प्रान्तीय राजवंश

प्रान्तीय राजवंश: नेपाल

सन् 879 ई. तक सम्भवत: नेपाल ने तिब्बत की प्रभुता को उखाड़ फेंका तथा इसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व हो गया। इसके दो सौ वर्ष बाद तक नेपाल में शासन करने वाले राजाओं के विषय में हमें कुछ मालूम नहीं पर ग्यारहवीं सदी से नेपाल ठाकुरियों के अधीन उन्नति करने लगा। दो सौ वर्षों से अधिक तक (1097-1326 ई.) मिथिला का कर्णाटक-वंशीय राजा नान्यदेव तथा उसके उत्तराधिकारी अपनी राजधानी सिमराव से नेपाल के स्थानीय राजाओं पर एक प्रकार की ढीली प्रभुता का दावा करते रहे। 1324 ई. में तिरहुत के हरिसिंह ने, जो नान्यदेव का वंशज था, नेपाल पर आक्रमण किया। नेपाल के राजा जयरुद्र मल्ल ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। भातगाँव में अपना मुख्यालय रखकर हरिसिंह ने धीरे-धीरे सम्पूर्ण घाटी पर अपनी शक्ति को फैलाया। चौदहवीं सदी में उसके राज्य का चीन के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध था। पर साथ-साथ हरिसिंह तथा उसके वंशजों ने स्थानीय शासकों को बिना रोकटोक किये छोड़ दिया। ये स्थानीय शासक अन्य दोनों राजधानियों अर्थात् पाटन एवं काठमांडू पर अधिकार किये रहे, पर इन्होंने उनकी प्रभुता स्वीकार कर ली। लगभग 1370 ई. में मल्लराजा जयरुद्र (1320-1236 ई.) के दौहितृ-जामाता तथा जगत सिंह के जामाता जयस्थितिमल्ल ने मल्लों के राजसिंहासन पर कब्जा जमा लिया और 1382 ई. तक लगभग सारे नेपाल पर अधिकार कर लिया। जगत सिंह हरिसिंह के कर्नाट वंश का राजकुमार था। उसने जयरुद्र की पुत्री नायक देवी से विवाह किया था। तब से इस पर उसके वंशज नियमित क्रम से  राज्य करने लगे। उसके तीन पुत्र थे- धर्ममल्ल, ज्योतिर्मल्ल तथा कीर्तिमल्ल। उन्होंने राज्य को अविभक्त रखा। 1418 ई. तक नेपाल में हरिसिंह के वंशजों का अधिकार समाप्त हो गया तथा ज्योतिर्मल्ल ने सम्राट् की शक्ति का प्रयोग करने का प्रयत्न किया। 1426 ई. के लगभग ज्योतिर्मल्ल का ज्येष्ठ पुत्र यक्षमल्ल उसका उत्तराधिकारी बना, जिसने लगभग आधी सदी तक शासन किया। वह नेपाल के मल्ल शासकों में सर्वश्रेष्ठ था। पर अपने राज्य को अपने पुत्रों एवं पुत्रियों में बाँट कर उसने लगभग 1480 ई. में अपनी मृत्यु के पहले एक गलती की। इससे काठमांडू एवं भातगाँव के दो प्रतिद्वन्द्वी राज्यों का उदय हुआ, जिनके झगड़ों के कारण अन्त में 1768 ई. में गुरखों ने नेपाल जीत लिया।

प्रान्तीय राजवंश: कामरूप और आसाम

तेरहवीं सदी के प्रारम्भ में बंगाल के मुसलमानों के आगमन के समय ब्रह्मपुत्र की घाटी बहुसंख्यक स्वतंत्र राज्यों में विभक्त थी, जो एक-दूसरे के साथ लड़ते रहते थे। चुटिया (मिश्रित बोडो-शान वंश की एक जाति) राजाओं का एक वंश सुबनसिरी एवं दिसंग नदियों के पूर्व के प्रदेश पर शासन करता था। दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व का एक लम्बा संकीर्ण खंड कुछ बोडो जातियों के नियंत्रण में था और पश्चिम में एक कछाड़ी राज्य था, जो ब्रह्मपुत्र के दक्षिण तथा नवगाँव जिले के आरपार शायद आधी दूर तक फैला हुआ था। उत्तरी तट पर चुटियों के तथा दक्षिणी तट पर कछाड़ियों के पश्चिम भुइया नामक कुछ छोटे सरदारों के राज्य थे। एकदम पश्चिम में कामरूप का राज्य था, जिसकी पश्चिमी सीमा पर करतोया नदी थी तथा पूर्वी सीमा इसके अमित्र पड़ोसियों की स्थिति के अनुसार बदलती रहती थी। यह कामत के राज्य के नाम से प्रसिद्ध था। महान् शान जाति का अहोम नामक एक वर्ग तेहरवीं सदी के प्रारम्भ में ब्रह्मपुत्र की घाटी के इतिहास में एक नये तत्त्व के रूप में उपस्थित हुआ। इसने कामत राजा के पूर्वी प्रसार को रोक दिया। इसके पश्चिमी पडोसी बंगाल के मुलसमान सुल्तानों ने इसके प्रदेशों पर कई आक्रमण किये, जिनके परिणाम भिन्न-भिन्न हुए।

पंद्रहवीं सदी के प्रारम्भ में कामत में खेनों ने एक प्रबल राजतंत्रात्मक राज्य स्थापित किया। उनकी राजधानी कूचबिहार से कुछ मील दक्षिण कामतापुर में थी। खेनों ने कामत पर लगभग पचहत्तर वर्षों तक राज्य किया। उनके अन्तिम शासक नीलाम्बर को अलाउद्दीन हुसैन शाह ने लगभग 1498 ई. में हरा दिया। कुछ समय की गड़बड़ी के बाद मंगोल वंशीय कोच जाति के विश्वसिंह ने 1515 ई. के लगभग एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया। उस राजा की राजधानी कोचबिहार (आधुनिक कूचबिहार) में हुई। इस वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक विश्वसिंह का पुत्र एवं उत्तराधिकारी नर नारायण था। उसके शासनकाल में कामत के राज्य की समृद्धि बढ़ी तथा यह अपनी शक्ति की चरम सीमा पर पहुँच गया। पर 1581 ई. में वह संकोश नदी के पूर्व का अपने राज्य का भाग अपने भतीजे रघुदेव को देने को विवश हुआ। इस प्रकार कोच राज्य दो प्रतिद्वन्द्वी राज्यों में विभक्त हो गया। मुसलमान इन राज्यों को कोचबिहार एवं कोच हाजी कहते थे। उनके कलह के कारण अहोमों एवं मुसलमानों ने हस्तक्षेप किया और 1639 ई. में पश्चिमी तथा पूर्वी राज्य क्रमश: मुसलमानों तथा अहोमों के प्रभुत्व में जा पड़े।

शान जाति के एक वर्ग अहोमों ने, जो आसाम में लगभग 1215 ई. में आये थे, धीरे-धीरे अपनी स्थिति को दृढ़ किया तथा एक शक्तिशाली राजतंत्रय राज्य की स्थापना की, जो छ: सदियों तक कायम रहा। जिस युग पर हम प्रकाश डाल रहे हैं उसमें उन्होंने कामरूप के राजाओं एवं बंगाल के सुल्तानों के पूर्वी प्रसार को रोका। मुसलमानों द्वारा कामरूप के अधीन किये जाने के बाद ही अहोमों का राज्य मुस्लिम आक्रमणों के आगे झुका। इस प्रकार बंगाल का अलाउद्दीन हुसैन शाह सेना लेकर आसाम पर चढ़ दौड़ा, जब इस पर (आसाम पर) सुहेन्फा राज कर रहा था। मुस्लिम सेना की प्रारम्भिक सफलता के बावजूद इस आक्रमण का विनाशकारी अंत हुआ। तीस वर्षों से अधिक तक अहोमों तथा मुस्लिमों के बीच संघर्ष नहीं हुआ। इसका दूसरा पहलू तब आरम्भ हुआ, जब बंगाल के कुछ स्थानीय नायकों ने आसाम पर आक्रमण कर दिये। परन्तु उनके प्रयास भी सितम्बर, 1533 ई. तक असफल हो गये। इस प्रकार बंगाल के मुस्लिमों का आसाम जीतने के प्रयास सोलहवीं सदी की चौथी दशाब्दी तक असफल हो गये। इस काल के बाद का आसाम का इतिहास उचित स्थान पर दिया जायेगा।

