ऋग्वैदिक काल

सिन्धु सभ्यता के पतन के बाद आर्य सभ्यता का उदय हुआ। आर्यों की सभ्यता वैदिक सभ्यता भी कहलाती है। वैदिक सभ्यता दो काल-खण्डों में विभक्त है- ऋग्वैदिक सभ्यता और उत्तर वैदिक सभ्यता। ऋग्वैदिक सभ्यता के ज्ञान का मूल स्रोत ऋग्वेद है, अतएव यह सभ्यता उसी के नाम से अभिहित है। ऋग्वेद चारों वेदों में सर्वाधिक प्राचीन है। प्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान् स्मिथ के अनुसार- किसी भी इंडो-यूरोपीय अथवा आर्य भाषाओं में अन्य कोई साहित्य इतना प्राचीन नहीं है जितने ऋग्वेद के मंत्र जो सुदूर प्राचीनता के शिखर पर अकेले हैं।

ऋग्वैदिक काल से अभिप्राय उस काल से है जिसका विवेचन ऋग्वेद में मिलता है। इस काल के अध्ययन के लिए दो प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं।

पुरातात्विक साक्ष्य

  1. चित्रित धूसर मृदभांड, धूसर मृदभांड संस्कृति के 109 स्थल पंजाब में, हरियाणा में, 24 उत्तर प्रदेश में तथा 8 राजस्थान में विदित है। इस धूसर मृदभांड संस्कृति का काल 1700-1800 ई.पू. माना जाता है। यह काल लगभग वही है जो अन्य आधारों पर ऋग्वेद के संदर्भ में बताया जाता है।
  2. खुदाई में हरियाणा के पास भगवानपुरा में 13 कमरों वाला एक भवन मिला है एवं पंजाब में भी तीन स्थल ऐसे मिले हैं जिनका संबंध ऋग्वैदिक काल से जोड़ा जाता है।
  3. बोगाजकोई अभिलेख (मितन्नी अभिलेख) 1400 ई.पू.-एक लेख में हिती राजा शुब्बिलिम्मा और मित्तान्नी राजा मतिऊअजा के मध्य हुई संधि के साक्षी के रूप में वैदिक देवताओं इन्द्र, मित्र, वरूण और नासत्य को उद्धृत किया गया है। यहाँ अश्विन को नासत्य कहा गया है।
  4. कस्सी अभिलेख (1600 ई.पू.)- इस अभिलेख से यह सूचना मिलती है कि ईरानी आर्यों की एक शाखा भारत में आयी।

साहित्यिक साक्ष्य- ऋग्वेद-इसमें दस मंडल एवं 1028 सूक्त हैं। पहला एवं दसवाँ मण्डल बाद में जोड़ा गया है जबकि दूसरे से सातवाँ मण्डल पुराना है।

काल निर्धारण- आर्यों के आगमन का काल विभिन्न विद्वानों ने अपने ढंग से निर्धारित करने की चेष्टा की है। बालगंगाधर तिलक ने नयत्रीय आधार पर ऋग्वेद की तिथि 6000 ई.पू. निर्धारित की। हरमन जैकोबी के अनुसार, वैदिक सभ्यता 4500 ई.पू. से 2500 ई.पू. के बीच विकसित हुई। एक प्रसिद्ध विद्वान् विंटरनिजत्स के अनुसार, ऋग्वेद का संकलन 3000 ई.पू. हुआ। दूसरी तरफ आर. के. मुकर्जी ऋग्वैदिक काल की शुरूआत 2500 ई.पू. तथा जी. सी. पाण्डेय इसकी शुरूआत 3000 ई.पू. में मानते हैं। मैक्समूलर के अनुसार, वैदिक युग की शुरूआत 1500 ई.पू. में मानी जाती है।

आर्यों का मूल निवास स्थान- बाल गंगाधर तिलक ने आकर्टिक प्रदेशों को आर्यों का मूल स्थान माना है। फिलिप संसटी और विलियम जोन्स ने इनका मूल स्थान यूरोप माना है। पी. गाइल्स ने इसका मूल निवास हगरी तथा डेन्यूब नदी माना है। मैक्समूलर ने मध्य एशिया से आर्यों का आगमन माना है। स्वामी दयानन्द ने इसका मूल निवास तिब्बत माना। जी.बी. रीड ने इनका मूल निवास बैकट्रिया माना। ब्रैण्डनस्टिन का मत सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। इन्होंने आर्यों का आदि देश दक्षिणी रूस माना है। नहरिंग नामक एक अन्य विद्वान् ने दक्षिण रूस को आर्यों का आदिदेश माना है। एक अन्य विद्वान् पोकोनी ने वेजर और निश्चुल नदियों के मध्य भाग को आर्यों का मूल स्थान माना है। पेंका महोदय ने स्कैण्डिनेविया को आर्यों का मूल स्थान माना है। आज अधिकांश विद्वान् नेहरिंग के मत का समर्थन करते हैं किन्तु अनेक भारतीय विद्वान् इस मत से सहमत नहीं हैं, वे यह नहीं मानते कि आर्य बाहर से आए। श्री के.एम. मुशी, पं. गंगानाथ झा, डी.एस. त्रिवेदी, एल.डी. कल्ला, राधाकुमुद मुखर्जी, डॉ. सम्पूर्णानन्द, डॉ. ए.सी. दास, सी.वी. वैद्य तथा डॉ. राजबली पाण्डेय आर्यों को भारत का ही मूल निवासी मानते हैं वस्तुत: अभी तक यह प्रश्न विवादास्पद बना हुआ है।

विस्तार

आर्य लोग जिस समय भारत में प्रविष्ट हुए और उन्होंने देशी जनसंख्या को परास्त कर इस देश में अपनी शक्ति का विस्तार करना प्रारम्भ किया, वे राजनैतिक दृष्टि से संगठित हो चुके थे। समन्वय की प्रक्रिया भी यद्यपि संघर्ष के साथ-साथ चलती रही। उनके संगठन को जन कहते थे। भारतीय आर्यों के जैसे जन थे, वैसे ही आर्यों की अन्य शाखाओं (प्राचीन ईरानियों, ग्रीकों और लैटिक लोगों) के भी थे। इन जनों का संगठन परिवार के नमूने पर होता था और प्रत्येक जन का नाम उसके किसी प्रतापी पूर्व पुरुष या विद्यमान शक्तिशाली पुरुष के नाम पर पड़ता था। एक जन  के सब व्यक्ति सजातसनाभि व एक वंश के समझे जाते थे। अपने जन को वे स्व कहते और दूसरे जनों के व्यक्तियों को अन्यनाभि या अरण

प्राय: आर्यों के अत्यन्त प्राचीन जन, अनवस्थित दशा में होते थे क्योंकि वे किसी प्रदेश पर स्थायी रूप से बसे हुए नहीं थे। राज्यसंस्था के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य किसी निश्चित प्रदेश पर बस जाएँ पर इन अनवस्थित जनों में भी संगठन का अभाव नहीं था। प्रत्येक जन के अनेक विभाग होते थे, जिन्हें ग्राम कहते थे। ग्राम का अर्थ समुदाय है। बाद में जब मनुष्यों का कोई समूह या समुदाय (ग्राम) किसी स्थान पर स्थायी रूप से बस गया, तो वह स्थान भी ग्राम कहलाने लगा। इसी प्रकार जब कोई जन (जो अनेक ग्रामों में विभक्त होता था) भी किसी प्रदेश पर स्थायी रूप से बस जाता, तो वह प्रदेश जनपद कहलाने लगता, और स्वाभाविक रूप से उसमें अनेक ग्रामों की सत्ता होती। राजा सारे जनपद के शासक को कहते थे, और विभिन्न ग्रामों के शासकों को ग्रामणी

भारत में जब आर्यों ने प्रवेश किया, तो वे ग्रामों और जनों में हो संगठित चुके थे। भारत के प्राचीनतम निवासियों को वैदिक साहित्य में दास या दस्यु कहा गया है। ये लोग रंग में कृष्ण थे, और उनकी नाक उभरी हुई होती थी। अनासः इस कारण उन्हें भी कहा जाता था। सिन्धु सभ्यता के लोगों को परास्त कर जब आर्य जन भारत के विविध प्रदेशों में स्थायी रूप से बस गए, तो वहाँ उन्होंने अपने विविध जनपद स्थापित किये। ऋग्वेद के अनुशीलन से इस बात में कोई सन्देह नहीं रह जाता कि उस युग के भारत में आर्यों के अनेक जनपद या राज्य विद्यमान थे। अनेक मन्त्रों में पञ्चजना का उल्लेख है। पुरु, यदु, तुर्वशु, अनु और द्रुह्यु ये पाँच पञ्चजन थे। नि:सन्देह, ये वैदिक आर्यों की मुख्य शाखाएँ थीं पर इनके अतिरिक्त भरत, श्रृंजय आदि अन्य का भी, अनेक जनों का उल्लेख वेदों में आया है, जिससे इस बात में कोई सन्देह नहीं रह जाता कि वैदिक आर्य अनेक जनों में विभक्त थे, और उन्होंने इस देश में अनेक जनपदों या राज्यों की स्थापना की थी। आर्य कबीला भरत सबसे महत्त्वपूर्ण था और इसके शासक वर्ग का नाम त्रित्सु था। यदु और तुर्वस को दास भी कहा जाता है। पुरु को मृधवाच (कटुवाची) कहा जाता था। यदु और तुवस के विषय में माना जाता है कि उन्हें इन्द्र बाद में लाये। यह ज्ञात होता कि सरस्वती, दृषद्वती एवं अपाया नदी के किनारे भरत कबीले ने अग्नि की पूजा की।

