विजयनगर के शासक

आरवीडु-वंश Aravidu Dynasty

लगभग 1570 ई. में अपने राज्यकाल के अन्त में तिरुमल ने नाममात्र के शासक सदाशिव को हटा दिया तथा आरवीडु वंश के लिए, जिस वंश का वह स्वयं था, गद्दी हड़प ली। उसके पुत्र एवं उत्तराधिकारी रंग द्वितीय ने साम्राज्य की कार्यक्षमता बढ़ाने की नीति को जारी रखा। 1568 ई. के लगभग रंग द्वितीय का उत्तराधिकारी उसका भाई वेंकट द्वितीय हुआ। उसका मुख्यालय चन्द्रगिरि में था। एक गौरवपूर्ण शासनकाल के बाद 1614 ई. में उसकी मृत्यु हुई। उसे विजयनगर का अन्तिम महान् शासक माना जा सकता है, जिसने साम्राज्य को अक्षुण्ण रखा। इस बात का एकमात्र अपवाद यह था कि 1612 ई. में राजा ओएडयार ने उसकी अनुमति लेकर, श्रीरंगपट्टम की सूबेदारी के नष्ट होने पर, मैसूर राज्य की स्थापना की। उसकी मृत्यु साम्राज्य के पतन का संकेत थी। इसके बाद उत्तराधिकार के लिए युद्ध हुआ तथा फलस्वरूप अनेकीकरण की शक्तियाँ उत्पन्न हुई। इन्हें विजयनगर का अन्तिम महत्वपूर्ण राजा रंग तृतीय अपने भरसक प्रयत्नों के बावजूद साम्राज्य के विद्रोही सामंतों की स्वार्थी प्रवृत्ति एवं बीजापुर तथा गोलकुंडा के मुस्लिम राज्यों की महत्त्वाकांक्षा के कारण नहीं रोक सका। इस प्रकार विजयनगर साम्राज्य के हिन्दू जागीरदार अन्त में उसके शत्रु सिद्ध हुए। उनके अविवेकी अहंकार, अन्ध स्वार्थ, राजद्रोह एवं आपसी कलह से बीजापुर एवं गोलकुडा के मुस्लिम राज्यों को हिन्दू दक्कन को जीतने में बड़ी सुगमता हुई, और भी सेरिंगापटम (श्री रंगापट्टम्) एवं बेदनूर (केलदी, इक्केरी) के सरदारों तथा मदुरा एवं तंजोर के नायकों के समान अधीन राजप्रतिनिधियों ने अपने स्वतंत्र राज्य बना लिया

तुलुव वंश

सन् 1505 ई. में जब वह स्वयं मर गया, तब उसके पुत्र वीर नरसिंह ने अन्तिम सालुव शासक को सिंहासनाच्युत कर स्वयं गद्दी पर अधिकार कर लिया। इसे द्वितीय बलापहार कहते हैं। इससे विजयनगर-साम्राज्य पर तुलुव-वंश का प्रत्यक्ष शासन स्थापित हो गया। कुछ ताम्रपत्रों पर और नूनिज द्वारा भी वीर नरसिंह का वर्णन एक ऐसे धार्मिक राजा के रूप में किया गया है, जो पवित्र स्थानों पर दान किया करता था।

