हर्षवर्धन: एक मूल्यांकन

सम्राट् हर्षवर्धन प्राचीन भारत के शासकों की गौरवमयी परम्परा का अन्तिम प्रतापी सम्राट् था। वह एक सफल योद्धा, पराक्रमी विजेता, सुयोग्य शासक, प्रजावत्सल और धर्मपरायण सम्राट् था। एक साधारण स्थिति से उठकर हर्ष ने तत्कालीन भारत के राजनैतिक मान-चित्र पर एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया था। वाण ने अपनी कालजयी कृति हर्षचरित में हर्ष को चतुसमुद्राधिपति एवं सव चक्रवर्ति नाम धीरेय: आदि उपाधियों से समलंकृत किया है। हर्ष के साम्राज्य में मालवा, गुजरात एवं सौराष्ट्र के अतिरिक्त हमालय पर्वत से लेकर नम्रदा तक (जिसमें नेपाल भी सम्मिलित था) गंगा की पूरी तरेटी पर हर्ष का प्रमुख निर्विवाद रूप से स्थापित था। उत्तर भारत में प्रभुत्व स्थापित करने के कारण ही हर्ष को सकलोत्तरा पथनाथ पदवी से विभूषित किया गया हे।

डॉ. के.एम. पणिक्कर ने हर्ष के साम्राज्य-विस्तार पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि हर्ष का साम्राज्य कामरूप से लेकर पश्चिम में कश्मीर तक तथा उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विन्ध्य-क्षेत्र तक फैला हुआ था। किन्तु डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार ने इसका खण्डन किया है। डॉ. मजूमदार के अनुसार, हर्ष के साम्राज्य में आगरा एवं अवध का संयुक्त प्रान्त, बिहार तथा पूर्वी पंजाब का कुछ भाग, उत्तर-पश्चिम के मो.ती. पुल्ली (ह्वेनसांग के अनुसार) को छोड़कर शेष क्षेत्र आता था।

सम्राट् हर्ष न केवल एक कुशल विजेता प्रत्युत एक कुशल शासक भी था। शासन-प्रबन्ध में राजा का स्थान सर्वोच्च था। साम्राज्य का वह प्रधान सूत्रधार था। उसके हाथों में शासन की सर्वोच्च शक्तियाँ प्राप्त थीं। वही सभी उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति करता था, आज्ञा-पत्र एवं घोषणा-पत्र निकालता था, न्यायाधीश का काम करता था, युद्ध में सेना का नेतृत्व भी करता था। उसे परम भट्टारकपरमेश्वरपरम देवतामहाराजाधिराज आदि की उपाधियाँ प्राप्त थीं। अपने शासन सम्बन्धी दायित्व का वह पूरी निष्ठा से निर्वाहन करता था। वाटर्स के शब्दों में हर्ष अधिक परिश्रमी था और दिन का विस्तार उसके कार्य के लिए सर्वथा अल्प था। हर्ष की प्रशासनिक कुशलता का परिचय इस बात से लग जाता है की हर्ष ने पानी राजस्व व्यवस्था को संतुलित रखा। उस्मने एक ओर अपनी प्रजा पर  कर का बोझ नहीं बढ़ाया और दूसरी ओर राज्य के व्यय में वृद्धि नहीं की। उसने लोक कल्याण के लिए अनेक उपयोगी कार्य किए उसकी दानशीलता का सबसे जीवंत प्रमाण उसका प्रयाग प्रति पांचवें वर्ष में दान के रूप में अपना सब-कुछ अर्पित कर देना था। ह्वेनसांग ने जो प्रयाग के छठे धार्मिक सम्मेलन (643-644 ई.) में स्वत: उपस्थित था, लिखा है, महाराज हर्षवर्धन ने भी अपने पूर्वजों का अनुसरण करते हुए पाँच वर्ष का संचित कोष एक दिन में वितरित कर दिया। हर्ष ने विद्यार्थियों, विधवाओं और दीन-दुखियों को भी अपनी सम्पत्ति में हिस्सा दिया। जब उसके पास कुछ भी शेष न रहा तब उसने रत्नजड़ित मुकुट और मुक्ताहार भी उतार कर दान कर दिया। अंत में अपनी निर्धनता के प्रतीक स्वरूप हर्ष ने अपनी बहन राज्य श्री से जीर्ण-शीर्ण वस्त्र लेकर उसे धारण किया।

इसके अतिरिक्त उसने ज्न्मर्गों के निर्माण तथा उनकी सुरक्षा का पूर्ण प्रबंध किया। इस प्रसंग में हम पुन: ह्वेनसांग के शब्दों को प्रस्तुत कर सकते हैं। इस यात्री के अनुसार- उसने (हर्ष ने) पंचभारत (पंचगौड्) में मांसाहार बंद कर दिया तथा जीवों को कठोर शारीरिक दंड देने की मनाही कर दी।उसने गंगा तट पर हजारों स्तूपों का निर्माण करवाया, अपने सम्पूर्ण राज्य में यात्रियों के लिए विश्रामगृह बनवाया तथा पवित्र बौद्ध स्थानों में बिहारों की स्थापना करवाई। वह नियमित रूप से पंचवर्षीय दान-वितरण का आयोजन करता और धर्म के निमित्त वह प्रति दिन 100 बौद्ध भिक्षु तथा 500 ब्राह्मणों को भोजन देता था। राजा का दिन तीन भागों में विभक्त था। जिसमें एक भाग राज-काज के लिए तथा शेष दो धार्मिक कृत्यों के लिए निर्धारित था।

सम्राट् हर्ष के व्यक्तित्व की अन्य विशेषता यह श्री वह स्वतः विद्वान् था, लेखक था और विद्वानों तथा लेखकों का आश्रयदाता था। कादम्बरी और हर्षचरित जैसी सुविख्यात रचनाओं के यशस्वी विद्वान् वाणभट्ट पर उसकी विशेष अनुकम्पा थी। वाण के सम्बन्धी मयूर को भी हर्ष ने आश्रय प्रदान किया था, और उसने कामशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रन्थ अष्टक की रचना की थी। हर्ष के दरबार में एक अन्य प्रसिद्ध साहित्यकार था मतंग दिवाकर। हर्ष साहित्यकारों का आश्रयदाता तो था ही वह स्वयं भी एक सुयोग्य साहित्यकार था। रत्नावलीप्रियदर्शिका तथा नागानन्द नामक संस्कृत के तीन नाटकों का उसे प्रणेता माना जाता है। हर्ष के व्यक्तित्व के इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए डॉ. बैजनाथ शर्मा ने लिखा है कि भारत के महान् शासकों में हर्ष की गणना होती है। उसमें चन्द्रगुप्त मौर्य की सैनिक प्रतिभा, अशोक की उदारता एवं समुद्रगुप्त की राजनीतिज्ञता तथा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की प्रबुद्धता थी।