गुलाम वंश

दिल्ली सल्तनत

दिल्ली सल्तनत- कुतुबुद्दीन ऐबक और आराम शाह: 1206-1210 ई.

गोरी की विजय से 1526 ई. तक दिल्ली पर मुस्लिम सुल्तानों का शासन रहा जिसे दिल्ली सल्तनत कहा जाता है। इस दौरान कई वंशों के सुल्तानों ने दिल्ली पर शासन किया। गोरी की मृत्यु के बाद ऐबक उसके भारतीय प्रदेशों का शासक बना।

कुतुबुद्दीन ऐबक और आराम शाह (1206-1210 ई.)

ऐबक एक तुर्की शब्द है, जिसका अर्थ होता है चंद्रमा का देवता। इस वंश को कई नामों से जाना जाता है। प्रथम नाम है गुलाम वंश, (वंश के शासक में केवल तीन ही गुलाम कुतुबुद्दीन, इल्तुतमिश, बलबन)। उनमें भी इल्तुतमिश और बलबन शासक बनने से पूर्व ही मुक्त हो गये थे।

ममलुक वंश- ममलुक वैसे दासों को कहा जाता है, जो स्वतंत्र माता-पिता के पुत्र होते हैं। ममलुक शब्द उन दासों के लिए भी आता है जो घरेलू सेवा में नहीं वरन सैनिक सेवा में लगाए गए। ममलुक वंश नामकरण भी उचित नहीं लगता है।

प्रारंभिक तुर्की वंश- यह तीसरा नाम है। यह नाम भी उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि इसके बाद फिर किसी तुर्की वंश की स्थापना नहीं हुई।

इलवरी वंश- केवल एक शासक कुतुबुद्दीन ऐबक इस वंश का नहीं है। अतः इलवरी वंश ही सही प्रतीत होता है (सबसे अधिक मान्यता प्राप्त)।

मुहम्मद गोरी का कोई उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण अत: उसके प्रान्तीय राज-प्रतिनिधियों ने शीघ्र ही अपने-अपने अधिकार-क्षेत्रों में अपनी शक्ति स्थापित कर ली। गृजूनी के सिंहासन पर किरमान का शासक ताजुद्दीन यल्दूज आरूढ़ हुआ। कुतुबुद्दीन ऐबक ने सुल्तान की उपाधि धारण की तथा बंगाल के इख्तियारुद्दीन, मुलतान एवं उच्च के शासक नासिरुद्दीन कबाचा आदि मुस्लिम पदाधिकारियों ने उसे भारतीय प्रदेशों का शासक स्वीकार कर लिया। कुतुबुद्दीन ऐबक के उत्कर्ष से ताजुद्दीन यल्दौजू को बड़ी ईर्ष्या हुई और वह पंजाब पर प्रभुत्व जमाने के लिए उससे लड़ बैठा। कुतुबुद्दीन ने यल्दौजू को परास्त कर गजनी से खदेड़ भगाया तथा उसे चालीस दिनों तक अपने अधिकार में रखा। परन्तु गजनी के लोगों ने उसकी ज्यादतियों से ऊबकर अपने उद्धार के लिय यल्दौज को गुप्त रूप से आमंत्रित किया। यल्दौज इस अवसर से लाभ में नहीं चूका तथा उसके अचानक एवं अप्रत्याशित रूप से वापस आ से कुतुबुद्दीन शीघ्रता से भाग गया। इससे भारत एवं अफ़गानिस्तान के बीच राजनैतिक एकता की सम्भावना जाती रही और यह बाबर की दिल्ली विजय तक पूरी नहीं हुई। कुतुबुद्दीन केवल भारत का सुल्तान रह गया। चार वर्षों से कुछ अधिक शासन करने के पश्चात् चौगान अथवा पोलो खेलते समय घोड़े से गिरकर 1210 ई. के नवम्बर मास के आरम्भ में लाहौर में उसकी मृत्यु हो गयी।

मिनहाजुस्सिराज का कहना है कि कुतुबुद्दीन एक वीर एवं उदार-हृदय सुल्तान था। वह निर्भीकता एवं सैनिक पराक्रम से सम्पन्न रहने के कारण कभी किसी युद्ध में पराजित नहीं हुआ तथा अपनी विस्तृत विजयों से हिन्दुस्तान का एक बृहत् भाग इस्लाम की ध्वजा के नीचे ले आया। वह लाखों में दान किया करता था तथा अपनी असीम उदारता के लिए सभी लेखकों द्वारा लाखबख्श (लाखों का दाता) कहा गया है। उसके दरबार में हसन निजामी जैसा विद्वान् (इतिहासकार) रहता था। उसने ताज उल मासिर की रचना की। फक्र-ए-मुदब्बीर उसी के दरबार में रहता था। ऐबक ने कुछ निर्माण कार्य भी किए। दिल्ली में उसने कुब्बत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण करवाया। अजमेर में अढ़ाई दिन का झोपड़ा बनवाया। दिल्ली में किला-ए-राय पिथौरा के बगल में एक नगर की स्थापना की जो दिल्ली के प्राचीनतम सात नगरों में प्रथम माना जाता है। 1199 ई. में कुतुबमीनार का निर्माण शुरु किया जिसे इल्तुतमिश ने पूरा किया। यह कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर है। ताजुल-मआसिर का लेखक हसनुन्निज़ामी, जो कुतुबुद्दीन की मुक्त कंठ से प्रशंसा करता है, लिखता है कि- वह निष्पक्ष भाव से लोगों का न्याय करता था तथा राज्य में शान्ति एवं उन्नति की वृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहा करता था।

परन्तु सुल्तान अपनी विजयों और प्रशासन में आवश्यकता पड़ने पर कठोर कार्रवाई करने में तनिक भी संकोच नहीं करता था। इस्लाम में उसकी अद्भुत भक्ति थी।

लाहौर में कुतुबुद्दीन की अचानक मृत्यु हो जाने पर वहाँ के अमीरों और मलिकों ने उपद्रव पर नियंत्रण करने, साधारण जनता में शान्ति कायम रखने तथा सैनिकों के हृदयों के संतोष के लिए आरामबख्श को सुल्तान आरामशाह के नाम से उसका उत्तराधिकारी खड़ा किया। आरामशाह राज्य-शासन के योग्य नहीं था। शीघ्र ही दिल्ली सरदारों ने आराम के विरुद्ध षड्यंत्र रच कर उसे हटाने के लिए मलिक शम्सुद्दीन इल्तुतमिश को आमंत्रित किया, जो उस समय बदायूं का शासक था। इस बुलावे के उत्तर में इल्तुतमिश अपनी सारी सेना लेकर आगे बढ़ा तथा आराम को दिल्ली के निकट, जूद के मैदान में परास्त किया। आराम का फिर क्या हुआ, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

इल्तुतमिश: 1211-1236 ई.

