कन्नौज के गुर्जर-प्रतिहार

हर्षोत्तर-कालीन भारत की राजनैतिक शक्तियों में गुर्जर-प्रतिहारों का राज्य प्रमुख था। गुर्जर-राजकुल राजपूत जाति का था। गुर्जर-राजकुल प्रतिहार शाखा का था, अतएव इतिहास में यह गुर्जर-प्रतिहार के नाम से विख्यात है। सन् 836 ई. के लगभग प्रतिहार राजवंश ने कन्नौज के नगर में अपनी सत्ता जमा ली। नवीं शताब्दी के अन्त के पूर्व ही इस सम्राट्-कुल की शक्ति सभी दिशाओं में फैल गई और महान् प्रतिहार सम्राट् की आज्ञा पंजाब के पेहोआ से लेकर मध्य भारत में देवगढ़ तक और काठियावाड़ में अना से लेकर उत्तरी बंगाल में पहाड़पुर तक के विस्तृत भूभाग में मानी जाती थी।

गुर्जर-प्रतिहारों की वंशावलियों द्वारा हमें 500 ई. के पूर्व का उनका इतिहास विदित नहीं होता। सबसे पहले उनका उल्लेख पुलकेशिन-द्वितीय के एहोल अभिलेख (634 ई.) में किया गया है। हर्षचरित् में बाण ने भी उनका उल्लेख किया है। छठी शताब्दी के प्रारम्भ से गुर्जरों ने भारत की राजनैतिक घटनाओं में महत्त्वपूर्ण भाग लिया। उन्होंने पंजाब, मारवाड़ और भडौंच में अपने राज्य स्थापित कर लिये। आठवीं शताब्दी के मध्य के लगभग कतिपय गुर्जर-सरदारों ने राष्ट्रकूट सम्राट् के अधीन उज्जैन में एक यज्ञ के अनुष्ठान-कार्य में द्वार-रक्षक का काम किया। अतएव वे लोग गुर्जर-प्रतिहार कहे जाने लगे। कुछ साहित्यिक कृतियों जैसे राजशेखर की काव्य मीमांसाकर्पूरमंजरीविद्धशालमञ्किाबाल रामायण, जनायक का पृथ्वीराज विजय तथा कल्हण की राजतरंगिणी से भी गुर्जर प्रतिहारों के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। ग्वालियर अभिलेख के अनुसार गुर्जर प्रतिहार अपने को राम के भाई लक्ष्मण का वंशज कहते हैं। राजशेखर अपने संरक्षक महेन्द्रपाल को रघुकुल तिलक और रघुग्रामिणी कहता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि गुर्जर प्रतिहार राष्ट्रकूटों के द्वारपाल रहे थे। प्रतिहार अपनी पैतृक परंपरा हरिश्चंद्र नामक ब्राह्मण से भी जोड़ते हैं। उनके मूल स्थान के बारे में मतभेद है। कुछ विद्वान् उनका मूल स्थान उज्जैन (अवन्ति) मानते हैं। प्रतिहार का संबंध अवन्ति से अवश्य रहा होगा क्योंकि एक जैन ग्रन्थ महावंश में प्रतिहार शासक वत्सराज का संबंध अवन्ति से जोड़ा गया है। इस वंश का प्रथम ऐतिहासिक पुरुष हरिशचंद्र था जिसकी दो पत्नियां थी- ब्राह्मण एवं क्षत्रिय। ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न पुत्र मालवा पर शासन कर रहे थे और क्षत्रिय पत्नी से उत्पन्न पुत्र जोधपुर पर शासन कर रहे थे। गुर्जर-प्रतिहारों के प्रारम्भिक इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अरब आक्रान्ताओं के प्रसार और विस्तार को रोका और उनको सिन्ध से आगे बढ़ने नहीं दिया। अरबों के प्रसार को रोककर गुर्जर-प्रतिहारों ने वस्तुत: भारत के प्रतिहारी (द्वार-रक्षक) का कार्य किया। इस वंश के संस्थापक नागभट्ट-प्रथम ने, जिसका समय अनुमानत: 725-740 तक निश्चित किया जा सकता है, म्लेच्छों को पराजित किया था। उसके द्वारा म्लेच्छों की पराजय सम्भवत: इसी घटना का उल्लेख करती है कि उसने सिन्ध प्रान्त के अरबों को आगे बढ़ने से रोक दिया था। हेनसांग ने भीनमल के गुर्जर राज्य का उल्लेख किया है जिसके आधार पर नागभट्ट की शक्ति का केन्द्र वहीं पर निश्चित किया जा सकता है। ग्वालियर अभिलेख में कहा गया है कि वह नारायण के रूप में लोगों की रक्षा के लिए उपस्थित हुआ था।

