विजयनगर साम्राज्य

राजनैतिक इतिहास

मुहम्मद तुगलक के काल में विजय नगर साम्राज्य की स्थापना हुई थी। विजयनगर का प्रारम्भिक इतिहास अभी भी अंधकार से आवृत्त है। उस विशाल राजनगर के उद्गम सम्बन्धी अनेक परम्परागत वर्णनों का निर्देश करते हुए सेवेल कहता है कि- सम्भवत: सर्वाधिक तर्कसंगत वर्णन हिन्दू पौराणिक कथाओं के सामान्य तात्पर्य और ऐतिहासिक तथ्य की निश्चित बातों के मिश्रण में से निकाला जा सकता है। वह उस परम्परागत कथा को स्वीकार करता है जिसके मतानुसार संगम के पाँच पुत्रों ने, जिनमें हरिहर और बुक्का सर्वाधिक प्रसिद्ध थे, तुंगभद्रा के उत्तरी तट पर स्थित अनेगुंडी दुर्ग के सम्मुख उसके दक्षिणी तट पर विजयनगर शहर एवं राज्य की नींव डाली थी। अपने इस साहसिक कार्य में उन्हें तत्कालीन प्रसिद्ध ब्राह्मण साधु एवं विद्वान् माधव विद्यारण्य तथा उनके भाई वेदों के प्रसिद्ध भाष्यकार सायण से प्रेरणा मिली। इस परम्परागत कथा को कुछ बाद की मिथ्या रचना मानते हैं, जिसका प्रचार (उनके मतानुसार) सोलहवीं शताब्दी में हुआ। रेवेरेंड फादर हेरास के मतानुसार, अनेगुडी नगर की, जो विजयनगर साम्राज्य का उत्पत्ति-स्थान था, नींव होयसल राजा वीर बल्लाल तृतीय ने डाली थी तथा उसी राज-परिवार का एक निकट सम्बन्धी हरिहर सीमा-प्रदेश का अधिकारी था एवं अपना मुख्यालय वहीं रखे हुए था। एक दूसरे लेखक के मतानुसार, उस नगर के दुर्गीकरण (किलाबन्दी) को, जो बाद में विजयनगर हो गया, महान् होयशल शासक वीर बल्लाल तृतीय का सुविचारित काम ही समझा जाना चाहिए। इसकी स्थापना मुहम्मद तुगलक की सेना द्वारा कम्पिली के विनाश के शीघ्र पश्चात् एवं होयशल राजधानी द्वारसमुद्र के आक्रमण के तुरत बाद हुई।

हाल में होयसल उद्गम के सिद्धान्त को एक लेखक की चुनौती मिली है, जिसने विभिन्न स्रोतों से इस प्रश्न पर विचार करते हुए तर्क किया है कि हरिहर और बुक्का ने उस नगर की स्थापना की तथा उन्होंने माधव विद्यारण्य की सलाह पर अपने आचरण का दिशा-निरूपण किया, जिनका वर्णन हरिहर द्वितीय के एक अभिलेख में सर्वोच्च प्रकाश अवतार के रूप में हुआ है। कतिपय अधिकारी विद्वानों के मतानुसार, वे पाँचों भाई वारंगल के काकतीय राज्य में सम्मिलित तेलुगु देश के भगोड़े थे, जिसकी राजधानी 1424 ई. में मुसलमानों द्वारा अधिकृत कर ली गयी थी। इन विरोधी सम्मतियों के बीच इतना ही कहा जा सकता है कि हरिहर और बुक्का तथा उनके तीन भाईयों ने उत्तर के आक्रमणकारियों की प्रगति के विरुद्ध प्रतिरोध संगठित करने के लिए गंभीर प्रयत्न किया। भारत के इतिहास में विजयनगर-साम्राज्य का महत्त्व यह है कि लगभग तीन शताब्दियों तक वह देश के प्राचीनतर धर्म एवं संस्कृति का साथ देता रहा और उन्हें नये विचारों एवं शक्तियों के प्रचंड आक्रमण द्वारा निगले जाने से बचा लिया। साथ ही, उसने बहमनी राज्य और उसकी शाखाओं को सदैव दक्षिण में फंसाये रखा तथा इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से उत्तर में उनके प्रभाव के विस्तार को रोका, जहाँ दिल्ली सल्तनत की शक्ति पहले से ही अत्यन्त दुर्बल हो चुकी थी। संक्षेप में, यह विजयनगर ही था, जिसके पास तुर्क-अफगान सल्तनत के पतन तथा महत्वपूर्ण देशी शक्तियों के अभ्युदय के कारण, तत्कालीन राजनैतिक परिस्थिति की कुंजी थी।

विजयनगर का वैभव

पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं सदियों में भारत का भ्रमण करने वाले विदेशी यात्रियों ने विजयनगर साम्राज्य के विषय में देदीप्यमान विवरण लिख छोडे हैं। विजयनगर शहर विशाल दुगों से घिरा तथा बृहदाकार था। इटली का यात्री निकोली कौण्टी, जिसने, लगभग 1420 ई. में यहाँ भ्रमण किया था, लिखता है- नगर की परिधि साठ मील है। इसकी दीवारें पहाड़ों तक चली गयी हैं तथा उनके अधोभाग में घाटियों को परिवेष्टित करती हैं, जिससे इसका विस्तार बढ़ जाता है। अनुमान किया जाता है कि इस नगर में अस्त्र धारण करने के योग्य नब्बे हजार आदमी हैं। राजा भारत के सभी अन्य राजाओं से अधिक शक्तिशाली है। अबदुर्रज्जाक, जो फारस से भारत आया था तथा 1442-1443 ई. में विजयनगर गया था, लिखता है- उस देश में इतनी अधिक जनसंख्या है कि कम स्थान में उसका अन्दाज देना असम्भव है। राजा के कोष में गड्ढे-सहित प्रकोष्ठ हैं, जो पिघले हुऐ सोने के थोक से भरे हैं। देश के सभी निवासी-ऊँच अथवा नीच, यहाँ तक कि बाजार के शिल्पकार तक कानों, गलों, बाँहीं, कलाइयों तथा अंगुलियों में जवाहरात एवं सोने के आभूषण पहनते हैं। डोमिंगौस पीजू (पेज या पेइस)जो एक पुर्तगीज था तथा जिसने विजयनगर का एक विस्तृत विवरण लिखा है, कहता है- इसके राजा के पास भारी खजाना है। उसके पास बहुत सैनिक एवं बहुत हाथी हैं, क्योंकि इस देश में ये बहुतायत से मिलते हैं…….इस नगर में आपको प्रत्येक राष्ट्र एवं जाति के लोग मिलेगे, क्योंकि यहाँ बहुत व्यापार होता है तथा बहुत-से बहुमूल्य पत्थर मुख्यतः हीरे पाये जाते हैं। यह संसार में सबसे सम्पन्न नगर है। यह चावल, गेहूँ, अन्न, मकई-जैसे खाद्य पदार्थों तथा कुछ मात्रा में जौ एवं सेम, मूग, दलहन, चने (घोड़े का दाना) तथा इस देश में उपजने वाले बहुत-से अन्य बीजों से परिपूर्ण है। ये लोगों के भोजन हैं और यहाँ इनका बड़ा भंडार है, तथा ये बड़े सस्ते हैं। गलियाँ तथा बाजार अनगिनत लदे हुए बैलों से भरे रहते हैं। एडोअडों बारबोस जो 1516 ई. में भारत में उपस्थित था, विजयनगर का वर्णन करते हुए लिखा है- अत्यन्त विस्तृत, अति जनाकीर्ण तथा देशी हीरों, पेगू की लाल-मणियों, चीन एवं अलेक्जेण्ड्रिया के रेशम और मालाबार के सिंदूर, कपूर, कस्तूरी, मिर्च एवं चन्दन के क्रियाशील व्यापार के स्थान के रूप में करते हैं।