प्रान्तीय राजवंश: मेवाड़

कुछ राजपूत राज्यों में तुर्क-अफगान-साम्राज्य के खंडित होने पर पुनरुत्थान का भाव जाग्रत हो चला था। इनमें सबसे प्रमुख मेवाड़ का गुहिल राज्य था। यहाँ राजपूत प्रतिभा अत्यंत चमक तीव्रता के साथ प्रस्फुटित हुई। पीढ़ियों तक इसने लगातार साहसी सेनापति, वीर नेता, बुद्धिमान् शासक तथा कुछ प्रसिद्ध कवि उत्पन्न किये। सातवीं सदी में ही गुहिलवंश के साहसी और शूरवीर राजपूतों ने इस प्रदेश में अपनी शक्ति स्थापित कर ली थी। हम पहले ही यह कह चुके हैं कि किस प्रकार अलाउद्दीन खल्जी ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर घेरा डाल कर उसे जीत लिया तथा किस प्रकार हमीर अथवा उसके पुत्र ने इसे मुसलमानों के हाथों से मुक्त कर अपनी जाति के खोये हुए सम्मान को पुनः प्राप्त कर लिया। हमीर पूरी आयु का होकर सम्भवः 1364 ई. में मर गया। अपने पीछे वह एक ऐसा नाम छोड़ गया, जो आज भी मेवाड में उसके एक अत्याधिक बुद्धिमान् एवं परम वीर राजा के रूप में सम्मानित होता है। अपने पुत्र क्षेत्र सिंह को वह सुस्थापित एवं विस्तृत शक्ति दे गया। क्षेत्र सिंह 1382 ई. में या उसी के लगभग एक पारिवारिक झगड़े में मारा गया। उसके बाद उसका पुत्र लाखा आया। 1418 ई. के बाद लाखा की मृत्यु होने पर उसका पुत्र मोंकल मेवाड़ की गद्दी पर बैठा; पर 1431 ई. में या उसी के लगभग उसके दो चाचाओं ने उसकी हत्या कर दी। मेवाड़ का अगला शासक राणा कुम्भा था, जो भारत के इतिहास के सबसे विख्यात शासकों में है। उसके राज्य के इतिहास में उसका शासन-काल एक महत्वपूर्ण युग था। टॉड इस प्रकार उसके कार्यों की प्रशंसा करता है- काकेशस के किनारे एवं औक्सस के तट पर जमा होने वाले झंझावार के विरुद्ध, जो उसके पौत्र साँगा के सिर पर अचानक आने वाला था, उसके (मेवाड़ के) साधनों के बढ़ाने में जो सारा अभाव था, उसे कुम्भा ने पूरा किया। उसने हमीर की स्फूर्ति, लाखा की कलारुचि तथा विस्तृत और उतनी ही अथवा अधिक सौभाग्यपूर्ण प्रतिभा के साथ अपने सभी कार्यों में सफलता प्राप्त की तथा पुन: एक बार मेवाड़ के लाल झंडे को घग्घर नदी के किनारे, जहाँ समरसी की पराजय हुई थी, खड़ा किया।  कुम्भा ने मालवा एवं गुजरात के मुस्लिम शासकों के विरुद्ध युद्ध किया। यद्यपि उसे अपने सभी साहसपूर्ण कायाँ में सफलता नहीं मिली, फिर भी वह अपने महत्त्वाकांक्षी पड़ोसियों के विरुद्ध अपनी स्थिति को बचाये रख सका।

वह एक महान् निर्माता भी था। मेवाड़ अपने कुछ अत्यन्त सुन्दर स्मारकों के लिए उसका आभारी है। मेवाड़ की रक्षा के लिऐ बनाये गये 54 दुर्गों में 36 कुम्भा के द्वारा निर्मित हुए थे। उसकी सैनिक एवं रचनात्मक प्रतिभा का सबसे अधिक देदीप्यमान स्मारक कुम्भलगढ़ का दुर्ग है जो सामरिक महत्त्व अथवा ऐतिहासिक ख्याति में किसी से घटकर नहीं है। कुम्भा का जयस्तम्भ, जिसे कीर्तिस्तम्भ भी कहा जाता है, उसकी प्रतिभा का एक दूसरा स्मारक है। राणा कवि, विद्वान् एवं निपुण संगीतज्ञ था। उसने एक ग्रन्थ एकलिंग महात्म्य की रचना की। उसके पुत्र उदयकरण ने सम्भवत: 1469 ई. में उसकी हत्या कर दी। उदय की इस निष्ठुरता ने सरदारों को थर्रा दिया। उन्होंने उसके अनुज रायमल्ल को राणा स्वीकार किया। रायमल्ल के पुत्र उत्तराधिकार के लिए आपस में लड़ने लगे। अंत में उनमें से एक संग्राम अथवा साँगा, जिस नाम से वह प्रायः पुकारा जाता था, मेवाड़ की गद्दी पर 1509 ई. में अथवा उसके लगभग बैठा। साँगा विलक्षण सैनिक पराक्रम से सम्पन्न था। उस वीर ने एक सौ युद्ध लडे थे। एक आँख से अंधे होने तथा एक पैर से लँगडे होने के अतिरिक्त उसके शरीर में अस्सी जख्मों के दाग थे। उसने मालवा, दिल्ली तथा गुजरात के विरुद्ध सफल युद्ध किया। दिल्ली सल्तनत के पतन के बाद मेवाड़ की प्रभुता स्थापित करने के ध्येय से उसने उसके (मेवाड़ के) वित्तीय साधनों एवं सैनिक बल को संगठित किया। इस प्रकार उसके तथा किसी अन्य शक्ति के बीच, जो उस समय उत्तरी भारत में प्रभुता स्थापित करने की कोशिश कर रही थी, संघर्ष अनिवार्य था। खानवा का युद्ध, इसी बात का न्यायसंगत परिणाम था।

प्रांतीय राजवंश: कश्मीर

1315 ई. में शाह मिर्जा नामक स्वात का एक मुस्लिम साहसिक कश्मीर के हिन्दू राजा की नौकरी में नियुक्त हुआ। राजा शीघ्र ही मर गया। 1320 में मंगोल आक्रमणकारी दलूचा ने यहाँ हमला किया। दलूचा के आक्रमण के बाद कश्मीर से हिन्दू शासन का खात्मा हो गया। शाह मिर्जा ने 1339 अथवा 1346 ई. में शम्शुद्दीन शाह के नाम से कश्मीर की गद्दी पर अधिकार कर लिया तथा अपने नाम के सिक्के ढलवाने और खुत्बा पढ़वाने लगा। उसने अपनी नव-प्राप्त शक्ति का बुद्धिमानी से प्रयोग किया। 1339 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसके पुत्र जमशीद, अलाउद्दीन, शहबुद्दीन एवं कुतुबुद्दीन क्रमश: लगभग छियालीस वर्षो तक राज्य करते रहे। 1394 ईं में कुरुबुदीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सिकन्दर कश्मीर के सिंहासन पर बैठा।

तैमूर के भारत-आक्रमण के समय सिकन्दर राज्य कर रहा था। उसने उसके साथ दूत-विनिमय भी किया, यद्यपि वे दोनों कभी एक-दूसरे से नहीं मिले। वह अपने धर्म के लोगों के प्रति उदार था। फारस, अरब तथा मेसोपोटामिया से बहुत-से प्रकांड मुस्लिम विद्वान् उसके दरबार में एकत्र होते थे। पर उसका सामान्य ढंग उदार नहीं था। माना जाता है कि इसका मंत्री सुहाभट्ट हुआ। सुहाभट्ट ने इस्लाम धारण कर हिन्दुओं को घाटी छोड़ कर जाने का आदेश दिया। कई मंदिर नष्ट कर दिए गए। बाईस वर्ष एवं नौ महीने राज्य करने के पश्चात् 1416 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। तत्पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र अली शाह कुछ वर्षों तक राज्य करता रहा। पीछे उसका भाई शाही खाँ उसे पराजित कर जून, 1420 ई. में जैनुल आबदीन (Zain-ul-Abidin) की उपाधि ले गद्दी पर बैठ गया।

जैनुल आबदीन परोपकारी, उदार एवं ज्ञानी शासक था। उसने स्थानीय अपराधों के लिए ग्रामीण मंडलियों के उत्तरदायित्व के सिद्धान्त को लागू कर अपने राज्य में चोरी एवं आम पर होने वाली डकैती को कम करने की यथाशक्ति कोशिश की। उसने वस्तुओं का मूल्य निश्चित किया और लोगों पर कर के बोझ को हल्का किया। उसके पूर्वगामियों के राज्य-कालों में सिक्कों की धातु में खोट मिलायी गयी थी, पर वह उन्हें फिर पूर्वावस्था में ले आया। उसके सार्वजनिक कार्यों से उसकी प्रजा का बड़ा उपकार हुआ। वह उदार विचारों वाला पुरुष था। वह अन्य धर्मावलम्बियों के प्रति विलक्षण सहिष्णुता प्रदर्शित करता था। उसने अपने पिता के समय में राज्य छोड़कर गये ब्राह्मणों को वापस बुलाया, अपने समाज में विद्वान् हिन्दुओं को प्रविष्ट किया, जजिया कर उठा दिया तथा सब को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की। अपनी भाषा के अतिरिक्त उसे फारसी, हिन्दी तथा तिब्बती का अच्छा ज्ञान था। वह साहित्य, चित्रकारी तथा संगीत को प्रश्रय देता था। उसकी प्रेरणा से महाभारत एवं राजतरंगिणी का संस्कृत से फारसी में तथा कई अरबी और फारसी पुस्तकों का हिन्दी भाषा में अनुवाद हुआ। इस प्रकार, इन सभी गुणों के लिए, यथार्थ ही उसका कश्मीर के अकबर के रूप में वर्णन किया गया है, यद्यपि वह उससे (अकबर से) व्यक्तिगत चरित्र के कुछ लक्षणों में भिन्न था। उसके स्थापत्य का एकमात्र नमुना जैन उल-लंका है जो वूलर झील के पास बनाया गया था। यह इतिहास में बड़शाह के नाम से प्रसिद्ध है। 1470 ई. के नवम्बर अथवा दिसम्बर में उसकी मृत्यु हो गयी तथा उसका पुत्र हैदरशाह उसका उत्तराधिकारी बना।

