गुप्त काल

गुप्त काल में प्रशासन

राजनैतिक व्यवस्था- गुप्त-साम्राज्य के अन्तर्गत सब प्रदेशों पर गुप्त-सम्राटों का सीधा शासन नहीं था। उनके अधीन अनेक महाराजा, राजा और गणराज्य थे, जो आन्तरिक शासन में स्वतन्त्र थे। सामन्तों को उनके राज्य और शक्ति के अनुसार महाराजा व राजा आदि पदों से कहा जाता था। सब सामन्तों की स्थिति भी एक समान नहीं थी। आर्यावर्त या मध्यदेश के सामन्त गुप्त सम्राटों के अधिक प्रभाव में थे। सुदूरवर्ती सामन्त प्रायः स्वतन्त्र स्थिति रखते थे, यद्यपि वे गुप्त-सम्राटों की अधीनता को स्वीकार करते थे। यही दशा गणराज्यों की थी। शासन की दृष्टि से हम गुप्त-साम्राज्य को निम्नलिखित भागों में बाँट सकते हैं-

  1. गुप्तवंश के सम्राटों के शासन में विद्यमान प्रदेश- ये शासन की सुगमता के लिए भुक्तियों (प्रान्तों या सूबों) में विभक्त थे। प्रत्येक भुक्ति में अनेक विषय और उनके भी विविध उपविभाग होते थे।
  2. आर्यावर्त व मध्यदेश के सामन्त- इनकी यद्यपि पृथक् सत्ता थी पर ये सम्राट् की अधीनता में ही शासन का कार्य करते थे।
  3. गणराज्य- यौधेय, मालव, आर्जुनायन, आभीर, शनकानीक, काक, खर्परिक, मद्र आदि अनेक गणराज्य गुप्तों के शासन-काल में विद्यमान थे, जो गुप्त सम्राटों के आधिपत्य को स्वीकार करते थे।
  4. अधीनस्थ राजा- दक्षिण कोशल, महाकांतार, पिष्टपुर, कोट्टूर, ऐरङडपल्ल, देवराष्ट्र अवमुक्त आदि बहुत-से राज्य इस काल में पृथक रूप से विद्यमान थे। पर उनके राजाओं ने गुप्त-सम्राटों की शक्ति के सम्मुख सिर झुका दिया था।
  5. सीमावर्ती राज्य- आसाम, नेपाल, समतल, कर्तृपुर आदि के सीमावर्ती राज्य प्रायः स्वतन्त्र सत्ता रखते थे, पर ये सब गुप्त-सम्राटों को भेंट-उपहार और उनकी आज्ञाओं का पालन कर उन्हें सन्तुष्ट रखते थे। ये सब गुप्त सम्राटों के दरबार में भी उपस्थित होते थे।
  6. अनुकूल मित्र- राज्य-सिंहलद्वीप और भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा के राजा गुप्त सम्राटों को भेंट-उपहार और कन्यादान आदि उपायों से मित्र बनाये रखने के लिए उत्सुक रहते थे। यद्यपि उनके राज्य गुप्त-साम्राज्य के अन्तर्गत नहीं थे, तथापि वे गुप्त-सम्राटों को एक प्रकार से अपना अधिपति मानते थे। इन्हें हम अनुकूल मित्र राज्य कह सकते हैं।

सम्राट् को शासन-कार्य में सहायता देने के लिये मन्त्री या सचिव होते थे, जिनकी कोई संख्या निश्चित नहीं थी। नारदस्मृति ने राज्य की एक सभा का उल्लेख किया है, जिसके सभासद् धर्म-शास्त्र में कुशल, अर्थज्ञान में प्रवीण, कुलीन, सत्यवादी और शत्रु व मित्र को एक दृष्टि से देखने वाले होने चाहिए। राजा अपनी राजसभा के इन सभासदों के साथ राज्यकार्य की चिन्ता करता था, और उनके परामर्श के अनुसार कार्य करता था। देश का कानून इस काल में भी परम्परागत धर्म-चरित्र और व्यवहार पर आश्रित था। जनता के कल्याण और लोकरंजन को ही राजा लोग अपना उद्देश्य मानते थे। इसका परिणाम यह था, कि परमप्रतापी गुप्त सम्राट् भी स्वेच्छाचारी व निरंकुश नहीं हो सकते थे।

साम्राज्य के मुख्य पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों को कुमारामात्य कहते थे। कुमारामात्य राजघराने के भी होते थे और दूसरे लोग भी। साम्राज्य के विविध अंगो-भुक्ति, विषय आदि का शासन करने के लिए जहाँ इनकी नियुक्ति की जाती थी, वहाँ सेना, न्याय आदि के उच्च पदों पर भी ये कार्य करते थे। कुमारामात्य साम्राज्य की स्थिर सेवा में होते थे और शासन-सूत्र का संचालन इन्हीं के हाथों में रहता था।

केन्द्रीय शासन के विविध विभागों को अधिकरण कहते थे। प्रत्येक अधिकरण की अपनी-अपनी मुद्रा (सील) होती थी। गुप्त-काल के विविध शिलालेखों और मुद्राओं आदि से निम्नलिखित अधिकरणों और प्रधान राज-कर्मचारियों के विषय में परिचय मिलता है-

  1. महासेनापति- गुप्त सम्राट् स्वयं कुशल सेनानायक और योद्धा थे। वे दिग्विजयों और विजय-यात्राओं के अवसर पर स्वयं सेना का संचालन करते थे। पर उनके अधीन महासेनापति भी होते थे, जो साम्राज्य के विविध भागों में, विशेषतया सीमान्त प्रदेशों में, सैन्यसंचालन के लिये नियत रहते थे। सेना के ये सबसे बड़े पदाधिकारी महासेनापति या महाबलाधिकृत थे।
  2. महादण्डनायक- महासेनापति के अधीन अनेक महादण्डनायक होते थे, जो युद्ध के अवसर पर सेना का नेतृत्व करते थे। गुप्त-काल की सेना के तीन प्रधान विभाग होते थे- पदाति, घुड़सवार और हाथी। महादण्डनायकों के अधीन महाश्वपति, अश्वपति, महापीलपति, आदि अनेक सेनानायक रहते थे। साधारण सैनिक को चाट और सेना की छोटी टुकड़ी को चमू कहते थे। चमू का नायक चमूप कहलाता था। युद्ध के लिये परशु शर, अंकुश, शक्ति, तोमर, भिदिपाल, नाराच आदि अनेकविध अस्त्रों को प्रयुक्त किया जाता था।
  3. रणभांडारिक- सेना के लिये सब प्रकार की सामग्री को जुटाने का विभाग रणभांडारिक के अधीन होता था।
  4. महाबलाधिकृत- सेना, छावनी और व्यूह रचना का विभाग महाबलाध्यक्ष या महाबलाधिकृत के हाथ में रहता था। उसके अधीन अनेक बलाधिकृत होते थे।
  5. दंडपाशिक- पुलिस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी दंडपाशिक कहलाता था। उसके नीचे खुफिया विभाग के अधिकारी चोरोद्धरणिकदूत आदि अनेक कर्मचारी रहते थे। पुलिस के साधारण सिपाही को भट कहते थे।
  6. महासांधिविग्रहिक- इस उच्च अधिकारी का कार्य पड़ोसी राज्यों, सामन्तों और गणराज्यों के साथ संधि तथा विग्रह की नीति का प्रयोग करना होता था। यह सम्राट् का अत्यन्त विश्वस्त कर्मचारी होता था, जो साम्राज्य की विदेशी नीति का निर्धारण करता था। किन देशों पर आक्रमण किया जाय, अधीनस्थ राजाओं व सामन्तों के प्रति क्या व्यवहार किया जाय, ये सब बातें इसी के द्वारा तय होती थीं।
  7. विनय-स्थिति-स्थापक- मौर्यकाल में जो कार्य धर्म-महामात्र करते थे, वही गुप्त-काल में विनय-स्थिति-स्थापक करते थे। देश में धर्मनीति की स्थापना, जनता के चरित्र को उन्नत रखना और विविध सम्प्रदायों में मेल-जोल रखना इन्हीं अमात्यों का कार्य था।
  8. भांडागाराधिकृत- यह कोष-विभाग का अध्यक्ष होता था।
  9. महाक्षपटलिक- राज्य के सब आदेशों का रिकार्ड रखना, इसके अधिकरण का कार्य था। राजकीय आय-व्यय आदि के सब लेखे भी इसी अमात्य द्वारा रखे जाते थे।
  10. सर्वाध्यक्ष- यह सम्भवत: साम्राज्य के केन्द्रीय कार्यालय का प्रधान अधिकारी होता था।

इन मुख्य पदाधिकारियों के अतिरिक्त राज्य-कर को वसूल करने का विभाग ध्रुवाधिकरण कहलाता था। इस अधिकरण के अधीन शाल्किक (भूमिकर वसूल करने वाले), गौल्मिक (जंगलों से विविध आमदनी प्राप्त करने वाले), तलवाटक व गोप (ग्रामों के विविध कर्मचारी) आदि अनेक राजपुरुष होते थे।

राजप्रासाद का विभाग बहुत विशाल होता था। महाप्रतीहार और प्रतीहार नाम के अनेक कर्मचारी उसके विविध कार्यों को सँभालते थे। अंत:पुर का रक्षक प्रतिहार होता था जबकि महाप्रतिहार राजमहल का रक्षक होता था।

युवराज-भट्टारक और युवराज के पदों पर राजकुल के व्यक्ति ही नियत किये जाते थे। सम्राट् का बड़ा लड़का युवराज-भट्टारक और अन्य लड़के युवराज कहलाते थे। शासन में इन्हें अनेक महत्त्वपूर्ण पद दिये जाते थे। यदि कोई युवराज (राजपुत्र) कुमारामात्य के रूप में कार्य करे, तो वह युवराज-कुमारामात्य कहलाता था। सम्राट् के निजी स्टाफ में नियुक्त कुमारामात्य को परमभट्टारकपादीय कुमारामात्य कहते थे। इसी प्रकार युवराज-भट्टारक के स्टाफ के बड़े पदाधिकारी युवराज-भट्टारकपादीयकुमारामात्य कहे जाते थे। राजा के विविध पुत्र प्रान्तीय शासक और इसी प्रकार के अन्य ऊंचे राजपदों पर नियुक्त होकर शासन-कार्य में सम्राट् की सहायता करते थे।

पुराने मौर्यकालीन तीर्थों का स्थान अब अधिकरणों ने ले लिया था। उनके प्रधान कर्मचारी अब अधिकृत कहलाते थे। स्मृति ग्रन्थों में न्याय विभाग के लिए कुल और पुत्र संस्थाओं का उल्लेख है।

प्रान्तीय शासन- विशाल गुप्त साम्राज्य अनेक राष्ट्रों या देशों में विभक्त था। साम्राज्य में कुल कितने देश या राष्ट्र थे, इसकी ठीक संख्या ज्ञात नहीं है। प्रत्येक राष्ट्र में अनेक भुक्तियाँ और प्रत्येक भुक्ति में अनेक विषय होते थे। भुक्ति को हम वर्तमान समय की कमिश्नरी के समान समझ सकते हैं। गुप्तकालीन शिलालेखों में तीर-भुक्ति (तिरहुत), पुण्डूवर्धन भुक्ति (दीनाजपुर, राजशाही आदि), मगध भुक्ति आदि विविध भुक्तियों का उल्लेख आता है। विषय वर्तमान समय के जिलों के समान थे। प्राचीन काल के महाजनपद अब नष्ट हो गये थे। सैकड़ों वर्षों तक मगध साम्राज्य के अधीन रहने के कारण अपनी पृथक् सत्ता की स्मृति अब उनमें बहुत कुछ मन्द पड़ गई थी। अब उनका स्थान राजकुल ने ले लिया था, जिनका निर्माण शासन की सहुलियत की दृष्टि में रखकर किया जाता था।

देश या राष्ट्र के शासक के रूप में प्राय: राजकुल के व्यक्ति नियत होते थे। इन्हें युवराज-कुमारामात्य कहते थे। इनके अपने-अपने महासेनापति, महादंडनायक आदि प्रधान कर्मचारी भी होते थे। युवराज कुमारामात्यों के अधीन भुक्तियों का शासन करने के लिए ‘उपरिक’ नियत किये जाते थे। उपरिकों की नियुक्ति सीधी सम्राट् द्वारा होती थी। इस पद पर राजकुल के कुमार भी नियत किये जाते थे। प्रत्येक भुक्ति अनेक विषयों में विभक्त होती थी। विषय के शासक विषयपति कहलाते थे। इनकी नियुक्ति भी सम्राट् द्वारा की जाती थी।

गुप्तकाल के जो लेख मिले हैं, जिनसे सुराष्ट्र, मालवा, मन्दसौर और कौशाम्बी-चार राष्ट्रों का परिचय मिलता है। सुराष्ट्र का राष्ट्रिक (शासक) समुद्रगुप्त के समय में पर्णदत्त था। मन्दसौर का शासन बन्धुवर्मा के हाथ में था। इसमें सन्देह नहीं, कि विशाल गुप्त-साम्राज्य में अन्य भी बहुत-से राष्ट्र रहे होंगे, पर उनका उल्लेख उस काल के शिलालेखों में नहीं हुआ है।

भुक्ति के शासक को उपरिक के अतिरिक्त भोगिक, भोगपति और गोप्ता भी कहते थे। सीमान्त प्रदेश के शासक को गोप्ता कहा जाता था। दामोदरगुप्त के समय में पुण्ड्रवर्ध भुक्ति का शासक उपरिकर महाराज राजपुत्र देवपुत्र देवपुत्र देवभट्टारक था। वह राजकुल का था। उससे पूर्व इस पद पर चिरतिदत्त रह चुका था, जो कि राजकुल का नहीं था। इसी तरह चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के शासनकाल में तीरभुक्ति का शासक सम्राट् का पुत्र गोविन्दगुप्त था। इन उपरिक महाराजाओं की बहुत-सी मोहरें इस समय उपलब्ध होती हैं। पुण्ड्रवर्ध नामक प्रांत गुप्तों के अधीन था जिसका प्रशासक चीरोदत्त था।

विषय (जिले) से शासक विषयपति को अपने कार्य में परामर्श देने के लिए एक सभा होती थी, जिसके सभासद विषय-महत्तर (जिले के बड़े लोग) कहलाते थे। इनकी संख्या तीस के लगभग होती थी। नगरश्रेष्ठी, सार्थवाह (काफिलों का प्रमुख), प्रथम कुलिक (शिल्पियों का प्रमुख), और प्रथम कायस्थ (लेखक-श्रेणी का प्रमुख) इस विषय-सभा में अवश्य रहते थे। इनके अतिरिक्त जिले में रहने वाले जनता के अन्य मुख्य लोग भी इस सभा में महत्तर के रूप में रहते थे। सम्भवत: इन महत्तरों की नियुक्ति चुनाव द्वारा नहीं होती थी। विषयपति अपने प्रदेश के मुख्य व्यक्तियों को इस कार्य के लिए नियुक्त कर देता था। इन महत्तरों के कारण जिले के शासन में सर्वसाधारण जनता का पर्याप्त हाथ रहता था। विषयपति को यह भलीभांति मालूम होता रहता था, कि उसके क्षेत्र की जनता क्या सोचती और क्या चाहती है?