इल्तुतमिश का अर्थ है साम्राज्य का रक्षक। इल्तुतमिश तुर्किस्तान की इल्बरी काबिले का था। प्रारंभ से ही उसमें बुद्धिमत्ता एवं चतुराई के लक्षण दिखलाई देते थे। इससे उसके भाइयों को बड़ी ईष्य हो गयी तथा उन्होंने उसे पैतृक घर एवं संरक्षण से वंचित कर दिया। परन्तु विपरीत परिस्थितियों ने उसके गुण नष्ट नहीं किये और शीघ्र ही उसके जीवन में एक नया द्वार खोल दिया। उसके गुणों ने दिल्ली के तत्कालीन राजप्रतिनिधि कुतुबुद्दीन का ध्यान आकृष्ट किया, जिसने अधिक मूल्य पर खरीद लिया। अपनी योग्यता के बल से इल्तुतमिश धीरे-धीरे अपना दर्जा बढ़ाता गया। वह बदायूँ का शासक बना दिया गया और कुतुबुद्दीन की एक कन्या से उसका विवाह हो गया। खोकरों के विरुद्ध मुहम्मद गोरी के आक्रमण के समय हुई, उसकी सेवाओं के उपलक्ष में सुल्तान के आदेश द्वारा वह दासत्व से मुक्त कर दिया गया और उसे अमीरुल-उमरा का ऊंचा पद मिला।

इस प्रकार दिल्ली के सरदारों ने एक योग्य व्यक्ति को चुना। परन्तु 1210 या 1211 ई. में सिंहासन पर बैठने के पश्चात् इल्तुतमिश ने अपने को संकट पूर्ण परिस्थिति में पाया। नासिरुद्दीन कुबाचा ने सिंध में स्वतंत्रता स्थापित कर ली और ऐसा प्रतीत होने लगा कि वह पंजाब पर भी अपना अधिपत्य जमाना चाहता है। ताजुद्दीन यल्दूज जो गजनी पर अधिकार किये था, अब भी मुहम्मद के भारतीय प्रदेशों पर प्रभुता का अपना पुराना दावा किये बैठा था। एक खलजी सरदार अली मर्दान ने, जो 1206 ई. में इख्तियारुद्दीन की मृत्यु के पश्चात् कुतुबुद्दीन द्वारा बंगाल का शासक नियुक्त हुआ था, उसके (कुतुबुद्दीन के) मरने पर दिल्ली के प्रति अपनी राजभक्ति को ताक पर रख सुल्तान अलाउद्दीन की उपाधि धारण कर ली। यही नहीं, हिन्दू राजा और सरदार स्वतंत्रता खोकर असन्तोष से उद्विग्न थे; ग्वालियर एवं रणथम्भोर उनके शासकों द्वारा आरामशाह के कमजोर शासन-काल में लौटा लिये गये थे। दिल्ली के कुछ अमीर इल्तुतमिश के शासन के विरुद्ध अपना क्रोध प्रकट कर उसके कष्टों को और बढ़ा रहे थे।

पर नये सुल्तान ने साहस के साथ परिस्थिति का सामना किया। पहले उसने अमीरों के एक विद्रोह का दिल्ली के निकट जूद के मैदान में सफलता पूर्वक दमन किया। तत्पश्चात् उसने दिल्ली राज्य के विभिन्न भागों एवं बदायूँ, अवध, बनारस तथा शिवालिक आदि उसके अधीन राज्यों को अपने अधिकार में ले लिया। उसने प्रतिद्वन्द्वियों के महत्त्वाकांक्षा से भरे मनसूबे भी विफल कर दिये गये।। 1214 ई. में ताजुद्दीन यल्दौज को ख्वारज्म के शाह सुल्तान मुहम्मद ने गजनी से मार भगाया। ताजुद्दीन यल्दौजू लाहौर भाग गया और थानेश्वर तक पंजाब जीत लिया। उसने स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने तथा इल्तुतमिश पर भी अपना अधिकार स्थापित करने की चेष्टा की। इसे इल्तुतमिश सहन नहीं कर सका। वह शीघ्र अपने प्रतिद्वन्द्वी की ओर बढ़ा तथा उसने 1216 ई. की जनवरी में तराइन के निकट लड़ाई में उसे पराजित किया। यल्दूज बन्दी बनाकर बदायूँ भेज दिया गया। नासिरुद्दीन कुबाचा को, जो इस बीच में लाहौर तक बढ़ आया था, 1217 ई. में इल्तुतमिश ने उसे नगर से निकाल भगाया। 1228 ई. की फरवरी में वह पूर्णतः वशीभूत कर लिया गया तथा उसके अचानक सिन्धु में डूब जाने के कारण सिंध दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।

लगभग एक वर्ष बाद बगदाद के खलीफ़ा अल-मुस्तन्सर बिल्लाह ने उसे सम्मान का जामा एवं विशिष्ट अधिकार पत्र दिया, जिससे उसके द्वारा जीते गये सभी देश एवं सागर पर सुल्ताने-आजम (महान् सुल्तान) की हैसियत से उसको अधिकार दे दिया गया। इससे इल्तुतमिश की सत्ता को नया बल प्राप्त हुआ तथा उसे मुस्लिम संसार में एक दर्जा मिल गया। दिल्ली की सल्तनत पर खिलाफत का काल्पनिक अधिकार हो गया और भारत की भौगोलिक सीमाओं के बाहर, किन्तु अनिश्चित फिर भी वास्तविक इस्लामी भाईचारे के अधीन, खिलाफत की चरम सत्ता को कानूनी रूप मिला। सिक्कों पर इल्तुतमिश ने अपना उल्लेख खलीफा के प्रतिनिधि के रूप में करवाया। टॉमस का कथन है कि उसके सिक्कों के साथ दिल्ली के पठानों के चाँदी के सिक्कों का यथार्थ रूप में प्रचलन आरम्भ होता है। इस तरह उसे दिल्ली का प्रथम वैधानिक सुल्तान कहा जाता है।

इसी बीच 1226 ई. में इल्तुतमिश ने रणथम्भोर को पुनः प्राप्त कर लिया तथा एक वर्ष बाद उसने शिवालिक पर्वत में स्थित मंडावर को जीत लिया। 1230-1231 ई. के जाड़े में बंगाल के खल्ज़ी मलिक पूर्णत: अधीन कर लिये गये तथा अलाउद्दीन लखनौती का शासक नियुक्त हुआ। ग्वालियर को, जो कुतुबुद्दीन की मृत्यु के पश्चात् पुनः स्वतंत्र हो गया था, 1232 ई. के अंत में सुल्तान ने वहाँ के हिन्दू राजा मंगलदेव से पुन: छीन लिया। सुल्तान ने 1234 ई. में मालवा के राज्य पर आक्रमण कर भिलसा के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने उज्जैन की प्रसिद्ध नगरी पर चढ़ाई कर दी। उसे अधिकृत कर लूट लिया। विख्यात विक्रमादित्य की एक प्रतिमा दिल्ली लाई गयी। इल्तुतमिश का अन्तिम आक्रमण बनियान पर हुआ, लेकिन राह में उसे ऐसा भयंकर रोग हुआ कि वह डोली में दिल्ली वापस लाया गया। यह रोग घातक सिद्ध हुआ तथा छब्बीस वर्ष राज्य करने के पश्चात् 29 अप्रैल, 1236 ई. को उसकी मृत्यु हो गयी।