कश्मीर के उत्तरकालीन सुल्तानों का इतिहास नीरस तथा महत्वहीन है। जैनुलआबेदीन की मृत्यु के पश्चात् नाममात्र के शासकों के अधीन, जिन्हें आत्मोत्कर्ष और लूट के उद्देश्यों से प्रधानता चाहने वाले विभिन्न दलों के षड्यंत्रों के चिन्ह स्वरूप गद्दी पर बैठाया गया था, अराजकता आरम्भ हो गयी। 1540 ई. के अन्त में हुमायूँ के एक सम्बन्धी मिर्जा हैदर ने कश्मीर को जीत लिया। वह इस पर सिद्धान्त रूप में हूमायूँ की ओर से, पर व्यवहार में स्वतंत्र शासक की तरह, शासन करता रहा। 1551 ई. मे कश्मीर के सरदारों ने उसे उखाड़ फेंका। उनके षड्यंत्र तथा कलह पुनः आरम्भ हो गये। 1555 ई. के लगभग चक्कों ने कश्मीर की गद्दी को हथिया लिया, पर उपद्रवग्रस्त राज्य को कोई आराम न मिला। अकबर के समय में यह राज्य मुग़ल-साम्राज्य में मिला लिया गया।

प्रान्तीय राजवंश: गुजरात Provincial Dynasty: Gujarat

गुजरात प्रान्त के विशाल धन के कारण, जो विशेषत: खंभात, सूरत तथा भडौंच के समृद्ध बन्दरगाहों से होकर किए जाने वाले क्रियाशील वाणिज्य से हुआ था, उस पर बार-बार बाहरी हमले हुआ करते थे। अलाउद्दीन खल्जी ने इसे 1297 ई. में दिल्ली सल्तनत में मिला लिया। तब से बहुत समय तक दिल्ली के सुल्तानों द्वारा नियुक्त मुस्लिम सूबेदार इस पर शासन करते रहे। पर 1401 ई. में जफर खाँ (एक राजपूत से मुसलमान बने हुए का पुत्र) ने, जिसे फीरोज तुगलक के कनिष्ठ पुत्र मुहम्मद शाह ने 1391 ई. में उस प्रान्त का शासक नियुक्त किया था, विधिवत् स्वतंत्रता धारण की। 1403 ई. में जफर खाँ के पुत्र तातार खाँ ने कुछ असन्तुष्ट सरदारों के साथ षड्यंत्र कर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, उसे असावल में बंदी बना लिया तथा नसिरुद्दीन मुहम्मद शाह के नाम से अपने को राजा घोषित कर दिया। वह अपना अधिकार स्थापित करने के लक्ष्य से दिल्ली की ओर भी बढ़ा, पर उसके चाचा एवं संरक्षक शम्स खाँ ने उसे मौत के घाट उतार डाला। इससे जफर खाँ गद्दी पुनः प्राप्त करने तथा सुल्तान मुजफ्फर शाह की उपाधि धारण करने में समर्थ हो गया। मुजफ्फर शाह ने मालवा के सुल्तान हुशंग शाह के विरुद्ध सफल युद्ध किया तथा धार को जीत लिया। जून, 1411 ई. में उसकी मृत्यु हुई। उसके पश्चात् उसका पौत्र एवं भावी उत्तराधिकारी अहमद शाह गद्दी पर बैठा। अहमद उचित ही गुजरात की स्वतंत्रता का वास्तविक संस्थापक समझा गया है। वह पर्याप्त साहस एवं स्फूर्ति से सम्पन्न था। लगभग तीस वर्षों के अपने पूरे शासनकाल में वह अपने राज्य की सीमाओं को बढ़ाने में व्यस्त रहा, जो उसके दोनों पूर्वगामियों के शासनकालों में असावल के निकट एक छोटे क्षेत्र में परिमित हो गया था। मालवा के सुल्तान तथा असीरगढ़, राजस्थान एवं अन्य पाश्र्ववर्ती प्रदेशों के नायकों के साथ युद्धों में उसे बराबर सफलता प्राप्त हुई। उसने अपने राज्य के असैनिक प्रशासन को सुधारने पर भी ध्यान दिया। वह निष्पक्ष होकर न्याय करता था। अपने शासनकाल के प्रथम वर्ष में असावल के प्राचीन नगर के स्थान पर उसने अहमदाबाद के सुन्दर नगर का निर्माण किया तथा वहीं उसी स्थान पर अपनी राजधानी ले गया, जो आज तक उसकी रुचि एवं उदारता का साक्षी है। उसका एकमात्र दोष उसकी धार्मिक असहिष्णुता थी। 16 अगस्त, 1442 ई. को उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद शाह गद्दी पर बैठा, जो अपनी मृत्यु (10 फरवरी, 1451 ई.) तक राज्य करता रहा। उसके बाद मुहम्मद शाह के पुत्र कुत्बुद्दीन अहमद एवं मुहम्मद के भाई दाऊद नामक दो दुर्बल शासक आये। गद्दी पर बैठने के कुछ ही दिनों के अन्दर अपने बुरे तरीकों के कारण दाऊद सरदारों की सहानुभूति से हाथ धो बैठा। उन्होंने उसे गद्दी से उतारकर, उसके भतीजे और अहमद शाह पौत्र अबुल फतह खाँ को, महमूद के नाम से, गद्दी पर बैठाया। उसे सामान्यत: बैगरा कहा जाता है।

मुहम्मद बैगरा निस्संदेह अपने वंश का सबसे विख्यात सुल्तान था। उसके राज्य का एक प्रमुख मुस्लिम इतिहासकार लिखता है कि- उसने गुजरात राज्य की महिमा और ज्योति बढ़ायी। वह अपने पूर्वगामियों एवं उत्तरगामियों सहित गुजराती राजाओं में सर्वश्रेष्ठ था। चाहे प्रचुर न्याय और उदारता के लिए हो या इस्लाम एवं मुसलमानों के कानूनों के प्रचार के लिए, चाहे बचपन, प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था में एक समान निर्णय के ठोसपन के लिए हो या शक्ति, वीरता एवं विजय के लिए, वह श्रेष्ठता का आदर्श था। अपेक्षाकृत कम उम्र में गद्दी पर बैठाने पर भी, उसने तुरंत अपने राज्य-कार्य के प्रबन्ध को अपने ही हाथों में ले लिया तथा अपने विरोधी दरबारियों को पराजित कर दिया, जिन्होंने उसके भाई हसन खाँ का गद्दी पर बैठने का षड्यंत्र रच रखा था। उसने लगभग तिरपन वर्षों तक किसी मंत्री अथवा अन्त:पुर के प्रभाव में आये बिना उद्यम से राज्य किया। वीर सैनिक होने के कारण उसे अपने सभी आक्रमणों में सफलता मिली। उसने निजाम शाह बहमनी की मालवा के महमूद खल्जी के आक्रमण से रक्षा की, कच्छ के सूम्रा एवं सोधा नायकों को हराया, जगत (द्वारका) के सामुद्रिक डाकुओं को दबाया तथा जूनागढ़ एवं चम्पानेर के मजबूत दुर्गों को जीत चम्पानेर का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रख दिया। उसकी विजयों के फलस्वरूप गुजरात का राज्य अपनी चरम सीमाओं तक पहुँच गया। यह राज्य “मांडू की सभाओं से लेकर जूनागढ़ होते हुए सिंध की सीमाओं तक, जालोर और नागौड़ होकर शिवालिक पर्वत तक, बलगाना होकर नासिक अम्बक तक, बुरहानपुर से लेकर दक्कन में बाराह एवं मलकापुर तक, बुरहानपुर की और करकून एवं नर्मदा नदी तक, ईडर की और चितौड़ एवं कुम्भलगढ़ तक तथा समुद्र की ओर चौल की सीमाओं तक फ़ैल गया। अपने शासनकाल के अंत में मिस्र के सुलतान कस्नावा-अल-गौरी के साथ मिलकर उसने भारतीय सागरों में पुर्तगीज की उभरती हुई शक्ति को रीकने की कोशिश की। इन पुर्तगीजों ने वास्कोडिगामा द्वारा 1498 ईं में अंतरी मार्ग (यूरोप से उत्तमाशा अंतरीप होकर भारत पहुँचने का समुद्र-मार्ग) का पता लगाए जाने के 10 वर्षों के अन्दर ही लाल सागर एवं मिस्र से होने वाले मसाले के लाभदायक व्यापार पर प्रायः एकाधिकार स्थापित कर लिया था। इससे मुस्लिम व्यापारियों एवं पश्चिम भारत के खम्भात एवं चौल जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों के हितों पर क्षति पहुंची थी। जद्दा के शासक अमीर हुसैन कुर्द के अधीन मिस्र के बेड़े तथा गुजरात के दरबार में काम पाए हुए एक तुर्क मालिक अयाज के अधीन भारतीय सैन्यदल ने एक पुर्तगीज बेड़े को जिसका सेनापतित्व पुर्तगीज राजप्रतिनिधि फैन्सेस्को डी अलमिडै का पुत्र डोम लौरेंसो कर रहा था, बम्बई से दक्षिण चौल के निकट 1508 ई. में हरा दिया पर 1509 ई. में पुर्तगीजों ने दीव के निकट मिलेजुले मुस्लिम बेड़े को करारी हार दी  और सामुद्रिक तट पर अपना नाविक प्रभुत्व पुनः प्राप्त कर लिया। महमूद ने उन्हे दीव में कारखाने (फैक्ट्री) के लिए भूमि दी, माना जाता है की इसने दो किलों को जीता था इसलिए इसका नाम बेगडा पड़ा। ये किले गिरनार और चम्पानेर थे। उसने गिरनार का नाम मुस्तफाबाद और चम्पानेर का नाम मोहम्मदाबाद रखा। इसका दरबारी कवि उदयराज था जिसने राजा विनोद नामक ग्रन्थ लिखा। यह महमूद बेगड़ा की जीवनी है। माना जाता है कि बचपन से ही उसे विष देकर पाला गया था इसलिए उसके शरीर पर बैठने वाली मक्खी भी मर जाती थी।