गुर्जर-प्रतिहार वंश का चतुर्थ नरेश वत्सराज अपने कुल का एक शक्तिशाली राजा था। यह सम्भवत: नागभट्ट-प्रथम का प्रपौत्र था। वत्सराज ने बंगाल के शासक को पराजित किया। किन्तु राष्ट्रकूट वंश के ध्रुव नामक राजा ने उसे पराजित कर दिया और अन्त में वह बंगाल के राजा द्वारा भी हरा दिया गया। वत्सराज ने अपने वंश की शक्ति और प्रतिष्ठा को बढ़ाने का प्रयास किया। उसने जोधपुर पर कब्जा किया जिससे प्रतिहारों की दोनों शाखाएं एक हो गई।

वत्सराज का उत्तराधिकारी नागभट्ट-द्वितीय (800-834) भी अपने कुल का एक प्रतापी सम्राट् था। नागभट्ट को अपने सैन्य-जीवन के प्रारम्भ में कई सफलतायें प्राप्त हुई। नागभट्ट-द्वितीय को इस बात के लिए श्रेय प्रदान किया जाता है कि उसने उत्तर में सिन्ध से लेकर दक्षिण में आन्ध्र और पश्चिम में अनर्त (काठियावाड़ में एक स्थान) से लेकर पूर्व में बंगाल की सीमाओं तक अपने राज्य का विस्तार किया। यद्यपि राष्ट्रकूट वंश के राजा गोविन्द तृतीय ने नागभट्ट-द्वितीय को पराजित कर दिया तथापि कन्नौज पर प्रतिहार वंश का अधिकार बना रहा। नागभट्ट-द्वितीय को गोविन्द-तृतीय द्वारा पराजय सहन करने से कुछ हानि अवश्य उठानी पडी किन्तु कन्नौज को उसने अपने हाथ से नहीं जाने दिया और इसे अपनी राजधानी बनाया। नागभट्ट-द्वितीय का उत्तराधिकारी रामभद्र था (834-840), जिसके शासन-काल में कोई महत्त्वपूर्ण घटना घटित नहीं हुई।

