो गया।

राजस्थानी चित्रकला- मेवाड़, आमेर, बूंदी, गुजरात, जोधपुर, मालवा आदि राजस्थानी चित्रकला के महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे। राजस्थानी चित्रकला में प्रकृति चित्रण को महत्त्वपूर्ण माना गया है। गीत गाते पंछी और उछलते कूदते पशु चित्रकला के लोकप्रिय विषय थे। मेवाड़ का निथारदीन घराना राजस्थानी समूह का प्राचीनतम स्कूल है। जोधपुर और नागोर स्कूल की विशेषता यह थी कि इनमें मनुष्य की आँखें, मछली की आँख की तरह बनायी जाती थी। दूसरी तरफ किशनगढ़ स्कूल अधिक गीतात्मक और संवेदनशील है। इसे प्रारंभ करने का श्रेय महाराजा सावंत सिंह को है। 10वीं सदी के उत्तरार्द्ध में कांगड़ा स्कूल के द्वारा, जिसकी एक शाखा टिहरी गहड़वाल स्कूल थी, अत्यंत सुंदर चित्र बनाये गये और 19वीं सदी के प्रारंभ में यह पंजाबी और सिक्ख चित्रकला के रूप में विकसित हुआ।

कांगड़ा शैली का सबसे कुशल चित्रकार भोलाराम था। वह गढ़वाल का था। भोला राव का रंगों का प्रयोग बहुत ही सुन्दर है और पशुओं, पेड़-पौधों आदि के उसके चित्र अपनी सुस्पष्ट प्राचीन परम्पराओं के बावजूद कूंची के बारीक कान और सौन्दर्य के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। उसके रात्रि के चित्र विशेष रूप से सुन्दर हैं।

संगीत कला

अबुल फजल के अनुसार अकबर के दरबार में 36 गायक थे जिनमें सबसे प्रमुख तानसेन एवं बाजबहादुर थे। तानसेन ध्रुपद गायक था। उसके प्रारंभिक गुरु मुहम्मद गौस थे। फिर उसने स्वामी हरीदास से संगीत की शिक्षा पायी थी। उसने रूद्रवीणा नामक वाद्ययंत्र की खोज की। साथ ही उसने मियाँ की मल्हारमियाँ की तोड़ीदरबारी कान्हीर आदि रागों का अविष्कार किया। तानसेन का प्रारंभिक नाम रामतनु पाण्डेय था। तानसेन के विषय में अबुल फज़ल ने लिखा है, उसके समान गायक पिछले हजार वर्षों में भी भारत में नहीं हुआ।

शाहजहाँ स्वयं एक अच्छा गायक था। इसके दरबार में तानसेन के दामाद लाल खाँ और तानसेन के पुत्र विलास खाँ रहते थे। उसके दरबार में सुख सेन और पंडित जगन्नाथ भी रहते थे। शाहजहाँ ने लाल खाँ को गुणसमुद्र एवं पंडित जगन्नाथ को महाकवि राय की उपाधि दी।

मुगल काल में स्थापत्य कला

साहित्य एवं धर्म के समान कला में भी मुगलकाल पूर्णत: नवीनता और पुनर्जागरण का युग नहीं था, बल्कि उन प्रक्रियाओं का विस्तार और चरम परिणति था, जो पिछले तुर्क-अफगान-युग में आरम्भ हुई थीं। वास्तव में 1526 ई. के बाद की कला, इसके पहले के युग की कला के समान मुस्लिम तथा हिन्दू कला परंपराओं एवं तत्वों का सम्मिश्रण है।

औरंगजेब को छोड़कर, जिसकी धार्मिक कट्टरता कला के पोषण के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकी, भारत के सभी प्रारम्भिक मुगल बादशाह महान् निर्माता थे। यद्यपि बाबर का भारतीय राज्यकाल छोटा था, फिर भी वह अपने संस्मरण (आत्मकथा) में हिन्दुस्तान की भवन निर्माण कला की आलोचना करने तथा भवननिर्माण के लिए विचार करने का समय निकाल सका। कहा जाता है कि उसने भारत में मस्जिदें तथा अन्य स्मारक बनाने के लिए कुस्तुन्तुनिया से अल्बानिया के प्रसिद्ध भवननिर्माता सीनान के शिष्यों को आमंत्रित किया। श्री पसी ब्राउन लिखते हैं, यह बहुत असंभाव्य है कि इस प्रस्ताव का कभी कोई परिणाम निकला हो; क्योंकि यदि उस प्रसिद्ध स्कूल का कोई भी सदस्य मुगलों के यहाँ नौकरी कर लेता, तो बाइजैण्टाइन शैली के प्रभाव के चिन्ह दिखाई देते किन्तु ऐसा कोई चिन्ह नहीं है। बाबर ने अपने भवनों के निर्माण के लिए भारतीय संगतराशों को बहाल किया। वह स्वयं अपने संस्मरण में लिखता है कि आगरे में उसके भवनों में छः सौ अस्सी तथा सीकरी, बियाना, धौलपुर, ग्वालियर एवं किउल में उसके भवनों में लगभग पंद्रह सौ मजदूर प्रतिदिन काम करते थे। बाबर के बड़े-बड़े भवन पूर्णत: लुप्त हो चुके हैं। तीन छोटे भवन बच रहे हैं। इनमें एक पानीपत के काबुली बाग में एक स्मारक मस्जिद है (1526); दूसरा, रोहिलखंड में सम्भल नामक स्थान पर जामी मस्जिद (1526) है तथा तीसरा, आगरे के पुराने लोदी किले के भीतर एक मस्जिद है

भाग्यहीन बादशाह हुमायूँ के राज्यकाल के अर्धभग्नावस्था में केवल दो भवन शेष हैं। एक भवन आगरे की मस्जिद है। दूसरा भवन पूर्वी पंजाब के हिसार जिले के फतहाबाद में एक बड़ी और अच्छे अनुपात पर निर्मित मस्जिद है, जो फारसी ढंग के मीनाकारी किये हुए खपड़ों की सजावट के साथ लगभग 1540 ई. में बनी थी। यहाँ पर हमें यह याद रखना चाहिए कि यह फारसी, बल्कि मंगोल, पद्धति पहले-पहल भारत में हुमायूँ द्वारा नहीं लायी गयी; यह पहले से ही बहमनी राज्य में पंद्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में वर्तमान थी।

भारतीय-अफगान पुनर्जीवनकर्ता शेरशाह का छोटा शासनकाल भारतीय भवन-निर्माण-कला के इतिहास में संक्रान्ति का युग है। उसके द्वारा योजित दिल्ली में चहारदीवारियों से घिरी हुई राजधानी के, जो उसकी असामयिक मृत्यु के कारण पूरी नहीं की जा सकी, दो बचे हुए द्वार तथा पुराना किला नामक गढ़ कुछ काल तक प्रचलित भवन-पद्धति से अधिक परिष्कृत एवं कलात्मक रूप से अलंकृत भवन-पद्धति प्रदर्शित करते हैं। किला-ए-कुहना नामक मस्जिद को, जो 1545 ई. में दीवारों के भीतर बनी थी, उसके उज्ज्वल वास्तुकलात्मक गुणों के कारण, उत्तरी भारत के भवनों में उच्च स्थान देना चाहिए। शेरशाह का मकबरा, जो बिहार के शाहाबाद जिले के सहसराम नामक स्थान पर एक तालाब के बीच ऊँचे चबूतरे पर बना है, आकार एवं गौरव, दोनों दृष्टियों से भारतीय मुसलमानी निर्माण कला का चमत्कार है तथा हिन्दू एवं मुस्लिम वास्तुकलात्मक विचारों का आनंदजनक सम्मिश्रण प्रदर्शित करता है। इस प्रकार शासन में ही नहीं, बल्कि संस्कृति तथा कला में भी महान् अफगान ने महान् मुगल अकबर के लिए रास्ता तैयार कर दिया।

स्थापत्य कला

अकबर के शासनकाल में भवन-निर्माण-कला का अद्भुत विकास हुआ। बादशाह ने अपनी पहले की संपूर्णता के साथ कला के प्रत्येक ब्योरेवार विवरण का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया तथा उदार एवं समन्वयशील मन से विभिन्न साधनों से कलात्मक विचारों को ग्रहण किया। इन कलात्मक विचारों को व्यावहारिक रूप उन कुशल कारीगरों ने दिया, जिन्हें अकबर ने अपने चारों ओर एकत्रित कर रखा था। अबुल फजल उचित ही कहता है कि उसके बादशाह ने आलीशान इमारतों की योजना बनायी तथा अपने मस्तिष्क एवं हृदय की रचना को पत्थर और मिट्टी की पोशाक पहनायी। फर्गुसन ने ठीक ही कहा कि फतेहपुर सीकरी किसी महान् व्यक्ति के मस्तिष्क का प्रतिबिम्ब था।

अकबर क्रियाशीलता केवल वास्तुकला की परमोत्कृष्ट कृतियों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि उसने कुछ दुर्ग, ग्राम्य गृह, मीनारें, सराय, स्कूल, तालाब एवं कुएँ भी बनवाये। उसकी माँ जाम के एक फारसवासी शेख परिवार में उत्पन्न हुई थी, जिससे उसने विरासत में फारसी विचार पाये और वह अभी भी उनसे चिपका रहा। फिर भी हिन्दुओं के प्रति उसकी सहनशीलता, उनकी संस्कृति से सहानुभूति तथा उन्हें अपने पक्ष में करने की नीति के कारण उसने अपने बहुत-से भवनों में वास्तुकला की हिन्दू शैलियों का व्यवहार किया। इन भवनों की सजावट की विशेषताएँ हिन्दू तथा जैन मंदिरों में पायी जाने वाली सजावट की विशेषताओं की अनुकृतियाँ हैं। इसकी अभिव्यक्ति निम्नांकित कला-कृतियों में देखी जा सकती है- आगरे के किले के अन्दर जहाँगीरी महल में, जिसमें वर्गाकार स्तम्भ तथा सहारे के रूप में चोटियाँ हैं एवं हिन्दू ढंग पर बनी, (पत्थर या ईंटों की) तहाँ से शून्य, छोटी मेहराबों की पत्तियाँ हैं; फतेहपुर सीकरी के, जो 1569 से लेकर 1584 ई. तक शाही राजधानी रही, बहुत-से भवनों में तथा लाहौर के किले में। पुरानी दिल्ली में हुमायूँ के प्रसिद्ध मकबरे तक में, जो 1569 ई. के आरम्भ में तैयार हुआ था तथा जो साधारणतः पारसी कला के प्रभावों को प्रदर्शित करता हुआ समझा जाता है, कब्र की धरातल पर की योजना भारतीय है। भवन के बाहरी भाग में उजले संगमरमर का स्वच्छन्द प्रयोग भारतीय है तथा रंग-बिरंगे खपडों की सजावट, जिसका पारसी भवन-निर्माता इतना अधिक व्यवहार करते थे, अनुपस्थित है। फतेहपुर सीकरी में बादशाह के सबसे शानदार भवन हैं- जोधाबाई का महल तथा दो अन्य रहने के भवन जो कुछ लोगों के कथनानुसार उसकी रानियों के रहने के लिए बनवाये गये थे; दीवाने-आम, जो हिन्दू शैली का था, जिसमें खम्भे पर निकली हुई बरामदे की छत थी; आश्चर्यजनक दीवाने-खास, जो योजना, बनावट एवं अलंकार में स्पष्ट रूप से भारतीय था; जामी मस्जिद नामक संगमरमर की मस्जिद, जिसका वर्णन फर्गुसन ने पत्थर में रूमानी कथा के रूप में किया है; बुलन्द दरवाजा, जो मस्जिद के दक्षिणी द्वार पर है तथा अकबर की गुजरात-विजय के स्मारक स्वरूप संगमरमर तथा बलुआ पत्थर से बनाया गया है तथा पंचमहल, जो पिरामिड के आकार का पाँच महलों का था और भारतीय बौद्ध विहारों की, जो अब तक भारत के कुछ भागों में वर्तमान है, योजना का प्रसार था। उस युग के दो अन्य उल्लेखनीय भवन हैं- इलाहाबाद में चालीस स्तम्भों का राजमहल तथा सिकन्दरा में अकबर का मकबरा। इलाहाबाद का राजमहल, जिसके निर्माण में विलियम पिंच के लेखानुसार चालीस वर्ष लगे तथा विभिन्न वगों के पाँच हजार से लेकर बीस हजार तक मजदूर लगाये गये, निश्चित रूप में भारतीय ढंग का है तथा उसमें हिन्दू स्तम्भों की पंक्तियों पर आधारितबाहर निकली हुई बरामदे की छत है। सिकन्दरा में अकबर के मकबरे के विशालकाय ढाँचे में, जिसकी योजना बादशाह के जीवन-काल में बनी थी, किन्तु जो 1605 तथा 1613 के बीच निर्मित हुआ था, पाँच चबूतरे हैं, जो सफेद संगमरमर के सबसे ऊपरी महल तक एक गुम्बजदार छत के साथ ऊपर बढ़ने में एक-के-बाद दूसरे घटते जाते हैं तथा यह समझा जाता है कि स्मारक के ऊपर एक केन्द्रीय गुम्बज बनवाने का विचार थ। इस भवन का भारतीय ढग भारत के बौद्ध विहारों से तथा संभवत: कोचीन-चीन में प्रचलित खमेर वास्तुकला से भी प्रेरित था।

जहाँगीर के शासनकाल में, उसके पिता के वास्तुकला-विषयक कार्य को ध्यान में रखते हुए, बहुत कम इमारतें बनीं किन्तु उसके समय की दो इमारतें विशेष आकर्षण की हैं। एक है अकबर का मकबरा, जिसकी खास विशेषताओं की चर्चा पहले की जा चुकी है। दूसरी है आगरे में इतिमादुद्दौला की कब्रें, जिसे उसकी पुत्री तथा जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ ने बनवाया। यह कब्र बिलकुल उजले संगमरमर की बनी हुई थी तथा संगमरमर में जडित कम मूल्य वाले पत्थरों से सजी हुई थी। इस काम का एक पहले का नमूना हम उदयपुर के गोलमण्डल मंदिर में पाते हैं (1600 ई. से)। अत: यह एक राजपूत शैली थी या सम्भवतः एक पुरानी भारतीय शैली थी।

शाहजहाँ बहुत बड़ा निर्माता था। उसके कारण बहुत- से भवन, राजमहल, किले, उद्यान तथा मस्जिदें आगरे, दिल्ली, लाहौर, काबुल, कश्मीर, कंधार, अजमेर, अहमदाबाद, मुखलिसपुर तथा अन्य स्थानों में पायी जाती हैं। यद्यपि इन इमारतों पर किये गये खर्च का पक्का अंदाज लगाना सम्भव नहीं, फिर भी इसमें सन्देह नहीं कि इन पर कई दर्जन करोड़ रुपये लगे होंगे। अकबर की इमारतों की तुलना में शाहजहाँ की इमारतें चमक-दमक एवं मौलिकता में घटिया हैं, परन्तु अति व्ययपूर्ण प्रदर्शन एवं समृद्ध और कौशलपूर्ण सजावट में वे बढ़ी हुई हैं, जिससे शाहजहाँ की वास्तुकला एक अधिक बड़े पैमाने पर रत्नो के सजाने की कला बन जाती है। यह विशेष रूप से दीवाने-आम एवं दीवाने-खास जैसे उसके दिल्ली के भवनों में देखी जा सकती हैं

शाहजहाँ के द्वारा अपनी प्रिय पत्नी मुमताजमहल की कब्र पर बनवाया गया शानदार मकबरा ताजमहल जिसके निर्माण में उस समय 50 लाख रुपए लगे थे उचित ही अपनी सुन्दरता एवं वैभव के लिए संसार का एक आश्चर्य मन जाता है। ताज की योजना बनाने वाले और इसके निर्माण करने वाले कारीगरों के विषय में स्मिथ का विचार है कि यह यूरोपीय और एशियाई प्रतिभा के सम्मिश्रण की उपज है। परन्तु मोइनुद्दीन अहमद ने इस पर आपत्ति की है तथा वे अपने विवेकपूर्ण तर्क देकर हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि दाम्पत्य प्रेम के इस महान् स्मारक की योजना या निर्माण में इटली वाले अथवा फ्रांसीसी वास्तुकारों को कोई हाथ न था। वे इसकी योजना का श्रेय उस्ताद ईसा को देते हैं। ताज का अध्ययन करते समय भारतीय कला के विद्यार्थी को कुछ बातें नहीं भूलनी चाहिएँ। प्रथमत: इसकी योजना तथा प्रमुख विशेषताएँ एकदम नयी नहीं थीं, क्योंकि शेर के मकबरे से लेकर हुमायूँ की कब्र तथा बीजापुर के स्मारकों को देखते हुए, शैली का उतार आसानी से दृष्टिगोचर होता है। यहाँ तक कि संगमरमर तथा अन्य पत्थरों में बेल-बूटे का काम तथा संगमरमर में बहुमूल्य पत्थरों के जड़ने की कला भी पहले से ही पश्चिमी भारत एवं राजपूत कला में उपस्थित थी। दूसरे, उजले संगमरमर के प्रचुर मात्रा में प्रयोग तथा भारतीय ढंग की कुछ सजावटों से पता चलता है कि शाहजहाँ की इमारतों पर पारसी प्रभाव की उतनी बहुलता नहीं थी, जितनी कि सामान्यतः सोची जाती है। तीसरे, मुगलकाल में भारत का पश्चिमी जगत् विशेष रूप से भूमध्य सागरीय क्षेत्र के साथ सम्बन्ध का ध्यान रखते हुए यह विश्वास करना ऐतिहासिक रूप से असंगत नहीं होगा कि सोलहवीं और सत्रहवीं सदियों में भारत की कला पर पश्चिमी जगत् की कला के कुछ तत्वों का प्रभाव था तथा तत्कालीन भारत के विभिन्न भागों में कुछ यूरोपीय निर्माता विद्यमान् थे।

जहाँगीर का मकबरा, जिसे शाहजहाँ ने आरम्भ में ही लाहौर में शाहदरा नामक स्थान में बनवाया था, यद्यपि ताज के समान प्रसिद्ध नहीं है, तथापि कला का एक सुन्दर नमूना है। इस राज्यकाल की दूसरी प्रसिद्ध कला की कृति थी मयूर सिंहासन (तख्ते-ताऊस)। सिंहासन सुनहले पाँवों पर एक खाट के रूप में था। मीनाकारी किया हुआ चंदवा पन्ने के बारह स्तम्भों पर आधारित था। प्रत्येक स्तम्भ पर रत्नों से जड़े दो मयूर थे। प्रत्येक जोडे पक्षियों के बीच हीरों, पन्नों, लाल मणियों तथा मोतियों से आच्छादित एक वृक्ष था। नादिरशाह इस सिंहासन को 1739 ई. में फारस ले गया परन्तु दुर्भाग्यवश अब यह इस संसार में कहीं नहीं है।

औरंगजेब के शासनकाल में भवन-निर्माण-कला की शैली का ह्रास होने लगा। यह कट्टर बादशाह प्रत्यक्ष रूप में भवन-निर्माण-कला के विरुद्ध तो था ही, तो उसने अपने पूर्वगामियों के विपरीत इसे प्रोत्साहन देना या भवनों का निर्माण करना भी बंद कर दिया। उसके राज्यकाल की जो कुछ भी इमारतें हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण थी लाहौर मस्जिद, जो 1674 ई. में पूरी हुई थी, वे पुराने आदशों की कमजोर नकल मात्र है। शीघ्र भारतीय कलाकारों की रचनात्मक प्रतिभा अधिकतर लुप्त हो गयी और अठारहवीं सदी में एवं उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में आशिक रूप में अवध तथा हैदराबाद में शेष रहीं।

उद्यान

बाबर ने आगरा में आरामबाग का निर्माण कराया। जहाँगीर के द्वारा कश्मीर की घाटी में अनेक बाग लगवाए गए जिनमें शालीमार बाग सबसे प्रमुख है। शाहजहाँ ने कश्मीर में निशात बाग एवं चश्मा-ए-शाही लगवाया। औरंगजेब ने हरियाणा में पिंजोर बाग उद्यान लगवाया।

मुगल काल में साहित्य

भारत के तैमूरी बादशाह साहित्य के पोषक थे तथा इसकी विभिन्न शाखाओं के विकास को बहुत प्रोत्साहन देते थे। अकबर के संरक्षण में बहुत-से विद्वान् हुए तथा उन्होंने दिलचस्प एवं महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। अकबर का एक समकालीन व्यक्ति माधवाचार्य, जो त्रिवेणी का एक बगाली कवि तथा चडी-मंगल का लेखक था, बादशाह की विद्या के पोषक के रूप में बहुत प्रशंसा करता है।

अकबर के शासनकाल के फारसी साहित्य को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं-

  1. ऐतिहासिक पुस्तके,
  2. अनुवाद तथा
  3. काव्य और पद्य।

उस शासनकाल की प्रमुख ऐतिहासिक पुस्तके हैं- मुल्ला दाऊद की तारीखे-अल्फी, अबुलफजल की आईने-अकबरी तथा अकबरनामा, बदायूनीं की मुख्तखाबुत्-तबारीखनिजामुद्दीन अहमद की तबकाते-अकबरीफैजी-सरहिन्दी का अकबरनामा तथा अब्दुल वाकी की मआसिरे-रहीमी जो अब्दुर्रहीम खाने-खानान के संरक्षण में संकलित हुई। उस शासनकाल का (फारसी में) सबसे योग्य लेखक अबुल फजल था, जो विद्वान्, कवि, निबन्धकार, समालोचक तथा इतिहासकार था। बादशाह की आज्ञा से संस्कृत एवं अन्य भाषाओं की बहुत-सी पुस्तकों का फारसी में अनुवाद हुआ। बहुत-से मुसलमान विद्वानों ने महाभारत के विभिन्न भागों का फारसी में अनुवाद किया तथा उनका रज्मनामा के नाम से संकलन हुआ। चार वर्षों तक परिश्रम करने के बाद बदायूनी ने 1589 ई. में रामायण का अनुवाद पूरा किया। फारसी में हाजी इब्राहिम सरहिन्दी ने अथर्ववेद का, फैजी ने गणित की एक पुस्तक लीलावती का, मुकम्मल खाँ गुजराती ने जयोतिष शास्त्र की एक पुस्तक तजक का, अबुर्रहीम खाने-खानान ने वाकियाते-बाबरी का तथा मौलाना शाह मुहम्मद शाहाबादी ने कश्मीर के इतिहास का अनुवाद किया। कुछ ग्रीक तथा अरबी पुस्तकों का भी फारसी में अनुवाद हुआ। कुछ कवियों या पद्यकारों ने अकबर के संरक्षण में अच्छी पुस्तकें लिखीं। पद्य लिखने वालों में सबसे विख्यात गिजाली था। उसके बाद अबुल फजल के भाई फैजी का स्थान आता था। अबुल फजल अनवर-ए-साहिली के नाम से पंचतंत्र को अनुदित किया। फैजी ने नल दमयन्ती की कहानी का फारसी में रूपान्तरण किया। अन्य प्रसिद्ध कवि थे- निशापुर का मुहमद हुसैन नाजिरी, जिसने बहुत अच्छी गजले लिखीं तथा शीराज का सैयद जमालुद्दीन उर्फी, जो अपने समय में कसीदों का विख्यात लेखक था।

