राजपूत काल

राजपूत काल The Rajput Age

हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् भारतीय इतिहास के रंगमंच पर कई छोटे-छोटे राज्यों का उदय हुआ। यां प्राचीन भारतीय इतिहास के गौरव के अवसान का युग था। भारतीय इतिहास के प्राचीन युग के अवसान और पूर्व मध्ययुग के आगमन का सन्धि काल राजपूत युग के नाम से प्रसिद्ध है। राजपूत उन राजकुलों, राजवंशों एवं पराक्रमी सेनानियों का सामूहिक नाम है जो अपने शस्त्र-बल पौरुष और पराक्रम के लिए इतिहास में सुविख्यात हैं। सम्राट् हर्ष की मृत्यु के बाद भारतवर्ष में जिन छोटे-बड़े अनेक राज्यों का उदय हुआ था। उन राज्यों की स्थापना और आधिपत्य के मुख्य सूत्रधार राजपूत थे। किन्तु यह इतिहास की विडम्बना हा की जिन राजपूतों के राजकुलों ने भारतीय इतिहास में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की, उनका उत्पत्ति का प्रश्न आज भी विवादित ही कहा जायेगा। राजपूत शब्द संस्कृत भाषा के राजपुत्र शब्द से निकला है। राजपुत्र शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है राजा का पुत्र हर्ष चरित्र और पुराणों में इसी अर्थ में राजपूत शब्द का प्रयोग हुआ है।

राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों ने अपने-अपने विचार प्रतिपादित किए हैं। राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में मुख्यतया तीन परस्पर विरोधी मान्यताएँ प्रचलित हैं। ये मान्यताएँ संक्षेप में इस प्रकार हैं-

  • प्राचीन क्षत्रिय सिद्धान्त
  • अग्निकुंड की उत्पत्ति का सिद्धान्त
  • विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त

जहां तक कि प्राचीन क्षत्रिय सिद्धान्त का प्रश्न है, इस सिद्धान्त के अनुसार राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक गौरीशंकर, हीराचन्द ओझा, सी.वी. वैद्य तथा उनकी परम्परा के कई अन्य विद्वान हैं। इन विद्वानों ने प्राचीन अनुश्रुतियों, अभिलेखों तथा साहित्यिक स्रोतों के आधार पर यह स्थापित किया है कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा मेवाड़ के सिसोदिया और चालुक्य को श्रीराम का वंशज बताया है। भोज ग्वालियर अभिलेख तथा बाउक जोधपुर अभिलेख में प्रतिहारों ने अपने को प्रभु श्री राम के भाई लक्ष्मण की संतान बताया है। एक अनुश्रुति के अनुसार हारीत के कमण्डल से चालुक्य की उत्पत्ति हुई थी। प्रतिहार सम्राटों ने अपने को इक्ष्वाकु अथवा सूर्यवंशीय क्षत्रिय कहा है। हम्मीर महाकाव्य के अनुसार,  चाहमान अथवा राजपूत सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। पृथ्वी राज रासो में जिन छत्तीस राज्बंशों का उल्लेख किया गया है, उनमें से सभी सूर्य, चन्द्र अथवा यदुवंशी बतलाए गए हैं। इस प्रकार उपर्युक्त आधारों पर राजपूतों को प्राचीन क्षत्रियों का वंशज बताया गया है, जिनका मुख्य कार्य-व्यवसाय शासन और सुरक्षा थी।

राजपूतों की उत्पत्ति का दूसरा सिद्धान्त, उनकी उत्पत्ति में अग्निकुण्ड से उत्पत्ति के विचार का प्रतिपादन करता है। अग्निकुण्ड सिद्धान्त का प्रतिपादन पृथ्वीराज रासों में मिलता है। पृथ्वी राजरासो में कहा गया है कि जब पृथ्वी पर म्लेच्छों के अत्याचारों में ऐसी वृद्धि हो गई कि वे असह्य हो गए तब इन अत्याचारियों का दमन करने के लिए महर्षि वशिष्ठ ने आबू पर्वत पर एक अग्निकुण्ड का निर्माण करके यज्ञ किया। इस अग्निकुण्ड में चार योद्धा अर्थात् परमारचाहमानचालुक्य और प्रतिहार निकले। भारत के राजपूत इन्हीं चारों की की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से हुई। अतएव इन्हें अग्निवंशीय कहा गया है। किन्तु अधिकांश इतिहासकार इस सिद्धांत को कल्पना पर आधारित मानते हैं।