आर्थिक अवस्था: विजयनगर साम्राज्य

भू-राजस्व प्रशासन- राजस्व नगद और उपज दोनों में वसूल किया जाता था। नगद राजस्व को सिद्धदाय कहा जाता था। भू-राजस्व से सम्बंधित विभाग अठनवे विभाग कहलाता था और भू-राजस्व को शिष्ट कहा जाता था। विजयनगर साम्राज्य में विभेदकारी कर पद्धति प्रचलित थी। जमीनो को कई भागों में विभाजित किया जाता था, यथा भीगी जमीन, सूखी जमीन और वन एवं जंगल। भू-राजस्व की राशि उपज के 1/6 भाग से 1/3 भाग तक निर्धारित थी। ब्राह्मणों को उत्पादन का 1/20 भाग कर के रूप में देना पड़ता था और मंदिरो को 1/30 भाग देना पड़ता था। सैनिक विभाग को कन्दाचार कहा जाता था और उसके प्रमुख महादण्डनायक कहलाते थे। न्यायालय चार प्रकार के होते थे- 1. तिस्ठिता 2. चल 3. मुद्रिता और 4. शास्त्रिता। कानून के सम्बन्ध में याज्ञवल्क्य स्मृति और पराशर स्मृति पर माधव का टीका महत्त्वपूर्ण ग्रंथ था।

भू-राजस्व कर के अतिरिक्त व्यवसायों एवं मकानों पर भी कर लगते थे। राजमहल की सुरक्षा से सम्बन्धित अधिकारी कवलकरस था। वह नायको के अन्दर कार्य करता था। कभी-कभी पुलिस के अधिकारों को बेच दिया जाता था जिसे पदिकावल कहा जाता था। पुलिस कर को अरसुस्वतंत्रम् कहा जाता था।

विदेशी विवरणों एव अन्य साधनों से भी यह स्पष्ट है कि विजयनगर साम्राज्य में असीम समृद्धि थी। राज्य के विभिन्न भागों में खेती उन्नति पर थी तथा राज्य सिंचाई की एक बुद्धिमत्तापूर्ण नीति का अनुसरण करता था। भूमि अधिकार के एक श्रेणी के अन्तर्गत सिंचाई में पूंजी निवेश के द्वारा आय प्राप्त की जाती थी। तमिल क्षेत्र में इसे दशवन्दा एवं आन्ध्र तथा कर्नाटक में कटट्कोडर्गे कहा जाता था। ग्राम में कुछ विशेष सेवाओं के बदले भूमि प्रदान की जाती थी, ऐसी भूमि को उबलि कहा जाता था। युद्ध में मारे को दी गयी भूमि को रत्तकोडगै कहलाती थी। पट्टे पर ली गयी कुट्टगि कहा जाता था। भू-स्वामी एवं पट्टेदार के बीच उपज की हिस्सेदारी को वारम कहा जाता था। कृषक मजदूर कुदि कहलाते थे। कभी-कभी खरीद बिक्री के साथ कृषक मजदूर भी हस्तांतरित कर दिये जाते थे।

विदेशी व्यापार उन्नत अवस्था में था। मालावर तट पर सबसे महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह कालीकट था। अब्दुर्र रज्जाक के अनुसार, सम्पूर्ण साम्राज्य में 300 बंदरगाह थे। निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपड़ा, चावल, शोरा, लोहा, चीनी एवं मशालें। साम्राज्य में आयात की मुख्य वस्तुएँ घोडे, मुक्ता, ताँबा, मुंगा, पारा, चीनी, रेशम और मखमल। बारबोसा के अनुसार दक्षिण भारत के जहाज मालद्वीप में बनते थे।

अब्दुर्र रज्जाक के अनुसार, चुंगीघर के आफीसर व्यापारिक सामानों की देख-रेख करते थे और बिक्री पर 40वाँ हिस्सा कर के रूप में लेते थे। मलक्का के साथ काली मिर्च का अच्छा व्यापार था। इतालवी यात्री बार्थेमा (1505 ई.) के अनुसार कैम्बे के निकट बहुत बड़े परिमाण में सूती वस्त्र बनते थे और हर साल सूती और सिल्क वस्त्र से लादे हुए 40 या 50 जहाज विभिन्न देशों में भेजे जाते थे। विजयनगर साम्राज्य में सिक्के बनाने के लिए तीन प्रकार के धातु प्रयुक्त होते थे- सोना, चाँदी और ताँबा। अब्बदुर रज्जाक भी शाही टकसाल का उल्लेख करता है।

सोने के सिक्के बराह और पेरदा कहलाते थे जबकि मिश्रित धातु (सोना और चाँदी) परतब (वराह का आधा), फनम (परतब का आधा हिस्सा) कहलाते थे। इन सब सिक्कों में फनम सबसे ज्यादा उपयोगी था। चाँदी का सिक्का टार (फनम का छठा हिस्सा) था और ताँबे का सिक्का डिजटेल कहलाता था।

विदेशी व्यापार में वस्तु विनिमय की अपेक्षा मुद्रा की अधिक आवश्यकता थी। विजयनगर साम्राज्य में अनेक टकसाले थीं तथा प्रत्येक प्रांतीय राजधानी की अपनी टकसाल होती थी। स्थानीय मुद्राओं के अतिरिक्त तटीय क्षेत्रों में विदेशी मुद्रा भी प्रचलित थी-जैसे पुर्तगाली मुद्रा कुज्रेडो, फारसी-दीनार, इटली का फ्लोरीन तथा दुकत।

ग्रामीण विकास में मंदिरों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। मंदिर कृषि और व्यापार के अतिरिक्त सूद पर भी रुपये देते थे। ऋण पर ब्याज की दर 12 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक वार्षिक होता था। जब कर्जदार ऋण नहीं चुका पाता था तो उसकी भूमि मंदिर की हो जाती थी। मंदिर ही बंजर भूमि खरीद कर और उस पर जुलाहों को बसा कर अथवा सिंचाई योजनाओं का निरीक्षण कर ग्राम विकास को प्रोत्साहन देते थे।