जहाँगीर की अच्छी साहित्यिक अभिरुचि थी। उसने भी विद्वानों का पोषण किया। सामग्री और शैली की दृष्टि से उसकी आत्मकथा का बाबर की आत्मकथा के बाद ही स्थान है। उसके दरबार को सुशोभित करने वाले विद्वानों में, जिनकी एक विस्तृत सूची इकबालनामाए-जहाँगीरी में है, यहाँ हम रगियास बेग, नकीब खाँ, मुतमिद खाँ नियामतुल्ला तथा अब्दुल हक दिहलवी के नामों का उल्लेख कर सकते हैं। जहाँगीर के राज्यकाल में कुछ ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी गयीं, जिनमें मासिरे-जहाँगीरी, इकबाल-नामाए-जहाँगीरी तथा जब्दुत्-तवारीख सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं। शाहजहाँ ने विद्वानों का पोषण करने में अपने पूर्वगामियों का अनुसरण किया। उसके दरबार में बहुत-से कवियों एवं ब्रह्मज्ञानियों के अतिरिक्त कुछ प्रसिद्ध इतिहास लेखक भी थे, जिनमें हैं-पादशाहनामा का लेखक अब्दुल हमीद लाहौरी, एक अन्य पादशाहनामा का लेखक अमीनाई कजवीनी, शाहजहाँनामा का लेखक इनायत खाँ तथा अमले-सालिह का लेखक मुहम्मद सालिह मुख्य है। ये सब शाहजहाँ के राज्यकाल के इतिहास के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। शाहजादा दाराशिकोह की विद्वत्तापूर्ण पुस्तके, जिनका जिक्र पहले किया जा चुका है, फारसी साहित्य के गौरव ग्रंथ हैं। औरंगजेब एक उत्साही सुन्नी तथा मुस्लिम धर्मशास्त्र एवं न्यायशास्त्र का एक आलोचनात्मक विद्वान था। उसकी कविता के प्रति अभिरुचि नहीं थी। वह अपने राज्यकाल को इतिहास लिखवाने के विरुद्ध था। इस कारण खाफ़ी खाँ की मुन्तखाबुल्लुबाब को गुप्त रूप से लिखा जाना पड़ा। फिर भी इस प्रकार की कुछ प्रसिद्ध पुस्तके हैं, जैसे- मिर्जा मुहम्मद काजिम का आलमगीरनामा, मुहम्मद साकी का मुआसिरे-आलमगीरी, सुजान राय खत्री का खुलासत्-उत्-तवारीख, भीमसेन का नुश्क-ए-दिलकुशा तथा ईश्वरदास का फतूहात-ए-आलमगीरी

अकबर के द्वारा शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित हो गयी थी। साथ ही उस युग के धार्मिक आन्दोलनों के उदार विचारों का प्रचार सन्त उपदेशकों का एक समूह जनता की समझ में आ जाने वाली भाषा में कर रहा था। इन बातों से प्रोत्साहन पाकर जनता की प्रतिभा बहुमुखी होकर प्रस्फुटित हुई। फलस्वरूप सोलहवीं तथा सत्रहवीं सदियाँ हिन्दुस्थानी साहित्य का स्वर्णिम युग बन गयीं। 1526 ई. के बाद का प्रथम उल्लेखनीय लेखक मलिक मुहमद जायसी था। उसने 1540 ई. में पद्मावत नामक उत्तम दार्शनिक महाकाव्य लिखा, जिसमें मेवाड़ की रानी पद्मिनी की कहानी रूपक में बाँधकर दी गयी है। हिन्दी काव्य में अकबर की अत्याधिक दिलचस्पी थी तथा वह उसका पोषण करता था। इससे हिन्दी साहित्य को बहुत प्रोत्साहन मिला। बादशाह के दरबारियों में बीरबल, जिसे उसने कविप्रिय की उपाधि दी थी, एक प्रसिद्ध कवि था। राजा मानसिंह भी हिन्दी में पद्य लिखा करता था तथा विद्या का पोषक था। अकबर के मंत्रियों में सबसे प्रसिद्ध लेखक अब्दुर्रहीम खाने-खानान था, जिसके दोहे आज भी सम्पूर्ण उत्तर भारत में दिलचस्पी एवं प्रशंसा के साथ पढ़े जाते हैं। नरहरि, जिसे बादशाह ने महापात्र की उपाधि दी थी, हरीनाथ तथा गज भी उसके दरबार के उल्लेखनीय लेखक थे।

उस समय का अधिकतर काव्य-साहित्य धार्मिक था तथा कृष्णपूजा अथवा रामभक्ति की व्याख्या करता था। कृष्णपूजा के बहुत-से लेखक ब्रजभूमि में हुए, जो मोटे तौर पर यमुना घाटी है। वहाँ इसका अद्भुत विकास हुआ। बल्लभाचार्य तथा उनके पुत्र बिट्ठलनाथ के आठ शिष्य थे, जिनका सम्मिलित नाम अष्टछाप था। इनमें सबसे उल्लेखनीय थे आगरे के चक्षुहीन कवि- सूरदास। वे ब्रजभाषा में लिखते थे। उन्होंने अपने सूरसागर में कृष्ण के प्रारम्भिक जीवन की क्रीडाओं का वर्णन किया और कृष्ण एवं उनकी प्रेयसी राधा की सुन्दरता पर बहुत से पद्य रचे। इस विचारधारा के अन्य महत्वपूर्ण कवि थे रास-पंचाध्यायी के रचयिता नन्ददास, गद्यग्रथ चौरासी वैष्णवों की वार्ता के लेखक बिट्ठलनाथ, परमानन्ददास, कुम्भनदास तथा प्रेमवर्तिका के लेखक रसखनन (बिट्ठलनाथ के एक मुस्लिम शिष्य)। रामभक्ति के लेखकों में सबसे प्रसिद्ध तुलसीदास (1532-1623 ई.) थे, जो बनारस में रहते थे। यशोमन्दिर में वे पहुँच के बाहर अकेले अपने स्थान पर विराजमान हैं। वे केवल उच्च कोटि के कवि ही नहीं थे, बल्कि हिन्दुस्तान के लोगों के आध्यात्मिक गुरू भी थे। उनका नाम यहाँ घर-घर में लिया जाता है तथा लाखों मनुष्य उनकी स्मृति को अपने मानस में संजोए श्री रामचरित मानस की पंक्तियों को दुहराते रहते हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना रामचरितमानस है जिसे सर जार्ज ग्रियर्सन ने उचित ही हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों की एकमात्र बाइबिल बतलाया है। ग्राउज ने भी तुलसीदास की रामायण के अपने अनुवाद में कहा है कि उनकी पुस्तक राजमहल से लेकर झोपड़ी तक प्रत्येक व्यक्ति के हाथों में है तथा क्या ऊँच क्या नीच, क्या धनी क्या रंक, क्या युवा क्या वृद्ध, हिन्दू जाति का प्रत्येक वर्ग इसे पढ़ता, सुनता तथा इसकी प्रशंसा करता है।

इस युग में काव्यकला को क्रमबद्ध करने के प्रथम प्रयास भी हुए। केशवदास (मृत्यु 1617 ई.) जहाँगीर के समय के एक सुविख्यात कवि थे। जहाँगीर का भाई दानियाल हिन्दी का अच्छा कवि था। सुन्दर कविराय, मतिराम, बिहारी और कवीन्द्र आचार्य शाहजहाँकालीन प्रसिद्ध कवि है। जिन्होंने रीतिकालीन हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि करने में सराहनीय योगदान दिया। शाहजहाँ के दरबार के अन्य प्रसिद्ध कवि हरीनाथ, शिरोमणि मिश्र और वेदांगराय थे।

बंगाल में यह युग वैष्णव साहित्य के अद्भुत विकास के लिए प्रसिद्ध था। इसकी विभिन्न शाखाओं- जैसे कछे पद, गीत और चैतन्यदेव की जीवनियाँ- ने बंगाल के जन-गण-मन को प्रेम एवं उदारता की भावनाओं से ही नहीं भर दिया, बल्कि उस युग में इस प्रदेश के सामाजिक जीवन के दर्पण के रूप में भी वे बने रहे हैं। सबसे प्रमुख वैष्णव लेखक थे कृष्णदास कविराज (बर्दवान के झमालपुर के एक वैद्य परिवार में 1517 ई. में जन्म), जो चैतन्य चरितामृत नाम चैतन्य की सबसे महत्वपूर्ण जीवनी के लेखक थे; चैतन्य भागवत के लेखक वृन्दावन दास (1507 ई. में जन्म), जिनकी पुस्तक चैतन्य देव के जीवन पर एक उत्तम पुस्तक होने के अतिरिक्त उनके समय के बंगाली समाज के सम्बन्ध में ज्ञान का भंडार है; चैतन्यमंगल के लेखक जयानन्द (1513 ई. में जन्म) जिनकी पुस्तक जीवनचरितात्मक ग्रंथ है और चैतन्यदेव के जीवन के विषय में कुछ नयी बातें बतलाती है; त्रिलोचन दास (बर्दवान के तीस मील उत्तर कोवग्राम नामक गाँव में 1523 ई. में जन्म), जो चैतन्यमंगल नाम के ही चैतन्य देव की एक अत्यन्त लोकप्रिय जीवनी के लेखक थे तथा भक्तिरत्नाकर के लेखक नरहरि चक्रवर्ती, जिनकी पुस्तक पंद्रह परिच्छेदों में लिखी गयी चैतन्यदेव की एक विस्तृत जीवनी है तथा महत्त्व की दृष्टि से इसका स्थान कृष्णदास कविराज की रचना के बाद ही आया हुआ समझा जाता है। इस युग में महाकाव्यों और भागवत के बहुत-से अनुवाद हुए तथा चंडी देवी एवं मनसा देवी की प्रशंसा में पुस्तके रची गयीं। इन ग्रंथों में सबसे महत्वपूर्ण थे- काशीराम दास का महाभारत तथा मुकुन्दराम चक्रवर्ती का कविककण-चंडी, जिसकी लोकप्रियता आज भी बंगाल में वैसी ही है, जैसी ऊपरी भारत में तुलसीदास की प्रसिद्ध पुस्तक की। मुकुन्दराम के ग्रंथ में उसके समय के बंगाल के लोगों की सामाजिक एवं आर्थिक दशा का स्पष्ट चित्र है। यही कारण है कि प्रोफेसर कॉवेल ने उसे बंगाल का क्रैब बतलाया है तथा डाक्टर ग्रियर्सन के विचार में उसकी कविता स्कूल (किसी विशेष विचाराधारा) से नहीं, बल्कि हृदय से निकलती है तथा सच्ची कविता और वर्णनात्मक शक्ति से अलंकृत संदर्भों से भरी हुई है।

बादशाहों के पुस्तक-प्रेम के कारण पुस्तकालय स्थापित हुए, जिनमें अनगिनत बहुमूल्य हस्तलिखित ग्रंथ भरे पड़े थे। अकबर के पुस्तकालय में विशाल संग्रह था तथा पुस्तकों का भिन्न-भिन्न विषयों के अनुसार उचित रूप से वर्गीकरण किया गया था।

सुन्दर लिखावट की कला उत्तमता की अच्छी अवस्था पर थी। अकबर के दरबार के प्रसिद्ध ग्रंथकर्ताओं में, जिनकी एक सूची आईने-अकबरी में है, सबसे प्रमुख कश्मीर का मुहम्मद हुसैन था, जिसे जरीकलम की उपाधि मिली थी।

औरंगजेब के शासनकाल में राजसंरक्षण हटा लेने के कारण हिन्दी साहित्य का विकास अवरुद्ध हो गया। इस युग में उत्तरी भारत में अधिक उर्दू कविता भी नहीं लिखी गयी। किन्तु दक्कन में उर्दू पद्य के कुछ प्रसिद्ध लेखक हुए।

उत्तरकालीन मुगल शासन के गड़बड़ी के दिनों में भी साहित्यिक कार्य एकदम ठप नहीं पड़ गया। बहादुर शाह तथा मुहम्मद शाह के समान बादशाह, मुर्शिद कुली जाफर खाँ एवं अलीवर्दी खाँ के समान सुबेदार, नदिया के राजा कृष्णचन्द्र और वीरभूम के असादुल्ला के समान तथा कुछ अन्य जमींदार विद्वानों का पोषण करते थे। रामप्रसाद के भजनों को छोड़कर इस युग का साहित्य प्रायः तुच्छ भाव एवं दूषित प्रवृत्ति का होता था। इस युग में हिन्दू तथा मुसलमान दोनों में स्त्री-शिक्षा अज्ञात नहीं थी। जान मुहम्मद की, जो हिन्दू से मुसलमान बना था, दो पुत्रियाँ स्कूल भेजी गयीं तथा उन्होंने विद्या में कुछ निपुणता प्राप्त की। कोकी जिउ हस्तलिपि एवं रचना में अपने भाईयों से कहीं चढ़कर थी। बंगाल में हमें शिक्षित महिलाओं के कई उदाहरण मिलते हैं। उदारहणत: कलकत्ते में शोभाबाजार के राजा नवकृष्ण की पत्नियाँ अपनी पढ़ने की क्षमता और रुचि के लिए प्रसिद्ध थीं तथा पूर्व बंगाल की आनन्दमयी काफी प्रसिद्धि की कवियित्री थीं।

हिन्दी के साथ ही उर्दू का भी मध्ययुग में विकास हुआ। रेखता के रूप में उर्दू कविता को सबसे पहले दक्षिण में मान्यता मिली। भारतीय मुसलमानों को फारसी के रूप में अपनी मातृभाषा बनाए रखना कठिन हो गया। फलत: 18वीं शती के प्रारम्भ में भारतीय मुसलमानों के घरों और दरबारों में हिन्दवी बोली जाने लगी। इसी प्रक्रिया में उर्दू का उद्भव और विकास हुआ। रेखता में लिखित सबसे प्राचीन पुस्तक मीरातुल आशकीन एक रहस्यात्मक गद्य ग्रन्थ है। ख्वाजा बन्दानवाज गेसूदराज इस ग्रन्थ के लेखक है। इस ग्रन्थ की लिपि पारसी है। वहमनी राज्य के विघटन के पश्चात् दक्षिण के मुस्लिम सुल्तानों ने विशेषकर बीजापुर और गोलकुण्डा के सुल्तानों ने उर्दू को संरक्षण दिया। उत्तर में सम्राट् मुहम्मदशाह के दरबार में लगभग 18वीं सदी के मध्य में मान्यता मिली। मुहम्मदशाह (1718-48 ई.) प्रथम मुगल शासक था जिसने कि दक्खिन के सुविख्यात कवि समसुद्दीन वली को दरबार में अपनी कविताएँ सुनाने को आमन्त्रित कर उर्दू को प्रोत्साहन दिया था। वली 1722 ई. में दिल्ली आ गए थे। उसके पूर्व भी वे दिल्ली आ चुके थे। दिल्ली आने पर उन्होंने दक्खिनी मुहावरों के स्थान पर दिल्ली के मुहावरों का प्रयोग किया। इससे उर्दू को नया आयाम मिला। 18वीं सदी में इस परम्परा का और विकास हुआ। हातिम अबू हातिम, नाजी मजम और मजहर दिल्ली के प्रथम उर्दू कवि थे। दूसरी पीढ़ी के उर्दू कवियों में मीर तर्की, मीर ख्वाजा, मीर दर्द सौ, सोज, शदी और इंशा ने उर्दू को और अधिक परिष्कृत किया। परवर्ती शताब्दी में उर्दू विकास के पथ पर और आगे बढ़ी। कालान्तर में उर्दू सरकारी काम-काज की भाषा के रूप में स्वीकार कर ली गई। इससे उसके विकास को और प्रोत्साहन मिला।

मुगल काल में सूफी आंदोलन

इन प्रवृत्तियों के परिणामस्वरूप कुछ सूफियों ने, जैसे शेख नसिरूद्दीन महमूद चिरागे दिल्ली (मृ. 1356 ई.) ने कट्टरपंथी इस्लाम और सूफी परम्परा के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयत्न किया, जैसा कि पहले अल गजाली ने किया था और बाद में लक्शबन्दी सम्प्रदाय अन्य महासन्त दिल्ली के वहीदुल्ला (1707-62 ई.) ने किया था। बौद्धिक स्तर पर शेख अलाउद्दीन सिम्नानी (मृ. 1336 ई.) ने इब्न अल अराबी के सर्वात्यवादी सिद्धांत वहादत-उल-वुजूद का खंडन किया और उसके स्थान पर वहादत-उश-शुहूद (Unity of Witnessing) का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार सूफी रहस्यवाद की उच्च स्तरीय अनुभूति से यह प्रकट होता है कि ईश्वर और सृष्टि के बीच अंतर होता है न कि इनमें समायोजन होता है। यह विचार शरिया के विचार की पुष्टि करता है।

मुगलकाल में पूर्व की शताब्दियों की भाँति, जो शरिया की पूर्ण उपेक्षा करने के लिए विख्यात थे उन्हें अकसर मजजूब (The ecstatic ones) कहा जाता था।

कहा जाता है कि बाबर नक्शबंदी नेता ख्वाजा उबैदुल्ला अहरार और उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों का भक्त था। भारत में यह सिलसिला ख्वाजा बाकी बिल्लाह (मृ. 1603 ई.) द्वारा शुरू किया गया। उनके प्रमुख शिष्य शेख अहमद सरहिंदी (मृ. 1624 ई.) थे। शेख अहमद सरहिंदी एक ऐसे सूफी थे जो कट्टर मुसलमान होने के साथ वहादत-उल-वुजूद के सिद्धांत, गैर-सूफी मुसलमानों और हिंदुओं के विरुद्ध थे। वह नक्शबंदी सिलसिला के अनुयायी होने के साथ-साथ चिश्ती और कादिरी सिलसिलों में भी आस्था रखते थे।

शरिया को महत्त्व देने के कारण सरहिंदी वहादत-उल-वुजूद के उस सर्वात्यवादी सिद्धांत के विरुद्ध थे जिसका प्रतिपादन इब्न अल अराबी ने किया था। उन्होंने अपने मब्द व माद (Mabd wa Maad) नामक प्रपत्र में अलाउद्दौला सिम्नानी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत वहादत उश शुदूद का समर्थन किया।

शेख आदम बनूरी को शाहजहाँ ने देश से निष्कासित कर दिया। यद्यपि औरंगजेब 1665 ई. में नक्शबंदी सिलसिले का अनुयायी बना लेकिन वह शेख अहमद के विरोध को समाप्त नहीं कर सका। अत: 1679 में शेख अहमद के पत्रों का औरंगाबाद में प्रचार रोकना पड़ा।

अठारहवीं शताब्दी में नक्शबंदी सिलसिले में एक नई परंपरा तरीकाए मुहम्मदिया विकसित हुई जिसमें पैगबर मुहम्मद के उपदेशों को नई शक्ति देने का दावा किया गया। इस आंदोलन के नेताओं में दिल्ली के ख्वाजा मुहम्मद नासिर अदलीब (मृ. 1759) और उनके पुत्र ख्वाजा मीर दर्द (मृ. 1785) थे। ख्वाजा मुहम्मद नासिर ने एक ग्रंथ की रचना की जिसका नाम नालाए अदलीब था। इसमें तत्कालीन धार्मिक विवादों के बारे में लिखा गया। ख्वाजा मीर दर्द उर्दू के कवि थे। इसके साथ उन्होंने सूफी मत के बारे में अनेक ग्रंथ लिखे जिनमें इल्म-उल-किताब प्रसिद्ध है।

चिश्ती परंपरा के लोग शरिया को सर्वाधिक महत्त्व देते थे कितु साथ कभी-कभी वुजूदी सिद्धांत और हिन्दू विचारों को भी स्वीकार करते थे। विचारों का यह विरोधाभास शेख अब्दुल कुद्दूस गंगोही (1538) के चरित्र में देखने को मिलता है जो कि चिश्ती सिलसिला की एक शाखा चिश्ती-सबीरी परंपरा के थे।

शेख मोहम्मद गौस की सबसे अधिक विख्यात रचना जवाहिर-ए-खम्सा है जिसमें उन्होंने अपनी आध्यात्मिक खोज को अभिव्यक्त किया। इस रचना में रहस्यवादी और जादुई क्रियाओं का भी उल्लेख है।

उन्होंने हठ येाग की एक पुस्तक अमृत कु का नया अनुवाद किया। इसका पहले अरबी भाषा में तेरहवीं शताब्दी में भी बंगाल में अनुवाद किया गया था। उन्होंने इस अनुवाद को बहर-उल-हयात के नाम से लिखा। शिक्षा मुगलकालीन भारत में राज्य के द्वारा स्थापित तथा पोषित आधुनिक शिक्षा-प्रणाली-जैसी कोई चीज नहीं थी। परन्तु एक प्रकार की प्रारम्भिक तथा माध्यमिक शिक्षा विद्यमान् थी। स्वयं शासक तथा बहुत-से अमीर उमरा मस्जिदों, मठों तथा अलग-अलग सन्तों और विद्वानों को भूमि अथवा धन देकर इस प्रकार की शिक्षा को प्रोत्साहन देते थे। इस प्रकार प्रत्येक मस्जिद में एक मकतब लगी होती थी, जहाँ पड़ोस के लड़के तथा लड़कियाँ प्रारम्भिक शिक्षा पाते थे। हिन्दुओं के संस्कृत तथा देशी भाषाओं के स्कूल भी विद्यार्थियों के लाभ के लिए नागरिक और ग्रामीण क्षेत्रों में चालू रहे।