ऋग्वैदिक युग में एक जन के अन्तर्गत सब व्यक्तियों को सामूहिक रूप विश: कहा जाता था और राजनैतिक रूप से संगठित जन या विश: की राष्ट्र संज्ञा थी। दूसरे शब्दों में, हम इस प्रकार कह सकते हैं, कि ऋग्वैदिक का भारत अनेक ऐसे राष्ट्रों में विभक्त था, जिनकी संख्या तो बहुत अधिक पर क्षेत्रफल व जनसंख्या की दृष्टि से जो छोटे-छोटे थे।

ऋग्वैदिक युग के आर्य राजनैतिक दृष्टि से जिन जनों में संगठित थे, वेदों अनुशीलन से उनके सम्बन्ध में भी परिचय मिलता है। वैदिक इन्डेक्स में इन का भौगोलिक दृष्टि से इस प्रकार विभाजन किया गया है-

  1. उत्तर-पश्चिम के क्षेत्र में- कम्बोज, गान्धारि, अलिन, पक्थ, भलाना और विषाणिन्।
  2. सिन्धु तथा विस्तता नदियों के क्षेत्र में- अर्जीकीय, शिव, केकय और वृचीवन्त।
  3. विस्तता नदी के पूर्ववर्ती पार्वत्य क्षेत्र में- महावृष, उत्तर-कुरु और उत्तर-मद्र।
  4. असिक्नी और पुरुष्णी नदियों के मध्य में- बाल्हीक, द्रुह्यु, तुर्वशु और अनु।
  5. शतुद्री नदी के पूर्व में- भरत, त्रित्सु, पुरु, पारावत और श्रृंजय।
  6. यमुना के क्षेत्र में- उशीनर, वश, साल्व और क्रिवि।

इन जनों के अतिरिक्त मत्स्य, मुजवन्त, यक्षु, यदु, सोमक, शिष्ट, शिम्यु, वैकर्ण, वरशिख, पृथु आदि अन्य भी अनेक जनों का उल्लेख वैदिक साहित्य में आया है। ऋग्वैदिक युग के आर्यों की इन विविध शाखाओं व जनों का निवास प्राय: उत्तर-पश्चिमी भारत और पंजाब के क्षेत्र में ही था। इसी प्रदेश को वैदिक साहित्य में सप्तसैन्धव देश कहा गया है। उत्तर-वैदिक काल में आर्यों का प्रसार पूर्व की ओर होता गया और उन्होंने वर्तमान समय के उत्तर-प्रदेश में अपने अनेक नये राज्यों की स्थापना की।

ऋग्वेद में नदियों की चर्चा- ऋग्वेद के नदी सूक्त में कुल 21 नदियों का विवरण दिया गया है। इन नदियों में सबसे पश्चिम में कुमा नदी तथा सबसे पूरब में गंगा नदी स्थित है। सिन्धु नदी एक असाधारण नदी थी और यह सप्त सैधव क्षेत्र की पश्चिमी सीमा थी। क्रुमु (कुरंम) एवं गोमती (गोमल) कुभा (काबुल) औसुवस्तु (स्वात) की। ये नदियाँ पश्चिमी किनारे में सिन्धु की सहायक नदियाँ थीं। विस्तता (इोलम), अस्किन (चेनाब), परुष्णी (रावी), शतुद्रु (सतलज), विपासा (व्यास) ये पाँचों नदियाँ पूर्वी किनारे में सिन्धु की सहायक नदियाँ थीं। विपासा (व्यास) नदी के तट पर ही इन्द्र ने उषा को पराजित किया और उसके रथ के टुकड़े-टुकड़े कर दिये।

सरस्वती- ऋग्वेद में सरस्वती नदी को नदियों की अग्रवतीं, नदियों की माता, वाणी, प्रार्थना एवं कविता की देवी, बुद्धि को तीव्र करने वाली और संगीत की प्रेरणादायी भी कहा गया है। यह वह शक्तिशाली नदी थी, जो एक जगह दिखती थी, परन्तु दूसरी जगह नहीं दिखती थी।

ऋग्वेद में सिन्धु नदी की चर्चा सबसे अधिक बार हुई है। इसलिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण नदी थी जबकि सरस्वती सबसे पवित्र नदी थी। सप्त सैधव प्रदेश में सिन्धु नदी, पंजाब की पाँच नदियाँ एवं सरस्वती नदी शामिल थीं।

दृषद्वती- यह सिन्धु-समूह की नदी नहीं थी। यह ब्रह्मावर्त का पूर्वी एवं दक्षिणी किनारा थी।

अपाया- यह दृष्द्वती एवं सरस्वती के बीच में बहती थी।

सरयू- यह गंगा की सहायक नदी थी। ऋग्वेद के अनुसार, चित्रथा और अवनी संभवत: यदु एवं तुर्वस के द्वारा सरयू नदी के किनारे ही पराजित किए गए थे।

यमुना- ऋग्वेद में यमुना की चर्चा तीन बार की गई है।

गंगा- गंगा की चर्चा एक बार की गई है।

इन महत्त्वपूर्ण नदियों के अतिरिक्त कुछ नदियाँ निम्नलिखित थीं- यथा रास, अनुमति, अशुनिती, राका और गंगु आदि।

समुद्र- ऋग्वेद में समुद्र की चर्चा हुई है और भुज्यु की जहाज दुर्घटना वाली कहानी से जलयात्रा पर प्रकाश पड़ता है। साथ ही वैदिक तौल की इकाई मन एवं बेबीलोन की इकाई मन में समानता से भी समुद्र यात्रा पर प्रकाश पड़ता है। परन्तु कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक आर्यों को संभवत: समुद्र का ज्ञान नहीं था। अत: समुद्र नाम या तो सिन्धु नदी के लिए प्रयुक्त हुआ है या फिर जलराशि का वाचक है।

पहाड़- ऋग्वैदिक आर्य हिमालय पहाड़ से परिचित थे परन्तु विंध्य या सतपुड़ा से परिचित नहीं थे। कुछ महत्त्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों की चर्चा है- यथा हिमवंत, मुजर्षत, शिलामंत आजक, शयानांवत, सुषोम।

मरुस्थल- ऋग्वेद में मरुस्थल के लिए धन्व शब्द आया है। वैदिक आयाँ को संभवत: मरुस्थल का ज्ञान था क्योंकि इस बात की चर्चा की जाती है कि पार्जन्य ने मरुस्थल को पार करने योग्य बनाया।

क्षेत्र- प्रारंभिक वैदिक साहित्य में केवल एक क्षेत्र गांधारि की चर्चा है। इसकी पहचान आधुनिक पेशावर एवं रावलपिंडी जिलों से की गई है।

आर्यों का संघर्ष- आर्यों का संघर्ष, गैरिक मृदभांड एवं लाल और काले मृदभांड वाले लोगों से हुआ। आर्यों के विजय होने का कारण था- घोड़े चालित रथ, काँसे के अच्छे उपकरण तथा कवच (वर्मन)।

विशिष्ट प्रकार के दुर्ग का प्रयोग आर्य संभवत: करते थे। इसे पुर कहा जाता था। वे धनुष बाण का प्रयोग करते थे। प्राय: दो प्रकार के बाणों का प्रयोग होता था। पहला विषाक्त एवं सींग के सिरा (मुख) वाला तथा दूसरा तांबे के मुख वाला। इसके अतिरिक्त बरछी, भाला, फरसा और तलवार आदि का प्रयोग भी वे करते थे। पुरचरिष्णु शब्द का अर्थ था दुर्गों को गिराने वाला। आर्यों के शत्रु दास एवं दस्यु थे। दस्यु को अनसा (चपटी नाक वाला), अकर्मण (वैदिक कमों में विश्वास न करने वाला), अयज्जवन (यज्ञ न करने वाला), अदवेयु (वैदिक देवता में विश्वास न करने वाला) एवं शिश्नदेवा (लिंग पूजक) कहा जाता था। पुरु नामक कबीला त्रसदस्यु के नाम से जाना जाता था।

विश्वामित्र का सहयोग भरत जन को प्राप्त था। इसी सहयोग के बल पर उसने व्यास एवं शतुद्रु को जीता। किन्तु शीघ्र ही भरतों ने वशिष्ठ को अपना गुरु मान लिया। अत: विश्वामित्र ने क्रुद्ध होकर भरत जन के विरोधियों को समर्थन दिया और फिर माना जाता है कि परूष्णी नदी के किनारे दशराज्ञ युद्ध हुआ। इसमें भरत के विरोध में पाँच आर्य एवं पाँच अनार्य कबीले मिलकर संघर्ष कर रहे थे। इनके नाम निम्नलिखित थे- पुरू, यदु, तुर्वस, द्रुहु, अणु। पाँच अनार्य कबीले- अकिन, पकथ, भलानस, विषाणी और शिवि। दस राजाओं के युद्ध का कारण यह था कि इस दस ने परुष्णी नदी को मोड़ने का यत्न किया था। माना जाता है कि इसमें भरत राजा सुदास की विजय हुई। इससे पूर्व भी सुदास के पूर्वज दिवोदास ने संबर नामक दासों के सरदार को हराया था। इसमें पुरु राजा पुरूत्सा मारा गया था।

धर्म- वैदिक काल

ऋग्वैदिक धर्म

जब मनुष्य ने सभ्य जीवन का प्रारम्भ किया, तो उसने अपने को विशाल एवं अपरिचित प्राकृतिक शक्तियों से आवृत पाया। प्रकृति के विभिन्न रूप एवं महती शक्ति ने उसे प्रभावित किया और उनके दिव्य रूप में उन्हें देवत्व का आभास हुआ। उन्होंने यह भी माना कि प्रकृति की शक्ति को देवता ही नियन्त्रित करते हैं। अत: उन देवताओं को प्राकृतिक दृश्यों के अधिष्ठाता के रूप में माना गया एवं भौतिक जगत की उत्पत्ति के लिए ही उनकी परिकल्पना की गई।

