तुगलक-वंश

ग्यासुद्दीन तुगलक: 1320-1325 ई.

ग्यासुद्दीन तुगलक (1320-1325 ई.)

गाजी मलिक का वंश स्वदेशीय समझा जा सकता है। उसका पिता बलबन के समय में हिन्दुस्तान आया था तथा उसने पंजाब की एक जाट कन्या से शादी की थी। गाजी मलिक अपनी योग्यता के कारण निम्न स्थिति धीरे साम्राज्य के सर्वोच्च पद तक पहुँच गया। हम पहले लिख चुके प्रकार योग्यता पूर्वक उसने मंगोल आक्रमणों से दिल्ली साम्राज्य की सीमाओं रक्षा की थी। अंत में दैव ने वृद्धावस्था में उसे राज सिंहासन पर दिया मुल्तान के एक मस्जिद में एक अभिलेख पाया गया है जिसमें गाजी यह दावा किया है कि मैंने 29 लड़ाईयों में तत्तारों को पराजित किया है, मेरा नाम मलिक-उल-गाजी है। गाजी के बारे में अमीर खुसरो कहता है कि वह अपने राजमुकुट के नीचे सैकड़ों पंडितों का शिरस्तान (पगड़ी) छिपाये हुए था अर्थात् वह बहुत ही बुद्धिमान था।

सरदारों द्वारा दिल्ली के शासक के रूप में गाजी मलिक का चुनाव पूर्णतः न्यायोचित सिद्ध हुआ। उसके सिंहासन पर बैठने के समय परिस्थिति गम्भीर थी। सीमावर्ती प्रान्तों में दिल्ली सल्तनत का प्रभाव समाप्त हो चुका था। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद जो गड़बड़ी का युग आया, उसमें उसकी शासन-पद्धति भी विच्छिन्न हो गयी थी। परन्तु उसने अपने को परिस्थिति के उपर्युक्त सिद्ध कर दिखाया। अपने पूर्वगामियों से भिन्न, मुख्यतया विपरीत परिस्थितियों में अपने प्रारम्भिक प्रशिक्षण के कारण उसमें चरित्रबल था। वह पुण्यात्मा था तथा ईश्वर से डरता था। वह दयालु एवं उदार प्रकृति का था। उसने अपने दरबार को, शायद बलबन के समय को छोड, पहले से अधिक गंभीर बना दिया। वह संयम एवं चतुराई से काम करता था।

राज्याभिषेक के शीघ्र बाद ग्यासुद्दीन तुगलक अपने पूर्वगामी शासन के दोषों को दूर कर शासन-पद्धति को पुन: सुव्यवस्थित करने के काम में लग गया। मुबारक एवं खुसरो के अपव्यय के कारण राज्य की आर्थिक दशा शोचनीय हो। गयी थी। अत: ग्यासुद्दीन ने सभी विशेषाधिकारों एवं जागीरों की दृढ़ जाँच की जाने की आज्ञा दी। अवैध जागीरें राज्य की ओर से जब्त कर ली गयीं। इस कार्य से उसकी जो थोड़ी बदनामी हुई, वह उसकी विवेकपूर्ण उदारता एवं अपनी प्रजा की भलाई के परोपकारी कायों से शीघ्र मिट गयी। उसने प्रान्तों में कर्मनिष्ठ शासक नियुक्त किये। उसने राज्य के कर को घटा कर समूची उपज का दसवाँ या ग्यारहवाँ भाग निश्चित कर दिया और सरकारी लूट तथा उत्पीड़न के विरुद्ध भी व्यवस्था की। इस प्रकार उसने राजस्व का बोझा काफी हल्का कर दिया। खेती को, जो इस देश के लोगों का प्रमुख धंधा है, विशेष प्रोत्साहन मिला।

खिल्जी के समय के भूमि माप की व्यवस्था मसाहत की पद्धति को त्याग दिया। उसने खुर-मुकद्दम और चौधरी को कुछ रियायतें दिन लेकिन हुकूक-ए-खुती को वापस नहीं किया। खेतों को सींचने के लिए नहरें खोदी गयीं। सुल्तान था जिसने नहरें बनवाई। बगीचे लगाये गये। कृषकों को लुटेरों के विरुद्ध शरण देने के लिए दुर्ग बनाये गये। परन्तु सुल्तान के कुछ नियमों में भलाई की वह प्रवृत्ति नहीं थी।

न्याय एवं पुलिस जैसे शासन की दूसरी शाखाओं में सुधार किये गये, जिससे देश में व्यवस्था एवं सुरक्षा फैल गयी। सुल्तान ने दरिद्रों की सहायता के लिए एक व्यवस्था निकाली तथा धार्मिक संस्थाओं एवं साहित्यकों की सहायता की। उसके राजकवि अमीर खुसरो को राज्य से एक हजार टका प्रतिमास की पेंशन मिलती थी। पत्र-व्यवहार की सुविधा के लिए देश की डाक-व्यवस्था का पुनः संगठन किया गया। सैनिक विभाग को कार्यक्षम एवं सुव्यवस्थित बनाया गया।

विभिन्न प्रान्तों पर सल्तनत का प्रभुत्व स्थापित करने के विषय में ग्यासुद्दीन असावधान नहीं था। उसने सैनिक प्रभुत्व एवं साम्राज्यवाद की खल्जी नीति का अनुसरण किया, जिसके विरुद्ध प्रतिक्रिया उसके उत्तराधिकारी मुहम्मद बिन तुगलक की असफलता के साथ आरम्भ हो गयी। इसका दृष्टांत विशेषरूप से हम उनके कामों में पाते हैं, जो उसने दक्कन तथा बंगाल में किए।

दक्कन में वारंगल के काकतीय राजा प्रतापरुद्रदेव द्वितीय ने, जिसने अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद की अव्यवस्था के समय में अपनी शक्ति बढ़ा ली थी, दिल्ली सरकार को निश्चित कर देना बन्द कर दिया। अत: ग्यासुद्दीन ने अपने शासनकाल के द्वितीय वर्ष में अपने ज्येष्ठ पुत्र तथा भावी उत्तराधिकारी फख़रुद्दीन जौना खाँ के अधीन वारंगल के विरुद्ध एक सेना भेजी। आक्रमणकारियों ने वारंगल के मिट्टी के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। हिन्दुओं ने इसकी रक्षा दृढ़ निश्चय एवं वीरता के साथ की। षड्यंत्रों तथा सेना में महामारी फैल जाने के कारण शाहजादा जौना को बिना कुछ किये ही दिल्ली लौट आना पड़ा। परन्तु जौना के दिल्ली लौटने के चार महीने बाद ही सुल्तान ने पुन: उसी शहजादे के अधीन एक दूसरी सेना वारंगल के विरुद्ध भेजी। यह दूसरा प्रयत्न सफल रहा। भीषण युद्ध के पश्चात् काकतीय राजा ने परिवार एवं सरदारों के सहित शत्रु के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया। शहज़ादा जौना ने उसे दिल्ली भेजकर काकतीयों के सम्पूर्ण देश को अधीन कर लिया तथा वारंगल का नाम बदलकर सुल्तानपुर कर दिया। यद्यपि दिल्ली के सुल्तान ने काकतीय राज्य को विधिवत् अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया, परन्तु शीघ्र ही इसकी प्राचीन शक्ति एवं गौरव का अन्त हो गया।

1322 ई. में बंगाल में शम्सुद्दीन फ़िरोज शाह की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों के बीच गृहयुद्ध के कारण ग्यासुद्दीन तुगलक ने उस प्रान्त के मामले में हस्तक्षेप किया। शम्सुद्दीन फ़िरोजू शाह के पाँच पुत्रों में ग्यासुद्दीन बहादुर, जो सोनारगाँव को अपनी राजधानी बनाकर पूर्वी बंगाल में 1310 ई. से स्वतंत्र रूप से शासन कर रहा था, शहाबुद्दीन बोगार शाह, जो बंगाल के राजसिंहासन पर अपने पिता के बाद बैठा और जिसकी राजधानी लखनौती थी तथा नासिरुद्दीन बंगाल में अपनी-अपनी प्रभुता स्थापित करने के लिए संघर्ष करने लगे। ग्यासुद्दीन बहादुर ने शहाबुद्दीन बोगरा शाह को पराजित कर बंगाल के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया। इस पर नसिरुद्दीन की भी लोलुप दृष्टि लगी थी। अत: नसिरुद्दीन ने सहायता के लिए दिल्ली के सुल्तान से अपील की, कि बंगाल के इस सुदूरवर्ती प्रान्त को, जिसकी दिल्ली के सुल्तान के प्रति भक्ति सदैव डाँवाँडोल रहती थी, पूर्णरूप से अपने अधिकार में लाने के इस अवसर का सुल्तान ने लाभ उठाया। 1324 ई. में वह लखनौती की ओर बढ़ा, ग्यासुद्दीन बहादुर को पकड़कर उसे बंदी के रूप में दिल्ली भेजा और नसिरुद्दीन को अधीन शासक के रूप में पश्चिमी बंगाल के राजसिंहासन पर बैठा दिया। पूर्वी बंगाल को भी दिल्ली सल्तनत का एक प्रान्त बना दिया गया। दिल्ली लौटते समय ग्यासुद्दीन ने तिरहुत के राजा हरसिंह देव पर आक्रमण कर दिया। पराजित राजा अब से दिल्ली सल्तनत का जागीरदार बन गया। बंगाल के अभियान से लौटने पर जौना खाँ ने उसके लिए एक लकड़ी का महल तैयार किया। उस महल के गिर जाने से ग्यासुद्दीन तुगलक की मृत्यु हो गई।

मुहम्मद बिन तुगलक: 1325-1351 ई.