भारत के मुगल बादशाह शिक्षा के पोषक थे। बाबर के एक मंत्री सैय्यद मकबर अली की तवारीख के आधार पर यह कहा जाता है कि उस शासक के समय के जन-निर्माण विभाग (शुहरते-आम) का एक कर्त्तव्य स्कूल तथा कालेज बनाना भी था। हुमायूँ यद्यपि आलसी था तथा उसे अफीम खाने का व्यसन था, फिर भी उसे अध्ययन की प्रबल इच्छा थी। भूगोल तथा ज्योतिष-विद्या उसके प्रिय विषय थे। पुस्तकों की उसकी चाह इतनी बड़ी थी कि वह सदैव अपने साथ एक चुना हुआ पुस्तकालय लेकर चलता था। उसने दिल्ली में एक मदरसा स्थापित करवाया तथा पुराना किला में शेरशाह के द्वारा बनाये गये विलास-गृह को एक पुस्तकालय में परिवर्तित कर दिया। स्कूलों तथा कालेजों में शिक्षा देने की प्रथा चालू करने की दृष्टि से अकबर का राज्यकाल नवयुग-प्रवर्त्तक है। उसने फतेहपुर सीकरी, आगरा तथा अन्य स्थानों में कालेज बनवाये। मुस्लिम शिक्षा की दशा को सुधारने के उद्देश्य से उसने इसके पाठ्यक्रम में कुछ परिवर्तन किये तथा यह कहना युक्तिहीन होगा कि इनका कोई फल नहीं निकला। सच पूछिए तो इसके अच्छे परिणामों की चर्चा करते हुए अबुल फजल ने लिखा है कि सभी राष्ट्रों में युवकों की शिक्षा के लिए स्कूल हैं, परन्तु हिन्दुस्तान अपने विद्यालयों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

धार्मिक सहिष्णुता की अपनी नीति से अनुप्राणित अकबर ने आगे चलकर मदरसों में हिन्दुओं की शिक्षा का प्रबन्ध कर दिया। जहाँगीर को कुछ साहित्यिक अभिरुचि थी। फारसी तुर्की उसकी अच्छी पढ़ी हुई थी। उसने एक नियम निकाला जिसके यदि कोई धनी पुरुष अथवा व्यापारी बिना किसी उत्तराधिकारी के मर जाता था, तो उसकी सम्पत्ति को राज्य ले लेता था तथा उसे मदरसे, मठ इत्यादि के बनवाने और मरम्मत करवाने में खर्च किया जाता था। तारीखे-जान-जहान में लिखा है कि राज्यारोहण के शीघ्र बाद जहाँगीर ने ऐसे-ऐसे मदरसों की भी मरम्मत करवायी जो तीस वर्षों से चिड़ियों एवं पशुओं के निवास-स्थान बने हुए थे तथा उन्हें विद्यार्थियों और प्राध्यापकों से भर दिया। शाहजहाँ की सबसे अधिक दिलचस्पी भव्य भवनों में थी। किन्तु प्रारम्भिक युवावस्था में उसने तुर्की में शिक्षा पायी थी। रात्रि में कुछ समय वह अपने अध्ययन में व्यतीत किया करता था और विद्वानों को पुरस्कार एवं वृत्तियाँ देकर विद्या को प्रोत्साहन देता था। उसने दिल्ली में एक कालेज स्थापित किया तथा दाररुल-बका नामक कालेज की, जो नष्टप्राय हो चुका था, मरम्मत करवायी।

मुगल राजपरिवार में उत्पन्न दाराशिकोह भारत के सबसे बडे विद्वानों में एक था। वह अरबी, फारसी, एवं संस्कृत का बहुत बड़ा विद्वान् था। वह कुछ प्रसिद्ध पुस्तकों का लेखक था, जिनमें कुछ ये थीं- उपनिषदों, भगवद्-गीता एवं योगवशिष्ठ रामायण के फारसी अनुवाद; मुस्लिम सन्तों की सूची तथा सूफी दर्शन पर बहुत-सी पुस्तके। इस भाग्यहीन व्यक्ति की कब्र को देखकर सर विलियम स्लीमैन ने उचित ही सोचा था कि यदि वह राजसिंहासन पर बैठने के लिए जीवित रहता तो शिक्षा का स्वरूप तथा उसके साथ-साथा भारत का भाग्य भिन्न होता। यद्यपि औरंगजेब को ऊँची शिक्षा प्राप्त थी परन्तु उसने आमतौर पर शिक्षा की उन्नति के लिए कोई ठोस कार्य नहीं किया। उसने केवल मुस्लिम शिक्षा को प्रत्येक सम्भव प्रोत्साहन दिया तथा कीन के लेखानुसार बहुत से स्कूलों तथा कालेजों की स्थापना की।

मुगल काल में किसी रूप में स्त्री शिक्षा विद्यमान् थी। शाही घराने की तथा धनी सरदारों की पुत्रियों को अपने घरों में शिक्षा दी जाती थी। हम लोग यह मान सकते हैं कि हिन्दुओं में मध्यम वर्ग के लोगों की लड़कियाँ स्कूलों में लड़कों के साथ प्रारम्भिक शिक्षा पाती थीं तथा कुछ धार्मिक साहित्य से सुपरिचित थीं। इंडियन स्टेट्यूटरी कमीशन की औग्जलियरी कमिटी ने सितम्बर, ई. में ठीक ही कहा था कि हिन्दू अथवा मुसलमान धर्म में कोई ऐसी चीज नहीं है, जो स्त्री-शिक्षा के विरुद्ध हो। वास्तव में प्राचीन काल में भी भारत में ऐसी स्त्रियों के दृष्टान्त मिलते हैं जिन्हें विशेष रूप से धर्मशास्त्रों तथा अकबर के समय में शाही घराने की महिलाओं की नियमित रूप से प्रशिक्षण दिया जाता था। यों शिक्षा प्राप्त कर कुछ महिलाओं ने साहित्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठा प्राप्त की। इस प्रकार बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम (जो हुमायूँनामा की लेखिका थी), हुमायूँ की भतीजी सलीमा सुलताना (जिसने बहुत से फारसी पद्य लिखे थे), नूरजहाँ, मुमताज महल, जहाँनारा बेगम और जेबुन्निसा उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएँ थीं तथा उन्हें फारसी एवं अरबी साहित्य का बहुत अध्ययन था। अरबी और फारसी की प्रकाण्ड विदुषी होने के अतिरिक्त जेबुन्निसा सुन्दर लिखावट लिखने में अत्यन्त निपुण थी तथा उसके पास एक समृद्ध पुस्तकालय था।

मुगलकाल में सामाजिक और आर्थिक जीवन

मुगल भारत के लोगों का सामाजिक जीवन एवं आर्थिक अवस्था का इतिहास अधिक रोचक एवं महत्त्वपूर्ण है। इनके अध्ययन के साधन वास्तव में कम हैं, किन्तु समकालीन यूरोपीय यात्रियों के विवरणों तथा यूरोपीय कारखानों के कागजात से बहुमूल्य सूचनाओं का संग्रह किया गया है। उस युग के पारसी एवं देशी साहित्यों के समकालीन ऐतिहासिक ग्रंथों में आकस्मिक उल्लेख मिल जाते हैं।

समाज सामन्तवादी संस्था के समान दीखता था, जिसके शीर्ष पर बादशाह था।

बादशाह के नीचे पदाधिकारी सरदार थे। इन्हें विशेष सम्मान एवं अधिकार थे, जो साधारण जनता के भाग्य में कभी नहीं पड़े। इससे स्वभावत: उनके रहन-सहन के स्तर में अन्तर पैदा हो गया। पदाधिकारी सरदार धन एवं आराम से रहते थे, जबकि साधारण जनता की अवस्था अपेक्षाकृत दयनीय थी। अपने पास अत्याधिक साधन रहने के कारण धनी पुरुष स्वभावत: भोग-विलास तथा मद्यपान में लीन रहते थे। मृत्यु के पश्चात् अपने धन एवं जायदाद के राज्य द्वारा लिये जाने के भय से सरदारों में मितव्ययता की प्रेरणा नष्ट हो गयी। अमीरों में मदिरा एवं स्त्रियों के प्रति घोर आसक्ति एक आम बुराई थी।

यहाँ पर यह याद रखना चाहिए कि साधारणत: विदेशी सरदारों के रहने से देश का धन अधिक मात्रा में विदेशों को नहीं चला जाता था, क्योंकि उस वर्ग का कोई इसे देश के बाहर नहीं ले जा सकता था। प्रारम्भ में सरदारों में ऐसे गुण थे कि जब तक वे अपनी शक्ति को बनाये रहे, तब तक राज्य के योग्य सेवक बने रहे। परन्तु शाहजहाँ के राज्यकाल के अन्तिम वर्षों से उनकी पुरानी उपयोगिता नष्ट होने लगी तथा उनका आचार अधिक भ्रष्ट होने लगा। औरंगजेब के राज्यकाल तथा अठारहवीं सदी में उनका और भी पतन हुआ। उत्तर काल के स्वार्थी एवं पतित सरदारों की प्रतिद्वन्द्विताओं एवं षड्यंत्रों ने सामाजिक जीवन पर तो दूषित प्रभाव डाला ही, साथ ही उस युग की राजनैतिक अव्यवस्थाओं में भी उनका बहुत बड़ा हाथ रहा।

सरदारों के नीचे ठाटबाट के खर्चों से बचा हुआ एक छोटा और मितव्ययी मध्यम वर्ग था। इसके रहन-सहन का स्तर इसके पदों एवं धंधों के अनुकूल था। व्यापारी आमतौर पर सरल एवं संयमी जीवन व्यतीत करते थे।

दोनों उच्चतर वर्गों की हालत से तुलना करने पर निचले वर्गों की हालत बुरी थी। उनके कपडे पूरे नहीं होते थे। ऊनी पोशाक एवं जूते उनके साधन से परे थे। उनकी अन्य आवश्यकताएँ कम रहती थीं। इसलिए साधारण परिस्थिति में उनके लिए सामान्य भोजन का अभाव नहीं था। परन्तु दुर्भिक्ष और महँगाई के समय में उनके कष्ट और विपन्नता अवश्य बहुत बढ़ जाते रहे होंगे।

हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही ज्योतिष-विद्या के सूत्रों और भविष्यवाणियों में विश्वास करते थे। उस युग की प्रधान सामाजिक रीतियाँ थीं-सती-प्रथा, बाल-विवाह, कुलीन-प्रथा तथा दहेज-प्रथा। अकबर ने सामाजिक प्रथाओं को इस प्रकार नियमित करने का प्रयत्न किया जिससे विवाहों में दुल्हा तथा दुल्हिन की स्वीकृति एवं माता-पिता की अनुमति आवश्यक हो जाए। वह दोनों पक्षों के वयस्क होने के पहले विवाह, निकट सम्बन्धियों के बीच विवाह, अत्याधिक दहेज की स्वीकृति तथा बहुविवाह को रोकना चाहता था। परन्तु उसके प्रयत्न व्यवहार में सफल हुए मालूम नहीं पड़ते। अठारहवीं सदी में सामाजिक बुराईयाँ-विशेष रूप से बंगाल में बढ़ गयीं। तथा बोल्ट्स क्रौफर्ड एवं स्क्रैफ्टन जैसे समकालीन यूरोपीय लेखकों की किताबों तथा समकालीन साहित्य में इनकी ओर बार-बार संकेत किया गया है। परन्तु तत्कालीन मराठा समाज देहज की स्वीकृति को प्रोत्साहन नहीं देता था। पेशवा महाराष्ट्र के सामाजिक एवं धार्मिक मामलों पर काफी नियंत्रण रखते थे तथा डाक्टर सेन कहते हैं कि उनके विवाह सम्बन्धी नियमों में वह उदार भाव पाया जाता था, जिसका अनुकरण करके उनके आधुनिक वंशज लाभान्वित हो सकते हैं। वे बलपूर्वक विवाहों के विरुद्ध थे, परन्तु कभी-कभी नियम विरुद्ध विवाहों की अनुमति दे देते थे, यदि उभय पक्षों के अभिप्राय ठीक होते थे। महाराष्ट्र के गैर-ब्राह्मणों तथा पंजाब एवं यमुनाघाटी के जाटों में विधवा-विवाह प्रचलित था। उपर्युक्त जाटों में बहुपतित्व अज्ञात नहीं था। अठारहवीं सदी के मध्य में ढाका के राजा राजवल्लभ ने विधवा-विवाह चलाने का असफल प्रयत्न किया। यद्यपि स्त्रियाँ साधारणत: अपने स्वामी की इच्छा के अधीन रहती थीं, किन्तु राजनैतिक मामलों में उनके सक्रिय भाग लेने के दृष्टान्त भी अप्राप्य नहीं हैं।

मुगल सेना

राज्य के द्वारा कोई विशाल सेना स्थायी रूप से नहीं रखी जाती थी परन्तु सिद्धान्त रूप में साम्राज्य के सभी बल नागरिक शाही सेना के हो सकने वाले सिपाही थे। मुगल सेना का इतिहास अधिकतर मनसबदारी प्रणाली का इतिहास है। मनसबदारों के अतिरिक्त दाखिली और अहदी हेाते थे। दाखिली पूरक सिपाही थे, जो मनसबदारों के कमान में रखे जाते थे तथा उनका खर्च राज्य से मिलता था। अहदी प्रतिष्ठा वाले सिपाही थे। वे एक विशेष प्रकार के अश्वारोही थे, जो साधारणत: बादशाह के शरीर के आसपास रहते थे तथा किसी और के अधीन नहीं थे। मनसबदारी प्रथा भ्रष्टाचार से मुक्त न थी। आधुनिक शब्दों में मुगल सेना के ये भाग थे- (1) घुड़सवार, (2) पैदल, (3) गोलंदाज और (4) जलसेना। इन सब विभागों में घुड़सवार सबसे अधिक महत्वपूर्ण था। पैदल सेना में अधिकतर साधारण नगरवासी तथा किसान थे। सेना की सामरिक शक्ति के अंग के रूप में यह विभाग महत्वहीन था। बाबर, हुमायूँ तथा अकबर ने युद्धों में देश के भीतर बनी बंदूकों का और बाहर से मंगायी गयी बन्दूकों का भी, व्यवहार किया। किन्तु तोपें आलमगीर के राज्यकाल में पहले की अपेक्षा अत्याधिक पूर्ण तथा बहुसंख्यक थीं। गोलंदाज फौज का पूरा खर्च राज्य देता था। आधुनिक अर्थ में कोई प्रबल जलसेना नहीं थी। किन्तु अबुल फजल एक जलसेना-विभाग का वर्णन करता है, जिसके कर्त्तव्य थे (1) नदी में आवागमन के लिए हर प्रकार की नावें बनाना, (2) लड़ाई के हाथियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए मजबूत नावों को तैयार करना, (3) कुशल नाविकों की भर्ती करना, (4) नदियों की देखभाल करना तथा (5) नदी सम्बन्धी चुगियाँ और कर लगाना, वसूल करना तथा माफ करना। बंगाल के तट की मूगों तथा अराकानी समुद्री लुटेरों से रक्षा करने के लिए सात सौ अडसठ सशस्त्र जहाजों तथा नावों का एक बेडा ढाके में रहता था। परन्तु मुगलों की समुद्र-सेना की व्यवस्था काफी मजबूत नहीं मालूम पड़ती।

यद्यपि मुगल सेना अयोग्य नहीं थी, फिर भी वह दोष रहित नहीं थी प्रथमत: वह राष्ट्रीय सेना नहीं थी, बल्कि विभिन्न तत्वों का सम्मिश्रण थी, जिसमें प्रत्येक तत्व अपने विचित्र तरीकों तथा युद्धकौशल का अनुसरण करने की चेष्टा करता था। इस प्रकार यद्यपि समय बीतने के साथ इसकी संख्या में वृद्धि होती गयी, किन्तु यह कष्टकर हो गयी तथा इस पर नियंत्रण रखना अथवा इसका प्रबन्ध करना कठिन हो गया। दूसरे, सिपाही सीधे बादशाह के प्रति वफादारी नहीं रखते थे, बल्कि अपने निकटस्थ भतीं करने वालों तथा उच्च अधिकारियों से उनका अधिक घनिष्ट सम्बन्ध था। इन अधिकारियों के भीषण द्वेष एवं घोर प्रतिद्वंद्विता के कारण प्राय: आक्रमण में सफलता की सम्भावना नष्ट हो जाती थी। अन्ततः पड़ाव में तथा आक्रमण के समय मुगल सेना के वैभव तथा प्रदर्शन के कारण अधिकतर इसकी कार्यक्षमता नष्ट हो जाती थी। कभी-कभी अकबर इस प्रचलन को छोड़ सका था। परन्तु सामान्यतः शाही सेना एक भारी चलायमान शहर के समान दिखाई पड़ती थी तथा शाही दरबार के सभी अति व्ययी साजसामानों के बोझ से दब जाती थी। इसमें हाथियों तथा ऊँटों पर सवार अन्त:पुर का एक भाग तथा इसके सेवक रहते थे; भ्रमणशील दरबार रहता था, गायकों की वीथी, दफ्तर, कारखाने तथा बाजार रहते थे। हाथियों तथा ऊँटों पर कोष रहता था। सैकड़ों बैलगाड़ियों पर फौजी भंडार रहता था। खच्चरों की एक फैाज शाही साज-सामान और अन्य सामग्री का परिवहन होती थी। मनसबदारों के अतिरिक्त सैनिकों का एक अन्य प्रकार था जो दखिली कहा जाता था। ये सैनिक भी मनसबदारों के अंतर्गत ही नियुक्त किये जाते थे।

अहदी सैनिक- वैसे सैनिक जो राजा की व्यक्तिगत सेवा में थे। मुगल घुड़सवार एशिया में प्रसिद्ध माना जाता था। औरंगजेब के समय तोपखाने सबसे सशक्त थे। आइन-ए-अकबरी से ज्ञात होता है कि बंगाल की खाड़ी में पुर्तगीजों के दमन के लिए नाविक बेडे भी रखे जाते थे। पियादगानों पैदल सैनिकों को कहा जाता था। इन्हें विशेष कार्यों के लिए नियुक्त किया जाता था।

मुगलों की धार्मिक नीति

अकबर की धार्मिक नीति को निम्नलिखित बातों ने प्रभावित किया-

  1. तुर्की मंगोल परंपरा की धार्मिक उदारता
  2. अकबर का व्यक्तिगत रुझान
  3. ईरानी दरबार का प्रभाव
  4. गुरु अब्दुल लतीफ और माता हमीदा बानो बेगम का प्रभाव
  5. अकबर की साम्राज्यवादी आवश्यकता।

1562 ई. में अकबर ने युद्ध बंदियों को जबरन दास बनाने की प्रथा बंद कर दी और ऐसा उसने मेड्ता विजय के समय राजपूतों की वीरता से प्रभावित होकर किया। 1563 ई. में उसने तीर्थयात्रा कर खत्म कर दिया। 1564 ई. में उसने जजिया कर का अंत कर दिया। 1565 ई. में उसने जबरदस्ती धर्म परिवर्तन पर पाबंदी लगा दी। 1573 ई. में वह शेख मुबारक के संपर्क में आया और 1574 ई. में उसके दोनों पुत्रों फैजी और अबुल फजल के संपर्क में आया। फैजी और अबुल फजल ने अकबर की विचारधारा को प्रभावित किया। 1575 ई. में अकबर ने फतेहपुर सिकरी में इबादत खाना स्थापित किया। अकबर का इबादत खाना दो गुटों में विभाजित हो गया। उदारवादियों का नेतृत्व अबुल फजल और रूढ़िवादियों का नेतृत्व मुखदुम उल मुल्क और अब्दुल नवी कर रहे थे। आगे अकबर ने 1598 ई. में इबादतखाना सभी धमों के लिए खोल दिया। अकबर संतों के संपर्क में भी आया। उदाहरण के लिए-हिन्दू संत-पुरुषोत्तम और देवी पारसी संत-मेहर जी राणा जैन संत-हरि विजय सूरी, जिन सेन सूरी इसाई पादरी-अक्वावीवा और मानसुरेट।

1579 ई. में अकबर ने महजरनामा की घोषणा की। उसका मसविदा शेख मुबारक ने तैयार किया था। अबुल फजल इससे जुड़ा हुआ नहीं था क्योंकि आइन-ए-अकबरी में कहीं भी मजहरनामा  की चर्चा नहीं है। विन्सेट स्मिथ ने महजरनामा को अमोघत्व का आदेश कहा है कितु यह सही नहीं प्रतीत होता है। मजहरनामा में यह बात निहित थी कि अगर विभिन्न मुल्लाओं के विचारों में मतभेद हो तो अकबर इन्सान-ए-कामिल (विवेकशील) होने के नाते उनमें से एक को चुन सकता है और अगर वह राज्य के हित में आवश्यक समझे तो नया आदेश भी जारी कर सकता है। 1582 ई. में अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक नया धर्म चलाया। प्रारंभ में इसे तौहीद-ए-इलाही  कहा जाता था। अकबर ने सूर्य पूजा और अग्नि पूजा भी प्रारंभ की। अबुल फजल और बदायूनी दीन-ए-इलाही को तौहीद-ए-इलाही भी कहते हैं। आइन-ए-अकबरी के अनुसार इसके 12 सिद्धांत थे। इसके कुल अनुयायियों की संख्या 22 थी जिनमें एकमात्र हिन्दू बीरबल था।

अकबर ने समाज सुधार के लिए भी कुछ कार्य किए। उसने सती प्रथा को हतोत्साहित करने की कोशिश की। उसने इस प्रकार का नियम बनाया कि अगर कोई स्त्री पति के साथ सहवास नहीं करती है या वैसी स्त्री जिसे संतान उत्पन्न नहीं हुई हो तो उसे सती नहीं होना चाहिए। उसने शादी की उम्र बढ़ा कर स्त्रियों के लिए 14 वर्ष और पुरुषों के लिए 16 वर्ष कर दी।

जहाँगीर भी धार्मिक मामलों में उदार था। उसने मथुरा गोकुल और वृंदावन में कुछ मंदिर भी बनवाए। उसने इसाईओं को भी गिरीजाघर बनाने की छूट दे दी किंतु उसने कुछ कट्टर काम भी किए। कांगडा अभियान के समय उसने ज्वालामुखी के मंदिर को नष्ट करवाया। उसी तरह उसने पुष्कर (अजमेर) के वराह मंदिर को नष्ट किया। उसने जैनियों को देश निर्वासित कर दिया क्योंकि उसे ऐसा महसूस हुआ की वे खुसरो के साथ षड्यंत्र में शामिल थे।