ऋग्वैदिक धर्म की मुख्य विशेषताएँ हैं-

  1. ऋग्वैदिक धर्म की सर्वप्रमुख विशेषता है, इसका व्यावहारिक एवं उपयोगितावादी स्वरूप।
  2. वैदिक धर्म पूर्णतः प्रवृत्तिमार्गी है।
  3. ऋषि विश्व को अमंगलकारी कष्ट का स्थान नहीं मानते और शरीर छोड़ने की बात नहीं करते।
  4. वैदिक देवताओं में पुरुष भाव की प्रधानता है।
  5. यद्यपि अधिकांश देवताओं की अराधना मानव रूप में की जाती है तथापि कुछ देवताओं की अराधना पशु रूप में भी की गई है। अज एक पाद और अहिर्बुधन्य इन दोनों देवताओं की परिकल्पना पशु रूप में की गई है। मरूतों की माता की परिकल्पना चितकबरी गाय के रूप में हुई है। इन्द्र की, गाय खोजने वाले सरमा (कुतिया) स्वान रूप में है। इनके अतिरिक्त इन्द्र की कल्पना वृषभ (बैल) के रूप में एवं सूर्य का बेगवान अश्व के रूप में की गई। ऋग्वेद में पशुओं की पूजा का प्रचलन नहीं था।
  6. प्रकृति का दैवीकरण इस धर्म में मिलता है।
  7. देवताओं का मानवीकरण भी किया गया।
  8. मृत्यु के उपरांत की स्थिति के विषय में, ऋग्वेद की ऋचाओं में कुछ दृढ़ विश्वास नहीं दिखायी पड़ता।
  9. वैदिक देवताओं में किसी प्रकार के ऊंच-नीच का भेद नहीं था और वैदिक ऋषियों ने प्रसंगवश सभी देवताओं की महिमा गायी है।

सबसे प्राचीन देवता द्यौस थे। तत्पश्चात् पृथ्वी थी। दोनों द्यावा-पृथ्वी के नाम से जाने जाते हैं। ऋग्वैदिक काल में महत्त्वपूर्ण देवता इंद्र है जो युद्ध एवं वर्षा के देवता हैं। इन्द्र के दो रूपों का वर्णन है- प्रथमत: आर्यों के नायक या नेता रूप में तथा दूसरे प्राकृतिक शक्ति के प्रतीक के रूप में प्रथम रूप में वह महापराक्रमी नायक के रूप में दिखाई पड़ते हैं। इस रूप में वे दासों, दानवों या दस्युओं के रूप में दिखाई पड़ते हैं। इस रूप में उन्हें पुरन्दर कहा गया है। दूसरा रूप मानवी रूप से भिन्न है। वे विद्युत उत्पन्न करने वाले तथा बादलों से पृथ्वी को अभिसिंचित करने वाले हैं। इन्द्र पुलुवि के रूप में उन्होंने वृत्त (राक्षस) की हत्या की और जल (आप) को मुक्त किया। इन्द्र के लिए ऋग्वेद में 250 सूक्त अर्पित हैं। उन्होंने वृत्त का वध करके आप को मुक्त किया एवं आकाश, सूर्य एवं उषा को भी जन्म दिया। अनेक विद्वानों का मत है कि वृत्र को अनावृष्टि का असुर कहा गया है। इन्द्र उसकी हत्या करके जल को मुक्त करते हैं, इसलिए उन्हें पुरभिद भी कहा गया है। इन्द्र के लिए एक और विशेषण अत्सुजीत (पानी को जीतने वाला) भी आता है। द्यौस उसके पिता हैं। अग्नि भाई है। मारूत उसका सहयोगी है। साथ ही विष्णु ने वृत्र के वध में इंद्र की सहायता की थी।

ऋग्वेद में इंद्र को समस्त संसार का स्वामी बताया गया है। उसका प्रिय आयुद्ध वज्र है। इसलिए उसे वज्रबाहु कहा जाता है। इन्द्र एक सर्वान्तक था और मुक्तरूप से झंझारोही था। उसके चरित्र की प्रथम विशेषता अत्यादिम अवस्था में मेसापोटामिया से ग्रहण की गई लगती है।

अग्नि- ये दूसरे महत्त्वपूर्ण देवता थे। जो यज्ञ एवं गृह के देवता थे। वे पुरोहितों के भी देवता थे। वे देवता एवं मानव के बीच मध्यस्थ भी थे। उनके लिए ऋग्वेद में 200 सूक्त अर्पित किए गए हैं। वे पृथ्वी पर अग्नि, अंतरिक्ष में तड़ित और आकाश में सूर्य हैं। उनका मूल निवास स्वर्ग है किन्तु मातरिश्वन (देवता) उसे पृथ्वी पर लाया। पृथ्वी पर यज्ञ वेदी में अग्नि की स्थापना भृगुओं और अंगीरसों ने की। इन्हें इस कार्य के कारण अथर्वन् कहा गया है। अग्नि के बारे में माना जाता कि वह दुर्ग का भेदन भी करती थी। यह प्रत्येक घर में प्रज्वलित होती थी। इसलिए इसे प्रत्येक घर का अतिथि भी माना गया है।

वरूण- तीसरे महत्त्वपूर्ण देवता वरूण थे। इनकी स्तुति लगभग 30 सूक्तों में की गई है। ये जल देवता हैं। इन्हें असुर भी कहा जाता था। इन्हें राजा भी माना गया है। वरूण एक पवित्र देवता थे जो केवल यज्ञ और बलि से ही संतुष्ट नहीं थे। उनकी कृपा पाने के लिए पवित्र होना आवश्यक था। वे ऋतु के संरक्षक थे। इन्हें ऋतस्यगोप भी कहा जाता था। ये देवता ईरान में अहूरमजदा और यूनान में ओरनोज के नाम से प्रतिष्ठित थे। वरूण के साथ मित्र का भी उल्लेख है और दोनों मिलकर मित्रावरूण कहलाते हैं। मित्र के अतिरिक्त वरूण के साथ आप (जल) का भी उल्लेख किया गया है। आप का अर्थ होता है जल। आप सोम की बहन अथवा माता मानी जाती थी। ऋग्वेद में वरूण को वायु की सांस कहा गया है।

सोम- ऋग्वेद में नवें मंडल में सोम की चर्चा की गई है। इनका निवास स्थान पर्वतीय क्षेत्र माना जाता है किन्तु इनका मूल निवास स्वर्ग में था। इन्हें औषधि एवं वनस्पति का देवता माना गया है। ये चंद्रमा से संबंधित देवता थे। इनकी तुलना ईरान के ओम देवता और यूनान के दिआनासिस से की गई है।

सूर्य- ऋग्वेद में 10 सूक्तों से सूर्य की स्तुति की गई है। सूर्य को मित्र, वरुण, अग्नि का नेत्र माना है। उसे चर-अचर का रक्षक, मनुष्य के सत्-असत् कमों का द्रष्टा एवं ज्योतियों में सर्वोत्तम ज्योति कहा है। एक स्थान पर सूर्य को विराट पुरुष के नेत्रों से आविर्भूत माना है। सूर्य को दीर्घदर्शी विश्व दृष्टा बनाकर मानव जगत के कार्यों का निरीक्षण करने वाला भी स्वीकार किया है। सवितृ, मित्र, विष्णु, विवस्वत, पूषन एवं भग को सूर्य का पर्याय मानते हुए इनके लिए समान विशेषणों का प्रयोग हुआ है। सूर्य रथ को एतश (सात हरित अश्व) का बताया गया। ध्यातव्य है कि सूर्य के सात अश्वों की अवधारणा से आगे जाकर सप्ताह के सात दिवस बने। ऋग्वेद के दसवें मण्डल में उसे सब लोकों का पालन करने वाला माना है।

मित्र- ये वरूण से संबंधित देवता हैं। वे शपथ एवं प्रतिज्ञा के देवता हैं।

यम- वे मृत्यु के देवता हैं। संभवत: आदम पहला व्यक्ति था जिसने मृत्यु का स्वागत किया।

अश्विन (नासत्य)- अश्विन् का ही नाम नासत्य है। ये दुर्घटनाग्रस्त नाव के यात्रियों की रक्षा करते थे। अपंग व्यक्ति को कृत्रिम पैर प्रदान करते थे। ये चिकित्सा के देवता थे। ये युवतियों के लिए वर की तलाश करते थे।

विष्णु- ये कुछ हद तक यज्ञ से संबद्ध थे। ये तीन कदम के देवता थे।

रूद्र- ये अनैतिक आचरण से संबद्ध माने जाते हैं। वे चिकित्सा (औषधि) के संरक्षक थे। हॉलर ने इन्हें यूनानी देवता अपोलो के समान माना है। रूद्र को कभी-कभी शिव और कल्याणकर कहा जाता था।

पूषण- यह भी सूर्य से संबद्ध देवता थे। ये पशुपालन एवं चारागाह के देवता थे। ऋग्वेद में कुछ अर्द्ध देवता भी थे। यथा-विश्वदेव, आर्यमन (विवाह से संबंधित), ऋभु (बौने)-धातुकार से संबंधित थे, गंधर्व, अप्सरा-ऋग्वेद में उर्वशी की चर्चा है। त्वष्ट्रि को पितृदेवता कहा जाता था तथा इसका साम्य रोमन वासियों के धातु देवता बलकन से की जाती है।

ऋग्वेद में कुछ देवियों की भी चर्चा है यथा, उषा, अदिति, निषा (रात्रि), अरण्ययी (जंगल से संबंधित), सरस्वती और पृथ्वी। देवियों में सर्वाधिक महत्त्व अदिति को प्रदान किया गया, जिसे सम्पूर्ण देव जगत में महान्, आदित्यों एवं सब देवों की माता की संज्ञा प्रदान की है। अदिति को प्रकृति की किसी शक्ति से सम्बद्ध नहीं किया गया। कीथ अदिति के चित्रण में पाश्चात्य प्रभाव मानते हैं। कुछ विद्वान् अदिति की तुलना यूनान की ऐट्स अथवा हादिस, नार्वे की ईडा तथा एडोनिस आदि से करते हैं। सम्भवत: यह आर्यों की प्राचीन देवी न होकर अन्य देवताओं के मानवीकरण के बाद की कल्पना थी। ऋग्वेद में एक स्थान पर चर्चा मिलती है कि अदिति आकाश, पृथ्वी, माता-पिता अर्थात् सब कुछ है। इस प्रकार अदिति को सर्वोपरि माना गया। ऋग्वेद में देवताओं की संख्या 33 बताई गई है।