विषय के शासक कुमारामात्यों (विषयपतियों) का गुप्त-साम्राज्य के शासन में बड़ा महत्त्व था। अपने प्रदेश की सुरक्षा, शान्ति और व्यवस्था के लिए वे ही उत्तरदायी थे। उनके अधीन राजकीय करों को एकत्र करने के लिए अनेक कर्मचारी रहते थे, जिनके युक्त, आयुक्त, नियुक्त आदि अनेक नाम थे। मौर्यकाल में भी जिले के इन कर्मचारियों को युक्त ही कहते थे। गुप्तकाल में बड़े पदाधिकारियों के नाम बदले गये थे, पर छोटे राजपुरुषों के अब भी वही नाम थे, जो कम-से-कम सात सदियों से भारत में प्रयुक्त होते आ रहे थे। विषयपति के अधीन दंडपाशिक (पुलिस के कर्मचारी), चोरोद्धरणिक (खुफिया पुलिस), आरक्षाधिकृत (जनता के रक्षार्थ नियुक्त कर्मचारी) और दंडनायक (जिले की सेना के अधिकारी) रहते थे।

विषय में अनेक शहर और ग्राम होते थे। शहरों के शासन के लिए पुरपाल नाम का कर्मचारी होता था, जिसकी स्थिति कुमारामात्य की तरह मानी जाती थी। पुरपाल केवल बड़े-बड़े नगरों में ही नियुक्त होते थे। विषय के महत्तर इसे भी शासनकार्य में परामर्श देते थे। पुरों की निगम-सभाएँ अब तक भी विद्यमान थीं, और उनके कारण जनता अपने बहुत-से मामलों की व्यवस्था स्वयं ही किया करती थी। व्यापारियों और शिल्पियों के संघ इस काल में भी विद्यमान थे।

ग्रामों के शासन में पंचायत का बड़ा महत्त्व रहता था। इस युग में पंचायत को पंच-मंडली  कहते थे। ग्राम सभा में महत्तर के अलावा अष्टकलाधिकारी ग्रामिक एवं कुटम्बिन होते थे। चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के अन्यतम सेनापति अम्रकादेव ने एक ग्राम की पंच-मंडली को 25 दीनारें एक विशेष प्रयोजन के लिए दी थीं। इसका उल्लेख साँची के एक शिखालेख में किया गया है। महाबलाधिकृत नामक अधिकारी के अधीन सैनिक संगठन होता था। हाथी सेना का प्रधान महापीलपति होता था। घुड़सवार का प्रधान भटाश्वपति होता था। सेना में सामान रखने वाला रणभंडारिक कहलाता था। गुप्तों से पूर्व ग्राम की सभा को पंच-मंडली नहीं कहा जाता था। पर इस युग में भारत की उस पंचायत-प्रणाली का पूरी तरह आरम्भ हो चुका था, जो सैकडों साल बीत जाने पर भी आंशिक रूप में अब तक भी सुरक्षित है।

राजकीय कर- गुप्तकाल के लेखों के अनुशीलन से ज्ञात होता है, कि इस युग में राजकीय आय के निम्नलिखित साधन थे-

  1. भागकर- खेती में प्रयुक्त होने वाली जमीन से पैदावार का निश्चित भाग राज्यकर के रूप में लिया जाता था। इस भाग की मात्रा 18 फीसदी से 25 फीसदी तक होती थी। यह भागकर (मालगुजारी) प्राय: पैदावार की शक्ल में ही लिया जाता था। यदि वर्षा न होने या किसी अन्य कारण से फसल अच्छी न हो, तो भागकर की मात्रा स्वयं कम हो जाती थी, क्योंकि किसानों को पैदा हुए अन्न का निश्चित हिस्सा ही मालगुजारी के रूप में देना होता था। भागकर का दूसरा नाम उद्रग भी था।
  2. भोगकर- मौर्यकाल में जिस चुंगी को शुल्क संज्ञा कहा जाता था, उसी को गुप्तकाल में भोग कर कहते थे।
  3. भूतोवात-प्रत्याय- बाहर से अपने देश में आने वाले और अपने देश से उत्पन्न होने वाले विविध पदार्थों पर जो कर लगता था, उसे भूतोवात-प्रत्याय कहते थे। गुप्तकालीन लेखों में स्थूल रूप से 18 प्रकार के करों का निर्देश किया गया है पर इनका विवरण नहीं दिया गया। पृथक् रूप से केवल तीन करों का ही उल्लेख किया गया है। इस काल की स्मृतियों के अध्ययन से ज्ञात होता है, कि परम्परागत रूप से जो विविध कर मौर्य-युग से चले आते थे, वे गुप्तकाल में भी वसूल किये जाते थे, यद्यपि उनके नाम और दर आदि में कुछ-न-कुछ अन्तर इस समय में अवश्य आ गया था।

अधीनस्थ राज्यो का शासन- गुप्त साम्राज्य के अन्तर्गत जो अनेक अधीनस्थ राज्य थे, उन पर सम्राट् के शासन का ढंग यह था कि छोटे सामन्त विषयपति कुमारामात्यों के और बड़े सामन्त मुक्ति के शासन उपरिक महाराज कुमारामात्यों के अधीन होते थे। अपने इन कुमारामात्यों द्वारा गुप्त सम्राट् विविध सामन्तों और अधीनस्थ राजाओं पर अपना नियन्त्रण व निरीक्षण रखते थे। पर अनेक बड़े महासामन्त ऐसे भी थे, जिनके राज्य बहुत विशाल थे और जिनके अपने सन्धिविग्रहिक, भौगिक, विषयपति और उपरिक आदि पदाधिकारी भी होते थे। महाराजा हस्तिन् इसी प्रकार का महासामन्त था।

मौर्ययुग में यह सामन्त पद्धति विकसित नहीं हुई थी। उस काल में पुराने जनपदों की पृथक् सत्ता की स्मृति और सत्ता विद्यमान थी, पर इन जनपदों में अपने धर्म, चरित्र और व्यवहार के अक्षुण्ण रहते हुए भी उनके पृथक् राजा और पृथक् सेनाएँ नहीं थीं। गुप्त काल में बड़े और छोटे सब प्रकार के सामन्त थे, जो अपनी पृथक् सेनाएँ रखते थे। प्रतापी गुप्त-सम्राटों ने इन्हें जीतकर अपने अधीन कर लिया था, पर इनकी स्वतन्त्र सत्ता को नष्ट नहीं किया था।

शक, यवन, कुषाण आदि के आक्रमणों से भारत में जो अव्यवस्था और अशान्ति उत्पन्न हो गई थी, उसी ने इस पद्धति को जन्म दिया था। पुराने मगध-साम्राज्य के उच्च महामात्रों ने इस परिस्थिति से लाभ उठाकर अपनी शक्ति को बढ़ा लिया था, और वे वंशक्रमानुगत रूप से अपने-अपने प्रदेश में स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगे थे। अव्यवस्था के युग में अनेक महत्त्वाकांक्षी शक्तिशाली व्यक्तियों ने भी अपने पृथक् राज्य बना लिये थे। गुप्त सम्राटों ने इन सब राजा-महाराजाओं का अन्त नहीं किया। यही कारण है, कि उनकी शक्ति के शिथिल होते ही ये न केवल पुनः स्वतन्त्र हो गये, अपितु परस्पर युद्धों और विजय-यात्राओं द्वारा अपनी शक्ति के विस्तार में भी तत्पर हो गये। इसी का यह परिणाम हुआ, कि सारे उत्तरी भारत में अव्यवस्था छा गई, और एक प्रकार के मत्स्यन्याय का प्रादुर्भाव हो गया।

गुप्त काल में समाज

प्राचीन भारतीय समाज का ढाँचा गुप्त काल में भी स्थिर रहा। गुप्तकालीन समाज व्यवस्था की झांकी पुराणों, स्मृति-ग्रन्थों व अभिलेखों से प्राप्त होती है। स्मृति ग्रन्थों के नियम व्यवहारतः समाज में किस हद तक लागू होते थे, यह संदेहास्पद है। भारतीय समाज की प्रारम्भिक व्यवस्था चार वर्णों पर आधारित थी- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। प्रारम्भ में इसका आधार कर्म था लेकिन धीरे-धीरे यह जन्म पर आधारित हो गयी। मनुस्मृति के समय तक इसका स्वरूप कठोर हो गया था। गुप्तकालीन अन्य स्मृतियों में भी समाज के कठोर रूप का चित्रण मिलता है। गुप्तकालीन समाज परम्परागत चार वर्णों में विभाजित था। स्मृति साहित्य में चारों वणाँ के कर्त्तव्य बताए गये हैं। इनमें आर्यावर्त के धर्म क्षेत्र का भी उल्लेख हुआ है। म्लेच्छों को भारतीय समाज से अलग हट कर देखा गया। चातुर्वणर्य व्यवस्था का रक्षक राजा को माना गया है। चातुर्वणर्य व्यवस्था में बाहरी व्यक्तियों को प्रवेश करने तथा इससे लाभान्वित होने की अनुमति तो थी, पर सामाजिक व्यवस्था की स्थिरता को भी कायम रखने की कोशिश की जाती थी। गुप्तकाल तक आते-आते परम्परागत वर्ण व्यवस्था में बहुत से परिवर्तन आ चुके थे। कालिदास की रचनाओं में भी गुप्तकालीन कठोरता दिखाई देती है। व्यवहारिक दृष्टि से कठोरता निश्चय ही कम हुई होगी। प्रमुख चार वर्णों की सामाजिक स्थिति का अध्ययन गुप्तकाल के परिप्रेक्ष्य में करना उचित होगा।

ब्राह्मणों के अन्दर भी बहुत से उपभेद पैदा होने लगे थे जिनका आधार गोत्र व प्रवर था। दण्ड देते समय भी राजा ब्राह्मणों के प्रति उदारता का व्यवहार करता था। स्मृति साहित्य में वर्ण-विभेद की भावना दृष्टिगोचर होती है। भयंकर अपराध करने पर भी ब्राह्मण को मृत्यु दण्ड नहीं दिया जा सकता था। शूद्रक के मृच्छकटिकम के नवें अंक में ब्राह्मण चारूदत्त के हत्यारा सिद्ध हो जाने पर भी उसे प्राण-दण्ड नहीं दिया गया था। देश कुमार चरित ब्राह्य मंत्री राजद्रोह का दोषी है, किन्तु उसे केवल अन्धा बना दिया गया था। उन्हें अर्थ दण्ड ही मिलता था। देश-निष्कासन का दण्ड भी उन्हें दिया जा सकता था। ब्राह्मणों को अन्य वर्णों की तुलना में दंड कम मिलता था। बृहस्पति के अनुसार सभी प्रकार के दिव्य सबसे कराये जा सकते थे लेकिन ब्राह्मण से विष दिव्य नहीं कराया जाना चाहिए। साक्ष्य देने के संदर्भ में भी भेदभाव निहित था। इस प्रकार समाज में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था। उनके मुख्यतया छह कर्म थे- वेद पढ़ना, वेद पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना और दान लेना। ये कार्य उसके स्वधर्म के अन्तर्गत आते थे। इसके अतिरिक्त अपनी तपश्चर्या और ज्ञान से वह समाज का मार्ग-दर्शन करता था। ब्राह्मणों में भी उपजातियाँ विकसित हो गई थीं। वेदों के अध्ययन को ध्यान में रखकर उसका विभाजन किया गया था। यजुर्वेदी ब्राह्मण-उड़ीसा, तेलंगाना, कोशल और मध्य प्रदेश में थे। सामवेदी ब्राह्मण-काठियावाड़ क्षेत्र में रहते थे। अथर्ववेदी ब्राह्मण-मैसूर, बेलगाँव और वल्लभी में रहते हैं। ऋग्वैदिक ब्राह्मणों की चर्चा गुप्तकाल में नहीं मिलती है। उत्तरी भारत में अंतर्वेदी ब्राहमण, राजस्थान में श्रीमाली ब्राह्मण और गुजरात में नगर ब्राह्मण अपने को अन्य ब्राहमणों से श्रेष्ठ मानते थे। वैसे ब्राहमणों का मुख्य कार्य धार्मिक था। परन्तु वे अन्य प्रकार के पेशे भी अपनाने लगे थे। स्म्रितिग्रंथों में आपद धर्म के समयएशे अपनाने की अनुमति दी गयी। जिस तरह कौटिल्य ने विभिन्न वर्णों के लिए विभिन्न बस्तियों का विधान किया है, उसी प्रकार वराहमिहिर ने विभिन्न वर्णों के लिए भिन्न-भिन्न व्यवस्था बताई है। वराहमिहिर के अनुसार ब्राह्मण के 5 कमरे, क्षत्रिय के मकान में 4, वैश्य के मकान में 3 और शूद्र के मकान में 2 कमरे होने चाहिए। न्याय व्यवस्था में भी वर्ण भेद को ध्यान में रखा गया था। ऐसा माना जाता था कि ब्राह्मण की परीक्षा तुला से, क्षत्रिय की अग्नि से, की परीक्षा जल से तथा शूद्र की परीक्षा विष से की जानी चाहिए। साक्षी के विषय में बृहस्पति का मानना है कि साक्षी कुलीन हो, तथा वह नियमपूर्वक वेदों एवं स्मृतियों का अध्ययन करता हो। इस बात की भी चर्चा है कि की जाति प्रतिवादी की जाति के समान हो। परन्तु नारद इस बात का खंडन करते हैं और उनका मानना है कि सभी वर्ण के लोग एक-दूसरे के साक्षी हो सकते हैं। दंड व्यवस्था भी वर्ण पर आधारित थी। महाभारत के शांतिपर्व में कहा गया है कि अगर कोई क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र की हत्या करे तो उसे अलग-अलग दण्ड दिया जाए। नारद के अनुसार चोरी करने पर ब्राह्मण का अपराध सबसे अधिक और शूद्र का अपराध सबसे कम होता है। विष्णु ने हत्या के पाप से शुद्धि के संदर्भ में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की हत्या के लिए क्रमशः 12, 9 और 3 वर्ष का महाव्रत नामक तप बताया है। दायविधि में यह नियम बना रहा कि उच्च वर्ण के शूद्र पुत्र को संपति में सबसे कम हिस्सा मिले परन्तु वर्ण व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं चल रही थी क्योंकि महाभारत के शांति पर्व के कम से कम 9 पदों में ब्राह्मण और क्षत्रियों के बीच सहयोग की बात उठायी गई है। इससे आभास होता है कि उन्हें वैश्यों एवं शूद्रों के विरोध का भय था।

क्षत्रिय- चार वर्ण वाली व्यवस्था में क्षत्रियों का दूसरा स्थान था। धर्मशास्त्रों के अनुसार क्षत्रिय का प्रमुख कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना, दान करना, यज्ञ करना, वेद पढ़ना आदि माने गए हैं। स्मृतिकार विष्णु के क्षत्रिय का प्रमुख कर्तव्य प्रजा का पालन मन है। बौद्ध ग्रंथों में क्षत्रियों की प्रमुखता अधिक है। प्राचीन काल में कई क्षत्रिय महान् विद्वान् हुए थे। वैदिक कालीन क्षत्रिय विद्वानों में जनक, प्रवाहण जाबालि आदि उल्लेखनीय रहे हैं। आपात स्थिति में क्षत्रिय भी वेश्यावृति अपना सकते थे। गुप्तकाल में बहुत से क्षत्रिय व्यापार भी करते थे। इंदौर से प्राप्त स्कंदगुप्त के एक अभिलेख में इसका उल्लेख है। ह्वेनसांग ने क्षत्रियों की प्रशंसा की है। वे दयालु, परोपकारी व् युद्ध कला प्रवीण होते थे। मनु के अनुसार 10 वर्षीय ब्राह्मण भी 100 वर्षीय क्षत्रिय से श्रेष्ठ होता है। उसके अनुसार ब्राह्मण और क्षत्रिय पिता और पुत्र के समान है। गुप्तकाल के क्षत्रिय द्वारा अपने से वर्ण के व्यवसाय अपनाये जाने का भी उदाहरण मिलता है। इंदौर से स्कंदगुप्त के काल के एक अभिलेख के अनुसार क्षत्रिय लोग वैश्य का भी कार्य करते थे। मनु क्षत्रियों को वैश्य-कर्म अपनाने की अनुमति देते हैं परन्तु लिए कृषि-कर्म वर्जित मानते हैं। किन्तु क्षत्रियों का मुख्य कार्य देश और की रक्षा करना था। युद्ध उनके जीवन का मुख्य पहलू था। युद्ध में सारी वस्तुएँ क्षत्रिय की होती थीं। मनु के अनुसार रथ, घोड़ा, हाथी, धान्य, पशु, स्त्रियाँ (दासी आदि), सब प्रकार के द्रव्य, और कुप्य (सोना-चांदी के अतिरिक्त ताँबा-पीतल आदि धातुएँ) युद्ध के विजेता की वस्तुएँ मानी जाती थीं।