अनेक विद्वानों के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति विदेशियों तथा अनार्यों से हुयी। इस वर्ग में आने वाले विद्वानों में कर्नल टाड, विलियम्स क्रुक, स्मिथ तथा  भारतीय इतिहासकार भंडारकर हैं। राजस्थान के इतिहास एनल्स एंड एंरीक्रिरीज ऑफ़ राजस्थान के प्रसिद्द प्रणेता कर्नल टाड के अनुसार, राजपूत मध्य एशिया की शक अथवा सीथियन जाति की संतान है। उनकी इस मान्यता का आधार शकों तथा राजपूतों के रीति-रिवाज में समानाएं हैं। कर्नल टाड के मत का करते हुए स्मिथ महोदय ने लिखा है कि मुझे इस बात में कोई सन्देह कि शकों तथा कुषाणों के राजवंश, हिन्दू धर्म स्वीकार करने के बाद जाती व्यवस्था में क्षत्रियों के रूप में सम्मिलित कर लिए गए।’ स्मिथ महोदय ने कतिपय राजपूत वंशों को अनायों की भी सन्तान माना है। उनका कहना है कि विदेशियों की भांति दक्षिण की अनेक अनार्य जातियां राठौर, चन्देल तथा गहड़वाल आदि राजपूत वंश इन्हीं भारतीयकृत अनार्य जातियों की सन्तान हैं। विलियम क्रुक भी राजपूतों को विदेशियों की सन्तान मानते हैं। डॉ. भण्डारकर के अनुसार भी राजपूत विदेशियों की सन्तान हैं। सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. ईश्वरी प्रसाद राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति में विश्वास करते हैं किन्तु डॉ. ईश्वरी प्रसाद क्षत्रियों को निम्न वंश में उत्पन्न नहीं मानते। किन्तु सी.वी. वैद्य तथा गौरीशंकर हीराचन्द ओझा तथा कतिपय अन्य विद्वानों ने इस मत का खण्डन किया है। डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार, डॉ. हरीराम तथा डॉ. दशरथ शर्मा ने राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति के सिद्धान्त को अस्वीकार करते हुए यह स्थापित किया है कि अधिकांश राजपूत परिवार प्राचीन क्षत्रियों या ब्राह्मणों की सन्तान हैं। इस प्रसंग में डॉ. मजूमदार के अनुसार मेवाड़ के गहलौत राजपूत वंश का संस्थापक रावल ब्राह्मण था। इसी प्रकार गुर्जर-प्रतिहार राजकुल संस्थापक हरीसेन ब्राह्मण था जिसकी एक पत्नी ब्राह्मण थी और दूसरी क्षत्रिय। डॉ. दशरथ शर्मा ने अपनी पुस्तक अर्ली चौहान डायनेस्टीज़ में डॉ. मजूमदार के विचारों का समर्थन किया तथा प्राचीन मुद्राओं और अभिलेखों के आधार पर टाड और स्मिथ जैसे विद्वानों की मान्यताओं को असंगत बताया है। इस प्रकार राजपूतों के विदेशी मूल का सिद्धांत प्रमाणित नहीं मन गया है। अधिकंध विद्वानों की यह धरना है की राजपूत मूलतया भारतीय हैं, हां उनमे कुछ वे ऐसे लोग भी आत्मसात हो गए जो मूलतया विदेशी थे किन्तु जिन्होंने भारत और भारतीयता को अंगीकार कर लिया था।

उत्तर भारत के राज्य: राजपूत काल

जिस कन्नौज को सम्राट् हर्ष ने अपनी राजधानी बनाकर गौरवान्वित किया था उसी का इतिहास हर्ष की मृत्यु के बाद धूमिल हो गया। परन्तु यह स्थिति बहुत समय तक नहीं रहने पाई। कन्नौज के विगत वैभव से साम्राज्य-निर्माण के इच्छुक राजाओं को उत्साह प्राप्त होता था, अत: यशोवर्मन ने कन्नौज पर अधिकार करके उसके पूर्व गौरव को पुनर्जीवित किया। यशोवर्मन के वंश और उसके प्रारम्भिक जीवन के विषय में हमें कोई सुनिश्चित बात नहीं मालूम। परन्तु उसकी राजसभा के प्राकृत कवि वाक्पतिराज ने काव्य गौड़वहो लिखा, जिससे उसके विषयों और सैन्य-सफलताओं के विषय में काफी महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त होती है। हाँ, यह अवश्य है कि चूंकि गौड़वहो एक काव्य-ग्रन्थ है, अतएव इसमें वर्णित तथ्यों को हम विवेक तथा समालोचनात्मक बुद्धि का आश्रय ग्रहण करके ही सत्य स्वीकार करते हैं।