वीर नरसिंह के बाद उसका छोटा भाई कृष्णदेवराय गद्दी पर बैठा, जो निस्संदेह विजयनगर का सबसे बड़ा शासक तथा भारत के इतिहास के सबसे प्रसिद्ध राजाओं में एक था। वह एक वीर और फुर्तीला योद्धा था। वह सदैव युद्धों में सफल रहा। उसने लगभग अपने संपूर्ण शासनकाल भर युद्ध लड़े। उत्तर में अपने बड़े प्रतिद्वन्द्वियों से लड़ने की चेष्टा करने से पहले उसने प्रथमत: अपने साम्राज्य के क्रन्दीय भाग में सामन्तों के दमन करने की आोर ध्यान दिया। 1510 ई. के अन्त में अपनु मुख्यालय को छोड़कर वह दक्षिणी मैसूर के अन्तर्गत उम्मतूर के विद्रोही नायक के विरुद्ध बढ़ा। वह (नायक) पराजित कर दिया गया और शिवसमुद्रम के दुर्ग को अधिकृत कर लिया गया (1511-1512 ई.)। अन्य निकटवत्तीं नायक भी आज्ञाकारी बना लिये गये। 1512 ई. में कृष्णदेवराज बीजापुर की ओर बढ़ा और रायचूर पर अधिकार जमा लिया। अपने योग्य एवं अनुभवी मंत्री और सेनापति सालुव तिम्मा की राय के अनुसार इस समय उसने मुसलमानी प्रदेशों पर आक्रमण ही नहीं किया, बल्कि उन प्रदेशों को पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया जो पहले विजयनगर के अन्तर्गत थे। 1513 ई. में वह उड़ीसा के गजपति प्रतापरुद्र के विरुद्ध मुड़ा। 1514 ई. के आरम्भ में उसने उदयगिरि के दुर्ग पर अधिकार कर लिया और उड़ीसा के राजा के एक चाचा और एक चाची को बंदी बना लिया, जिनके साथ सम्मान का बर्ताव किया गया। दूसरे वर्ष के पूर्वाद्ध तक उसने कोण्डवीडु का शक्तिशाली दुर्ग तथा निकटवर्ती अन्य अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण दुर्ग जीत लिये, यद्यपि उडीसा के राजा को गोलकुण्डा और बीदर के सुल्तानों से सहायता मिली थी। उसने गजपति राजकुमार वीरभद्र तथा उड़ीसा के कुछ अन्य सरदारों को बन्दी बना लिया। उसने राजकुमार को एक प्रदेश का शासक (प्रदेशपाल) बना दिया। कृष्ण शास्त्री का कथन है कि यह बात “कृष्णराय की उच्च राजनीतिज्ञता प्रमाणित करती है।” उड़ीसा के राजा के विरुद्ध अपने तृतीय युद्ध-अभियान में कृष्णदेवराय ने बेजवाडा में पड़ाव डाला, कोण्डपल्ली को घेर लिया और उस पर अधिकार कर लिया। इस अवसर पर भी उडीसा के राजा की पत्नी और एक पुत्र (राजकुमार वीरभद्र को छोड़कर) तथा उड़ीसा के कुछ सरदार एवं सेनापति उसके हाथों में पड़ गये। तब वह उत्तर-पूर्व की ओर विजगापटम् जिले के अन्तर्गत सिंहाचलम् तक बढ़ गया और अपने उड़ीसाई समकालीन को संधि करने को विवश किया। कृष्णदेवराय की अन्तिम महान् सैनिक सफलता 19 मार्च, 1520 ई. को रायचूर के निकट इस्माइल आदिलशाह पर उसकी विजय थी, जब कि इस्माइल आदिल शाह ने रायचूर दोआब को पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न किया था। कहा जाता है कि उसने बीजापुर राज्य को रौद डाला और गुलबर्गा के किले को मटियामेट कर दिया। संक्षेप में, कृष्णदेवराय की सैनिक विजयों से उसके उत्तरी शत्रुओं का दर्प-दलन हो गया और उसके साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार पश्चिम में दक्षिणी कोंकण तक, पूर्व में विजगापटम् तक तथा दक्षिण में प्रायद्वीप की सुदूरवर्ती सीमा तक हो गया। भारत-महासागर के कतिपय द्वीप एवं समुद्र-तट इस साम्राज्य के प्रभाव-क्षेत्र के अन्तर्गत थे। अपने जीवन के अन्तिम कुछ वर्षों में उसने सभी रूपों में साम्राज्य के संगठन तथा शान्तिमय प्रशासन के कायों पर ध्यान दिया।

कृष्णदेवराय ने पुर्तगीजों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखा और उन्हें सुविधाएँ भी दीं, क्योंकि जैसा कि सेवेल लिखता है, घोड़ों एवं अन्य आवश्यक पदार्थों के आयात से उसे अत्याधिक लाभ पहुँचता था।