इल्तुतमिश के शासन-काल में ही 1221 ई. में सर्वप्रथम मंगोल अपने प्रसिद्ध नेता चंगेज़ खाँ के अधीन सिन्धु-तट पर उपस्थित हुए। चंगेज का जन्म 1155 ई. में हुआ था तथा उसका मूल नाम तेमूजिन था। वह केवल विजेता ही नहीं था। प्रारम्भिक काल में प्रतिकूल परिस्थितियों में ही उसका प्रशिक्षण हुआ था। इससे वह धैर्य, साहस और आत्मविश्वास-जैसे गुणों से सम्पन्न हो गया, जिनके कारण उसने एक साम्राज्य में मध्य एशिया की असभ्य जातियों का संगठन किया तथा नियम एवं संस्थाएँ बनायीं जो उसकी मृत्यु के बाद भी कई पीढ़ियों तक चली। उसने विद्युद्वेग से मध्य एवं पश्चिम एशिया के देशों को रौंद डाला और जब उसने ख्वारज़्म अथवा खीवा के अन्तिम शाह जलालुद्दीन मंगबर्नी पर आक्रमण किया, तब वह (जलालुद्दीन मंगबर्नी) पंजाब भाग आया तथा उसने इल्तुतमिश के राज्य में शरण ली। दिल्ली के सुल्तान ने अपने इस बिना बुलाये अतिथि की प्रार्थना अस्वीकार कर दी। मंगबनी खोकरों से जा मिला तथा मुलतान के नासिरुद्दीन कुबाचा को पराजित कर सिन्ध एवं उत्तरी गुजरात को लुटा और फारस चला गया। मंगोल भी लौट गए। इस तरह भारत एक भयानक संकट से बच गया। परन्तु अगले युगों में दिल्ली के सुल्तान मंगोल आक्रमणों के भय से व्याकुल रहे।

मंगोल मध्य एशिया के स्टेपीज में रहने वाले जनजातीय लोग थे। इन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार करने से पहले बौद्ध धर्म स्वीकार किया था और बौद्ध धर्म की समनिष्ठ शाखा में विश्वास करते थे। 1206 ई. में इस प्रदेश में मंगोलजनजाति की एक सभा (करुलताई) हुई जिसमें तेमूजिन (चंगेज खां) को नेता चुना गया। मंगोलों की प्रशासनिक और सैनिक व्यवस्था एक दूसरे से जुड़ी हुई थी। सैनिक टुकड़ियों का विभाजन 10 से 10 हजार के बीच था। 10 हजार सैनिकों की टुकड़ी मिनगान कहलाती थी। उससे ऊपर की टुकड़ी तुआन होती थी। माना जाता है कि प्रशासनिक एवं सैनिक व्यवस्था के संचालन के लिए चंगेज खां ने गार्डों की टुकड़ियों को नियुक्त किया था।

इल्तुतमिश दिल्ली की प्रारंभिक तुर्की सल्तनत का, जो 1290 ई. तक कायम रही, सर्वश्रेष्ठ शासक माना जा सकता है, जो उचित ही है। उसे ही भारत के नव-स्थापित मुस्लिम राज्य को भंग होने से बचने तथा कुतुबुद्दीन के द्वारा जीते गए प्रदेशों को एक शक्तिशाली एवं ठोस राज्य के रूप में संगठित करने का श्रेय प्राप्त है। यह राज्य उसकी मृत्यु के समय कतिपय बहरी प्रान्तों को छोड़कर सारे हिंदुस्तान (उत्तर भारत) में फैला था। इल्तुतमिश एक निर्भीक योद्धा था। उसने अपने शत्रुओं को दृढ़ता से पराजित किया तथा अपने जीवन के अन्तिम वर्ष तक सैनिक विजयों में व्यस्त रहा। साथ-साथ वह मनुष्य के रूप में देदीप्यमान गुणों से सम्पन्न था। कला एवं विद्या का पोषक भी था। दिल्ली की प्रसिद्ध कुतुबमीनार को सुल्तान ने 1231-1232 ई. में पूरा करवाया। यह उसकी महत्ता का अमर प्रमाण है। इस मीनार का नाम दिल्ली के प्रथम तुर्की सुल्तान के नाम पर नहीं था, जैसा की कुछ लेखकों का अनुचित विचार है; बल्कि वह बगदाद के नजदीक उष नामक स्थान के निवासी खवाजा कुतुबुद्दीन के नाम पर है, जो रहने के लिए हिंदुस्तान (उत्तर भारत) आये थे और जिनका इल्तुतमिश तथा अन्य लोग काफी सम्मान एवं सत्कार करते थे। कृतज्ञता के कारण कारण ही इल्तुतमिश ने अपने पोषकों-सुल्तान कुतुबुद्दीन एवं सुल्तान मुइजुद्दीन-के नाम इस पर अंकित कर दिये थे। सुल्तान की आज्ञा से एक शानदार मस्जिद भी बनी। वह अत्यन्त धर्मनिष्ठ था तथा नमाज पढ़ने में बड़ा तत्पर रहा करता था।

मिनहाजुस्सिराज लिखता है कि ऐसा गुणवान, दयालु हृदय तथा विद्वानों एवं धर्मोपदेशकों का आदर करने वाला सुल्तान कभी सिंहासन पर नहीं बैठा है। कुछ तत्कालीन अभिलेखों में उसे ईश्वर की भूमि का संरक्षकईश्वर के सेवकों का सहायक आदि कहा गया है।

तुर्क विजय- लगभग उत्तरी भारत में बहुत सारे क्षेत्रों में तुर्की साम्राज्य स्थापित हो चुका था। गोरी के समय ही बख्तियार खिलजी ने बंगाल को जीत लिया था। उस समय बंगाल पर लक्ष्मण सेन शासन करता था और उसकी राजधानी नदिया थी। माना जाता है कि बख्तियार खिलजी घोडे के व्यापारी के वेश में गया और बंगाल पर अचानक धावा बोल दिया। लक्ष्मण सेन अपनी राजधानी छोड़कर भाग गया और फिर नदिया पर बख्तियार खिलजी का नियंत्रण हो गया। बख्तियार खिलजी लखनौती से शासन करता रहा। दूसरी तरफ लक्ष्मण सेन सोनारगाँव के कुछ क्षेत्रों पर कब्जा बनाये रहा। माना जाता है कि अपने बंगाल अभियान के मध्य ही खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को नष्ट कर दिया और बौद्ध भिक्षुकों की हत्या की। अंत में बख्तियार खिलजी असम के माघ शासक से संघर्ष करता हुआ मारा गया। तुर्की विजय के कई कारण बताए जाते है। हसन निजामी और मिनहाज-उस-सिराज इसे दैवी कृपा मानते है। फक्र ए मुदव्विर इसके पीछे सैनिक कारकों को उत्तरदायी मानते है। महत्त्वपूर्ण कारक थे, तुर्कों की अश्वारोही सेना और राजपूतों की सामंतवादी पद्धति।