शाहजहाँ की बहुत बैटन में औरंगजेब का पूर्वगामी था। शाहजहाँ ने सिजदा की पद्धति को छोड़ दिया। उसने इलाही संवत के बदले हिजरी संवत को प्रारंभ किया। उसने हिन्दुओं पर इस बात के लिए भी पाबन्दी लगायी की वे मुस्लिम दास नहीं रख सकते थे। उसने हिन्दुओं को मुस्लिम स्त्रियों  के साथ शादी करने पर रोक लगाई और जो हिन्दू ऐसा कर चुके थे उन्हें यह आदेश दिया गया की या तो वे उन स्त्रियों को मुक्त करें या फिर मुस्लिम रीति से शादी करें। उसने सरहिंद के दलपत रॉय को दण्डित किया उसने इस आदेश की अवहेलना की थी। शाहजहाँ ने धर्म परिवर्तन के लिए एक पृथक विभाग की स्थापना की। वह प्रतिवर्ष 50 हजार रुपए मक्का भेजता था। उसने 1633 ई. में मंदिर तोड़ने का आदेश दिया और बनारस में 72 मंदिर तोड़ दिए गए। उसने तीर्थ-यात्रा कर को पुनर्जीवित किया किन्तु बनारस के संत कविन्दाचार्य के अनुरोध पर उसे वापस ले लिया। बाद में डरा शुकोह एवं जहाँआरा बेगम  के प्रभाव में उसकी दृष्टि कुछ उदार हुई।

औरंगजेब का घोषित उद्देश्य दर-उल-हर्ब को दर-उल-इस्लाम में तब्दील करना था। औरंगजेब ने सिक्कों पर से कलमा का लेख हटवा दिया। उसने झरोखा दर्शन और नीरोज का त्यौहार बंद करवा दिया। उसने टीका उत्सव पर भी पाबंदी लगा दी। उसने दरबारी इतिहास-लेखन को बंद करवा दिया और दरबारी कलाकारों को छुट्टी दे दी। उसने मुसलमानों से राहदारी कर हटवा दिया। उसने एक आदेश के तहत भू-राजस्व विभाग में मुसलमानों की नियुक्ति पर बल दिया। उसने प्रांतीय गवर्नरों को हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर दे और सबसे बढ़कर उसने 1679 ई. में जजिया कर दुबारा लगा दिया।

मुगलों की राजपूत नीति

अकबर ने अपनी राजपूत नीति में पुरस्कार और दमन का सहारा लिया। उसकी राजपूत नीति साम्राज्यवादी आवश्यकता और अकबर की सुलह-ए-कुल की नीति से प्रभावित थी। अकबर की राजपूत नीति में वैवाहिक शर्त अनिवार्य नहीं थी। कुछ ऐसे भी राज्य थे जिन्होंने अकबर के साथ वैवाहिक संबंध कायम नहीं किये, फिर भी उनकी स्थिति अच्छी थी- उदाहरण के लिए रणथंभौर, बांसवाडा, सिरोही।

राजपूत राज्यों को हम तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं-

  1. वैसे राज्य जिन्होंने बिना संघर्ष किए अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली, जैसे-अम्बेर, बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर
  2. वे राज्य जिन्होंने कुछ संघर्ष के बाद अधीनता स्वीकार की थी- मेड़ता, रणथंभौर
  3. वैसे राज्य जिन्होंने लम्बा संघर्ष किया- मेवाड़, बूंदी, डुगरपुर और कोटा।

जहाँगीर ने अम्बेर और बीकानेर के उत्तराधिकार में हस्तक्षेप किया था। अम्बेर में उसने गद्दी पर मानसिंह के पौत्र महासिंह के दावे को स्वीकार कर लिया था। शाहजहाँ ने अकबर की राजपूत नीति को उलट दिया और उसने राजपूतों के साथ वैवाहिक संबंधों को हतोत्साहित किया। औरंगजेब के समय जोधपुर की समस्या उत्पन्न हुयी।

मुगलकाल में वाणिज्य और व्यापार

मुगल काल में वाणिज्य और व्यापार का विकास हुआ। इसकी वजह यह थी कि काबुल और कधार कुषाण काल के बाद पहली बार भारतीय साम्राज्य के अंतर्गत आया। कधार से पश्चिम एशिया के लिए व्यापारिक कारवां जाते थे। मुल्तान भी व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र था। लाहौर और बुरहानपुर भी व्यापारिक केन्द्र थे। लाहौर एक तरफ काबुल और कंधार से जुड़ा हुआ था तो दूसरी ओर दिल्ली और आगरा से जुड़ा हुआ था।

सूती वस्त्र उत्पादन के केन्द्र- पटना, जौनपुर, बुरहानपुर और गुजरात में पाटन तथा बंगाल में उड़ीसा तक का क्षेत्र। बंगाल में ढाका मलमल के लिए विश्व प्रसिद्ध था। बंगाल में रेशमी वस्त्र (तस्सर) का भी उत्पादन होता था। बंगाल चावल एवं चीनी का भी निर्यात करता था।

शोरा का उत्पादन बिहार और दक्षिण प्रायद्वीप में होता था। अकबर के समय गलीचा और साल बनाने की कला विकसित हुई। आगरा और लाहौर गलीचा बनाने के केन्द्र थे जबकि साल बनाने का केन्द्र आगरा और कश्मीर था। महत्त्वपूर्ण बंदरगाह निम्नलिखित थे- सिंध में लाहौरी बन्दर, गुजरात में पाटन और खभात, महाराष्ट्र में रत्नागिरी, दाभोल और भतकल, मालाबार में कोचीन और कालीकट, बंगाल में सत्गाँव और सोनारगाँव, गुजरात में भड़ौच एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था।

आयात की महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ सोना, चाँदी, हाथी दाँत, कच्चा रेशम, औषधि, घोड़ा, टीन, आदि थी। निर्यात की मुख्य वस्तुएँ मसाले, मलमल, सूती वस्त्र, सोरा, नील और बंगाल से संभवत: चावल और चीनी थी। उत्तर पश्चिम के व्यापार में बोहरा व्यापारी सक्रिय थे। इनमें हिन्दू, जैन और मुसलमान तीनो शामिल थे। दो महत्त्वपूर्ण व्यापारी विरजी बोहरा और अब्दुल गफूर बोहरा थे।

दक्षिण भारत में व्यापारिक समूहों को चेट्टी कहा जाता था। कुछ महत्त्वपूर्ण व्यापारी रामा चेट्टी और मेले चेट्टी थे। ये व्यापारी दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार करते थे। दक्षिण पूर्व एशिया में मलक्का एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र था। राजस्थान में ओसवाल, अग्रवाल आदि सक्रिय थे। कुछ मुगल अधिकारी भी व्यापार में हिस्सा लेते थे, उदाहरण के लिए आसफ खाँ, मीर जुमला आदि। मुगल काल में मुद्रा व्यवस्था विकसित अवस्था में थी। अबुल फजल के अनुसार 1595 ई. में लगभग 42 टकसालों से तांबे के सिक्के निकाले जाते थे; 14 टकसालों में चाँदी का रुपया निर्मित होता था और 4 टकसालों में सोने के सिक्के बनते थे। मुगल काल में तटीय इलाकों में कौड़ियाँ चलती थीं। गुजरात में चाँदी का एक सिक्का महमूदी चलता था। अकबर ने मुहर नामक एक सिक्का चलाया, जिसे शहनशाह कहा जाता था।

सोने का सिक्का- शहनशाह-(अटमा)-शहनशाह का 1/4 भाग था। (विसात)—शहनशाह का 1/3 भाग था। (चुगल)-शहनशाह का 1/50वाँ भाग था। अकबर ने चाँदी के वर्गाकार एवं वृताकार सिक्के चलाये। वर्गाकार सिक्का जलाली एवं वृताकार सिक्का इलाही कहा जाता था। 1 रुपया 40 दाम के बराबर होता था। किंतु शाहजहाँ के काल में 1 रुपया 30 दाम के बराबर हो गया था। छोटे मूल्य का चाँदी का सिक्का आना कहा जाता जो रुपये का 16वाँ भाग होता था। जहाँगीर ने एक निसार नामक सिक्का चलाया जो एक रुपया का चौथाई भाग होता था। दाम की भी छोटी ईकाई निर्धारित की गई अर्थात् दाम को 25 भागों में विभाजित किया गया। इसे जीतल कहा जाता था। सबसे प्रचलित सिक्का सोने का सिक्का मुहर था, जो 9 रुपये के बराबर होता था। मुगल काल में हुण्डी प्रणाली विकसित अवस्था में थी। 17वीं सदी में हुण्डी का प्रयोग रकम भेजने के अलावा अल्प समय के लिए ऋण की व्यवस्था के लिए होता था। बीमा प्रणाली के विषय में महत्त्वपूर्ण स्रोत ग्रंथ सुजान राय खत्री का खुलासत-उल-तवारिख है। मुगल काल में ऋण की सुविधा भी व्यापारियों को उपलब्ध थी। ऋण प्रदान करने की एक नई व्यवस्था दादनी प्रचलित थी। दादनी प्रथा के अन्तर्गत शिल्पियों को इसमें अग्रिम पैसा दे दिया जाता था और शिल्पियों को निश्चित अवधि तक व्यापारियों को माल तैयार कर देना होता था। एक विशिष्ट प्रकार की निवेश प्रणाली थी जो आवोल कहलाती थी। इसके अन्तर्गत उधार लिया हुआ धन किसी विशिष्ट स्थान के लिए प्रस्थान कर रहे जहाजों में सामग्री के रूप में रख दिया जाता था। इस पर अधिक ब्याज लिया जाता था क्योंकि ऋणदाता ही माल का खतरा वहन करता था।

भारत की जनसंख्या- मोरलैंड के अनुसार भारत की जनसंख्या 16वीं सदी में 100 मिलियन थी। सरदेशाई के अनुसार भारत की जनसंख्या 64.9 और 88.3 मिलियन के बीच में थी। सिरीन मुसबी के अनुसार अकबर के साम्राज्य की जनसंख्या 108.4 मिलियन और संपूर्ण भारत की जनसंख्या 144.3 मिलियन थी। किंग्सले डेविस के अनुसार 16वीं सदी में भारत की जनसंख्या 125 मिलियन थी।

मुगलकाल में भू राजस्व प्रणाली

मुगल साम्राज्य के राजस्व को दो भागों में बाँटा जा सकता है- केंद्रीय अथवा शाही तथा स्थानीय अथवा प्रान्तीय। स्थानीय राजस्व स्पष्टत: बिना केन्द्रीय सरकार के वित्त-सम्बन्धी अधिकारियों से पूछे ही वसूला तथा खर्च किया जाता था। यह विभिन्न छोटे-छोटे करों से प्राप्त किया जाता था, जो उत्पादन एवं उपभोग, व्यापार एवं धंधों, सामाजिक जीवन की विभिन्न घटनाओं तथा सबसे अधिक परिवहन पर लगाये जाते थे। केन्द्रीय राजस्व के प्रधान साधन थे-भूमि-राजस्व चुंगी, टकसाल, उत्तराधिकार, लूट एवं हर्जाना, उपहार, एकाधिकार तथा प्रत्येक मनुष्य पर लगने वाला कर (पॉल-टैक्स)। इनमें पुराने जमाने की तरह राज्य की आय का सबसे महत्वपूर्ण साधन था भू-राजस्व।

मुगलों के समय भू-राजस्व उत्पादन का हिस्सा होता था। यह भूमि पर कर नहीं वरन् उत्पादन और उपज पर कर होता था। आइन-ए-अकबरी के अनुसार भू-राजस्व राजा द्वारा दिये जाने वाले संरक्षण और न्याय व्यवस्था के बदले लिए जाने वाला संप्रभुता शुल्क था। मुगल शासन में भू-राजस्व के लिए फारसी शब्द माल और मालवाजिब का प्रयोग किया जाता था। खराज शब्द की नियमित रूप से चर्चा नहीं मिलती थी।

अकबर के समय प्रयोग-1563 ई. में एतमद खाँ के अधीन संपूर्ण साम्राज्य का 18 परगनों में विभाजन हुआ और प्रत्येक परगने में एक करोड़ी नामक अधिकारी की नियुक्ति की गई। 1564 ई. में मुज्जफर खाँ के अधीन दूसरा प्रयोग किया गया। 1568 ई. में शिहाबुद्दीन के अधीन तीसरा प्रयोग किया गया। इसने नसक प्रणाली पर बल दिया। 1571 ई. में मुज्जफर खाँ और उसके अधीन अधिकारी के रूप में टोडरमल की नियुक्ति की गई। इस प्रयोग में भूमि माप पर बल दिया गया। गुजरात विजय के बाद 1573 ई. में टोडरमल ने गुजरात में भूमि माप की पद्धति अपनायी। अकबर इस पद्धति से संतुष्ट हुआ। 1582 ई. में टोडरमल की नियुक्ति दीवान ए आला के रूप में हुयी और कई प्रयोगों के बाद टोडरमल के द्वारा जब्ती या आइन-ए-दहशाला पद्धति को अपनाया गया।

जब्ती पद्धति में पाँच चरण होते थे।

1. भूमि की माप- भूमि माप की इकाई के रूप में पहले शेरशाह के द्वारा अपनाये गए गज-ए-सिकन्दरी के बदले इलाही गज का प्रयोग किया। इलाही गज 33 ईंच और 41 अंगुल का होता था।

जब्ती व्यवस्था के लाभ-

  • भूमि की माप को कभी भी जाँचा जा सकता था।
  • निर्धारित दस्तूरों के कारण पदाधिकारियों की मनमानी नहीं चल सकती थी।
  • स्थायी दस्तूरों के निर्धारण के बाद भू-राजस्व की अनिश्चितता और उतार-चढ़ाव में कमी आ गई।

सीमाएँ

  • भूमि की उर्वरता समान न होने पर उसे लागू नहीं किया जा सकता था।
  • उत्पादकता की अनिश्चितता का दण्ड केवल किसानों को भुगतान करना पड़ता था और यह किसानों के लिए हानिकारक था।
  • यह एक महगी प्रणाली थी क्योंकि इसमें माप करने वाले दल को पारिश्रमिक के रूप में प्रति बीघा 1 दाम की दर से जरीवाना देना पड़ता था।
  • माप करते समय कर्मचारियों के द्वारा गड़बड़ी एवं धोखाधड़ी की समस्या भी बनी रहती थी।

2. भूमि का वर्गीकरण- शेरशाह ने उत्पादकता के आधार पर भूमि का श्रेणीकरण किया था कितु अकबर ने उत्पादकता के बदले बारंबारता पर अधिक बल दिया कितु बारंबारता पर बल देते हुए भी उसने उत्पादकता के आधार को भी बनाये रखा। बारंबारता के आधार पर भूमि चार प्रकार की होती थी।

  • पोलज– इसमें एक वर्ष में दो फसलें होती थी।
  • परती- इसमें दो फसलों के बाद किन्हीं कारणों से एक वर्ष के लिए भूमि को खाली छोड़ दिया जाता था।
  • चाचर- इसमें तीन या चार वर्षों में खेती होती थी।
  • बंजर- इसमें पाँच वर्षों तक खेती नहीं होती थी।

उत्पादकता के आधार पर भूमि को तीन भागों में विभाजित किया गया- 1. उत्तम 2. मध्यम 3. निम्न। अगर हम बंजर भूमि को बाहर कर देते हैं तो दोनों के जोड़ने पर भूमि के कुल 9 प्रकार होते हैं।

3. भू-राजस्व का निर्धारण- भू-राजस्व के निर्धारण के लिए एक दर तालिका बनायी गयी। उस दर तालिका को रय के नाम से जाना जाता था। भू-राजस्व के निर्धारण में निचले स्तर पर बीघा को और ऊँचे स्तर पर परगना को इकाई माना जाता था। भू-राजस्व के निर्धारण के लिए संबंधित क्षेत्र के दस वर्षों के उत्पादन का औसत निकाला जाता था। यह औसत 1571-81 के बीच के वर्षों को बनाया गया था। जब्ती व्यवस्था में भू-राजस्व का निर्धारण करते समय नाबाद क्षेत्र (जिसमें फसल न हुई हो) को छोड़ दिया जाता था।

4. अनाजों का नगद में परिवर्तन- अनाजों के नगद में परिवर्तन के लिए स्थानीय बाजार के मूल्यों को ध्यान में रखते हुए साम्राज्य की दस्तूर में बाँट दिया जाता था और प्रत्येक दस्तूर में अनाजों के मूल्यों का दस वर्षों का औसत निकाला जाता था। नील, पान, हल्दी और पोस्त नगदी फसलों में अपवाद था। उनकी दरें कुछ अच्छे वर्षों की फसल को ध्यान में रखकर तय की जाती थी।

5. भू-राजस्व का संग्रह- भू-राजस्व के संग्रह के लिए सरकारी अधिकारियों को दस्तूर अल अमल (निर्देश) दिया जाता था। भू-राजस्व की वसूली करने वाले अधिकारी में सरकार के स्तर पर अमाल गुजार और परगने के स्तर पर आमिल होता था। प्रत्येक परगने में कानूनगी होता था जो गाँव के पटवारियों का प्रमुख होता था। भू-राजस्व के संग्रह में सबसे छोटी इकाई गाँव था। ग्रामीण अधिकारियों में मुकद्दम और पटवारी होता था। मुकद्दम गाँव का मुखिया होता था और अपनी सेवा के बदले उसके द्वारा वसूले गये राजस्व में से उसे 2.5 प्रतिशत प्राप्त होता था। अमीन एक प्रमुख अधिकारी था। अमीन का पद शाहजहाँ के शासन काल में आया। अमीन का मुख्य कार्य भू-राजस्व का निर्धारण था।

सामान्यत: भू राजस्व की दर कुल उपज की 1/3 थी। किंतु मोरलैण्ड और इरफान हबीब का मानना है कि भू राजस्व की दर उत्पादन का आधा या तीन चौथाई थी। कश्मीर में अकबर ने कुल उत्पादन के आधे भाग की वसूली का आदेश दिया था। आई.ए.एच. कुरैशी का मानना है कि संभवत: भू-राजस्व एक तिहाई ही लिया जाता था। अगर इस तरह की बात न होती तो किसानों का विद्रोह शाहजहाँ के समय न होकर अकबर के समय हुआ होता। औरंगजेब ने स्पष्ट घोषणा की कि भू-राजस्व शरियत के अनुसार कुल उत्पादन के आधे से अधिक नहीं होना चाहिए। जब्ती या आइन-ए-दहशाला आगरा, लाहौर और गुजरात में लागू की गयी। जब्ती प्रणाली के अतिरिक्त अन्य पद्धतियाँ भी प्रचलित थीं। उदाहरण के लिए बँटाई या गल्लाबख्शी निगार-नामा-ए-मुंशी के अनुसार फसल के बँटवारे को सर्वोत्तम प्रणाली कहा गया है। इसके अतिरिक्त नसक या कानकूत प्रणाली भी प्रचलित थी। कानकूत संभवत: व्यक्तियों पर न लगाकर व्यक्तियों के समूह पर लगाया जाता था।

कृषि उत्पादन एवं कृषि संबंध

सम्पूर्ण साम्राज्य का विभाजन खालिसा, जागीर, सयूरगल या मदद-ए-माश में होता था। मदद-ए-माश की देखभाल सद्र-उस-सुद्र के अंतर्गत एक विभाग करता था। नकद सहायता को वजीफा कहा जाता था। इस प्रकार के अनुदान पाने वाले व्यक्ति का भूमि पर कोई अधिकार नहीं होता था। अकबर ने इस प्रकार के अनुदान पर 100 बीघा प्रति व्यक्ति की सीमा निर्धारित की। अकबर ने कृषि को प्रोत्साहन देने के लिए आधी खेती योग्य भूमि और आधी जुती या बंजर भूमि देने की प्रथा चलाई। अनुदान प्राप्तकर्ता को पूरे जीवन के लिए अनुदान प्राप्त होता था और उसकी मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी अनुदान के नवीनीकरण के लिए आवेदन कर सकते थे। आम तौर पर उत्तराधिकारियों को अनुदान का एक अंश प्राप्त होता था। जहाँगीर के द्वारा अकबर के दिए गये अनुदानों का नवीनीकरण किया गया। परन्तु शाहजहाँ के द्वारा इसकी सीमा 30 बीघा और औरंगजेब के द्वारा इसकी सीमा 20 बीघा कर दी गई। औरंगजेब ने अपने शासन के 30वें वर्ष में सारे अनुदानों को आनुवांशिक बना दिया। किंतु उसने उन अनुदानों को एक प्रकार का ऋण माना न की संपत्ति। उसके शासन के उत्तरार्ध में और उसकी मृत्यु के बाद अनुदान प्राप्तकर्ता जमीन को खरीदने, बेचने या हस्तांतरित करने लगे। इस कारण धीरे-धीरे इन अनुदानों का अधिकार-क्षेत्र जमींदारी अनुदानों के समकक्ष हो गया।

अकबर के शासन-काल में इस प्रकार के अनुदानों का राजस्व कुल राजस्व का 5.84 प्रतिशत हो गया। अधिकांश अनुदान उपरी गंगा प्रदेश अर्थात् दिल्ली और इलाहाबाद के क्षेत्र में थे। लगभग 70 प्रतिशत सयुरगल अनुदान उन परगनों में केन्द्रित थे जो गैर मुसलमानों जमींदार के अधिकार में थे। एक दूसरे प्रकार का अनुदान वक्फ कहलाता था जो धार्मिक कार्यों के लिए दिया जाता था। इसकी आमदनी मकबरों, समाधियों एवं मदरसों के रख-रखाव पर खर्च होती थी। मदद ए मास अनुदान की सहायता से बंजर भूमि को विकसित करने में मदद की जाती थी। 18वीं शताब्दी के आरंभ तक ये अनुदान सभी प्रकार के लेनदेन में जमींदार भूमि के रूप में प्रयुक्त किए जाने लगे।