1510 ई. में पुर्तगीज शासक (गवर्नर) अलबुकर्क ने उससे भटकल में एक दुर्ग का निर्माण करने की अनुमति माँगी, जिसकी स्वीकृति पुर्तगीजों के मुसलमानों से गोआ छीन लेने पर मिल गई। पुर्तगीज यात्री डोमिंगोस पाइस उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करता है- वह सब से अधिक विद्वान् एवं पूर्ण राजा है, जितना संभवत: हुआ जा सकता है-समभाव से ही प्रसन्न और परम प्रफुल्लित। वह ऐसे व्यक्तियों में से है, जो कार्यों के सम्बन्ध में सब-कुछ पूछते हैं-चाहे उनकी जो भी अवस्था हो। वह एक महान् शासक तथा न्यायप्रिय व्यक्ति है, किन्तु कभी-कभी क्रोधावेश के वशीभूत हो जाता है।…..जितनी सेना एवं प्रदेशों पर उसका अधिकार है उस हिसाब से वह श्रेणी में किसी से भी बड़ा राजा है। किन्तु सभी बातों में वह इतना शूर और पूर्ण है कि ऐसा प्रतीत होता है कि उसके जैसे व्यक्ति के पास जितना रहना चाहिए उसकी तुलना में वस्तुत: उसके पास कुछ भी नहीं है।

कृष्णदेवराय के शासन-काल में न केवल विजयनगर-साम्राज्य का क्षेत्र-विस्तार चरम उत्कर्ष को पहुँचा, बल्कि कला एवं विद्या के प्रोत्साहन और विकास के लिए भी यह उल्लेखनीय था। राय स्वयं प्रकांड विद्वान् और विद्या का उदार आश्रयदाता था। कृष्ण शास्त्री लिखते हैं कि वह- अपनी धार्मिक उमंग तथा उदारता के लिए किसी प्रकार कम विख्यात न था। वह हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों का समान आदर करता था, यद्यपि उसकी अपनी आस्था वैष्णव धर्म में थी।…….पराजित शत्रु के प्रति कृष्णराय की दयालुता, विजित नगरों के निवासियों के प्रति उसके दया एवं दानशीलता के कार्य, उसका महान् सैनिक पराक्रम जिसके कारण वह अपने जागीरदारों तथा अपनी प्रजा का समान भाव से प्रिय बन गया था, विदेशी राजदूतों के प्रति उसका अनवरत राजकीय स्वागत तथा दयालुता, उसकी प्रभावशाली व्यक्तिगत आकृति, उसका सुखप्रद रूप तथा नम्र भाषण जिनसे एक पवित्र एवं प्रतिष्ठित जीवन का पता चलता था, साहित्य एवं धर्म के लिए उसका प्रेम, अपनी प्रजा के कल्याण के लिए उसकी उत्कंठा तथा विशेषकर अति विशाल धनराशि जो वह मन्दिरों एवं ब्राह्मणों को दान के रूप में देता था- इन सब के कारण वह वस्तुत: दक्षिण भारत का सबसे महान् राजा था, जो इतिहास के पृष्ठों को कान्ति प्रदान करता है। उसने यवनराज्यस्थापनाचार्यअभिनवभोजआन्ध्रपितामह जैसी उपाधियाँ भी ली। उसने गौफर मंदिर का निर्माण करवाया। पुर्तगाली इंजीनियर की सहायता से सूखी जमीनों पर सिंचाई की व्यवस्था की। राजधानी के दक्षिणी सीमांत पर नागलपुर नामक नगर बसाया। इसके अलावा नरसिंह की एक प्रतिमा बनवायी। वास्तव में विजयनगर-साम्राज्य उसके राज्यकाल में अपने गौरव एवं समृद्धि के शिखर पर पहुँच गया, जब कि पुरानी तुर्क-अफगान सल्तनत प्रायः संकुचित एवं दुर्बल लाश बन गयी थी तथा शीघ्र एक नये तुर्की आक्रमण के द्वारा तेजी से बहा दी जाने वाली थी।