यदुनाथ सरकार अपना अलग मत रखते है। इसने तुर्कों, पठानो एवं अरबों के विजय के निम्नलिखित कारण माने हैं-

1. इस्लामी व्यवस्था में जातीय समानता की भावना।

2. मुसलमानों का नियतिवादी होना एवं अल्लाह के नाम पर युद्ध करना।

3. कुरान में मदिरा पान पर मनाही थी इसलिए मुसलमान सैनिक मदिरापान से परहेज रखते हैं।

ब्रिटिश इतिहासकारों का मत- (तुर्क-विजय के संदर्भ में) एलिफिस्टन महोदय का कहना है कि तुर्की सेना में ऑक्सस एवं सिन्धु नदी के बीच बसने वाले जनजातीय लोग थे, ये लोग काफी लड़ाकू थे। इसी वजह से तुर्की सेना ज्यादा सक्षम थी। दूसरी तरफ स्मिथ एवं लेनपूल का कहना है कि तुर्की ठण्डे प्रदेश में बसने वाले मांसाहारी लोग थे इसलिए वे भारतीयों की तुलना में अधिक ताकतवर थे। बहुत सारे इतिहासकारों ने सैनिक कारकों को ज्यादा महत्त्व दिया है किन्तु सैनिक दृष्टि से भारतीय कम सक्षम नहीं थे। यह सही है कि तुर्की सेना में घोडे पर सवार तीरंदाज थे तो भारतीय सेना में भी गज सेना थी। अत: सैनिक दृष्टि से भारतीय राज्य पिछड़े हुए नहीं थे। मूल कमजोरी संगठनात्मक व्यवस्था में थी। मुसलमानों में जातीय समानता थी जबकि भारतीय समाज जाति के अधर पर विभाजित था। सैनिक कार्य केवल क्षत्रियों का पेशा था। अलबेरुनी  के अनुसार जिस समय विदेशी आक्रमण होता था उस समय दस प्रतिशत जनसँख्या ही युद्ध में भाग लेती थी और 90 प्रतिशत जनसँख्या इससे अलग रहती थी। यही कारण है कि विदेशी आक्रमण के समय भारतीय राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाते थे। तुर्कों की इक्ता प्रणाली भारतीय सामन्तवादी पद्धति से ज्यादा विकसित थी। इक्ता प्रणाली के अधीन नियुक्त सैनिक, सामंतों के सैनिकों की तुलना में युद्ध मैदान में अधिक समय तक रहते थे।

रजिया: 1236-1240 ई.

इल्तुतमिश के सबसे बड़े पुत्र नासिरुद्दीन मुहम्मद की 1229 ई. की अप्रैल में मृत्यु हो गयी। वह अपने पिता के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल पर शासन कर रहा था। सुल्तान के शेष जीवित पुत्र शासन कार्य के योग्य नहीं थे। अत: इल्तुतमिश ने अपनी मृत्यु-शैय्या पर से अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया। परन्तु उसके दरबार के सरदार एक स्त्री के समक्ष नतमस्तक होना अपने अहंकार के विरुद्ध समझते थे। उन लोगों ने मृतक सुल्तान की इच्छाओं का उल्लंघन कर, उसके सबसे बड़े जीवित पुत्र रुक्नुद्दीन फ़िरोज को, जो अपने पिता के जीवन काल में बदायूं तथा कुछ वर्ष बाद लाहौर का शासक रह चुका था, सिंहासन पर बैठा दिया। रुक्नुद्दीन शासन के बिलकुल अयोग्य था। वह नीच रुचि का था, राजकाज की उपेक्षा करता था और राज्य के धन का अपव्यय करता था। उसकी माँ शाह तुर्खान के, जो एक निम्न उद्भव की महत्त्वकांक्षापूर्ण महिला थी, कामों से बातें बिगड़ती ही जा रही थीं। उसने सारी शक्ति को अपने अधिकार में कर लिया, जबकि उसका पुत्र भोग-विलास में डूबा रहता था। सारे राज्य में गड़बड़ी फैल गयी। बदायूँ, मुलतान, हाँसी, लाहौर, अवध एवं बगाल में केन्द्रीय सरकार के अधिकार का तिरस्कार होने लगा। दिल्ली के सरदारों ने, जो राजमाता के अनावश्यक प्रभाव के कारण असन्तोष से उबल रहे थे, उसे बन्दी बना लिया तथा रज़िया को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा दिया। रुक्नुद्दीन फिरोज को, जिसने लोखरी में शरण ली थी, कारावास में डाल दिया गया, जहाँ 1236 ई. में 9 नवम्बर को उसके जीवन का अन्त हो गया। परन्तु रज़िया में शासकोचित गुणों का अभाव नहीं था। उसने चतुराई एवं उच्चतर कूटनीति से शीघ्र ही अपने शत्रुओं को परास्त कर दिया। हिन्दुस्तान (उत्तरी भारत) एवं पंजाब पर उसका अधिकार स्थापित हो गया तथा बंगाल एवं सिन्ध के सुदूरवर्ती प्रान्तों के शासकों ने भी उसका अधिपत्य स्वीकार कर लिया।

फिर भी उसके भाग्य में शान्तिपूर्ण शासन नहीं बदा था। वह अबीसीनिया के एक दास जलालुद्दीन याकूत के प्रति अनुचित कृपा दिखलाने लगी तथा उसने उसे अश्वशालाध्यक्ष का ऊँचा पद दे दिया। इससे क्रुद्ध होकर तुर्की सरदार एक छोटे संघ में संगठित हुए। सबसे पहले सरहिन्द के शासक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया ने तौर पर विद्रोह किया, जिसे दरबार के कुछ सरदार गुप्त रूप से उभाड़ रहे थे। बेगम एक बड़ी सेना लेकर विद्रोह का दमन करने चली, परन्तु इस युद्ध में विद्रोही सरदारों ने याकूत को मार डाला तथा बेगम को कैद कर लिया। वह अल्तूनिया के संरक्षण में रख दी गयी तथा उसका (रज़िया का) भाई मुइजुद्दीन बहराम दिल्ली का सुल्तान घोषित किया गया। रजूिया ने अल्तूनिया से विवाह कर इस विकट परिस्थिति से छुटकारा पाने का प्रयत्न किया, परन्तु यह व्यर्थ सिद्ध हुआ। वह अपने पति के साथ दिल्ली की ओर बढ़ी, लेकिन कैथल के निकट पहुँचकर अल्तूनिया के समर्थकों ने उसका साथ छोड़ दिया तथा 13 अक्तूबर, 1240 ई. को मुइजुद्दीन बहराम ने उसे पराजित कर दिया। दूसरे दिन पति के साथ उसकी हत्या कर दी गयी। इस तरह तीन वर्ष तथा कुछ महीनों के राज्य-काल के बाद रज़िया बेगम के कष्टपूर्वक जीवन का अंत हुआ।