वैश्य- वैश्य वर्ण का प्रमुख व्यवसाय कृषिऔर व्यापार था। धर्मशास्त्रों में इनका कर्तव्य अध्ययन, यजन, दान, कृषि, पशुपालन और वाणिज्य बताया गया है। गुप्त युग में इन्हें वणिक, श्रेष्ठि और सार्थवाह भी कहा गया है। ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जहाँ वैश्य वर्ण के लोगों को क्षत्रिय कर्म करते हुए दिखाया गया है। वैश्य राजकीय कार्य भी करते थे। कई स्मृतियों में यह भी कहा गुया है कि ब्राह्मणों और क्षत्रियों की सेवा करना भी वैश्यों का कर्त्तव्य है। वास्तव में वैश्यों का कार्यक्षेत्र बहुत विस्तृत था। इसमें विभिन्न व्यवसायों वाले लोग शामिल थे जैसे- कृषक, व्यापारी, लुहार, सुनार, बढाई, तेली सूत कातने वाले, बुनकर, पशुपालक, आदि। इस काल में वैश्यों की स्थिति में गिरावट के चिन्ह भी मिलते हैं। शूद्र उस समय भी कृषक थे। गुप्तकाल में व्यापारी, गोपालक, सुनार, बढ़ई आदि व्यावसायिक समूहों ने अपनी श्रेणियाँ बना ली थीं। वैश्य भी आपातकाल में दूसरे वर्ण के कर्म अपना सकते थे। वे सैनिक कर्म भी कर सकते कि गौ, ब्राह्मण और वर्ण की रक्षा के लिए वैश्य भी शस्त्र ग्रहण कर सकते थे। वैश्य न्यायालय की प्रमुख सभा के सदस्य भी बन सकते थे। विषय आदि की शासन परिषदों में श्रेष्ठि, सार्थवाह, कुलिक आदि प्रतिनिधि रहते थे। परमेश्वरी लाल गुप्ता इन गुप्त शासकों को वैश्य वर्ण स्वीकार करते हैं। स्पष्ट है कि वैश्य वर्ण ने गुप्तकाल में बहुत प्रगति की। वर्ण के लोग अपनी दानशीलता के लिए भी प्रसिद्ध थे। संभवत: ये अपनी आय का बहुत सा हिस्सा सार्वजनिक हित में खर्च करते थे, फाह्यान के यात्रा विवरण में इस प्रकार के उल्लेख मिलते हैं। फाह्यान ने औषधालयों व पंथशालाओं का उल्लेख किया है। औषधालयों में निर्धन, अपंग, अनाथ, विधवा, नि:संतान, रोगी आदि आते थे और वहाँ उन्हें सब तरह की सहायता मिलती थी। पंथशालाओं के बारे में फाह्यान ने कहा है कि वहाँ कमरे, चारपाई, बिस्तर आदि यात्रियों को दिये जाते थे।

शूद्र- अतिम वर्ण शूद्रों का था। साधारणतः शूद्रों का कार्यं द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) की सेवा करना था। याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि शूद्र व्यापारी, कृषक और कारीगर भी हो सकता था। स्पष्ट है कि गुप्तकालीन शूद्र खेती व व्यवसाय करते थे। प्रशासनिक गतिविधियों में भी उनकी साझेदारी होती थी। शूद्रों की स्थिति मौर्यकाल की अपेक्षा अधिक संतोषजनक लगती है। ह्वेनसांग ने शूद्रों के राजा होने का उल्लेख किया है। सातवीं शताब्दी ईसवी के लगभग शूद्र खेतिहरों का उल्लेख है।  याज्ञवल्क्य ने ब्राहमण पिता और शुद्र माता से उत्पन्न पुत्र को संपत्ति का अधिकारी माना है परन्तु वृहस्पति नहीं मानते हैं। मनु ने शूद्रों की सेवानिवृत्ति पर बहुत बल दिया था परन्तु याज्ञवल्क्य का दृष्टिकोण उदार है। उसने शूद्रों को व्यापारी, कृषक एवं कारीगर होने की अनुमति दी। कुछ शूद्रों ने सैनिक वृत्ति को भी अपनाया। गुप्तकाल के धर्मशास्त्रों ने स्पष्ट रूप से दसों और अस्पृश्यों से शूद्रों को भिन्न बताया है। वैश्य लोगों से शूद्रों को भिन्न बताया गया है। वैश्य लोग जब कृषि से विमुख होने लगे तो शूद्रों ने कृषि को अपना लिया। वायु पुराण में शिल्प और भृति शूद्रों के लिए दो प्रमुख कर्तव्य माने गए हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार, अगर शुद्र भक्ति में निमग्न रहे, मदिरा पान न करे, इन्द्रियों को बस में रखे और निर्भय रहे तो वह भी मोक्ष प्राप्त कर सकता है। मार्कण्डेय पुराण में, दान देना शूद्र का भी कर्त्तव्य बताया गया है। याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट रूप से कहा है कि शूद्र ओंकार के बदले नमः शब्द का प्रयोग करते हुए पंच महायज्ञ कर सकता है। शूद्रों को रामायण, महाभारत और पुराण सुनने का अधिकार था। योग और सांख्य दर्शन जिसका सर्वोच्च विकास गुप्तकाल में हुआ था, शूद्रों के लिए वर्जित नहीं थे। इस युग में एक महत्तर नामक नई जाति विकसित हुई थी। वस्तुत: ये महत्तर प्रारंभ में गाँव के वृद्ध जन थे। जमीन के क्रय-विक्रय बिक्री में इनकी भी अनुमति ली जाती थी। आगे चलकर यह पृथक जाति हो गया। कृषि व व्यापार में शूद्रों के आने से उनकी सामाजिक स्थिति निश्चय ही सुधरी होगी। विष्णुस्मृति से विदित होता है कि सेवक और शिल्पकारों की गणना शूद्रों में की जाती थी। वे किसी प्रकार अस्पृश्य नहीं समझे जाते थे और समाज में उनका समुचित स्थान था। द्विजातियों के समान उन्हें भी पंचमहायज्ञ करने का अधिकार था। मनु ने शूद्रों के लिए धन संग्रह का निषेध किया है। संभवतः शूद्र भी धन संग्रह की स्थिति में रहे होंगे। शिल्प के क्षेत्र में भी उनका प्रवेश था। अमरकोष में शूद्र शिल्पियों का उल्लेख है जैसे- माली, धोबी, कुम्हार, जुलाहा, राजमिस्त्री, दरजी, चित्रकार, शस्त्रकार, चर्मकार, लुहार, स्वर्णकार, बढई, अभिनेता, नर्तक आदि। बृहस्पति स्मृति में शिल्पियों की पारिश्रमिक दरों का उल्लेख किया गया है। उनकी मजदूरी में बढ़ोत्तरी हो गयी थी। अत: उनकी आर्थिक दशा भी अच्छी रही होगी।

शूद्रों के प्रति वर्णविभेद की भावना दिखाई देती है। शूद्र केवल अपने के साक्षी हो सकते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य की तुलना में शूद्रों को दिये वाला दण्ड कठोर होता था। इस समय भी एक ही अपराध के लिए शूद्रों ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों की तुलना में अधिक दण्ड दिया जाता था। यह प्रतीत होता है कि धार्मिक क्षेत्र में शूद्रों के प्रति उदारता दिखायी देती है। पुराणों में उनके लिए सरल भक्तिमार्ग व मोक्ष का प्रतिपादन किया गया है। वे यज्ञ भी कर सकते थे, शांतिपर्व में इसका उल्लेख है। शूद्र रामायण, महाभारत, पुराण भी सुन सकते थे। वेद सुनने का अधिकार भी उन्हें कभी-कभी प्राप्त हो जाता था। गुप्तकाल में शिक्षित शूद्रों के उल्लेख भी मिलते हैं। इस काल में धर्मशास्त्रकार ब्राह्मणों को शूद्र का भोजन करने से मना करते हैं लेकिन कुछ का भोजन ग्रहण किया जा सकता था। याज्ञवल्क्य के अनुसार उच्च वर्ण का व्यक्ति अपने किसान, ग्वाले, नाई या परिवार के शूद्र मित्र का भोजन कर ले तो आपत्तिजनक न था।

कायस्थ- गुप्तकालीन अभिलेखों व साहित्य में कायस्थ का उल्लेख हुआ है। याज्ञवल्क्य स्मृति में पहली बार कायस्थों की चर्चा हुई है। ये किसी उपजाति से सम्बद्ध नहीं थे वरन् लेखन कार्य से जुड़े हुए थे। कायस्थ अधिकतर राजकीय सेवा में थे। गुप्तकालीन अभिलेखों में प्रथम कायस्थ नामक अधिकारी का उल्लेख मिलता हैं। यह विषय-परिषद् का सदस्य होता था। इन्होंने राजकीय सेवा में ब्राह्मणों को चुनौती देनी शुरू की।

सर्वप्रथम ‘कायस्थ’ का उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति में मिलता है। इनसे प्रजा को सावधान रहने को कहा गया है। शूद्रक के मृच्छकटिकम् में कायस्थ का उल्लेख, न्यायालय के लेखक के रूप में हुआ है। लेखक होने के अतिरिक्त वे लेखाकरण, गणना, आय-व्यय और भूमिकर के भी अधिकारी होते थे। स्पष्ट है कि गुप्त काल में कायस्थों का एक वर्ग था जो आगे चल कर एक जाति के रूप में उभरा।

अछूत- चार वर्णों के अतिरिक्त समाज में अछूत थे। इनमें चाण्डाल मुख्य थे। गुप्त युग में चांडालों का उल्लेख मिलता है। ये नगर से बाहर रहते थे। इनका स्पर्श वर्जित था। वे शवों को जलाने, गाड़ने के अलावा शिकार, मछलियाँ पकडना आदि कार्य करते थे। साधारणत: उनके बारे में यह माना जाता था कि वे अपवित्र हैं, झूठ बोलते हैं, चोरी करते हैं, नास्तिक क्रोधी है और बिना कारण झगड़ा करते हैं। उनकी पोशाक राजा द्वारा निर्धारित की जाती थी। इनके संदर्भ में स्मृतिकारों के नियम कठोर दिखाई देते हैं। स्मृतियों में इनका कार्य लावारिस मुर्दे हटाना और बधिक का काम करना बताया गया है। फाह्यान ने पाँचवीं शताब्दी में व ह्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी में इसका उल्लेख किया है। फाह्यान के विवरण से प्रतीत होता है कि जब कभी वे नगर में प्रवेश करते तो लकड़ी से ढोल बजाते चलते थे, ताकि लोग मार्ग से हट जायें और उनका स्पर्श न कर सकें।

दास प्रथा- मौर्कालिन समाज की तरह गुप्तकाल में भी दास प्रथा का अस्तित्व था पर शूद्र होने का तात्पर्य दास होना नहीं था। हाँ, कुछ शूद्र दास होते थे, इसका उल्लेख आया है। नारद स्मृति से दासों की एक सूची प्राप्त होती है जो 15 प्रकार के हैं। जिसमें उनके दास होने के कारणों पर प्रकाश डाला गया है जैसे प्राप्त किया हुआ दास, स्वामी द्वारा प्रदत्त, ऋण न चुका सकने के कारण बना दास, दाँव पर हार जाने वाला, स्वयं दासत्व ग्रहण करने वाला, अपने को एक निर्धारित समय के लिए दास बनाने वाला, आत्मविक्रयी, दायी के प्रेम में पड़ने वाला दास, चोरों या डाकुओं द्वारा बेचा हुआ व्यक्ति, सन्यास छोड़कर गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होने वाला व्यक्ति। दास घर के कार्य तो करते थे, अन्य गंदे कार्य-सफाई करना, मलमूत्र साफ करना भी करते थे। कात्यायन स्मृति में कहा गया है कि द्विज स्त्री, दास से विवाह करते ही दास हो जाती थी लेकिन यदि दास स्त्री अपने द्विज स्वामी से पुत्र उत्पन्न कर ले तो वह दासत्व से मुक्त हो जाती थी। संकट के समय यदि दास स्वामी के प्राणों की रक्षा करता था तो उसे दासत्व से मुक्त कर दिया जाता था। आधुनिक शोधकायाँ से स्पष्ट होता है कि गुप्तकाल में दास प्रथा शिथिल हो गयी थी। वर्ण व्यवस्था के कमजोर होने से दास प्रथा में भी शिथिलता आई। गुप्तकाल में भूमि अनुदानों की संख्या बढ़ जाने से भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गयी। इससे कृषि कार्य के लिए अधिक दासों की आवश्यकता नहीं पड़ी होगी। वैसे भी विश्व के अन्य प्राचीन समकालीन समाज की तुलना में भारतीय दासप्रथा का स्वरूप सरल रहा था। उनके साथ सामान्यत: अच्छा व्यवहार किया जाता था।

पारिवारिक जीवन पारिवारिक जीवन का ज्ञान गुप्तकालीन अभिलेखौं व साहित्य से प्राप्त होता है कि गुप्तकालीन परिवार का स्वरूप संयुक्त था। माता-पिता, पुत्र-पुत्री के अतिरिक्त अन्य सम्बन्धी भी परिवार में रहते थे। परिवार ज्येष्ठ व्यक्ति के अनुशासन में रहता था। धर्मशास्त्रकारों ने संयुक्त परिवार प्रथा की प्रशंसा की है। पूर्व गुप्तयुग तक परिवार में पिता की शक्ति ही अधिक थी। धीरे-धीरे पुत्र के अधिकार बढ़ने लगे। पैतृक सम्पत्ति में पुत्रों का भी समान रूप से स्वामित्व माना जाने लगा। विभिन्न स्मृतिकारों (याज्ञवल्क्य, बृहस्पति आदि) ने इसका समर्थन किया है। स्मृतिकार मनु व याज्ञवल्क्य माता को गुरु और पिता से ऊँचा स्थान देते हैं। यद्यपि वंश विस्तार की दृष्टि से पुत्री की अवहेलना की गई है फिर भी प्राचीन काल से ही पुत्री माता-पिता के प्रेम की हकदार रही है। मनु पुत्री को पुत्र के बराबर ही मानते हैं। नारद व बृहस्पति के अनुसार कन्या पुत्र की ही तरह पिता की संतान है। अतएव उसे पुत्र के अभाव में दायाधिकार मिलना चाहिए।

प्राचीन काल में परिवार में सामान्यत: एक पत्नी विवाह ही प्रचलित था लेकिन कुछ लोग बहुविवाह करते थे। वर का चयन साधारणत: माता-पिता द्वारा ही किया जाता था। लेकिन स्वयं वर-वधू स्वेच्छा से भी विवाह कर सकते थे। विधवा-विवाह एवं अन्तर्जातीय विवाहों का भी रिवाज था। अनुलोम व प्रतिलोम विवाहों का भी प्रचलन था। स्वयंवर प्रथा के उल्लेख मिलते हैं। कालिदास ने आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख किया है- ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष, दैव, आसुर, गंधर्व, राक्षस व पैशाच। प्रथम चार प्रकार के विवाह ही उत्तम कहे गये हैं और अंतिम चार को हेय दृष्टि से देखा गया है।