लेकिन विजयनगर-साम्राज्य के लिए खतरे उत्तर के उसके शक्तिशाली पड़ोसियों की महत्त्वाकांक्षा तथा उसके राजप्रतिनिधियों की मनोवृत्ति में छिपे थे। इनमें से दो राजप्रतिनिधियों- मदुरा के राजप्रतिनिधि तथा राज्य के केन्द्रीय खंड के राजप्रतिनिधि- ने तो कृष्णदेवराय के अन्तिम दिनों में भी (1528 अथवा 1529 ई. में) विद्रोह मचा दिया। पहले को तो कृष्णदेवराय की मृत्यु के पहले ही पुन: वशीभूत कर लिया गया, पर पिछले को उसके (कृष्णदेवराय के) उत्तराधिकारी के शासनकाल के प्रारम्भ में सबक सिखाया गया।

कृष्णदेवराय के मृत्यु 1529 ई. अथवा 1530 ई. में हो गयी। उसके बाद उसका सौतेला भाई अच्युत राय आया। अभिलेखीय एवं साहित्यिक प्रमाण बतलाते हैं कि अच्युत राय एकदम वैसा भीरु नहीं था,  जैसा कि नूनिज ने उसका वर्णन किया है। उसने मदुरा के विद्रोही राजप्रतिनिधि को दण्ड दिया तथा तिरुवांकर के राजा को, जिसने मदुरा के राजप्रतिनिधि को शरण दी थी, अपने अधीन कर लिया। किन्तु बाद में उसने शासन पर अपना नियंत्रण ढीले कर देने की जो भूल की वह सर्वथा उसके हित के विरुद्ध थी। इससे उसके राज्य के शासन पर उसके दो सालों के वर्चस्व स्थापित करने का अवसर मिला। इन दोनों का एक ही नाम था-तिरुमल। इससे चिढ़कर अन्य राजप्रतिनिधियों ने आरवीडु वंश के राम, तिरुमल तथा वेंकट नामक तीन भाईयों के नेतृत्व में एक प्रतिद्वन्द्वी दल बनाया। ये तीनों शासन करने वाले तुलुव-वंश से विवाह द्वारा संबद्ध थे। दलबंदी के फलस्वरूप राज्य विपत्तियों में पड़ गया। ये विपत्तियाँ विजयनगर-साम्राज्य के इतिहास की पूरी दौड़ तक कायम रहीं और उसके पूर्णत: लुप्त होने पर ही हटीं। इन विपत्तियों के कारण अच्युतदेवराय ने तिरूपति एवं कालाहस्ती में दो जगहों पर सिंहासनरोहण कराया। सन् 1541 ई. या 1542 ई. में अच्युतराय की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र वेंकटाद्रि अथवा वेंकट प्रथम सिंहासन पर बैठा, पर उसका राज्यकाल छः महीनों से अधिक नहीं टिका। तत्पश्चात् राजमुकुट अच्युत के एक भतीजे सदाशिव को प्राप्त हुआ।