रज़िया की मृत्यु के पश्चात् कुछ काल तक अव्यवस्था एवं गड़बड़ी फैली रही। दिल्ली की गद्दी पर उसके उत्तराधिकारी मुइजुद्दीन वहराम शाह (1240-42 ई.) तथा अलाउद्दीन मसूद शाह (1242-46 ई.) गुणहीन एवं अयोग्य थे तथा उनके छः वर्षों के शासन-काल में देश में शान्ति एवं स्थिरता का नाम भी न रहा। बाहरी आक्रमणों से हिन्दुस्तान (उत्तरी भारत) का दु:ख और भी बढ़ गया। बहराम शाह के समय, नयाब-ए-ममलिकात के पद का सृजन हुआ और इस पद पर प्रथम व्यक्ति एखतियारूद्दीन एतिगीन नियुक्त हुआ। इसी के समय मिन्हान उस सिराज ने तबकात-ए-नासिरी लिखा। 1241 ई. में मंगोल पंजाब के मध्य में पहुँच गये तथा लाहौर का सुन्दर नगर उनके निर्मम पंजे में पड़ गया। 1245 ई. में वे उच्च तक बढ़ आये। लेकिन उनकी बड़ी क्षति हुई और उन्हें पीछे हटना पड़ा। मसूद शाह के शासन-काल के अन्तिम वर्षों में असंतोष अधिक प्रचंड एवं व्यापक हो गया। अमीरों तथा मलिकों ने 10 जून, 1246 ई. को इल्तुतमिश के एक कनिष्ठ पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को सिंहासन पर बैठा दिया।

नसिरुद्दीन महमूद: 1246-66 ई.

नसिरुद्दीन मधुर एवं धार्मिक स्वभाव का व्यक्ति था। शासक के रूप में नसिरुद्दीन में तत्कालीन पेचीदी परिस्थिति का सामना करने लायक आवश्यक गुणों का काफी अभाव था। बलबन उस समय नवाब-ए-मामलिकात के पद पर था। उसका मंत्री ग्यासुद्दीन बलबन ही, जो बाद में उसका प्रतिनिधि बना, सिंहासन के पीछे वास्तविक बल था। बलबन ने अपने को इस विश्वास का पात्र सिद्ध कर दिखाया। उसने राज्य को आन्तरिक विद्रोहों एवं बाहरी आक्रमणों के संकटों से बचाने का भरसक प्रयत्न किया। आक्रमणकारी मंगोलों को उसने पीछे हटा दिया तथा विद्रोही राजाओं एवं जमींदारों को परास्त करने के लिए अन्य भागों पर कई बार चढ़ाइयाँ कीं। 1253 ई. में बलबन के कुछ विरोधी सरदारों के एक दल ने सुल्तान को उसे (बलबन को) निर्वासित करने के लिए उभाड़ा। किन्तु उसके शत्रु राजकाज का उचित प्रबन्ध नहीं कर सके। विरोधियों का प्रायोजक चिकलू खां था। इस षड्यंत्र के तहत बलबन को हांसी का गवर्नर बनाकर भेज दिया गया था। बलबन की जगह इमादुद्दीन रेहान को नियुक्त किया गया था। अत: 1255 ई. में उसे वापस बुलाकर राज्य का सर्वोच्च अधिकार पुनः सौंप दिया गया। नसिरुद्दीन 1266 ई. की 12 फरवरी को चल बसा। उसके बाद उसका कोई भी पुरुष उत्तराधिकारी नहीं बचा। इस प्रकार इल्तुतमिश के वंश का अन्त हो गया। तब बलबन, जिसकी योग्यता सिद्ध हो चुकी थी तथा जो स्वर्गीय सुल्तान द्वारा उसका उत्तराधिकारी मनोनीत किया गया, कहा जाता है कि सरदारों एवं पदाधिकारियों की मौन स्वीकृति से सिंहासन पर बैठा।

गयासुद्दीन बलबन 1266-86 ई.

दिल्ली की गद्दी पर के अपने पूर्वगामियों की तरह बलबन भी तुर्किस्तान की विख्यात इलबरी जाति का था। प्रारम्भिक युवा-काल में उसे मंगोल बन्दी बना कर बगदाद ले गये थे। वहाँ बसरा के ख्वाजा जमालुद्दीन नामक एक धर्मनिष्ठ एवं विद्वान् व्यक्ति ने उसे खरीद लिया। ख्वाजा जमालुद्दीन अपने अन्य दासों के साथ उसे 1232 ई. में दिल्ली ले आया। इन सबको सुल्तान इल्तुतमिश ने खरीद लिया। इस प्रकार बलबन इल्तुतमिश के चेहलागान नामक तुर्की दासों के प्रसिद्ध दल का था। सर्वप्रथम इल्तुतमिश ने उसे खासदार (सुल्तान का व्यक्तिगत सेवक) नियुक्त किया परन्तु गुण एवं योग्यता के बल पर वह क्रमशः उच्चतर पदों एवं श्रेणियों को प्राप्त करता गया। बहराम के समय वह अमीर-ए-अखुर बना तथा मसूद शाह के समय अमीर-ए-हाजिब बन गया। अन्त में वह नसिरुद्दीन महमूद का प्रतिनिधि (नायबे-मामलिकत) बन गया तथा 1249 ई. में उसकी कन्या का विवाह सुल्तान से हो गया।

सिंहासन पर बैठने के बाद बलबन को विकट परिस्थिति का सामना करना पड़ा। इल्तुतमिश की मृत्यु के पश्चात् तीस वर्षों के अन्दर राजकाज में उसके उत्तराधिकारियों की अयोग्यता के कारण गड़बड़ी आ गयी थी। दिल्ली सल्तनत का खजाना प्राय: खाली हो चुका था तथा इसकी प्रतिष्ठा नीचे गिर गयी थी। तुर्की सरदारों की महत्त्वाकांक्षा एवं उद्दंडता बढ़ गयी थी।