स्त्री- स्त्रियों की स्थिति में सामान्यत: हृास आया। बाल विवाह का प्रचलन था। सामान्यतः 12-13 वर्षों में लड़कियों की शादी होती थी। याज्ञवल्क्य स्मृति में लड़कियों के उपनयन एवं वेदाध्ययन का निषेध किया है। नारद एवं पराशर विधवा विवाह का समर्हन करते हैं। परन्तु वृहस्पति द्वारा इसका विरोध किया गया है। विष्णु, याज्ञवल्क्य एवं बृहस्पति विधवा को संपूर्ण संपत्ति की स्वामिनी मानते हैं, जबकि मनु, नारद और कात्यायन इसका विरोध करते हैं भानुगुप्त के एरण अभिलख से सती प्रथा का प्रथम पुरातात्विक साक्ष्य मिलता है जब गोपराज नामक सेनापति की पत्नी अपने पति के साथ सती हो जाती फाह्यान और ह्वेनसांग पर्दा प्रथा की चर्चा नहीं करते हैं परन्तु कालीदास अभिज्ञानशाकुन्तलम् में अवगुठन शब्द का प्रयोग किया गया है। इससे यह होता है कि संभ्रात परिवार की महिलाएँ पर्दा करती थीं। देवदासी प्रथा प्रचलित थी। कालिदास के मेघदूत में महाकाल (उज्जैन) मंदिर में रखी जाने वाली देवदासियों की चर्चा है। परन्तु देवदासी प्रथा का प्रथम साक्ष्य अशोक के कुछ ही दिनों के बाद बनारस के पास रामगढ़ से प्राप्त एक गुफा अभिलेख में मिलता है। उस काल में वेश्याओं का भी अस्तित्व था। कामसूत्र में गणिकाओं के प्रशिक्षण की बात की गई है। मुद्राराक्षस से यह ज्ञात होता है कि उत्सवों के समय वेश्याएँ सड़क पर आ जाती थीं।

गुप्त काल में अर्थव्यवस्था

गुप्तकाल में समाज, धर्म, कला, साहित्य व विज्ञान के विकास के साथ ही एक मजबूत आर्थिक ढाँचे का गठन हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में गुप्तकाल की उपलब्धियों के कारण ही इसे क्लासिकल एज की संज्ञा दी गई है। गुप्तकाल के सांस्कृतिक विकास में इसकी आर्थिक समृद्धि का प्रमुख योगदान रहा है। कृषि, उद्योग और व्यापार में इस काल में काफी वृद्धि हुई। कई इतिहासकारों ने गुप्तकाल के अंतिम चरण में सामंतवाद का उदय बताया है और सामन्तीय व्यवस्था को देश की अर्थव्यवस्था के विघटन का संकेत माना जाता है। गुप्तकाल क्लासिकल युग था अथवा अर्थव्यवस्था के धीरे-धीरे ह्रास का काल, यह एक अत्यन्त विवादास्पद तथ्य है।

कृषि- सामान्यतः भूमि पर कृषक का ही स्वामित्व माना जाता है। मनु और गौतम जैसे स्मृतिकारों ने राजा को भूमि का स्वामी माना है, परन्तु मनु दूसरी जगह कहते हैं कि भूमि उसकी होती है जो उसे आबाद करता है। दूसरी तरफ बृहस्पति और नारद भूमि का स्वामी उसे मानते हैं जिसके पास कानूनी दस्तावेज हो। शबरस्वामि के अनुसार साधारण मनुष्य खेत के स्वामी होते हैं। राजा भी पूरी भूमि का स्वामी नहीं होता है, उसकी भी निजी भूमि होती है। प्राचीन काल में राजा सामान्यतः उपज के 1/6 भाग का अधिकारी माना गया है। यह भाग प्रजा की सुरक्षा करने के लिए, राजा को प्रजा द्वारा प्रदान किया जाने वाला कर था। राजा अपनी निजी भूमि में से ही भूदान आदि करता था। राजा द्वारा लिया जाने वाला कर भाग, भोग कर आदि कहलाता था। लगान के निर्धारण व की प्रतिष्ठा के संदर्भ में व्यापक विवरणों का अभाव है। कर के निर्धारण में भूमि की प्रकृति का ध्यान रखा जाता होगा।

स्मृतियों एवं बृहतसंहिता, अमरकोश, कालिदास की रचनाओं आदि से गुप्तकालीन कृषि के बारे में जानकारी मिलती है। गुप्तकाल में कृषि परम्परागत तरीकों से ही होती थी। हल में लोहे के फाल का प्रयोग किया जाता था। बृहस्पति व नारद की स्मृतियों में उनके लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की गयी है जो कृषि उपकरणों को क्षति पहुँचाते थे। कृषि में हल के महत्त्व के कारण ही उसे पवित्र माना जाने लगा। सीर-यज्ञ के आयोजन से भी इसका महत्त्व स्पष्ट हो जाता है। कृषि में अच्छे बीजों का महत्त्व माना गया था। वराहमिहिर ने बृहतसंहिता में बीजों की गुणवत्ता बढ़ाने व धरती की उर्वरा शक्ति में वृद्धि के तरीके बताए हैं। गुप्तकाल में कृषि व्यवस्था में राजा का हस्तक्षेप पहले की तुलना में बढ़ गया था। अमरकोश में बारह प्रकार की भूमि का उल्लेख है- उर्वरा, ऊसर, मरू, अप्रहत, सद्वल, किल जलप्रायमनुपम, कच्छा, शर्करा, शकविती, नदीमातृक, देवमातृक। आर्थिक उपयोगिता की दृष्टि से भूमि को कई भागों में विभाजित किया गया है- 1. वास करने योग्य भूमि-वास्तु, 2. चारागाह भूमि, 3. खेती के उपयुक्त भूमि-क्षेत्र, 4. नहीं जोती जाने वाली भूमि-सील, 5. बिना जोती गयी जंगल भूमि-अप्रहत। गुप्तकालीन अभिलेखों में भू धारण पर प्रकाश डालने वाली पाँच शब्दावलियाँ हैं

1. नीवीधर्म- इसके अन्तर्गत दानग्रहिता को सदा के लिए भूमि दे दी जाती थी।

2. अक्षयनीवी धर्म- संभवत: सबसे पहले कुषाणों ने किसानों को अक्षयनीवी पद्धति पर भूमि दी थी। इसके अनुसार किसान उस भूमि से प्राप्त आय का उपभोग कर सकता था। किन्तु वह उस जमीन का हस्तातरण नहीं कर सकता था। गुप्तकाल में भूमि खरीदकर अक्षयनीवी पद्धति पर ब्राह्मणों को दान में भी दी जाने लगी।

3. नीवी धर्म अक्षयन- इसके अनुसार नीवी धर्म समाप्त कर यह भूमि दूसरे को दी जा सकती थी।

4. अप्रदानीवी धर्म- दानग्रहिता को इस भूमि पर प्रशासनिक अधिकार नहीं था और न वह किसी अन्य व्यक्ति को भूमि दे सकता था।

5. भूमि-न्याय- कौटिल्य के अर्थशास्त्र में एक संपूर्ण अध्याय ही इस पर लिखा गया है। इसके अन्तर्गत बंजरभूमि को आबाद करने के ऐवज में किसी व्यक्ति को उस भूमि पर लगान माफ कर दिया जाता था।

राजस्व सामान्यतः भू-राजस्व को भागकहा जाता था। मनुस्मृति में एक कर भोगकी चर्चा है। भोग में राजा के प्रत्येक दिन की आवश्यकता शामिल थी। यथा-फल-फूल, सब्जी आदि। उद्रग भी भूमि कर का ही एक रूप था। उपरिकर उन रैयतों पर लगाया जाता था जो भूमि के स्वामी नहीं थे। भू-राजस्व नकद (हिरण्य) और अनाज (मेय) दोनों में लिया जाता था। नकद कर वसूलने वाला अधिकारी हिरण्य सामुदायिक कहलाता था। अनाज में कर वसूलने वाला अधिकारी औद्रगिक कहलाता था।

अन्य कर 1. धान्य, 2. भूत, 3. बैष्ठिका- बलात् श्रमिक, 4. भत या भट्ट (पुलिस कर), 5. प्रणय- ग्रामवासियों पर लगाया गया एक अनिवार्य कर, 6. चारासन- चारागाहों पर शुल्क, 7. चाट- लुटेरे द्वारा उत्पीड़न से मुक्ति का कर, 8. दशापराध- दस प्रकार के अपराधों के लिए किए गए जुर्माने, 9. हलदण्ड- यह हल पर लगाया जाता था। सातवाहन काल से भूमि दान की प्रथा शुरू हुई थी। गुप्तकाल तक आकर प्रशासनिक अधिकार भी दान ग्रहिता को सौंप दिया गया। हर्षकाल में राज्य अधिकारियों को भी अनुदान में वेतन दिया जाने लगा।

भूमि की माप माप का पैमाना, 1. निर्वतन, 2. कुल्यावाप, 3. द्रोणवाप, 4. आढ़वाप।

1 कुल्यावाप = 8 द्रोणवाप = 32 आढ़वाप

बंगाल में पाटक प्रचलित था। इस प्रकार हम देखते हैं कि विभिन्न क्षेत्र में यह भिन्न-भिन्न था। अमरकोष में हलों की बनावट का वर्णन है। बृहस्पति के अनुसार हल का फाल का वजन 12 पल होना चाहिए और यह आठ अंगुल लंबा और चार अंगुल चौड़ा होना चाहिए।

प्राचीन काल में प्रजा को कृषि हेतु सिंचाई की सुविधाएँ मुहैया करवाना राजा का कर्त्तव्य माना गया है। कालिदास के ‘रघुवंश’ से भी राजा के इस रूप का बोध होता है। बृहत्संहिता में दकार्गलाध्यायनामक पूरा अध्याय पृथ्वी के नीचे जल खोजने की विधियों से संबंधित है। प्राचीन काल में इस प्रकार के अध्ययन का प्रयोग कुओं और तालाबों के खोदने में निश्चित रूप से किया जाता होगा। अमरकोश में भी इस प्रकार का विवरण है। जूनागढ़ अभिलेख से प्राचीन भारतीय शासकों की सिंचाई व्यवस्था के प्रति गहन रुचि जाहिर होती है। सुदर्शन झील जो मौर्यकाल में सुरक्षित थी, स्कंदगुप्त के राज्यकाल में क्षतिग्रस्त होने से समस्या बन गयी थी। जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार सुदर्शन झील अधिक वर्षा के कारण उफन पड़ी तथा उसका जल समुद्र की तरह हो गया। इससे गिरनार नगर की सुरक्षा को भय उत्पन्न हो गया तथा नागरिक किकर्त्तव्यविमूढ़ होकर भय और विषाद से भर उठे। ऐसे समय गिरनार नगर के अधिकारी चक्रपालित ने अनुपम साहस दिखाकर दो महीने तक सहस्रों लोगों को दिन रात लगाकर, अपार धन व्यय करके झील के बाँध का पुनरूद्धार किया।

गुप्त काल में कृषि में मध्यस्थों की संख्या में वृद्धि होने लगी थी। इसी आधार पर इतिहासकार गुप्तकाल को भारतीय सामंतवाद के उदय का काल मानते हैं। आर्थिक संबंधों के आधार में परिवर्तन आने था। इस काल में यह एक नया विकास हुआ कि गाँव की भूमि दानमें दिये जाने के सैनिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों को भी उनके वेतन के बदले में दी जाने लगी। इस भूपति को ही कृषक अपने कर देता था। भूपति कृषकों व उसके परिवार से बेगारले सकता था, लेकिन उनको बेदखल नहीं कर सकता था। राजनैतिक शक्तियों के साथ-साथ मध्यस्थों की आर्थिक शक्तियों का विकास हुआ। विकेन्द्रित कर-प्रणाली की प्रवृत्ति में विकास के कारण अनेक नवीन वित्तीय इकाइयों का उद्भव हुआ। कृषक के ऊपर करों का दबाव भी बढ़ने लगा था। यह तो स्पष्ट है की भूपतियों की विशाल भूमि में कृषिक मजदूर ही करते थे। याज्ञवल्क्य स्मृति में उल्लेख है की खेत में कार्य करने वाले श्रमिक को फसक का दसवां हिस्सा प्राप्त होता था। ग्रामीण जीवन में कृषक मजदूरों की संख्या बढ़ने लगी थी। कृषकों द्वारा कई फसलें बोयी जाती थी। वराहमिहिर ने फसलों के 3 प्रकार बताएं हैं- गर्मी (रबी), पतझड़ (खरीफ) और साधारण समय में होने वाली फसलें। अमरकोश में भी उन वस्तुओं के नाम मिलते हैं जो सरसों, अलसी, अदरक, कालीमिर्च आदि। धान के कई नाम थे जैसे नीवार, शालि और कमल। चावल की फसल लगभग 60 दिन में तैयार हो जाती थी। बाण के अनुसार श्रीकण्ठ जनपद में चावल, गेहूँ, ईख, सेम, अंगूर आदि पैदा थे। इत्सिंग के यात्रा-विवरण से भी तत्कालीन फसलों की जानकारी मिलती है। केला, आम, द्राक्षा, कटहल, केसर आदि की भी खेती की जाती थी।

पशुपालन- प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार पशु थे। पशुपालन को भी कृषि के साथ स्वतंत्र व्यवसाय माना गया है। अमरकोश, बृहतसंहिता, कामन्दकीय नीतिसार के पशु संबंधी उल्लेखों से स्पष्ट है कि गुप्तकाल में भी पशु अर्थव्यवस्था के आधार थे। गाय और बैल की आर्थिक उपयोगिता के कारण ही उन्हें पवित्र माना गया। उनके साथ दुव्र्यवहार करने पर दण्ड का विधान था। स्मृतियों में पशुओं से संबंधित अलग अध्याय (स्वामिपाल विवाद) मिलता है। पशुओं की सुरक्षा के लिए चरवाहा उत्तरदायी होता था। नारद के अनुसार उसे पारिश्रमिक के रूप में सभी पशुओं का दूध प्रति आठवें दिन और प्रति वर्ष 100 पशुओं के लिए एक बछिया और 200 पशुओं के लिए एक दुधारू गाय देय थे। हाथी और घोड़ों का महत्त्व सामरिक दृष्टि से था। हाथी दाँत निर्यात की प्रमुख वस्तु थी।

उद्योग व शिल्प- गुप्तकालीन आर्थिक सम्पन्नता उद्योग व शिल्प में दिखायी देती है। कच्चे माल की अधिकता और शिल्पियों की कुशलता के कारण व्यवसाय और उद्योगों ने गुप्तकाल में बड़ी उन्नति की। गुप्तकालीन अभिलेखों व साहित्यिक ग्रन्थों से भी इसकी पुष्टि हो जाती है। इस काल में खनिज पदार्थों का बड़ी मात्रा में उत्खनन किया जाने लगा था। कालिदास ने अपनी रचनाओं में बहुत-सी धातुओं व रत्नों का उल्लेख किया है जैसे- स्वर्ण, कनकसिकता (नदियों की बालू में से निकाला गया स्वर्ण), रजत, ताम्र (तांबा), अयस (लोहा), बज्र (हीरा), पद्याराग (लाल), पुष्पराग (पुखराज), इन्द्रनील (नीलम), मरकत (पन्ना), वैदूर्य (बिल्लोर), स्फटिक, मणिशिला (संगमरमर) आदि।