23 नवम्बर, 1511 ई. मो. महमूद बैगरा की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र मुजफ्फर द्वितीय को गद्दी मिली। मुजफ्फर द्वितीय ने राजपूतों के विरुद्ध सफल युद्ध किये तथा मालवा के महमूद खल्जी को पुन: उसकी गद्दी पर बैठा दिया! 7 अप्रैल, 1526 ई. को मुजफ्फर की मृत्यु के पश्चात् सिकन्दर तथा नासिर खाँ महमूद द्वितीय नामक उसके पुत्रों के दो छोटे महत्वहीन शासनकाल आते हैं। अंत में उसी वर्ष जुलाई महीने में उसके अत्याधिक साहसी पुत्र बहादुर ने गद्दी पर अधिकार कर लिया।

बहादुर अपने दादा के समान साहसी एवं युद्धप्रिय था। वह मध्यकालीन भारत के इतिहास में एक विख्यात शासक था। उसने न केवल मालवा के महमूद द्वितीय को परास्त कर 1531 ई. में उसके राज्य को अपने राज्य में मिला लिया, बल्कि अपने खानदान के पुराने शत्रु मेवाड़ के राणा के प्रदेशों को रौद डाला तथा 1534 ई. में चित्तौड़ को तहस-नहस कर दिया। पर हुमायूँ के विरुद्ध लड़े गये युद्धों में भाग्य ने उसका साथ नहीं दिया। उसे नव-विजित मालवा प्रान्त ही नहीं, बल्कि अपने राज्य के अधिकतर भाग से हाथ धोना पड़ा। पर दिल्ली की सेना के लौट जाने पर बहादुर ने अपने राज्य को पुनः प्राप्त कर लिया तथा पुर्तगीजों के निकालने के लिए कटिबद्ध हो गया। उसने पुर्तगीजों से मुगलों के विरुद्ध सहायता माँगी थी, पर नहीं मिली। पुर्तगीज शासक नुन्हो-डा-कुन्हा को अपने पास बुलाने में असफल हो, वह स्वयं फरवरी, 1537 ई. में उससे मिलने अपने जहाज पर चला। पर पुर्तगीजों ने उसे छलपूर्वक डुबो दिया तथा उसके सभी साथियों को मार डाला। बहादुर की मृत्यु के बाद उसके दुर्बल उत्तराधिकारियों के अधीन जो प्रतिद्वन्द्वी सरदारों के दलों के हाथों के कठपुतले मात्र थे, गुजरात में अराजकता और गड़बड़ी का तांडव नृत्य करने में लगा। इसलिए अकबर ने इसे 1572 ई. में आसानी से मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया।

प्रान्तीय राजवंश: मालवा Provincial Dynasty: Malwa

मालवा पर अलाउद्दीन खल्जी ने 1305 ई. में अधिकार कर लिया था। तब से यह दिल्ली के अधीन मुस्लिम नायकों के शासन में रहा। तैमूर के आक्रमण के बाद की अव्यवस्था के युग में यह, अन्य प्रान्तों के समान, स्वतंत्र बन गया।

दिलावर खाँ गौरी जिसे शायद तुगलक वंश के फीरोज ने मालवा का शासक नियुक्त किया था, 1401 ई. में दिल्ली के सुल्तान से व्यवहारिक रूप में स्वतंत्र हो गया, यद्यपि उसने कभी विधिवत् उसकी अधीनता को अस्वीकार नहीं किया और न राजत्व की पदवी को ही धारण किया। 1406 ई. में उसके बाद उसका महत्त्वाकांक्षी पुत्र अल्प खाँ आया, जो हुशंग शाह के नाम से सिंहासन पर बैठा। नया शासक विरामहीन प्रवृत्ति का मनुष्य था। उसे साहसपूर्ण कार्यों एवं युद्ध में आनन्द मिलता था, जिनमें वह अपने शासन काल भर बराबर व्यस्त रहा। 1422 ई. में एक व्यापारी के वेश में वह अपनी राजधानी से उड़ीसा को चल पड़ा तथा उस राज्य के आशंका-राहित राजा पर अचानक हमला कर दिया। उससे रिश्वत के रूप में पचहत्तर हाथी लेकर वह वापस आया। मालवा लौटते समय हुशंग ने खेरला को जीत लिया तथा उसके राजा को बंदी बनाकर ले आया। उसे दिल्ली, जौनपुर एवं गुजरात के सुल्तानों से लड़ना पड़ा। एक बार उसे अहमदशाह बहमनी से भी अपनी ताकत आजमानी पड़ी, जो उसकी खेरला की विजय से क्रुद्ध हो गया था क्योंकि उस स्थान का राजा पहले बहमनी राज्य के अधीन रह चुका था। पर अधिकांश आक्रमणों में उसी की पराजय अथवा बरबादी हुई। 6 जुलाई, 1435 ई. को उसकी मृत्यु हो गयी। तब उसका ज्येष्ठ पुत्र गजनी खाँ, मुहम्मद शाह के नाम से, मालवा का सुल्तान घोषित किया गया। पर नया शासक राज्य के कार्यों से पूर्णतः असावधान था। उसके मंत्री महमूद खाँ ने मई, 1436 ई. में गद्दी हड़प ली। इस प्रकार मालवा के खल्जी सुल्तानों का वंश स्थापित हुआ। महमूद ने सरदारों के एक गुट एवं गुजरात के अहमदशाह प्रथम के, जिसने मालवा के मुहम्मद शाह के एक पुत्र मसूद खाँ का पक्ष ले रखा था, विरोध को निष्फल कर दिया।

महमूद खल्जी एक वीर योद्धा था। उसने गुजरात के अहमद शाह प्रथम, दिल्ली के मुहम्मद शाह, मुहम्मद शाह तृतीय बहमनी एवं मेवाड़ के राजा कुम्भ के विरुद्ध युद्ध किया। वह मुस्लिम सुल्तानों के साथ किये गये युद्धों में असफल रहा। मेवाड़ के राणा के साथ उसका युद्ध निर्णयात्मक प्रतीत होता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि उभय पक्ष विजय का दावा करने लगे। मेवाड़ के राजा ने चित्तौड़ में, विजय-स्तंभ बनवाया और मालवा के सुल्तान ने अपनी विजय के स्मरणार्थ मांडू में एक सात महलों वाला स्तम्भ स्थापित किया। निस्सन्देह महमूद खल्जी मालवा के मुस्लिम शासकों में सबसे अधिक योग्य था। उसने अपने राज्य की सीमाओं को दक्षिण में सतपुड़ा पर्वत श्रेणी तक, पश्चिम में गुजरात की सरहद तक, पूर्व में बुन्देलखंड तक तथा उत्तर में मेवाड़ एवं हरौती तक बढ़ाया। उसकी ख्याति भारत के बाहर फैल गयी। मिश्र के खलीफा ने उसके पद को स्वीकार किया तथा महमूद खल्जी ने सुल्तान अबू सईद के यहाँ से आये एक दूतमंडल का स्वागत किया। वह न्यायी एवं क्रियाशील प्रशासक था। फरिश्ता इस प्रकार उसके गुणों की प्रशंसा करता है- सुल्तान महमूद नम्र, वीर, न्यायी एवं विद्वान् था। उसके राज्यकाल में उसकी प्रजा-मुसलमान एवं हिन्दू-प्रसन्न थी तथा उनका एक दूसरे से मित्रवत् सम्बन्ध था। कोई भी ऐसा वर्ष नहीं बीतता था, जिसमें वह युद्ध नहीं करता रहा हो। फलस्वरूप उसका खेमा उसका घर बन गया तथा युद्धक्षेत्र उसका विश्राम-स्थल। अपने अवकाश के घंटे वह संसार के विभिन्न राजाओं के दरबारों के इतिहास एवं संस्मरण पढ़वाकर सुनने में लगाता था। लगभग चौंतीस वर्षों तक राज्य करने के बाद 68 वर्ष की उम्र में 1 जून, 1469 ई. को माण्डू में उसकी मृत्यु हो गयी।