फरवरी-मार्च 1325 ई. में अपने पिता की मृत्यु के तीन दिन के पश्चात् शहजदा जौना ने अपने को मुहम्मद बिन तुगलक की उपाधि से दिल्ली का सुल्तान घोषित किया। चालीस दिनों के बाद वह दिल्ली की ओर बढ़ा तथा सुल्तानों के प्राचीन राजमहल में बिना किसी विरोध के काफी तड़क-भड़क के बीच राजसिंहासन पर बैठा। अलाउद्दीन की तरह उसने लोगों में सोने-चाँदी सिक्कों का तथा सरदारों में उपाधियों का खूब वितरण किया।

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के इतिहास का अध्ययन करने के लिए हम लोगों के पास एक समकालीन पदाधिकारी जियाउद्दीन बरनी, जिसने सुल्तान के उत्तराधिकारी फिरोज शाह के समय में अपना ग्रन्थ लिखा था, के प्रशंसनीय इतिहास के अतिरिक्त, उसके निकट समकालीनों के अनेक अन्य फारसी ग्रन्थ हैं, जैसे शम्से सिराज का तवारीख-ए-फीरोजशाही, ऐनुल्मुल्क मुल्तानी का मुनशाते माहरू, अमीर खुसरो का तुगलकनामा तथा यहिया बिन अहमद सरहिन्दी का तवारीखे-ए-मतुबारक शाही, जो तुलनात्मक दृष्टि से बाद का ग्रन्थ है और जिसमें काफी परिपूरक वृत्तान्त हैं। इस काल के इतिहास के लिए अफ्रीकी यात्री इब्नबतूता का ग्रन्थ भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। वह सितम्बर, 1333 ई. में भारत आया। दिल्ली के सुल्तान ने उसका खूब स्वागत-सत्कार किया और उसे दिल्ली का प्रमुख काजी नियुक्त किया। इस पद पर वह जुलाई, 1342 ई. में सुल्तान का राजदूत बनाकर चीन भेजे जाने तक रहा। उसके वृत्तान्त पर सामान्यत निष्पक्षता की छाप है तथा इसमें विस्तृत विवरण दिये गये हैं। मुहम्मद बिन तुगलक के सिक्कों से भी उपयोगी सूचना मिलती है।

वास्तव में मुहम्मद बिन तुगलक का व्यक्तित्व असाधारण है तथा इतिहास में उसका स्थान-निर्धारण करना कठिन कार्य है। वह अपूर्व प्रतिभाशाली था अथवा पागल था: आदर्शवादी था या स्वप्नदशीं था। रक्त का प्यासा प्रजापीड़क था अथवा परोपकारी राजा था। पाखंडी और धर्म में अविश्वासी था अथवा धर्मात्मा मुसलमान था? इसमें सन्देह नहीं कि वह अपने समय के प्रकांड पंडितों एवं निपुण विद्वानों में से एक था। जिसके लिए बरनी तथा अन्य लोगों ने उसकी उचित प्रशंसा की है। वह तीक्ष्णबुद्धि, आश्चर्य-जनक स्मरणशक्ति एवं ज्ञानार्जन की असाधारण योग्यता से सम्पन्न था। वह तर्क-शास्त्र, दर्शन, गणित, ज्योतिष-विद्या एवं पदार्थ विज्ञान आदि विद्या की विभिन्न शाखाओं में निष्णात था। रचना एवं शैली पर उसका पूर्ण अधिकार था। सुन्दर लिखावट लिखने में उसका कोई सानी न था। उसे फारसी काव्य का विशाल ज्ञान था तथा वह अपने पत्रों में फारसी पद्यों का उद्धरण किया करता था। औषध शास्त्र से वह अनभिज्ञ न था। तर्क विद्या में भी वह पूर्ण प्रवीण था। जिस विषय में वह पूर्ण दक्ष था, उसमें उससे कोई विवाद आरम्भ करने के पहले विद्वान् दो बार अवश्य सोच लिया करते थे। वह एक अनुभवी सेनापति था। उसने अनेक बार विजय हासिल की थीं तथा बहुत कम आक्रमणों में वह हारा था।

परन्तु सुल्तान में व्यवहारिक निर्णय शक्ति एवं सामान्य बुद्धि का अभाव था। अपने सैद्धान्तिक ज्ञान के आवेश में आकर वह ऊंचे सिद्धान्तों एवं काल्पनिक योजनाओं में डूबा रहता था। यद्यपि उसकी योजनाएँ सिद्धान्त रूप से ठोस रहती थीं तथा कभी-कभी उनमें राजनैतिक सूझ की चमक भी होती थी, पर वास्तविक कार्य में वे अव्यवहारिक सिद्ध हुई तथा अन्त में उसके राज्य पर संकटों का पहाड़ टूट पड़ा। यह उसके चरित्र में कुछ गम्भीर दोषों के कारण हुआ।

अपने शासन-काल के आरम्भ से ही मुहम्मद बिन तुगलक, स्पेन के फिलिप द्वितीय के समान, शासन के ब्योरेवार विवरणों को देखने में तत्परता से संलग्न हो गया। सर्वप्रथम उसने उस समय रखे जाने वाले रजिस्टर (बही) के नमूने पर भूमिकर के लिए एक रजिस्टर संकलित करने की आज्ञा दी और तब से राजस्व-विभाग में निर्विघ्न रूप से कार्य होने लगा। पर शीघ्र ही उसने गंगा एवं यमुना के बीच की समृद्ध एवं उर्वर भूमि दोआब में एक अविचारपूर्ण आर्थिक प्रयोग किया। इस कार्य को देखने के लिए उसने दीवान-ए-कोही की स्थापना की। उसने कर की दर को बढ़ा दिया तथा कुछ अतिरिक्त करों (अबवाबों) को पुनर्जीवित किया और चलाया। समकालीन एवं उत्तरकालीन मुस्लिम लेखकों के वर्णनों में भेद एवं संदिग्धता रहने के कारण इस अतिरिक्त कर-निर्धारण के वास्तविक मूल्य को ठीक-ठीक निश्चित करना सम्भव नहीं है। कुछ आधुनिक लेखक यह सुझाव पेश करते हैं कि यह कर-वृद्धि मूलरूप में अत्याधिक नहीं थी तथा अधिकतम 50 प्रतिशत से आगे नहीं गयी थी, जो सीमा अलाउद्दीन के समय में पहुँच चुकी थी। उनकी यह भी धारणा है कि दोआब के लोगों पर विशेष कर लगाने में सुल्तान का ध्येय (दोआब के विद्रोही निवासियों के विरुद्ध) दंड-प्रद कार्य तथा कोष को पुन: भरने का साधन नहीं था, जैसा कि बदायूनी तथा आधुनिक काल में सर वुल्सेले हेग ने अनुमान किया है, परन्तु वह ध्येय था सैनिक साधनों को बढ़ाना तथा शासन को एक कार्यक्षम आधार पर संगठित करना। जो कुछ भी हुआ हो इसमें संदेह नहीं कि इस कार्य से दोआब के लोगों को बहुत कष्ट हुआ, जो खल्जियों के समय से ही अत्यधिक कर के बोझ का अनुभव कर रहे थे, विशेषरूप में  इसलिए की यह बिलकुल असमय में लगाया गया, जबकि देश में एक भयानक दुर्भिक्ष था। दुर्भिक्ष का भी ख्याल कर राज्य ने अपनी माँगों को कम नहीं किया, पर इसके विपरीत उसके अधिकारी कठोरता से कर वसूल करते रहे। परिश्रम करने वाले किसान वर्ग की कठिनाइयों को कम करने का भी राज्य ने कोई उपाय नहीं किया। खेतिहरों को ऋण देना, कुएँ खुदवाना तथा सीधे राज्य प्रबन्ध और आर्थिक समर्थन द्वारा बिना जोती हुई भूमि पर खेती करवाना जैसे सुल्तान की सहायता के कार्य भी देर से हुए। खेती भयानक रूप से बर्बाद हुई तथा दोआब के दरिद्र किसान अपने खेत छोड़कर अन्य स्थानों में जा बसे। अत्याधिक क्रुद्ध होकर सुल्तान ने अनिच्छुक रैयतों को अपने कार्य पर वापस लाने के लिए कठोर प्रतिशोध का सहारा लिया जिसका परिणाम तुगलक-वंश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण हुआ।

1327 ई. में मुहम्मद बिन तुगूलक का दिल्ली से देवगिरि, जिसका नाम उसने दौलताबाद रखा, राजधानी बदलने का निर्णय एक दूसरा अनुचित कदम था, जिससे अन्त में लोगों को असीम कष्ट हुआ। सुल्तान की यह योजना, के लोगों से प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से, एक पागलपनपूर्ण प्रयोग नहीं , जैसा कुछ आधुनिक लेखकों ने अनुमान किया है, बल्कि यह विचार में ठोस था। नयी राजधानी केन्द्र में स्थित थी और युद्ध कला की दृष्टि इसकी स्थिति अच्छी थी। उस समय राज्य के अंतर्गत उत्तर में दोआब, पंजाब के मैदान लाहौर और सिंधु से लेकर गुजरात के समुद्रतट तक फैले प्रदेश, पूर्व में बंगाल का सम्पूर्ण प्रान्त, मध्य भाग में मालवा, महोबा, उज्जैन एवं धार के राज्य तथा (दक्षिण में) दक्कन, जो हाल ही में इसमें सम्मिलित किया गया था, ऐसे राज्य को सुल्तान के अनवरत ध्यान की आवश्यकता थी। बरनी लिखता है- यह स्थान मध्य में स्थित था। दिल्ली, गुजरात, लखनौती, सातगाँव, सोनारगाँव तेलेम, माबर, द्वारसमुद्र एवं काम्पिल यहाँ से लगभग समान दूरी पर थे और इन दूरियों में बहुत कम अन्तर था। साथ-साथ, नयी राजधानी मंगोल आक्रमणों से सुरक्षित थी जिनका सर्वदा भय बना रहता था। यहाँ सुन्दर भवनों का निर्माण कर सुल्तान ने भै नयी राजधानी को अधिकारियों एवं लोगों के रहने योग्य बनाने का भरसक प्रयत्न किया। इन सुन्दर भवनों के वैभव का वर्णन इब्नबतूता, शाहजहाँ के शासनकाल के दरबारी इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी तथा सत्रहवीं सदी के यूरोपीय यात्रियों ने किया है। जो बाहर से यहाँ आकर बसना चाहते थे उनके लिए सभी सुविधाओं का प्रबन्ध किया गया। उनकी सुविधा के लिए एक लंबी-चौड़ी सड़क बनवायी गयी, इसके दोनों ओर छायादार वृक्ष लगाये गये तथा दिल्ली और दोलताबाद के बीच नियमित रूप से डाक का प्रबंध किया गया। बरनी तक लिखता है कि सुल्तान (दिल्ली से) बाहर जाने वालों के प्रति, उनकी यात्रा में तथा उनके (दौलताबाद) पहुँचने पर, दानशीलता और अनुग्रह दिखलाने में उदार था। इन सब में सुल्तान ने विवेक से काम लिया।