सदाशिव राय अपने आरवीडु-वंशीय मंत्री रामराय के हाथों में कठपुतली-मात्र था, जो राज्य का यथार्थ शासक था। रामराय योग्यता से सम्पन्न था तथा विजयनगर-साम्राज्य की शक्ति को, जो कृष्णदेवराय की मृत्यु के बाद क्षीण हो गयी थी, पुन: स्थापित करने की कृत-संकल्प था। वह पहले गोलकुण्डा के शाही दरबार में सेवा कर चुका था। रामराय की नीति का एक महत्वपूर्ण लक्षण था दक्कन की सल्तनतों के झगड़ों में उसका क्रियाशील हस्तक्षेप। वह पहले एक के बाद अन्य किसी से मित्रता कर लेता था। उसके साहसी कार्य तात्कालिक दृष्टि से अवश्य सफल रहे। पर इनसे वह आवश्यकता से अधिक निश्चिन्त एवं उद्धत बन गया तथा ये अन्त में साम्राज्य के विनाश का कारण सिद्ध हुए। पुर्तगालियों के साथ रामराय के संबंध हमेशा मैत्रीपूर्ण नहीं रहे। 1542 में मार्टिन लाकोन्सो डीसोजा गोवा के गवर्नर के पद पर नियुक्त हुआ तब संबंध और भी बिगड़ गया। उसके उत्तराधिकारी जोआवडी कास्ट्रो के साथ 1547 ई. में रामराय ने एक संधि की। इसके अनुसार उसे घोड़े के व्यापार का एकाधिकार मिल गया। 1543 ई. में रामराय ने बीजापुर पर आक्रमण करने के उद्देश्य से अहमदनगर एवं गोलकुंडा के साथ संधि की। पर बीजापुर के मंत्री असद खाँ की कूटनीति से उसका लक्ष्य असफल हो गया। असद खाँ ने बुरहान निजाम शाह एवं रामराय के साथ अलग-अलग संधि कर ली और इस प्रकार संगठन को तोड़ डाला। 1558 ई. में सन्धि में परिवर्तन हुआ, जब बीजापुर, गोलकुंडा तथा विजयनगर ने मिलकर विरोध किया तथा उस पर आक्रमण कर दिया। इस अवसर पर विजयनगर की सेना ने अहमदनगर के लोगों को नाराज कर दिया। विजयनगर की सेना के इस उद्धत आचरण ने विजयनगर के प्रति दक्कन की सल्तनतों के चिरकालीन, मगर धीरे-धीरे सुलग रहे विरोध को प्रज्वलित कर दिया। बरार की सल्तनत को छोड़कर, सल्तनतें इसके विरुद्ध एक संघ में सम्मिलित हो गयीं, जो वैवाहिक गठबंधनों से बांध गया।

दक्कन के मित्र सुल्तानों ने 23 जनवरी, 1565 ई. को विजयनगर के विरुद्ध उस स्थान पर युद्ध किया जहाँ राक्षस तथा तगदी नामक दो गाँव हैं। इस युद्ध में विजयनगर की विशाल सेना की पराजय हुई तथा अपार क्षति हुई। बुरहाने-मआसिर का लेखक लिखता है कि विजेताओं ने जवाहरात, आभूषण, असबाब, ऊँट, खेमे, तम्बुओं के सामान, ढोल, झंडे, दासियाँ, दास एवं हर प्रकार के अस्त्र-शस्त्र इतनी मात्रा में अधिकृत किये कि सम्पूर्ण सेना अमीर बन गयी। फरिश्ता लिखता है कि इतनी अधिक लूट-खसोट हुई कि मित्र-सेना का प्रत्येक मनुष्य स्वर्ण, जवाहरात, खेमों, अस्त्रों, अश्वों एवं दासों से संपन्न हो गया। सुल्तानों ने प्रत्येक मनुष्य को, केवल हाथियों को छोड़कर जिसे उन्होंने अपने कार्य के लिए सुरक्षित कर लिया, जो भी उसने प्राप्त किया था उसे अपने पास रखने की अनुमति दे दी। हुसैन निजाम शाह ने रामराय को अपने हाथ से मार डाला तथा चिल्लाया अब मैंने तुझसे बदला ले लिया! अल्ला मुझे जो चाहे करे। विजयनगर का भव्य नगर लूट लिया गया तथा आक्रमणकारी सेना द्वारा इस प्रकार वैभवहीन कर दिया गया जिसका वर्णन सेवेल निम्नलिखित ढंग से करता है- तीसरे दिन ने अत्याचार का प्रारम्भ देखा। विजयी मुसलमान रणक्षेत्र में विश्राम तथा जलपान के लिए ठहरे थे, पर अब वे राजधानी पहुँच चुके थे तथा उस समय के बाद से पाँच महीनों तक विजयनगर को चैन नहीं मिला। शत्रु विध्वंस करने आये थे तथा उन्होंने अपना काम निर्दयता से किया।…….उनसे कुछ भी बचता हुआ मालूम नहीं पड़ा। उन्होंने विशाल चबूतरों पर खडे मंडपों को तोड़ दिया, जहाँ से राजा उत्सव देखा करते थे तथा नक्काशी के सारे काम को तहस-नहस कर दिया। उन्होंने नदी के निकट बिट्ठलस्वामी के मंदिर के शान से सजे हुए भवनों में भयंकर आग लगा दी तथा इसकी अत्यन्त सुन्दर प्रस्तर मूर्तियों को चकनाचूर कर दिया। वे प्रतिदिन अपने विध्वंस का कार्य अग्नि, तलवार, रंभों एवं कुल्हाड़ियों से करते रहे। शायद विश्व-इतिहास में ऐसा विध्वंस ऐसे अचानक तथा ऐसे भव्य नगर पर, कभी नहीं लाया गया है, जहाँ एक शक्तिशाली एवं उद्योगी लोग समृद्धि के पूर्ण प्राचुर्य मे अधिक संख्या में इकट्ठे हों तथा जो दूसरे दिन वर्णनातीत असभ्य जनसंहार एवं भय के दृश्यों के बीच पराजित, अपहृत एवं ध्वंश को प्राप्त हों।