मिहिरभोज- अपने वंश का मिहिरभोज अत्यन्त प्रतापी और प्रभावशाली नरेश था। इसने एक सुदीर्घ काल (840-890) तक शासन किया। मिहिरभोज को ही वास्तव में अपने राजकुल की सीमाओं को विस्तृत करने का श्रेय दिया जा सकता है, क्योंकि उसके पूर्वजों का पर्याप्त समय पालों और राष्ट्रकूटों से युद्ध करने में व्यतीत हो जाता था। मिहिरभोज को इस बात का गौरव प्राप्त था कि राजनैतिक प्रभुता के लिए तीन राजकुलों में जो संघर्ष छिड़ा, उसमें अपने वंश को उसने सबसे अधिक शक्तिशाली बनाया। विभिन्न दिशाओं में उसकी विजयों के फलस्वरूप गुर्जर-प्रतिहारों का राज्य एक वास्तविक साम्राज्य के रूप में परिणत हो गया। उसके राज्य में पूर्वी पंजाब, राजपूताना का अधिकांश भाग, वर्तमान उत्तर प्रदेश का अधिकतर हिस्सा और ग्वालियर आदि प्रदेश सम्मिलित थे। अपने उत्तराधिकारियों की भांति भोज ने भी सम्भवतः सुराष्ट्र (काठियावाड), मालवा और अवन्ति पर शासन किया। इस प्रकार भोज के अधीन कन्नौज का राज्य उत्तर-पश्चिम में सतलज द्वारा, पश्चिम में वहिन्द (हकरा) द्वारा, जिसके उस ओर सिन्ध का मुस्लिम राज्य था और दक्षिण-पश्चिम में नर्मदा नदी द्वारा घिरा हुआ था। नर्मदा नदी राष्ट्रकूटों और गुर्जर-प्रतिहारों के साम्राज्यों के मध्य में थी और उनके बीच एक विभाजक सीमा का निर्माण करती थी। पूर्व में भोज के राज्य की सीमा बंगाल और बिहार के राजा देवपाल के राज्य के बिल्कुल निकट थी। भोज ने देवपाल पर सफलतापूर्वक आक्रमण किया। दक्षिण में जैजाकभुक्ति (बुन्देलखण्ड) के चन्देलों का राज्य था जो अभी शक्ति प्राप्त कर रहा था। इस राज्य ने कदाचित् मिहिरभोज की अधीनता स्वीकार कर ली थी। इस प्रकार गुर्जर-प्रतिहार-साम्राज्य के विस्तार की तुलना गुप्तों या हर्ष के साम्राज्य से की जा सकती है। भोज के एक अर्द्ध-शताब्दी के सुदीर्घकालीन शासन में प्रतिहार वंश ने अपने गौरव और समृद्धि का उपभोग किया। भोज के विषय में हमें उसके अभिलेखों द्वारा कुछ महत्त्वपूर्ण सूचना प्राप्त होती है। उसकी मुद्रायें भी हमें उसके सम्बन्ध में कुछ सूचना प्रदान करती है। उसकी रजत-मुद्रायें काफी प्रचुर संख्या में प्राप्त हुई हैं जो उसके विस्तृत साम्राज्य और सुदीर्घ शासन-काल का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। उसके सिक्कों पर फारसी-प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगत होता है। भोज ने आदि-वराह और प्रभास के विरुद्ध धारण किये थे जो उसके सिक्कों पर उत्कीर्ण हैं।

भोज विष्णु और शिव का उपासक था। उसने आदिवराह की उपाधि ली। उसने सम्भवत: भोजपुर की स्थापना कराई थी। अरब यात्री सुलेमान ने भोज के साम्राज्य, उसके शासन, उसके राज्य के व्यापार तथा समृद्धि की बड़ी प्रशंसा की है। उसने उसे अरबों तथा मुसलमानों का सबसे प्रबल शत्रु कहा है। भोज की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपलब्धि उसके द्वारा मुस्लिम आक्रान्ताओं के विस्तार पर अंकुश लगाना था। उसके प्रतिरोध के कारण मुसलमान आक्रांत दक्षिण अथवा पूर्व की ओर नहीं बढ़ सके। सुलेमान ने उसे बरूआ भी कहा है। सुलेमान ने लिखा है- जर्ज (गुर्जरों) के राजा के पास असंख्य सेनायें हैं और किसी भी भारतीय राजकुमार के पास इतनी सुन्दर अश्वारोही सेना नहीं है।…उसके पास अतुल सम्पत्ति है और उसके घोड़ों तथा ऊंटों की संख्या भी बहुत अधिक है। भारत में कोई ऐसा अन्य देश नहीं है जो डाकुओं से इसकी अपेक्षा अधिक सुरक्षित हो। कश्मीर-नरेश शंकरवर्मन उत्पल के लिए कहा जाता है की उसने भोज की शक्ति को रोका था। परन्तु यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता है की इस बात में सत्यांश किय्ना है। डॉं. रमेशचंद्र मजूमदार में भोज का मूल्यांकन करते हुए लिखा है- भोज ने एक प्रबल शासक के रूप में ख्याति अर्जित कर ली थी। वह अपने साम्राज्य में शान्ति बनाए रखने तथा बाह्य आक्रमणों से उसकी रक्षा करने में सक्षम रहा। वह मुसलमानों के आक्रमणों के विरुद्ध एक सुरक्षा-दीवार की भाँति खड़ा था और अपने उत्तराधिकारियों को अपने कार्यों की एक विरासत दे गया?