बलबन एक अनुभवी शासक था। वह उत्सुकता से उन दोषों को दूर करने में लग गया, जिनसे राज्य एक लम्बी अवधि से ग्रस्त था। उसने ठीक ही महसूस किया कि अपने शासन की स्थिरता के लिए एक मजबूत एवं कार्यक्षम सेना नितान्त आवश्यक है। अत: वह सेना को पुर्नसंगठित करने में लग गया। अश्वारोही एवं पदाति-नये तथा पुराने दोनों ही- अनुभवी एवं विश्वसनीय मलिकों के अधीन रख दिये गये। इसके बाद उसने दोआब एवं दिल्ली के पार्श्ववर्ती प्रदेशों को, जिन्हें पिछले तीस वर्षों के दुर्बल शासन-काल में मेवात (अलवर के आसपास का जिला) के राजपूत एवं अन्य तस्करों के दल लूटते रहे, पुनः व्यवस्थित करने की ओर ध्यान दिया। जीवन, सम्पत्ति एवं वाणिज्य आरक्षित हो। थे। सुल्तान ने दिल्ली के पार्श्ववर्ती जंगलों से मेवातियों को खदेड़ भगाया उनमें से बहुतों को तलवार के घाट उतार डाला। भविष्य में होने वाले उपद्रवों से सावधान रहने के लिए उसने गोपालगिर में एक दुर्ग बनवाया तथा दिल्ली शहर के निकट अफगान अधिकारियों के अधीन बहुत-सी चौकियाँ स्थापित कीं। अगले वर्ष (1267 ई. में) बलबन ने दोआब के लुटेरों को पराजित किया। वह स्वयं घोड़े पर कम्पिल, पटियाली तथा भोजपुर स्थित उनके दुर्गों तक गया। उन स्थानों पर उसने मजबूत किले बनवाये तथा जलाली के किले की मरम्मत भी करवायी। इस तरह व्यवस्था एवं सुरक्षा पुनः स्थापित की गयी। उसके साठ वर्षों के बाद बरनी ने लिखा कि- तबसे सड़के डाकुओं से मुक्त रहीं। उसी वर्ष उसने कटेहर (अब रुहेलखंड में) के विद्रोहियों को दंड दिया। कुछ दिन बाद उसने जूद के पहाड़ों की यात्रा की तथा वहाँ की पहाड़ी जातियों को दबाया।

सरदारों की शक्ति का अवरोध करने के लिए बलबन ने दोआब में भूमि प्राप्त करने के नियमों को व्यवस्थित करने का प्रयत्न किया। इल्तुतमिश के समय से ही 2000 शम्सी घुड़सवार सैनिक सेवा की शर्त पर इसका उपभोग कर रहे थे। बरनी बतलाता है कि अधिकतर मूल जागीरदार अब तक मर चुके थे अथवा शक्तिहीन हो चुके थे तथा उनके वंशजों ने उन जागीरों पर पैतृक सम्पत्ति के रूप में अधिकार कर अरीज के सरकारी कागजों पर भी अपना नाम अंकित करा लिया था, यद्यपि उनमें अधिकांश की प्रवृत्ति खेतों में काम करने की न थी। बलबन ने परिमित मात्रा में सुधार कर इस दोष को हटाने का प्रयत्न किया। उसने पुरानी जागीरों को पुन: अधिकृत कर लिया किन्तु जागीरदारों को उनकी उम्र के अनुसार जीवन-निर्वाह का भत्ता दे दिया। इससे जागीरदारों में असन्तोष फैल गया। उन्होंने अपनी इस दशा का वर्णन दिल्ली के कोतवाल वृद्ध फखुद्दीन से किया। कोतवाल ने सुल्तान को, एक भावुकतापूर्ण भाषण देकर, अपना पुराना आदेश रद्द करने एवं जागीरदारों को जागीरें लौटाने के लिए राजी कर लिया। इस प्रकार बुद्धिमत्ता पर भावनाओं की विजय हुई और एक पुरातन दोष ज्यों-का-त्यों छोड़ दिया गया, जिससे राज्य के साधन नष्ट होते रहे।

इस प्रकार भीतर से अपने शासन को दृढ़ एवं स्थायी बनाने का प्रयत्न करते हुए बलबन मंगोलों के आक्रमणों से उत्तर-पश्चिम सीमा की रक्षा करने के विषय में भूला नहीं था। मंगोलों ने गजनी एवं ट्रांसऑक्सियाना में अपनी शक्ति स्थापित कर ली थी तथा खलीफा अल-मुतसिम की हत्या कर बगृदाद पर भी अधिकार कर लिया था। अब वे पंजाब एवं सिन्ध की ओर बढ़े। सन् 1271 ई. में सुल्तान लाहौर पहुँचा तथा उसने दुर्ग के पुनर्निर्माण की आज्ञा दी। इस दुर्ग को उसके पूर्वकालीन शासकों के समय में मंगोलों ने नष्ट कर दिया था। बहुत समय तक सुलतान के चचेरे भाई शेर खान सुन्फर, जो राज्य का एक योग्य सेवक था तथा जिसे भंटिडा, भटनेर, समाना एवं सुनाम की जागीरें मिली थीं, मंगोलों के आक्रमणों के रस्ते में एक बड़ी अड़चन थी। परन्तु उस पर संदेह करता था, क्योंकि वह चेहलगान (चालीस) का एक सदस्य था उसके सिंहासन पर बैठने के बाद से दिल्ली नहीं आया था। करीब इसी समय उसकी मृत्यु हो गयी। शेर खाँ ने अद्भुत योग्यता के साथ सीमा की रक्षा की थी तथा बहुत सी विद्रोही जातियों को वश में किया था। उसकी मृत्यु के बाद फिर मंगोल सीमान्त प्रदेशों को लूटने के लिए प्रोत्साहित हुए। उनकी लूटपाट को रोकने के लिए सुल्तान ने अपने ज्येष्ठ पुत्र शाहजादा मुहम्मद को (जो खाने-शहीद के नाम से विख्यात था) मुलतान का शासक नियुक्त किया। शाहजादा मुहम्मद संयत स्वभाव का साहसी, योग्य तथा साहित्य का उदार पोषक था। साथ-साथ सुल्तान ने अपने द्वितीय पुत्र बोगरा खाँ को, मंगोलों के सम्भावित आक्रमणों को रोकने के लिए अपनी सेना को प्रबल बनाने का आदेश देकर, समाना एवं सुनाम के प्रदेशों का अधिकारी बना दिया। सन् 1279 ई. के लगभग लुटेरों ने पुनः आक्रमण किया और सतलज भी पार कर गये। परन्तु मुलतान के शाहजादा मुहम्मद, समाना के बोगरा खाँ तथा दिल्ली के मलिक मुबारक बेक्तर्स की मिली-जुली सेना ने उन्हें पूर्णतया छिन्न-भिन्न कर दिया। इस तरह कुछ काल के लिए मंगोलों का भय टल गया। सैन्य शक्ति को मजबूत करने के लिए उसने दीवान-ए-आरिज (सैन्य विभाग) की स्थापना की। आरिज-ए-मुमालिक के पद पर उसने इमादुलमुल्क को नियुक्त किया था।