जेवरों का निर्माण गुप्तकाल का प्रमुख उद्योग था। वात्सायन के कामसूत्र में धातुकर्म को 64 कलाओं में गिनाया गया है। शूद्रक के मृच्छकटिकम् में सुनारों के द्वारा अनेक प्रकार के आभूषण बनाने एवं उनमें रत्नों को जड़ने आदि का बड़ा सजीव चित्रण है। सुवर्णकार का क्षेत्र एवं महत्त्व गुप्तकाल में बढ़ गया था। वह जौहरी का भी कार्य करता था। रत्नों से संबंधित वैज्ञानिक अध्ययन भी विकसित हुआ जिसे रत्न परीक्षा के नाम से संबोधित किया गया। कामसूत्र में रूपरतनपरीक्षा व मणिरागकरज्ञानम् का संबंध रत्नों व उसके परीक्षण से था। रत्नों का प्रयोग विभिन्न प्रकार से होता था जैसे स्वर्ण की वस्तुएँ, आभूषणों और मुद्राओं को जड़ने-वस्त्रों को सजाना आदि।

वस्त्रोद्योग भी गुप्तकाल का प्रमुख उद्योग था। वराहमिहिर ने वज्रलेप का उल्लेख किया है, जिससे बोध होता है कि उस समय लोग वस्त्रों को रंगने की रासायनिक प्रक्रिया से परिचित थे। प्राचीन काल में रंग वृक्षों से तैयार किए जाते थे।

लौहकार अनेक उपयोगी अस्त्र-शस्त्र, उपकरण और वस्तुओं को बनाते थे। मेहरौली का लौह स्तंभ तत्कालीन लौहकारों के कौशल और उच्च तकनीक का एक विशिष्ट उदाहरण है। शताब्दियों की उथल-पुथल, प्राकृतिक प्रकोप भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सके हैं। इसमें अभी तक जंग भी नहीं लगी है। इस काल की 7½ फुट ऊँची महात्मा बुद्ध की मूर्ति भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से मिली है। इससे भी धातु विज्ञान की उन्नति का बोध होता है।

कुम्हार का व्यवसाय भी प्रचलित था। उत्खनन से प्राप्त हुए बहुत से बर्तनों में से कुछ सांचे में ढले हुए हैं और कुछ चाक पर बने हुए हैं। बर्तनों को रंग कर उस पर उत्कीर्णन भी किया जाता था। पीने के बर्तनों पर हत्थे भी लगाये जाते थे। कामसूत्र में तक्षण को 64 कलाओं में एक बताया गया है। वाकाटक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि नमक बनाने पर राज्य का एकाधिकार था। नमक दो प्रकार से बनाया जाता था- समुद्र के जल से व चट्टानों से।

प्राचीन भारतीय श्रृंगार प्रेमी थे। श्रृंगार की सामग्री, सुगंधित पदार्थों, कुमकुम आदि का निर्माण भी अवश्य किया जाता होगा। बृहतसंहिता में सुगंधित पदार्थों और तेलों आदि से संबंधित विवरण प्राप्त होता हैं। गुप्तकाल में वास्तुकला का पूर्ण विकास दिखाई देता है। गुप्तकालीन कलाकृतियों से स्पष्ट है कि वास्तुशिल्पी उत्कृष्ट रहे होंगे। इस काल की विभिन्न कलाकृतियों में कल्पना व यथार्थ का अद्भुत मिश्रण है।

श्रेणी संगठन- गुप्तकाल में व्यापारिक संगठनों की संख्या व क्षेत्र में वृद्धि हो गयी थी। प्राचीन काल के व्यापारिक संगठनों को  श्रेणीनिगमया निकाय कहा जाता था। वृहत्कल्पसूत्र भाष्य के अनुसार गुप्तकाल में निगम का महत्त्वपूर्ण स्थान था। निगम दो तरह के होते थे- एक महाजनी का कार्य करता था तथा दूसरा महाजनी के अतिरिक्त अन्य कार्य भी करते थे। विभिन्न व्यवसायिक सम्प्रदायों की अलग-अलग श्रेणियाँ होती थीं। श्रेणी संगठनों का कार्य सिर्फ आर्थिक ही नहीं था वरन् समाज के राजनैतिक व सांस्कृतिक पक्षों से भी जुड़ा हुआ था। इन्हें सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। शूद्रक के मृच्छकटिकम् में तो न्यायाधिकरण में भी व्यापारियों को सम्मिलित किया गया है। विभिन्न अभिलेखों में इनके लिए नगर श्रेष्ठी, सार्थवाह, प्रथम कुलिक आदि नामों का उल्लेख हुआ है। वैशाली से प्राप्त मुहरों से भी श्रेणी-संगठनों के अस्तित्व का बोध होता है। बसाढ़ उत्खनन से महाजनों, व्यापारियों और सार्थवाह के संयुक्त वृत्तिसंघ की दो सौ चौहत्तर सीले मिली हैं। इन पर महाजनों, व्यापारियों तथा वणिकों के निगम या संघों के निर्देश अंकित हैं। इन लेखों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वणिकों और शिल्पियों के संघ वाणिज्यिक कारोबार के लिए बनाये गये थे।

उत्तरी भारतवर्ष के अनेक व्यापारिक नगरों में इनकी शाखायें थीं तथा सदस्य थे। ईशानदास, मृतदास और गोमिस्वामिन से संबंधित सीलों की संख्या अधिक है, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि ये आर्थिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते थे। कुमारगुप्त और बुद्धगुप्त के अभिलेखों से स्पष्ट है कि कोटिवर्ष विषय का राज्यपाल वैत्रवर्मन एक समिति (जिसके सदस्य नगरश्रेष्ठि, सार्थवाह प्रथम, कुलिक आदि होते थे) की सहायता से राज्य करता था। स्कंदगुप्त के 465 ई. के इंदौर ताम्रपत्र लेख में इन्द्रपुर की तैलिक श्रेणी का उल्लेख मिलता है। इसमें धन जमा कराया जाता था जिसके ब्याज से सूर्य मंदिर में दीपक जलाने हेतु तेल की व्यवस्था की गई थी। गुप्तकाल में तमोलियों की श्रेणियों का भी उल्लेख मिलता है। इस युग में श्रेणियाँ स्वतंत्र इकाईयों के रूप में गतिशील बनी रहीं। इनके नियमों को राजा मान्यता प्रदान करता था। नारद के अनुसार- राजा को श्रेणियों के नियमों को मान्यता प्रदान करनी चाहिये। संगठन में फूट डालने वाले को कठोर दण्ड देना चाहिए।

इस समय तक श्रेणियों के संगठन का निर्माण हो चुका था। बृहस्पति स्मृति के अनुसार श्रेणी संगठन की एक प्रबंधकारी समिति होती थी जिसमें पाँच, तीन या दो सदस्य होते थे। उस समिति का एक प्रधान होता था। प्रबंध समिति के सदस्य कार्य-निपुण, सत्यनिष्ठ, कर्त्तव्यनिष्ठ, ज्ञाता, योग्य और उच्चकुल के होते थे। याज्ञवल्क्य के अनुसार भी अत्यन्त चरित्रवान्, कार्यचिन्तक और शुद्ध व्यक्ति ही प्रबंधकारी बनाया जाता था जो संस्था के सदस्यों की कार्यप्रणाली की देखभाल करता था। नियमों की अवमानना करने वाले सदस्यों को वह दण्डित करता था लेकिन वह निरंकुश नहीं हो सकता था।

व्यापारिक गतिविधियों में वृद्धि के साथ ही श्रेणियों की संख्या में वृद्धि हुई। आर्थिक संबंधों में जटिलता पैदा होने लगी। क्रेता व विक्रेताओं के झगड़ों को निबटाने के लिए स्मृतिकारों ने बहुत से नियम बनाये हैं। मनु, याज्ञवल्क्य, नारद आदि ने विवाद के वर्गीकरण में अस्वामिविक्रय, क्रयविक्रयानुशय आदि को सम्मिलित किया है, जिनका संबंध क्रय-विक्रय से है। प्रो. लल्लनजी गोपाल के अनुसार पूर्वकाल की तुलना में इस काल में सबसे अधिक उल्लेखनीय परिवर्तन यह था कि पहले राज्य मूल्य-निर्धारण करने के अधिकार का उपयोग करने के लिए तत्पर रहता था। इस काल में एक उदार और उन्मुक्त नीति अपनाई गई थी। वह संगठनों के नियमों को पालित कराता था। विपत्ति और संकट के समय राज्य को इन श्रेणियों से ऋण भी प्राप्त होता था। श्रेणियाँ आर्थिक दृष्टि से बहुत सम्पन्न होती थीं। विश्रामगृह, सभागृह, आदि जनकल्याण से संबंधित निर्माण कार्य श्रेणियों द्वारा संपन्न कराये जाते थे। मन्दसौर अभिलेख में उल्लिखित है कि रेशम के व्यापारियों ने सूर्य का एक भव्य मंदिर निर्मित करवाया तथा कालान्तर में उसके भग्न होने पर पुन: उसी श्रेणी ने इसकी मरम्मत कराई थी। श्रेणियाँ अपनी स्वयं की मुद्राएँ भी प्रचलित करती थीं। नालन्दा, कौशाम्बी, वैशाली से उत्खनन में बहुत-सी मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं, जो निगमों की हैं। इन पर नैगम शब्द अंकित है। प्राचीन काल में श्रेणियाँ बैंकों की भाँति भी कार्य करती थी और विभिन्न संस्थाओं व व्यक्तियों के धन को सुरक्षित रखती थीं। समय पड़ने पर ये ऋण भी प्रदान करती थीं। इनके अपने न्यायालय भी होते थे जो सदस्यों के झगड़ों का निबटारा करते थे। इनको राजा भी मान्यता प्रदान करता था। विष्णुसेन सन् 592 के एक से एक पश्चिमी भारत में राजा तथा व्यापारियों के संबंधों जानकारी मिलती है। गुप्तकाल के आर्थिक जीवन में श्रेणियाँ अत्यन्त सक्षम गयी थीं और राजसत्ता के समानांतर आकर खड़ी हो गयी थीं। फिर भी राज्य अपेक्षा की जाती थी कि वह उनके अनैतिक व अवांछित वर्गों को प्रतिबंधित करे।

श्रेणियों ने अपनी सैन्य व्यवस्था भी विकसित कर ली थी जिससे उनकी सुरक्षा की समस्या भी हल हो गयी थी। मन्दसौर अभिलेख से विदित होता है कि रेशम बुनने वाली श्रेणी के लोग धनुर्विद्या में पारंगत थे। गुप्तकाल के अंतिम चरणों में वृत्ति संघ व्यवस्था में गिरावट दिखाई देती है।

सिक्के- गुप्तकालीन सिक्के बहुतायत में प्राप्त हुए हैं। उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में गुप्तकालीन सिक्कों की निधियाँ प्राप्त हुई हैं। गुप्त साम्राज्य के विभिन्न भागों में सिक्कों के 16 ढेर प्राप्त होते हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण बयाना (भरतपुर) क्षेत्र का ढेर है। चन्द्रगुप्त प्रथम और समुद्रगुप्त के प्रारंभिक सोने के सिक्के 118-122 ग्रेन के थे। इन शासकों ने कुषाणों के मानदंड को आधार बनाया था। गुप्त अभिलेख में उसे दीनार कहा गया था। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पहली बार कुषाणों के मानदंडों का परित्याग किया। उसके स्वर्ण सिक्के 124-132 ग्रेन के हैं। स्कंदगुप्त ने स्वर्ण सिक्के के दीनार मॉडल को छोड़ दिया। उसके स्वर्ण सिक्कों के वजन अधिक हैं किन्तु उसमे स्वर्ण की मात्रा कम है। चांदी के सिक्के सबसे पहले चन्द्रगुप्त द्वितीय ने जारी किए। उसने शक मॉडल को छोड़कर कार्षापण मॉडल को अपनाया। अधिकतर गुप्त सिक्के सुवर्ण व् चांदी के हैं। गुप्तकाल में इनकी तौल 125 से 127 ग्रेन प्रचलित थी। स्कन्धगुप्त के सिक्के 144 ग्रेन के भी हैं। कुछ विद्वान् यह मानते हैं की गुप्तकाल में अर्थव्यवस्था में ह्रास हुआ। इसका आधार परवर्ती गुप्त शासकों की मिलावटी मुद्राएँ हैं। जिनमे स्वर्ण के अनुपात में कमी आ गयी थी। कुमारगुप्त प्रथम के अंतिम काल व स्कंदगुप्त के काल में आर्थिक ह्रास परिलक्षित होता है। संभव है इसका कारण हूण आक्रमण रहा हो। फाह्यान का तो यहाँ तक कहना है कि लोग दैनिक कार्यों के लिए कोड़ियों का प्रयोग करते थे। यह स्थिति विरोधाभास लिए हुए है कि एक तरफ सुवर्ण सिक्कों का प्रयेाग और दूसरी तरफ कोड़ियों का प्रचलन। इतिहासकार लल्लनजी गोपाल के अनुसार मूल्यों की नीची दरों के कारण चाँदी और सोने के सिक्कों का उपयेाग दैनिक जीवन में सीमित था।

व्यापार व वाणिज्य- गुप्तकाल में विदेशी आक्रमणों से मुक्ति, विशाल भू-भाग की राजनैतिक एकता और प्रशासनिक स्थिरता से व्यापार व वाणिज्य का विकास हुआ।

आांतरिक व्यापार- गुप्तकालीन आंतरिक व्यापार श्रेष्ठिसार्थवाहकुलिक और निगमके माध्यम से संगठित होता था। ग्रामीण क्षेत्रों में दुकानों के अलावा साप्ताहिक हाट भी लगते थे, जहाँ वस्तुओं का क्रय-विक्रय किया जाता था। बाजारों को विपणि की संज्ञा प्रदान की गयी थी। पण्यवीथी (सड़क) के दोनों तरफ दुकानें होती थीं जिन पर लोगों के उपभोग की वस्तुएँ उपलब्ध रहती थीं। अमरकोश में भी सड़क के दोनों ओर दुकानें होने का उल्लेख है। भीटा के उत्खनन से भी यह जानकारी होती है कि सड़कों के दोनों ओर दुकानें होती थीं। पंचतंत्रमें व्यापार को श्रेष्ठ कहा गया है तथा व्यापार के लिए माल सात विभागों में विभाजित किया गया है- (1) गंधी का व्यवसाय (2) रेहन बट्टे का कार्य (3) पशुओं का व्यापार (4) परिचित ग्राहक का आना (5) माल का झूठा दाम (6) झूठी तौल रखना तथा (7) विदेश में माल पहुँचाना। ऐसे व्यापारी जो अपनी वस्तुओं को घोड़ों, बैलों या अन्य पशुओं अथवा रथों पर लादकर समूह में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पैदल जाते-आते थे तथा क्रय-विक्रय करते, सार्थकहलाते थे। सार्थवाह व्यापारियों का नेता होता था। वैशाली से ऐसी कई प्रकार की मुहरें मिली हैं, जिन पर सार्थवाह अंकित है। राजा भी व्यापारिक गतिविधियों में रुचि लेता था और व्यापार को संरक्षण प्रदान करता था। प्रशासन भी उनके नियमों को मान्यता प्रदान करता था। नारद स्मृति में कहा गया है कि यदि यात्रा करने वाला व्यापारी माल के साथ अपने देश लौटता है और उसकी मृत्यु हो जाती है तो राजा का यह कर्त्तव्य था कि वह माल को तब तक सुरक्षित रखे जब तक उसके उत्तराधिकारी नहीं आते। सार्थके व्यापारियों में एकता होती थीं। ये हानि लाभ के लिए समान रूप से उत्तरदायी होते थे। इनमें व्यापारी, वाहन (घोडे, ऊँट, बैल आदि), भारवाह (माल ढोने वाले लोग), औदारिका (आजीविका के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने वाले लोग), साधु और भिक्षु आदि होते थे। व्यापारिक मागों पर कहीं-कहीं दस्युओं का प्रकोप रहता था। लेकिन फाह्यान को अपनी भारत यात्रा के दौरान इसका सामना नहीं करना पडा। इससे इस काल की आन्तरिक सुरक्षा परिलक्षित होती है। आन्तरिक व्यापार स्थल व जल दोनों के माध्यम से होता था। बंगाल में नदियों का बाहुल्य था। संभव है कि वहाँ व्यापार नदियों के द्वारा ही होता होगा। कालिदास के रघुवंश में उल्लेख है कि अयोध्यावासी सरयू के द्वारा व्यापार करते थे। पश्चिम व दक्षिण भारत में व्यापारिक मार्ग अवश्य रहे होंगे। समुद्रगुप्त के दक्षिणापथ विजय का मार्ग और चन्द्रगुप्त के गुजरात विजय के मार्ग आदि से भी आंतरिक व्यापार अवश्य होता होगा। सामान्यत: वैश्य ही व्यापारिक क्षेत्र में सक्रिय रहते थे लेकिन आपद्धर्म में धर्मशास्त्रकारों ने भी ब्राह्मणों को व्यापार करने की छूट दी है। धर्मशास्त्रों में व्यापार करने योग्य व न करने योग्य वस्तुओं की सूची दी गयी है।