महमूद का ज्येष्ठ पुत्र ग्यासुद्दीन अपने पिता की मृत्यु के दो दिनों के बाद मालवा की गद्दी पर बैठा। वह शान्ति-प्रेमी था। वह धर्मनिष्ठ मुस्लिम था तथा अपनी दैनिक प्रर्थना में सावधान था। वह सभी मादक पदार्थों एवं वर्जित खाद्य पदार्थों से दूर रहता था। पर अब्दुल कादिर नासिरुद्दीन एवं शुजात खाँ अलाउद्दीन नामक उसके दोनों पुत्रों में कलह होने के कारण उसके अन्तिम दिन दु:खदायी बन गये। अन्त में अब्दुल कादिर नसिरुद्दीन ने 1500 ई. में गद्दी पर अधिकार कर लिया। नसिरुद्दीन 1510 ई. में अपनी मृत्यु होने तक अपनी शक्ति का बहुत दुरुपयोग करता रहा। तब उसका दूसरा पुत्र महमूद द्वितीय के नाम से सिंहासन पर बैठा। मुस्लिम सरदारों के प्रभाव से छुटकारा पाने के उद्देश्य से महमूद द्वितीय ने चंदेरी के शक्तिशाली राजपूत नायक मेदिनी राय को मंत्री के पद पर नियुक्त किया। मेदिनी राय ने शीघ्र राज्य में सर्वोच्च प्रभाव जमा लिया तथा विश्वास एवं उत्तरदायित्व के पदों पर हिन्दुओं को नियुक्त करने लगा। इससे मालवा के सरदारों में विद्रोह भड़क उठा। उन्होनें गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह द्वितीय की सहायता से उस राजपूत मंत्री को हटा दिया। पर मेदिनी राय ने चित्तौड़ के राणा साँगा की सहायता से महमूद द्वितीय को ही हटा डाला। विजयी राजपूतों ने मालवा के सुल्तान को पकड़ लिया। पर राणा साँगा ने उसके साथ वीरतापूर्ण उदारता का व्यवहार किया, जो राजपूत जाति की विलक्षणता है तथा अपने विजित शत्रु को अपने राज्य में पुन: स्थापित कर दिया। पर इस समय तक मालवा राज्य की ताकत बहुत घट गयी थी तथा इसकी स्वतंत्रता के दिन गिने थे। सुल्तान महमूद द्वितीय ने राणा साँगा के उत्तराधिकारी राणा रतन सिंह के राज्य पर आक्रमण कर उससे शत्रुता मोल ले ली। राणा ने बदला लेने के उद्देश्य से मालवा पर आक्रमण कर दिया। वह गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के छोटे भाई एवं उसकी गद्दी के प्रतिद्वंद्वी चाँद खाँ को शरण देकर उसका भी कोपभाजन बन बैठा। इस पर बहादुरशाह ने 17 मार्च, 1531 ई. को मांडू जीत लिया। इस तरह मालवा की स्वतंत्रता जाती रही। यह गुजरात के बहादुरशाह के अधीन हो गया। पीछे कुछ काल के लिए मुग़ल शासक हुमायूँ ने इस पर कब्जा कर लिया। 1535 ई. के लगभग मल्लू खाँ ने, जो पहले मालवा के खल्जी सुल्तानों का एक पदाधिकारी था, कादिर खाँ के नाम से, मालवा में प्रभुसत्ता स्थापित कर ली, पर 1542 ई. में दिल्ली के अफगान शासक शेरशाह ने उसे गद्दी से उतार दिया। मालवा पर अफगान सरकार के प्रतिनिधि शासन करते रहे, किन्तु 1561-1562 ई. में मुग़ल सेनापतियों ने इसे बाज बहादुर से छीन लिया।

प्रान्तीय राजवंश: उड़ीसा Provincial Dynasty: Orissa

उड़ीसा को एक शक्तिशाली राज्य के रूप में अनन्तवर्मन् चोडगंग ने अपने सत्तर वर्षों से भी अधिक लम्बे राज्यकाल (करीब 1076-1148 ई.) में संगठित किया था। अनेक अभिलेखों से यह पता चलता है कि उस समय राज्य गंगा के मुहाने से दक्षिण में गोदावरी के मुहाने तक फैला था। शान्ति के क्षेत्र में भी चोडगंग की सफलताएँ अपूर्व रहीं। वह धर्म तथा संस्कृत एवं तेलुगु साहित्य का आश्रयदाता था। पुरी का विशाल जगन्नाथ मंदिर उसके राज्य काल में उड़ीसा की कलात्मक शक्ति एवं समृद्धि के देदीप्यमान स्मारक के रूप में खड़ा है। चोडगंग के उत्तराधिकारियों ने सफलतापूर्वक मुसलमानों के आक्रमणों को रोका तथा अपने राज्य की समृद्धि को बनाये रखा। उनमें सबसे विख्यात था नरसिंह प्रथम (1238-1264 ई.), जिसने, बंगाल के मुस्लिमों के विरुद्ध विलक्षण सफलता पाने के अतिरिक्त, शायद पुरी के जगन्नाथ मंदिर के निर्माण को पूरा किया तथा जिले के कोणार्क में सूर्य देवता का विशाल मंदिर बनावाया। नरसिंह की मृत्यु के पश्चात् इस वंश की भाग्य-लक्ष्मी क्षीण होने लगी। लगभग 1434-1435 ई. में एक सूर्यवंशी ने इसे उखाड़ फेंका तथा उड़ीसा में एक सदी से अधिक तक राज्य करता रहा।

नये वंश का संस्थापक कपिलेन्द्र बहुत योग्यता एवं शक्ति से सम्पन्न था। उसने उड़ीसा के राज्य की प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित कर दिया, जो उत्तरकालीन गंगों के शासनकाल में धूल में मिल गयी थी। उसने अपने देश के प्रबल विद्रोहियों का दमन किया, बीदर के बहमनियों एवं विजयनगर के शासकों के साथ सफलतापूर्वक लड़ा तथा अपने राज्य को गंगा से कावेरी तक बढ़ाने में सफल हुआ। यही नहीं, वह बहमनी राज्य के मध्य में बीदर के पाश्र्व तक अपनी विजयी सेना लेकर पहुँच गया। गोपीनाथपुर के अभिलेख में लिखा हुआ है कि उसने विजयनगर के एक राजप्रतिनिधि की राजधानी उदयगिरि तथा कांजीवरम् (कांची) पर अधिकार कर लिया। अगले शासक पुरुषोत्तम (1470-1497 ई.) के राज्य काल में प्रारम्भ में कुछ अव्यवस्था हुई। इसमें उड़ीसा के राज्य ने अपना दक्षिणी आधा मार्ग, जो गोदावरी से नीचे पड़ता था, खो दिया। सालुव नरसिंह ने कृष्णा के दक्षिण के भाग पर अधिकार कर लिया तथा बहमनियों से गोदावरी-कृष्णा दोआब को ले लिया, पर अपने शासनकाल के अन्त में पुरुषोत्तम दोआब को फिर ले लिया तथा आंध्र देश के एक भाग को-आधुनिक गुंटूर जिले तक-पुनः प्राप्त कर लिया। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उसने कपिलेन्द्र के साम्राज्य के तमिल जिलों को पुनः जीता या नहीं।

पुरुषोत्तम का पुत्र एवं उत्तराधिकारी प्रतापरुद्र (1497-1540 ई.) चैतन्य का समकालीन एवं शिष्य था। उसे (अपने पूर्वगामी) ऐसा राज्य मिला, जो पश्चिम बंगाल के हुगली एवं मिनापुर जिलों से लेकर आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले तक फैला था तथा जिसमें तेलंगाना की उच्च भूमि का एक भाग भी सम्मिलित था। पर विजयनगर के कृष्णदेव राय तथा पूर्वी तट पर गोलकुंडा के बढ़ते हुए कुतुबुशाही राज्य के आक्रमणों के कारण इसका अधिक समय तक यह विस्तार बनाये रखना नहीं बदा था। तीन आक्रमणों के फलस्वरूप प्रतापरुद्र को विजयनगर के अपने अधिक शक्तिशाली समकालीन शासक को अपने राज्य का वह भाग सौंपना पड़ा, जो गोदावरी के दक्षिण में था। गोलकुंडा के सुल्तान कुली कुतुब शाह ने 1522 ई. में उड़ीसा राज्य पर आक्रमण किया।

कुछ का विश्वास है कि उड़ीसा का यह राजनैतिक पतन चैतन्य द्वारा प्रचारित वैष्णव धर्म के फलस्वरूप उसके शासकों एवं लोगों में फौजी जोश के अभाव के कारण हुआ। चाहे जो कुछ भी हो, पर यह सच है कि सोलहवीं सदी के प्रारम्भ से उड़ीसा राज्य की पुरानी शक्ति जाती रही। 1541-1542 ई. के लगभग कपिलेन्द्र के वंश को भोई-वंश ने उखाड़ फेंका। इस वंश का यह नाम इसलिए पड़ा कि इसका संस्थापक गोविन्द, जो पहले प्रतापरुद्र का एक मंत्री था, भोई अथवा लेखक जाति का था। गोविन्द, उसके पुत्र तथा दो पौत्रों ने लगभग अठारह वर्षों तक राज्य किया। इस वंश को लगभग 1559 ई. में मुकुन्द हरिचन्दन ने निकाल दिया। मुकुद हरिचन्दन ने 1568 ई. में अपनी मृत्यु तक उड़ीसा के राज्य को मुस्लिम-आक्रमणों से बचाने का भरसक प्रयत्न किया। अकबर ने भी बंगाल के अफगानों पर दोनों ओर से आक्रमण करने की अपनी नीति का अनुसरण करते हुए उससे मित्रता करनी चाही। बंगाल के कररानी सुल्तानों ने 1568 ई. में उड़ीसा को अपने राज्य में मिला लिया। कहा जाता है कि हिन्दू धर्म-त्यागी काला पहाड़ ने, जो सुलेमान कररानी के पुत्र बायजीद के साथ उड़ीसा गया था, जगन्नाथ के मंदिर को अपवित्र कर दिया तथा लकड़ी की मूर्तियों को नष्ट करने तक की कोशिश की। इसके बाद उड़ीसा पर अधिकार करने के लिए मुगलों तथा अफगानों की बीच संघर्ष प्रारंभ हो गया।