तथाकथित तालीकोट का युद्ध वास्तव में भारत के निर्णयात्मक युद्धों में एक है। इससे दक्षिण में हिन्दुओं की प्रभुता का अवसर जाता रहा और यह सत्रहवीं सदी में मराठों के अभ्युदय तक एक नये तुर्की वंश के शासकों के आक्रमणों के लिए खुला रह गया। निस्सन्देह इस युद्ध से विजयनगर-साम्राज्य को महान् क्षति हुई, पर हाल के अनुसन्धानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि यह इस युद्ध के परिणामस्वरूप एकदम लुप्त नहीं हो गया। एक आधुनिक लेखक उचित ही कहता है कि तालीकोट विजयनगर-साम्राज्य के जीवन का संकटकाल था, पर अन्तिम संकटकाल नहीं। वास्तव में दुर्बल एवं अध:पतित उत्तर से अनवरत आक्रमणों के कारण दुर्बल तथा अन्दर के राजप्रतिनिधियों के असन्तोष एवं विद्रोह के कारण अध:पतित होने के पहले साम्राज्य आरवीडु वंश के शासकों के अधीन सत्रहवीं सदी के प्रारम्भिक भाग तक टिका रहा।

विजयी सल्तनतों को इस युद्ध के परिणामस्वरूप अन्त में अधिक लाभ नहीं हुआ। उनकी मैत्री शीघ्र विघटित हो गयी। उनमें आपसी द्वेष फिर पैदा हो गया। इससे विजयनगर साम्राज्य की रामराय के भाई तिरुमल के अधीन पुन: शक्ति प्राप्त करने का अवसर मिल गया। मुसलमानों के लौट जाने के बाद वह विजयनगर लौट आया परन्तु यहाँ कुछ समय तक ठहरने के बाद पेनुगोंडा चला गया। वहाँ उसने साम्राज्य की प्रतिष्ठा एवं शक्ति को पुन: उत्कर्ष की ओर उन्मुख किया।

सालुव वंश

राज्य को इन खतरों से बचाने के लिए नरसिंह सालुव ने अपने अयोग्य स्वामी को सिंहासन-च्युत कर दिया और 1486 ई. के लगभग स्वयं राजगद्दी पर अधिकार कर लिया। इस घटना को विजय नगर साम्राज्य के इतिहास में प्रथम बलापहार कहा जाता है। इसी के साथ संगम वंश का अंत और सालुव वंश का आरम्भ होता है।

नरसिंह सालुव को जनता का विश्वास प्राप्त था। उसके हृदय में साम्राज्य की भलाई एवं कल्याण की भावना थी। अपने छः वर्षों के शासन में उसने अधिकांश विद्रोही प्रान्तों को फिर से प्राप्त कर लिया, तथापि रायचूर दोआब बहमनियों के नियंत्रण में रहा तथा उदयगिरि उड़ीसा के राजा के नियंत्रण में रहा।