विदेशी व्यापार- साहित्यिक स्रोतों से स्पष्ट हो जाता है कि गुप्तकाल में वैदेशिक व्यापार विकसित था और समुद्री मार्ग द्वारा होता था। छठी शती के लेखक कासमश ने अपने ग्रन्थ क्रिश्चियन टोपोग्राफीमें सिन्दुस, आोरोंथा, कल्याण, चोल, मालाबार आदि बंदरगाहों का उल्लेख किया है। गुप्तकाल की स्थापना तक रोमन व्यापार का पतन हो चुका था और दक्षिण के तीन बंदरगाह मुजरिस, अरिकमेडु और कावेरी पतनम् भी अमहत्त्वपूर्ण हो चुके थे। किन्तु यह भी एक तथ्य है कि रोमन साम्राज्य के पतन के बाद बाइजेण्टाइन साम्राज्य स्थापित हुआ। और फिर भारत का व्यापारिक संबंध उससे पुन: स्थापित हो गया। गुप्त शासकों ने इथोपिया के माध्यम से बाइजेंटाइन साम्राज्य तक पहुँचने की कोशिश की थी क्योंकि हम देखते हैं कि कॉसमश भारत एवं इथोपिया के व्यापार का उल्लेख करता है। दूसरी तरफ रोमन सम्राट् जस्टिनियन ने इथोपिया नरेश हेल्लेस्थेयास से समझौता किया ताकि वह फारसवासियों की शत्रुता का सामना कर सके। 550 ई. तक रोमवालों ने चीनी लोगों से रेशम बनाने की कला सीख ली। इसके साथ भारत की मध्यस्थ की भूमिका समाप्त हो गई। इसके साथ रोमन व्यापार को एक बार धक्का लगा। किन्तु यह भी सत्य है कि गुप्तकाल में जहाँ रोमन व्यापार का पतन हुआ वहीं चीन और दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार में वृद्धि हुई। कॉसमश कहता है कि छठी सदी के मध्य में भारत का पूर्वी एवं पश्चिमी तट श्रीलंका के माध्यम से जुड़ते थे। चीन और भारत के बीच व्यापार संभवत: वस्तुओं की अदला-बदली पर आधारित था क्योंकि न तो चीन के सिक्के भारत में मिलते हैं और न भारत के सिक्के चीन में। इथोपिया से हाथी दांत, अरब से घोडे और चीन से रेशमी वस्त्र मंगाए जाते थे। कॉसमश के अनुसार भारत के महत्त्वपूर्ण बंदरगाह निम्नलिखित थे- 1. सिन्ध, 2. गुजरात, 3. कल्याण, 4. चोल और मालाबार तट पर पाँच बंदरगाह 1. परती, 2. मंगलौर, 3. शलीपत्तन, 4. नलोपत्तन, 5. पांडोपत्तन।

कालिदास की रचनाओं जैसे अभिज्ञानशाकुन्तलम्, रघुवंश, कुमारसंभव आदि से भी गुप्तकालीन व्यापारिक जीवन की झांकी मिलती है। समकालीन विश्व के बहुत से देशों से भारत के व्यापारिक संपर्क थे। उनसे बहुत सी वस्तुएँ आयात व निर्यात की जाती श्रीं। पूर्वी देशों में ब्रह्मा, चीन, स्वर्णभूमि आदि से व्यापार किया जाता था। प्रथम सदी के पेरिप्लसनामक ग्रन्थ में भारत से आयात व निर्यात होने वाली वस्तुओं के नाम मिलते हैं। भृगुकच्छ, कल्याण, ताम्रलिप्ति, माले (मालाबार) आदि गुप्तकालीन प्रमुख बंदरगाह थे। गंगा के डेल्टा पर स्थित ताम्रलिप्ति भौगोलिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। यहाँ स्थल और जल दोनों मार्ग मिलते थे। रघुवंश और दशकुमार चरित से भी स्पष्ट है कि ताम्रलिप्ति बंदरगाह से व्यापारिक वस्तुओं का आयात-निर्यात अधिक होता था। चीनी यात्री फाह्यान ने कपिशा का उल्लेख किया है जहाँ से ईरान होकर भारतीय वस्तुएँ अन्य देशों को जाती थीं। भारत से बाहर जाने वाली वस्तुओं में उल्लेखनीय थीं- रेशम, लौंग, चंदन, मोती, कपडे, चाँदी, हाथीदाँत, गैडे के सींग, केसर, सुगंधित पदार्थ, लोहे का बना सामान, प्रसाधन सामग्री आदि। रेशम के अलावा मलमल, कलिंग क्षेत्र का कालिंगम् नामक वस्त्र तथा कामरूप का महीन वस्त्र आदि भी निर्यात होता था। बाहर से आने वाली वस्तुओं में चीनांशुकनामक कौशेय वस्त्र उल्लेखनीय है जिसका आयात चीन से होता था। कम्बोज देश से घोड़े आदि भी आते थे। अरबी घोड़ों की भी भारत में मांग थी। पेरिप्लसमें उल्लेख आया है, नम्बरस् के राज्य में निम्नलिखित वस्तुयें लायी जाती हैं- सुरा, लाओदिकी, अरबी, टिन, सीसा, मूंगा, महीन-मोटे विभिन्न प्रकार के वस्त्र, हाथ भर चौडे चमकीले कमरबन्द, काँच, सिंदूर, स्वर्ण-रजक की मुद्राएँ, अनेक प्रकार के मरहम (अवलेह), राजा के लिए अनेक प्रकार के उपहार, भेंट, चाँदी के मूल्यवान बर्तन, गायक लड़के, अन्त:पुर के लिए सुन्दर युवतियाँ, पुरानी मदिरा आदि।

पश्चिमी  बंदरगाहों से गजदंत, गोमेद, लाल, मलमल, मोटा वस्त्र, रेशम, सूत, पीतल आदि की वस्तुयें निर्यात की जाती थीं। भारतीय मिट्टी के पात्र भी इस समय निर्यात होते थे जो विदेशों में लोकप्रिय थे। दक्षिण भारतीय बंदरगाहों से विदेशों को भेजी जाने वाली वस्तुयें थीं-काली मिर्च, मोती, गजदन्त, पारदर्शी पत्थर, हीरा, नीलम, गोमेद, मूंगा, कछुए के आवरण आदि। कस्तूरी शैलेय, काली मिर्च, सफेद मिर्च, इलायची, मालाबार के बंदरगाह से निर्यात होती थी। बाँस, बारहसिंह के सींग भी विदेश को निर्यात होते थे। लाल मोती, बिल्लौर कुरूंड, सीसा आदि पश्चिमी देशों को भेजी जाने वाली व्यापारिक वस्तुएँ थीं। भारतीयों का व्यापार चीन, शकस्थान, हिन्दूकुश, रोम, फारस, अरब, इथोपिया, मिस्र आदि देशों तक फैला हुआ था। रोम के साथ भी भारतीय विदेशी व्यापार इस समय तक प्रचलित था, परंतु पांचवीं शताब्दी के प्रारंभ में रोम साम्राज्य के पतन के पश्चात् व्यापार गिर गया। चौथी से छठी शताब्दी ई. की रोमन मुद्राएँ दक्षिण भारत के क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं, जिनसे व्यापारिक संबंधों की पुष्टि होती है। बहुमूल्य रत्न चाँदी, लौह उपकरण, ऊनी कपडे, मसाले आदि ईरान से व्यापार के माध्यम से जाते थे। अरब में दवा नामक स्थान पर वार्षिक मेला होता था। जिसमें भारतीय व्यापारी भाग लेते थे। दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों से भी व्यापार में बढ़ोत्तरी हुई, साथ ही सांस्कृतिक संपर्क भी बढ़े। दक्षिण पूर्वी एशिया से प्राप्त कलावशेषों से भी इसकी पुष्टि होती है। फाह्यान ने ताम्रलिप्ति से श्रीलंका होते हुए चीन की यात्रा एक बड़े समुद्री जहाज से की थी। चीन की तरफ जाने के लिए समुद्री मार्ग के अलावा कई स्थल मार्ग भी थे जैसे सुलेमान व कराकोरम पहाड़ी से होकर जाने वाला मार्ग।

गुप्तकाल में आन्तरिक व्यापार स्थलमार्ग व जलमार्ग (नदियों द्वारा), दोनों प्रकार से होता था। पाटलिपुत्र, मथुरा, अयोध्या, उज्जैन, भडौंच, कौशाम्बी आदि प्रमुख नगर व्यापारिक गतिविधियों के केन्द्र थे। उज्जैन और पाटलिपुत्र अपने व्यापार के लिए अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके थे। पादताडितकम् में उल्लेख आया है की उज्जैन के बाजारों में देशी और विदेशी व्यापारिक वस्तुओं का जमावड़ा था। यहाँ पर घोड़े, रथ, हठी आदि का विक्रय होता था। पाटलिपुत्र से भड़ौच जाने वाला प्रमुख मार्ग था। मौर्यकाल से पूर्व ही पथों व् मार्गों का विकास हो चुका था। गुप्तकालीन शासकों ने इन्हें और विकसित किया। गुप्त शासकों द्वारा किए गए विजय अभियानों से स्पष्ट होता है की आतंरिक क्षेत्र में मार्गों की समुचित व्यवस्था रही होगी। समुद्रगुप्त के दक्षिण की ओर किये गये विजय अभियानों से स्पष्ट ह उत्तर से दक्षिण तक पथों का विस्तार था।

गुप्तकाल में मार्गों की पूरी सुरक्षा की जाती थी। लोग निर्भय होकर यात्रा किया करते थे। चीनी यात्री फाह्यान ने पश्चिमी भारत से पूर्वी विभिन्न नगरों व स्थानों का भ्रमण किया था। किन्तु मार्ग में असुरक्षा महसूस नहीं की। गुप्तों के शासन के उपरांत स्थिति पूर्णतः परिवर्तित हो चुकी थी। देश से सुरक्षा और भय का वातावरण समाप्त हो चुका था पुष्टि ह्वेनसांग के यात्रा विवरण से भी होती है। उसे अपने यात्रा-काल में सी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। गुप्तकाल में जलमार्ग का भी अधिक प्रचलन था। नदियों (सिंधु, रावी, चिनाब, गंगा, यमुना, सरयु, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा व कावेरी आदि) द्वारा व्यापार किया जाता था। वैदेशिक व्यापार में बड़े-बड़े समुद्री जलपोतों का उपयोग किया जाता था। फारस, मिस्र, बाली, सुमात्रा, जावा, सुवर्णभूमि आदि देशों से व्यापार समुद्री मार्ग से ही होता था।

गुप्त काल में धर्म

आधुनिक हिन्दू धर्म का जो स्वरूप है, वह बहुत कुछ गुप्तकालीन धर्म पर आधारित है। गुप्तकालीन हिन्दू धर्म में लोक आस्थाओं का प्रवेश हो गया था। परम्परागत धर्म नवीन तत्त्वों को भी समाहित करने लगा था। इसी दृष्टिकोण का प्रभाव पुराणों व स्मृतियों पर पड़ा। इनमें धर्म के परम्परागत स्वरूप के साथ-साथ देश व काल के अनुरूप नवीनता को स्वीकारा गया है।