यास्क ने देवताओं के तीन वर्ग निर्धारित किए हैं-

  1. आकाशलोक- द्योस वरूण, मित्र, सूर्य, अश्विन (नासत्य) उरूक्रम, पूषण, सावित्री, विष्णु और उषा।
  2. वायु लोक- मारूत, वायु, वातं, रूद्र पार्जन्य, इन्द्र और अहिर्बुधन्य।
  3. भू-लोक (पृथ्वी लोक)- सोम, अग्नि, पृथ्वी, सरस्वती। अंतर्जगत के देवता-सरस्वती (विद्या, बुद्धि), वाक् (Speech), श्रद्धा और मनु।

ऋग्वैदिक दर्शन

ऋग्वेद में ब्रह्म नामक रहस्यपूर्ण सत्ता का उल्लेख है जिसके ज्ञाता ब्राह्मण कहलाए। ऋग्वेद में अग्नि के बारे में कुछ चर्चाएँ मिलती हैं। वह यह कि अग्नि का एक नाम है अथवा अनेक है। इन प्रश्नों में हमें एकेश्वरवाद का संकेत मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक दार्शनिक, एकेश्वरवाद की ओर प्रेरित हो रहे थे। इसके अतिरिक्त धीरे-धीरे इनका झुकाव एकात्मवाद की ओर हो रहा था क्योंकि ऋग्वेद में कहा गया है कि सत्य एक है जिसे विभिन्न ऋषि अलग-अलग मानते हैं।

उपासना का उद्देश्य भौतिक सुखों की प्राप्ति था। उपासना की विधि थी प्रार्थना एवं यज्ञ। किन्तु ऋग्वैदिक काल में यज्ञ की तुलना में प्रार्थना ही अधिक प्रचलित थी। यह प्रार्थना व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों हो सकती थी। यज्ञ में अभी मंत्रोच्चारण को अधिक महत्त्व नहीं प्राप्त हुआ था।

समाज- वैदिक काल

वर्णव्यवस्था ऋग्वेदकालीन समाज की व्यवस्था का प्रमुख आधार थी। इस व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वाभाविक गुणों के अनुरूप कार्य के चयन की स्वतंत्रता थी। अत: व्यक्ति के कर्म का विशिष्ट महत्त्व था, क्योंकि व्यक्ति के वर्ण का निर्धारण उसके कर्म से होता था। अपने गुण एवं कर्म के अनुरूप किये गये कर्त्तव्य, समाज में वर्ण-धर्म के नाम से अभिहित किये जाने लगे। वर्ण शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के वृज वरणे धातु से हुई है जिसका अभिप्राय है वरण करना। इस प्रकार वर्ण से तात्पर्य किसी विशेष व्यवसाय (या वृत्ति) के चयन से लिया जाता है। ऋग्वेद में वर्ण शब्द का प्रयोग रंग अथवा प्रकाश के अर्थ में हुआ है। कहीं-कहीं वर्ण का सम्बन्ध ऐसे जन वर्गों से दिखाया गया है जिनका चर्म काला या गोरा है।

आर्य प्रारंभ में एक ही वर्ण के थे और आर्यों का समूह विश कहलाता था। इस समय वर्ण रंग का बोधक था। आगे चलकर दास भी उनसे जुड़ गए। इस प्रकार ऋग्वेद की प्रारंम्भिक स्थिति में समाज में दो वर्ण थे, अर्थात् आर्य और दास। इस ग्रंथ में उल्लिखित है कि उग्र प्रकृति के ऋषि अगत्स्य ने दोनों वर्णो का पोषण किया। जब उत्पादन अधिशेष की स्थिति उत्पन्न हुई तो विश का विभाजन योद्धा, पुरोहित एवं सामान्य लोगों में हो गया। इस तरह वर्ण व्यवस्था का आधार अब कर्म हो गया। ऋग्वेद में एक छात्र लिखता है- मैं कवि हूँ, मेरे पिता चिकित्सक हैं; और मेरी माता आटा पीसती है

ऋग्वैदिक काल में ही ब्रह्मक्षत्र की अवधारणा सामने आई, जिसका अर्थ वैसे व्यक्ति से था जो जन्म से क्षत्रिय, किन्तु कर्म से ब्राह्मण हो। इससे संकेत मिलता है कि ब्राह्मण-क्षत्रिय द्वंद्व प्रारंभ हो चुका था और क्षत्रियों द्वारा ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को चुनौती दी जा रही थी। एक राजन कर्म से पुरोहित हो सकता था एवं पुरोहित राजन एवं महर्षि विश्वामित्र क्षत्रिय होते हुए भी वे कर्म से ब्राह्मण थे। उसी तरह ऋषि भृगु के बारे में कहा जाता कि भृगु के वंशज ने अनेकों राज्यों की स्थापना की। ऋग्वेद में ब्राह्मण की चर्चा चौदह बार हई है जबकि क्षत्रिय शब्द की चर्चा नौ बार हुई है।

शूद्र की चर्चा प्रथम बार ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में वैश्य शब्द का भी प्रथम बार प्रयोग यहीं मिलता है। इसमें चारों वर्णों ब्रह्मा के शरीर के अंगों से की गई है। ब्राह्मण की तुलना ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय की भुजा से, वैश्य की जंघा से एवं शूद्र की पैर से की गई है।

रक्त संबंध सामाजिक व्यवस्था का आधार था। समाज पितृसत्तात्मक था। परिवार का मुखिया स्वाभाविक रूप में मानवीय एवं करूणाशील होता था। सिर्फ एक दो उदाहरण ऐसे मिलते हैं जिससे यह ज्ञात होता है कि घर का मुखिया कभी-कभी संतान को क्रूर रूप में भी दण्डित करता था। ऋजास्व एवं भुज्यु की कथा इस ओर इंगित करती है। ऋजास्व का आख्यान, जिसमें उसे सौ भेड़ों को गवा देने के अपराध में अपने पिता द्वारा अंधा कर दिये जाने की चर्चा मिलती है। इसके द्वारा पुत्र के ऊपर पिता का पूर्ण नियंत्रण प्रदर्शित होता है। किन्तु, इस तरह के आख्यान को अपवाद स्वरूप ही लिया जाना चाहिए क्योंकि ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर पुत्र के कल्याण की कामना में निवेदन किया गया है। वैदिक समाज में पितृसत्तात्मक व्यवस्था थी। अत: समाज में पुत्र का विशेष महत्त्व था। पुत्र न होना दरिद्रता के समान कहा गया है। पिता की मृत्यु के बाद ज्येष्ठ पुत्र को संपत्ति में अधिक हिस्सा मिलता था।

विवाह वैदिक काल में पवित्र संस्कार माना जाता था जो व्यक्ति एवं सामाजिक विकास के लिए आवश्यक था। याजक कार्यों हेतु पति एवं पत्नी दोनों की उपस्थिति वांछनीय थी। अग्नि से प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि- हे अग्ने, तुम कन्याओं के अर्यमा अर्थात् विधान कर्ता के तुल्य हो, तुम जब पति-पत्नी को समान मन वाला बनाते हो, तब वे तुम्हें धृत-दुग्ध द्वारा बन्धु के समान सींचते हैं। लड़कियों को अपने पति के चयन करने की स्वतंत्रता थी।

स्त्रियो की स्थिति

समाज पितृसत्तात्मक था किन्तु स्त्रियो की स्थिति अच्छी थी। बाल विवाह का प्रचलन नहीं था। लड़कियों का विवाह 16 या 17 वर्ष में होता था। विधवा एवं अंतर्जातीय विवाह होता था। बहुपतित्व विवाह एवं रक्त संबंध में विवाह के कुछ चिह्न मिलते हैं, उदाहरण के लिए यमी ने अपने भाई यम से विवाह का अनुरोध किया परन्तु यम ने उसे अस्वीकार कर दिया। मरूतों ने रोदसी को मिलकर भोगा। उसी तरह अश्विन के दो भाई सूर्य की पुत्री सूर्या के साथ रहते थे। किन्तु इस विषय में हम कह सकते हैं कि यह आदिम अवस्था के अवशेष थे। वास्तव में ऋग्वैदिक काल में बहुपतित्व की प्रथा नहीं थी। संभवत: उच्च कुल के संपन्न लोग एक से अधिक पत्नियाँ रखते थे। इसलिए हम कह सकते हैं कि पुरुषों में बहुविवाह की प्रथा थी।

स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी और उन्हें भी उपनयन संस्कार का अधिकार था। बहुत-सी महिलाएँ विदुषी थीं। उदाहरण के लिए लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, विश्वारा, सिक्ता आदि। लोपामुद्रा क्षत्रिय वर्ण की थी, किन्तु उसकी शादी ऋषि अगत्स्य से हुई। तलाक, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल विवाह, बहुपत्नीत्व का प्रचलन नहीं था। दूसरी तरफ विधवा विवाह एवं नियोग प्रथा का प्रचलन था। विदुषी महिलाओं को ऋषिका या ब्रह्मवादिनी कहा जाता था। जीवन भर अविवाहित रहने वाली लड़कियों को अमाजू कहा जाता था और इस स्थिति में यदि पुत्री पिता के घर में ही रहती है तो वह पिता की संपत्ति की हिस्सेदार होती थी। ऋग्वेद के आठवें मण्डल में अपाला के अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा प्राप्ति का उल्लेख है। स्त्रियाँ सभा एवं समिति में भाग लेती थीं। साथ ही वे पति के साथ यज्ञ में भी भाग लेती थीं।