परंतु जब दिल्ली के लोगों ने भावनावश अपने घर छोड़ने में आगा-पीछा किया, जो (घर) भूतकाल की यादगारों से जुड़े थे, तब सुल्तान की सुबुद्धि पर उसके कठोर स्वभाव ने विजय पायी तथा उसने दिल्ली के सभी लोगों को अपने सामान लेकर एक साथ दौलताबाद जाने की आज्ञा दे डाली। हम लोगों को इब्नबतूता के इस असमर्थनीय कथन में विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है। कि एक अंधे को घसीटकर दिल्ली से दौलताबाद ले जाया गया और यह कि एक शय्यागत लँगड़े को पत्थर फेंकने के एक यंत्र द्वारा वहाँ फेंका गया और न हमें बरनी के ही इस अतिशयोक्तिपूर्ण कथन को अक्षरश: स्वीकार करना चाहिए कि- नगर (दिल्ली) के भवनों, प्रासादों अथवा इसके बाहरी भागों में एक भी बिल्ली या कुत्ता नहीं छोड़ा गया। इस प्रकार के कथन भारत के मध्य कालीन लेखकों में सामान्य रूप से पाये जाते थे। नगर का पूर्ण विनाश अथवा परित्याग तो सोचा भी नहीं जा सकता। पर सात सौ मील की लम्बी यात्रा में दिल्ली के लोगों को निस्सन्देह अत्यन्त कष्ट हुआ। थकावट से चूर होकर उनमें से बहुत तो रास्ते में ही मर गये तथा बहुत, जो दौलताबाद पहुँच भी गये, अपरिचित भूमि में निर्वासितों की तरह, अत्यन्त नैराश्य एवं कष्ट में परलोक सिधारे। ये ही सुल्तान की गलत योजना के भयानक परिणाम हुए। श्री स्टैनले लेनपूल का उचित ही कथन है कि- दौलताबाद गुमराह शक्ति का स्मारक चिह्न था।

सुल्तान, अन्त में अपनी नीति को मूर्खतापूर्ण एवं अन्याय स्वीकार कर, कचहरी को पुन: दिल्ली ले गया और लोगों को वापस आने की आज्ञा दी। पर बहुत कम लौटने के लिए जीवित रहे। दिल्ली ने अपनी पुरानी समृद्धि एवं ऐश्वर्य खो दिया, जो बहुत काल तक पुनः प्राप्त नहीं किया जा सका। हाँ, सुल्तान नगर (दिल्ली) में अपने राज्य के कुछ शहरों से विद्वानों, सज्जनों, व्यापारियों तथा भूमिपतियों को लाया तथा उन्हें वहाँ बसाया। इब्नबतूता ने 1334 ई. में दिल्ली को कहीं-कहीं निर्जन एवं विनाश के चिह्न सहित पाया।

मुहम्मद बिन तुगलक ने मुद्रा-सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण प्रयोग किये। एडवर्ड टॉमस ने उसका वर्णन धनवानों के युवराज के रूप में किया है तथा वह लिखता है कि- उसके शासनकाल के सबसे प्रारम्भिक कार्यों में एक था सिक्के को फिर से तैयार करना, बहुमूल्य धातुओं के बदले हुए मूल्य के अनुकूल इसके (सिक्के के) दुमू विभागों को पुनः क्रमानुसार रखना तथा छोटे सिक्कों के नये और अधिक शुद्ध प्रतिरूप निकालना। उसने सोने का एक नया सिक्का चलाया, जिसे इब्नबतूता दीनार कहता था तथा जिसका तौल 200 ग्रेन था। पहले के 175 ग्रेन के तौल के सोने और चाँदी के सिक्कों के बदले उसने अदली (एक सिकके का नाम) को फिर से चलाया, जिसका वजन 140 ग्रेन चाँदी के बराबर था। शायद इस परिवर्तन का कारण यह था कि दक्कन के आक्रमणों के फलस्वरूप राजकीय कोष के अधिक मात्रा में सोने से परिपूर्ण हो जाने से सोने-चाँदी के सम्बन्धित मूल्य में कमी हो गयी थी।

परन्तु उसके प्रयोगों में सबसे अधिक साहसपूर्ण था 1329 ई. और 1330 ई. के बीच ताम्बे के सिक्कों के रूप में सांकेतिक (टोकन करेंसी) का प्रचलन करना, जिसके लिए उसके समक्ष चीन एवं फारस के दृष्टान्त थे। तेरहवीं सदी के अन्त में चीन के मंगोल सम्राट कुबलै खाँ ने चीन में कागजू का सिक्का चलाया तथा फारस के शासक गैखातू ने 1294 ई. में इसका प्रयोग किया। मुहम्मद बिन तुगलक ने भी आज्ञा निकाल कर घोषणा की कि लेनदेन के सभी कायों में ताम्बे के सांकेतिक सिक्के, सोने-चाँदी के सिक्कों की तरह, प्रचलित सिक्कों के रूप में चलें। इस कार्य के पीछे सुल्तान के उद्देश्य थे, अपने रिक्त कोष को पुन: भरना तथा विजय एवं शासन की अपनी योजनाओं के लिए अत्याधिक साधन पाना। अत: उस पर लोगों के छलने की युक्ति या अभिप्राय रखने का अपराध नहीं लगाया जा सकता।

यह सावधानी से संगठित किया हुआ कार्य मुख्यत: दो कारणों से असफल रहा। पहला कि यह समय से बहुत आगे था तथा लोग इसका वास्तविक महत्त्व नहीं समझ सके। दूसरा यह कि सुल्तान ने ताम्बे के सिक्के चलाने पर राज्य का एकाधिकार स्थापित नहीं किया तथा जालसाजी के विरुद्ध उचित सावधानी बरतने में असफल रहा। जैसा कि टॉमस लिखता है, राजकीय टकसाल के बनाये हुए एवं साधारण कौशल-संपन्न शिल्पकारों के हाथ से बनाये हुए सिक्कों में अन्तर परखने के लिए कोई विशेष प्रबंध नहीं था। चीन में कागज के नोटों के अनुकरण को रोकने के लिए जिस प्रकार सावधानी बरती जाती थी दै ताम्बे के सांकेतिक सिक्कों की प्रामाणिकता के लिए खास तौर पर प्रतिबन्ध न था तथा जनसाधारण द्वारा उत्पादन की शक्ति की कोई सीमा थी। परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में जाली सिक्के चल निकले। बरनी हमें कहता है कि- इस आज्ञा की घोषणा से प्रत्येक हिन्दू का घर टकसाल बन गया तथा विभिन्न प्रान्तों के हिन्दुओं ने तांबे के करोड़ों और लाखों सिक्के ढाले। इन्हीं से वे अपना कर अदा करते थे और इन्हीं से वे घोड़े,  अस्त्रशस्त्र तथा सब तरह की सुन्दर वस्तुएँ खरीदते थे। राय, गाँव के मुखिया तथा भूमिपति ताम्बे के इन सिक्कों के सहारे धनी एवं बलवान बन गये, पर राज्य निर्धन बन गया….उन स्थानों में जहाँ सुल्तान की आज्ञा का भय था, सोने के टके का मूल्य बढ़कर सौ (ताम्बे के) टकों के बराबर हो गया। प्रत्येक सोनार अपनी दुकान में ताम्बे के सिक्के बनाया करता था। कोष तांबे के इन सिक्कों से भर गया। उनका मूल्य इतना घट गया कि ये ककड़ों अथवा ठीकरों से अधिक मूल्यवान्। नहीं गिने जाने लगे। पुराने सिक्के का मूल्य दुर्लभ होने के कारण, चार या पाँच गुना बढ़ गया। फलत: व्यापार एवं व्यवसाय पर बुरा प्रभाव पड़ा, अत्यन्त गड़बड़ी फैल गयी। सुल्तान ने अपनी गलती महसूस की और सिक्का चलाने के करीब चार वर्ष बाद उसने अपनी आज्ञा रद्द की। उसने कोष में लाये गये ताम्बे के प्रत्येक सिक्के के राज्य द्वारा स्वीकृत मूल्य के बराबर के सोने एवं चाँदी के सिक्के दिये। इस प्रकार राज्य के बिना किसी लाभ के सार्वजनिक धन का बलिदान हो गया। ताम्बे के इतने अधिक सिक्के दिल्ली लाये कि तुगलकाबाद में उनके ढेर इकट्ठे हो गये, जो एक शताब्दी बाद मुबारक शाह द्वितीय के राज्यकाल में देखे जा सकते थे।