जमींदार दो शब्दों से बना है- जमीन (भूमि) और दार (ग्रहण करना)। मुगल काल से पहले जमींदार शब्द का प्रयोग इलाके के प्रधान के लिए किया जाता था कितु अकबर के समय से यह शब्द किसी भी व्यक्ति के उत्पादन से सीधा हिस्सा ग्रहण करने के लिए आनुवांशिक दावों के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा था। जमींदार शब्द के कई स्थानीय शब्द प्रचलित थे- उदाहरण के लिए दोआब में खूत और मुकद्दम अवध में राजस्थान और गुजरात में बैठ या वन्ठ। जमींदारी का मतलब भूमि पर संपत्ति का अधिकार नहीं था। यह मात्र भूमि उत्पादन पर जमींदारों का दावा था जो राज्य के भू-राजस्व के साथ-साथ था किंतु उसका क्रय-विक्रय किया जा सकता था। यह अनुवांशिक एवं विभाज्य था। जब जमींदारों को भू-राजस्व की वसूली का अधिकार नहीं दिया जाता था वहाँ भी उन्हें मालिकाना के रूप में भू-राजस्व का 10 प्रतिशत प्राप्त हो जाता था।

इसके अतिरिक्त वे दस्तूरी सुमारी (पगड़ी), खाना सुमारी (गृहकर) विवाह, जन्म आदि पर भी कर लगाते थे। आइन ए अकबरी के अनुसार मुगल साम्राज्य में जमींदारों की सेना में 44 लाख से अधिक सिपाही थे। बंगाल में उनके पास हजारों नावे थे। उनकी स्थिति स्वायत्त शासकों की तरह थी। वे राजा, राव, राणा, रावत आदि कहलाते थे। चौधरी परगने का अधिकारी होता था और परगने के अन्य जमींदारों से कर वसूलता था। अपने परंपरागत नानकार के अतिरिक्त चौधरियों का वसूले गये भू-राजस्व में भी अलग से हिस्सा मिलता था जिसे चौधराई कहा जाता था जो कुल राजस्व का 2.5 प्रतिशत होता था। जमींदारों के विपरीत चौधरी की नियुक्ति राज्य द्वारा होती थी और उसे ठीक ढंग से काम न करने पर किसी भी समय हटाया जा सकता था।

प्रत्येक गाँव में आनुवांशिक पदाधिकारी होता था। गाँव का मुखिया उत्तर भारत में मुकद्दम तथा पटेल कहलाता था। उसे गाँव में राजस्व मुक्त भूमि मिलती थी और वसूले गये राजस्व में नगद हिस्सा मिलता था। उनकी सहायता के लिए लेखपाल भी होते थे जो उत्तर भारत में पटवारी तथा दक्षिण भारत में कुलकर्णी कहलाते थे। मुकद्दम और पटवारी के पद तथा उनसे जुड़े हुए अधिकार वंशानुगत होते थे। कृषकों के भूमि संबंधी अधिकार स्पष्ट नहीं थे जब तक वे खेती करते थे तब तक उनका अधिकार होता था। धनी किसानों को उत्तर भारत में खुदकाश्त, राजस्थान में घरहुल और महाराष्ट्र में मिरासदार कहा जाता था। उसी तरह गरीब किसानों को उत्तर भारत में रेजा और रियाजा, राजस्थान में पालती और महाराष्ट्र में कुन्वी कहा जाता था।

किसान वर्ग के विभाजन का आधार केवल आर्थिक ही नहीं होता था। गाँव के स्थायी निवासी उत्तर भारत में खुदकाश्त, महाराष्ट्र में मिरासहार और दक्कन में थालकर कहा जाता था और अस्थायी निवासी को उत्तर भारत में पाहिकाश्त और महाराष्ट्र में उपरी कहा जाता था।

  • खुदकाश्त- वे किसान जो अपनी भूमि पर खेती करते थे।
  • पाहिकाश्त- जिनके पास अपने हल बैल होते थे और वे दूसरे गाँव में जाकर खेती करते थे।
  • मुजारियन- उनकी स्थिति बटाईदारों जैसी होती थी और वे प्राय: इनाम की भूमि पर काम करते थे।

सिंचाई और फसल के प्रकार- सिंचाई के लिए पर्शियन व्हील का प्रयोग होता था। कुएँ से जल निकालने के लिए लीवर का प्रयोग होता था। आइन-ए-अकबरी में 17 रबी फसल और 26 खरीफ फसल बतायी गयी है। मुगल काल में कलम लगाने की प्रणाली विकसित हुई। मुगल काल में खरीफ फसल के साथ-साथ रबी फसल का भी महत्त्व बढ़ने लगा। सभी मुगल शासकों में शाहजहाँ दो नहरें बनवायी- 1. नहर फैज 2. शाही नहरा 16वीं शताब्दी में पुर्तगली तंबाकू को भारत में लाये और महाराष्ट्र में तंबाकू की खेती शुरू हुई। 17वीं शताब्दी में ज्वार की खेती शुरू हुई। 18वीं सदी में मक्का की खेती महाराष्ट्र एवं पूर्वी राजस्थान में प्रारंभ हुई। 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में कॉफी का उत्पादन शुरू हुआ और 18वीं सदी में आलूलाल मिर्च और टमाटर की खेती शुरू हुई। अमेरिका को तंबाकू, अन्नानास, काजू, आलू का निर्यात होता था। मध्य एशिया को तरबूज, अमरूद और खरबूजे का निर्यात होता था। लैटिन अमेरिका को मक्का का निर्यात होता था।

नकदी फसल को जिस-ए-कामिल या जिंस-ए-आला कहा जाता था। नकदी फसलों में सबसे अधिक खेती गन्ना की होती थी। फिर कपास, नील, अफीम और तंबाकू की खेती होती थी। पुर्तगालियों द्वारा अन्नानासपपीता और काजू अमेरिका से लाए गए थे। काबुल से चेरी लाई गई और उसकी कलम लगाकर कश्मीर में उसकी खेती शुरू की गई। 1550 ई. में कलम लगाने की पद्धति विकसित हुई। बयाना और सरखेज में नील की माँग सबसे अधिक थी। आगरा के निकट बयाना में उपजाया जाने वाला नील उत्तम कोटी का माना जाता था और उसका मूल्य भी ज्यादा होता था। बिहार तथा मालवा में अच्छे प्रकार के अफीम की खेती होती थी।

  • खनिज-शोरा- आरंभ में अहमदाबाद, बड़ौदा, दिल्ली और आगरा में (17वीं सदी के उत्तरार्ध में पटना) बनता था।
  • सोना- फिच महोदय ने बिहार की नदी की रेत से सोना निकालने की विधि के बारे में बताया है।
  • ताँबा- राजस्थान की खानों से तांबा निकाला जाता था।
  • लोहा- अबुल फजूल के अनुसार-बंगाल, इलाहाबाद, आगरा, बिहार, गुजरात, दिल्ली, और कश्मीर में लोहा बनाया जाता था।
  • कागज बनाने की कला अहमदाबाद, दौलताबाद, सियालकोट, लाहौर और पटना में विकसित अवस्था में थी।

मुगलों की शासन व्यवस्था

मुगलों के राजत्व की अवधारणा तुर्की मंगोल परंपरा पर आधारित थी। तुर्की मंगोल परंपरा में शक्तिशाली राजतंत्र की अवधारणा थी। मंगोल खलीफा की सत्ता को नहीं मानते थे। चंगेज खाँ के पौत्र हलाकू खाँ ने बगदाद के खलीफा की हत्या कर दी। मुगलों ने भी मंगोलों के प्रभाव में खलीफा की सत्ता को नकार दिया। मुगल शासकों ने अपने को खलीफा घोषित किया। अपनी विदेश नीति की बाध्यता के कारण भी मुगलों ने अपने को खलीफा घोषित किया।

बादशाह और सुल्तान में अंतर- सुल्तान अपने से ऊपर खलीफा की सत्ता को मानते थे, जबकि बादशाह अपने को खलीफा मानते थे। बाबर ने अपने को बादशाह या पादशाह घोषित किया था।

अकबर के समय राजत्व का भारतीयकरण भी हुआ। अकबर अपने सम्मुख चक्रवर्ती सम्राट् की अवधारणा रखता था। वह अवधारणा भारतीय परंपरा पर आधारित थी। अबुल फजल ने राजत्व को फर्र-ए-इज्दी (दैवी प्रकाश) कहा है जो देवता से निकलता है और सीधे राजा पर पड़ता है। जहाँगीर ने अकबर के सुलह-ए-कुल की नीति को बनाये रखा और शाहजहाँ ने भी कुछ हद तक इसका अनुशरण किया किन्तु औरंगजेब ने इसे उलट दिया। औरंगजेब का घोषित उद्देश्य दर-उल-हर्ब (मूर्ति पूजक का देश) को दर-उल-इस्लाम (इस्लाम का देश) बनाना था। औरंगजेब विचार, व्यवहार और कार्य में अकबर के विपरीत था।

मुगल शासन का स्वरूप- दिल्ली के सुलतानों के विचारों एवं सिद्धान्तों से भिन्न विचारों और सिद्धांतों पर मुगल शासन की स्थापना मुख्यत: अकबर का कार्य था। उसके दो पूर्वाधिकारियों- बाबर तथा हुमायूँ- में असैनिक सरकार की पद्धति को रूपायित करने के लिए बाबर को न तो समय था और न अवसर ही तथा हुमायूँ का न तो झुकाव था और न योग्यता ही। यद्यपि अकबर उच्च श्रेणी की राजनैतिक प्रतिभा से सम्पन्न था तथापि कुछ बातों में वह सूरों के शासन सम्बन्धी संगठन का ऋणी था। मुगल सरकार भारतीय तथा गैर-भारतीय तत्वों का सम्मिश्रण थी। कह सकते हैं कि यह भारतीय वातावरण में पारसी-अरबी प्रणाली थी। यह स्वरूप में मुख्यतया सैनिक भी थी तथा मुगल राज्य के प्रत्येक अफसर को सेना की सूची में नाम लिखना पड़ता था। यह आवश्यक रूप में एक केन्द्रीकृत एकतंत्री शासन था तथा बादशाह की शक्ति असीम थी। उसका शब्द कानून था तथा उसकी इच्छा का कोई विरोध नहीं कर सकता था। वह राज्य में सर्वोच्च अधिकारी, शासन का प्रधान, राज्य की सेनाओं का अध्यक्ष, न्याय का स्रोत तथा प्रधान कानून-स्रष्टा था। वह अल्लाह का खलीफा था तथा (इस्लामी) धर्मग्रंथों एवं इस्लामी परम्पराओं का पालन करना उसका कर्त्तव्य था। परन्तु व्यवहारिक रूप में यदि कोई प्रबल बादशाह चाहता, तो वह धार्मिक कानून (इस्लामी कानून) के विरुद्ध कार्य कर सकता था। आधुनिक मंत्रिमंडल जैसी कोई वस्तु नहीं थी। मंत्री परामर्श देने के अधिकार का दावा नहीं कर सकते थे। उनके परामर्श को स्वीकार करना अथवा नहीं करना बिलकुल बादशाह की खुशी पर था। वास्तव में बहुत-कुछ बादशाह तथा उसके मत्रियों के व्यक्तिगत व्यक्तित्व पर निर्भर था। शाहजहाँ जैसा विवेकी शासक सदैव एक सादुल्ला खाँ से सलाह लेना चाहता था, जबकि हुसैन अली खाँ जैसे मंत्री को अपने द्वारा गद्दी पर बैठाये गये कठपुतलों की कोई परवाह न थी, बल्कि उनके प्रति खुल्लमखुल्ला घृणा तक थी। फिर भी भारत के पहले छः मुगल बादशाहों की प्रबल सामान्य-बुद्धि थी। अत: उनका एकतंत्री शासन भ्रष्ट होकर ऐसे असहनीय निरंकुश शासन में परिवर्तित नहीं हो गया, जो लोगों के अधिकारों तथा रीतियों को पैरों तले कुचलता चले। परोपकारी स्वेच्छाचारियों की प्रवृत्ति से सम्पन्न रहने के कारण ये बादशाह, एक या दूसरे तरीके से, अपनी प्रजा की भलाई के लिए कठिन परिश्रम करते थे-विशेष रूप से केन्द्रीय राजधानी के चारों ओर के क्षेत्रों तथा प्रान्तों में राजप्रतिनिधियों की सरकारों के स्थान पर। परन्तु उन दिनों राज्य कोई समाजवादी कार्य नहीं करता था और न तब तक ग्रामवासियों के जीवन में हस्तक्षेप ही करता था जब तक उस इलाके में कोई हिसात्मक अपराध अथवा राजा की प्रभुता का विरोध न हो। एक दृष्टिकोण से मुगल बादशाहों की विशाल शक्ति अत्यन्त सीमित थी। उनके आदेश साम्राज्य के सुदूरवर्ती कोनों में सदैव आसानी से लागू नहीं किये जा सकते थे-छोटा नागपुर तथा संथाल परगने के कुछ पहाड़ी इलाकों का तो कुछ कहना ही नहीं था, जिन्होंने संभवत: उनके आधिपत्य को कभी माना ही नहीं। जब हम लगभग प्रत्येक बादशाह को अपने राज्यकाल के प्रथम वर्ष में एक ही प्रकार के करों और चुगियों के उठाने की आज्ञा देते हुए पाते हैं, तब हमें यह विश्वास करना पड़ता है कि इनके उठाने के पिछले प्रयत्न निष्फल और अकार्यकारी हुए। भारत के अंग्रेजी कारखानों (फैक्ट्रियों) के कागजात में यह दिखलाने के लिए प्रचुर संकेत हैं कि शाहजहाँ तथा औरंगजेब के जमाने तक में (उनके दुर्बल उत्तराधिकारियों के राज्यकालों का तो कुछ कहना ही नहीं) सूबेदार, प्रान्तीय दीवान एवं चुंगी-अफसर कभी-कभी केन्द्रीय सरकार की आज्ञा के विरुद्ध काम किया करते थे और अधिकतर स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से ही ऐसा होता था।

सरदार वर्ग- कई कारणों से सरदार-वर्ग विभिन्न तत्वों की मिश्रित संस्था थी- जैसे तुर्क, तार्तार, पारसी तथा भारतीय मुसलमान और हिन्दू। अत: यह एक शक्तिशाली सरदार-वर्ग के रूप में अपना संगठन नहीं कर सका। कुछ यूरोपियनों को भी सरदारों की उपाधियाँ मिलीं। सिद्धान्त रूप में सरदार- वर्ग पुश्तैनी न होकर बिलकुल अधिकारी वर्ग था। सरदार को जागीर केवल जीवन भर के लिए मिलती थी तथा उसकी मृत्यु के पश्चात् बादशाह की हो जाती थी तथा उपाधियाँ और वेतन सामान्यतः पिता से पुत्र को नहीं दिये जा सकते थे। उत्तराधिकारी के अभाव में जायदाद की बादशाह द्वारा जब्ती की प्रथा का परिणाम अत्यन्त हानिकारक हुआ। सरदार अतिव्ययी जीवन व्यतीत करने लगे। वे अपनी जीवन-काल में ही अपनी सारी संपत्ति अनुत्पादक विलास में नष्ट कर देते थे। इससे भारत को एक स्वतंत्र पैतृक कुलीनवर्ग के रूप में जनता की स्वतंत्रता का एक प्रबल रक्षक तथा राजा की निरंकुशता पर एक प्रबल प्रतिबन्ध नहीं मिल सका। इस स्वतंत्र पैतृक कुलीन वर्ग की स्थिति तथा सम्पत्ति प्रत्येक पीढ़ी में राजा की कृपा पर निर्भर नहीं रहती थी और इस कारण वह राजा के सनकीपन की आलोचना तथा राजा की निरंकुशता का विरोध करने का साहस कर सकता था।

नौकरशाही- साम्राज्य की सैनिक शक्ति बनाये रखने के लिए मुगलों को बड़ी संख्या में विदेशी साहसिकों को नियुक्त करना आवश्यक हो गया। यद्यपि अकबर ने भारत भारतीयों के लिए की नीति आरम्भ की तथा हिन्दुओं के लिए सरकारी पद खोल दिया, फिर भी मुगल लोक-सेवा (सरकारी नौकरियों) में विदेशी तत्वों की प्रधानता रही। लोक-सेवाओं का सामान्य स्वरूप जहाँगीर तथा शाहजहाँ के राज्यकालों में अपरिवर्तित रहा। परन्तु उनकी कार्यक्षमता में जहाँगीर के राज्यकाल से ही हास आरम्भ हो गया, उसके पुत्र के राज्यकाल में यह हास ध्यान आकृष्ट करने लायक हो गया, औरंगजेब के राज्यकाल में उससे भी अधिक ध्यान आकृष्ट करने लायक हो गया।

राज्य के प्रत्येक अफसर को एक मनसब मिला हुआ था। यह श्रेणी एवं लाभ से युक्त सरकारी नियुक्ति होती थी। अतएव सिद्धान्त रूप में प्रत्येक मनसब-प्राप्त अफसर को राज्य की सैनिक सेवा के लिए कुछ सिपाही भेजना आवश्यक था। इस प्रकार मनसबदार देश के अधिकतर सरदार थे तथा यह प्रबन्ध सेना, कुलीन वर्ग और असैनिक शासन सब-कुछ मिलकर एक था। अकबर ने पदाधिकारियों को तेंतीस वगों में बाँटा, जिनमें दस के सेनापति से लेकर दस हजार के सेनापति तक थे।

अकबर के राज्यकाल के मध्य तक एक साधारण अफसर जो ऊँचे-से-ऊँचा पद पा सकता था वह पाँच हजार के सेनापति का पद था। सात हजार से दस हजार तक के सेनापतियों के उच्चतर पद राजपरिवार के सदस्यों के लिए सुरक्षित थे परन्तु उसके राज्य-काल के अन्त में यह बन्धन ढीला कर दिया गया तथा उसे उत्तराधिकारियों के अधीन अफसर काफी उच्चतर पदों तक पहुँच गये। मनसबदारों को बादशाह सीधे नियुक्त करते, प्रोन्नति देते, मुअत्तल करते अथवा पदच्युत करते थे। प्रत्येक वर्ग के लिए वेतन की एक निश्चित दर थी। इस वर्ग के अधिकारी से इसी रकम में से घोड़ों, हाथियों, बोझ ढोने वाले पशुओं तथा गाड़ियों के रखने का खर्च निकालने की आशा की जाती थी। परन्तु मनसबदार इस शर्त को शायद ही कभी पूरा करते थे। (सेना का) संग्रह करने तथा (घोड़ों के) दागने (के नियमों) के बावजूद हम असंदिग्ध रूप से यह मान सकते हैं कि बहुत कम मनसबदार घुड़सवारों का भी पूरा भाग रखते थे, जिसके लिए वेतन पाते थे। मनसबदारी का पद पैतृक नहीं था। राज्य की किसी खास सेवा के बराबर अधिकारी उसी सेवा में रहकर विशेषज्ञता प्राप्त करें ऐसी बात नहीं थी और किसी भी क्षण किसी अफसर को बिलकुल नया कार्य दिया जा सकता था। अकबर की उचित व्यक्ति के उचित पद के लिए चुनने की अद्भुत योग्यता ने इस प्रणाली के दोषों को रोक रखा, किन्तु आगे चलकर शासकों के व्यक्तित्व के बदलने के साथ ह्रास प्रारम्भ हो गया।

मुगल सरकार के अफसर अपना वेतन दो प्रकार से पाते थे या तो वे राज्य से नकद रूप में पाते थे अथवा कभी-कभी उन्हें कुछ समय के लिए जागीरें दे दी जाती थीं। परन्तु उन्हें अपनी जागीरों में भूमि पर किसी प्रकार का अधिकार नहीं दिया जाता था। वे केवल निर्दिष्ट इलाकों से अपने वेतन के बराबर भूमि-राजस्व वसूल कर उसका उपभोग कर सकते थे।

कुछ भी अधिक वसूलना न केवल कृषकों के प्रति अन्यायपूर्ण था, बल्कि यह राज्य के विरुद्ध फरेब भी था। प्राय: जागीरें एक मनसबदार से लेकर दूसरे को दे दी जाती थीं। फिर भी जागीर-प्रथा से जागीरदारों को कुछ अनुचित शक्ति तथा स्वतंत्रता मिल गयी। अतएव अकबर ने उचित ही, शेरशाह की तरह, यथासंभव अपने अफसरों को नगद वेतन देने तथा जागीर की भूमि को खालसा भूमि में परिवर्तित करने का प्रयत्न किया। चाहे मुगल लोक-सेवकों का वेतन नकद दिया जाता हो अथवा जागीरों के रूप में किन्तु जैसा कि हमें आईने-अकबरी से मालूम होता है, उनके वेतन अत्यन्त अधिक थे। इससे पश्चिमी एवं मध्य एशिया के बहुत-से साहसिक अफसर आकृष्ट होकर आये थे। औरंगजेब के राज्यकाल के पहले नहीं तो बाद में मुगल लोक-सेवा में बहुत बुराइयाँ प्रवेश कर गई।

शासन के प्रमुख अधिकारी- यद्यपि मुगल बादशाहों को पूर्ण अधिकार थे, किन्तु सरकार के विभिन्न विभागों में विविध सरकारी मामलों के प्रबन्ध के लिए वे बहुत-से अफसर नियुक्त कर देते थे। राज्य के प्रमुख विभाग थे-

  1. खान-ए-सामान के अधीन शाही परिवार,
  2. दीवान के अधीन कोष,
  3. मीर बख्शी के अधीन सैनिक वेतन तथा लेखा-जोखा कार्यालय,
  4. प्रधान काजी के अधीन न्याय विभाग,
  5. प्रमुख सदर अथवा सदरेसदूर के अधीन धार्मिक धन समर्पण तथा दान तथा
  6. मोहतासिब के अधीन प्रजा के चरित्र एवं व्यवहार की देख-भाल।

दीवान-ए-आला अथवा वजीर प्रायः राज्य का सर्वोच्च अफसर हुआ करता था क्योंकि वह राजस्व एवं वित्त का प्रधान अधिकारी रहता था। बख्शी कई प्रकार के कार्य करता था। राज्य के उन सभी अफसरों का, जो सिद्धान्त रूप में सैनिक विभाग के थे, वेतनदाता अफसर होने के अतिरिक्त वह सेना में भर्ती भी किया करता तथा मनसबदारों एवं अन्य उच्चाधिकारियों की सूचियाँ रखता था। युद्ध की तैयारी करते समय वह बादशाह के समक्ष सेना की सम्पूर्ण नामावली उपस्थित करता था। खाने-सामान बड़ी तथा छोटी दोनों वस्तुओं के सम्बन्ध में सम्पूर्ण राजकीय परिवार का अधिकार था। मोहतासिब पैगम्बर की आज्ञाओं तथा सदाचार के नियमों के पालन की देखभाल करते थे।