ऋग्वेद में समनो (उत्सवों) का उल्लेख है जिनमें कन्याएँ स्वयं अपनी पति को वरण कर लेती थीं। कभी-कभी शारीरिक बीमारी के कारण विवाह में विलंब भी हो सकता था। उदाहरण के लिए चर्म रोग के कारण घोषा का विवाह बहुत समय तक नहीं हुआ था।

दास व्यवस्था

ऋग्वैदिक काल में दास व्यवस्था प्रचलित थी। इनके दान देने का भी उल्लेख मिलता है। दासों की तुलना में दासियों के दान के अधिक उल्लेख मिलते हैं। दासों का उपयोग घरेलू दासों के रूप में होता था। कृषि में अभी इन्हें नहीं लगाया गया था|

शिक्षा

सातवें मंडल में शिक्षा की चर्चा है। ऋग्वेदकालीन शिक्षण संस्थाओं का स्पष्ट विवेचन नहीं मिलता है, तथापि एक सूक्त से तत्कालीन शिक्षा प्रणाली के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। इस सूक्त में मेंढकों के टर्राने की तुलना गुरु द्वारा उच्चारित शब्दों के  विद्यार्थियों द्वारा सामूहिक स्वर में दोहराने से की गई है। इससे वैदिक शिक्षा प्रणाली एवं शिक्षण संस्थाओं के अस्तित्व  का बोध होता है। निश्चित रूप में इनमे वैदिक मन्त्रों की शिक्षा डी जाती होगी। इसके अतिरिक्त छंदशास्त्र, ज्यामिति, इतिहास के शिक्षण की व्यवस्था रही होगी। शिक्षा में वाद-विवाद का भी प्रचलन रहा होगा, ऐसे संकेत मिलते है। ऋग्वेद से बारह बारह महीनों की चर्चा के साथ-साथ, वर्ष विशेष में पड़ने वाले अधिक मास का उल्लेख आया है।

भोजन

ऋग्वैदिक लोगों का मुख्य भोजन पदार्थ था- अन्न, फल, दूध, दही, घी एवं मांस। नशीले पेय पदार्थों में सोम और सुरा प्रचलित थे। सोम यज्ञों के अवसर वाला नशीला पदार्थ था। ऋग्वेद के नवें मण्डल में इसकी विस्तार है। सोम का पौधा पहाड़ों पर, विशेष रूप में मुजवंत पर्वत पर उत्पन्न होता था। सुरा साधारण अवसर पर पिए जाने वाला पेय पदार्थ था। गौ को अघन्या कहा गया है। इसलिए उसका माँस निषिद्ध था किन्तु बैल, भेड़ और बकरी का माँस निषिद्ध नहीं था और जब यज्ञ के अवसर पर उनको बलि दी जाती थी तो पुरोहितों को भी उसका माँस खाना पड़ता था। घोड़े का माँस यज्ञ के अश्वमेघ यज्ञ के अवसर पर खाया जाता था। दूध आयों का प्रिय पेय पदार्थ था उससे दही, अमिक्षा, छाछ, नवनीत, घृत आदि तैयार किए जाते थे। नमक और मछली का प्रयोग संभवत: ऋग्वैदिक काल में नहीं होता था। ऋग्वैदिक भुने हुए दाने, हरी सब्जियाँ एवं मांस खाते थे।

वस्त्र

ऋग्वेदकालीन आर्य विभिन्न प्रकार के वस्त्र धारण करते थे। ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर विविध प्रकार के वस्त्रों का उल्लेख हुआ है। वस्त्र के लिए वासस्अधिवाससवसन आदि शब्दों का प्रयोग, आयों की वस्त्र में विशेष अभिरुचि को इंगित करता है। शरीर के ऊपरी भाग में धारण किये जाने वाला वस्त्र अधिवास तथा अधोभाग में धारण किया जाने वाला वास कहलाता था। भेड़ की ऊन से उर्णा नामक वस्त्र बनाया जाता था। उस युग में गांधार की भेड़ों की ऊन का अधिक प्रचलन था। शाल की तरह ओढ़े जाने वाले वस्त्र उत्क तथा द्रापि कहलाते थे। नीवि अथवा अधोवस्त्रसे कमर के नीचे का शरीर ढंका जाता था। उष्णीस (पगड़ी) पहनने का भी प्रचलन था। ब्रह्मचारी सामान्यतया मृग चर्म धारण करते थे। अधिकांशतः सूत (क्षौम) के वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। ऋग्वैदिक आर्यों को सिलाई तथा कपड़े पर कसीदाकारी की कला का ज्ञान था।

मनोरंजन

संगीत मनोरंजन का महत्त्वपूर्ण साधन था। ऋग्वेद के मंडूक सूत्र में सोम रस निकालने में जुटे ब्राह्मणों के संगीतपूर्ण पाठ के उल्लेख हैं। पुरुष नर्तक को नृत्य तथा स्त्री नर्तक को नृतु कहा जाता था। ऋग्वैदिक आर्य जीवन के उल्लास के गीत गाते थे एवं मृत्यु की चर्चा शत्रुओं के अतिरिक्त अन्य किसी परिप्रेक्ष्य में नहीं करते थे। नृत्य और संगीत के अतिरिक्त रथ दौड़, शिकार और जुआ खेलना आदि भी मनोरंजन के साधन थे। ऋग्वैदिक आयों के घर लकड़ी, बांस और मिट्टी के बने होते थे। घुड़दौड़ भी मनोरंजन का साधन था। विश्वला नामक त्वरित अश्व का उल्लेख मिलता है।

रीतिरिवाज

वैदिक कालीन रीति-रिवाजों के प्रसंग में तत्कालीन समन नामक उत्सव का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। ऋग्वेद में वर्णन आया है कि जब कन्या सुन्दर है और आभूषित है तो स्वयं पुरुषों के झुण्ड में से अपना मित्र ढूंढ लेती है। एक विशेष परिधान वाधूय का प्रयोग वधू द्वारा विवाह के अवसर पर किया जाता था। नर्तकियों द्वारा विशिष्ट परिधान पेशस धारण करने का विवेचन मिलता है। कभी-कभी मुनि लोग चर्म को वस्त्र के रूप में उपयोग करते थे। आर्य लोगों की आभूषण प्रियता का विवेचन भी अनेक मन्त्रों में हुआ है। ऋग्वेद में अनेक आभूषणों के नाम मिलते हैं, गले में निष्क धारण किया जाता था। कान में कर्णशोभन एवं शीश पर कुम्ब नामक आभूषण के पहनने की प्रथा थी। इनके अतिरिक्त खादिरुक्मभुजबंदकेयूरनूपुरकण एवं मुद्रिका आदि आभूषण भी धारण किये जाते थे। एक सूक्त में अश्विनों को स्वर्ण कमल की माला पहने हुए, होने का उल्लेख किया है। पैरों में सम्भवत: कड़े के रूप में कोई आभूषण पहना जाता था।

चिकित्सा

भिषज शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में वैद्य के लिए होता था। भिषज अश्विन देवता को कहा जाता था। वे अंधे को नेत्र एवं पंगु को गति प्रदान करते थे। उन्होंने परावृज का अंधापन दूर किया। उन्होंने च्यवन ऋषि को फिर जवान बना दिया और युद्ध में जब विश्वपाल का पैर कट गया तो उन्होंने उसके कृत्रिम पैर लगाया। ऋग्वेद में कभी-कभी वरूण एवं रूद्र का भी भिषज के रूप में उल्लेख किया गया है। उस युग के चिकित्सक औषधि के साथ, जादू-टोना का भी प्रयोग करते थे। यक्ष्मा (तपेदिक) का उल्लेख अनेक स्थलों पर हुआ है।

मृतक संस्कार

ऋग्वेद के 5 सूक्तों में इसकी चर्चा है। अधिकांशत: अग्नि संस्कार होता था। अग्नि पितृ एवं देवताओं के लोक में वाहक का कार्य करती थीं। मार्ग में सवितृ मृतक का निर्देशन करते थे तथा पूषण उनकी रक्षा करते थे। अग्नि संस्कार के अतिरिक्त कभी-कभी मृतक को दफनाया भी जाता था।

अर्थव्यवस्था – वैदिक काल

वन्य प्रदेशों को साफ कर आर्यों ने देश में अपने ग्रामों की स्थापना की थी। इस प्रक्रिया में सम्पूर्ण पंजाब, सैन्धव प्रदेश एवं उत्तरी भारत के बहुसंख्य ग्रामों की स्थापना हुई। ऋग्वैदिक कालीन समाज में ग्राम सबसे छोटी राजनैतिक एवं सामाजिक इकाई थी। इस युग के प्रारम्भिक चरण में आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक अस्थिरता बनी रही। आर्यजनों में संयुक्त परिवार प्रथा थी। एक परिवार में कई सदस्य एक साथ रहते थे एवं कई परिवारों या कबीलों से ग्राम बनते थे। प्रारम्भ में पशुचारण प्रमुख व्यवसाय था। कभी-कभी आर्य कबीले अपने पशुओं के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाते थे और इस तरह ग्राम एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रतिस्थापित होते रहते थे। कबीलाई-संघर्ष के कारण, पराजित समूहों द्वारा विजित सरदारों को कर (बलि) अदायगी करनी पड़ती थी। विजयी कबीले के अन्य सदस्यों को युद्ध में बलपूर्वक प्राप्त किये गये एवं लूट के सामान का हिस्सा (अंश) प्राप्त होता था। आर्यों की इस कबायली व्यवस्था ने उनके जीवन के विभिन्न पक्षों को प्रभावित किया। ऋग्वैदिक काल में भूमि के व्यक्तिगत स्वामित्व का कोई साक्ष्य नहीं मिलता है। टेसिटस ने इस सन्दर्भ में एक प्रकार के सामुदायिक स्वामित्व का उल्लेख किया है।