महेन्द्रपाल (885-910 ई.)- मिहिरभोज का उत्तराधिकारी महेन्द्रपाल (890-908) अपने महान् पिता का एक योग्य पुत्र था। अपने पिता द्वारा प्राप्त साम्राज्य के ऊपर न केवल उसने अपना सुदृढ अधिकार रखा, वरन् उसमें कुछ अन्य भाग भी मिलाये। उसके अभिलेख पेहेवा (करनाल, आधुनिक हरियाणा का एक जनपद), मगध में गया, तथा काठियावाड़ में प्राप्त हुए हैं। सियहदोनि (ग्वालियर) तथा स्रावस्ती के भुक्ति में भी उसके अभिलेख मिले हैं। उसके अभिलेख यह सूचित करते हैं कि उसने पालों से मगध और उत्तर बंगाल छीन लिया। कश्मीर के राजा शंकरवर्मन के आक्रमणों के फलस्वरूप महेन्द्रपाल की राज्य-सीमा कुछ घट गई, परन्तु अन्य किसी प्रकार के हास की सूचना हमें नहीं प्राप्त होती। महेन्द्रपाल ने हर्ष और यशोवर्मन की भांति विद्या को प्रोत्साहन दिया। राजशेखर नामक कवि उसके राजदरबार में रहता था।

भोज द्वितीय (910913 ई.) और महिपाल प्रथम (913-944 ई.)- महेन्द्रपाल का उत्तराधिकारी उसका पुत्र भोज-द्वितीय हुआ, महेन्द्रपाल प्रथम की दो प्रधान रानियां थीं। एक का नाम देहनागा देवी तथा दूसरी का नाम महादेवी था।

देहनागादेवी नामक रानी के पुत्र का नाम भोज और महादेवी नामक रानी के पुत्र का नाम महीपाल था। महेन्द्रपाल की मृत्यु के उपरान्त इन दोनों सौतेले भाइयों में गृहयुद्ध प्रारम्भ हो गया। युद्ध में भोज द्वितीय सफल रहा। किन्तु उधर महिपाल प्रथम भी राजसिंहासन प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहा। अत में चन्देल नरेश हर्षदेव की सहायता से उसने अपने भाई को पराजित कर सिंहासन पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। उसके बाद उसका अनुज महीपाल कन्नौज के राज-सिंहासन पर आसीन हुआ। महीपाल के शासन-काल से कन्नौज के प्रतिहार-वंश की राजलक्ष्मी विचलित होने लगी। परन्तु उसके शासनकाल के प्रारम्भिक वर्षों में उसके राज्य में शान्ति और समृद्धि व्याप्त थी। साम्राज्य की शक्ति इस समय अक्षुण्ण बनी रही और इसकी सीमायें संकुचित भी नहीं होने पाई। कवि राजशेखर ने, जिसने उसकी राजसभा को भी सुशोभित किया था, उसे आर्यावर्त का महाराजाधिराज कहा है और उसने मेखलों, कलिगों, केरलों और कुन्तलों पर महीपाल की विजयों का भी उल्लेख किया है। परन्तु महीपाल की स्थिति निरापद नहीं थी। गुर्जर-प्रतिहारों के चिर शत्रु राष्ट्रकूट और बंगाल के पाल नरेश दोनों ही सजग हो गये और कन्नौज के राज्य पर आक्रमण करने का अवसर ताकने लगे। सन् 916 ई. में राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र-तृतीय ने एक बहुत बडी सेना लेकर कन्नौज पर आक्रमण कर दिया और इसको अपने अधिकार में कर लिया। परन्तु महीपाल ने चन्देल राजा की सहायता से अपने राज्य पर पुन: अधिकार कर लिया। कन्नौज के साथ-साथ उसने दोआब, बनारस, ग्वालियर और सुदूरवर्ती काठियावाड पर भी अपना स्वामित्व स्थापित किया। इस प्रकार महीपाल प्रथम के साम्राज्य के अन्तर्गत पूर्व में बिहार की पश्चिमी सीमा तक उत्तर-पश्चिम में पंजाब के कुछ प्रदेशों तक, पश्चिम में सौराष्ट्र तक, उत्तर में तराई प्रदेश तक और दक्षिण में नर्मदा के तटीय प्रदेश तक का क्षेत्र आता था।