1. वकील या वजीर- वजारत की संस्था जिसे वकालत के नाम से भी जाना जाता था खलीफाओं के समय से ही प्रचलित थी। भारत में वजीर शब्द के बदले वकील शब्द प्रचलित हो गया। वकील संपूर्ण प्रशासन का पर्यवेक्षण करता था और बादशाह वकील के माध्यम से ही अन्य अधिकारियों से संपर्क स्थापित करता था। बाबर का वजीर निजामुद्दीन अहमद और हुमायूँ का वजीर हिन्दू बेग था। अकबर के समय बैरम खाँ ने उस पद को और भी शक्तिशाली बना दिया। बैरम खाँ के विद्रोह के बाद इस पद का महत्त्व घटने लगा और यह पद औपचारिक रूप से तो बना रहा परंतु व्यवहारिक रूप में शक्तियों से वचित हो गया। उस पद पर कुछ बुजुर्ग उमरा को नियुक्त किया जाता था। कभी-कभी यह पद वर्षों तक खाली रहता था, उदाहरण के लिए मुनीम खाँ के बाद यह पद वर्षों तक खाली रहा।

2. दीवान-ए-आला या दीवान-ए-कुल- आगे चलकर वजीर या वकील की वित्तीय शक्तियाँ दीवान को दे दी गई। इसे राजस्व एवं वित्त का अधिभार दे दिया गया। यह भू-राजस्व का आकलन एवं उसकी वसूली का निरीक्षण करता था। वह उससे संबंधित हिसाब की जाँच भी करता था। उसके कायों के सहायता करने के लिए उसके अंतर्गत बहुत से अधिकारी थे उदाहरण के लिए-

  • दीवान-ए-खालसा – खालसा भूमि का निरीक्षण
  • दीवान-ए-तन – नगद वेतन से संबंधित
  • दीवान-ए-जागीर – जागीर भूमि का निरीक्षण
  • दीवान-ए-वयुतत – राजकीय कारखानों का निरीक्षण
  • शाहीद-ए-तौजिन – सैनिक लेख का प्रभारी
  • मुशरिफ-ए-खजाना – खजांची

दीवान के पद के महत्त्व को कम करने के लिए एक से अधिक दीवानों की भी नियुक्ति की जाती थी। कभी-कभी तो दीवानों की संख्या 10 तक पहुँच जाती थी।

1. मीर बख्शी- सल्तनत काल के दीवान-ए-आरिज के बदले मुगल काल में बख्शी का पद आया। यह साम्राज्य का सर्वोच्च भुगतान अधिकारी होता था चूंकि मुगल काल में मनसबदारी पद्धति थी और सैनिक एवं असैनिक सेवाओं में एकीकरण किया गया था इसलिए यह साम्राज्य के सभी अधिकारियों को भुगतान करता था। यह मनसबदारों की नियुक्ति के लिए सिफारिश तथा उसके लिए जागीर की अनुशंसा करता था। जागीर देने का काम दीवान-ए-आला करता था। इस तरह रोक और संतुलन के द्वारा दोनों पद एक दूसरे को नियंत्रित करते थे। मीर बख्शी एक महत्त्वपूर्ण पद था और मुगल काल में अमीरों का नेता दीवान न होकर मीर बख्शी होता था।

2. दीवान-ए-समाँ या खान-ए-समा- यह राजकीय कारखानों का निरीक्षण करता था। यह राजकीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कारखानों में उनका उत्पादन करता था। उस पद पर रोक और संतुलन बनाने के लिए राजकीय कारखानों के आय व्यय की जाँच का अधिकार दीवान-ए-आला को दिया गया था। आगे चलकर यह पद बहुत ही महत्त्वपूर्ण हो गया और कालांतर में इस पद ने मीर बख्शी के पद को भी आच्छादित कर दिया। अकबर के समय भारमल को उस पद पर नियुक्त किया गया था और जहाँगीर के समय आसफ खाँ को। दीवान-ए-आला के पद पर सर्वप्रथम मुज्जफर खाँ को नियुक्त किया गया था। बाद में टोडरमल को नियुक्त किया गया।

3. सद्र-उस-सुद्र (सदर-ए-सदूर)- यह बादशाह का मुख्य धार्मिक परामर्शदाता होता था। यह धार्मिक अनुदानों को नियंत्रित करता था। साथ ही यह धार्मिक मामलों से सम्बन्धित मुकदमें भी देखता था। अब्दुल नबी के समय इस पद की मर्यादा गिर गई क्योंकि अकबर के मुख्य सद्र अब्दुल नबी ने धार्मिक अनुदानों में भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित किया। अत: अकबर भविष्य में इस प्रकार के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एक प्रस्ताव लाया। उसके अनुसार 15 एकड़ से अधिक भूमि के अनुदान में बादशाह का अनुमोदन आवश्यक था। शाहजहाँ के शासनकाल में काजी एवं मुख्य सद्र के पद एक ही व्यक्ति को दिए जाते थे। किंतु औरंगजेब के शासन-काल में मुख्य काजी एवं मुख्य सद्र के पद को अलग-अलग कर दिया गया। अत: मुख्य सद्र की शक्ति में कमी आई।

4. मुख्य काजी– यह न्याय विभाग का प्रधान होता था। परन्तु प्रायः काजी एवं सद्र का पद एक ही व्यक्ति को दिया जाता था। उदाहरण के लिए अब्दुल नबी मुख्य काजी एवं मुख्य सद्र दोनों था।

5. मोहतासिब- यह जनता के नैतिक आचरणों का निरीक्षण करता था और यह देखता था कि शरीयत के मुताबिक कार्य हो रहा है या नहीं। साथ ही वह माप-तौल का निरीक्षण भी करता था। अकबर के समय इसका धर्म निरपेक्ष कार्य अधिक महत्त्वपूर्ण था। इस समय उसके धार्मिक कार्यों में कटौती हो गयी थी।

इनके अतिरिक्त कुछ छोटे-छोटे पद भी थे जो निम्नलिखित थे-

  • मीर-ए-आतिश या दरोगा-ए-तोपखाना तोपखाना विभाग से संबंधित
  • दरोगा-ए-डाक चौकी
  • मीर माल – टकसाल का प्रधान
  • मीर बहरी – जल सेना का प्रधान
  • मीर बर्र – वन अधीक्षक
  • बाकया-ए-नवीश समाचार प्रेषक
  • मीर अर्ज बादशाह के पास भेजी गई अर्जियों का अधिकारी।

प्रांतीय प्रशासन- बाबर ने अपने साम्राज्य का विभाजन जागीरों में कर दिया था। इसके समय किसी भी प्रकार की प्रांतीय व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी। हुमायूँ के पास समय का अभाव रहा था। इसलिए उसने कोई कदम नहीं उठाया। शेरशाह ने स्थानीय प्रशासन की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया था किंतु जैसा कि इतिहासकारों का मानना है उसके समय सुसंगठित प्रांतीय व्यवस्था विकसित नहीं हुई थी।

सबसे पहले एकरूप प्रांतों का निर्माण अकबर के समय हुआ। 1580 ई. में उसने अपने साम्राज्य का विभाजन 12 प्रांतों में किया। ये थे-

1. आगरा, 2. दिल्ली, 3. इलाहाबाद, 4. अवध, 5. अजमेर, 6. अहमदाबाद, 7. बिहार, 8. बंगाल, 9. काबुल, 10. लाहौर, 11. मुल्तान, 12. मालवा।

उसके शासन काल के अंत में प्रांतों की संख्या 15 हो गई अर्थात् बरारखानदेश, अहमदनगर क्षेत्र जुड़ गए। जहाँगीर के समय प्रांतों की संख्या 17 थी और औरंगजेब के समय प्रांतों की संख्या 21 थी।

अकबर की प्रशासनिक नीति दी बातों पर अधारित थी-

  1. प्रशासनिक एकरूपता,
  2. रोक एवं संतुलन

प्रांतीय प्रशासन केन्द्रीय प्रशासन का ही प्रतिरूप था। प्रांतीय प्रशासन का प्रमुख नजीब, सूबेदार या सरसुबा होता था। वह सूबे का सर्वोच्च अधिकारी होता था। उसकी नियुक्ति बादशाह करता था। सूबेदार का कार्यकाल आमतौर पर तीन वर्ष का होता था।

केन्द्रीय दीवान की अनुशंसा पर बादशाह प्रांतीय दीवान की नियुक्ति करता था। प्रांतीय दीवान नजीम के बराबर का अधिकारी होता था और कभी-कभी श्रेष्ठ अमीरों को भी दीवान का पद दे दिया जाता था। उसी तरह केन्द्रीय बख्शी की अनुशंसा पर प्रांतीय बख्शी की नियुक्ति होती थी और प्रांतीय बख्शी सुरक्षा से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण बातें नजमी को बताये बिना केन्द्रीय बख्शी तक प्रेषित कर सकता था। प्राय: प्रांतीय बख्शी ही बरीद-ए-मुमालिक के पद को सुशोभित करता था। अकबर ने केन्द्रीय सद्र की शक्ति को कम करने के लिए प्रांतीय सद्र को नियुक्त करना प्रारंभ किया। अब प्रांतीय सद्र के परामर्श पर भी धार्मिक बातों का निर्णय किया जाता था।

सरकार- प्रान्तों का विभाजन सरकारों में होता था। सरकार के जुड़े हुए निम्न अधिकारी थे- फौजदार, अमालगुजार, खजानदार, वितिक्ची।

  1. फौजदार शांति व्यवस्था की देखरेख करता था और अमालगुजार को, भू-राजस्व को प्रशासन में सहयोग करता था।
  2. अमालगुजार भू-राजस्व प्रशासन से जुड़ा हुआ अधिकारी था। कभी-कभी एक सरकार में कई-कई फौजदार होते थे तो कभी-कभी दो सरकारों पर एक फौजदार भी होता था।
  3. खजानदार सरकार के खजाने का संरक्षक होता था।
  4. बितिक्ची एक फारसी शब्द है, जिसका अर्थ होता है लेखक।

शाहजहाँ के शासनकाल में प्रशासनिक ईकाई के रूप में चकला का संगठन हुआ। चकला कई परगनों से मिलकर बनता था।

परगना- सरकार का विभाजन परगनों में होता था। परगनों से जुड़े हुए निम्नलिखित अधिकारी थे-शिकदार, शांति व्यवस्था का संरक्षक था तथा भू-राजस्व संग्रह में आमिल की सहायता करता था। आमिल भू-राजस्व प्रशासन से जुड़ा हुआ था। पोतदार खजांची को कहा जाता था। कानूनगो गाँव के पटवारियों का मुखिया एवं स्वयं कृष्य भूमि का पर्यवेक्षक होता था।

सबसे नीचे ग्राम होता था। इससे जुड़े हुए अधिकारी मुकद्दम और पटवारी थे। मुगल काल में ग्राम पंचायत की व्यवस्था थी। इस विभाजन के अतिरिक्त नगरों में कानून व्यवस्था की देखरेख के लिए कोतवाल की नियुक्ति होती थी। अबुल फजल के आइन-ए-अकबरी में कोतवाल के कार्यों का विवरण दिया गया है। उसी तरह प्रत्येक किले पर किलेदार की नियुक्ति होती थी।

बंदरगाह प्रशासन- यह प्रांतीय अधिकारी से स्वतंत्र होता था। बंदरगाह के गवर्नरों को मुतसद्दी कहा जाता था। ये सीधे सम्राट् के द्वारा नियुक्त होते थे। कभी-कभी इस पद की नीलामी होती थी। इसके अन्तर्गत एक अधीनस्थ अधिकारी होता था। जिसे शाह बदर भी कहा जाता था। कुछ इतिहासकार जिनमें इरफ़ान हबीब एवं अतहर अली प्रमुख है, मुग़ल प्रशासनिक ढांचा को अतिकेंद्रित मानते हैं।

मनसबदारी पद्धति

मनसब फारसी शब्द है जिसका अर्थ होता है प्रतिष्ठा का स्तर पद। मनसबदारी व्यवस्था अकबर ने अपने शासन के 19वें वर्ष अर्थात् 1575 ई. में प्रारंभ किया। बाबर के समय प्रशासनिक अधिकारियों को वजहदार कहा जाता था और अकबर के समय उसे मनसबदार कहा जाने लगा।

अकबर की मनसबदारी व्यवस्था मंगोलो की दशमलव प्रणाली पर आधारित थी। यह मंगोलो की सैनिक व्यवस्था से प्रभावित थी। किन्तु प्रेरणा भले ही मंगोल पद्धति से मिली परंतु अकबर ने अपनी प्रतिभा के अनुकूल इसे एक मौलिक पद्धति बना दिया। मनसबदारी व्यवस्था वह व्यवस्था थी जिसमें अमीर वर्ग, सेना और सिविल अधिकारी तीनों का एकीकरण किया गया। प्रत्येक मनसबदार का रैक दो अंकों में व्यक्त होता था। प्रथम अंक-जात रैक, द्वितीय अंक सवार रैक का बोधक होता था। जात शब्द से किसी भी अधिकारी की श्रेणी, अधिकारियों के बीच उसका स्थान और उसका वेतन निर्धारित होता था। और सवार रैंक से यह निर्धारित होता था कि संबंधित अधिकारी के अंतर्गत कितनी सेना रखी गयी है।

मनसबदारों की तीन श्रेणियाँ होती थीं-

  1. सवार रैक जात रैंक के बराबर
  2. सवार रैंक जात रैंक से आधा या आधे से अधिक
  3. सवार रैंक जात रैंक के आधे से कम

किसी भी स्थिति में सवार रैंक जात रैंक से अधिक नहीं हो सकता था अबुल फजल के आइने-ए-अकबरी से ज्ञात होता है कि मनसबदारों की 6 श्रेणियाँ थी पर उनमें 33 श्रेणियाँ प्रचलित थी। अपवाद है राजा मान सिंह एवं मिजा अजीज कोका। राजकुमारों को कभी-कभी बड़ी मनसबदारी भी दी जाती थी। उदाहरण के लिए, दाराशिकोह को 60 हजार रैंक की मनसबदारी दी गयी थी।

  1. 10 से 500 जात तक – मनसबदार
  2. 500 से 2500 जात तक – अमीर
  3. 2500 से अधिक जात – अमीर-उल-उमदा

प्रत्येक सवार पर दो घोडे रखे जाते थे और उसे दह बिशती (10:20) प्रणाली कहा जाता था। जिस सवार के पास एक घोड़ा होता था उसे आधा सवार या नीम सवार कहा जाता था।

मनसबदारों की नियुक्ति में मीर बख्शी बादशाह के सामने प्रत्याशियों को प्रस्तुत करता था। बादशाह मनसबदारों को नियुक्त करता था। नियुक्ति में खानजादों को प्राथमिकता दी जाती थी। इस व्यवस्था में प्रतिभा के लिए गुंजाइश थी। अधिकारियों की पदोन्नति एवं अवनति की जा सकती थी। मुगल मनसब का आकर्षण इतना तीव्र था कि 1636 ई. में बीजापुर के शासक इब्राहिम आदिलशाह ने शाहजहाँ से बीजापुर के अमीरों को मनसब नहीं देने का अनुरोध किया था।

जागीर प्रथा- अकबर मनसबदारों का वेतन नगद में देना चाहता था परन्तु उस समय के कुलीन वर्ग को भू संपत्ति से जबरदस्त आकर्षण था इसलिए कुछ अधिकारियों को जागीर में वेतन दिया जाता था। कुछ मनसबदारों को नगद में वेतन दिया जाता था और कुछ अन्य को जागीर में और कुछ को नगद एवं जागीर दोनों में वेतन दिया जाता था। जागीरों में अनुमानित आय को जमादामी कहा जाता था क्योंकि इसका आकलन दाम के रूप में होता था। उस काल में एक रुपया 40 दाम के बराबर होता था।

जमा में भूराजस्व, अंतर्देशीय पारगमन शुल्क सीमा शुल्क, और शायद जेहाद नामक अन्य कर भी शामिल होता था। निर्धारित वेतन में कटौती का भी प्रावधान था। सबसे अधिक कटौती दक्खिनियों से की जाती थी। जिनके वेतन का 1/4 हिस्सा काट लिया जाता था इसके अतिरिक्त सम्राट् के मवेशियों के चारे के खर्च के लिए खुराक दब्बाव नामक कटौती की जाती थी। नकद वेतन प्राप्त करने वाले में से एक रुपये में दो दाम काट लिया जाता था।

कुलीनों की संपत्ति का अधिग्रहण, राज्य की माँग के अनुसार समायोजन तथा कुलीन और इसके उत्तराधिकारियों के बीच इसके बँटवारे का काम खान-ए-समाँ नामक अधिकारी करता था। कभी-कभी सम्राट् इस्लामी उत्तराधिकार कानून की परवाह न करके अमीर की संपत्ति का बँटवारा इसके उत्तराधिकारियों के बीच कर देता था। 1666 ई. में औरंगजेब ने फरमान जारी किया कि उत्तराधिकारीहीन कुलीन की मृत्यु के बाद सारी संपत्ति राजकोष की हो जायेगी। 1691 ई. के फरमान में इन कुलीनों की संपत्ति नष्ट न करने का आदेश दिया गया जिनके उत्तराधिकारी राज्य सेवा में कार्यरत थे।

इक्ता और जागीर में अंतर- इक्तादारी में संबंधित इक्तादार इक्ता के प्रशासन से भी जुड़े हुए थे किंतु जागीर में प्रशासन का काम सरकारी अधिकारियों के हाथ में था और जागीरदार केवल भूराजस्व से संबंध रखते थे। दूसरी बात, इक्तादारी व्यवस्था में फवाजिल की गुंजाइश होती थी। फवाजिल (अतिरिक्त रकम) को केन्द्रीय खजाने में भेज दिया जाता था। जागीर में फवाजिल की गुंजाइश नहीं थी। संबंधित मनसबदार को उतनी ही जागीर दी जाती थी जितना उनका वेतन होता था। जागीर निम्नलिखित प्रकार की थे-

  1. जागीर-ए-तनख्वाह- वेतन के रूप में दी गई जागीर।
  2. मसरूत- किसी व्यक्ति को दी गई सशर्त्त जागीर।
  3. इनाम जागीर- यह पद एवं कार्य रहित होती थी और राज्य इसे किसी विशेष सेवा के बदले देता था।
  4. वतन जागीर- यह जागीर राजपूतों को दी जाती थी अर्थात् उनका अपना क्षेत्र उन्हें जागीर के रूप में दे दिया जाता था।

तनख्वाह जागीर वंशानुगत नहीं था और जागीरदारों को एक जागीर पर लगभग 3 वर्षों के लिए नियुक्त किया जाता था किन्तु वतन जागीर वंशानुगत थी और वह हस्तांतरणीय नहीं थी।

इसके अतिरिक्त जहाँगीर ने अलतम्मागा जागीर लागू की। यह जागीर मुस्लिमों को उसी प्रकार दी जाती थी। जिस प्रकार वतन जागीर हिन्दुओं को। जहाँगीर ने मनसबदारी पद्धति में एक नई बात जोड़ी जिसे दो अस्पा-सी अस्पा के नाम से जाना जाता है। इसके अनुसार, किसी भी मनसबदार के जात रैक में वृद्धि किए बिना उसके अंतर्गत सवारों की संख्या बढ़ाई जा सकती थी।

शाहजहाँ ने उसमें एक नई बात जोड़ी जो महाना वेतन पद्धति नाम से जानी जाती है। अब मनसबदारों को वेतन पूरे वर्ष का न देकर 10, 8, 6 महीने और 5 महीने के लिए दिए जाने लगे और अनुसार मनसबदारों के अधीन रखी गई सेनाओं की संख्या कम कर दी जाती थी। बहुत सारे इतिहासकारों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि ऐसा जागीरदारी संकट के कारण हुआ।

जागीरदारी संकट के कारण जमा दामी और हासिल दामी में अंतर आने लगा और यह संभवत: भूमि उत्पादकता में ह्रास के कारण हुआ। किंतु सतीश चन्द्र का मानना है कि वस्तुतः शाहजहाँ ने महाना वेतन, जमा दामी और हासिल दामी में अंतर के कारण नहीं निर्धारित किया क्योंकि जैसा कि हम मानते हैं कि शाहजहाँ के शासन-काल में जागीरों की आमदनी में कमी नहीं हुई थी। 17वीं सदी में ही पहली बार नकदी खेती को प्रोत्साहन मिला था। दूसरे महाना वेतन इन मनसबदारों पर भी लागू किया गया जिन्हें जागीर में वेतन न देकर नकद में वेतन दिया जाता था।

जागीरदारी संकट- यह एक आर्थिक समस्या न होकर प्रशासनिक समस्या थी। उत्तर भारत में जब प्रशासनिक ढाँचा कमजोर हो गया तो धीरे-धीरे जमींदारों ने शक्ति संचय कर लिया। जागीरों में जमींदार मनसबदारों को भू-राजस्व संग्रह में अवरोध उत्पन्न करने लगे और ऐसी जागीरें जोरतलब जागीर कहलाती थी। दूसरी तरफ कुछ जागीरें ऐसी थी जिनमें आसानी से भू-राजस्व संग्रह किया जा सकता था और ऐसी जागीरों को सैर हासिल जागीर कहा जाता था। स्वाभाविक रूप से मुगल दरबार में सैरहासिल जागीरों के लिए मनसबदारों में प्रतिस्पर्धा होने लगी। इसने गुटबंदी को प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप मुगल प्रशासनिक ढाँचा और भी चरमरा गया गया। औरंगजेब ने बहुत सारी जागीर भूमि और पैबाकी भूमि गया (ऐसी भूमि जो खालसा भूमि से अलग हो किंतु अभी तक किसी को जागीर के रूप में नहीं दिया हो) को खालसा भूमि में तब्दील कर दिया। साथ ही उसने मनसबदारों की संख्या में भी वृद्धि कर दी। अत: कभी-कभी एक ही जागीर कई मनसबदारों के बीच बँट जाती थी। इसने एक प्रकार की प्रशासनिक अव्यवस्था को उत्पन्न किया।