प्रमुख व्यवसाय बुने हुए कपड़ों, खानों की खुदाई तथा धातुशोधनविद्या से सम्बन्धित थे तथा छोटे व्यवसायों में सबसे महत्वपूर्ण गंधी का पेशा था। राज्य के आर्थिक जीवन में शिल्पियों एवं व्यापारियों के संघों का एक महत्वपूर्ण भाग था। अब्दुर्रज्जाक लिखता है- प्रत्येक पृथक संघ अथवा शिल्प के व्यापारियों की दुकानें एक दूसरे के निकट हैं। पीज भी कहता है- प्रत्येक गली में मंदिर है, क्योंकि ये (मंदिर) सभी शिल्पियों तथा व्यापारियों की संस्थाओं (से संस्थाएँ हम लोगों के देश के गिल्ड के समान होती हैं जिन्हें आप जानते हैं) के होते हैं। राज्य की आर्थिक अवस्था की सबसे उल्लेखनीय विशेषता थी देश के भीतर का, तटवर्ती एवं सामुद्रिक व्यापार। मालाबार तट पर सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह कालीकट था तथा अबुर्रज्जाक के लेखानुसार साम्राज्य में तीन सौ बन्दरगाह थे। इसका भारत-महासागर के द्वीपों, मलय द्वीपपुज, बर्मा, चीन, अरब, फारस, दक्षिण अफ्रीका, अबिसीनिया एवं पुर्तगाल के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था। निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपड़ा, चावल, लोहा, शोरा, चीनी एवं मसाले थे। साम्राज्य के आयात घोडे, हाथी, मुक्ताएँ, ताम्बा, मूंगा, पारा, चीनी, रेशम एवं मखमल थे। देश के आन्तरिक व्यापार के लिए यातायात के सस्ते साधन कावडी, सिर पर बोझ ढोने वाले, लद्दू घोडे, लददू बैल, गाड़ियाँ एवं गधे थे। तटवर्ती एवं सामुद्रिक व्यापार के लिए जहाजों का व्यवहार किया जाता था। बारबोसा के लेखानुसार दक्षिण भारत के जहाज मालदीप द्वीपों में बनते थे। अभिलेख-सम्बन्धी प्रमाण से यह सिद्ध होता है कि विजयनगर के शासक जहाजी बेड़े रखते थे तथा पुर्तगीजों के आगमन के पहले वहाँ के लोग जहाज-निर्माण कला से परिचित थे। पर हम लोगों को इस बात का कोई निश्चित ज्ञान नहीं है कि किस प्रकार विजयनगर-साम्राज्य समुद्री यातायात के महत्वपूर्ण प्रश्न को हल करता था।

विजयनगर-साम्राज्य के सिक्के विभिन्न प्रकार के होते थे। ये सोने और ताँबे दोनों के थे चाँदी के सिक्के का एक ही नमूना था। सिक्के पर विभिन्न देवताओं एवं पशुओं के प्रतीक रहते थे, जो शासकों के धार्मिक विश्वास के अनुसार बदलते रहते थे। वस्तुओं के मूल्य कम थे। विदेशी यात्रियों के विवरणों से हमें मालूम होता है कि उच्च वर्ग के लोगों के रहने का स्तर ऊँचा था। पर अभिलेखों से हम जानते हैं कि साधारण जनता भारी करों के बोझ से कराह रही थी, जो स्थानीय शासकों द्वारा कड़ाई से वसूले जाते थे। कभी-कभी सर्वोच्च शासक इन स्थानीय शासकों पर प्रतिबन्ध लगाते थे।

सामाजिक जीवन: विजयनगर साम्राज्य

विदेशी यात्रियों के विवरणों, अभिलेखों तथा साहित्य में विजयनगर-साम्राज्य के लोगों के सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं के संकेत प्रचुर मात्रा में मिलते हैं, जिनमें हम यहाँ केवल अधिक महत्वपूर्ण पहलुओं का अध्ययन कर सकते हैं।

स्त्रियों का सामान्यत: समाज में ऊँचा स्थान था तथा देश के राजनैतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक जीवन में उनके सक्रिय भाग लेने के दृष्टान्त दुष्प्राप्त नहीं हैं। कुश्ती लड़ने, तलवार एवं ढाल चलाने तथा संगीत एवं अन्य ललित कलाओं में प्रशिक्षित होने के अतिरिक्त कम-से-कम कुछ स्त्रियों को अच्छी साहित्यिक शिक्षा दी जाती थी। नूनिज लिखता है- उसके (विजयनगर के राजा के) पास मल्ल युद्ध करने वाली, ज्योतिष-विद्या जानने वाली एवं भविष्यवाणी करने वाली स्त्रियाँ भी हैं। उसके पास ऐसी स्त्रियाँ हैं, जो फाटकों के अन्दर किये गये खचों का पूरा हिसाब लिखती हैं। अन्य स्त्रियाँ भी हैं, जिनका कर्तव्य है राज्य के कार्यों को लिखना तथा अपनी पुस्तकों की बाहरी लेखकों की पुस्तकों से तुलना करना। उसके पास संगीत के लिएं भी स्त्रियाँ है, जो वाद्य बजाती तथा गाती हैं। राजा की पत्नियाँ तक संगीत में दक्ष हैं। ……कहा जाता है कि उसके पास न्यायाधीश एवं नाजिर हैं और पहरेदार भी हैं, जो हर रात राजमहल में पहरा देते हैं तथा ये स्त्रियाँ हैं। पत्नियों की अनेकता विशेष रूप से धनी वगों में प्रचलित प्रथा थी। बाल-विवाह सामान्य रीति थी। सामाजिक जीवन में सम्भ्रान्त लोगों में अत्यधिक दहेज ऐठने की कुप्रथा उग्र रूप में प्रचलित थी। विभिन्न सम्प्रदायों में झगड़ों को सुलझाने के लिए कभी-कभी राज्य सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप किया करता था। सती-प्रथा विजयनगर में बहुत प्रचलित थी तथा ब्राह्मण स्वच्छन्दता से इसके लिए अनुमति देते थे।

शासकों से उच्च सम्मान पाने के कारण ब्राह्मणों का महत्वपूर्ण प्रभाव केवल सामाजिक एवं धार्मिक बातों में ही नहीं, बल्कि राज्य के राजनैतिक मामलों में भी था। नूनिज उनका वर्णन- ईमानदार, व्यापार में संलग्न, बहुत चतुर, अत्यंत मेधावी, हिसाब-किताब में परम दक्ष, दुबले-पतले तथा सुगठित, पर कठिन कार्य के अयोग्य व्यक्तियों के रूप में करता है।

भोजन के मामलों में कड़े प्रतिबन्ध नहीं थे। फलों, सब्जियों तथा तेल के अतिरिक्त, साधारण लोग बैलों एवं गायों का, जिनके लिए लोगों में बड़ी श्रद्धा थी, मांस छोड़ कर, सभी प्रकार के मांस खाते थे। पर ब्राह्मण किसी जीवित वस्तु को कभी मारते अथवा खाते नहीं थे। नूनिज विजयनगर के राजाओं के भोजन का विवरण इस प्रकार देता है-