प्रान्तीय राजवंश: बंगाल Provincial Dynasty: Bengal

बंगाल

बंगाल पर दिल्ली के सुल्तानों का अधिकार सदैव अनिश्चित रहा तथा यह सर्वप्रथम स्वतंत्रता स्थापित करने वाले राज्यों में एक था। दिल्ली से इसकी दूरी एवं इसकी अत्याधिक सम्पत्ति से प्राय: इसके शासकों को केन्द्रीय शक्ति के विरुद्ध विद्रोह करने का लोभ हो जाता था, जिसके कारण, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, इल्तुतमिश एवं बलबन को बहुत कष्ट रहा। दिल्ली सरकार का अधिकार फिर ग्यासुद्दीन तुगलक के समय में स्थापित हुआ। ग्यासुद्दीन तुगलक ने ग्यासुद्दीन बहादुर शाह को पराजित कर प्रान्त को तीन स्वतंत्र प्रशासनिक विभागों में बाँट दिया, जिनकी राजधानियाँ क्रमश: लखनौती, सातगाँव एवं सोनार गाँव में हुई। राजसिंहासन पर बैठते ही मुहम्मद बिन तुगलक ने कद्र खाँ को लखनौती की सरकार और हज्जुद्दीन आजूमुलमुल्क को सातगाँव की सरकार में नियुक्त किया तथा ग्यासुद्दीन बहादुर शाह को सोनारगाँव की सरकार में फिर से बहाल किया, किन्तु अपने दूध-भाई (धात्री-पुत्र) तारतार खाँ को, जो बहराम खाँ के नाम से अधिक प्रसिद्ध है, उसके संग कर दिया। पर बंगाल के इस विभाजन से उस प्रांत के पुराने रोग दूर नहीं हुए। ग्यासुद्दीन बहादुर ने शीघ्र विद्रोह कर दिया तथा सोनारगाँव एवं ग्यासपुर की टकसालों से सिक्के निकाले। पर वह शीघ्र परास्त होकर मार डाला गया और बहराम खाँ सोनारगाँ, सात गाँव तथा अस्थायी रूप से लखनौती का अकेला शासक बना। 1336 ई. में बहराम खाँ की मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसके सिलाहबरदार या सिलाहदार (कवच ले जाने वाले) फखरुद्दीन ने फौरन अपने को फखरुद्दीन मुबारक शाह के नाम से सोनारगाँव का शासक घोषित कर दिया। शीघ्र ही अलाउद्दीन अली शाह (1339-1345 ई.) उत्तर बंगाल में स्वतंत्र हो गया तथा अपनी राजधानी को लखनौती से हटाकर पाण्डुआ ले गया। फखरुद्दीन के सिक्के उत्तमकोटि के थे। इनका वर्णन सिक्का गढ़ने की कला के वास्तविक रत्नों के रूप में किया गया है और इनसे सोनारगाँव के कलाकारों की निपुणता के बारे में पता चलता है। इनका आकार नियमित है, इन पर खुदे अक्षर आश्चर्यजनक ढंग से स्पष्ट एवं सुडौल हैं और इनके चारों ओर परिष्कृत रुचि की छाप है। कुछ सिक्कों के प्रमाण पर यह दृढ़तापूर्वक स्वीकार किया गया है कि दस वर्षों के लगातार शासन के बाद फखरुद्दीन मुबारक शाह की स्वाभाविक मृत्यु हो गयी। उसके बाद सोनार गाँव की गद्दी पर इख्तियारुद्दीन गाजी शाह बैठा, जो संभवत: उसका पुत्र था।

अन्त में अलाउद्दीन अलीशाह का दूध-भाई (धात्रीपुत्र) हाजी इलियास 1345 ई. के लगभग, शम्सुद्दीन इलियास शाह के नाम से, सम्पूर्ण बंगाल प्रान्त का स्वतंत्र शासक बन बैठा। सिंहासन पर बैठने के शीघ्र बाद उसने विभिन्न दिशाओं में अपनी शक्ति बढ़ायी। उसने 1350 ई. में नेपाल पर भी आक्रमण किया और वहाँ के अनेक नगर नष्ट किये। ऐसा प्रतीत होता है कि 1352 ई. में सोनारगाँव के पूर्वीय राज्य को मिला लेने के बाद, उसने उड़ीसा एवं तिरहुत के राज्यों से कर वसूल किया तथा बनारस तक बढ़ गया। उसने कामरूप के भागों को भी अपने राज्य में मिला लिया। इस प्रकार उसके काम दिल्ली के लिए उसकी पूर्वी सीमा पर संकटजनक सिद्ध हुए। उसी के राज्यकाल तुगलक वंश के फीरोज ने खोये हुए बंगाल प्रान्त को पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न किया, जो अन्त में निष्फल सिद्ध हुआ। 1357 ई. में पाण्डुआ में इलियास की मृत्यु हो गयी। उसके राज्यकाल में शान्ति एवं समृद्धि थी, जो राष्ट्रीय एवं विशिष्ट सिक्कों के उद्घाटन तथा शान्ति की कलाओं-विशेषत: वास्तुविद्या में रुचि के विकास से प्रमाणित होता है।

इलियास का पुत्र सिकंदर शः उसका उत्तराधिकारी बना। उसके राज्यकाल के आरम्भ में ही दिल्ली के सुल्तान ने बंगाल को पुनः प्राप्त करने के लिए दूसरी बार प्रयत्न किया, पर उसे नीरस होकर लौटना पड़ा। लहभग 33 वर्षों के सफल शासन के बाद सिकंदर की मृत्यु अपने पुत्र गयासुद्दीन आजम से लड़ते हुए पाण्डुआ के निकट गोपालपाड़ा नामक स्थान पर संभवतः अक्टूबर, 1930 में हो गई। उसके राज्यकाल की समृद्धि पाण्डुआ में उसके शानदार मस्जिद (आदीनी मस्जिद) के निर्माण करने तथा उसके सिक्कों की आकृति, उसकी संख्या, प्रकार से प्रमाणित होती है। अगले शासक ग्यासुद्दीन आज़म का प्रसिद्ध कवि हाफिज से पत्र-व्यवहार चलता था। वह एक योग्य राजा था। कानून और मुस्लिम संतों के लिए वह अत्यन्त उदार था। 1405, 1408 और 1409 ई. में उसने चीन के मिंगवंश के सम्राट् चुंग ली के पास उपहार के साथ दूत-मण्डल भेजे। चीनी सम्राट् ने भी बदले में उसके पास दूत-मण्डल और उपहार भेजे। लगभग 20 वर्षों के राज्यकाल के बाद 1410-11 ई. में ग्यासुद्दीन आजमशाह की मृत्यु हो गयी। उसका पुत्र सैफुद्दीन हमजाशाह उसका उत्तराधिकारी हुआ। किन्तु लगभग इसी समय कुछ असफल सैनिक अभियानों के परिणामस्वरूप इलियासशाही शासन की निरन्तर बढ़ती कमजोरी का लाभ उठाकर उत्तर बंगाल के भाटरिया का हिन्दू जमीन्दार और बंगाल के इलियासशाही शासकों का एक प्रभावशाली अफसर राजा गणेश (फारसी पाण्डुलिपियों में जिसे भूल से कंसपढ़ा गया है) अपनी शक्ति बढ़ाने लगा। तत्कालीन कठपुतले शासकों के राज्यकाल में उसने अपने को वस्तुतः निरंकुश शासक बना लिया। उसने दनुज-मर्दनदेव की उपाधि ली। ये कठपुतली शासक थे- नफुद्दीन हमजाशाह जिसने दो या तीन वर्षों तक राज्य किया, शाहाबुद्दीन बायजीद शाह, जो सैफुद्दीन हमजाशाह का दत्तक पुत्र या गुलाम था और जिसका राज्यकाल भी 1412-13 ई. से 1414-15 ई. तक रहा और सैफुद्दीन हजमाशाह का पुत्र एवं उत्तराधिकारी अलाउद्दीन फिरोजशाह जिसने नाम के लिए कुछ महीनों तक ही राज्य किया और जब वह मर गया, जिसने नाम के लिए कुछ महीनों तक ही राय किया और जब वह मर गया, राजा गणेश ने (1415 ई. के प्रारंभ) में बंगाल गद्दी हथिया ली। गणेश के द्वारा राज्य का अपहरण एवं हिन्दू शासन की पुनः स्थापना बंगाल के मुसलमानों के एक दल को पसंद नहीं आयी।

नूर कुतुब आलम के नेतृत्व में इन लोगों ने स्थानीय मुस्लिम धर्माचायों के साथ उसका विरोध किया। नूर कुतुब आलम ने जौनपुर के शासक इब्राहिम शर्की के पास एक अत्यन्त उत्तेजक पत्र लिखा और गणेश के राज्य को खत्म करने के बंगाल पर आक्रमण करने को आमंत्रित किया। बंगाल जाते समय मिथिला होते हुए चला, जहाँ जौनपुर शासन की अधीनता को चुनौती देकर और अपने पिता देवी सिंह को गद्दी से उतारकर शिव सिंह ने अपने को स्वतंत्र शासक बना लिया था। गणेश के मित्र और सहायक शिव सिंह ने जौनपुर की सेना का विरोध किया किन्तु इसकी अधिक संख्यागत शक्ति के द्वारा परास्त कर दिया गया। उसका पिता जौनपुर के सुल्तान की अधीनता स्वीकार करने पर फिर मिथिला का शासक बना दिया गया। बंगाल में राजा गणेश जौनपुर की विशाल सेना के सामने अधिक दिनों तक टिक नहीं सका और उसे गद्दी छोड़ देनी पड़ी। गद्दी के लालच में उसके पुत्र जदुसेन ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया। सम्भवत: 1415 ई. के अन्त में इब्राहिम शर्की ने जलालुद्दीन नाम से उसे बंगाल का शासक बना दिया। किन्तु बंगाल से इब्राहिम शकीं की वापसी के तुरन्त बाद राजा गणेश ने बंगाल में पुनः प्रभुता प्राप्त कर ली और दनुजमर्दन देव की उपाधि धारण की। 1418 ई. के मध्य तक राजा गणेश ने अपराजेय शक्ति के साथ एक विस्तृत राज्य पर शासन किया जिसमें वस्तुत: सम्पूर्ण बंगाल शामिल था। गणेश ने शुद्धीकरण द्वारा अपने पुत्र को पुन: हिन्दू धर्म में वापस लाने की कोशिश की। किन्तु ऐसा लगता है कि यह शुद्धि हिन्दू समाज को मान्य नहीं हुई और जदुसेन को अपने पिता के अवशिष्ट राज्यकाल में प्रायः जाति-बहिष्कृत व्यक्ति की तरह अपने दिन बिताने पड़े।