भागवत धर्म- गुप्तकाल में ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान हुआ। मूर्ति उपासना का केन्द्र बन गई। यज्ञ का स्थान उपासना ने ले लिया। भागवत धर्म ब्राह्मण धर्म से इस बात में भिन्न था कि उसने उपनिषद् द्वारा प्रतिपादित विश्व ब्रह्म की जगह एक व्यक्तिगत ईश्वर को उपासना का केन्द्र बनाया। भागवत धर्म पाणिनी के समय से ही प्रचलित था जबकि वैष्णव शब्द का प्रयोग 5वीं सदी से होने लगा। था। पाणिनी ने वसुदेव के पुजारी वासुदेवका की चर्चा की है। मेगस्थनीज का भी कहना है कि सुरेसन (मथुरा) के लोग वासुदेव की पूजा करते थे। ऐतरेय ब्राह्मण में विष्णु का उल्लेख सर्वोच्च देवता के रूप में हुआ है। पतंजलि ने वासुदेव के पर्यायवाची नामों में कृष्ण और जनार्दन का उल्लेख किया है। उसने केशव और राम के मन्दिरों में उत्सवों का भी जिक्र किया है। वासुदेव कृष्ण वृष्णि अथवा सतवत् वंश के थे। यादव कुल के नायक जो धार्मिक आंदोलन के नेता थे, कालांतर में देवता बन गए। आभीर जातियों ने ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में वासुदेव की पूजा को लोकप्रिय बना दिया। छांदोग्य उपनिषद् में वासुदेव कृष्ण की चर्चा है। उन्हें ऋषि घोरा का शिष्य और देवकी का पुत्र बताया गया। ऋग्वेद काल में ही हमें विष्णु देवता मिलते हैं। ऋग्वेद में वे सूर्य संबंधित हैं। उत्तर वैदिक काल में विष्णु की उपासना यज्ञ के द्वारा की जाती थी। भागवत गीता के अनुसार भागवत धर्म का सिद्धांत सबसे पहले ब्रह्म ने सूर्य बताया, फिर सूर्य ने मनु को बताया और मनु ने इच्छवाकु को सिखाया। सिद्धांत को सतवत् पद्धति का योग कहा जाता है। छांदोग्य उपनिषद् मानता कि वासुदेव कृष्ण का उदय सातवीं एवं छठीं सदी ई.पू. हुआ था। इसकी पुष्टि जैन परंपरा के अनुसार भी होती है क्योंकि यह वासुदेव कृष्ण को अरिष्टिनेमी (जैन तीर्थंकर) का समकालीन मानता है। तैत्तरीय अरण्यक वासुदेव को नारायण और विष्णु से जोड़ता है। बौधायन के धर्मसूत्र में भी वासुदेव और नारायण को जोड़ा गया है। नारायण की पूजा पद्धति संभवत: सबसे पहले हिमालय क्षेत्र में प्रचलित हुई थी। नारायण के उपासक मौलिक रूप से पांचरात्रिक के नाम से जाने जाते थे। बाद मेंवासुदेव से संयुक्त हो गए। पांचरात्र शब्द सबसे पहले शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित है। मान्यता यह है कि पुरुष नारायण ने पांचरात्र सत्र किया जो पांच रातों तक चलता रहा। इससे सृष्टि का विकास हुआ। इसके विकासक्रम में भगवान के 5 रूपों की ओर संकेत है। वैष्णवों ने इन 5 रूपों पर, व्यूह, विभव, अंतर्यामी और अर्चा (मूर्ति) का नाम दिया है। अर्थात् वासुदेव जो है वे क्रमश: 5 रूपों में प्रकट होते हैं। पाँचरात्र मत के अनुसार समस्त सृष्टि का बीज भगवान वासुदेव में सिमटा हुआ है। इससे छः गुण- ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज विकसित हुए। इनमें ज्ञान और बल, ऐश्वर्य और वीर्य, शक्ति और तेज के तीन जोड़े बनते हैं। इन जोडों को व्यूह कहते हैं। ये तीन व्यूह संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न (वासुदेव का पुत्र) और अनिरुद्ध (वासुदेव का पौत्र) हैं। इनके ऊपर वासुदेव कृष्ण हैं। ये चार व्यूहों से 16 उपव्यूह फिर 4 विद्येश्वर बनते हैं। ये सब मिलकर वासुदेव की 24 मूर्तियाँ होती हैं। इसके बाद भगवान अपने आप को प्रकृति के विविध रूपों में प्रकट करते हैं।  ये इनके विभव है। यही अवतार है। विभव अवतार भी कहे जाते हैं। घोसुंडी (उदयपुर, राजस्थान) से दूसरी ई.पू. का अभिलेख प्राप्त हुआ। ज्ञात है नारायण की पूजा के लिए बने एक अहाते में सकर्षण और वासुदेव उपासना के लिए भी अहाता बना हुआ है। इसका निर्माण पराशरी का पुत्र गजायान ने करवाया था। एक पंचाल राजा विष्णुमित्र का एक सिक्का प्राप्त हुआ, जिस पर चार हाथों वाला ईश्वर का चित्र है जिनके बाँये हाथ में एक चक्र है। उसी तरह कुषाण काल की एक मुहर प्राप्त होती है जिस पर ऐसी तस्वीर मिली है, जिसके एक हाथ में शंख, दूसरे हाथ में चक्र, तीसरे में गदा और चौथे हाथ में रिंग की तरह कोई चीज है। कनिघम ने इस सिक्के को हुविष्क से संबंद्ध माना है। प्रथम शताब्दी के मथुरा के मोरा नामक जगह से एक अभिलेख मिला है। इस अभिलेख में पाँच वृष्णि नायकों का वर्णन है। वायु पुराण में कहा गया है कि वासुदेव (वासुदेव-देवकी का पुत्र)। संकर्षण (रोहिणी से वसुदेव का पुत्र) प्रद्युम्न (रुक्मणी से वासुदेव का पुत्र) शम्ब (जाम्बती से वासुदेव का पुत्र) थे। भागवत एवं पाँचरात्र संप्रदाय ने ही ब्राह्मण धर्म में मूर्तिपूजा को प्रोत्साहित किया। उत्तर मध्य काल में राधा-कृष्ण के साथ जुड़ गये। शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित मत्स्य कच्छप तथा वराह के स्वरूप को विष्णु से संबंधित कर दिया गया। गुप्तयुग में अवतारवाद की अवधारणा प्रचलित हो गई। सबसे पहले भागवत गीता में अवतारवाद के सिद्धांत का व्यापक निरूपण किया गया है। अहीरबधन्य संहिता में 39 अवतारों की चर्चा है। इनमें शान्तोत्मा, बुद्ध का परिचायक है परन्तु आमतौर पर 10 अवतारों की चर्चा मिलती है- 1. मत्स्य, 2. क्रुर्म, 3. बराह, 4. नरसिंह, 5. वामन, 6. परशुराम, 7. राम, 8. कृष्ण, 9. बुद्ध, 10. कल्कि- आने वाला अवतार (विष्णु के) हैं।

कश्मीरी लेखक क्षेमेन्द्र की (1050 ई.) दशावतारचरित में बुद्ध को अवतार माना गया है। जयदेव अपने गीत गोविन्द में लिखते हैं कि विष्णु पशुओं के प्रति करूणा का भाव रखने के कारण बुद्ध के नजदीक आ गए। वैष्णववादी अवधारणा के विकास के दूसरे चरण में विष्णु की पत्नी के रूप में भी श्री या लक्ष्मी की पहचान हुई। स्कंदगुप्त के समय लक्ष्मी विष्णु से जुड़ गई। कुछ अभिलेखों में उसे वैष्णवी कहा गया है। वैष्णव धर्म में ईश्वर को प्राप्त करने की तीन विधियां हैं- ज्ञान, कर्म और भक्ति। इनमें सर्वाधिक महत्त्व भक्ति को दिया गया है। वैष्णव धर्म में तप और धार्मिक अनुष्ठान के बदले ईश्वर की कृपा पर अधिक बल दिया गया है। भक्ति का अभिप्राय सभी इच्छाओं और कमों को भगवान को अर्पित कर देना है। ज्ञान का संबंध भक्ति से जोड़ दिया गया। दूसरी तरफ कर्म के महत्त्व पर भी बल दिया गया, ऐसा माना गया कि निष्क्रियता नहीं, वरन् सच्चे कर्म से भगवान प्रसन्न होते हैं। दुर्गा, कार्तिकेय एवं गणेश जैसे देवी-देवताओं के उदय के साथ संकर्षण ने अपना महत्त्व खो दिया। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध को विष्णु के 4 मुखों के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उन्हें क्रमश: विष्णु के बल, ज्ञान, ऐश्वर्य और शक्ति का प्रतिनिधि माना गया है। भागवत एवं वैष्णव संप्रदाय में अहिंसा पर बल दिया गया है। भागवत धर्म का महत्त्वपूर्ण स्रोत निम्न है- महाभारत, भागवद्गीता, भगवतपुराण, नारदसूत्र, शाण्डिल्यसूत्र। भागवत अथवा वैष्णव धर्म का चरमोत्कर्ष गुप्त राजाओं के शासन-काल (319-550 ई.) में हुआ। गुप्त नरेश, स्वत: वैष्णव, मतानुयायी थे। अधिकांश शासकों ने परम भागवत की उपाधि धारण कर रखी थी। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के सिक्के पर परमभागवत खुदा हुआ है। चन्द्रगुप्त और समुद्रगुप्त के सिक्के पर विष्णु के वाहन गरूड़ की प्रतिमा बनी हुई है। स्कंदगुप्त के भीतरी स्तंभलेख में वासुदेव कृष्ण की मूर्ति का उल्लेख है। स्कंदगुप्त के जूनागढ़ तथा बुद्धगुप्त के एरण अभिलख विष्णु की स्तुति से प्रारंभ होते है। देशागढ़ का दशावतार मंदिर, गुप्तकाल में वैष्णव धर्म से सम्बंधित सबसे महत्वपूर्ण मन्दिर है।

शैव धर्म- ऋग्वेद में शिव के लिए रूद्र नाम आया है। स्कंदगुप्त के बैल के आकार का सिक्का प्राप्त हुआ है। कालिदास के रघुवंश में शिव की स्तुति है। कालिदास की रचनाओं में काशी के विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल मंदिर की चर्चा है। लिंग पूजा का प्रथम वर्णन मत्स्य पुराण में मिलता है। उत्तर में मांऊट कैलाश और द. में चिदरम्बम् एवं तिल्लई शिव का स्थान माना गया है। कुमारगुप्त के समय शिव के साथ पार्वती भी जुड़ गई। कुमारगुप्त प्रथम के सिक्के पर मयूर पर बैठे कार्तिकेय की आकृति है। मानव आकार में शिव की मूर्ति कोसम से प्राप्त होती है। वामन पुराण के अनुसार शैव धर्म से जुड़े हुए गुप्त काल में चार उपसंप्रदाय हुए- (1) शैव धर्म (2) पाशुपत धर्म (3) कापालिक धर्म (4) कालामुख धर्म। पाशुपत धर्म सबसे प्राचीन था। इसके संस्थापक लकुलीश थे। पाशुपत धर्म के अनुयायी पांचर्थिक कहलाते थे। कापालिक संप्रदाय के इष्टदेव भैरव थे। इन्हें शिव का अवतार माना गया। इनके उपासक क्रोधी स्वभाव के थे। इनका प्रमुख केन्द्र श्रीशैल था। इसका प्रमाण भवभूति के मालती माधव से मिलता है। कापालिक संप्रदाय के लोग भी अतिवादी विचारधारा के थे। शिवपुराण में इन्हें महाव्रतधर कहा गया है। इस संप्रदाय के लोग नर ककाल में भोजन करते थे और चिता की भस्म शरीर पर मलते थे।

शिव के विभिन्न रूपों में दक्षिण की मूर्ति भी प्रचलित थी। इसमें शिव को सार्वभौमिक शिक्षक के रूप में दिखाया गया है। दक्षिण में शिव की पत्नी के रूप में मीनाक्षी को दिखाया गया है।

पूजा या सौर सम्प्रदाय- हिन्दू समाज में सूर्य पूजा की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। ऋग्वेद में सूर्य के लिए सविता शब्द का प्रयेाग हुआ है। गुप्त काल में सूर्य पूजा का प्रचलन था। इस तथ्य के अनेक साक्ष्य उपलब्ध है। महाकवि

कालिदास के ‘रघुवंश’ में सूर्य के सात हरे अश्वों का उल्लेख है। गुप्त सम्राट् कुमारगुप्त के शासन-काल में रेशम बुनने वालों के एक संघ ने मंदसौर के निकट दशपुर में एक सूर्यमन्दिर का निर्माण कराया था। उस युग की अनेक सूर्य-प्रतिभाएँ मिली हैं। सूर्य पूजा की परम्परा परवर्ती युग में भी चलती रही और आज भी किसी न किसी रूप में वह प्रचलित है।

मध्यभारत एवं कश्मीर में कुछ उदारवादी शैव संप्रदाय भी विकसित हुए। कश्मीरी शैव सिद्धान्त को तीन शाखाएँ हैं- आगम शास्त्र, स्पन्दन शास्त्र और प्रत्यभिज्ञा शास्त्र प्रत्यभिज्ञा उपसंप्रदाय के संस्थापक वसुगुप्त थे और स्पंदशास्त्र उपसंप्रदाय का संस्थापक कलात् और सोमानंद थे। मध्य भारत और दक्कन में मत्तामयूर नामक उपसंप्रदाय विकसित हुआ। कलचूरि, चेदी शासकों के समय यह उत्थान पर था। आगे चलकर कई अन्य उपसंप्रदाय भी विकसित हुए। आगमन्त संप्रदाय के संस्थापक- अघोर शिवाचार्य थे। शुद्ध शैव-सं. श्रीकांत शिवाचार्य ने इसका प्रतिपादन किया। वीर शैव सम्प्रदाय का उद्भव दक्षिण भारत में हुआ। बसव पुराण के अनुसार इस सम्प्रदाय का प्रवर्त्तन अल्लभ प्रभु और उनके शिष्य वसव (या वसवण्ण) थे। वसव एक ब्राह्मण थे, वे कलचुरी शासक विजय के एक मंत्री थे। मत्स्येन्द्रनाथ (मछेन्द्रनाथ) ने नाथप की स्थापना की। यह भी शैव धर्म का ही एक उपसंप्रदाय था। शैव एवं वैष्णव मत दोनों ईश्वरवादी एवं एकेश्वरवादी थे। जहाँ वैष्णव मत व्यक्ति के मानवीय एवं भावनात्मक पक्ष को छूता था वहीं शैव, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक विचारधारा पर अत्यधिक बल देता था।

दक्षिण में शासन करने वाले चालुक्यराष्ट्रकूटपल्लवचोल आदि राजवंशों के समय में शैव धर्म की उन्नति हुई तथा शिव के अनेक मन्दिर और मूर्तियाँ बनाई गई। पल्लव काल में शैव धर्म का प्रचार-प्रसार नायनारों द्वारा किया गय। नायनार सन्तों की संख्या 63 बताई गई है। जिनमें अप्पार तिरुज्ञान सम्बन्दर, सुन्दरमूर्ति, मणिक्य वाचगर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इनके भक्ति गीतों को देवारय में संकलित किया गया है।

शक्ति उपासना (शाक्त धर्म)- गुप्त काल में शक्ति पूजा प्रचलित थी, कुमारगुप्त के गंगाधर अभिलेख में शक्ति पूजा का उल्लेख है। मार्कण्डेय पुराण में देवी की स्तुति है। वृहत् संहिता में भी देवी पूजा का उल्लेख है। गुर्जर प्रतिहार शासक देवी के उपासक थे और अपने को परमभगवति भक्त कहते थे। आगे भक्ति आंदोलन के उदय के साथ देवी पूजा का महत्त्व घटता गया, फिर भी वह बंगाल और असम में लोकप्रिय रहा। निम्नलिखित रूप में देवी की पूजा होती थी- (1) पार्वती (हिमालय की पुत्री) (2) गौरी (3) अन्नपूर्णा (4) माता (तमिल में अम्मई) 5. दुर्गा (6) काली (7) चण्डी (8) कोराबाई। इन्द्र की सवारी ऐरावत मानी जाती थी। वे नीचे के स्वर्ग अमरावती में विद्यमान थे। वे पूर्वी भाग के स्वामी थे। वे शक्र के नाम से भी जाने जाते थे।

वरुण- वे पश्चिमी भाग के स्वामी थे। बाद में तमिल क्षेत्र में मछुवारे के देवता हो गए और उन्हें वरूण कहा जाने लगा। उनके प्रतीक के रूप में शार्क मछली के सींग की पूजा की जाने लगी।

यम- ये दक्षिणी भाग के स्वामी थे। कुबेर वैश्रवण के नाम से जाने जाते थे और वे उत्तरी भाग के स्वामी थे। ये चारों देवता मिलकर लोकपाल कहलाये।

षड्दर्शन- (भौतिक दर्शन)

न्याय- न्याय दर्शन तर्क और ज्ञान पर आधारित है। इसकी उत्पत्ति अक्षपाद गौतम के सूत्रों से हुई।

वैशेषिक- यह न्याय दर्शन का पूरक है और संभवत: उससे पुराना भी है। यह एक प्रकार का परमाणु दर्शन है, जो भौतिक विज्ञान से संबद्ध है। इसका प्रवर्तक उलूक कणाद है। इसका व्याख्याता प्रशस्तपाद है।

सांख्य- इसमें 25 मूल सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। इसमें प्रकृति एवं पुरुष के ध्रुवीकरण पर बल दिया गया है। इसके प्रवर्तक कपिल हैं। कृष्ण द्वारा प्रतिपादित सांख्यकारिका इसका सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसमें प्रकृति की व्याख्या के क्रम में रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण पर बल दिया गया है। इस पर जैन धर्म का प्रभाव सबसे अधिक है।

योग- यह शरीर विज्ञान से संबंधित है। इसका आधार पतंजलि का योगसूत्र है। बाद में व्यास द्वारा इसमें संशोधन और परिमार्जन किया गया।

पूर्व मीमांसा (मीमांसा)- मीमांसा द्वारा वेदों को प्रतिष्ठित करने का कार्य किया गया। इसमें अनुष्ठान कायों पर विशेष बल दिया गया। मंत्रों के महत्त्व को स्पष्ट किया गया। छठी सदी ई.पू. का जैमिनी सूत्र इससे संबंधित प्राचीनतम ग्रन्थ है। इससे संबंधित सबसे महत्त्वपूर्ण आचार्य शबरस्वामिन है।