विसनग (विजयनगर) के ये राजा हर प्रकार की वस्तु खाते हैं, पर बैलों अथवा गायों का मांस नहीं। इन्हें वे कभी नहीं मारते क्योंकि वे इनकी पूजा करते हैं। वे भेड़ का मांस, सूअर का मांस, हरिण का मांस, तीतर, खरगोश, पंडुक, बटेरें तथा सब तरह की चिड़ियाँ-यहाँ तक कि गौरैया, चूहे, बिल्लियाँ तथा छिपकलियाँ भी खाते हैं। ये सभी चीजें, विसनग (विजयनगर) शहर के बाजार में बिकती है। हर चीज को जीवित बेचना पड़ता है, ताकि हरेक आदमी यह जान सके कि वह क्या खरीद रहा है। यह बात कम-से-कम आखेट के जानवरों और पक्षियों के साथ है। नदियों से मछलियाँ भी अधिक परिमाण में आती हैं।

डाक्टर स्मिथ लिखते हैं कि यदि पीज एवं नूनिज के विवरण सत्य हों, तो यह राजकुमारों तथा लोगों के लिए एक विचित्र भोजन-तालिका थी, जो कृष्णदेवराय एवं अच्युत राय के समय में कट्टर हिन्दू थे तथा विष्णु के कुछ रूपों के प्रति विशेष भक्ति रखते थे। अधिक सम्भावना यह है कि चूहे, बिल्लियाँ तथा छिपकलियाँ समाज के निम्न वर्ग के लोग खाते थे, जो विजयनगर के जन-समाज के अनार्य तत्त्व थे।

विदेशी यात्री राज्य में बहुत से बलिदानों का वर्णन करते हैं। पीज के लेखानुसार राजा चौबीस भैसों और डेढ़ सौ भेड़ों का बलिदान होते देखा करता था, जिसमें एक बड़े हँसुए से एक ही बार में जानवर का सिर काट लिया जाता था। प्रसिद्ध नवरात्रि पर्व के अन्तिम दिन अढ़ाई सौ भैसों तथा साढ़े चार हजार भेड़ों की बलि चढ़ाई जाती थी।

विजयनगर की सामाजिक संरचना की तीन प्रकार की विशेषताएँ थी-

1. दक्षिण भारत के ब्राह्मणो की धर्म निरपेक्ष भूमिका- दक्षिण भारत के ब्राह्मण महत्त्वपूर्ण राजनैतिक पदों को सुशोभित करते थे। वे मंत्री, सेनानायक, दुर्ग रक्षक आदि पदों पर नियुक्त होते थे।

2. निचले सामाजिक समूहों में दोहरा विभाजन- निचले सामाजिक समूह दायाँ हाथ और बाएँ हाथ में विभाजित थे। दाएँ हाथ से जुड़ी हुई जातियाँ वैष्णव होती थी और बाएँ हाथ से जुड़ी हुई जातियाँ शैव होती थी। दाएँ हाथ से जुड़ी हुई जातियाँ कृषि उत्पादन तथा कृषि उत्पादों एवं स्थानीय व्यापार में संलग्न थीं जबकि बाएँ हाथ से जुड़ी जातियाँ गैर कृषि उत्पादन, व्यापार तथा शिल्प से संबद्ध थी।

3. समाज का क्षेत्रीय खंडीकरणः समाज के क्षेत्रीय खडीकरण से तात्पर्य समाज का प्राकृतिक उपक्षेत्रों में विभाजन अर्थात् एक क्षेत्र में निवास करने वाली जाति दूसरे क्षेत्र के उसी जाति से रक्त संबंध नहीं जोड़ पाती थी और इसी का स्वाभाविक परिणाम था कि दक्षिण में भाई-बहन और मामा-भांजी में वैवाहिक संबंध वर्जित थे। सुनारों, लोहारों एवं बढ़ईयों की हैसियत समाज में ऊँची थी, किन्तु जुलाहों एवं कुम्हारों का स्थान नीचा था।

श्रीरंग के शासन-काल में 1632 ई. के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने कुछ ग्रामों के निवासियों को आदेश दिया कि दस्तकार समुदायों में बढ़ई, लोहार और सुनार के साथ नहीं किया जाए और इसका उल्लंघन करने वालों पर 12 पण जुर्माना लाद दिया गया। तेलियों, कलालों और चमारों की हैसियत समाज में नीची थी। ब्राह्मण जाति सर्वप्रमुख जाति थी। क्षत्रियों के विषय में जानकारी प्राप्त नहीं होती। मध्य वर्गों में शेट्ठी या चेट्टी नामक एक बड़े समूह का उल्लेख मिलता है। चेट्टियों के ही समतुल्य व्यापार करने वाले तथा दस्तकार वर्ग के लोग थे उन्हें वीरपंचाल कहा जाता था। इसके अतिरिक्त विप्र्विनोदन नामक एक जातीय श्रेणी थी, इसमें लोहार, स्वर्णकार और दस्तकार शामिल थे। कैकोल्लार (जुलाहे), कम्बलतर, शास्त्र्वाहक और गड़ेरिया नाइ और रेडी कुछ क्षेत्र में महत्वपूर्ण समुदाय थे। इस काल में उत्तर भारत के बहुत सारे लोग दक्षिण भारत में बस गए थे। उन्हें बदव कहा जाता था। दक्षिण भारत के व्यापार को उन्होंने अपनाना शुरू किया। इसने एक प्रकार के सामाजिक विद्वेष को जन्म दिया।

कैकोल्लार (जुलाहे) मंदिरों की परिसीमा में भी रहते थे और मंदिर के प्रशासन एवं स्थानीय करारोपण में उनका बहुत बड़ा हाथ था। दूसरी तरफ डोम, जोगी और मछुआरों की सामाजिक स्थिति हेय थी। विजयनगर में दास प्रथा प्रचलित थी और दासों की खरीद बिक्री को बेसबग कहा जाता था।

स्त्रियो की स्थिति- स्त्रियो की स्थिति एक से अच्छी और बुरी दोनों थी। किन्तु कुल मिलाकर उनकी स्थिति निम्न ही थी। नूनिज के अनुसार, राजप्रसाद में रहने वाली महिलाओं में अनेक ज्योतिष, भविष्य वक्ता, संगीत और नृत्य में प्रवीण और राज्य की अंग रक्षिकायें भी होती थीं। इसके अतिरिक्त कुछ महिलायें कुश्ती लड़ती थीं और मल्ल युद्ध भी करती थीं।

विजयनगर में देवदासी की प्रथा प्रचलित थी। डोमिंगोपायस देवदासी प्रथा की सूचना देता है। इस काल में सती प्रथा का प्रमाण भी मिलता है। बारबोसा कहता है कि सती प्रथा शासक वर्ग में प्रचलित थी। 1534 ई. के एक अभिलेख में मालगौरा नामक एक महिला के सती होने का प्रमाण मिलता है। विजयनगर काल में वैश्या वृति भी प्रचलित थी। विजयनगर साम्राज्य में बाल-विवाह और दहेज प्रथा का भी प्रचलन था। विधवा व्यवस्था थी। परन्तु विधवा से विवाह करने वाले विवाह-कर से मुक्त कर दिये जाते थे। युद्ध वीरता दिखाने वाले पुरुषों को गंडप्रेद प्रदान किया जाता था जो सम्मान सूचक था। सांप्रदायिक विवादों के मामलों में भी राज्य का हस्तक्षेप होता था। श्रवणवेलगोल से प्राप्त एक अभिलेख में जैन एवं वैष्णव के विवाद में राज्य के हस्तक्षेप की चर्चा है।