जनसंख्या के गतिशील चरित्र के बारे में विश शब्द से भी सूचना मिलती है, जिसका तात्पर्य है बस्ती। उनके भ्रमणशील जीवन के लिए पशुपालन अधिक उपयुक्त व्यवसाय था। पशुओं को लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के दौरान, उनका दस्युओं से संघर्ष की चर्चा ऋग्वेद में मिलती है। आर्य जनों को अपने कबायली जीवन से स्थायी आवासों की स्थापना में सम्भवत: प्रागायों से संघर्ष भी करना पड़ा होगा। कृषि का भी व्यापक प्रचलन यद्यपि इस काल में हो चला था, तथापि पशुपालन महत्त्वपूर्ण व्यवसाय बना रहा। पशुओं से सम्बद्ध देवताओं में पूषन नामक देवता का प्रमुख स्थान था। अनेक पशुओं से आर्य लोग परिचित थे, किन्तु गाय एवं बैल का विशेष महत्त्व था। ऋग्वेद में अनेक भाषागत अभिव्यक्तियाँ गाय (गौ) से जुड़ी हैं। पालतू पशु सम्पन्नता के प्रतीक थे और एक सम्पन्न पालतू पशुओं के स्वामी को गोमत कहा जाता था। इन्हें सम्पत्ति के विशिष्ट भाग के रूप में लिया जाता था। गायों का सर्वाधिक उल्लेख पशुओं में हुआ है। गोपाल की देख-रेख में गायें गोष्ठ में चरती थीं। वह गायों को गड्डे आदि में गिरने अथवा चुराये जाने से रक्षा करता था। गोपाल के पास अंकुश होने का उल्लेख भी मिलता है। ऋग्वेद का दशम मण्डल गौ देवता एवं गायों की अभिवृद्धि की कामना में लिखा गया है। अनेक स्थलों पर पशुओं की चोरी के भी मिलते हैं एवं कई राज्यों में परस्पर युद्ध का कारण गायों का अपहरण भी रहा है। ऐसे युद्धों के लिए गविष्टि शब्द का प्रयोग मिलता है। ऋग्वेद में पणि शब्द आया है जिन्हें वैदिक जनों का शत्रु माना गया। वे आर्यों के धन, एवं जंगलों में छिपा देते थे। पशुओं को छुड़ाने के की जाती थी। वस्तुत: पशुओं का अपहरण एक सामान्य थी। जन की गायों की रक्षा करने के कारण राजा को गोपति भी कहा जाता था। इसी प्रकार दूरी के लिए गवयतु शब्द प्रयोग में लाया जाता था। पुत्री के लिए दुहिता शब्द का इस्तेमाल होता था। समय की माप के लिए गोधूलि शब्द का प्रयोग किया जाता था। गाय को पवित्र माना जाता था और उसे अघन्य कहा जाता था। गोत्र शब्द की व्युत्पत्ति भी, गायों को एक साथ गोष्ट में रखने के कारण हुई प्रतीत होती है।

कृषि, द्वितीयक पेशा इस काल में था। ऋग्वेद के 10462 श्लोकों में केवल 24 में कृषि की चर्चा है। ऋग्वेद में यव और धान्य का उल्लेख है, परन्तु यहाँ धान्य का अर्थ अनाज है। ऋग्वेद में कृष धातु अनेक बार प्रयुक्त हुई है। इससे कृषि की लोकप्रियता का पता चलता है। भूमि हल (सीर) से तैयार की जाती थी जिसे बैल खींचते थे। हल से तैयार की गई भूमि को उर्वरा या क्षेत्र कहा जाता था। भूमि जीतने से बनी हराइयों (सीता) में बीज बोये जाते थे। हल को जोड़ने में आठ से बारह बैलों तक का उपयोग किया जाता था। फसल तैयार होने पर उसे हँसिये (दात्र, सृणि) से काटते थे एवं गट्ठर (वर्ष) बाँधकर ले जाते थे और खलिहान (खल) में एकत्र कर सूप (शूर्प) की सहायता से, अन्न को अलग किये जाने का उल्लेख दसवें मण्डल में मिलता है। अन्न के परिमापन हेतु उपयोग में लाये जाने वाले बर्तन को उर्दर कहा जाता था। ऋग्वेद के प्रथम मंडल में लिखा है कि अश्विन देवताओं ने मनु को हल चलाना और जौ की खेती करना सिखाया।

वर्षा पर ही साधारण कृषक निर्भर करते थे। ऋग्वेद में स्थान-स्थान पर वर्षा के लिए प्रार्थनायें मिलती हैं। आर्यों के प्रारम्भिक सप्त सिन्धु क्षेत्र में वर्षा कम होती थी एवं सतलज, रावी, सिन्धु , घग्गर  आदि नदियों की कछारी भूमि में खेती की जाती थी। किन्तु अधिक फसल के लिए सिंचाई की जाती थी। ऋग्वेद से जानकारी मिलती है कि सामान्यतः कुएँ (अवट) के जल से सिंचाई की जाती थी। चक्र के द्वारा पानी निकाला जाता और नालियों या नहरों (कुल्याओं) द्वारा पानी खेत में पहुँचाया जाता था। परवर्ती ग्रन्थों में अनेक प्रकार के धान्यों का वर्णन हुआ है- ब्रीहि, यव, तिल, उड्द (माष), गेहूँ (गोधूम), मसूर, चना आदि। ऋग्वेद में उल्लेख आया है कि अश्विन देवताओं ने मनु को हल चलाना एवं उत्पादन करना सिखाया।

कृषि एवं तटसम्बन्धी उपकरणों के विवरणों से प्रकट होता है की ऋग्वेद कल में कृषि की प्रतिष्ठा हो चुकी थी। जंगल जलाने के लिए आग का प्रयोग किया जा रहा था और परिवर्तित खेती का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। कृषि लोगों की समृद्धि का कारण बन रही थी। एक स्थान पर अपाला अपने पिता की खेती की समृद्धि के लिए प्रार्थना करती है। अन्यत्र पूषन् देवता से हल चलाने की प्रार्थना की गई है। एक स्थान पर सब कुछ हारे हुए जुआरी को यह राय दी जाती है कि वह कृषि कर्म करे जिससे उसे पत्नी, धन एवं पशु की प्राप्ति होगी। भूस्वामित्व व्यक्तिगत सम्पत्ति का आधार नहीं बन पाया था। भूमि सहज ही सुलभ थी और भूमि का अधिग्रहण व्यावसायिक आधार पर था। राजा को भूस्वामी नहीं कहा गया। सम्भवत: सामूहिक भूस्वामित्व रहा होगा।

इस प्रकार ऋग्वेद में एक ही अनाज जौ का उल्लेख है। किन्तु ऋग्वैदिक काल में कृषि कार्य से संबद्ध लोगों को मन्दबुद्धि समझा जाता था। उर्वरा जुते हुए खेत को कहा जाता था। हल के लिए लांगल शब्द का प्रयोग हुआ है। गोबर खाद के लिए करिषु शब्द आता था। कूप के लिए अवल शब्द का प्रयोग होता था। हल से बनी नाली या हल रेखा को सीता कहते हैं। अनाज का कोठार स्थिवि कहलाता था। कीवाश हलवाहा को कहा जाता था। बादल के लिए पर्जन्य और नहर के लिए कुल्या शब्द का प्रयोग होता था। ऋग्वैदिक आर्यों को पाँच ऋतुओं का ज्ञान था। पशुओं में गाय एवं घोड़ों को पवित्र माना जाता था। ऋग्वेद में गाय की चर्चा 176 बार तथा घोड़ों का जिक्र 215 बार किया गया है। हाथियों की चर्चा मिलती है, परन्तु वे पालतू नहीं थे। व्याघ्र की चर्चा ऋग्वेद में नहीं मिलती है। ऋग्वेद में नगर की चर्चा नहीं है, बल्कि पुर की चर्चा हुई है।

वाणिज्य एवं व्यापार

वाणिज्य एवं व्यापार बहुत ही सीमित था। पणि नामक अनार्य जो अपनी कंजूसी के लिए प्रसिद्ध थे, वाणिज्य व्यापार से जुड़े थे। पणि नामक ये व्यापारी आर्यों के शत्रु के रूप में भी चित्रित किए गये हैं। इनमे से कुछ पराजित अनार्य सरदार पुन: आर्य व्यवस्था में शामिल हो गये। उदाहरण के लिए बलबूथ, तीरूक्ष आदि। इस काल में प्रमुख व्यापारिक वस्तुएँ कपड़ा, चादर एवं खालें थीं। ऋग्वेद में व्यापारी के लिए वणिक शब्द मिलता है एवं उसके धनार्जन के लिए परदेश जाने की चर्चा मिलती है। उस काल में पदार्थों का आदान-प्रदान भी होता था। एक स्थान पर कहा गया है कि गायों को देकर इन्द्र की प्रतिमा ली गई थी। अन्यत्र कवि दान में सौ अश्वों के साथ सौ निष्कों की प्राप्ति का उल्लेख करता है। कहा जाता है कि निष्क कालान्तर में स्वर्ण मुद्रा में परिणत हो गया। यद्यपि क्रय-विक्रय में वस्तु विनिमय प्रणाली का प्रचलन था। गाय मूल्य की इकाई के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी थी। एक स्थान पर उल्लेख मिलता है कि एक व्यक्ति ने कम मूल्य पर अधिक वस्तु विक्रय कर दी, परन्तु क्रेता के पास जाकर वह पुन: कहता है कि वस्तु विक्रय नहीं की (अविक्रीत) है और अधिक मूल्य चाहता है, किन्तु इसलिए कि उसने कम मूल्य पर अधिक वस्तु दे दी है वह मूल्य नहीं बढ़ा सकता, मूल्य कम हो या अधिक, बिक्री के समय जो तय हो। उसे ही विक्रेता एवं क्रता दोनों को मानना चाहिए। ऋण देने की प्रथा भी थी, इस समय आठवें और सोलहवें भाग के रूप में मूलधन पर ब्याज लिया जाता था।