जहाँ तक गाँवों का सम्बन्ध था, मुगलों ने अपराधों के रोकने तथा पकड़ने का कोई नया प्रबन्ध नहीं किया। यह, जैसा चिर काल से होता आ रहा था, गाँव के मुखिया तथा उसके अधीन पहरेदारों की देखरेख में रहा। यह प्रबन्ध, जिसके द्वारा कभी-कभी अव्यवस्था के समय की गड़बड़ियों को छोड़कर स्थानीय इलाकों में काफी अंशों में सुरक्षा रहती थी, उन्नीसवीं सदी के आरम्भ तक चला। शहरों में सभी पुलिस कार्य, जिनमें सार्वजनिक व्यवस्था तथा शिष्टता बनाये रखने का कार्य भी शामिल था, कोतवालों को दे दिये गये। आईने-अकबरी के अनुसार कर्त्तव्य इस प्रकार थे- (1) चोरों को पकड़ना, (2) चीजों के मूल्य का निर्धारण करना था माप-तौल की जाँच करना, (3) रात में पहरा देना तथा शहर में चक्कर लगाना, (4) घरों, चालू सड़कों तथा नागरिकों की फेहरिस्त रखना तथा नवागन्तुकों की चालढाल पर नजर रखना, (5) घुमक्कड़ों में से भेदिये नियुक्त करना, निकटवर्ती गाँवों के मामलों तथा विभिन्न वर्गों के लोगों की आय और व्यय के विषय में सूचना एकत्रित करना, (6) उत्तराधिकारी-विहीन मृत अथवा खोये हुए व्यक्तियों की जायदाद की सूची तैयार करना तथा उसे अपने अधिकार में रखना (7) बैलों, भैसों, घोड़े अथवा ऊँटों की हत्या को रोकना तथा (8) स्त्रियों को अपनी इच्छा के विरुद्ध जलने से तथा बारह वर्षों से कम उम्र में सुन्नत करने से रोकना। डाक्टर यदुनाथ सरकार का विश्वास है कि आईने में कोतवाल के कर्त्तव्यों की यह लम्बी सूची केवल कोतवाल के आदर्श की न कि वास्तविक दशा की परिचायक है। परन्तु मनूची भी अपने व्यक्तिगत निरीक्षण से कोतवाल के कर्त्तव्यों का पूर्ण विवरण देता है। फिर भी यह निश्चित है कि कोतवाल का प्रमुख काम था शहरी इलाकों में शान्ति एवं सार्वजनिक सुरक्षा बनाये रखना। जिलों अथवा सरकारों में नियम और व्यवस्था प्राय: फौजदार-जैसे अफसर बनाये रखते थे। फौजदार, जैसा कि उसके नाम से पता चलता है, केवल देश में स्थित फौज का कमानदार होता था। उसे मामूली बलवों को कुचलना, डकैतों के दलों को भंग करना या कैद करना, सभी हिंसापूर्ण अपराधों की जानकारी रखना तथा राजस्व अधिकारियों, फौजदारी के न्यायाधीश अथवा दोष निरीक्षक के विरोधियों को डराने के लिए शक्ति का प्रदर्शन करना पड़ता था। पुलिस के प्रबन्ध कुछ बातों में कार्यसाधक थे, यद्यपि सार्वजनिक सुरक्षा की दशा स्थानों तथा समय के अनुसार बहुत बदलती रहती थी।

न्याय- मुगल युग में आज की तरह कानून बनाने की विधि अथवा लिखित नियम-व्यवस्था कुछ भी नहीं थी। इसके प्रसिद्ध अपवाद केवल ये थे-जहाँगीर की बारह आज्ञाएँ तथा फतवा-ए-आलमगीरी, जो औरंगजेब की देखरेख में बनी हुई मुसलमानी कानून की एक संक्षिप्त पुस्तक (डाइजेस्ट) थी। न्यायाधीश मुख्यत: कुरान के आदेशों या उपदेशों, प्रसिद्ध कानूनविदों के फतवाओं (पवित्र कानून अर्थात् कुरान की पिछली व्याख्याओं) तथा बादशाहों के मानूनों (आज्ञाओं) का अनुसरण करते थे। वे साधारणत: प्रचलित कानूनों की उपेक्षा नहीं करते थे तथा कभी-कभी न्यायपरता के सिद्धान्तों का अनुसरण करते थे। विशेषकर बादशाह की व्याख्याओं की ही महत्ता रहती थी, यदि वे पवित्र कानून (कुरान) के विरुद्ध नहीं होती थीं।

मुस्लिम कानूनों का आधार निम्नलिखित था-(शरियत और जबाबित या उर्फ) मुस्लिम शरीयत के निम्नलिखित आधार थे-

  1. कुरान मुहम्मद साहब ने जो सुना था।
  2. हदीस सुनी हुई बातों का अर्थ निकाला गया।
  3. इज्म विभिन्न विद्वानों की व्याख्या।
  4. कयास मिलती जुलती बातों के आधार पर निर्णय लेने की पद्धति।

जब कोई शासक देश काल की परिस्थिति के अनुसार प्रशासनिक सुविधाओं के लिए कानून बनाता था तो वह जबाबित या उर्पु कहलाता था। दीवानी मुकदमों का निर्णय मुस्लिमों के परिप्रेक्ष्य में मुस्लिम कानूनों के अनुसार लिया जाता था और हिन्दुओं के परिप्रेक्ष्य में हिन्दू कानून के अनुसार लिया जाता था। किन्तु अगर एक पक्ष हिन्दू और दूसरा पक्ष मुस्लिम हो तो निर्णय मुस्लिम कानूनों के अनुसार लिया जाता था। फौजदारी मुकदमों में मुस्लिम कानून ही लागू होते थे।

काजी-उल-कुजात (प्रधान काजी) साम्राज्य में प्रधान न्यायाधीश था। वह प्रत्येक प्रान्तीय राजधानी में काजियों की नियुक्ति करता था। काजी हिन्दू तथा मुसलमान दोनों के दीवानी एवं फौजदारी मुकद्दमों की पड़ताल एवं फैसले करते थे, मुफ्ती मुसलमानी कानून की व्याख्या करते थे तथा मीर अद्ल फैसलों का मजमून बनाते तथा पढ़कर सुनाते थे। काजियों से न्यायपरायण, ईमानदार एवं पक्षपातरहित होने, दोनों दलों की उपस्थिति तथा न्यायालय एवं राजधानी में मुकद्दमों जानने, जहाँ वे कार्य करते थे वहां के लोगों से कोई उपहार स्वीकार नहीं करने और न ही जैसे-तैसे के यहाँ उत्सवों  में जाने की आशा की जाती थी। उनके विषय में कहा जाता था की वे निर्धनता में ही अपने गौरव समझें परन्तु व्यवहार में वे अपने अधिकार का दुरूपयोग करते थे तथा जैसा डॉ. यदुनाथ सरकार कहते हैं, मुगलों के समय में काजी का विभाग निंदाजनक कहावत हो गया। काजियों के न्यायालयों के नीचे कोई प्रारंभिक न्यायालय नहीं थे। गंव्वालोनेवं छोटे नगरों के निवासियों के ऊपर काजी नहीं होते थे। अतत वे अपने झगड़ों का निर्णय अपने ही यहाँ जातिसभाओं अथवा पंचायतों में अपील करके या किसी निष्पक्ष निर्णयकर्ता (सालिस) के फैसले के द्वारा अथवा शक्ति के प्रयोग के द्वारा कर लेते थे। सदरुस्सुदूर (प्रधान सदर) बादशाहों या शाहजादों के द्वारा धार्मिक व्यक्तियों, विद्वानों तथा महंथों को दी गयी भूमि की देखभाल करता था और इनसे सम्बन्ध रखने वाले मुकद्दमों का फैसला करता था। उससे नीचे प्रत्येक प्रान्त में एक स्थानीय सदर हुआ करता था।

नगरों तथा प्रान्तों के न्यायालयों के ऊपर स्वयं बादशाह था, जो उस युग के खलीफा के रूप में न्याय का स्रोत तथा अपील का अन्तिम न्यायालय था। कभी-कभी वह मुकद्दमों का प्रारम्भिक न्यायालय भी होता था। बादशाह से बिना पूछे ही न्यायालय जुर्माना कर सकते थे तथा अंग-भंग, अंगछेद और कोडे लगाने के कठोर दण्ड भी दे सकते थे। परन्तु फाँसी की सजा देने में बादशाह की स्वीकृति आवश्यक थी। कारावासों की नियमित व्यवस्था नहीं थी, किन्तु कैदियों को किलों में बन्द रखा जाता था।

औरंगजेब की दक्कन नीति

राज्यकाल के प्रथमार्द्ध पूर्वार्द्ध में औरंगजेब का ध्यान उत्तर के मामलों में उलझा हुआ था तथा दक्कन सूबेदारों पर छोड़ा हुआ था। ह्रासोन्मुख दक्षिणी सल्तनतें अब तक अपने ऊपर किये गये आघातों से पूर्णत: नहीं उबर सकी थी। उनसे लाभ उठाकर मराठों का उत्थान हो गया। मुगल-साम्राज्य के लिए चुनौती के रूप में मराठों के उत्थान से दक्कन की राजनैतिक परिस्थिति उलझ गई, जिसका पूरा महत्व बादशाह पहले नहीं समझ सका। उसके राज्य-काल के पहले चौबीस वर्षों में दक्कन में उसके सूबेदार इन सल्तनतों अथवा मराठों के विरुद्ध कोई निश्चित सफलता नहीं प्राप्त कर सके थे।

1680 ई. में शिवाजी की मृत्यु से दक्कन में बादशाह की स्थिति किसी भी तरह नहीं सुधरी थी, यद्यपि औरंगजेब अपनी प्रभुता को दृढ़ करने में कृतसंकल्प था। विद्रोही शाहजादा अकबर के मराठा राजा शम्भूजी के पास जाने तथा दोनों के बीच संधि हो जाने से उसकी दक्कन-नीति में पूर्ण परिवर्तन आ गया। उसने अब साम्राज्य के हित के विरुद्ध उपस्थित इस संकट को रोकने के लिए स्वंय सेना लेकर जाने की आवश्यकता का अनुभव किया और जून, 1681 ई. में मेवाड़ के साथ झटपट संधि कर ली।

8 सितम्बर, 1681 ई. को दक्कन के लिए अजमेर से प्रस्थान कर वह 23 नवम्बर, 1681 ई. को बुरहानपुर तथा 1 अप्रैल, 1682 ई. को अहमदनगर पहुँचा। वह यह नहीं सोच सका कि नियति उसे दक्षिण में उसकी तथा उसके साम्राज्य की कब्रें खोदने के लिए घसीट कर ले जा रही है। पहले चार वर्ष शाहजादा अकबर को पकड़ने की असफल चेष्टाओं तथा मराठों के विरुद्ध विनाशकारी आक्रमणों में व्यतीत हो गये। मराठों के कुछ दुर्ग शाही दल द्वारा जीत लिये गये। किन्तु हट्टे-कट्टे लोग, जिन्हें शिवाजी ने नयी अभिलाषाओं से प्रेरित किया था, पूर्णत: दबाये नहीं जा सके।

इसके बाद अवनतिग्रस्त सल्तनतों की विजय की ओर बादशाह का ध्यान आकृष्ट हुआ। दक्कन की शिया सल्तनतों के प्रति शाहजहाँ की तरह औरंगजेब का रुख भी अंशत: साम्राज्य के हित तथा अंशत: धार्मिक विचारों से प्रभावित था। बीजापुर ने गुटबन्दियों एवं मराठों के उत्कर्ष से दुर्बल हो जाने के कारण आक्रमणकारियों की अधीनता स्वीकार कर ली। नगर का मुग़लों द्वारा अन्तिम घेरा 11 अप्रैल, 1685 ई. को आरम्भ हुआ तथा बादशाह स्वयं वहाँ जुलाई 1687 ई. में पहुँचा। घिरी हुई सेना ने वीरता से सामना किया। परन्तु भोजन की सामग्री के अभाव तथा दुर्मिक्ष के कारण अनगिनत मनुष्यों एवं घोड़ों की मृत्यु से थककर उन्होंने सितम्बर, 1686 ई. में आत्म-समर्पण कर दिया। अन्तिम आदिल शाही सुल्तान सिकन्दर ने बादशाह के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया तथा यूसुफ आदिल शाह के द्वारा स्थापित राजवंश की इतिश्री हो गयी।

इसके बाद गोलकुंडा के कुतुबुशाही राज्य की बारी आयी। फरवरी, 1687 ई. के प्रारम्भ में औरंगजेब स्वयं गोलकुंडा के समक्ष उपस्थित हुआ तथा कुछ दिनों के अन्दर मुग़ल फौज ने स्थानीय गढ़ पर घेरा डाल दिया। परन्तु उस किले में पर्याप्त भोजन एवं युद्ध-सामग्री संचित थी, जिससे घिरे हुए व्यक्ति लगभग आठ महीनों तक वीरतापूर्वक डटे रह सके। इसके बावजूद उन्हें कोई निश्चित सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। बल्कि दुर्मिक्ष एवं महामारी से उन्हें क्लेश ही हुआ तथा अपने शत्रुओं के प्रतिशोध के कार्य से उन्हें भारी हानियाँ हुई। फिर भी औरंगजेब पूरी धुन के साथ डटा रहा तथा उसने और सेना इकट्ठी की। अब्दुल्ला पनी नामक एक अफ़गान सिपाही था, जो उस समय गोलकुंडा के सुल्तान अबुल हसन के यहाँ नौकरी करता था। बादशाह ने उसे घूस दे दी। फलत: उसने किले का प्रमुख द्वार खोलकर मुग़लों को इसमें प्रवेश करने दिया। परन्तु अब्दुर्रज्जाक लारी नामक गोलकुंडा के एक स्वामिभक्त सरदार ने बादशाह द्वारा दिये गये रुपये-पैसे के प्रलोभनों पर लात मारी। वह अकेला लड़ता रहा और सत्तर घाव जाने के बाद ही कहीं उसका लड़ना बंद हुआ। मुग़लों ने उसकी कर उसे स्वस्थ किया तथा उसने अन्त में बादशाह के अधीन एक उच्च पद स्वीकार किया। अबुल हसन को पचास हजार रुपये वार्षिक पेंशन देकर अपने अन्तिम दिन व्यतीत करने की दौलताबाद के किले में भेज दिया गया। गोलकुंडा को मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया गया (सितम्बर, 1687 ई.)।

अपनी दक्कन-नीति के दो उद्देश्यों में एक की प्राप्ति कर लेने के पश्चात् अर्थात् दक्कन की हासोन्मुख सल्तनतों को मिला लेने के बाद, औरंगजेब दूसरे उद्देश्य की ओर मुड़ा, अर्थात नवोदित मराठा शक्ति का दमन करने में संलग्न हुआ। पहले उसके प्रयास सफल हुए। शम्भूजी 11 मार्च, 1889 ईं को फांसी पर चढ़ा दिया गे। उसकी राजधानी रायगढ़ जित ली गयी। यद्यपि उसका भाई राजाराम बच निकला, पर उसके छोटे लड़के शाहू के सहित उसका शेष परिवार बन्दी बना लिया गया। बादशाह ने दक्षिण में अपने प्रभुत्व का विस्तार किया तथा तंजोर एवं त्रिचिनापल्ली के हिन्दू राज्यों पर कर लगाया।

इस प्रकार 1690 ई. तक औरंगजेब अपनी शक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँच गया तथा काबुल से लेकर चटगाँव और कश्मीर से लेकर कावेरी तक फैले हुए लगभग सम्पूर्ण भारत का परम स्वामी बन गया। ऐसा प्रतीत होता था कि औरंगजेब ने अब सब कुछ प्राप्त कर लिया है; परन्तु वास्तव में वह सब कुछ खो चुका था। यह उसकी इतिश्री का श्रीगणेश था। अब उसके जीवन का सबसे दु:खपूर्ण एवं आशाशून्य अध्याय खुला। मुग़ल साम्राज्य इतना विस्तृत हो गया था कि एक व्यक्ति द्वारा अथवा एक केन्द्र से उस पर शासन करना सम्भव नहीं था। उसके शत्रु सब ओर खड़े हो गये। वह उन्हें पराजित कर सकता था, पर सदा के लिए उन्हें नष्ट नहीं कर सकता था।….उत्तरी तथा मध्य भारत के बहुत-से स्थानों में अराजकता फैल गयी। सुदूर दक्कन में बैठे बूढ़े बादशाह का हिन्दुस्तान के अपने अफूसरों पर सारा नियंत्रण जाता रहा। शासन शिथिल एवं भ्रष्टाचारपूर्ण हो गया। नायक एवं जमींदार स्थानीय अधिकारियों की उपेक्षा कर अपनी प्रभुता स्थापित करने लगे। देश में उन्होंने हलचल मचा दी। विशेष रूप से आगरा प्रान्त में अव्यवस्था पुरानी हो चुकी थी। शाही संरक्षण के हट जाने से कला एवं विद्या की अवनति होने लगी। एक भी भवन, सुन्दर लिखावट वाली पांडुलिपि अथवा उत्तम चित्र औरंगजेब के राज्य-काल का स्मरण नहीं दिलाते। दक्कन के अंतहीन युद्ध के कारण उसका कोष रिक्त हो गया। सरकार दिवालिया हो गयी। वेतन बाकी रहने के कारण सैनिक भूख से मरने लगे तथा उन्होंने बलवा कर दिया। उसके राज्य-काल के अन्तिम वर्षों में बंगाल का राजस्व, जो योग्य दीवान मुर्शिद कुली खाँ नियमित रूप से भेजता था, बादशाह के परिवार अथवा उसकी सेना का एकमात्र सहारा बन गया था तथा इसके आने की उत्सुकता से प्रतीक्षा की जाती थी। दक्कन के फोड़े ने औरंगजेब को नेस्तनाबूद कर दिया। बादशाह मराठों को अधीन करने अथवा उनके देश को जीतने में असफल रहा। 1691 ई. तक मराठों की स्थिति में सुधार हुआ और वे मुगलों के विरुद्ध राष्ट्रीय प्रतिरोध का युद्ध फिर करने लगे। पहले यह युद्ध राजाराम तथा कुछ अन्य योग्य मराठा नायकों के अधीन चलाया गया। 1700 ई. में राजाराम की मृत्यु हो गयी। तत्पश्चात् उसकी वीर विधवा ताराबाई ने अपने हाथों में इसकी बागडोर ले ली।

औरंगजेब का राजपूतों के साथ संघर्ष

राजपूतों ने साम्राज्य के विकास में बड़ी सहायता की थी। औरंगजेब उनकी मित्रता का मूल्य समझने में असफल रहा। उसने उनके प्रति राज्य की नीति में परिवर्तन कर दिया। अम्बर के राजा जयसिंह को वह अपनी नीति के विरुद्ध राजपूत विरोध का एक प्रबल नेता समझता था। उसे (राजा जय सिंह को) 1667 ई. में दक्कन में अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा।

इसके बाद एक से अधिक कारणों से मारवाड़ की विजय की ओर उसका ध्यान आकृष्ट हुआ। इसका युद्धकौशल की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण स्थान था, क्योंकि मुग़ल राजधानी से पश्चिमी भारत के समृद्ध नगरों एवं बन्दरगाहों के कुछ सैनिक एवं व्यापारिक रास्तों पर इसका नियंत्रण था। उस समय उत्तर भारत में एक प्रबल सैनिक राज्य के रूप में इसकी स्थिति औरंगजेब को फूटी आँखों भी नहीं सुहाती थी। उसे संदेह था कि इसका प्रधान जसवन्त सिंह, जो पहले दारा शुकोह के दल का था, उसकी नीति के विरोधियों का नेता बनकर खड़ा हो सकता है।

शीघ्र ही बादशाह को मारवाड़ के विरुद्ध अपनी योजनाएँ कार्यान्वित करने का अनुकूल अवसर मिल गया। राजा जसवन्त सिंह खैबर की घाटी और पेशावर जिले में मुगल सीमान्त दस्तों का संचालन कर रहा था। इसी समय 10 दिसम्बर, 1678 ई. को जमरूद में उसकी मृत्यु हो गयी। इस समाचार को सुनते ही औरंगजेब ने तुरंत मारवाड़ को मिला लेने के लिए कदम उठाया। उसने वहाँ अपने अफसरों को फौजदार, किलादार कोतवाल एवं अमीन के रूप में नियुक्त कर लिया तथा उसे सीधे मुग़ल शासन में ले आया। राठौर अपने राजा की मृत्यु से व्यग्र एवं त्रस्त हो जाने के कारण संयुक्त राष्ट्रीय प्रतिरोध उपस्थित करने में असफल रहे। मई के महीने में नागौर के नायक तथा जसवन्त के पोते (भतीजे के बेटे) इन्द्र सिंह राठौर को उत्तराधिकार शुल्क के रूप में छत्तीस लाख रुपये देने पर जोधपुर का राणा मान लिया गया। परन्तु मुग़ल अफूसरों से घिरा हुआ वह केवल नाम का शासक रहा।

इस प्रकार बादशाह की नीति सफल प्रतीत होने लगी। परन्तु मारवाड़ वास्तव में अधीन नहीं किया गया था। उस राज्य का प्रत्येक राजपूत गृह बादशाह के तीव्र आघात का अन्त करने की कृतसंकल्प हो गया। अब शाही नीति को बाधा पहुँचाने तथा अन्त में उसे पराजित करने को एक नया तत्त्व घटनास्थल में आ घुसा। इधर फरवरी, 1679 ई. में जसवन्त की मृत्यु के पश्चात् लाहौर में उसके दो पुत्रों का जन्म हो चुका था। एक तो जन्म के तुरंत बाद मर गया; परन्तु दूसरा, जिसका नाम अजीत सिंह था, जीवित रहा। उसके पिता के प्रमुख अनुगामी उसे दिल्ली ले आये। उन्होंने औरंगजेब से उसे मृतक राजा का उत्तराधिकारी स्वीकार करने का अनुरोध किया। परन्तु बादशाह ने उसका पोषण अपने अन्त:पुर में करने का प्रस्ताव किया अथवा एक अन्य समकालीन विवरण के अनुसार अजीत को जोधपुर का राजसिंहासन उसके मुसलमान बन जाने की शर्त पर देने का वादा किया गया।

बादशाह के इस असाधारण प्रस्ताव से राठौरों की भावनाओं पर कठोर आघात पहुँचा। उन्होंने इन शतों को स्वीकार करने के बदले अपने प्राणों की आहुति देने की प्रतिज्ञा की। परन्तु शाही दल की संगठित शक्ति के विरुद्ध केवल भक्ति एवं अपरिणामदर्शी साहस किसी काम के नहीं हो सकते थे।