कला और साहित्य: विजयनगर साम्राज्य

विजयनगर-साम्राज्य को देदीप्यमान सांस्कृतिक एवं कलात्मक कायों का श्रेय प्राप्त है। सम्राट् संस्कृत, तेलुगु, तमिल एवं कन्नड़ सभी भाषाओं के संरक्षक होते थे तथा उनके प्रोत्साहनपूर्ण आश्रय में साहित्य की कुछ सर्वश्रेष्ठ कृतियों की रचना हुई। वेदों के प्रसिद्ध भाष्यकार सायण तथा उनके भाई माधव विजयनगर के शासन के प्रारम्भिक काल में प्रादुर्भूत हुए तथा राज्य से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध था। अन्य क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी कृष्णदेवराय का राज्यकाल विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। यह दक्षिण भारत के साहित्यिक इतिहास में एक नवीन युग का उषाकाल था। वह स्वयं विद्वान्, संगीतज्ञ एवं कवि था। वह अपने को कवियों, दार्शनिकों एवं धार्मिक शिक्षकों से घिरा रखना पसन्द करता था तथा उन्हें भूमि एवं धन के उदारतापूर्ण दानों से सम्मानित करता था। उसने अपनी सबसे महत्वपूर्ण कृति आमुक्तमाल्यदातेलुगु में लिखी, जिसकी भूमिका में, उसने संस्कृत में लिखी अपनी पाँच पुस्तकों की चर्चा की है। यह पुस्तक केवल धार्मिक महत्व की ही नहीं, बल्कि कृष्णदेवराय के राज्यकाल के लिए विशेष ऐतिहासिक महत्व की है। उसके दरबार में अष्टदिग्गज थे, जिन पर (तेलुगु) साहित्य का संसार टिका था। उसके राजकवि पेद्दन की बड़ी ख्याति थी तथा तेलुगु लेखकों में उसका स्थान ऊँचा था। आरवीडु-वंश के शासकों तक ने कवियों एवं धार्मिक उपदेशकों को आश्रय दिया तथा उनके अधीन तेलुगु साहित्य पुष्टि की हुई शक्ति से उन्नत हुआ। छोटे नायकों एवं सम्राटों के सम्बन्धियों में भी लेखक थे। पेद्दन की महत्त्वपूर्ण कृतियाँ-मनुचरित और स्वारोचीस सम्भव है। इसकी एक महत्त्वपूर्ण कृति हरिकथा शरणम् है। तेलुगु के एक दूसरे विद्वान् नदितिम्मन ने परिजातापहरण की रचना की। कृष्णदेवराय ने तेलुगु भाषा में एक महत्त्वपूर्ण कृति अमुक्तमाल्यदा की रचना की। कृष्णदेवराय ने एक संस्कृत में भी ग्रंथ लिखा था जिसका नाम था जाम्वतीकल्याणम्। उस काल में संगीत पर भी महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई। लक्ष्मीनारायण ने संगीत सूर्योदय नामक ग्रंथ लिखा। कृष्णदेवराय और रामराय एक अच्छे संगीतज्ञ थे। कृष्णदेवराय के दरबार में तेनालीराम नामक विदुषक रहता था। उसने पोदुरंग महात्मय नामक ग्रंथ की रचना की। महात्म्य माधव के भाई साय के नेतृत्व में महत्त्वपूर्ण विद्वानों ने चारों वेदों पर टीकायें लिखी। माना जाता है कि वेल्लोर के नायकों के अधीन अप्पयादीक्षित नामक विद्वान् रहते थे। उन्होंने शैवाद्वैत पर टीका लिखी। संगीत-नृत्य, नाटक, व्याकरण, न्याय, दर्शन इत्यादि के ग्रंथों को सम्राटों एवं उनके मत्रियों से प्रोत्साहन मिला। संक्षेप में, विजयनगर-साम्राज्य दक्षिण भारतीय संस्कृति का एक समन्वय था

संस्कृति के विकास के साथ कला एवं वास्तुकला की भी विलक्षण उन्नति हुई। इस साम्राज्य की पुरानी राजधानी के खंडहर संसार को यह घोषित करते हैं कि इसके गौरव के दिनों में स्वदेशी कलाकारों ने यहाँ वास्तुकला, मूर्तिकला एवं चित्रकला की एक पृथक् शैली का विकास किया था। माना जाता है कि दक्षिण में द्रविड़ शैली स्वतंत्र शैली के रूप में विकसित हुई थी और इस शैली में व्यापक निर्माण कार्य हुआ था। किन्तु मलिक काफूर के अधीन अलाउद्दीन की सेना ने दक्षिण के स्थापत्य को छत-नष्ट कर दिया। विजयनगर साम्राज्य हिन्दू नई उत्थानवादी पुनरुत्थान के आदर्श से जुड़ा हुआ था। माना जाता है कि बुक्का प्रथम ने संपूर्ण भारत के विद्वानों, हिन्दू, शिल्पकारों और कारीगरों को विजयनगर साम्राज्य में आमंत्रित किया था। द्रविड़ शैली के आधार पर ही विजयनगर साम्राज्य का स्थापत्य विकसित हुआ। इसकी विशेषतायें निम्नलिखित थी-

  1. मण्डप के अतिरिक्त कल्याण मण्डप का प्रयोग (इसमें देवताओं और देवियों का विवाह होता था)
  2. अलंकृत स्तम्भों का प्रयोग,
  3. एक ही चट्टान को काटकर स्तम्भ और जानवर की आकृति बनायी जाती थी, जिसमें सबसे स्पष्ट है दो पैरों पर खड़ा घोड़ा।

कृष्णदेवराय ने हजारा एवं विट्ठलस्वामी के मंदिर का निर्माण कराया। उन्होंने अम्बारम में तदापाती और पार्वती का मंदिर कांचीपुरम में बरदराज और एकम्बरनाथ के मंदिर का निर्माण कराया। लौंघर्स्ट कहता है कि कृष्णदेवराय के शासनकाल में बनाया गया प्रसिद्ध हजार मन्दिर विद्यमान हिन्दू मन्दिरों की वास्तुकला के पूर्णतया नमूनों में एक है। बिट्ठलस्वामी मन्दिर भी विजयनगर शैली का एक सुन्दर नमूना है। पगुसन के विचार में यह फूलों से अलंकृत उस वैभव की पराकाष्ठा का द्योतक है, जहाँ तक शैली पहुँच चुकी थी। चित्रकला उत्तमता की ऊँची सीढ़ी पर पहुँच गयी। यह चित्रकला लिपाक्षी कला कहलाती है। इसके विषय रामायण एवं महाभारत से लिये गए हैं। संगीतकला का शीघ्रता से विकास हुआ। संगीत के विषय पर कुछ नयी पुस्तकें लिखी गयीं। कृष्णदेवराय तथा संरक्षक (रीजेंट) रामराय संगीत में प्रवीण थे। नाट्यशालाओं से राज्य के लोगों का मनोरंजन होता था। यह यक्षणी शैली के नाम से जाना जाता है।