महत्त्वपूर्ण शिल्प

आर्य मुख्यतः तीन धातुओं का प्रयोग करते थे- सोना, तांबा और काँसा। अमस् शब्द यहाँ तांबे या काँसे का वाचक है। नारियाँ कपड़े बुनने का कार्य करती थीं। सिरी शब्द का प्रयोग वैसी नारियों के लिए किया जाता था। बढ़ई को तक्षण कहा जाता था और करघा को तसर कहा जाता था। उद्योग धंधे में लकड़ी की कटाई, धातु उद्योग, बुनाई, कुंभकारी और बढ़ईगिरी आदि शिल्प प्रचलित थे। जुलाहे को तंतुवाय कहा जाता था। चर्मन्न चमड़े का काम करने वाले को कहा जाता था। वासोवाय वस्त्र बुनता था। सोना भूमि के अतिरिक्त सिन्धु नदी के तल से प्राप्त किया जाता था इसलिए सिन्धु को हिरण्यवर्तिनी अथवा हिरण्यमयी नाम दिया जाता था।

विनिमय प्रणाली

संभवत: वस्तु विनिमय प्रणाली उस युग में भी प्रचलित रही होगी। यद्यपि विनिमय के रूप में गाय, घोड़े एवं निष्क का उपयोग होता था। निष्क संभवत: स्वर्ण आभूषण होता था या फिर सोने का एक ढेला। जाहिर है कि अभी नियमित सिक्के विकसित नहीं हुए थे। अष्टकर्णी (अष्टकर्मी) नाम से यह विदित होता है कि ऋग्वैदिक आर्यों को संभवत: अंकों की जानकारी थी। ऋण देकर ब्याज लेने वाले को वेकनाट कहा जाता था। इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वेद काल तक भारतीय समाज आर्थिक दृष्टि से विकसित अवस्था को प्राप्त कर चुका था। कृषि एवं पशु पालन आर्यों के महत्त्वपूर्ण व्यवसाय थे किन्तु कई लघु उद्योगों एवं व्यवसायों का आविर्भाव भी देखा जाता है। साथ ही वस्तु विनिमय के अतिरिक्त मुद्रा प्रणाली के रूप में निष्क का प्रादुर्भाव भी हो गया था।

प्रशासन- वैदिक काल

चूंकि इस काल की अर्थव्यवस्था एक निर्वाह अर्थव्यवस्था थी, जिसमें अधिशेष के लिए बहुत कम गुंजाइश थी। अत: करारोण प्रणाली भी स्थापित नहीं हो पायी तथा राजकीय अधिकारियों की संख्या भी सीमित थी। किन्तु राजा को अपने दायित्व निर्वाह के बदले प्रजा से बलि या कर पाने का अधिकारी माना जाता था। यह राजा को स्वेच्छापूर्वक दिया गया उपहार होता था। राजा को प्रारम्भ में प्रजा से नियमित कर नहीं मिलते थे। अत: इन्द्र से प्रार्थना की गई कि वह राजकर देने के लिए प्रजा को विवश करे। कालान्तर में नियमित करों की प्रथा उत्तरवैदिक काल में प्रतिष्ठित हुई।

समाज की सबसे बड़ी इकाई राज्य के लिए जन शब्द का प्रयोग मिलता है। जन शब्द का 275 बार प्रयोग ऋग्वेद में हुआ है, पर जनपद शब्द का एक बार भी नहीं। राज्य का आधार कुल थे जिन्हें संजाति एवं सनाभि (एक नाभि से उत्पन्न) कहा गया है तथा अन्य राष्ट्र के लिए अनाभि या अरण शब्द आया है। जन प्रारम्भ में अनवस्थित एवं संचरणशील थे अर्थात् ग्राम के ग्राम अपने पशुओं के साथ संचरण करते थे। समय क्रम से आर्य स्थायी रूप से निवास करने लगे। अत: कुलों के स्थायी होने से ग्राम एवं जनपदों से राष्ट्र का प्रारूप सामने आया।

ऋग्वेद से ज्ञात होता है कि समाज कुल (परिवार), ग्रामविश्व् तथा जन या राष्ट्र के रूप में विभक्त था। पर यह जानकारी नहीं मिलती है कि परिवार या कुल में कितनी पीढ़ी तक लोग एक साथ रहते थे, तथापि कीथ की धारणा है कि तीन पीढ़ी तक एक परिवार या कुल के सदस्य साथ-साथ रहते होंगे। कीथ के अनुसार, उस समय ऐसी प्रथा भी नहीं होगी कि माता-पिता की मृत्यु के बाद अलग रहा जाये, सम्भवत: उस काल में भूमि अथवा सम्पत्ति के प्रति अधिक लगाव नहीं रहा होगा क्योंकि कृषि भूमि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थी। परिवार एवं कुल में साथ रहने का उद्देश्य मात्र पारस्परिक सहयोग एवं सहायता था। कुल का संरक्षक कुलप कहलाता था। परिवार के समस्त सदस्य कुलप के अनुशासन को मानते हुए एक ही गृह में निवास करते थे।

ग्रामों का आविर्भाव विभिन्न परिवारों के समुदाय से हुआ। ग्राम स्वशासी एवं आत्मनिर्भर थे तथा ग्रामीण लोगों के हितों की रक्षा का दायित्व ग्रामणी नामक पदाधिकारी का होता था। युद्ध काल में वह राजा की सहायता भी करता था एवं युद्ध काल के अतिरिक्त ग्राम का सामान्य प्रशासन देखता था। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि ग्रामणी सैनिक, आर्थिक तथा सामाजिक आदि सभी मामलों में ग्राम का प्रमुख था और सम्भवत: ग्राम से कर या बलि भी वसूल करता होगा। राजा को बलि हृन्त: (बलिकर को अपद्वत करने वाला) कहा गया है। ग्राम के लोगों को गोधन के लिए उत्सुक कहा गया है। अनेक ग्रामों से मिलकर बना, उपजिला का स्पष्ट वर्गीकरण ऋग्वेद में नहीं मिलता। जन के सदस्यों को सामूहिक रूप से विश कहा जाता था। ऋग्वेद में इसका 170 बार उल्लेख है। ग्राम से बड़ी इकाई विश स्वीकार की जा सकती है क्योंकि इसके मुखिया विशपति का उल्लेख मिलता है। राजा की सहायता के लिए निम्नलिखित अधिकारी होते थे

पुरोहित

पुरोहित का महत्त्वपूर्ण स्थान राजा के मंत्रियों में था। उसे राजा का प्रमुख परामर्शदाता माना जाता था एवं यह धारणा थी कि उसकी प्रार्थना राजा तथा जन की रक्षा करती है। युद्ध के समय पुरोहित राजा की विजय के लिए प्रार्थना ही नहीं करता था, बल्कि युद्ध में भी भाग लेता था। पुरोहित द्वारा राजा एवं उसके परिवार के धार्मिक कृत्यों के निष्पादन किये जाने के बदले उसे दान था। कीथ ने वैदिक पुरोहित को वैदिक राजनीति का अग्रज कहा है। कोई सन्देह नहीं है कि प्रारम्भिक वैदिक राज्य में विश्वामित्र एवं वशिष्ठ पुरोहितों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। अत: कहा जा सकता है कि पुरोहित शान्ति तथा युद्ध दोनों अवस्थाओं में राजा का शिक्षक, पथ प्रदर्शक, मित्र तथा राजनैतिक एवं धार्मिक परामर्श-दाता होता था।

सेनानी

युद्ध में विजय के लिए सैन्य संचालन करना राजा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था और सेनानी नामक मंत्री उसे इस कार्य में सहयोग प्रदान करता था। युद्ध नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता राजा की प्रमुख योग्यता मानी गई थी। स्मरणीय कि तत्कालीन युद्धों का प्रमुख कारण एक दूसरे के क्षेत्र पर अधिकार करने की कामना के साथ पशु धन की प्राप्ति भी था। उस काल में पशुधन की प्राप्ति के लिए युद्ध इतने सामान्य थे कि ऋग्वेद में युद्ध के लिए गविष्टि, गोषुगवेषणगव्यत आदि शब्दों का प्रयोग मिलता है। सामान्यतः पैदल एवं रथारोही सेना में होते थे। इसके अतिरिक्त अश्वारोहियों का अस्तित्व भी रहा होगा। रथों का युद्धों में विशेष महत्त्व था। राजा तथा प्रमुख योद्धा रथों पर सवार होकर युद्ध करते थे।

सुरक्षा की दृष्टि से योद्धा कवच एवं शिरस्त्राण युद्ध में धारण करते थे, जिनके लिए क्रमश: वर्म एवं शिप्र शब्दों का प्रयोग हुआ है। वैदिक मंत्रों में विविध अस्त्र-शस्त्रों का विवरण मिलता है। धनुष बाण युद्ध काल के प्रमुख शस्त्र थे, किन्तु परशु, भाला (सृक्ति), तलवार का प्रयोग भी किया जाता था। बाणों का आगे का सिरा सींग अथवा धातु से मढ़ दिया जाता था। कभी-कभी विषयुक्त बाण भी प्रयोग में लाये जाते थे। युद्ध के दौरान विभिन्न प्रकार की व्यूह रचनायें की जाती थीं। शर्धगण एवं व्रात आदि शब्द संभवतः विविध प्रकार की व्यूह रचनाओं को इंगित करते हैं। प्राय: नदियों के किनारे युद्ध आयोजित होते थे। दशराज्ञ युद्ध पुरुष्णी (रावी) तट पर लड़ा गया था। ऋग्वेद में पुर-चरिष्णु का उल्लेख मिलता है, जिसका तात्पर्य दुर्गों को गिराने के प्रयोग में लाया जाने वाला कोई उपकरण रहा होगा। युद्ध सम्बन्धी मामलों में सेनापति राजा का सहयोग करता था। सेनापति की नियुक्ति राजा द्वारा की जाती थी। राजा की सहायता से सेनापति सेना का गठन करता एवं युद्ध की योजना बनाता था। सेनानी के पद के विषय में जी.एस.पी मिश्र की मान्यता है कि वह अधिकारी राज्य के अधिक संस्थागत हो जाने के पश्चात् अस्तित्व में आया होगा।