उसी वर्ष बलबन के समक्ष बंगाल के सम्पन्न प्रान्त से एक दूसरा भय उत्पन्न हो गया, जिसकी दूरी के कारण यहाँ के शासक प्राय: दिल्ली की सत्ता का, विशेषकर जब वह कमजोर हो जाती थी, अनादर करने की प्रलोभित हो जाते थे। यह था बंगाल में सुल्तान के प्रतिनिधि तुगरिल खाँ का विद्रोह। तुगरिल एक कार्यशील, साहसी एवं उदार तुर्क था तथा बंगाल में वह सफल शासक सिद्ध हुआ था। परन्तु महत्त्वाकांक्षा ने शीघ्र ही उसके मस्तिष्क पर अधिकार कर लिया। दिल्ली के सुल्तान की वृद्धावस्था, उत्तर-पश्चिम सीमा पर मंगोलों के पुनः आक्रमण एवं कुछ परामर्शदाताओं की मंत्रणा से उसे विद्रोह का झंडा खडा करने में प्रोत्साहन मिला।

तुगरिल खाँ के विद्रोह से बलबन बहुत व्यग्र हो गया। उसने तुरंत अल्प-तिगीन मुएदराज (लम्बे बालों वाला) के अधीन, जिसे अमीर खाँ की उपाधि मिली थी, एक बड़ी सेना भेजी। परन्तु विद्रोही शासक ने अमीर खाँ को हरा दिया तथा उसके बहुत-से सैनिकों को बहुमूल्य भेंट देकर अपनी ओर मिला लिया। सुल्तान अमीर खाँ की हार से इतना अधिक क्रुद्ध हुआ कि उसने दिल्ली के द्वार पर उसे फाँसी पर लटकाने की आज्ञा दे दी। अगले वर्ष (1280 ई. में) मलिक तर्गी के अधीन एक दूसरी सेना बंगाल भेजी गयी, परन्तु इस आक्रमण को भी तुगरिल ने निष्फल कर दिया। घटनाओं के इस क्रम से अत्याधिक कुद्ध हो बलबन ने अब अपना सारा ध्यान और शक्ति तुगरिल को परास्त करने में लगा दी। उसने स्वयं एक बलवती सेना तथा अपने पुत्र बोगरा खाँ को लेकर पश्चिमी बंगाल की राजधानी लखनौती की ओर बढ़ने का निर्णय किया। इसी बीच तुगरिल क्रुद्ध सुल्तान के आने का समाचार सुन लखनौती छोड़कर जाजनगर के जंगलों में जा छिपा। सुल्तान भागे हुए विद्रोही एवं उसके सहचरों की खोज में पूर्वी बंगाल की ओर बढ़ा। संयोगवश शेर अन्दाज नामक बलबन के एक अनुगामी ने उन्हें ढूंढ़ निकाला। मलिक मुकद्विर नामक उसका एक दूसरे अनुगामी ने तुरंत तुगरिल को एक तीर से घायल कर लाया। उसका सिर काटकर उसका शरीर नदी में फेंक दिया गया। उसके सम्बन्धी तथा उसके अधिकतर सिपाही पकड़ लिये गये। लखनौती लौट कर सुल्तान ने तुगरिल के सम्बन्धियों एवं अनुचरों को दृष्टान्त-योग्य सजाएँ दीं। बंगाल से प्रस्थान करने के पहले उसने अपने द्वितीय पुत्र बोगरा खाँ को उस प्रान्त का शासक नियुक्त किया तथा उसे यह शिक्षा दी कि वह विषय-सुख में लिप्त न रहकर शासन के कार्य में सावधानी बरते।

शीघ्र ही फिर सुल्तान पर एक महान् संकट आ पड़ा। मंगोलों ने 1285 ई. में अपने नेता तमर के अधीन पंजाब पर आक्रमण कर दिया। सुल्तान का ज्येष्ठ पुत्र शाहजादा मुहम्मद, जो मुलतान का अधिकारी था, लाहौर एवं दीपालपुर की ओर बढ़ा। एक आकस्मिक हमले में मंगोलों से लड़ता हुआ वह मार्च, 1285 ई. को वीरगति को प्राप्त हुआ। जीवन के इस बलिदान के कारण उसे मृत्यु के बाद शहीद (शहीद-ए-आजम) की उपाधि मिली। इस योग्य शाहजादे की मृत्यु से वृद्ध सुल्तान को, जो उस समय अस्सी वर्षों का हो चुका था, कठोर आघात पहुँचा। इस घटना ने उसे घोर विषाद में मग्न कर दिया तथा उसकी मृत्यु को अधिक निकट ला दिया। सुल्तान पहले बोगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत करना चाहता था, किन्तु बोगरा खाँ ने राजत्व के उत्तरदायित्व को स्वीकार करने में अनिच्छा प्रकट की। अत: सुल्तान ने अपने पौत्र कैखुसरू को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया। लगभग 22 वर्षों तक शासन करने के उपरान्त सन् 1287 ई. के अन्त में बलबन ने अंतिम साँस ली।

बलबन के गद्दी पर बैठने के समय दिल्ली सल्तनत खतरे एवं कठिनाइयों से ग्रस्त थी। अत: सुल्तान ने राज्य के शत्रु समझने वालों के साथ कठोरता एवं सख्ती की नीति अपनायी। उसके पक्ष में यह अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि उसने महत्वाकांक्षी सरदारों, विद्रोही प्रजा एवं बलवाई जातियों के प्रति अपनी दृढ़ता और मंगोलों के विरुद्ध अपनी सर्वाधिक सतर्कता से सल्तनत को उपस्थित विघटन से बचाया तथा इसे पर्याप्त बल एवं कार्यक्षमता प्रदान की। परन्तु दो बातों में अर्थात् शेर खाँ एवं अमीर खाँ का नाश करने में चतुराई तथा दूरदर्शिता पर सन्देह एवं क्रोध की विजय हुई। अमीर खाँ की मृत्यु की चर्चा करते हुए बरनी कहता है कि उसके उचित दंड से तत्कालीन बुद्धिमान लोगों में विरोध की एक दृढ़ भावना फैल गयी और वे इस बात का संकेत समझने लगे कि बलबन के शासन का अवसान निकट है।