इस शासन-काल में दिल्ली सल्तनत बाहरी संकट से पूर्णत: मुक्त नहीं थी। 1328-1329 ई. में ट्रांस-औक्सियाना के चगताई सरदार तरमाशीरीन खाँ ने भारत पर आक्रमण किया। उसने पंजाब के मैदानों को लूटा तथा दिल्ली के बाहरी अंचल पर पहुँच गया। दिल्ली से राजधानी के परिवर्तन तथा शायद दिल्ली के शासकों द्वारा उत्तर-पश्चिम सीमा की दुर्बल प्रतिरक्षा ने उसे इस महत्त्वाकांक्षा पूर्ण योजना के लिए अवसर दे दिया। यहिया बिन अहमद तथा बदायूनी के लेखानुसार मुहम्मद बिन तुगलक ने उसे पराजित कर देश के बाहर खदेड़ दिया, पर फरिश्ता लिखता है कि सुल्तान ने सोने और जवाहरात के बहुत-से उपहार उपस्थित कर, जिनका वर्णन वह राज्य के मूल्य के रूप में करता है, उसे रिश्वत दे अपनी ओर कर लिया। जो भी हो, यह आक्रमण साधारण धावे से अधिक नहीं था तथा तरमाशीरीन जिस प्रकार अकस्मात आया था, उसी प्रकार अदृश्य भी हो गया।

अलाउद्दीन की तरह मुहम्मद बिन तुगलक भी विश्व-विजय के अपूर्व स्वप्न देखा करता था। कुछ खुरासानी सरदारों से, जो सुल्तान की अत्याधिक उदारता से प्रलोभित होकर उसके दरबार में आये थे तथा अपना उल्लू सीधा करना चाहते थे, प्रोत्साहन पाकर सुल्तान ने, अपने शासनकाल के प्रारम्भिक वर्षों में, खुरासान एवं ईराक जीतने की महत्त्वाकांक्षी योजना बनायी तथा इस उद्देश्य से एक विशाल सेना इकट्ठी की। बरनी लिखता है कि दीवाने अर्ज के दफ्तर में तीन लाख सत्तर हजार व्यक्ति भरती किये गये तथा उन्हें पूरे एक वर्ष तक राज्य की ओर से वेतन दिया गया। यह वास्तव में सच है कि उस समय खुरासान अपने दुराचारी राजा अबुसईद के अधीन अव्यवस्थित दशा में था, जिसका लाभ कोई भी बाहरी शत्रु उठा सकता था। पर दिल्ली के सुल्तान द्वारा इसकी विजय निस्सन्देह एक असम्भव कार्य थी, क्योंकि स्वयं उसी का अधिकार उसके अपने राज्य भर में, विशेषतः दक्कन में, सुरक्षित आधार पर दृढ़ नहीं समझा जा सकता था। भौगोलिक तथा यातायात की कठिनाइयाँ भी साधारण तरह की नहीं थीं। हिन्दूकुश अथवा हिमालय की घाटियों से होकर एक विशाल सेना को ले जाना तथा दूरस्थ देशों में इसके लिए खाद्य पदार्थ का प्रबन्ध करना बहुत बड़े काम थे। यह भी विचारणीय है कि दिल्ली के सैनिकों के लिए, जिन्होंने अब तक दुर्बल एवं विभाजित भारतीय शक्तियों के विरुद्ध विजयें प्राप्त की थीं, मध्य एशिया के वीर जत्थों के साथ सफलतापूर्वक अपनी ताकत अजमाना कहाँ तक सम्भव था। और भी, चगताई सरदार तरमशीरीन खाँ तथा मिस्र का सुल्तान जो दोनों पतनशील फारसी साम्राज्य की पूर्वी एवं पश्चिमी सीमाओं पर आँखें गड़ाये बैठे, दिल्ली के सुल्तान के झूठे मित्र थे तथा उसके आयोजित आक्रमण में उसकी सहायता करने की अपेक्षा अपने उल्लू सीधे करने में ही अधिक दृढ़-संकल्प थे। इस प्रकार प्रत्येक दृष्टिकोण से दिल्ली के सुल्तान की योजना पूर्णतया नीति-विरुद्ध थी। शायद धनाभाव के कारण इसे त्याग देना पड़ा। बरनी लिखता है- जिन देशों के प्रति लोभ किया गया, वे अधिकृत नहीं हुए…तथा उसका धन जो राजनैतिक शक्ति का वास्तविक स्रोत था, खर्च हो गया

मुहम्मद बिन तुगलक ने तिब्बत एवं चीन पर विजय प्राप्त करने का असम्भव विचार कभी नहीं रखा। पर एक समकालीन अधिकारी बरनी एवं इब्नबतूता स्पष्ट रूप से उसकी करजल पर्वत, जो हिन्द (भारत) एवं चीन के राज्यों के मध्य में है, योजना का उल्लेख करते हैं। स्पष्टत: यह आक्रमण कुमायूँ-गढ़वाल क्षेत्र की कतिपय धृष्ट जातियों के विरुद्ध किया गया, जिसका उद्देश्य उनको दिल्ली सुल्तान के नियंत्रण में लाने का था। 1337-1338 ई. में एक योग्य सेनापति के अधीन एक विशाल सेना दिल्ली से भेजी गयी।

परन्तु प्रारम्भ की एक सफलता के बाद भौगोलिक कठिनाइयों, वर्षा ऋतु के आगमन तथा खाद्य पदार्थ की कमी के कारण दिल्ली की सेना को कष्ट हुआ। इस दुर्भाग्य पूर्ण आक्रमण की कहानी कहने को बहुत कम (बरनी के लेखानुसार दस, इब्नबतूता के लेखानुसार तीन) बचे रहे। पर इसके तात्कालिक उद्देश्य की पूर्ति हो गयी, क्योंकि पहाड़ियों ने संधि कर ली तथा दिल्ली के सुलतान को कर देने के लिए राजी हो गये।

फिर भी मुहम्मद बिन तुगलक की सभी झक्की योजनाओं का मिला-जुला परिणाम उसके लिए घातक सिद्ध हुआ। उनसे उसके राज्य के लोगों को अपार कष्ट हुआ, जो उस समय दुर्भिक्ष के उपद्रव से भी पीड़ित थे तथा अंत में उनका धैर्य समाप्त हो गया। सर्वसाधारण का अस्नातोश सुल्तान की प्रभुता के विरुद्ध खुले विद्रोहों में व्यक्त हुआ। उसका सारा शासन-काल बार-बार होने वाले उपद्रवों से समाप्त हो गया, जिससे उसका क्रोध और भी प्रबल हो उठा, उसकी प्रतिष्ठा एवं प्रभुता नष्ट हो गयी तथा उसके विशाल साम्राज्य के विच्छेद की गति तीव्र हो गयी।

प्रारंभ के दोनों विद्रोह आसानी से कुचल दिए गए तथा विद्रोहियों को दृष्टांत के योग्य दंड दिए गए। बहौदीन गुरशा ने जो, गयासुद्दीन तुगलक का भांजा और मुहम्मद बिन तुगलक का खास फुफेरा भाई था तथा जो दक्कन में शोरापुर से लगभग दस मील उत्तर स्थित सागर का जागीरदार था, सुल्तान की प्रभुता मानने से इनकार कर दिया और 1326 अथवा 1327 ई. में उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। पर वह साम्राज्यवादियों द्वारा बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया गया। जीवित अवस्था में उसकी खाल उतार ली गयी, उसका मृत शरीर नगर में चारों ओर घुमाया गया तथा उसकी फाँसी दूसरों के लिए चेतावनी के रूप में घोषित हुई- इसी प्रकार सभी राजद्रोही नेस्तनाबूद होंगे।

अगले वर्ष जो अधिक भयंकर विद्रोह हुआ, वह था बहराम ऐबा का, जिसका उपनाम था किशलू खाँ तथा जिसके अधीन उच्च सिंध एवं मुलतान की जागीरें थीं। मुहम्मद बिन तुगलक उस समय देवगिरि में था। वह दिल्ली होकर मुलतान की ओर बढ़ा तथा अबुहर के मैदान की लड़ाई में विद्रोही को बुरी तरह परास्त किया। सुल्तान का झुकाव मुलतान वासियों के कत्ले-आम का हुक्म देने का था, पर फकीर रुक्नुद्दीन ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। बहराम को पकड़ लिया गया तथा उसका सिर उतार कर, विद्रोही प्रवृत्ति के लोगों के लिए चेतावनी के रूप में, मुलतान नगर के द्वार पर लटका दिया गया।

इन दोनों विद्रोहों के दमन से सुल्तान की स्थिति जरा भी मजबूत नहीं हुई बल्कि 1325 ई. से उसके भाग्य का ह्रास होने लगा, उसकी प्रभुता को हिन्दू सरदार और प्रान्तों के मुस्लिम शासक (सूबेदार) खुले आम ललकारने लगे और वे स्वतंत्रता व्यक्त करने का भी साहस करने लगे। उत्तर भारत में सुल्तान के उलझे रहने से लाभ उठा कर माबर के शासक जलालुद्दीन अहसन शाह ने 1335 ई. में अपने को स्वतंत्र घोषित किया तथा अपने नाम से सिक्के ढाले। सुल्तान स्वयं उसके विरुद्ध सेना लेकर चला; पर वारंगल पहुँचने पर, अपने खेमे में हैजा फैल जाने से विवश होकर, उसे दौलताबाद लौट जाना पड़ा। इस प्रकार मदुरा का स्वतंत्र मुस्लिम राज्य स्थापित हुआ, जो 1377-1378 ई. तक बना रहा, जब नये विजयनगर राज्य के समक्ष इसका पतन हो गया। परम्परागत कथा के अनुसार, इस विजयनगर राज्य की नींव 1336 ई. में पड़ी।