नरसिंह सालुव ने अपने विश्वासी सेनापति नरस नायक पर, जो तुलुव देश पर शासन कर चुकने वाले एक वंश से उत्पन्न होने का दावा करता था, अपने पश्चात् राज्य के प्रशासन का उत्तरदायित्व सौंप कर बुद्धिमत्ता प्रदर्शित की, यद्यपि उसकी इच्छा थी कि उसके पुत्र ही उत्तराधिकारी बनें। अभिलेखीय प्रमाण से मुसलमान इतिहासकारों एवं नूनिज के इस कथन का खण्डन हो जाता है कि नरस नायक ने अपने स्वामी के दोनों पुत्रों को मार डाला और स्वयं गद्दी हड़प ली। सच्चाई तो यह है कि वह अपने स्वामी के वंश के प्रति वफादार बना रहा। उसने अपने स्वामी (नरसिंह सालुव) के छोटे पुत्र इम्मदी नरसिंह को बड़ा करके सिंहासन पर बैठाया, जब बड़े की मृत्यु युद्ध में घावों के कारण हो गयी थी। फिर भी उसने तथ्यत: शासक के रूप में राज्य के कार्यों का प्रबन्ध योग्यतापूर्वक किया।

संगम वंश

विजयनगर के प्रथम वंश का नाम संगम के नाम पर रखा गया है। हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम के समय में विजयनगर-राज्य अपने प्रभाव के अधीन कई रजवाड़ों एवं प्रमंडलों को ले आया, जिनमें कुछ के मतानुसार, होयशल-राज्य का अधिकांश भाग सम्मिलित था। उसने साम्राज्य को देश, स्थल और नाडुओं में विभाजित किया और कारणामों के रूप में ब्राह्मणों को नियुक्त किया। इसकी राजधानी अनेक गुण्डी थी। पर कुछ लेखकों ने बताया है कि हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम ने सम्राट् के अनुकूल पूरी उपाधियाँ धारण नहीं कीं। 1374 ई. में बुक्का प्रथम ने चीन में एक दूत-मंडल भेजा। उसे राज सिंहासन का आधार कहा गया है। इसकी राजधानी गुट्टी थी। बुक्का प्रथम के पुत्र कुमारमान के संकल्प मदुरा विजय का वर्णन कुमारम्पन की पत्नी गंगादेवी की कृति मदुरम विजयम में है। वह 1378-1379 ई. में मर गया। उसका पुत्र हरिहर द्वितीय उसका उत्तराधिकारी हुआ, जिसने महाराजाधिराज, राजपरमेश्वर आदि सम्राट के अनुकूल उपाधियाँ धारण कीं। कुछ मुसलमान इतिहासकारों के आधार पर सेवेल अपनी पहले की रचना में कहता है कि हरिहर का शासनकाल अटूट शान्ति का काल था। किन्तु कुछ अभिलेखों से सिद्ध होता है कि उसके शासनकाल में विजयनगर-साम्राज्य और मुसलमानों के बीच संघर्ष हुए थे। सच पूछिए तो बहमनी राज्य के समान, विजयनगर साम्राज्य का इतिहास विभिन्न-शक्तियों से रक्तपूर्ण युद्ध करने की एक अनवरत कथा है। 1398 ई. के जाड़े के मौसम में हरिहर द्वितीय के पुत्र बुक्का द्वितीय ने अपने पिता की अनुमति से कृष्णा एवं तुंगभद्रा के बीच स्थित रायचूर दोआब को छीनने के विचार से उत्तर की ओर बहमनी राज्य पर आक्रमण कर दिया। यह दोआब विजयनगर-साम्राज्य एवं बहमनी राज्य के बीच कलह का कारण था। फीरोजशाह बहमनी ने उसका सामना कर उसे पराजित कर दिया। 1399 ई. के मध्य में एक समझौता हुआ और फीरोज ने भारी हर्जाना ऐंठा। किन्तु जैसा कि कई अभिलेखों से पता चलता है, हरिहर द्वितीय के शासनकाल में विजयनगर के अधिकार का विस्तार मैसूर, कनारा, चिंगलपुट, त्रिचनापल्ली तथा काजीवरम् (कांची) सहित समस्त दक्षिणी भारत पर हो गया था।