बलबन ने दिल्ली सल्तनत की प्रतिष्ठा एवं गौरव बढ़ाने का भरसक प्रयत्न किया। सिंहासन पर बैठने के पश्चात् उसने रहन-सहन का शानदार तरीका अपनाया। उसने प्राचीन पारसी राजाओं के ढंग पर अपने दरबार को ढाला तथा पारसी शिष्टाचार एवं संस्कार को प्रचलित किया। उसने अपने को अफरासियाब का वंशज घोषित किया तथा ईरानी दरबार की परंपरा सिजदा एवं पायवोस (कदम-चुम्बन) की पद्धति लागू की। ईरानी पद्धति पर नौरोज का त्यौहार शुरू किया। उसके अधीन दिल्ली दरबार ने अपनी महान् महिमा के लिए ख्याति प्राप्त की तथा उसने (दिल्ली दरबार ने) मध्य एशिया के बहुत-से (पन्द्रह से कम नहीं) निर्वासित युवराजों को शरण दी। विख्यात कवि अमीर खुसरू, जिसका उपनाम था तूतिए-हिन्द (भारत का तोता) बलबन का समकालीन था। सुल्तान को राजकीय प्रतिष्ठा का ख्याल रहता था। अपने आत्मीय दासों के समक्ष भी वह सदा पूर्ण परिधान में उपस्थित होता था। निम्न जाति मूठ के लोगों को वह महत्त्वपूर्ण पद नहीं देता था। बरनी ने उससे कहलवाया है कि अगर तुच्छ कुल से उत्पन्न व्यक्ति को देखता हूँ तो मेरी आँखे जलने लगती है और हाथ तलवार के मूठ पर चला जाता है। माना जाता है कि उसने कमाल अमाया नामक व्यक्ति को पद पर इसलिए नियुक्त नहीं किया क्योंकि वह नीच कुल का था।

बलबन ने राजत्व का नया सिद्धान्त प्रतिपादित किया। वह प्रथम सुल्तान था जिसने राजत्व की सुस्पष्ट व्याख्या की। उसने राजत्व को निभायते-ए-खुदाई (ईश्वर द्वारा प्रदत) कहा। उसने जिल्ले-ए-इलाही इल्लाह (ईश्वर का प्रतिनिधि) की उपाधि धारण की। बलबन के विचार में राजा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है, किन्तु उसका विश्वास था कि अपने पद का गौरव बनाये रखने के लिए उसे कुछ कर्त्तव्यों का सच्चाई से निर्वाह करना चाहिए। उसके अनुसार ये कर्त्तव्य थे- धर्म की रक्षा करना, शरीअत के नियमों का पालन करना, दुराचार एवं पापकर्मों को रोकना, धर्मनिष्ठ मनुष्यों को पदों पर नियुक्त करना तथा समान भाव से न्याय करना। एक बार उसने कहा था कि- जो कुछ मैं कर सकता हूँ वह है, क्रूर मनुष्यों की क्रूरता नष्ट करना तथा यह देखना कि कानून के समक्ष सब व्यक्ति बराबर हैं। राज्य का गौरव उस नियम पर आधारित है, जिससे इसकी प्रजा प्रसन्न एवं उन्नतिशील बन सके। बलबन को न्याय का बहुत ख्याल था। इसका प्रबन्ध वह बिना किसी पक्षपात के किया करता था। राज्य के कार्यों की पूर्ण सूचना रखने के लिए उसने सल्तनत की जागीरों में गुप्तचर नियुक्त कर रखे थे।

सुल्तान के रूप में बलबन का जीवन आन्तरिक आपत्तियों एवं बाहरी संकट के विरुद्ध संघर्ष से पूर्ण था। अत: उसे अपने राज्य की सीमा के विस्तार के निमित्त अग्रसर होकर विजय प्राप्त करने का सिलसिला चलाने का मौका न मिला। यद्यपि उसके दरबारी इनके लिए उसे प्रेरित किया करते थे, किन्तु वह शान्ति, दृढ़ीकरण एवं रक्षा के कार्यों से ही सन्तुष्ट रहा। उसने शासन-सम्बन्धी कोई ऐसा पुर्नसंगठन शुरू नहीं किया, जिसका सम्बन्ध जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से हो। वास्तव में उसने एक ऐसी तानाशाही स्थापित की, जिसकी स्थिरता शासक के वैयक्तिक बल पर निर्भर थी। इस प्रकार बलबन, रक्त और लौह नीति (ब्लड और आइरन पालिसी) का अनुगामी था।

इस कथन की सत्यता का प्रमाण उसके कमजोर उत्तराधिकारी बोगरा खाँ के पुत्र मुइजुद्दीन कैकुबाद के शासन-काल में मिला। 17 या 18 वर्षों के इस युवक को राज्य के प्रमुख अधिकारियों ने स्वर्गीय सुल्तान के मनोनयन की उपेक्षा कर सिंहासन पर बैठाया। बचपन में कैकुबाद का पालन पोषण अपने दादा के कठोर अनुशासन में हुआ था। उसके अध्यापक इतनी सावधानी से उसकी देखभाल किया करते थे कि उसने कभी किसी रूपवती युवती पर दृष्टि नहीं डाली और न कभी मदिरा का एक प्याला ही चखा। लेकिन सिंहासन पर अचानक बैठने के बाद उसका विवेक एवं संयम लुप्त हो गये। उसने शीघ्र अपने को विषय-सुख के भंवर में डुबो दिया तथा अपने पद के कर्त्तव्यों का कोई विचार नहीं किया। दिल्ली के वृद्ध कोतवाल फखरूद्दीन के दामाद महत्त्वाकांक्षी निज़ामुद्दीन ने सारी शक्ति अपने हाथों में केन्द्रित कर ली। उसके प्रभाव में आकर राज्य के पुराने अधिकारियों का अपमान किया गया। सारे राज्य में अव्यवस्था एवं गड़बड़ी फैल गयी तथा राज्य में प्रभुता स्थापित करने के लिए तुर्की दल एवं खलजी दल के सरदारो की प्रतियोगिताओं से गड़बड़ी और भी बढ़ गयी। मलिक जलालुद्दीन फिरोज के नेतृत्व में खलजी विजयी हुए। उन्होंने तुर्की दल के नेता एतमार कंचन एवं एतमार सुर्खा को मार डाला। कैकुबाद अब असहाय था तथा उसका शरीर नष्ट हो चुका था। किलोखरी के उसके शीश-महल में एक खल्ज सरदार ने, जिसका पिता उसकी आज्ञा से फाँसी पर चढ़ाया गया था, उसकी हत्या कर दी। कैकुबाद का शरीर यमुना में फेंक दिया गया। फ़िरोज ने मार डाले गये सुल्तान के एक नन्हें बेटे कयोमर्स का काम तमाम कर दिया तथा वह जलालुद्दीन फिरोज शाह की उपाधि धारण कर 13 जून, 1290 ई. को किलोखरी के महल में सिंहासन पर बैठा। इस तरह बलबन द्वारा किये गये कार्य नष्ट हुए तथा उसका वंश अकीर्तिकर तरीके से समाप्त हो गया। इसके साथ ही दास राजवंश का भी अन्त हो गया।

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