उत्तर में बंगाल प्रान्त के शासक फकरूद्दीन मुबारक शाह ने, जिसकी दिल्ली सल्तनत के प्रति स्वामिभक्ति सर्वदा सन्देहजनक रहती आयी थी, शीघ्र ही 1338 ई. में अपनी राजभक्ति का जुआ उखाड़ फेंका तथा अपने नाम से सिक्के ढाले। दिल्ली का सुल्तान, जो उस समय दूसरी मुसीबतों में पहले से ही उलझा हुआ था, उसे वशीभूत करने के लिए कुछ भी नहीं कर सका और इस प्रकार बंगाल एक स्वतंत्र प्रान्त बन गया। साम्राज्य के अन्य भागों में भी एक के बाद दूसरे बलवे शीघ्रता से होते रहे, जिनमें सबसे अधिक भयानक था 1340-1341 ई. का अवध एवं जाफराबाद के शासक ऐनुलमुल्क का विद्रोह। ये सब विद्रोह वस्तुत: 1342 ई. के अन्त तक दबा दिये गये, पर इन्होंने राज्य के साधनों पर बुरा प्रभाव डाला। इन विद्रोहों ने सुल्तान की शक्ति को समाप्त कर दिया तथा उसके जोश को ठंडा कर दिया।

अत्यन्त व्यग्र करने वाली इस परिस्थिति में सुल्तान ने, मिस्र के अब्बासी खलीफा से विशिष्ट अधिकार-पत्र प्राप्त कर, अपनी पतनशील प्रभुता को दृढ़ करने के लिए धार्मिक स्वीकृति की चेष्टा की। इच्छित विशिष्ट अधिकार-पत्र आया तथा मुहम्मद बिन तुगलक के खुतबा एवं सिक्कों पर अपने नाम के बदले खलीफा का नाम चढ़वा दिया। पर उसका लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। उसकी प्रजा की राजभक्ति तथा आस्था पर इतना कठोर आघात हुआ था कि वह खलीफा के विशिष्ट अधिकार-पत्र के बल पर भी पुनः प्राप्त नहीं हो सकती थी। सच पूछिए तो राजसिंहासन पर सुल्तान के अधिकार के विषय में तो किसी ने आपत्ति की नहीं थी; यह तो उसकी नीति तथा उसके कार्य थे, जो उसकी प्रजा को पसन्द नहीं आये।

राज्य के प्राय: सभी भागों में सुल्तान को भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। तेलंगाना में प्रलय नायक और उसके बाद उसके भतीजे कृष्ण ने होयसल के राजा वीर वल्लाल तृतीय की सहायता से, मुस्लिम शासन के विरुद्ध एक हिन्दू राष्ट्रीय आन्दोलन का संगठन किया। कृष्णा नदी के निकट के प्रदेश में भी इसी तरह का आन्दोलन शुरू हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि विजय नगर में हिन्दू राज्य तथा दक्कन में कुछ अन्य हिन्दू राज्यों की स्थापना हुई।

सुल्तान द्वारा अमीरान-ए-सदा (सौ अमीरों की एक संस्था) को तंग करने से उसकी विपत्तियाँ और भी बढ़ गयीं तथा विद्रोह पर विद्रोह होने लगे। देवगिरि में विदेशी अमीर विद्रोह कर बैठे तथा अगस्त, 1347 ई. के प्रारम्भ में अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमन शाह द्वारा बहमनी राज्य की नींव पड़ गयी। जब सुल्तान एक भाग में किसी उपद्रव को रोकने के लिए आगे बढ़ता, तब किसी भिन्न दिशा में दूसरा उपद्रव आरम्भ हो जाता। इस प्रकार जब वह सिंध में विद्रोहियों का पीछा करने में व्यस्त था कि उसे थट्टा के निकट ज्वर हो। आया तथा 20 मार्च, 1351 ई. को उसकी मृत्यु हो गयी। बदायूंनी लिखता है- और इस तरह राजा अपनी प्रजा से मुक्त हुआ तथा प्रजा अपने राजा से मुक्त हुई

वास्तव में मुहम्मद बिन तुगलक के सम्पूर्ण राज्यकाल का, विफल उद्देश्यों के कारण, दु:खपूर्ण अन्त हुआ और तेईस प्रान्तों का उसका विशाल साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। इसमें सन्देह नहीं हो सकता कि इस दु:खांत नाटक के लिए सुल्तान स्वयं अधिकांशतः उत्तरदायी था। वह असाधारण बुद्धि एवं परिश्रम से सम्पन्न था, पर एक रचनात्मक राजनीतिज्ञ के आवश्यक गुणों का उसमें अभाव था तथा उसके अनुचित कायाँ एवं कठोर नीति ने, जो जन साधारण की इच्छा के विरुद्ध व्यवहार में लायी जाती थी, उसके साम्राज्य का नाश निश्चित कर दिया।

फिरोज शाह तुगलक: 1351-1388 ई.

थट्टा के निकट मुहम्मद बिन तुगलक की अचानक मृत्यु हो जाने के कारण नेतृत्वविहीन सेना में, जो खेमे में स्त्रियों एवं बच्चों की उपस्थिति के कारण पहले से ही व्यग्र थी, गडबड़ी एवं अव्यवस्था फैल गयी। ऐसी अवस्था में सरदारों ने फ़िरोज़ से राजसिंहासन पर बैठने एवं हतोत्साह सेना को नष्ट होने से बचाने के लिए आग्रह किया। फ़िरोज राजमुकुट स्वीकार करने में कुछ हिचकिचाहट के बाद, जो शायद सच थी, सरदारों की इच्छा के सामने झुक गया तथा 23 मार्च, 1351 ई. को छियालीस वर्षों की अवस्था में सुल्तान घोषित हुआ। वह सेना में व्यवस्था की पुन: प्रतिष्ठा करने में सफल हुआ तथा इसके साथ दिल्ली के लिए चल पड़ा। पर वह सिंध के बाहर भी नहीं आया था कि स्वर्गीय सुल्तान के प्रतिनिधि ख्वाजा-ए-जहाँ ने दिल्ली में एक लड़के को मुहम्मद बिन तुगलक का पुत्र एवं उत्तराधिकारी घोषित कर उसे गद्दी पर बैठा दिया। फ़िरोज़ के लिए स्थिति वास्तव में संकटपूर्ण हो गयी। उसने मुल्तान पहुँचकर सरदारों एवं मुस्लिम कानून विदों से परामर्श लिया। सरदारों ने यह स्वीकार ही नहीं किया कि मुहम्मद बिन तुगलक के कोई पुत्र भी है। मुस्लिम कानून विदों ने ख्वाजा-ए-जहाँ के उम्मीदवार को नाबालिग होने के कारण अयोग्य ठहराया। इस विषय पर कानून के दृष्टिकोण से विचार नहीं हुआ। ऐसा करना असंगत भी होता, क्योंकि मुस्लिम कानून में राजसत्ता परम्परा प्राप्त अधिकार की चीज नहीं समझी जाती थी। बालक सुल्तान के पक्ष के अत्यंत कमज़ोर होने के कारण ख्वाजा-ए-जहाँ शीघ्र फिरोज़ की शरण में आ गिरा। फिरोजू ने उसकी पिछली सेवाओं को ध्यान में रखकर उसे क्षमा कर दिया तथा उसे समाना की जागीर में जाकर वहाँ एकान्तावस्था में अपने अन्तिम दिन व्यतीत करने की आज्ञा दी। पर सुनाम एवं समाना के सेनापति शेर खाँ के एक अनुचर ने अपने स्वामी, अन्य सरदारों तथा सेना के नायकों द्वारा उकसाये जाने के कारण राह में उसका (ख्वाजा-ए-जहाँ का) काम तमाम कर डाला। फ़िरोज़ ने इस वृद्ध अधिकारी को, जिसकी निर्दोषिता का उसे विश्वास हो चुका था, सरदारों के प्रतिशोध का शिकार बनने देकर अपनी दुर्बलता का परिचय दिया।

फिरोज़ के समक्ष वस्तुत: बड़ा कठिन कार्य दिल्ली सल्तनत को शक्तिहीनता एवं आचार-भ्रष्टता की अवस्था से उठाना था जो, उसके पूर्वगामी के शासनकाल के अन्तिम वर्षों से गिर गयी थी। किसानों और अमीर वगों का असंतोष उभर रहा था। साम्राज्य विघटन की समस्या से जूझ रहा था। मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियों के कारण उलेमा वर्ग भी असंतुष्ट था। खजाना भी खाली था। पर नया सुल्तान अक्षम था। वह कमजोर, विचलित होने वाला तथा लगातार परिश्रम करने में अक्षम था। उसमें उत्तम सेनापति के आवश्यक गुणों का अभाव था। उसने साम्राज्य के खोये हुए प्रान्तों को पुनः प्राप्त करने का कभी हार्दिक प्रयास नहीं किया तथा उसके सैनिक कार्य अधिकतर असफल रहे। अपने आक्रमणों के समय संकटपूर्ण क्षणों में जब वह करीब-करीब जीतने को होता था, तब अपने सहधर्मियों के रक्तपात से बचने के लिए वहाँ से लौट पड़ता था।