अभिलेखनीय तथा साहित्यिक प्रमाण स्पष्टत: बतलाते हैं कि विजयनगर के शासक धार्मिक प्रवृत्ति के तथा धर्म में अनुरक्त थे। पर वे धर्मोन्मत्त व्यक्ति नहीं थे। तत्कालीन चार सम्प्रदायों-शैव, बौद्ध, वैष्णव एवं जैन-तथा विदेशी धर्मों-ईसाई, यहूदी एवं मूरिश (इस्लाम) तक के प्रति उनका रुख उदारता पूर्ण था। बारबोसा लिखता है- राजा ऐसी स्वतंत्रता देता है कि प्रत्येक मुनष्य बिना किसी खीझ और जाँच-पड़ताल के, कि वह ईसाई, यहूदी, मूर (मुस्लिम) अथवा हिन्दू है, अपने धर्म के अनुसार कहीं भी आ-जा तथा रह सकता है।

शासन व्यवस्था: विजयनगर साम्राज्य

राजा का पद सवाँच्च था। वह दिग्विजय की उपाधि धारण करता था। विजयनगर-साम्राज्य में धीरे-धीरे एक केन्द्रमुखी शासन का विकास हुआ, जिसकी सभी शाखाएँ सावधानी से संगठित थीं। इसमें सन्देह नहीं कि जैसा काम इसके शासकों ने अपने ऊपर लिया था उसके लिए उन्हें एक प्रबल सेना रखना तथा सैनिक आक्रमण भी करना पड़ा, पर उनके राज्य का वर्णन शक्ति पर आधारित मुख्यतः सैनिक राज्य के रूप में करना तथा उसे एक ऐसा संगठन, जिसमें “विकास का कोई सिद्धांत न था,……मानव-प्रगति का कोई आदर्श न था और इसलिए टिकाऊपन न आ सका, कहकर उसे कलंकित करना है, जैसा कि एक आधुनिक लेखक ने किया है, सही नहीं मालूम पड़ता। सच बात तो यह है कि साम्राज्य-विस्तार के साथ इसके शासकों ने शासन का संगठन इस कार्यक्षमता से किया कि जिससे युद्धकाल में फैली हुई अव्यवस्था का अन्त हो गया तथा विभिन्न क्षेत्रों में शान्तिपूर्ण कार्य करना सुगम हो गया।

अन्य मध्यकालीन सरकारों की तरह, विजयनगर-राज्य में राजा समस्त शक्ति का स्रोत था। वह नागरिक, सैनिक तथा न्याय-सम्बन्धी मामलों में सर्वोच्च अधिकारी था तथा प्राय: सामाजिक झगड़ों को सुलझाने के लिए हस्तक्षेप भी किया करता था। पर वह अनुत्तरदायी निरंकुश शासक नहीं था, जो राज्य के हितों की अवहेलना करता और लोगों के अधिकारों एवं इच्छाओं की उपेक्षा करता । विजयनगर के राजा लोगों की सद्भावना प्राप्त करना जानते थे। अपनी उदार नीति से उन्हेने राज्य में शान्ति एवं समृद्धि लाने में सहायता दी। कृष्णदेवराय अपनी आमुक्तमाल्यदा में लिखता है कि एक मूर्धाभिषिक्त राजा को सर्वदा धर्म की दृष्टि में रखकर शासन करना चाहिए। वह आगे कहता है कि राजा को अपने पास राजकाज में कुशल लोगों को एकत्रित कर राज्य करना चाहिए, अपने राज्य में बहुमूल्य धातुएँ देने वाली खानों का पता लगाकर (उनसे) धातुओं को निकालना चाहिए, अपने लोगों से परिमित रूप में कर वसूल करना चाहिए, मैत्रीपूर्ण होना चाहिए, अपनी प्रत्येक प्रजा की रक्षा करनी चाहिए, उनमें जाति-मिश्रण का अन्तर कर देना चाहिए, सर्वदा ब्राह्मणों का गुणवद्धन करने का प्रयत्न करना चाहिए, अपने दुर्ग को प्रबल बनाना चाहिए और अवांछनीय वस्तुओं की वृद्धि को कम करना चाहिए तथा अपने नगरों को शुद्ध रखने के लिए सदैव सतर्क रहना चाहिए।

शासन के कार्य में राजा द्वारा नियुक्त एक मंत्रिपरिषद् उसकी सहायता करती थी। इसमें 20 सदस्य होते थे। मंत्रियों की बैठक एक हॉल में होती थी जिसे वेकटविलासमानप कहा जाता था। प्रधानमंत्री को प्रधानी एवं मत्रियों को दण्डनायक कहा जाता था। यद्यपि ब्राह्मणों को शासन में ऊँचे पद प्राप्त थे तथा उनका काफी प्रभाव था तथा मंत्री केवल उनके वर्ग से ही नहीं, बल्कि क्षत्रियों एवं वैश्यों के वगों से भी भर्ती किये जाते थे। मंत्री का पद कभी-कभी वंशानुगत तथा कभी-कभी चुनाव पर निर्भर था। राजा परिषद् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं था। कभी-कभी महत्त्वपूर्ण मंत्रियों को भी दण्डित किया जाता था। जब सालुवतिम्मा पर युवराज की हत्या का शक हुआ तो कृष्णदेवराय द्वारा उसे दण्ड दिया गया। अब्दुर्रज्जाक तथा नूनिज दोनों ही एक प्रकार के सचिवालय के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं जिसमें रायसम (सचिव) एवं कर्णिम (लेखापाल) होते थे। रायसम नामक अधिकारी राजा के मौखिक आदेशों को अभिलेखित करता था। राज्य व्यवस्था सप्तांग विचारधारा पर आधारित थी। मंत्रियों के अतिरिक्त राज्य के अन्य अधिकारी थे- प्रमुख कोषाध्यक्ष, जवाहरात के संरक्षक, राज्य के व्यापारिक हित की रक्षा करने वाला अधिकारी, पुलिस का अधिकारी जिसका काम अपराधों को रोकना तथा नगर में व्यवस्था बनाये रखना था, अश्व का प्रमुख अध्यक्ष तथा अन्य छोटे अधिकारी, जैसे राजा के स्तुति-गायक भाट, तांबूल-वाही अथवा राजा के व्यक्तिगत सेवक, दिनपत्री प्रस्तुत करने वाले, नक्काशी करने वाले तथा अभिलेखों के रचयिता।

विजयनगर के राजा अत्याधिक धन व्यय कर राजधानी में एक शानदार दरबार रखते थे। इसमें सरदार, पुरोहित, साहित्यिक, ज्योतिषी तथा गायक उपस्थित होते थे। त्यौहार बड़ी शान-शौकत से मनाये जाते थे।