संकट के इस क्षण में राठौरों के सौभाग्य से उन्हें दुर्गादास (जसवन्त के मंत्री आसकरन का पुत्र) जैसा योग्य नेता मिल गया। जो राठौर वीरता का पुष्प था। राजस्थान के इतिहास में दुर्गादास को भयानक बाधाओं के होने पर भी अपने देश के प्रति नि:स्वार्थ भक्ति के लिए एक अमर व्यक्ति माना जाता है, जो उचित ही है। उस स्थिर हृदय को मुग़लों का सोना सत्पथ से न डिगा सका, मुग़लों के शस्त्र नहीं डरा सके। उसने एक राजपूत सैनिक के प्रबल आघात एंव संगठन-शक्ति के विरल संयोग का प्रदर्शन किया और राठौरों के प्रति वह करीब-करीब अकेला था।

एक शाही फौज रानियों तथा अजीतसिंह को पकड़ने के लिए भेजी गयी। सत्य का वरण करने वाले राजपूतों की एक टुकड़ी उस पर टूट पड़ी। फैली हुई गड़बड़ी से लाभ उठा कर दुर्गादास इच्छित शिकारों को पुरूषों के परिधान में घोड़े पर लेकर भाग चला। उसके नौ मील जाने पर शाही दल उस तक पहुँच गया। परन्तु यहाँ रणछोड्दास जोधा के अधीन राजपूतों की एक छोटी टुकड़ी ने जब तक हो सका तब तक पीछा करने वालों को रोकने का प्रयत्न किया तथा दुर्गादास रानियों एंव अजीत के साथ 23 जुलाई, 1679 ई. को जोधपुर पहुँचने में समर्थ हुआ। जब औरंगजेब ने विभिन्न प्रांतों से बहुत सी फौजें मॅगवाई और तीनों शहज़ादों-मुअज्जूम, आज़म एंव अकबर-को सेना के भिन्न-भिन्न दस्तों का कमान दे दिया गया। वह स्वंय सैनिक कार्यवाइयों का निर्देशन करने के लिए अगस्त, 1679 ई. में अजमेर गया। जोधपुर को जीत कर वहाँ लूटपाट मचायी गयी।

परन्तु मुग़ल बादशाह की इस आक्रमणकारी नीति के कारण मेवाड़ के वीर सिसोदिया मारवाड़ के निराश राठौरों से जा मिले। औरंगजेब ने तुरंत मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। राणा ने मुग़लों की प्रबलतर शक्ति का सामना करना अनुचित समझा। इसलिए वह मेवाड़ के नगरों तथा पुरवों को त्यागकर अपनी सारी प्रजा के साथ पहाड़ी किलों में चला गया। नीचे के मैदान बंजर पड़ गये। मुग़लों ने सुगमता से चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। सफलता के लिए निश्चित होकर बादशाह अकबर के अधीन एक प्रबल सेना चित्तौड़ में छोड़ अजमेर के लिए चल पड़ा। परन्तु शीघ्र ही उसकी आँखें खुल गयी। राजपूत छिप कर युद्ध करते रहे। वे मुग़लों की चौकियों पर इतने अधिक साहस के साथ टूट पड़ते थे कि मुग़ल चौकियों का कमान स्वीकार करने वाला कोई न रहा; एक-के-बाद दूसरे कप्तान इस खतरनाक सम्मान को बहाने बनाकर अस्वीकार करने लगे। अपनी सफलताओं से प्रोत्साहित होकर राजपूतों ने मई, 1680 ई. में शाहजादा अकबर के अधीन रहने वाली मुगल सेना पर हमला कर दिया। बादशाह ने इस पराजय के लिए शाहजादा अकबर को उत्तरदायी ठहराया। उसने चित्तौड़ की सेना को शाहजादा आजूम के अधीन कर दिया तथा अकबर को मारवाड़ भेज दिया।

शाहजादा अकबर ने अपने हटाये जाने के अपमान की पीड़ा का तीव्र अनुभव किया। वह राजपूतों की योग्यता, उनके साथ युद्ध करते समय अच्छी तरह समझ ही गया होगा। अब यह उनके साथ मिलकर अपने पिता से दिल्ली का राजमुकुट छीनने के सपने देखने लगा। राजपूत नायकों ने उसे बतलाया कि किस प्रकार उसके पिता की नीति से मुगलसाम्राज्य की स्थिरता नष्ट हो रही थी। उन्होनें दो सबसे महान् राजपूत जातियों सिसोदिया एंव राठौर, की सैनिक शक्ति से उसकी सहायता करने की प्रतिज्ञा की। इस प्रकार उनकी आशा थी कि दिल्ली के राजसिंहासन पर एक सच्चा राष्ट्रीय राजा बैठा सकेगे। लगभग सत्तर हजार व्यक्तियों की एक सेना लेकर जिसमें राजपूताना का सर्वोत्कृष्ट रक्त था, शाहजादा अकबर 15 जनवरी, 1681 ई. को अजमेर के निकट पहुँचा। उस समय औरंगजेब की स्थिति संकटपूर्ण थी क्योंकि उसकी सेना की दो प्रमुख टुकड़ियां चित्तौड एंव राजसमुद्र झील के निकट थी। यदि शाहजादा तुरंत इस सुअवसर का उपयोग कर लेता, तो बादशाह दिक्कत में पड़ सकता था। परन्तु उसने आलस्य एंव विषय-सुख में अपना समय गंवा दिया और इस प्रकार अपने चतुर पिता को अपनी प्रतिरक्षा के लिए तैयारियाँ करने का अवसर दे दिया। बादशाह ने अपने विद्रोही पुत्र के पास एक पत्र लिखा। उसने ऐसा प्रबंध किया जिसमें वह पत्र राजपूतों के हाथ पड़ जाए। इससे अकबर के मित्रों को यह विश्वास हो गया कि मुग़ल शाहजादा उनके साथ छल कर रहा है। बादशाह की यह चतुराईपूर्ण युक्ति सफल सिद्ध हुई। अकबर के राजपूत मित्रों ने विश्वासघात का संदेह कर, उसे त्याग दिया तथा वह शीघ्रता से अपनी जान बचाकर राजपूतों के पास भाग गया। परन्तु राजपूतों को तुरंत अपने प्रति किये गए छल का पता चल गया। वीर राठौर नायक दुर्गादास को शाहजादे के निर्दोष होने का पता चल गया। उसने वीरता के साथ उसे अपने पिता के प्रतिरोधों से बचाया तथा उसे खानदेश एवं बगलाना होकर मराठा राजा शम्भूजी के दरबार में पहुँचा दिया। पर शिवाजी का विलासी उत्तराधिकारी इस भगोडे मुग़ल शाहजादे को कोई कार्यसाधक सहायता न दे सका। इसका हिन्दू-मुस्लिम सामंजस्य और मेल पर आधारित भारतीय साम्राज्य का स्वप्न निरर्थक ही रहा। लगभग छः वर्षों के बाद निराश मुग़ल शाहजादा फारस चला गया। वहीं 1704 ई. में उसकी मृत्यु हुई।

शाहजादा अकबर के विद्रोह से दिल्ली का बादशाह बदला नहीं जा सका। परन्तु इससे मेवाड़ के राणा को बहुत चैन मिला। किन्तु मुगलों के विरुद्ध उसकी क्षणिक सफलता से उसकी प्रजा को बहुत कष्ट हुआ। मुगलों को भी काफी तकलीफ हुई तथा उन्हे राजपूतों के विरुद्ध किए गए कार्यों से कोई निश्चित लाभ नहीं हो सका। इन विचारों से बादशाह तथा राजसिंह के पुत्र एंव उत्तराधिकारी राणा जयसिंह ने जून, 1681 ई. में संधि कर ली। राणा ने जजिया के बदले कुछ जिले दे दिये तथा मुग़ल मेवाड़ से हट गये। परन्तु मारवाड़ के साथ सम्मानपूर्ण शर्तों पर संधि हुई और उससे तीस वर्षीय युद्ध करते रहे। उन्होंने मुगल चौकियों को तंग किया। इसलिए मुग़ल अफसरों को उसके (दुर्गादास के) आक्रमण से अपनी रक्षा करने के लिए अपने शत्रु को विवश होकर चौथ देना पड़ा। युद्ध चलता ही रहा। अंत में औरंगजेब की मुत्यु के पश्चात् उसके पुत्र तथा उत्तराधिकारी बहादुर शाह प्रथम ने 1709 ई. में अजीत सिंह को मारवाड़ का राणा स्वीकार कर लिया।

औरंगजेब के राजपूत युद्धों के परिणाम, उसके साम्राज्य के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए। हजारों व्यक्तियों की बलि चढ़ायी गयी तथा मरूभूमि पर अपार धन नष्ट किया गया। मगर बादशाह को कोई स्थायी सफलता न मिली। शाही प्रतिष्ठा के लिए यह परिणाम तो हानिकारक था ही, परन्तु इसके भौतिक फल और भी बुरे निकले। औरंगजेब के लिए राजपूतों की शत्रुता को उभाड़ना राजनैतिक अविवेक का काम था। राजपूत अब तक साम्राज्य के मित्र थे। परन्तु औरंगजेब को दक्कन के प्रति ध्वंसकारी युद्धों में अथवा उत्तर-पश्चिम सीमा में रखने के महत्त्वपूर्ण कार्य में वीर नायकों और सैनिकों की अनुरक्त सेवा से हाथ धोना पड़ा।

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब सर्वोपरि एक उत्साही सुन्नी मुसलमान था। उसकी धार्मिक नीति सांसारिक लाभ के किसी विचार से प्रभावित नहीं थी। उदार दारा के विरुद्ध सुन्नी कट्टरता के समर्थक के रूप में राजसिंहासन प्राप्त करने वाले की हैसियत से उसने कुरान के कानून को कठोरता से लागू करने का प्रयत्न किया। इस कानून के अनुसार, प्रत्येक धार्मिक मुस्लिम को अल्लाह की राह में मिहनत करनी चाहिए, या दूसरे शब्दों में, तब तक गैर-मुसलमान देशों (दारुल-हर्ब) के विरुद्ध धर्म-युद्ध (जिहाद) करना चाहिए, जब तक कि वे इस्लाम के राज्य उत्कट कट्टरपंथी बन गया, जिससे उसने जीवन की म्लान गम्भीरता सूक्ष्माचार-प्रधान कट्टरता वाले अपने विचारों को लागू करने के लिए कदम उठाये। उसके अपने जन्मदिन एवं राज्याभिषेक-दिवस के प्रचलित को सरल बना दिया। अपने शासन-काल के ग्यारहवें वर्ष से उसने झरोखा-दर्शन के प्रचलन को बन्द कर दिया। इस प्रथानुसार उसके पूर्वगामी प्रतिदिन सबेरे राज प्रसाद की दीवार के बरामदे पर लोगों का, जो उस समय सामने मैदान में एकत्रित रहते थे, अभिवादन स्वीकार करने की उपस्थित होते थे। उसी वर्ष उसने दरबार में संगीत का निषेध कर दिया तथा पुराने संगीतज्ञों और गायकों को बर्खास्त कर दिया। परन्तु दरबार में प्रतिबन्ध लगाये जाने पर भी संगीत मानवीय आत्मा से निर्वासित नहीं किया जा सका। सरदार गुप्त रूप से इसका अभ्यास करते रहे तथा शाही निषेध का कुछ प्रभाव केवल विख्यात नगरों में ही था। बारहवें वर्ष में बादशाह के शरीर को दो जन्मदिवसों पर सोने, चाँदी एवं अन्य वस्तुओं में तौलने का उत्सव रोक दिया गया तथा शाही मुहूर्तकों एवं ज्योतिषियों को हटा दिया गया। पर ज्योतिष-विद्या में मुसलमानों का विश्वास उनके दिमागों में इतनी गहराई के साथ जमा हुआ था कि किसी शाही आज्ञा से उसे उखाड़ना सम्भव न था। यह अठारहवीं सदी में भी बहुत काल तक सक्रिय रहा। अन्य धर्मावलम्बियों द्वारा सिक्कों पर कलमा के अपवित्र होने से बचाने के लिए उसने इसका व्यवहार निषिद्ध कर दिया। उसने नैरोज को भी उठा दिया, जिसे भारत के मुग़ल बादशाहों ने फारस से अपनाया था। उसने लोगों के जीवन को कुरान के कानून के पूर्णतया अनुरूप बनाने के लिए महतसिबों (सार्वजानिक सदाचार निरीक्षकों) को नियुक्त किया।

औरंगजेब जो कुछ दूसरों पर लागू करना चाहता था, उसका स्वयं अभ्यास करता था। उसके व्यक्तिगत जीवन का नैतिक स्तर ऊँचा था तथा वह अपने युग के प्रचलित पापों से दृढ़तापूर्वक अलग रहता था। इस प्रकार उसके समकालीन उसे शाही दरवेश समझते थे तथा मुसलमान उसे जिन्दा पीर के रूप में पूजते थे। सामान्य नैतिकता की उन्नति के लिए उसने अनेक नियम बनाये। उसने एक कानून द्वारा मदिरा एवं भाँग के उत्पादन की बिक्री तथा सार्वजनिक व्यवहार का निषेध कर दिया। मनूची हम लोगों का बतलाता है कि नर्तकियों एवं वेश्याओं को विवाह कर लेने अथवा राज्य छोड़ देने की आज्ञा दे दी गयी। बादशाह ने कड़ी आज्ञा दी कि अश्लील गीत नहीं गाये जाएँ उसने विशेष धार्मिक त्यौहारों के समय लकड़ी के बोझों का जलाना तथा जुलूसों का चलना रोक दिया। औरंगजेब के राज्यकाल की सरकारी तारीखों में लिखा हुआ है कि उसने सती-प्रथा को उठा दिया (दिसम्बर, 1663 ई.)। परन्तु भारत में आने वाले समकालीन यूरोपीय यात्रियों के प्रमाण से मालूम होता है कि शाही निषेधाज्ञा को शायद ही माना जाता था।

फिर भी बादशाह केवल इन्हीं नियमों से सन्तुष्ट होकर नहीं बैठा रहा। उसने अन्य फर्मान तथा आज्ञापत्र जारी किये, जिनसे लोगों के महत्त्वपूर्ण वर्गों के सम्बन्ध में एक नयी नीति का उद्घाटन हुआ। सन् 1679 ई. में काफिरों (गैर-मुसलमानों) पर पुन: जजिया कर लगा दिया गया।

इन नए नियमों और अग्यापत्रों का उन लोगों पर अवश्य ही गहरा प्रभाव पड़ा होगा, जिनके लिए ये जारी लिए गए। इन्होंने वैसी कठिनाईयों को बहुत बाधा दिया होगा, जिनका शाही सरकार को सामना करना था। बादशाह औरंगजेब को अपने धर्म का सच्चा एवं ईमानदार व्याख्याता होने का जो श्रेय था, उसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। पर यह भी सच है कि अपने उत्साह एवं जोश के कारण वह यह भूल गया कि भाग्य ने जिस देश पर उसके शासन करने का विधान रचा था, उसकी आबादी समान जाति की नहीं थी, बल्कि विभिन्न तत्वों की थी, जो अपनी धार्मिक परम्पराओं एवं आदशों में थी और इसे चतुराई एवं सहानुभूति के साथ समझने की आवश्यकता थी। औरंगजेब ने राज्य के हितों का, अपने धर्म के हितों से समीकरण कर तथा इससे मतभेद रखने वालों को अप्रसन्न कर अवश्य ही भूल की। इस नीति से लोगों के कुछ वर्गों में असन्तोष की भावनाएँ उत्पन्न हो गयीं, जिन्होंने उसके राज्यकाल के शेष भाग में उसकी ताकत को दूसरी ओर मोड़ दिया। इस प्रकार यह मुग़ल-साम्राज्य की अवनति एवं पतन का अत्यन्त प्रबल कारण सिद्ध हुआ।

नीति की प्रतिक्रिया- बादशाह के विरुद्ध प्रतिक्रिया का सर्वप्रथम भयानक विस्फोट मथुरा जिले के जाटों के बीच हुआ, जहाँ शाही फौजदार अब्दुन्न्बी ने उन पर बहुत अत्याचार कर रखा था। 1669 ई. में शक्तिशाली जाट किसानों ने तिलपत के जूमींदार गोकला के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। उन्होंने फौजदार को मार डाला और एक वर्ष तक सम्पूर्ण जिले को अव्यवस्था की दशा में रखा। अंत में मथुरा के नये फौजदार हसन अली खाँ के अधीन एक मजबूत शाही सेना ने उनका दमन कर दिया। गोकला मार डाला गया तथा उसके परिवार के सदस्यों को मुसलमान बना दिया गया। परन्तु इससे जाट स्थायी रूप से नहीं कुचले गये। उन्होंने 1685 ई. में पुन: एक बार राजाराम के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया और 1688 ई. में सिकन्दरा में अकबर की कब्र को लूट लिया। राजाराम को परास्त कर मार डाला गया तथा जाटों का प्रधान गढ़ 1691 ई. में अधीन कर लिया गया। परन्तु उन्हें शीघ्र चुरामन नामक एक अधिक उग्र नेता मिल गया। चुरामन ने असंगठित जाटों को एक प्रबल सैनिक शक्ति में परिवर्तित कर दिया तथा औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् मुग़लों के विरुद्ध एक सशस्त्र प्रतिरोध का संगठन किया।

औरंगजेब की नीति के विरुद्ध दूसरे सशस्त्र विरोध का नेतृत्व बुन्देला राजा छत्रसाल ने किया। छत्रसाल के पिता चम्पत राय ने औरंगजेब के राज्यकाल के प्रारम्भिक भाग में उसके विरुद्ध विद्रोह किया था परन्तु बादशाह की ओर से अधिक दबाव पड़ने पर कैद से बचने के लिए उसने आत्म-हत्या कर ली। छत्रसाल ने दक्कन में बादशाह की सेवा की थी, जहाँ शिवाजी के दृष्टान्त से प्रोत्साहित होकर उसने साहस तथा स्वतंत्रता का जीवन व्यतीत करने का स्वप्न देखा। बुन्देलखंड तथा मालवा की हिन्दू प्रजा के असन्तोष ने उसे 1671 ई. तक अपने धर्म तथा बुन्देल स्वतंत्रता के समर्थक के रूप में खड़े होने का अवसर दे दिया। उसने मुगलों पर कई विजयें प्राप्त कीं तथा पूर्वी मालवा में अपने लिए एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने में सफल हुआ। इसकी राजधानी पन्ना में थी। 1731 ई. में उसकी मृत्यु हुई।

एक और विद्रोह मार्च, 1672 ई. में सतनामियों के बीच हुआ। ये मूल रूप में हिन्दू भक्तों का एक अनुपद्रवी सम्प्रदाय था। इसका केंद्र नारनोल (पटियाला में) एवं मेवात (अलवर क्षेत्र) में था। सतनामियों के विद्रोह का तात्कालिक कारण था एक मुग़ल पैदल सैनिक द्वारा उनके एक सदस्य की हत्या। उन्होंने नारनोल पर अधिकार कर लिया। जब परिस्थिति गम्भीर सिद्ध हुई, तब मुग़ल बादशाह ने सैनिकों को अपने तबुओं के बाहर निकलने की आज्ञा दी। अप्रशिक्षित सतनामी किसान शीघ्र एक विशाल शाही फौज द्वारा परास्त हो गये। उनमे से बहुत कम बच पाये तथा देश का वह भाग उनसे साफ हो गया। औरंगजेब की नीति से सिक्खों में भी असंतोष फैला।

आसाम-युद्ध (1668 ई.) में वे मिर्ज़ा राजा जयसिंह के पुत्र राजाराम सिंह से जा मिले। परन्तु वे शीघ्र आनन्दपुर में अपने मूल-निवास को लौट आये। अब शाही सरकार से उनकी शत्रुता ठन गयी। उन्होंने बादशाह के कुछ कामों का विरोध किया तथा कश्मीर के ब्राह्मणों को इनका प्रतिरोध करने को प्रोत्साहित किया। यह औरंगजेब की बर्दाश्त के बाहर था। उसने सिक्ख गुरु को बन्दी बनाकर दिल्ली मंगवाया। वहाँ उसे मृत्यु तथा धर्म-परिवर्तन के बीच एक को चुनने का अवसर दिया गया। तेग बहादुर ने अपने धर्म को जीवन से अधिक पसन्द किया। पाँच दिनों के बाद उनकी फाँसी हो गयी (सन् 1675 ई.)। इस प्रकार उन्होंने अपना सर दियासार न दिया। गुरु की शहादत से सिक्खों की मुग़ल-साम्राज्य के विरुद्ध प्रतिशोध की भावना को प्रेरणा मिली तथा प्रकट रूप से युद्ध अनिवार्य हो गया। आगे की स्मृति में शीशगंज गुरूद्वारा (दिल्ली) का निर्माण किया गया।

तेग बहादुर के पुत्र एवं उत्तराधिकारी गुरु गोविन्द भारतीय इतिहास में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व थे। वे एक यूनानी विधि-निर्माता की संपूर्णता के साथ अपने अनुगामियों के संगठन के काम में कटिबद्ध हो गए। उन्होंने छुरे से चलाए हुए जल द्वारा दीक्षा (पहुल) की प्रणाली कायम की। इस नये प्रकार की दीक्षा को स्वीकार करने वाले खालसा कहलाये। उन्हें सिंह की उपाधि दी गयी। उन्हें पंच ककार को ग्रहण करना पड़ता था- केश, कघा, कृपाण, कच्छा और कड़ा। उन्हें लड़ाई में शत्रु को अपनी पीठे नहीं दिखलानी थी। उन्हें सदा निर्धनों एवं भाग्यहीनों की सहायता करनी थी। गुरु गोविन्द ने एक पूरक ग्रन्थ का संकलन किया। इसका नाम था दसवें बादशाह का ग्रन्थ। उन्होंने कुछ पाश्र्ववर्ती पहाडी राजाओं तथा मुग़ल अधिकारियों के विरुद्ध विलक्षण साहस एवं दृढ़ता के साथ युद्ध किया। कहा जाता है कि उन्होंने बहादुर शाह प्रथम को राजसिंहासन के लिए हुए उसके संघर्ष में सहायता दी तथा आगे चलकर उसके साथ दक्कन के लिए रवाना हुए। एक धर्मोन्मत्त अफ़गान ने 1708 ई. के अंत में गोदावरी के किनारे नान्द नामक स्थान पर उन्हें छुरा मार दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी।

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