वाक्पतिराज के काव्य गौड़वहो के नाम से अभिप्राय निकलता है कि इस ग्रन्थ में यशोवर्मन द्वारा गौड़-विजय का वर्णन किया गया है, परन्तु वास्तविकता यह है कि इसमें यशोवर्मन की अन्य सैनिक सफलताओं का भी विस्तार के साथ वर्णन किया गया है। गौड़-विजय का अन्त में केवल उल्लेख भर कर दिया गया है। पूर्व में यशोवर्मन बंगाल तक अपनी विजयवाहिनी लेकर गया और गौडाधिपति को युद्ध में पराजित कर दिया। यह जान लेना आवश्यक है कि इस समय तक अनुवर्ती गुप्त नरेशों की शक्ति, जिनके राज्य की स्थापना आदित्यसेन गुप्त ने की थी, काफी क्षीण हो गई थी। गौड्-शक्ति के पूर्व-संक्रमण से मगध के गुप्त राजकुल का विनाश हो गया और मगध के राज्य पर गौड़ों का अधिकार हो गया। अतएव जब यशोवर्मन ने बंगाल तक अपनी विजय-सेना की यात्रा कराई और गौड़ाधिपति को युद्ध में हराया तो स्वभावतः मगध राज्य पर भी उसका अधिकार हो गया। यशोवर्मन की पूर्वविजय की पुष्टि एक स्वतन्त्र साक्ष्य द्वारा भी हो जाती है। नालन्दा में एक अभिलेख प्राप्त हुआ है जो यशोवर्मन का उल्लेख एक सर्वशक्तिमान सम्राट् के रूप में करता है। इसका यह अर्थ निकाला जा सकता है की उसकी राजसत्ता मगध तक विस्तृत थी। अतएव हम यह विश्वास कर सकते हैं की अपनी विजय यात्रा के सम्बन्ध में यशोवर्मन पूर्व में बंगाल तक गया और गौड़-नरेश को पराजित करने का यशोपार्जन किया।

यद्यपि यशोवर्मन और कश्मीर नरेश ललितादित्य ने एक सत्कार्य के लिए एक-दूसरे से सहयोग किया था और अरबों के प्रसार को रोकने में वे सफल गये तथापि उनकी मैत्री अधिक दिनों तक टिक नहीं सकी। उन दोनों ही युद्ध छिड़ गया और कुछ समय के लिए उन दोनों में सन्धि हो गई, फिर भी उनमें पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता की भावना के कारण विग्रह की प्रवृत्ति बलवती हो गई। युद्ध में यशोवर्मन की पराजय हो गई और राजतरंगिणी के अनुसार कान्यकुब्ज का राज्य, जिसकी सीमायें जमुना तट से लेकर कालिका तट तक थीं, ललितादित्य की अधीनता में, उसके घर के आंगन के रूप में हो गया। यशोवर्मन के राज्य पर ललितादित्य का अधिकार हो गया। युद्ध में पराजित हो जाने पर यशोवर्मन की शक्ति बिल्कुल नष्ट-भ्रष्ट हो गई और उसका यश का गौरव लुप्त हो गया। यशोवर्मन के शासन-काल को बिल्कुल असन्दिग्ध रूप में निश्चित नहीं किया जा सकता परन्तु कतिपय विद्वानों ने 690 ई. से लेकर 740 सन् ई. तक के समय को उसका शासन-काल निर्धारित किया है।

राजपूत राज्यों में प्रशासन

शासन का स्वरूप- राजपूत राज्य सामन्तवादी प्रथा पर आधारित थे। राजपूत राज्य कई जागीरों में बंटा हुआ था और ये जागीरदार या तो राजवंश के ही कुमार होते थे अथवा आसपास के राज्यों से राजा की सेवा में आये हुए वीर सैनिक होते थे। ये सामन्त राजा के प्रति व्यक्तिगत श्रद्धा से जुड़े होते थे। संकट के समय ये राजा की सेना की सहायता करते थे और अपना सब कुछ राजा पर अर्पित करने को तैयार रहते थे।