साम्राज्य शासन सम्बन्धी कार्यों के लिए अनेक प्रान्तों (राज्य, मंडल, चावडी) में बाँट दिया गया था। इनके भी छोटे-छोटे भाग थे, जिनके नाम कर्णाटक अंश में वेण्ठे, नाडु, सीम, ग्राम एवं स्थल तथा तमिल अंश में कोट्टम, परं, नाडु एवं ग्राम थे। संपूर्ण साम्राज्य का विभाजन निम्नलिखित रूप में हुआ था-प्रांत (मंडल) या राय्या मॉडलम, जिला-वलनाडु, तहसील-स्थल, पचास ग्राम-मेलग्राम, गाँव-उर। साम्राज्य के प्रान्तों की ठीक-ठीक संख्या बतालाना कठिन है। कुछ लेखक पीज पर भरोसा कर लिखते हैं कि साम्राज्य दो सौ प्रान्तों में विभक्त था। पर विदेशी यात्री ने स्पष्ट रूप से कर देने वाले राजाओं को प्रान्तीय राजप्रतिनिधि समझ लिया है तथा इन्हें छोटे सरदार समझ लिया है, जो सरकार में अधिकारी-मात्र थे। एच. कृष्ण शास्त्री के मतानुसार साम्राज्य छ: प्रमुख प्रान्तों में विभक्त था। प्रत्येक प्रान्त एक राजप्रतिनिधि अथवा नायक के अधीन था, जो राजपरिवार का सदस्य अथवा राज्य का प्रभावशाली सरदार अथवा पुराने शासक परिवारों का कोई वंशज हो सकता था। प्रत्येक राजप्रतिनिधि अपने अधिकार क्षेत्र में नागरिक, सैनिक तथा न्याय-सम्बन्धी शक्तियों का उपयोग किया करता था, पर उसे केन्द्रीय सरकार को अपने प्रांत की आय तथा व्यय का नियमित हिसाब पेश करना पड़ता था तथा आवश्यकता पड़ने पर उसे (केंद्रीय सरकार को) सैनिक सहायता भी देनी पड़ती थी। यदि वह विश्वासघाती सिद्ध होता अथवा लोगों को सताता, तो राजा द्वारा कठोर दंड का भागी बनता था। यदि वह अपनी आय का तिहाई भाग राज्य (केंद्र) के पास नहीं भेजता, तो राज्य (केंद्र) उसकी जायदाद जब्त कर सकता था। यद्यपि नायक साधारणतया लोगों से राजस्व इकट्ठा करने में कठोर होते थे पर वे खेती को प्रोत्साहन देने, नये गाँव स्थापित करने, धर्म की रक्षा करने तथा मंदिर और अन्य भवन बनवाने जैसे परोपकारी काम करने में असावधान नहीं थे। पर दक्षिणी भारत में सत्रहवीं एवं अठारहवीं सदियों में, जब कि विजयनगर की शक्ति सर्वदा के लिए गायब हो चुकी थी, जो अव्यवस्था फैली उसके लिए वे स्वयं उत्तरदायी थे।

विजयनगर के शासकों ने अपने पूर्वगामियों से एक स्वस्थ एवं प्रबल स्थानीय शासन-प्रणाली पायी तथा उसको बनाये रखा। इसकी निम्नतम इकाई गाँव था। प्रत्येक गाँव स्वत: पूर्ण इकाई था। उत्तर भारत की पंचायत के समान, यहाँ ग्राम-सभा, अपने वंशानुगत अधिकारियों द्वारा, अपने अधीन क्षेत्र का कार्यपालिका सम्बन्धी, न्याय-सम्बन्धी एवं पुलिस-सम्बन्धी प्रशासन कराया करती थी। ये वंशानुगत अधिकारी सेनतेओवा (गाँव का हिसाब रखने वाला), तलर (गाँव का पहरेदार अथवा कोतवाल), बेगरा बलपूर्वक परिश्रम लेने का अधीक्षक तथा अन्य होते थे। गाँव के इन अधिकारियों का वेतन भूमि के रूप में अथवा कृषि की उपज के एक अंश के रूप में दिया जाता था। ऐसा जान पड़ता है कि व्यापारिक दलों अथवा निगमों के नेता ग्राम-सभाओं का एक अविच्छिन्न अंग बन गये थे। राजा महानायकाचार्य नामक अपने अधिकारी के द्वारा गाँव के शासन से अपना सम्बन्ध बनाये रखता था जो इसकी सामान्य देखभाल किया करते थे।

शिष्ट नामक भूमिकर विजयनगर राज्य की आय का प्रमुख साधन था। अठवने नामक विभाग के अधीन इसकी भूमि शासन की प्रणाली सुव्यवस्थित थी। कर लगाने के उद्देश्य से भूमि को 3 वर्गों में बांटा गया था- भीगी जमीन, सूखी जमीन, बाग एवं जंगल। रैयतों द्वारा दिया जाने वाला कर स्पष्ट रूप से बतला दिया जाता था। राज्य के भारी खर्चो के लिए तथा शत्रुओं का सामना करने के उद्देश्य से अधिक धन-जन पाने की समस्या हल करने के लिए विजयनगर के सम्राटों ने परम्परागत दर-उपज के छठे हिस्से-को छोड़कर कर की दर कुछ बढ़ा दी। नूनिज का यह कथन स्वीकार करना कठिन है कि किसानों को अपनी उपज का दसवाँ भाग देना पड़ता था। विजयनगर के शासकों ने पार्थक्य-सूचक कर के सिद्धान्त को अपनाया, अर्थात् उन्होंने भूमि की तुलनात्मक उपज पर कर निर्धारित किया। भूमि-कर के अतिरिक्त रैयतों को अन्य प्रकार के कर देने पड़ते थे, जैसे चारा-कर, विवाह-कर इत्यादि। राज्य की आय के अन्य साधन थे चुंगी से राजस्व, सड़कों पर कर, बाग एवं वृक्ष लगाने से राजस्व तथा साधारण उपभोग की वस्तुओं का व्यापार करने वालों, माल तैयार करने वालों एवं कारीगरों, कुम्हारों, रजकों, चर्मकारों, नापितों, भिखारियों, मंदिरों एवं वेश्याओं पर कर। कर मुद्रा एवं अनाज दोनों में दिये जाते थे, जैसा कि चोलों के समय में होता था।

इसमें सन्देह नहीं कि कर का बोझ भारी था तथा प्रान्तीय शासक एवं राजस्व-अधिकारी प्रायः लोगों पर जुल्म ढाया करते थे। पर साथ ही ऐसे भी दृष्टान्त हैं, जिनसे यह दीखता है कि सरकार अपने पास शिकायत होने पर लोगों की पीड़ा का कारण दूर करती थी, कभी-कभी कर घटा देती या छोड़ देती थी तथा आवश्यकता पड़ने पर लोग सीधे राजा के पास अपील (निवेदन) कर सकते थे। निश्चय ही साम्राज्य बलपूर्वक कर ऐंठने और जुल्म की क्रमबद्ध नीति पर लगभग तीन सदियों तक नहीं टिक सकता था।

नायंकर व्यवस्था- विजयनगर साम्राज्य की विशिष्ट व्यवस्था नायंकर व्यवस्था थी। साम्राज्य की समस्त भूमि तीन भागों में विभाजित थी।