पूर्व में बंगाल का स्वतंत्र शासक हाजी इलियास, जिसने शम्सुद्दीन इलियास शाह की उपाधि धारण कर ली थी, विभिन्न दिशाओं में अपने राज्य की सीमाएँ बढ़ाने में व्यस्त था तथा दिल्ली राज्य की सीमाओं का भी उल्लंघन कर रहा था। इस पर सत्तर हजार घुड़सवारों को लेकर नवम्बर, 1353 ई. में दिल्ली से फिरोज़ उसे पीछे हटाने के लिए विदा हुआ। उसके आने के विषय में सुनकर इलियास इकदाला के दुर्ग में लौट आया, जो पांडुआ से शायद दस या बारह की दूरी पर था। लेकिन वहाँ पर दिल्ली की सेना ने उस पर आक्रमण कर पराजित कर दिया। किन्तु फ़िरोज़ ने इस कठिनाई से प्राप्त की हुई विजय लाभ नहीं उठाया, क्योंकि वह बंगाल को अपने साम्राज्य में बिना मिलाये , जिसके लिए उसका सेनापति तातरि खाँ आग्रह कर रहा था, पहली सितम्बर,13 54 ई. को दिल्ली लौट आया। उसके अपमानपूर्ण ढंग से पीछे हटने के कारण विषय में दो विभिन्न मत हैं। फ़िरोज़ के शासन-काल के अधिकारी इतिहासकार शम्से-सिराज अफूीफ के लेखानुसार, सुल्तान घिरे हुए दुर्ग की स्त्रियों के रोने और कराहने से द्रवित होकर लौट पड़ा। पर कुछ उत्तरकालीन लेखकों ने इसका कारण वर्षा ऋतु के आरम्भ होने पर विपत्तियों का भय बतलाया है। उसके लौटने का जो भी कारण रहा हो, हमें टॉमस के कथन से सहमत होना पड़ता है कि- इस आक्रमण का परिणाम केवल दुर्बलता को स्वीकार करना ही हुआ।

कुछ वर्षों में फ़िरोज ने बंगाल को वशीभूत करने का पुन: प्रयत्न किया। उसे इसके लिए बहाना भी मिल गया। जब पूर्वी बंगाल के फखरुद्दीन मुबारक शाह के दामाद जफूर खाँ ने सोनारगाँव से समुद्र मार्ग द्वारा भाग कर, उसके दरबार में आकर बंगाल के शासक के अत्याचार के विषय में उससे शिकायत की। वीर एवं योग्य शासक शम्सुद्दीन इलियास की मृत्यु से फ़िरोज़ बंगाल के विरुद्ध आक्रमण का संगठन करने को प्रोत्साहित हुआ। सभी पिछली संधियों एवं मित्रता के आश्वासनों को तिलांजलि देकर एक विशाल सेना ले वह 1359 ई. में शम्सुद्दीन इलियास के पुत्र एवं उत्तराधिकारी सिकन्दर शाह के विरुद्ध बढ़ा। राह में गोमती के किनारे जूफराबाद में वह छः महीनों के लिए ठहरा तथा इसके पाश्र्व में अपने चचेरे भाई फखरुद्दीन जौन (मुहम्मद बिन तुगलक) की स्मृति में जौनपुर नगर की नींव डाली। वर्षा-ऋतु के बीत जाने पर उसने पुन: बंगाल की ओर बढ़ना जारी किया। उसने सिकन्दर शाह द्वारा भेजे गये मित्रता के सन्देशों का कुछ उत्तर नहीं भेजा। इसलिए सिंकदर शाह अपने पिता के दृष्टान्त का अनुकरण कर, एकदाला के मिट्टी के किले में जा छिपा। दिल्ली की सेना ने इस दुर्ग पर घेरा डाल दिया, पर इस पर अधिकार करना बच्चों का खेल नहीं सिद्ध हुआ। बंगाल की सेना तब तक वीरतापूर्वक अपने गढ़ की प्रतिरक्षा करती रही जब तक वर्षा ऋतु निकट नहीं आ गई थी तथा बाढ़ घेरा डालने वालों के विरुद्ध उसके पक्ष की सहायता के लिए नहीं आ गयी। शीघ्र सिकन्दर के पक्ष में ही अच्छी शतों के साथ एक संधि हो गयी। इस प्रकार दिल्ली के सुल्तान द्वारा किया गया बंगाल पर दूसरा आक्रमण भी पहले की ही तरह निष्फल रहा। इसने पुन: एक बार केवल उसके कमजोर एवं विचलित होने वाले स्वभाव का परिचय दिया।

दिल्ली लौटते समय सुल्तान कुछ समय के लिए जौनपुर में ठहर गया और तब जाम नगर (आधुनिक उड़ीसा) के विरुद्ध सेना लेकर बढ़ा। इस जगह का राय, दिल्ली सेना के आते ही, तेलंगाना की ओर भाग गया तथा शीघ्र उसने, कुछ हाथियों को समर्पित कर तथा कर के रूप में प्रतिवर्ष कुछ हाथियों को दिल्ली भेजने का वचन देकर, उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। फ़िरोज़ अढ़ाई वर्षों की अनुपस्थिति के बाद अत्यंत कठिनाई एवं कष्ट सहकर दिल्ली लौटा।

अपने दिल्ली लौटने के शीघ्र बाद फिरोजू का ध्यान नगरकोट के गढ़ के पराजय की ओर गया, जिसको मुहम्मद बिन तुगलक ने 1337 ई. में जीता था, पर जो सुल्तान के शासन काल के अन्तिम वर्षों में दिल्ली के अधिकार से निकल गया था। नगर पहुँच कर वह छः महीनों तक किले पर घेरा डाले रहा। छह माह के घेरे के बाद नगरकोट का गद्य क्षमा मांगने के लिए बाध्य हुआ। फ़िरोज़ का नगरकोट पर आक्रमण रोचक है, क्योंकि उसने विभिन्न विषयों पर तीन सौ संस्कृत पुस्तकों का, जो ज्वालामुखी के मन्दिर में सुरक्षित थीं, खालिद खानी नामक राजकवि द्वारा दलाइले-फ़िरोज शाही के नाम से फारसी-पद्य में अनुवाद करवाया।

1361-1362 ई. में फ़िरोज़ ने सिंध-विजय के कार्य को पुन: आरम्भ किया, जो लगभग 11 वर्ष पहले मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु होने पर त्याग दिया गे था। वह 90 हजार, घुड़सवारों, बहुत से पैदल सिपाहियों, 480 हाथियों तथा हजार नावों को लेकर सिंध के जामों की राजधानी थट्टा की ओर चला। सिंध के शासक जाम बाबनिया ने उसका सामना करने का निर्णय तथा बीस हजार घुड़सवारों एवं चार लाख पैदल सिपाहियों से एक -सेना का निर्माण किया। दुविधा पड़ने तथा संक्रामक पशुरोग फैल जाने दिल्ली की सेना को बहुत हानि उठानी पड़ी। रोग के कारण लगभग तीन चौथाई सेना का अंत हो गया। पुनः सेनापति नये सैनिकों की भर्ती करने वह गुजरात लौट गया। पर किन्हीं विश्वासघात मार्ग-प्रदर्शकों द्वारा हो वह कच्छ के मैदान (रन) में बहक गया तथा उसकी सेना की में छः महीनों तक कुछ नहीं मालूम हो सका। लेकिन उसके योग्य मंत्री खाने-जहाँ-मकबूल ने दिल्ली से और सेना भेजी। तब सुल्तान ने 13.. ई. में पुन: सिंधियों पर आक्रमण किया तथा उन्हें संधि करने को बाध्य किया। सुल्तान को प्रतिवर्ष कई लाख टके कर के रूप में देना स्वीकार किया तथा उसकी अधीनता भी मान ली। पर उसके बंगाल के आक्रमणों की तरह, उसके सिंधी आक्रमणों से भी उसमें सैनिक योग्यता एवं व्यूह-रचना की कुशलता का अभाव परिलक्षित हुआ।

फ़िरोज़ के शासन-काल में मंगोलों के आक्रमण नहीं हुए। यहिया हमें बताता है कि राज्य की सीमाएँ विशाल सेनाओं एवं सुल्तान के शुभचिंतको के अधीन सुरक्षित कर ली गयी थीं। पर फ़िरोजूने दक्कन को दिल्ली सल्तनत के अधीन लाने का कोई प्रयास नहीं किया जब उसके आधकारियों ने उसे दौलताबाद पर आक्रमण करने को कहा, तो जैसे शम्से-सिराज अफ़ीम कहता है, वह- दु:खी दिखलाई पड़ा, उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गए तथा उनके तर्कों को स्वीकार करते हुए उसने कहा कि मैंने इस्लाम धर्म के लोगों से आगे कभी युद्ध नहीं करने का निश्चय कर लिया है।

फ़िरोज़ में धार्मिक कट्टरता थी और उसने हिन्दुओं को सताया। मिस्र के खलीफा के प्रति उसे बड़ी श्रद्धा थी। मुस्लिम भारत के इतिहास में सर्वप्रथम उसने अपने को उसका प्रतिनिधि कहा। अपने शासन-काल के प्रथम छ: वर्षों में उसे दो बार शासक के विशिष्ट अधिकार-पत्र तथा सम्मान के परिधान प्राप्त हुए। उसके सिक्कों पर उसका अपना नाम खलीफा के नाम के साथ खुदा हुआ था। उसने राज्य के काम अपने धर्म के धर्मराज्यीय सिद्धान्तों पर चलाने का प्रयत्न किया। उसने अपनी विभिन्न मतावलम्बी प्रजा को उस धर्म का आलिंगन करने को प्रोत्साहित किया जिसमें उसे स्वयं शान्ति मिलती थी। उसने ऐसे नियम बनाये, जो उसके पूर्वगामियों द्वारा अनुसरण की हुई धार्मिक नीति से भिन्न थे।