राजा को सामन्त नियमित रूप से वार्षिक कर देते थे। प्रत्येक उत्सव के समय ये राज-दरबार में उपस्थित होकर राजा को नजराना देते थे। अनुपस्थित होने पर इन्हें विद्रोही समझकर इनकी जागीरें तक जब्त की जा सकती थीं। राजद्रोह, युद्ध से पलायन अथवा अत्याचारी शासन-प्रबन्ध के कारण भी राजा जागीर जब्त कर सकता था। ये सामन्त राजा की शक्ति का प्रमुख स्रोत थे और राज्य में शांति-व्यवस्था बनाये रखने में राजा को सहयोग देते थे। अपनी जागीर में इन सामन्तों को प्रायः स्वतन्त्र अधिकार प्राप्त थे। ये न्याय भी करते थे। राजा के यहाँ इनके विरुद्ध फरियाद सुनी जा सकती थी।

निरंकुश राजतन्त्र राजपूत राज्यों में प्रचलित था। राजा को असीमित अधिकार प्राप्त थे। वह अपने राज्य का सर्वोच्च अधिकारी प्रमुख सेनापति और मुख्य न्यायाधीश था। सभी पदों पर नियुक्तियां राजा द्वारा होती थीं। राजा को प्रशासन में परामर्श देने के लिए मन्त्रिपरिषद् होती थी, परन्तु राजा मन्त्रिपरिषद् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं था। निरंकुश होते हुए भी राजा प्रजा की रक्षा तथा जनकल्याण को अपना प्रमुख कर्त्तव्य समझते थे।

सैनिक प्रशासन- सैनिक संगठन भी राजपूत राज्यों का दोषपूर्ण था। राजा की व्यक्तिगत सेना कम होती थी। राजा की शक्ति सामन्तों की संयुक्त सेना पर ही निर्भर थी। दूसरे देशों में प्रचलित युद्ध के तरीकों से राजपूत राजा अनभिज्ञ थे। युद्ध क्षेत्र में वे आदशों और नैतिकता पर जोर देते थे, जैसे धर्मयुद्ध करना, आन पर मिट जाना, भागे हुए पर पीछे से वार न करना, शरणागत की रक्षा करना इत्यादि।

पैदल, घुड़सवार और हाथी राजपूत सेना में होते थे। घुड़सवार सैनिकों की संख्या कम थी और उनके घोड़े तुर्क आक्रमणकारियों की अपेक्षा घटिया किस्म  के होते थे। हाथियों की संख्या सेना में अधिक होती थी और तब तुर्क सैनिक हाथियों की आंखों को अपने तीरों का निशाना बनाते थे, तो ये हठी घाव लगने पर अपनी सेना की ओर ही दौड़ते थे। राजपूत युद्ध प्रणाली दोषपूर्ण थी। राज्य की सेना में अधिकतर संख्या सामन्तों द्वारा प्रदत्त सैनिक दस्तों की रहती थी। अतः उनमें एकता की भावना का अभाव था।

युद्ध करना राजपूत अपना महान् कर्त्तव्य समझते थे। वे आपस में ही घोर युद्धों में व्यस्त रहते थे और कभी-कभी इन युद्धों के परिणाम भयंकर होते थे। राजपूतों में राष्ट्रीय चेतना तथा राजनैतिक जागरण का अभाव था और इसी कारण वे विदेशी आक्रमणकारियों का मुकाबला संयुक्त रूप से न कर सके।

राज्य के आय के साधन- भूमिकर राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था। विभिन्न  राज्यों में भूमिकर की दरें विभिन्न थीं। राजपूत काल में राजदरबार, महल और निरंतर युद्धों पर बढ़ते हुए खर्च की पूर्ति के लिए भूमिकर में भी वृद्धि करनी आवश्यक हो गई। भूमिकर उपज का 1/6 भाग से 1/3 भाग तक लिया जाता था। बिक्री कर और व्यवसाय कर भी लिया जाता था। राज्य को उद्योग-धन्धों और व्यापार से भी आय होती थी। सामन्तों से प्राप्त वार्षिक कर, उपहार और आर्थिक दण्ड राज्य की आय के अन्य साधन थे। राज्य की आय का अधिकांश भाग युद्धों, सेना के रखरखाव, राजमहल और दान पर खर्च होता था। किलों और मंदिरों के निर्माण पर भी राजपूत राजा खर्च करते थे।