गणेश बुद्धिमान और समर्थ शासक था। यह अल्पज्ञात हिन्दू, जिसने बंगाल में उच्चतम शक्ति प्राप्त की और जिसने कुछ काल के लिए इस्लाम के बन्धन तोड़ दिये, अवश्य ही शक्तिशाली और निपुण व्यक्ति रहा होगा। फरिश्ता और कुछ अन्य लेखकों ने भी शासक के रूप में उसके गुणों की प्रशंसा की है। उसने अपने राज्य पर उत्तम रीति से शासन किया और सामान्यतः मुस्लिम प्रजा के प्रति उसका बर्ताव मैत्रीपूर्ण था। लेकिन उसने बेहिसाब बढ़ी हुई एवं अनियंत्रित मुस्लिम धर्म की मठ-व्यवस्था (खानकाह) को अनुशासित करने की कोशिश की।

गणेश 1418 ई. में शांतिपूर्वक मर गया। इसी साल पाण्डुआ और चटगाँव से चण्डी के उपासक महेन्द्र देव नामक राजा द्वारा बंगला-अक्षरांकित सिक्के लाये गये। सम्भवत: वह गणेश का छोटा बेटा था जिसको उसी वर्ष इस्लाम धर्म पुर्नग्रहण कर जलालुद्दीन मुहम्मद नाम से जदुसेन की गद्दी पर आरूढ़ होने के पहले, उसके कुछ पक्षपातियों ने कुछ महीनों के लिए ही गद्दी पर बैठाया था। उसके राज्यकाल में जौनपुर के इब्राहिम शर्की ने 1420 ई. में दूसरी बार बंगाल पर चढ़ाई की।

गणेश के वंश का शासन अधिक समय तक नहीं टिका। जलालुद्दीन मुहम्मद की मृत्यु 1431 ई. में हो गई। उसके बाद उसका पुत्र शम्सुद्दीन अहमद गद्दी पर बैठा, जिसने सम्भवत: 1435-1436 ई. तक राज्य किया। अपने अत्याचार के कारण यह राजा लोगों में अत्यन्त अप्रिय हो गया तथा वह अपनी सरकार के शादी खाँ और नासिर खाँ नामक दो अधिकारियों के द्वारा, अपने विरुद्ध संगठित षड्यंत्र का शिकार बन गया। नासिर खाँ एवं शादी खाँ शीघ्र एक दूसरे के विद्वेषी बन बैठे, क्योंकि दोनों की आंखें बंगाल की गद्दी पर लगी थीं। नासिर खाँ ने अपने प्रतिद्वन्द्वी को मौत के घाट उतार दिया। पर उसे भी कुछ ही दिनों के लिए राज्य करना लिखा था, क्योंकि शम्सुद्दीन अहमद से सम्बन्धित सरदारों ने शीघ्र ही उसकी प्रभुता का विरोध किया तथा उसे मार डाला। तब उन लोगों ने हाजी इलियास के एक पौत्र नसिरुद्दीन को राजसिंहासन पर बैठाया जिसने, जैसा कि उसके सिक्कों से पता चलता है, नसिरुद्दीन अबुल मुजफ्फर महमूद शाह की उपाधि धारण की। इस प्रकार इलियास शाही वंश का शासन पुनः स्थापित हुआ।

जैसा कि कुछ सिक्कों से प्रमाणित होता है, नसिरुद्दीन महमूद ने अनेक वर्षों तक न्यायी और उदार शासक के रूप में राज्य किया। उसे गौड़ में कुछ भवन तथा सातगाँव में एक मस्जिद बनवाने का श्रेय दिया जाता है। 1451 ई. में उसकी मृत्यु होने पर उसका पुत्र रुक्नुद्दीन बरबकशाह बंगाल की गद्दी पर बैठा। फरिश्ता के अनुसार वह हिन्दुस्तान का सर्वप्रथम शासक था जिसके पास अत्याधिक संख्या में अबिसीनियन दास थे जिनमें कुछ को ऊँचे पद मिले। कुछ इतिहासकारों ने एक चतुर और नियमपालक सम्राट् के रूप में उसकी प्रशंसा की है “जिसके राज्य में सैनिक और नागरिक एक समान रूप से संतुष्ट और सुरक्षित थे। 1474 ई. में उसकी मृत्यु हुई। उसके बाद उसका पुत्र शम्सुद्दीन युसुफ़ शाह गद्दी पर बैठा, जिसका वर्णन उसके अभिलेखों में शम्सुद्दीन अबुल मुजफ्फर यूसुफ शाह के रूप में है। वह गुणवान, विद्वान् एवं पुण्यात्मा शासक था। उसने 1481 ई. तक राज्य किया। उसकी मृत्यु के पश्चात् सरदारों ने उसके पुत्र सिकंदर द्वितीय को सिंहासन पर बैठाया। पर नया शासक, दोषयुक्त बुद्धि का पाया जाने के कारण, शीघ्र ही गद्दी से हटा दिया गया तथा नसिरुद्दीन महमूद का पुत्र जलालुद्दीन फतह शाह गद्दी पर बैठाया गया। उसे तीव्र बुद्धि और उदार शासक के रूप में वर्णित किया गया है, जिसने अतीत कायम रखा और जिसके समय में जनता प्रसन्न और सुखी के बढ़ते हुए प्रभाव से जो खतरा था, उसे समझने के लिए फतहशाह के पास पर्याप्त बुद्धि थी। पर इसे रोकने के प्रयत्न का मूल्य उसे अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। असन्तुष्ट अबिसीनियनों ने एक हिजड़े के नेतृत्व में उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा। हिजडे ने फतह शाह को 1486 ई. में मरवा, बरबक शाह सुल्तान शाहजादा की उपाधि धारण कर, बंगाल की गद्दी हड़प ली। पर महीनों के अन्दर ही इन्दील खाँ ने बरबक की हत्या कर दी। इंदील खाँ अबिसीनियन होने पर भी फतह शाह के प्रति वफादार था तथा सिद्ध योग्यता का युद्ध सेनापति था। गद्दी स्वयं लेने के बारे में उसने शिष्ट ढंग से कुछ अनिच्छा जाहिर की। पर फतह शाह की विधवा तथा गौड़ आग्रह करने पर वह सैफुद्दीन फीरोज के नाम से बंगाल की गद्दी पर बैठ गया। यदि रियाज के लेखक पर भरोसा किया जाए, तो उसमें जो एक योग्य शासक एवं सेनापति के रूप में विश्वास किया गया था उसे उसने कार्यों द्वारा सच कर दिखाया। पर वह दान देने में आगे-पीछे का विचार नहीं करता था। 1489 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। तब सरदारों ने सैफुद्दीन फीरोज शाह के एक पुत्र को नासिरुद्दीन महमूद शाह द्वितीय के नाम से राजसिंहासन पर बैठाया। पर 1490 ई. में सादी बदर नामक एक महत्त्वाकांक्षी अबिसीनियन ने इस शासक को मार डाला तथा शम्सुद्दीन अबू नसर मुजफ्फर शाह के नाम से गद्दी हथिया ली। इस अबिसिनियन के तीन वर्षों तथा कुछ महीनों के शासनकाल में अत्याचार तथा अव्यवस्था फैली रही। फलस्वरूप सैनिकों तथा अधिकारियों में अत्याधिक असन्तोष फैल गया। इन असन्तुष्ट अधिकारियों में उसका बुद्धिमान वजीर सैयद हुसैन भी था, जो अरब वंश का था। उन्होंने उसे गौड़ में चार महीनों तक घेर कर रखा, जिस बीच उसकी मृत्यु हो गयी। तब बंगाल के सरदारों ने सैयद हुसैन को अलाउद्दीन हुसैन शाह के नाम से उसके गुण एवं योग्यता की स्वीकृति के रूप में (1493 ई. में) गद्दी पर बैठाया।

