मुग़ल साम्राज्य

मुग़ल साम्राज्य

भारतीय इतिहास में मुग़ल साम्राज्य एक युग के समान है। सल्तनतकाल की समाप्ति के साथ भारतीय इतिहास में इस नए युग का प्रारम्भ होता है। भारतीय इतिहास का यह नव युग मुग़लकाल के नाम से प्रसिद्ध है। इस राजवंश का संस्थापक बाबर था जो चगताई तुर्क था। बाबर अपने पिता की ओर से तैमूर का वंशज था और माता की ओर से चंगेज खाँ का। जैसा कि डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है बाबर मुग़ल नहीं था, एक तुर्क था और अपने पिता की ओर से तैमूर का वंशज था, उसकी माँ मध्य एशिया के युनूस खाँ नामक एक मुग़ल या मंगोल सरदार की पुत्री थी। वास्तव में भारत के वे सम्राट् जो मुग़ल कहलाते हैं, तुर्क के मंगोल नहीं। सत्य तो यह है कि बाबर का मुगलों के साथ घृणास्पद व्यवहार था और उनके रहन-सहन से उसे घृणा थी। उसने तुर्कों तथा मंगोलों में सदैव भेद रखा और उन्हें वह सदा मुग़ल लिखा करता था। किन्तु इस अन्तर के होते हुए भी इतिहासकारों ने उत्तर मध्ययुग में उदित इस राजवंश को मुग़ल राजवंश और उनके द्वारा स्थापित साम्राज्य को मुग़ल साम्राज्य की संज्ञा दी है। लगभग दो शताब्दियों के ऊपर विशाल काल-खण्ड में फैला मुग़ल शासन-काल भारतीय इतिहास का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण युग है।

इस्लाम धर्म ग्रहण करने के बाद मंगोलो की ही एक शाखा मुग़ल कही जाने लगी। तैमूर ने एक बृहत साम्राज्य का निर्माण किया था। इसका साम्राज्य उत्तर में बोलगा नदी से दक्षिण में सिंधु नदी तक फैला हुआ था। इसमें एशिया माइनर का क्षेत्र, मावराउन्नहर (ट्रांस आक्तिसयाना), अफगानिस्तान और इरान का क्षेत्र शामिल था। पंजाब भी उसके अधीन रहा था। 1404 ई. में तैमूर की मृत्यु हो गयी और उसका उत्तराधिकारी शाहरुख मिर्ज़ा ने साम्राज्य के बहुत बड़े भाग पर एकता बनाये रखी। शाहरुख के पश्चात् साम्राज्य का विभाजन हो गया। तैमूर राजकुमार आपस में ही संघर्ष करने लगे और एक प्रकार की राजनैतिक शून्यता की स्थिति उत्पन्न हो गयी। इसी रिक्ति को भरने के लिये कुछ नये राज्य अस्तित्व में आये। तैमूर साम्राज्य के पतन के पश्चात् तीन साम्राज्य अस्तित्व में आए यथा मुग़लसफवी और उजबेक। ईरान के पश्चिम में अर्थात् पूर्वी यूरोप में ओटोमन साम्राज्य की स्थापना हुयी।

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