भक्ति आन्दोलन

हिन्दू धर्म इस्लाम को पूर्णत: पचा नहीं सका पर उसके बदले स्वयं दो प्रकार से प्रभावित हुआ। एक ओर, इस्लाम के परधर्मावलंबियों को स्वधर्म में दीक्षित करने के जोश ने हिन्दुओं की कट्टरपंथी मंडलियों में कट्टरता को मजबूत बना दिया, जिन्होंने इस्लाम धर्म के प्रसार के विरुद्ध अपनी स्थिति को दृढ़ बनाने के ध्येय से, जात-पाँत-संबंधी नियमों की कठोरता को बढ़ा दिया। इस कारण स्मृति ग्रंथों में अनेक नियम बनाये गए। इस वर्ग के सबसे अधिक विख्यात लेखक थे विजयनगर के माधव, जिनकी कालनिर्णय नामक पराशर-स्मृति संबंधी एक ग्रंथ पर टीका 1335 ई. से 1360 ई. के बीच में लिखी गयी; विश्वेश्वर, जो राजा मदनपाल (1360 ई. 1370 ई.) के लिए लिखे गये मदन पारिजात नामक एक स्मृति-ग्रन्थ का रचयिता था; मनु का प्रसिद्ध भाष्यकार कुल्लूक, जो एक बंगाली लेखक था तथा अधिवास के कारण बनारसी विचारधारा का था तथा बंगाल का रघुनन्दन, जो चैतन्य का समकालीन था। दूसरी ओर, इस्लाम के कुछ प्रजातांत्रिक सिद्धान्त हिन्दुओं की सामाजिक एवं धार्मिक परिपाटियों में प्रवेश कर गये, जिस कारण कुछ संत उपदेशकों के अधीन उदार आन्दोलनों का उदय हुआ। ब्योरे में कुछ विभिन्नताओं के बावजूद, ये सभी सुधारक उदार भक्ति सम्प्रदाय के प्रचारक थे, जिसके सन्देश को वे निरक्षर जनसमूहों के समक्ष ले जाने का प्रयत्न करते थे। वे सभी धमाँ की मौलिक समता एवं ईश्वर की एकता का उपदेश देते थे। उनका विश्वास था कि का गौरव उसके जन्म पर नहीं, बल्कि उसके कर्मों पर निर्भर है। वे धर्म अत्याधिक कर्मकांड एवं आडंबरों तथा पुरोहितों के प्रभुत्व का विरोध करते वे सबके लिए मोक्ष के साधन के रूप में सहज भक्ति और विश्वास पर देते थे।

उन सब में काल के विचार से रामानन्द का स्थान प्रथम आता है यद्यपि याद रखना चाहिए कि उनके जन्म एवं मृत्यु की तिथियों के विषय में मत है। रामानन्द का जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) के एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार हुआ था। उन्होंने उत्तरी भारत के तीर्थ-स्थानों का भ्रमण किया था। वे राम उपासक थे तथा सभी वर्गों के सदस्यों-पुरुष तथा स्त्री दोनों-को हिन्दी भक्ति के सिद्धान्त का उपदेश देते थे। इस प्रकार उनके बारह मुख्य शिष्यों धन्ना नामक जाटसेना-नामक नाईरैदास नामक चमार तथा कबीर नामक मुस्लिम जुलाहे थे। उनकी दो शिष्याएँ थीं- पद्मावती और सुरसीर। इस प्रकार रामानन्द ने वैष्णव धर्म के द्वार, बिना किसी जन्म, जाति, धर्म और लिंग भेद् के सभी के लिए, खोल दिए थे।

एक दूसरे प्रसिद्ध वैष्णव सन्त वल्लभाचार्य थे, जो कृष्ण-भक्ति-सम्प्रदाय के प्रचारक थे। उनका जन्म बनारस के निकट 1479 ई. में एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में उस समय हुआ था, जब कि वह परिवार तीर्थ-यात्रा में वहाँ आया हुआ था। अपने प्रारम्भिक जीवन में ही उन्होंने प्रतिभा के लक्षण प्रदर्शित किये। अपनी शिक्षा समाप्त करने के बाद वे विजयनगर के कृष्णदेव राय के राजदरबार में गये, जहाँ उन्होंने कुछ शैव पंडितों को शास्त्रार्थ में परास्त किया। वे संसार से वैराग्य लेने के पक्ष का समर्थन करते थे तथा आत्मा एवं संसार दोनों के परमेश्वर के साथ पूर्ण सारूप्य पर जोर देते थे। उनका एकवाद शुद्धाद्वैत के नाम से प्रसिद्ध था। पर आगे चलकर वल्लभाचार्य के अनुगामियों में बुराइयाँ आ गयीं और जैसा मॉनियर-विलियम्स लिखता है- वल्लभाचार्य का पंथ अपने विकृत रूप में पूर्व का विषय-सुखवाद बन गया।