महीपाल के उत्तराधिकारी- महीपाल की मृत्यु सन् 944 ई. के लगभग हुई। उसके उपरान्त महेन्द्रपाल-द्वितीय राजा हुआ। उसने अपने पिता के राज्य को दो-तीन वर्षों तक सम्भाला, परन्तु उसके बाद उसका अनुज देवपाल प्रतिहार साम्राज्य का स्वामी हुआ। देवपाल के समय से साम्राज्य का विघटन प्रारम्भ हो गया। परवर्ती प्रतिहार राजाओं ने गंगा की घाटी, राजपूताना के कुछ भागों और मालवा पर किसी प्रकार अपना अधिकार स्थापित रखा। परन्तु चन्देलों ने, जो पहले उसके सामन्त थे, उसका विरोध करते हुए अपनी आक्रमणात्मक नीति प्रारम्भ की। चालुक्यों ने गुजरात में अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दी, परमार मालवा में स्वतन्त्र हो गये और चन्देलों तथा चेदियों ने यमुना-नर्मदा के मध्यवर्ती भाग में अपने को स्वतन्त्र घोषित किया। महीपाल के पश्चात् महेन्द्रपाल, देवपाल, विजयपाल और राज्यपाल प्रतिहार वंश के राजसिंहासन पर बैठे थे, परन्तु इनमें से कोई भी अपने वंश के गौरव को पुनर्जीवित न कर सका। जब राज्यपाल कन्नौज के राज-सिंहासन पर बैठा (960-1028), तब उसका राज्य सिकुड़कर केवल गंगा और यमुना नदियों के मध्यवर्ती प्रदेश तक ही रह गया था। मुसलमानों के आक्रमण दसवीं शताब्दी में होने लगे थे जिनका आघात राज्यपाल के राज्य को भी लगा। जब गजूनी के महमूद ने 1018-19 ई. में कन्नौज पर आक्रमण किया तो राज्यपाल ने निर्विरोध आत्मसमर्पण कर दिया। फिर भी महमूद ने कन्नौज को काफी लूटा-खसोटा। महमूद के लौट जाने के बाद चन्देल राजकुमार विद्याधर ने राज्यपाल को उसकी कायरता का दण्ड देने के लिए उसके ऊपर आक्रमण कर दिया और युद्ध में उसे मार डाला। इस प्रकार प्रतिहार साम्राज्य को एक दु:खद अन्त देखना पड़ा। अभिलेखों में त्रिलोचन और यशपाल के नाम मिलते हैं। इन अभिलेखों से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि प्रतिहार राजाओं के हाथ से कन्नौज निकल गया था और इस पर 1090 ई. के लगभग गहड़वाल वंश के चन्द्रदेव ने अपना अधिकार जमा लिया था।

सभी प्रतिहार-नरेश शैव या वैष्णव धर्मों के अनुयायी थे। कुछ प्रतिहार शासक वैष्णव धर्म को मानते थे और कुछ शैव धर्म को। भगवती के प्रति भी उनकी श्रद्धा और भक्ति थी, गुर्जर-प्रतिहारों के पश्चात् कन्नौज का राज्य गहड़वालों के अधिकार में चला गया।