शायद सरदारों एवं अधिकारियों को शान्त रखने की इच्छा से फ़िरोज जागीर-प्रणाली को पुनर्जीवित किया, जो अलाउद्दीन द्वारा उठा दी गयी उसने, उन्हें अधिक वेतन एवं भत्ता देने के अतिरिक्त; सारे राज्य को उन में ठीके पर बाँट दिया। यद्यपि प्रकट रूप से इन कामों से नये सुल्तान की मजबूत हुई, पर इनसे अन्त में निष्केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गयी, केन्द्रीय सरकार के अधिकार पर गुप्त रूप से क्षति पहुँची। राजकीय पदों उसने वंशानुगत कर दिया। असैनिक ही नहीं सैनिक पद भी वंशानुगत कर दिये गए। इस कार्य में क्लर्क को घुस देने के लिए उसने स्वयं एक सैनिक को पैसा दिया अर्थात् उसने भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित किया।

परंतु इन सब उपरलिखित दोषों के बावजूद फ़िरोज़को कुछ परोपकारी कार्यों को करने का श्रेय प्राप्त है। उसका लगभग सैतीस वर्षों का लम्बा शासन-काल तुलनात्मक रूप से लोगों के लिए सुख का युग था। उसने बहुत से कष्टप्रद एवं अनुचित करों को उठा दिया, जो पहले के शासन कालों में लोगों पर लगाये गये थे। उसने कुरान के नियमों को दृष्टि में रखकर कर-निर्धारण किया। उसने कुरान द्वारा अनुमोदित चार प्रकार के कर लगाने की अनुमति दी- खराज अथवा खेती की हुई भूमि पर दसवाँ भाग, जकात अथवा भिक्षा, जजिया अथवा गैर-मुसलमानों एवं अन्य नास्तिकों पर हर आदमी के हिसाब से लगाया जाने वाला कर तथा खुम्स अथवा लूट के माल एवं खानों की आय का पाँचवाँ भाग। फ़िरोज़प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने जजिया को खराज से पृथक कर दिया। धार्मिक नियमों के विद्वानों से परामर्श कर उसने खेतों की उपज के दस प्रतिशत की दर से सिंचाई-कर (शुर्ष) भी लगाया। भू-राजस्व के लिए उसने एक अधिकारी ख्वाजा हिसामुद्दीन को नियुक्त किया। कुरान की आज्ञानुसार लड़ाई में लूटे हुए माल को राज्य एवं सैनिकों के बीच विभक्त होना था-राज्य को लूटे हुए माल का पाँचवाँ भाग मिलना था तथा सैनिकों को बाकी अस्सी प्रतिशत पाना था। व्यापारियों को कुछ अव्यवस्थित एवं कष्टप्रद कर देने से मुक्त कर दिया गया, जिनसे देश के एक भाग से दूसरे भाग में माल के निर्विघ्न परिभ्रमण में बाधा उपस्थित हो रही थी। राज्य के अधिकारियों को कड़ी चेतावनी दे दी गयी कि वे निश्चित रकम के अतिरिक्त कुछ भी न माँगें। अनुचित रूप से रुपये ऐंठने के लिए उन्हें दण्ड दिया जाता था। व्यापार एवं कृषि के लिए इन कार्यों के परिणाम वस्तुत: लाभदायक हुए। शम्स-ए-सिराज अफ़ीफ़ जो सुल्तान का प्रशंसक था तथा जिसका सम्बन्ध प्राय: सुल्तान के दरबार से रहता था, बहुत सच लिखता है कि इन नियमों के परिणामस्वरूप रैयत समृद्ध एवं सन्तुष्ट थी। उनके घर अन्न, सम्पत्ति, घोड़ों एवं साज-सामान से परिपूर्ण रहते थे। प्रत्येक मनुष्य के पास प्रचुर मात्रा में सोना-चाँदी थे। कोई भी स्त्री बिना आभूषणों के नहीं थी तथा कोई भी घर बिना अच्छे बिछावनों एवं दीवानों के न था। धन भरपूर था तथा आराम सब को था। इस शासन काल में राज्य आर्थिक दिवालियापन से पीड़ित नहीं रहा। दोआब का राजस्व अस्सी लाख टका होता था तथा दिल्ली के क्षेत्रों का राजस्व छ: करोड़ पचासी लाख टका था। सामान्य उपयोग की वस्तुओं के मूल्य भी कम ही हो गये।

सिंचाई की नहरों के निर्माण से कृषि की उन्नति में बड़ी सहायता मिली। शम्स-ए-सिराज अफीफ़ ने फ़िरोज़ की आज्ञा से खोदी गयी दो नहरों का उल्लेख किया है- पहली सतलज से तथा दूसरी यमुना से। पर यहिया, जिसे सरहिन्द का निवासी होने के कारण नहर-प्रणाली का अधिक ज्ञान था, उसके राज्यकाल में निर्मित चार नहरों के विषय में लिखता है-

  1. पहली सतलज से घाघरा नदी तक
  2. दूसरी मंडवी एवं सिरमूर पहाड़ियों के आसपास से निकाली, सात धाराओं द्वारा मिलायी गयी और हाँसी तक तथा वहाँ से अरसनी तक बढ़ायी गयी, जहाँ पर हिसार फ़िरोज़ा के दुर्ग की नींव पड़ी
  3. तीसरी घाघरा से निकल कर सिरसुती (सरस्वती दुर्ग) होती हुई हिरनी खेड़ा गाँव तक गयी
  4. चौथी यमुना से निकाली जाकर फिरोज़ाबाद तक ले जायी गयी तथा वहाँ से और आगे गयी।

फ़िरोज़ ने नहरों के अधीक्षण तथा विशेष रूप से वर्षा ऋतु में उनकी जाँच करने एवं उनके विषय में सूचना देने के लिए कुशल अभियन्ताओं (इंजिनियरों) को नियुक्त किया। उसका एक दूसरा परोपकारी कदम था, बंजर भूमि को पुनः प्राप्त करना, जिससे प्राप्त आमदनी को धार्मिक एवं शैक्षिक कार्यों पर व्यय किया जाता था।

फ़िरोज के निर्माण एवं उद्यान सम्बन्धी कार्यों से अप्रत्यक्ष रूप में जनसाधारण को लाभ हुआ। उसे नये नगरों को निर्माण करने एवं प्राचीन नगरों का पुनः नामकरण करने का बड़ा चाव था। वह स्वयं कहता है- उन अनेक दानों में, जो अल्लाह ने अपने मुझ जैसे मामूली सेवक को प्रदान किया, सार्वजनिक भवनों के निर्माण करने की इच्छा भी थी। इसलिए मैने अनेक मस्जिदों, कालेजों एवं मठों का निर्माण किया, ताकि विद्वान् एवं वृद्ध तथा धर्मात्मा लोग इन भवनों में बैठकर अल्लाह की इबादत कर सके और दयालु निर्माण कर्ता की अपनी उपासना से सहायता करें। उसने जौनपुर का नगर, फ़तहाबाद, हिसार, बदायूँ के निकट फ़िरोजपुर तथा अपनी राजधानी से दस मील की दूरी पर फ़िरोजाबाद की स्थापना की। अपने बंगाल के आक्रमणों के समय उसने एकदाला का नाम आजादपुर तथा पाँडुआ का फिरोजाबाद रखा। उसने बहुत-सी मस्जिदों, पुलों का निर्माण अथवा मरम्मत करवायी। राज्य का प्रमुख कारीगर था मलिक गाजी शहना, जिसकी सहायता अब्दुल हक करता था। उसका एक अन्य शिष्य अहमद था। बागवानी में अपनी अभिरुचि के कारण सुल्तान ने दिल्ली के निकट बारह सौ नये बाग लगाये तथा अलाउद्दीन के तीस पुराने बागों को फिर से लगवाया। वह अशोक के दो खुदे हुए पत्थर के स्तंभों को भी दिल्ली ले गया-एक ऊपरी यमुना के तट पर खिज्राबाद के निकट के एक गाँव से तथा दूसरा मेरठ से। उसने दिल्ली स्थित इल्तुतमिश के मदरसा की मरम्मत करायी। साथ ही उसने फिरोजाबाद में एक मदरसा का निर्माण भी करवाया। इसने इल्तुतमिश द्वारा निर्मित हौज-ए-खास की मरम्मत करायी।

फ़िरोज ने नये प्रकार के सिक्के भी चलाये। उसके राज्यकाल में चलने वाले सिक्के मुहम्मद-बिन-तुगलक के समय में भी प्रचलित थे। शशगनी (छ: जीतलों का एक सिक्का-विशेष) का भी, जिसका सम्बन्ध अफ़ीफ़ ने विशेषरूप से उसके साथ जोडा, मुहम्मद बिन तुगलक के समकालीन इब्नबतूता ने उल्लेख किया है। पर अद्धाएवं बिखनामक क्रमश: आधे एवं एक चौथाई जीतल के ताम्बा और चाँदी मिश्रित दो सिक्कों को चलाने का श्रेय उसी को देना चाहिए। इन मिश्रित धातुओं के सिक्कों से जनसाधारण को लेनदेन में बड़ी सुविधा हुई तथा सिक्कों को भी धातु-सम्बन्धी पर्याप्त बल मिला। पर टकसालों की कार्यवाही में छल एवं गबन के कारण उनकी बहुत-कुछ उपयोगिता नष्ट हो गयी।