न्याय व्यवस्था- दण्ड-विधान कठोर था। न्याय धर्मशास्त्रों और परम्पराओं के अनुसार किया जाता था। राज्य में सरकारी अदालतों का जाल बिछा रहता था जहां न्यायाधीश न्याय करते थे। प्राचीन हिन्दू धर्मशास्त्रों का न्याय करते समय सहारा लिया जाता था। ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी। ग्राम पंचायत ग्रामों में होती थीं जो दीवानी और फौजदारी दोनों प्रकार के मुकदमों का फैसला करती थीं। पंचायत से सन्तुष्ट न होने पर ऊपर की अदालत में अपील की जा सकती थी। यहां भी न्याय न मिलने पर प्रजा राजा के पास अपनी फरियाद कर सकती थी। मुकदमों के रिकार्ड्स नहीं रहे जाते थे और न्याय मुख्या रूप से मौखिक होता था। आजकल के मुकाबले न्याय जल्दी मिलता था और निर्णय खुले आम सुनाया जाता था। चोरी, डकैती और हत्या के मामलों में स्थानीय उत्तरदायित्व पर जोर दिया जाता था। जिस गांव में चोरी होती थी या लूटमार होती थी, वहां के निवासियों से सामूहिक रूप से हर्जाना वसूल किया जाता था। चोरी और डकैती की घटनाएं कम होती थीं। न्यायालय द्वारा घोषित अपराधियों को कारावास, राज्य से निष्कासन, आर्थिक जुर्माना, शारीरिक यातना जिसमें अंग-भंग भी था और मृत्यु दण्ड की सजाएं दी जाती थीं।

राजपूत राज्यों में साहित्य

राजपूत राजा साहित्य-प्रेमी और विद्वानों के आश्रयदाता थे। कुछ राजपूत राजा स्वयं विद्वान् और लेखक थे। अपने समय के मुन्ज और राजा भोज प्रसिद्ध विद्वान् थे। राजा मुन्ज एक महान् कवि था और राजा भोज एक लेखक था जिसने नक्षत्र विज्ञान, कृषि, धर्म ललितकला इत्यादि विषयों पर ग्रन्थ लिखे। इस युग में पालि, प्राकृत, संस्कृत और प्रांतीय भाषाओं में अच्छे ग्रन्थ लिखे गये। जयदेव जो बंगाल के राजा लक्षमण सेन का राजकवि था, ने गीतगोविन्द की रचना की। कवि चंद बरदाई ने अपने आश्रयदाता पृथ्वीराज की प्रशंसा में पृथ्वीराज रासो की रचना की। कल्हण ने राजतरगिणी की रचना की। कश्मीरी पडित क्षेमेन्द्र ने ग्यारहवीं शताब्दी में अनेक ग्रन्थों की रचना की जिनमें वृहत्कथा मञ्जरीदशावतारचरित और कलाविलास प्रसिद्ध हैं। बारहवीं शताब्दी में संस्कृत् के प्रसिद्ध विद्वान् और कवि श्रीहर्ष ने नैषधचरित की रचना की। श्रीहष कन्नौज के राजा जयचन्द के दरबारी कवि थे।

इस काल में कुछ प्रसिद्ध नाटककार भी हुए। संस्कृत साहित्य के महान् विद्वान भवभूति ने उत्तरामचरित् की रचना की जो संस्कृत साहित्य की अमूल्य कृति है। इसके अतिरिक्त भवभूति ने दो अन्य नाटक, महावीरचरित् और मालतीमाधव लिखे। भवभूति कन्नौज के राजा यशोवर्मा के सभा-पंडित थे और उनको कालिदास के बाद दूसरा स्थान दिया जा सकता है। प्रसन्नराघव की जयदेव ने रचना की। राजशेखर ने बालरामायणबालभारत और कर्पूर मञ्जरी नाटकों की रचना की। कर्पूर मञ्जरी प्राकृत भाषा में लिखी गई उत्कृष्ट रचना है। इस प्रकार राजशेखर ने संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं में साहित्य का सृजन किया।