  1. भण्डारवाद भूमि- यह भूमि राजकीय भूमि होती थी और इस प्रकार की भूमि कम थी।
  2. समरन् भूमि- दूसरे प्रकार की भूमि समरन् भूमि कहलाती थी। यह भूमि सैनिक सेवा के बदले अमरनायकों और पलाइगारों को दी जाती थी। इस प्रकार की भूमि अधिक थी। इस प्रकार की भूमि कुल भूमि का 3/4 भाग थी किन्तु यह भूमि वंशानुगत नहीं थी।
  3. मान्या भूमि- तीसरे प्रकार की भूमि मान्या भूमि होती थी। यह भूमि ब्राह्मणों, मंदिरों या मठों को दान में दी जाती थी।

पुर्तगाली लेखक नूनिज और पायस ने नायंकर व्यवस्था का अध्ययन किया है। उनके विचार में नायक बड़े-बड़े सामंत होते थे। इन नायकों को केन्द्र में दो प्रकार के संपर्क अधिकारी रखने पड़ते थे। इनमें से एक अधिकारी राजधानी में स्थित नायक की सेना का सेनापति होता था और दूसरा सम्बन्धित नायक का प्रशासनिक एजेण्ट होता था, जिसे स्थानापति कहा जाता था। आगे चलकर नायंकार व्यवस्था के कारण विजयनगर साम्राज्य कमजोर पड़ गया। नायकों पर नियंत्रण के लिए महामंडेलेश्वर या विशेष कमिश्नरों की नियुक्ति की जाती थी। पहली बार इसकी नियुक्ति अच्युतदेवराय के समय हुई।

आयंगार-व्यवस्था- आयंगर व्यवस्था ग्रामीण प्रशासन से जुड़ी व्यवस्था है। अब गाँव में चोल काल की स्थानीय स्वायत्त शासन की परम्परा कमजोर पड गयी और वास्तविक शक्ति 12 ग्रामीण अधिकारियों के हाथों में चली गयी। ये प्रशासनिक अधिकारी आयंगर कहलाते थे। इनका पद पैतृक या वंशानुगत होता था। इन अधिकारियों के पदों की खरीद-बिक्री भी होती थी। इनका वेतन भूमि के रूप में या कृषि की उपज के एक अंश के रूप में दिया जाता था। इस प्रकार आयंगर प्रशासनिक अधिकारियों का सामूहिक नाम था। इन अधिकारियों में निम्नलिखित प्रमुख थे-

  1. सेनतेओबा- गाँव का हिसाब रखने वाला,
  2. बलपूर्वक परिश्रम का कार्य कराने वाला अधीक्षक,
  3. राजा महानायकाचार्य नामक अधिकारी के माध्यम से गाँव के अधिकारियों से सम्पर्क बनाये रखता था और यह व्यवस्था ब्रिटिश काल तक चलती रही।

क्षेत्र में राजा का प्रतिनिधि परिपत्यागार नामक अधिकारी होता था। अत्रिमार नामक अधिकारी ग्रामीण सभा की कार्यवाहियों को नियंत्रित करता था। नट्टनायकार नामक अधिकारी नाडु का अध्यक्ष होता था।

राजा सर्वोच्च न्यायाधीश था, पर न्याय के शासन के लिए सुव्यवस्थित न्यायालय तथा विशेष न्याय-सम्बन्धी अधिकारी थे। कभी-कभी स्थानीय संस्थाओं की सहकारिता से राज्य के अधिकारी झगड़ों को सुलझा लेते थे। देश का एकमात्र कानून ब्राह्मणों का कानून जो पुरोहितों का कानून है नहीं था, जैसा कि नूनिज हमें विश्वास करने को कहता है बल्कि यह परम्परागत नियमों एवं रिवाजों पर आधारित था तथा देश की वैधानिक रीति द्वारा सबल किया हुआ था। इसका पालन दृढ़ता से करवाया जाता था। अपराधियों को कड़ी सजा मिलती थी। ये दण्ड मुख्यत: चार प्रकार के थे- जुर्माना, सम्पत्ति की जब्ती, दैवी परीक्षा एवं मृत्यु चोरी, व्यभिचार एवं राजद्रोह- जैसे अपराधों का दण्ड था मृत्यु अथवा अंगभंग होता था। कभी-कभी अपराधियों को हाथी के पैरों के सामने फेंक दिया जाता था ताकि वे उसके घुटनों, सूड एवं दाँतों से मार डाले जाएँ। न्याय के क्षेत्र में सरकार या अधिकारियों की ओर से जुल्म होना भी पाया जाता था पर कभी-कभी राज्य इसका प्रतिकार करता था तथा यह कभी-कभी स्थानीय संस्थाओं (निकाय) के सम्मिलित विरोध से भी सफलतापूर्वक रोका जाता था।

होयसालों की तरह विजयनगर के राजाओं का भी सैनिक विभाग सावधानी से संगठित था, जिसका नाम कन्दाचार था। यह दण्डनायक अथवा दन्नायक (प्रधान सेनापति) के नियंत्रण में था, जिसकी सहायता छोटे-छोटे अधिकारियों का समूह करता था। राज्य में एक विशाल एवं कार्यक्षम सेना थी, जिसकी संख्या सर्वदा एक-सी नहीं रहती थी। राजा की स्थायी फौज में आवश्यकता के समय जागीरदारों तथा सरदारों की सहायक सेना सम्मिलित कर ली जाती थी। सेना के विभिन्न अंग थे-पदाति, जिसमें भिन्न-भिन्न वर्गों एवं धमाँ के लोग (यहाँ तक कि कभी-कभी मुसलमान भी) लिये जाते थे; अश्वारोही सेना को पुर्तगीजों के द्वारा ओरमुज से अच्छे अश्व लेकर सबल बनाया जाता था, क्योंकि साम्राज्य में इन जानवरों की कमी थी; हाथी ऊँट तथा तोपें, जिनका 1368 ई. में ही हिन्दुओं द्वारा उपयोग किया जाना विदेशी विवरणों तथा अभिलेखों के प्रमाण से सिद्ध है। पर विजयनगर की सेना का अनुशासन तथा लड़ने की शक्ति दक्कन के मुस्लिम राज्यों की सेनाओं से कम थी।

इन सभी व्यवस्थाओं के साथ-साथ विजयनगर साम्राज्य में कुछ दोष थे। प्रथमत: प्रान्तीय शासकों को बहुत स्वतंत्रता थी, जिससे केन्द्रीय शक्ति काफी कमजोर हो गयी तथा अन्त में साम्राज्य का पतन हो गया। द्वितीयत: अनेक सुविधाओं के बावजूद साम्राज्य स्थिरता से व्यापार का विकास करने में असफल रहा। डॉ. आयंगर उचित ही कहते हैं कि यह असफलता विजयनगर के साम्राज्यीय जीवन में एक बड़ा दोष सिद्ध हुई तथा इसने एक स्थायी हिन्दू साम्राज्य असम्भव बना दिया। तृतीयत: अल्पकालीन लाभ के विचार से सम्राटों ने पुर्तगीजों को पश्चिम तट पर बसने दिया तथा इस प्रकार मुनाफे के सिद्धांतों ने उनके साम्राज्य की स्थिरता के महत्तर प्रश्न को कुचल डाला।

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