राज्य की सेना का संगठन सामन्तवादी आधार पर किया गया। सेना के स्थायी सैनिकों को जमीन मिलती थी, जो उनके सुख से रहने के लिए पर्याप्त थी। अस्थायी सैनिकों (गैरवझ, गैरवज) को सीधे राजकीय कोष से वेतन दिया जाता था। जिन्हें इन दोनों में किसी प्रकार से वेतन नहीं मिलता था, उन्हें राजस्व वाली चीज मिलती थी, जो समयानुसार बदली जा सकती थी। वेतन देने का यह अन्तिम तरीका दुरुपयोग का एक भारी साधन सिद्ध हुआ। राजधानी में कुछ मध्यस्थ आदमी राजस्व वाली चीज को तिहाई मूल्य पर खरीद लेते थे तथा वे जिलों में सैनिकों के हाथ इन्हें आधे मूल्य पर बेच देते थे। इस प्रकार लोगों का एक वर्ग बिना परिश्रम किये तथा सैनिकों को हानि पहुँचा कर गुप्त रूप से नफा कमा रहा था। राज्य की सेना में अस्सी या नब्बे हजार अश्वारोही थे, जिसमें सरदारों के सेवक भी अतिरिक्त रूप में भतीं किये जा सकते थे। पर इसमें सन्देह है कि सेना वास्तव में कार्यक्षम थी। अवश्य ही इसकी शक्ति, सैनिकों के प्रति सुल्तान की विवेकहीन उदारता के कारण, अधिकांशत: नष्ट हो गयी होगी। उसने एक नया नियम बनाया, जिसके अनुसार जब कोई सैनिक वृद्धावस्था के कारण मैदान में लड़ने के योग्य न रहे, उसका पुत्र अथवा दामाद या दास उसका स्थान ले ले। सैनिक सेवा में योग्यता का बिना कोई विचार किये, वंश-परम्परा सम्बन्धी अधिकार की स्वीकृति निस्सन्देह एक अपकारक प्रथा थी।

फ़िरोज के राज्य-काल में दासों की संख्या में अभूतपूर्व उन्नति हुई, जिनके लिए सरकार ने एक अलग विभाग ही खोल दिया। राज्य के विभिन्न भागों के जागीरदार सुल्तान को दास भेट किया करते थे, जिसके बदले उनके द्वारा सरकार को दिये जाने वाले कर में उसी हिसाब से कमी कर दी जाती थी। इस प्रकार दासों की संस्था के कारण केन्द्रीय राज धनागार को भारी क्षति हुई।

यद्यपि फ़िरोज भड़कीले दिखावटीपन के साधारणतया विरुद्ध था, पर अपने पूर्व-गामियों की तरह शानदार तथा ऐश्वर्यवान् दरबार रखता था, जो शम्से-सिराज अफ़ीफ़ के कथनानुसार, ईद एवं शबेरात जैसे त्यौहारों के अवसर पर विशेषरूप से सजाया जाता था। छत्तीस राजकीय विभाग भी थे, जिनमें प्रत्येक के लिए इसके मामलों की देखभाल के निमित्त अधिकारियों का एक अलग दल रहता था। सुल्तान के दरबार तथा घरेलू विभागों के निर्वाह का खर्च अवश्य ही काफी रहा होगा। उसने मुस्लिम गरीबों के कल्याण के लिए दीवान-ए-खैरात नामक विभाग की स्थापना की। यह विभाग गरीब मुसलमानों की पुत्री की शादी के लिए धन भी देता था। उसी तरह उसने मुस्लिम बेरोजगारों के कल्याण के लिए, एक रोजगार ब्यूरो की स्थापना करायी। उसने दिल्ली में एक राजकीय अस्पताल की स्थापना करायी जिसका नाम दर-उल-सफा था। उसने 36 राजकीय कारखाने स्थापित कराए और उनमें दासों को नियुक्त किया। उसने दासों के निर्यात पर पाबंदी लगायी।

फ़िरोज के मंत्री खाने-जहाँ मकबूल का राज्य के कार्यों पर प्रबल प्रभाव था। वह मूलरूप में तेलंगाना का एक हिन्दू था, पर बाद में उसने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। फ़िरोज के शासन-काल में इस महत्त्वपूर्ण स्थान को प्राप्त करने के पहले वह मुहम्मद बिन तुगलक के अधीन एक पदाधिकारी था। 1370 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके पद एवं वेतन का उत्तराधिकारी उसका पुत्र जूना शाह बना, जिसे उसकी उपाधि भी मिली। अगले साल गुजरात के सूबेदार जफ़र खाँ के मरने पर उसका पुत्र दरया खाँ उसके पद का उत्तराधिकारी बना। आगे चलकर 23 जुलाई, 1374 ई. को उसके ज्येष्ठ पुत्र फ़तह खाँ की मृत्यु हो जाने के कारण सुल्तान को कठोर आघात पहुँचा। इससे उसके मन एवं शरीर दोनों पर बुरा असर पड़ा। जैसा कि दिल्ली के अधिकतर सुल्तानों के साथ हुआ था, फ़िरोज के अन्तिम दिन शान्ति से दूर रहे। बढ़ती हुई आयु के साथ उसके विवेक ने जवाब दे दिया तथा सरकार की कार्यक्षमता घटने लगी। उसने अपने सबसे बडे जीवित पुत्र मुहम्मद खाँ को शासन-कार्य में भाग देने का प्रयत्न कर भारी भूल की। मुहम्मद खाँ एक अयोग्य युवक था। राज्य के शासन-प्रबन्ध की देखभाल करने के बदले वह विषय-सुख में लिप्त रहने लगा। सुल्तान के जीवन काल में ही एक गृह-युद्ध आरम्भ हो गया। मुहम्मद खाँ सिरमूर की पहाड़ियों की ओर भाग गया। तब फ़िरोज़ ने मुहम्मद खाँ की राजकीय उपाधि, अपनी मृत्यु से पहले अपने पौत्र तथा स्वर्गीय फतह खाँ के पुत्र तुगलक खाँ को दे दी। 20 सितंबर, 1388 ई. को उसकी मृत्यु हुई।

समकालीन भारतीय लेखक एक स्वर से फ़िरोज़ शाह के गुणों की प्रशंसा करते हैं। उनके विचार में नसिरुद्दीन महमूद के बाद कोई सुल्तान इतना न्यायशील, दयावान्, शिष्ट एवं अल्लाह से डरने वाला अथवा वैसा निर्माण करने वाला नहीं हुआ था, जैसा फ़िरोज। वास्तव में फ़िरोज हृदय के अत्युत्तम गुणों से सम्पन्न था, जैसे स्नेह एवं परोपकारिता। उसके शासन-काल में शान्ति एवं समृद्धि रही। पर उसकी विचार-शून्य उदारता एवं रियायतों ने अन्त में चलकर दिल्ली सल्तनत के पतन में अपना पूरा योग दिया। उसके जागीर-प्रथा को पुनर्जीवित करने से भी विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति उत्पन्न हुई तथा राज्य की पूर्णता को धक्का पहुँचा।

फ़िरोज़ के उत्तराधिकारी- फ़िरोज़ शाह का पौत्र तुगलक शाह उसका निकटतम उत्तराधिकारी था, उसने ग्यासुद्दीन तुगलक शाह द्वितीय की उपाधि धारण की। वह शीघ्र ही 19 फरवरी, 1369 को कुछ अधिकारियों एवं सरदारों के षड्यंत्र का शिकार बन गया। तब दिल्ली के सरदारों ने उसके चचेरे भाई अबूबकर को सुल्तान घोषित किया। इसी समय फ़िरोज़ के पुत्र नसिरुद्दीन मुहम्मद के दल के लोगों ने समाना में 24 अप्रैल, 1369 को उसे सुल्तान घोषित कर दिया। अबूबकर को अपने प्रतिद्वन्दी के सामने आत्मसमर्पण करने को विवश किया गया तथा उसे दिसंबर 1390 ई. में गद्दी से उतार डाला गया। अधिकतर विभिन्न बाधाओं से संघर्ष करते रहने की थकान से नसिरुद्दीन मुहम्मद का स्वास्थ्य गिर गया तथा जनवरी, 1394 में उसकी मृत्यु हो गयी। तब उसके पुत्र हुमायूँ का छोटा शासन-काल आया। उसकी मृत्यु अगली 8 मार्च को हो गयी। तुगलक वंश का अगला एवं अन्तिम शासक मुहम्मद का कनिष्ठ पुत्र नसिरुद्दीन महमूद था। उसके प्रतिद्वन्दी नसरत शाह ने, जो फ़िरोज के ज्येष्ठ पुत्र फतह खाँ का लड़का था, कुछ सरदारों द्वारा उकसाये जाने पर राजसिंहासन पर अधिकार करने का प्रयत्न किया, पर यह निष्फल रहा तथा वह धोखे से मार डाला गया।

फ़िरोज़ के सभी उत्तराधिकारी दुर्बल एवं दिल्ली सल्तनत को विघटन से बचाने में पूर्णतया अयोग्य थे, जिसके लक्षण पहले से ही दिखलाई पड़ने लगे। थे। वे कुछ सिद्धांत-शून्य सरदारों के हाथों में पुतले-मात्र थे। इन सरदारों के स्वार्थसाधक षड्यंत्र दिल्ली की गद्दी के प्रतिद्वन्द्वी हकदारों के बीच बहुधा गृह-युद्धों को प्रोत्साहित करते रहते थे। ये राज्य की प्रतिष्ठा एवं साधनों को बुरी तरह ले डूबे। परिणाम यह हुआ कि प्रायः सब जगह मुस्लिम सूबेदार एवं हिन्दू नायक इसकी प्रभुता की अवहेलना करने लगे। हिजड़ा मलिक सरवर ने, जिसने नसिरुद्दीन महमूद को फुसलाकर मलिकुश्शर्क(पूर्वाधिपति) की उपाधि ले ली थी, जौनपुर के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। उत्तर में खोकरों ने विद्रोह कर दिया। गुजरात, मालवा तथा खानदेश के प्रान्त स्वतंत्र राज्य बन बैठे। बियाना एवं कालपी में मुस्लिम राज्य तथा ग्वालियर में हिन्दू राज्य स्थापित हो गये। मेवात का नायक इच्छानुसार अपनी नाम-मात्र की अधीनता एक राजा से दूसरे के प्रति बदलने लगा। दोआब के हिन्दू प्राय: निरन्तर विद्रोह करने लगे।

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