अलाउद्दीन हुसैनशाह के राज्यारोहण से एक नये वंश का शासन आरम्भ होता है, जो लगभग आधी सदी तक टिका रहा तथा जिसे विभिन्न उपयोगी कार्य करने का श्रेय प्राप्त है। वह अपनी राजधानी हटाकर एकदला ले गया। हम लोगों को हुसैन शाह के कई अभिलेख प्राप्त हैं। उसके एवं उसके पुत्र नसरत शाह के सिक्के विभिन्न प्रकार के तथा बहुसंख्यक हैं। उसके दो महत्त्वपूर्ण हिन्दू अधिकारी रूप और सनातन थे। हुसैनशाह एक ज्ञानी एवं बुद्धिमान पुरुष था। वह महान् वैष्णव धर्मोपदेशक चैतन्य देव का समकालीन था। वह बंगाल की गद्दी पर बैठने वालों में से अधिक लोकप्रिय शासकों में से था। अपने राज्य के आन्तरिक शासन में पुन: व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से उसने राजमहल के संरक्षकों की शक्ति को दबाया। इन सरंक्षकों ने पूर्वगामी राज्य में रोम के प्रीटोरियन गाडौं के समान स्थान स्थापित कर लिया था। उसने अबिसीनियन को अपने राज्य से निकाल दिया, क्योंकि उनका बढ़ा हुआ प्रभाव राजसिंहासन के लिए एक भयंकर संकट बन गया था। 1494 ई. में उसने जौनपुर के हुसैन शाह शर्की का आदर-सहित स्वागत किया, जो अपने राज्य से दिल्ली के सिकंदर लोदी द्वारा खदेड़ा जाने पर बंगाल की ओर भाग आया था। भगोड़े राजा को कहलगाँव में (बिहार में भागलपुर के निकट) रहने की अनुमति मिली, जहाँ 1500 ई. में उसकी मृत्यु हुई। इस पर शीघ्र ही सिकन्दर लोदी ने बंगाल के नवाब के विरुद्ध कारवाई करने का निश्चय किया और महमूद लोदी तथा मुबारक लोहानी के अधीन 1495 ई. में एक सेना बिहार भेजी। बंगाल के हुसैनशाह ने भी अपने पुत्र दानियाल के अधीन उन्हें रोकने के लिए एक सेना भेजी। प्रतिस्पर्धी सेनाएँ बाढ़ में तब तक आमने-सामने खड़ी रहीं जब तक दोनों प्रतिपक्षियों में संधि न हो गयी। हुसैन शाह ने यह वादा किया कि भविष्य में वह दिल्ली के सुल्तान के शत्रुओं को आश्रय नहीं देगा। अपनी राजधानी के निकट व्यवस्था स्थापित करने के बाद हुसैनशाह ने बंगाल के खोये हुए प्रदेशों को पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न किया। उसने अपने राज्य की सीमाओं को दक्षिण में उड़ीसा की सरहद तक बढ़ाया, हालाँकि उड़िया के विरुद्ध सैनिक अभियानों में वह सफल नहीं हो सका, जौनपुर के शर्कियों के अधिकार से मगध को फिर से प्राप्त कर लिया, उत्तर बिहार पर कब्जा कर लिया, आसाम के अहोम राज्य पर आक्रमण किया और 1498 ई. में कूचबिहार के कामतापुर पर अधिकार कर लिया। शीघ्र ही आसाम को इसके पुराने राजा ने पुनः प्राप्त कर लिया। हुसैन शाह ने तिपेरा के एक भूभाग को भी अपने राज्य में मिला लिया और अराकानियों के कब्जे से चटगाँव ले लिया। तब हुसैन शाह अपने राज्य की सीमाओं की सुरक्षा पक्की करने में लग गया। उसने इसके विभिन्न भागों में मस्जिदें एवं खैरातखाने बनवाये और उनके निर्वाह के लिए उचित धन समर्पित किया। 1519 ई. में उसकी मृत्यु हुई। उसके बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र नसीब खाँ गद्दी पर बैठा। नसीब खाँ ने नसिरुद्दीन नसरत शाह की उपाधि धारण की। भारत के अन्य बहुत-से मुस्लिम शासकों से भिन्न नसरत शाह अपने भाईयों के प्रति उदार सिद्ध हुआ तथा उसने उनके पैतृक धन को दूना कर दिया। उसने तिरहुत पर आक्रमण किया, इसके राजा कंसनारायण को मार डाला तथा इसके शासन की देखभाल करने के लिए अपने बहनोई अलाउद्दीन एवं माखवमे-आलम को वहाँ रख दिया। मुग़ल-विरोधी संघ संघठित करने की नसरत शाह की कूटनीति सफल सिद्ध नहीं हो सकी और घाघरा नौकाघाट के निकट बाबर और नसरत शाह की सेनाओं में खुला संघर्ष हुआ जिसमें नसरत शाह की सेना अपनी बहादुरी का अच्छा सबूत देने के बाद अन्ततोगत्वा परास्त हो गयी। इसके बाद बाबर और नसरत शाह के बीच 1529 ई. में कुछ शर्तो पर समझौता हो गया। नुसरत शाह कला, वास्तुविद्या तथा साहित्य का आश्रयदाता था। उसने गौड में बड़ा सोना मस्जिद एवं कदम रसूल नामक दो प्रसिद्ध मस्जिदें बनवायीं। उसकी आज्ञा से महाभारत का एक बंगला अनुवाद किया गया। अन्त में उसके राजमहल के हिजड़ों ने 1532 ई. में उसकी हत्या कर दी। उसके बाद उसका पुत्र अलाउद्दीन फीरोज शाह गद्दी पर बैठा। अलाउद्दीन फीरोजू शाह तीन महीने भी शासन न कर पाया कि उसके चाचा ग्यासुद्दीन महमूद शाह ने उसे मार डाला। ग्यासुद्दीन महमूद शाह हुसैन शाही वंश का अन्तिम राजा था, जिसे शेर खाँ सूर ने बंगाल से भगा दिया।

प्रान्तीय राजवंश: जौनपुर Provincial Dynasty: Jaunpur

जिस वक्त दिल्ली सल्तनत के सुल्तान देश के अधिकांश भाग पर शासन कर रहे थे उस समय भी कई स्वतंत्र राज्य देश के विभिन्न हिस्सों में विद्यमान थे। दिल्ली सल्तनत के कमजोर होने से कई दूसरे राज्य भी अस्तित्व में आ गए।

जौनपुर

जौनपुर की स्थापना तुगलक वंश के फीरोज ने अपने चचेरे भाई एवं संरक्षक मुहम्मद जौन की स्मृति चिरस्थायी करने के लिए की थी। तैमूर के आक्रमण के बाद की फैली हुई गड़बड़ी के युग में ख्वाजा जहाँ ने दिल्ली सल्तनत की अधीनता त्यागकर, अपनी उपाधि मलिक-उश्-शर्क के नाम पर, जौनपुर में शर्की वंश नामक स्वतंत्र शासकों का एक वंश स्थापित किया था। 1399 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके दत्तक पुत्र मलिक करनफूल को उसकी गद्दी मिली जिसने मुबारक शाह शकीं की उपाधि धारण की। अल्पकालीन शासन के बाद 1402 ई. में मुबारक शाह की मृत्यु हो गयी। उसका अनुज इब्राहिम शाह शर्की उसका उत्तराधिकारी बना। इब्राहिम ने लगभग चौंतीस वर्षों तक राज्य किया। वह शर्की वंश का सबसे योग्य शासक था। वह स्वयं सुसंस्कृत व्यक्ति था तथा कला एवं साहित्य को आश्रय देता था। फलस्वरूप जौनपुर मुस्लिम विद्या का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। सुन्दर भवनों का निर्माण कर, जिन पर हिन्दू प्रभाव स्पष्ट था तथा साधारण ढंग की मीनारों से रहित मस्जिदें बनवाकर इस नगर को अलंकृत किया गया। प्रसिद्ध अटाला मस्जिद, जो अब जौनपुर शैली की शिल्पविद्या के देदीप्यमान नमूने के रूप में खड़ी है, 1408 ई. में पूरी हुई। 1436 ई. में इब्राहिम की मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसका पुत्र महमूद शाह आया। नये राजा ने चुनार जिले के अधिकांश भाग को अपने राज्य में मिला लिया, पर कालपी के विरुद्ध उसका आक्रमण असफल सिद्ध हुआ। दिल्ली पर अधिकार करने का प्रयत्न करने पर वह बहलोल लोदी द्वारा पराजित हुआ। बहलोल लोदी ने उसे जौनपुर लौटने को विवश किया। 1457 ई. में महमूद की मृत्यु हो गयी। तब उसका पुत्र भीखन, मुहम्मद शाह के नाम से, सिंहासन पर बैठा। पर इस राजा के सिद्धांतशून्य आचरण से सरदार एवं उसके अपने सम्बन्धी बहुत चिढ़ गये तथा उसकी हत्या करवा कर उसके भाई हुसैनशाह को गद्दी पर बैठाया।

सिंहासन पर बैठने के शीघ्र बाद हुसैनशाह ने 1458 ई. में दिल्ली के बहलोल लोदी के साथ एक चतुर्वर्षीय विराम-संधि की। इस समय का उपयोग उसने तिरहुत के स्वतंत्र जमींदारों का शमन करने तथा उड़ीसा पर एक लूटपूर्ण आक्रमण करने में किया। उड़ीसा के राजा ने एक विशाल धनराशि देकर उससे छुट्टी पायी। 1466 ई. में ग्वालियर का दुर्ग भी विजय करने को वह एक सेना लेकर गया, पर इसे अधीन नहीं कर सका और जब इसके राजा मान सिंह ने उसे भारी हर्जाना दिया, तब वह लौट गया। इन प्रारम्भिक सफलताओं के पश्चात् जब हुसैनशाह ने बहलोल लोदी के साथ अपना युद्ध फिर से जारी किया, तब भाग्य उसके विरुद्ध हो गया। बहलोल लोदी ने उसे बिहार भगा कर जौनपुर के राज्य को दिल्ली में मिला लिया। बहलोल ने अपने पुत्र बरबक को जौनपुर का शासक नियुक्त किया तथा उसे राजकीय उपाधि का व्यवहार करने और सिक्के ढालने की अनुमति दे दी। इस प्रकार जौनपुर की स्वतंत्रता का अन्त हो गया। जौनपुर के लगभग पचासी वर्षों के शर्की शासनकाल की विशेषातएँ थीं- समृद्धि, शिल्पकला का विकास तथा एक उच्च श्रेणी की संस्कृति का प्रस्फुटन, जिससे उस नगर को इब्राहिम के राज्यकाल में भारत का शीराज की उपाधि प्राप्त हुई।

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!