इस समय दार्शनिक साहित्य की भी काफी उन्नति हुई। बौद्ध, जैन और हिन्दू तीनों प्रकार के दर्शनशास्त्रों का राजपूत काल में विकास हुआ। इस काल में अनेक ऐसे विद्वान् हुए जिन्होंने अपने मतों का तर्क के साथ प्रतिपादन किया। शंकराचार्य (788-820 ई.) ने वेदान्त दर्शन पर शंकर भाष्य,  उपनिषद् भाष्य और गीता भाष्य नामक ग्रन्थ लिखे। इस समय के प्रसिद्ध दार्शनिक लेखक वाचस्पति मिश्र (नवीं शताब्दी) थे। प्रसिद्ध विद्वान् रामानुज (1140 ई.) का नाम भी उल्लेखनीय है जिन्होंने विशिष्टाद्वैत मत का प्रतिपादन किया।

राजपूत-काल इस प्रकार कला और साहित्य के क्षेत्र में प्रगति का काल था।

राजपूत राज्यों में कला

राजपूत राजा महान् निर्माता थे। उन्होंने अनेक मन्दिर, किले, बाँध, जलाशय और स्नानागार बनवाए। वास्तुकला की अनेक शैलियों का विकास हुआ। मूर्ति-कला के क्षेत्र में भी उन्नति हुई। राजपूत राजाओं ने मन्दिर बनवाने में अपार धन खर्च किया। बुन्देलखण्ड में खजुराहो-मन्दिर-समूह कला की एक महान् कृति है। इस में आरम्भ में 85 मन्दिर थे जिनका निर्माण चन्देल राजाओं ने 950 और 1050 ई. के बीच किया। खजुराहो के सुप्रसिद्ध मन्दिरों में कन्दरिया महादेव का चतुर्भुज का मन्दिर एवं पार्श्वनाथ का मन्दिर मुख्य हैं। खजुराहों के मंदिरों में मंडप और गर्भगृहत को जोडने वाले तथा अर्द्ध मण्डप तथा गर्भगृह प्राय: सभी में एक ही प्रकार के हैं। कुछ मन्दिरों में मण्डप और गर्भगृह को जोडने वाले अन्तराल भी बने हैं। खजुराहों की कुछ स्थापत्य कृतियां अनुपम हैं। उदाहरण के लिए, पैर से कांटा निकलती हुई एक नायिका, एक प्रसधान्रत नायिका और आलस नायिका आदि। मध्य भारत के खाजुत्रहो के मंदिरों के अतिरिक्त पश्चिम भारत में उत्कृष्ट मंदिरों का निर्माण हुआ। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्द आबू पर्वत के जैन मंदिर हैं। चंदेल राजाओं के प्रोत्साहन से खजुराहों का कला के क्षेत्र में महत्व बहुत बढ़ गया और उड़ीसा के बाद इसी कला शैली की प्रधानता रही। यहाँ पर शैव, वैष्णव और जैन लोगों की धार्मिक निष्ठा और उत्साह ने मंदिर-निर्माण को बड़ा प्रोत्साहन दिया।

उड़ीसा के भुवनेश्वर में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। भुवनेश्वर में लिंगराज का मंदिर हिन्दू कला का एक अच्छा उदाहरण माना जा सकता है। इसका विशाल शिखर 127 फीट ऊंचा है। उड़ीसा में जगन्नाथ मंदिर भी कला की एक अच्छी कृति है। पूरी से लगभग 20 मिल देय कोणार्क का सूर्यमंदिर हिन्दू निर्माण कला की एक उत्तम और अदभुत कृति है।

मंदिरों के निर्माण के साथ-साथ इस काल में मूर्ति निर्माण कला में भी प्रगति हुई। सूर्य, विष्णु, शिव, बुद्ध आदि की विभिन्न मुद्राओं में अनेक मूर्तियों का निर्माण किया गया। शिव-पारवती की सम्मिलित प्रतिमाएं, गणेश, कार्तिकेय औए जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की मूर्तियां बनायीं गयी। तीर्थंकरों की मूर्तियों के साथ यक्ष और यक्षिणी को भी दर्शाया गया है। ये मूर्तियाँ, पठार के अतिरिक्त, मिट्टी, तांबा और कांसा की भी बनायीं गयी। इन मूर्तियों से हमें संगीत और नृत्य कला की प्रगति का भी अनुमान होता है। शिव को तांडव करते हुए दिखाया गया है। मूर्तियों के साथ बने मृदंग, एकत्र, बांसुरी इत्यादि वाद्ययंत्रों द्वारा संगीत कला का भी ज्ञान होता है।