वैष्णव सन्तों में सबसे महान् एवं लोकप्रिय चैतन्य (1485-1533 ई.) थे। उनका जन्म 1485 ई. में बंगाल में नदिया (नवद्वीप) के एक विद्वान् ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अपने प्रारम्भिक जीवन में चैतन्य ने अद्भुत साहित्यक तीक्ष्णता का परिचय दिया। शीघ्र उनकी आत्मा इस संसार के बन्धनों से ऊपर उठने का उच्चाकांक्षा करने लगी। वे जब लगभग 22 वर्ष के थे तब उनकी भेट ईश्वरपुरी नामक एक सन्त से हुई। चैतन्य उनके शिष्य हो गए। उन्होंने अपना सारा जीवन-कृष्ण प्रेम तथा भक्ति के संदेश का उपदेश देने में व्यतीत किया-अठारह वर्ष उड़ीसा में तथा छ: वर्ष दक्कन, वृन्दावन, गौड तथा अन्य स्थानों में। उनके अनुगामी उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं चैतन्यवाद के सार तत्त्व को चैतन्य की प्रसिद्ध जीवनी चैतन्य-चरितामृत के लेखक कृष्णदास कविराज ने इस प्रकार व्यक्त किया है- यदि कोई प्राणी कृष्ण की पूजा करता है तथा अपने गुरु की सेवा करता है, तो वह माया-जाल से मुक्त होकर कृष्णपद को प्राप्त होता है तथा इनका (प्रलोभनों का) एवं जाति पर आधारित धमों का परित्याग कर (सच्चा वैष्णव) अशरण हो कृष्ण की शरण गहता है।

इस प्रकार वे पुरोहितों के कर्मकांड के विरुद्ध थे तथा हरि-भक्ति का उपदेश देते थे। उनका विश्वास था कि प्रेम एवं भक्ति तथा संगीत एवं नृत्य से हर्षोंन्माद की अवस्था उत्पन्न की जा सकती है, जिसमें ईश्वर का साक्षात्कार किया जा सकता है। उनका उपदेश बिना जाति अथवा धर्म का विचार किये सब के लिए था। उनके कुछ शिष्य हिन्दू समाज के निम्नतर स्तर तथा मुसलमानों में से लिये गये थे। जनसमूहों पर चैतन्य के उपदेशों का बहुत बड़ा तथा जबर्दस्त प्रभाव पड़ा था।

महाराष्ट्र में भक्ति-धर्म का उपदेश नामदेव ने किया। उनके अनुगामियों में कुछ हिन्दुधर्म में दीक्षित मुस्लमान भी थे। नामदेव जो दरजी के जाती के अथवा छीपी थे, शायद 15वीं सदी के पूर्वार्द्ध में हुए थे। एकेश्वर्तत्व में अपने विश्वास के कारण वे मूर्तिपूजा तथा धर्म के बाह्य अनुष्ठानों को विशेष महत्त्व नहीं देते थे। उनका विश्वास था कि मोक्ष केवल ईश्वर के प्रति प्रेम से ही प्राप्त किया जा सकता है।

कबीर ने हिन्दुधर्म एवं इस्लाम के बीच मेलजोल की भावना को प्रोत्साहित करने के सर्वाधिक प्रयास किया तथा उनके जन्म एवं मरण की तिथियां अनिश्चित हैं। वे चौदहवीं सदी के अन्त अथवा पंद्रहवीं सदी के प्रथम चरण में हुए थे। एक किंवदन्ती है कि वे एक ब्राह्मण विधवा से उत्पन्न हुए थे, जिसने उन्हें बनारस के एक तालाब के किनारे छोड़ दिया था और तब एक मुसलमान जुलाहे तथा उसकी स्त्री के द्वारा पाये जाकर पाले-पोसे गये। परम्परा के अनुसार रामानन्द के शिष्य बतलाये जाते हैं। यद्यपि जैसा डाक्टर कारपेंटर लिखते है- कबीर के विचार की संपूर्ण पृष्ठभूमि हिन्दू है, पर वे सूफी संतों एवं कवियों जिनके सम्पर्क में वे आये थे, बहुत प्रभावित हुए थे। इस प्रकार के प्रेम धर्म का उपदेश देते थे जिससे सभी वर्गों एवं धर्मों में एकता बढ़े। उनके लिए हिन्दू एवं तुर्क एक ही मिट्टी के बर्तन थे, अल्लाह और राम केवल विभिन्न नाम थे।

उस काल के एक दूसरे महान् उपदेशक नानक (1469-1538 ई.) थे, सिक्ख-धर्म को चलाया तथा उपनिषदों के शुद्ध एकेश्वरवादी सिद्धान्त पुनर्जीवित किया। उनका जन्म 1469 ई. में लाहौर शहर से करीब पैंतीस मील दक्षिण-पश्चिम में तालवंडी (आधुनिक नानकानापश्चिम पास्तिान में) के खत्री परिवार में हुआ था। उन्होंने अपना सारा जीवन सार्वभौमिक सहिष्णुता अपने सिद्धांत का उपदेश देने में व्यतीत कर दिया, जो हिन्दूधर्म तथा इस्लाम की सारी अच्छी बातों पर आधारित था। वास्तव में उनका ध्येय धमों के संघर्ष का अन्त करना था। कबीर की तरह उन्होंने ईश्वर के ऐक्य का उपदेश दिया तथा हिन्दू-धर्म और इस्लाम के आडम्बरवाद की कड़ी निंदा की। नानक का उद्देश्य एक ही इश्वर की मान्यता के आधार पर हिन्दू धर्म में सुधार करना था। उनके जीवन काल में सिक्ख धर्म कोई अलग धर्म न होकर हिन्दू धर्म की ही एक शाखा था।

नानक ने अत्याधिक संन्यास एवं आनंदोपभोग के बीच के एक मध्यम मार्ग का पक्ष लिया तथा अपने अनुगामियों को दंभ, स्वार्थ तथा असत्य का त्याग करने को प्रोत्साहित किया।

नानक के धर्म में दूसरे धर्मवाले दीक्षित हो सकते थे। अत: बहुत-से मुसलमानों ने इस धर्म को स्वीकार कर लिया। उनके उत्तराधिकारियों के अधीन इस धर्म ने और भी उन्नति की।

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