हरिहर द्वितीय शिव के विरूपाक्ष रूप का उपासक था, किन्तु अन्य धमों के प्रति सहिष्णु था। अगस्त, 1406 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। इसके पश्चात् कुछ समय तक उसके पुत्रों में राजसिंहासन के उत्तराधिकार के लिए झगड़ा चला। देवराय प्रथम ने किसी प्रकार 5 नवम्बर, 1406 ई. को सिंहासन पर अधिकार कर लिया। बहमनी सुल्तानों के साथ युद्ध करने में उसे कई बार पराजय का सामना करना पड़ा। उसके समय निकोलो कोन्टी का आगमन हुआ। देवराय प्रथम विजयनगर का प्रथम शासक था जिसने दस हजार मुस्लिमों को सेना में नियुक्त किया। देवराय प्रथम ने तुंगभद्रा नदी पर हरिद्रा बाँध बनवाया जिससे उसके राज्य में 3 लाख 50 हजार पेरदा की आमदनी बढ़ गई। उसके दरबार में श्रीनाथ रहता था जिसने हरविलासम् की रचना की। 1422 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके पुत्र विजय-बुक्का या वीर-विजय ने कुछ ही महीनों तक शासन किया। तब विजय-बुक्का का पुत्र देवराय द्वितीय सिंहासनारूढ़ हुआ। यद्यपि बहमनियों के साथ देवराय द्वितीय के युद्धों का अन्त पराजय एवं क्षति में हुआ, तथापि उसे राज्यकाल में प्रशासन का पुर्नसंगठन किया गया। बहमनियों की बराबरी करने के लिए उसने सेना में मुसलमानों को भर्ती किया। वाणिज्य को नियंत्रित एवं नियमित करने के लिए उसने लक्कन्ना या लक्ष्मण को, जो उसका दाहिना हाथ था, दक्षिण समुद्र का स्वामी बना दिया, अर्थात् विदेश-व्यापार का भार सौंप दिया। इटली के यात्री निकोलो कॉण्टी तथा फारस के दूत अब्दुर्रज्जाक ने क्रमशः 1420 ई. और 1443 ई. में विजयनगर का भ्रमण किया। उन्होंने उस नगर एवं विजयनगर-साम्राज्य की समृद्धि का विशद वर्णन किया है। वस्तुत: साम्राज्य का विस्तार अब समस्त दक्षिण भारत पर हो गया और वह सीलोन (श्रीलंका) के सामुद्रिक तटों तक पहुँच गया। प्रथम वंश के शासनकाल में यह अपनी समृद्धि की चरम सीमा पर पहुँच गया। देवराय द्वितीय ने इमादी देवराय और प्रोधरा देवराय की उपाधि ली। इसने गजबेटकार (हाथियों का शिकारी) की उपाधि ली। वह विद्वानों का भी संरक्षक था। महानाटक सुधानिधि की रचना एवं ब्रह्मसूत्र पर एक टीका लिखने का श्रेय उसी की है।

देवराय द्वितीय की मृत्यु 1446 ई. में हो गयी। उसका उत्तराधिकारी उसका सबसे बड़ा जीवित पुत्र मल्लिकार्जुन हुआ, जिसने अपनी राजधानी पर बहमनी सुल्तान एवं उड़ीसा के हिन्दू राज्य के राजा द्वारा किये गये संयुक्त आक्रमण को पीछे हटा दिया और अपने शासन-काल में अपने राज्य को अक्षुण्ण बनाये रखने में समर्थ हुआ। उसका शासन लगभग 1465 ई. तक चला। इसी शासन-काल की बात है कि चन्द्रगिरि का सालुव नायक नरसिंह, जिसके पूर्वजों ने सामन्तों के रूप में सच्चाई के साथ विजयनगर राज्य की सेवा की थी, ख्याति को प्राप्त हुआ और बहमनी राज्य एवं उड़ीसा के राज्य के आक्रमणों का प्रतिरोध किया। किन्तु मल्लिकार्जुन का उत्तराधिकारी विरूपाक्ष द्वितीय अयोग्य शासक प्रमाणित हुआ। स्वभावतः गडबडी एवं अव्यवस्था फैल गई। इसका लाभ उठाकर कुछ प्रान्त विद्रोह कर बैठे, बहमनी सुल्तान कृष्णा एवं तुंगभद्रा के बीच के दोआब में बढ़ गया और उड़ीसा का राजा पुरुषोत्तम गजपति दक्षिण में तिरुवन्नतमलय तक बढ़ गया।