एलोरा के कैलाशनाथ मंदिर की मूर्तियाँ अत्यंत मनोरम और आकर्षक है। एलिफैन्टा की मूर्तियाँ अपनी सौम्यता और स्वभाविकता के लिए विख्यात हैं। दक्षिण भारत में पल्लव राज्य के सिंह स्तम्भ बड़े ही आकर्षक है। मामल्लपुरम् के रथ-मन्दिरों में देवी-देवताओं तथा पशु-पक्षियों की मूर्तियाँ नयनाभिराम हैं।

राजपूत राज्यों में सामाजिक जीवन

सामाजिक जीवन

कई जातियों और उपजातियों में समाज विभाजित था। समाज में ब्राह्मणों का ऊंचा स्थान था। वे राजपूत राजाओं के पुरोहित और मंत्री होते थे। उन्हें विशेष अधिकार और सुविधाएं प्राप्त थीं, जैसे प्राणदण्ड ब्राह्मणो को नहीं दिया जाता था। वे अपना समय अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ और धार्मिक संस्कारों में बिताते थे। रक्षा का भार क्षत्रियों पर होता था और वे शासक और सैनिक होते थे। व्यापार वैश्य करते थे। शूद्र अन्य जातियों की सेवा का कार्य करते थे। जाति-बन्धन कठोर होने के कारण समाज का विकास अवरुद्ध हो गया था। विचारों में संकीर्णता और रूढ़िवादिता आ गई थी। रूढ़िवादी प्रवृत्तियों से ग्रस्त हो जाने के कारण हिन्दू समाज की गतिशीलता समाप्त हो चुकी थी, फलत: अब वह विदेशियों को अपने में आत्मसात् नहीं कर सका।

प्रसिद्ध विद्वान् अलबेरूनी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि- हिन्दू लोग यह नहीं चाहते थे कि जो एक बार अपवित्र हो चुका है, उसे पुनः करके अपना लिया जाय। उनका विश्वास था कि एक देश, धर्म और जाति के रूप में श्रेष्ठतम थे। अलबेरूनी कहता है- हिन्दू विश्वास करते हैं कि उनके जैसा कोई देश नहीं, उनके कोई राष्ट्र नहीं, उनके जैसा शास्त्र नहीं- उनके पूर्वज वर्तमान पीढ़ी के समान संकुचित मनोवृत्ति वाले नहीं थे।

नारी का समाज में सम्मान होता था। पर्दै की प्रथा नहीं थी। राजपूतों की नारियों को पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त थी और वे अपने पाती का वरन स्वयं कर सकती थीं। स्वयंवर प्रथा का प्रचलन था। उच्च परिवारों की नारियां साहित्य और दर्शन का अच्छा ज्ञान रखती थीं। राजपूतों में सती-प्रथा भी प्रचलित थी। जौहर की प्रथा भी थी। जौहर एक प्रकार से सामूहिक आत्महत्या की पद्धति थी। जिसमें राजपूत नारियाँ विजयी शत्रुओं द्वारा अपवित्र होने के बजाय स्वयं को अग्नि की भेंट कर देती थीं।

विवाह सवर्ण और सजातीय होते थे। अन्तर्जातीय विवाह भी कभी-कभी होते थे। विधवा-विवाह आमतौर पर निम्न जातियों में प्रचलित था। विधवाओं की कठोर जीवन व्यतीत करना पड़ता था। कन्या का जन्म राजपूतों में अशुभ माना जाता था क्योंकि कन्या के विवाह के समय पिता को झुकना पड़ता था। कई बार कन्याओं का जन्म के समय ही वध कर दिया जाता था।

शुद्ध शाकाहारी भोजन अच्छा समझा जाता था। शराब और अफीम का भी राजपूतों में प्रचलन था। चावल, दाल, गेहूँ, दूध, दही, सब्जी तथा मिष्ठान्न लोगों का प्रमुख भोजन था। गरीब लोग मक्का, ज्वार, बाजरा का प्रयोग करते थे। रेशमी, ऊनी और सूती तीनों प्रकार के वस्त्रों का प्रयोग होता था।

संगीत, नृत्य, नाटक, चौपड, आखेट और शतरंज मनोविनोद के साधन थे। आभूषणों का आम प्रचलन था। आभूषण स्त्रियां और पुरुष दोनों पहनते थे।

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