यह कुलपति परिवार का मुखिया होता था, यह विशपति विश का प्रधान होता था। व्राजपति-चारागाह का अधिकारी होता था। साथ ही यह युद्ध में कुलप को संगठित कर युद्ध मैदान में ले जाता था, यह ग्रामणी ग्राम का प्रधान था और युद्ध में ग्राम का नेतृत्व करता था। यह स्पर्श गुप्तचर होता था। यह दूत विभिन्न राजनैतिक इकाइयों को एक दूसरे के विषय में सूचित करता था। यह पुरप दुर्ग का अधिकारी होता था। सबसे बड़ा अपराध पशु चोरी को माना जाता था।

न्याय व्यवस्था

विचारकों ने इस काल में विधि या धर्म की सर्वोच्चता की घोषणा ही नहीं की थी, वरन् राजसत्ता द्वारा इसके पालन पर भी जोर दिया था। ऋग्वेद में विधि अथवा व्यवहार के लिए धर्मन् (बाद में धर्म) शब्द का प्रयोग हुआ है। वस्तुतः धर्म के अनेक उपादान आगे जाकर विधि के अंग बन गये। धर्म या विधि के स्वरूप तथा सर्वोच्चता की परिभाषा सामाजिक सन्दर्भ में की गई है, क्योंकि धर्म एवं विधि का मूल मानव समाज है। समाज में व्यक्ति नैसर्गिक रूप में धर्म से अनुप्राणित होकर व्यवस्था बनाये रखता है अथवा दण्ड के भय से व्यवस्था को स्वीकार करता है। इस प्रकार ‘धर्म प्रारम्भ में ऐसे नियमों का संग्रह प्रतीत होता है जिसके अनेक प्रावधानों ने बाद में विधि का स्वरूप ग्रहण कर लिया था और वे प्रावधान प्रारम्भ में समाज की व्यवस्था तथा नैसर्गिक नियमों के द्योतक थे। वेदों की ऋचाओं में पाप और अपराध परस्पर सम्बद्ध दिखाई देते हैं। ऋतु या धर्म के विपरीत किया गया कार्य अपराध माना गया। इस काल में चोरी, सेंधमारी, डकैती एवं पशु अपहरण मुख्य अपराध थे। हत्या का दंड द्रव्य के रूप में दिया जाता था। उच्च श्रेणी के व्यक्ति की हत्या का दड, द्रव्य के रूप में 100 गायों तक लिया जाता था जो मृतक के संबंधियों को प्रदान किया जाता था। वरदेय (बदला चुकाने की प्रथा) का प्रचलन था। शतदाय (100 गायों का दान) सदृश विशेषण का प्रयोग होता था। इसका तात्पर्य यह था कि वह व्यक्ति जिसके जीवन मूल्य की बराबरी 100 गायें करती थीं। दिवालिये को ऋणदाता का दास बनाया जाता था। छोटे-छोटे विवादों का निर्णय ग्राम पंचायत करती थी।

राजनैतिक व्यवस्था- वैदिक काल

राजनैतिक अवस्था

राजा वैदिक युग के राष्ट्र या जनपद का मुखिया होता था। सामान्यतया, राजा का पुत्र ही पिता की मृत्यु के बाद राजा के पद को प्राप्त करता था। पर इस वैदिक युग में प्रजा जिस व्यक्ति को राजा के पद पर वरण करती थी, उससे वह यही आशा रखती थी कि वह ध्रुवरूप से राष्ट्र का शासन करेगा। उसे किसी निश्चित अवधि के लिए राजा नहीं बनाया जाता था। इसीलिए अथर्ववेद में कहा है- हे राजन्, तू सुप्रसन्न रूप से राष्ट्र में दशमी अवस्था तक शासन करता रहे। 90 साल से ऊपर की आयु को दशमी अवस्था कहते हैं। राजा से वैदिक काल में यही आशा की जाती थी कि वह दशमी अवस्था तक (वृद्धावस्था तक) राष्ट्र के शासन का संचालन करता रहेगा।

ऐसे अवसर भी उपस्थित हो सकते थे, जबकि राजा दशमी अवस्था तक राष्ट्र का शासन न कर सके। राजा को कतिपय कारणों से निर्वासित भी कर दिया जा सकता था, और यदि जनता उसे राजा के पद पर पुन: अधिष्ठित करना चाहे, तो उसे निर्वासन से वापस भी बुलाया जा सकता था। जिस राजा का वरण विश या प्रजा करती थी, उससे वह कतिपय कर्तव्यों के पालन की आशा भी रखती थी।

राजा के मुख्यत: दो कर्तव्य थे: प्रथम, युद्ध में नेतृत्व करना और दूसरे, कबीले की रक्षा करना। युद्ध की आवश्यकताओं के अनुकूल राजा का पद था। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद के साक्ष्य से ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक काल में विश् समिति में एकत्रित होकर राजा का चुनाव करता था। किन्तु, वैदिक साहित्य में दी गई वंशावलियों से ऐसा प्रतीत होता है कि राजा का पद वंशानुगत था और पिता की मृत्यु के बद ज्येष्ठ पुत्र उत्तराधिकारी होता था। इस आधार पर गैल्डनर महोदय का मत है कि जन साधारण द्वारा राजा का चुनाव औपचारिकता मात्र था। किन्तु, यह औपचारिकता भी इस बात का द्योतक है कि उत्तराधिकारी के निर्णय में जनमत की भूमिका थी।

प्रशासन का लोकप्रिय स्वरूप ऋग्वैदिक काल में राजतंत्रात्मक था। संभवत: कुछ गैर-राजतंत्रात्मक राज्य भी थे। इसे ऋग्वेद में गण कहा गया है एवं इसका प्रमुख ज्येष्ठक या गणपति होता था, इस तरह यहाँ गणतंत्र का प्रारंभिक उल्लेख मिलता है। राजा की स्थिति स्पष्ट नहीं थी और राजा की पहचान उसके कबीले से होती थी। राजा को जनस्य गोप्ता तथा दुर्ग का भेदन करने वाला (पुराभेत्ता) कहा जाता था। इनके अतिरिक्त राजा की निम्नलिखित उपाधियाँ भी थीं, यथा विशाम्पति, गणना गणपति, ग्रामिणी आदि। कबीले के लोग स्वेच्छा से राजा को एक कर देते थे। इसे बलि कहा जाता था। संभवत: इस बलि की दर कुल उत्पादन के 1/16 से 1/10 भाग तक थी।

कुछ कबीलाई संस्थाएँ अस्तित्व में थीं। सभा, समिति, विदथ और गण। अथर्ववेद के अनुसार सभा और समिति प्रजापति की दो पुत्रियाँ हैं। मैत्रायणी संहिता के अनुसार, सभा में स्त्रियाँ भाग नहीं लेती थीं। सभा में भागीदारी करने वाले को समये कहा जाता था। इसके सदस्य श्रेष्ठ जन होते थे और उन्हें सुजात कहा जाता था। सभा के कुछ न्यायिक कार्य भी थे। ऋग्वेद में आठ बार सभा की चर्चा की गई है।

राजा का निर्वाचन संभवत: समिति करती थी। समिति के अध्यक्ष को पति या ईशान कहा जाता था। कुछ विद्वानों का मानना है कि राजा ही समिति का अध्यक्ष होता था। ऋग्वेद में नौ बार समिति की चर्चा हुई है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद से ज्ञात होता है कि समिति में राजकीय विषयों की चर्चा होती थी तथा सहमति से निर्णय लिया जाता था। जीमर महोदय ने सभा को ग्राम संस्था एवं समिति को केन्द्रीय संस्था कहा है। पंचालों के राजा प्रवाहण जैवलि ने समिति के समक्ष पाँच प्रश्न रखे, इनका वह उत्तर न दे पाई। अत: संभवत: समिति राष्ट्रीय अकादमी की तरह भी काम करती थी।

रॉथ के अनुसार विदथ संस्था सैनिक, असैनिक तथा धार्मिक कायाँ से संबद्ध थी। यही वजह है कि विदथ को के.पी. जायसवाल एक मौलिक बड़ी सभा मानते हैं, जो आगे चलकर सभा, समिति एवं सेना में विभक्त हो गई। रामशरण शर्मा इसे आर्यों की प्राचीनतम संस्था मानते हैं। विवरण विदथ का महत्वपूर्ण दायित्व था। त्वष्ट्रि को प्रथम वितरक कहा गया है। जिन ऋभुजनों की सभा का वह प्रधान था, उन्हें वितरण के काम में लगे होने के कारण स्वैच्छिक वितरक की संज्ञा दी गई। विदथ का महत्व इसी बात से आका जा सकता है कि जहाँ ऋग्वेद में सभा शब्द का उल्लेख आठ बार और समिति का नौ बार हुआ है, वहीं विदथ शब्द का उल्लेख 122 बार हुआ है। विदथ के महत्व में यद्यपि परवतींकाल में कमी आई, तथापि सभा और समिति के सापेहन में इसका भी महत्व बरकरार रहा। अथर्ववेद में सभा शब्द सत्रह बार और समिति शब्द तेरह बार आया है, यही विदथ 22 बार हुआ है। इसी प्रकार गण शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में 46 बार तथा अथर्ववेड में 9 बारहुआ है।

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