नेपाल का राज्य

भारत के साथ नेपाल के सम्बन्ध का सबसे पहला ऐतिहासिक उल्लेख हमें अशोक के काल में मिलता है। ऐसी अनुश्रुति है कि अशोक अपनी पुत्री चारुमती और दामाद देवपाल के साथ नेपाल गया था जहाँ उसने अनेक स्तूपों और बिहारों का निर्माण कराया था। अशोक को ही ललितपाटन नामक नगर के निर्माण का श्रेय भी दिया जाता है। इन बातों से यह अनुमान किया जा सकता है कि अशोक का नेपाल पर भी अधिकार था। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि मौयों के बाद नेपाल भारत से स्वतन्त्र हो गया। समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति में नेपाल का उल्लेख समुद्रगुप्त के करद राज्यों में किया गया है, जिससे यह विदित होता है कि कामरूप की भांति नेपाल ने भी गुप्त सम्राट् की अधीनता स्वीकार कर ली थी, किन्तु स्वायत्त शासन का अधिकार इसने नहीं खोया था। अशोक और समुद्रगुप्त के बीच के काल में नेपाल की क्या राजनैतिक स्थिति थी, यह हमें ज्ञात नहीं। छठी शताब्दी के अन्त में हमें नेपाल के इतिहास का कुछ अधिक विश्वसनीय ज्ञान होने लगता है। कई अभिलेखों द्वारा हमें ज्ञात होता है कि सातवीं शताब्दी के प्रारम्भ में नेपाल में लिच्छवि नरेश शिवदेव का राज्य था जो वास्तव में नाममात्र का ही राजा था। धीरे-धीरे उसके महासामन्त अंशुवर्मन ने सारी शक्ति स्वयं हस्तगत कर ली। अंशुवर्मन ने नेपाल से आभीर जाति के आक्रमणकारियों को निर्वासित कर दिया था, जिससे उसकी लोकप्रियता बहुत बढ़ गई थी और शिवदेव के शासन-काल में भी राज्य-संचालन में उसका व्यक्तित्व काम कर रहा था। नेपाल के राज्य-सिंहासन को हस्तगत कर लेने के बाद अंशुवर्मन ने लिच्छवि नरेश की कन्या से विवाह करके अपनी शक्ति को सुदृढ़ किया।

नेपाल का अंशुवर्मन एक विख्यात नरेश था। उसने कैलाशकूट को अपना राजकीय निवास स्थान बनाया। ह्वेनसांग ने अंशुवर्मन का उल्लेख नेपाल के गुणवान् और विद्वान् शासक के रूप में किया है। कहा जाता है कि उसने व्याकरण की एक पुस्तक लिखी थी और उसका यश सर्वत्र फैल गया था। अंशुवर्मन ने कम से कम पैंतालीस वर्षों तक राज्य किया और कदाचित् 595 ई. से आरम्भ होने वाला एक सम्वत् चलाया।

कुछ इतिहासकारों का विचार है कि सम्राट् हर्षवर्द्धन ने नेपाल पर आक्रमण किया था और वहां पर अपना सम्वत् चलाया था। परन्तु यह धारणा भ्रमपूर्ण है कि नेपाल हर्ष के साम्राज्य में सम्मिलित था। अन्त परमेश्वरेण तुषारलैलभुवो दुर्गाया गृहीतः करः के अस्पष्ट साक्ष्य के आधार पर और नेपाल के सम्वत् को हर्ष का सम्वत् बताकर यह कहना कि शीलादित्य हर्ष नेपाल का स्वामी था, ऐतिहासिक तथ्य का प्रत्यावर्तन करना है। अंशुवर्मन ने 595 ई. में ठाकुरी संवत् चलाया था। ह्वेनसांग ने अंशुवर्मन का उल्लेख एक विद्वान् शासक के रूप में किया है। 879 ई. में नेपाल से तिब्बत के अधिपत्य का अंत हो गया। इस समय नेपाल में एक नए संवत का प्रवर्त्तन हुआ। यह संवत् नेपाल में आज भी प्रचलित है। नेपाल नरेश गुणनामदेव के साठ वर्ष के शासन-काल में, नेपाल समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ा। इसके बाद चालुक्य नरेश सोमेश्वर द्वितीय ने नेपाल पर आक्रमण किया। 12वीं शताब्दी तक नेपाल में चालुक्यों का प्रभाव बना रहा।

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