उत्तर मीमांसा (वेदांत)- ई. सन् के प्रारंभ में बादरायण ने इसका प्रतिपादन किया। इसका मुख्य व्याख्याता गौड़पाद है। बाद में शंकराचार्य ने उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और भागवत्गीता पर टीकाएं लिखीं, जो शंकर के वेदांत के नाम से जानी जाती हैं।

बौद्ध धर्म- गुप्तकाल से पूर्व युग में बौद्ध धर्म व दर्शन का प्रचार बड़े पैमाने पर हुआ था। गुप्त युग में बौद्ध धर्म वह स्थान प्राप्त न कर सका जो कि अशोक व कनिष्क के समय प्राप्त था। गुप्त शासकों की धार्मिक सहिष्णुता की नीति के कारण ब्राह्मण धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म का भी विकास हुआ। बौद्ध धर्म के दोनों सम्प्रदाय हीनयान व महायान गुप्तकाल में विकसित होते रहे। प्रारंभिक गुप्त शासकों का झुकाव वैष्णव धर्म की ओर अधिक था लेकिन परवर्ती गुप्त शासकों का बौद्ध धर्म की ओर।

इत्सिंग के विवरण से स्पष्ट होता है कि गुप्त वंश के आदि पुरुष श्री गुप्त ने मृगशिखापत्तन (सारनाथ) में एक बौद्ध मंदिर बनवाया था। चीनी यात्री ने यह भी लिखा है कि सिंह नरेश मेघवर्ण के अनुरोध पर समुद्रगुप्त ने बोधगया में बौद्ध विहार बनाने की अनुमति प्रदान की थी। कुमारगुप्त व स्कंदगुप्त ने भी बहुत से संघारामों का निर्माण करवाया। यह आश्चर्यजनक लगता है कि बौद्ध धर्म को गुप्त काल में मौर्य काल की तुलना में राज्याश्रय प्राप्त नहीं हुआ। तब भी बौद्ध धर्म और बौद्ध साहित्य स्वाभाविक रूप से संवर्धित होता रहा। पी.एल. गुप्त के अनुसार बौद्ध धर्म को गुप्त सम्राटों को प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष संरक्षण अवश्य प्राप्त था। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समकालीन चीनी यात्री फाह्यान के विवरण से भी स्पष्ट है कि उसके समय बौद्ध धर्म विकसित अवस्था में था। बुद्धगुप्त के काल में तो बौद्ध धर्म का विकास राजधर्म के रूप में हुआ। ह्वेनसांग के विवरण से उसका बौद्ध होना प्रमाणित होता है। इसका उत्तराधिकारी वैन्यगुप्त शिव का उपासक होते हुए भी बौद्ध धर्म के प्रति सहानुभूति रखता था। उसने बौद्ध विहार के लिए गाँव दान में दिया था।

तत्कालीन अभिलेखों, स्मारकों, मूर्तियों से भी गुप्तकाल में बौद्ध धर्म के विकास के प्रमाण मिलते हैं। अभिलेखों में उन स्थानों का उल्लेख है जो बौद्ध धर्म के विकास के प्रमाण मिलते हैं। अभिलेखों में उन स्थानों का उल्लेख है जो बौद्ध धर्म के केंद्र थे। गुप्त युग में मथुरा, सांची, बोधगया, कुशीनगर आदि शहर बौद्ध गतिविधियों के केंद्र थे। अभिलेखों में बहुत सारे बौद्ध विहारों के अस्तित्व की ओर भी संकेत मिलता है। बहुत बड़ी संख्या में बुद्धमूर्तियों के प्राप्त होने से स्पष्ट है की बौद्ध धर्म को प्रसिद्धि मिल चुकी थी। फाह्यान ने अपने यात्रा-विवरण में लिखा है मथुरा में तीन सहस्र भिक्षु रहते थे। कन्नौज, वाराणसी आदि नगरों में भी उसने बौद्ध भिक्षुओं को देखा था। फाह्यान यह भी लिखता है की इस काल में साकेत, श्रावस्ती, कोशल, कपिलवस्तु आदि का महत्त्व बौद्ध धर्म की दृष्टि से घट गया था। कश्मीर, पंजाब और अफगान में बौद्ध धर्म का अधिक प्रचार था। नालंदा बौद्ध विहार, बौद्ध धर्म और विद्या का केंद्र था। नालंदा विश्वविद्यालय को गुप्त सम्राटों द्वारा अनुदान प्राप्त होता था। अजंता, एलोरा, भाजा, काले, कन्हेरी आदि स्थानों में बौद्ध गुफाओं, विहार व् चैत्यों आदि का निर्माण हुआ। ये बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थल थे। इनमें बुद्ध व् बोधिसत्व की कथाओं का सुन्दर चित्रण हुआ है।

गुप्त युग में हीनयान सम्प्रदाय की दो शाखायें थीं- थेरवाद (स्थविरवाद) और वैभाषिक (सर्वास्तिवाद)। महायान सम्प्रदाय की भी दो प्रमुख शाखायें थीं- माध्यमिक और योगाचारा गुप्तकाल में दोनों सम्प्रदायों के विहार पृथक-पृथक थे। पाँचवीं शताब्दी में बुद्धघोष ने विसुद्धिमग की रचना की। यह गया का निवासी था एवं वर्ण से ब्राह्मण था। विसुद्धिमग में शील, समाधि और प्रज्ञा को निर्वाण प्राप्ति का साधन बताया गया है। बुद्धघोष ने त्रिपिटक के बहुत से अंशों पर महत्त्वपूर्ण टीकायें लिखी हैं। बौद्ध धर्म के प्रमुख दार्शनिक वसुबंधु और असंग इसी युग से सम्बद्ध थे। वसुबंधु के प्रसिद्ध ग्रन्थ अभिधम्मकोष में वैभाषिक शाखा के सिद्धान्तों की व्याख्या की गयी है। असंग की रचनाओं से विज्ञानवाद के नये सिद्धान्तों की जानकारी मिलती है। दिङ्नाग ने प्रमाण समुच्चय ग्रन्थ की रचना की।

गुप्तकाल में महायान धर्म का अधिक प्रचार रहा। इस काल में महायान दर्शन से संबंधित ग्रन्थों की रचना नागार्जुन, आर्यदेव, असंग, वसुबंधु और द्विङ्नाग ने की। यह दर्शन लोगों की अभिरूचि के अनुरूप था। इसमें ज्ञान के स्थान पर भक्ति पर अधिक जोर दिया गया था। बुद्ध प्रतिमा व स्तूपों की पूजा को निर्वाण का साधन माना गया था। महायान की उपशाखाओं के साहित्य की भी रचना हुई। चतुशतकवज्रच्छेदिका प्रज्ञानपारमिता, प्रज्ञापारमिता ह्रदयसूत्र, की रचना भी इसी युग में हुई। योगाचार शाखा से सम्बंधित भी कई ग्रंथों का प्रणयन हुआ।इसके संस्थापक मैत्रस्यनाथ थेजिनका काल 200 ई. के लगभग माना जा सकता है। असंग ने महायान सम्परिग्रहयोगाचार भूमिशास्त्र व महायान सूत्रालंकार नामक ग्रन्थों की रचना की। दक्षिण में भी बौद्ध धर्म के बहुत से केन्द्र थे। नागार्जुनीकोंडा का प्रसिद्ध बौद्ध विहार दक्षिण में था। काँची भी बौद्ध धर्म का प्रसिद्ध केन्द्र था। बौद्ध विहारों एवं चैत्यों पर हिन्दू धर्म के भक्तिवाद का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। पौराणिक अवतारवाद की भाँति अन्तर्गत भी अवतारवाद की धारणा का विकास हुआ। बुद्ध की निर्माण किया जाने लगा। गुप्तकाल के अंतिम चरण में बौद्ध धर्म तंत्रवाद का विकास होने लगा था।

जैन धर्म- गुप्तकाल में ब्राह्मण व बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म का भी विकास हुआ। गुप्तकालीन साहित्यिक व पुरातात्विक साक्ष्यों से भी जैन धर्म के अस्तित्व का बोध होता है। यद्यपि तुलनात्मक दृष्टि से इसका विकास कम था। जैन धर्म भारत के उत्तरी व पश्चिमी भाग में फैला था। दक्षिण भारत में भी इसके अस्तित्व के परमन मिलते हैं। जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या ब्राह्मण धर्म व बौद्ध धर्म के अनुयायियों से कम थी। मथुरा, वल्लभी, विदिशा, पुंड्रवर्द्धन आदि जैन धर्म के प्रमुख केन्द्र थे। वल्लभी में जैन धर्म की सभा का आयोजन किया गया था। कुषाण और गुप्त काल के जैन तीर्थंकरों की कांस्य प्रतिमाएँ चौसा (बिहार) से प्राप्त हुई हैं। बुद्धगुप्त का एक ताम्रलेख पहाड़पुर (पूर्वी बंगाल) से प्राप्त हुआ है जिसमें एक जैन विहार के निर्माण का उल्लेख है। विहार में अतिथि शाला के निर्माण के लिए एक ब्राह्मण द्वारा दान दिये जाने का भी उल्लेख है। कहांव के अभिलेख में उल्लेख आया है कि स्कदगुप्त के काल में मद्र नामक व्यक्ति ने जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों की स्थापना करवाई। इन जैन तीर्थकरों के नाम थे- आदिनाथ, शांतिनाथ, नेमिनाथ, पाश्र्वनाथ और महावीर। मथुरा के एक अभिलेख में हरिस्वामिनी नामक एक जैन महिला द्वारा किसी जैन मंदिर को दान देने का उल्लेख है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समकालीन चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा विवरण सेभी जन मंदिरों के अस्तित्व का बोध होता है।

313 ई. में मथुरा में द्वितीय संगति हुई और 453 ई. में वल्लभी में तृतीय संगति संपन्न हुई। वल्लभी संगति की अध्यक्षता देवार्धिक्षमाश्रमण ने की। मुनि सर्वनन्दी ने लोक विभग नामक ग्रंथ की रचना की। आचार्य सिद्धसेन ने न्यायावतार की रचना की। कुमारगुप्त के उदयगिरी अभिलेख से ज्ञात होता है कि शांकर नामक एक व्यक्ति ने पार्श्वनाथ की मूर्ति स्थापित की थी।

गुप्त काल में विज्ञान

गुप्त काल में विज्ञान के विकास का पता चलता है। गुप्तकालीन विज्ञान के अंतर्गत मुख्यत: गणित, ज्योतिष और आयुर्वेद का विकास हुआ। आर्यभट्टवराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त गुप्तकालीन वैज्ञानिक हैं जिन्होंने अपने ग्रन्थों में विज्ञान की विवेचना की। आर्यभट्ट का प्रसिद्ध ग्रन्थ आर्यभट्टीयम् है। उसने गणित को अन्य विषयों से मुक्त कर स्वतंत्र रूप दिया। उसके अन्य ग्रन्थ दशगीतिक सूत्र और आर्याष्टशतक हैं। आर्यभट्ट ने पृथ्वी को गोल बताया और उसकी परिधि का अनुमान किया। इस प्रकार आर्यभट्ट विश्व के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यह स्थापित किया कि पृथ्वी गोल है। आर्यभट्ट ने ग्रहण का राहु-ग्रास वाला जन विश्वास गलत सिद्ध कर दिया। उसके अनुसार चन्द्र ग्रहण चन्द्रमा और सूर्य के मध्य पृथ्वी के जाने और उसकी चन्द्रमा पर छाया पड़ने के कारण लगता है। उसकी इन धारणाओं का वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त ने खंडन किया। आर्यभट्ट ने दशमलव प्रणाली की भी विवेचना की। आर्यभट्ट का शून्य, तथा दशमलव सिद्धान्त सर्वथा नयी देन थी। संसार के गणित इतिहास में आर्यभट्ट का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसने वर्षमान निकाला जो कि टालेमी द्वारा निकाले हुए काल से अधिक वैज्ञानिक है।

आर्यभट्ट के बाद दूसरा प्रसिद्ध गुप्तकालीन गणितज्ञ एवं ज्योतिषी वराहमिहिर है। उसने यूनानी और भारतीय ज्योतिष का समन्वय करके रोमक तथा पोलिश के नाम से नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जिससे भारतीय ज्योतिष का महत्त्व बढ़ा। उसके छ: ग्रन्थ उल्लेखनीय हैं- पंथ सिद्धान्तिका, विवाहपटल, योगमाया, बृहत्संहिता, वृहज्जातक और लघुजातक। पंचसिद्धांतिका में पाँच प्राचीन सिद्धान्तों (पैताभट्ट सिद्धान्त, वशिष्ट सिद्धान्त, सूर्य सिद्धान्त, पौलिश सिद्धान्त तथा रोमक सिद्धान्त) को बताया गया है। वराहमिहिर ने ज्योतिष शास्त्र को तीन शाखाओं में विभाजित किया- तंत्र (गणित और ज्योतिष), होरा (जन्मपत्र) और संहिता (फलित ज्योतिष)। वराहमिहिर के बृहज्जातक को विज्ञान और कला का विश्वकोश माना गया है। वराहमिहिर के पुत्र पृथुयश ने भी फलित ज्योतिष पर षट्पञ्चशिका ग्रन्थ की रचना की। इस पर भट्टोत्पल ने टीका लिखी। आचार्य कल्याण वर्मा भी प्रमुख ज्योतिषाचार्य थे जिनका काल 600 ई. के लगभग माना गया है। इन्होंने यवन-होराशास्त्र के संकलन के रूप में सारावली नामक ग्रन्थ की रचना की।

ब्रह्मगुप्त भी गुप्तकालीन गणितज्ञ थे जिन्हें गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त का जनक माना गया है। इनका समय 598 ई. था। इन्होंने ब्रह्मस्फुटसिद्धांत नामक ग्रन्थ की रचना की। ब्रह्मगुप्त ने बाद में खंडखाद्य और ध्यानग्रह की रचना की। उन्होंने न्यूटन से बहुत सी शताब्दियों पहले यह घोषित कर दिया था कि प्रकृति के नियमानुसार सारी वस्तुएँ पृथ्वी पर गिरती हैं क्योंकि पृथ्वी का स्वभाव सभी को अपनी ओर आकृष्ट करना है। कुडरंग, नि:शंकु और लाटदेव अन्य गुप्त-कालीन ज्योतिषी हैं। लाटदेव ने रोमक सिद्धान्त की व्याख्या की थी।

आयुर्वेद यद्यपि बहुत पुराना है तथापि इस पर गुप्त काल में ग्रन्थ लिखे गये। आयुर्वेद से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण रचनाओं का प्रणयन हुआ। नालंदा विश्वविद्यालय में ज्योतिष और आयुर्वेद का अध्ययन होता था। चीनी यात्री इत्सिंग ने तत्कालीन भारत में प्रचलित आयुर्वेद की आठ शाखाओं का उल्लेख किया है। नवनीतकम् नामक ग्रन्थ भी है। इसमें प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थों का सार है। इसमें रसों, चूर्णो, तेलों आदि का वर्णन है। इसके अलावा बालकों के रोग और निदान भी इसमें मिलते हैं।

इसी दौरान पशु चिकित्सा से संबंधित कई ग्रन्थों की रचना हुई जो घोड़ों व हाथियों से संबधित थे। भारतीय चिकित्सा ज्ञान का प्रसार पश्चिम की ओर हुआ तथा पश्चिमी एशिया के चिकित्सकों ने इसमें रुचि ली। गुप्तकाल का प्रसिद्ध रसायनशास्त्री एवं धातु विज्ञान वेत्ता नागार्जुन था। यह बौद्ध आचार्य था, जिसके प्रमुख ग्रन्थ हैं- लोहशास्त्ररसरत्नाकरकक्षपुटआरोग्यमजरीयोगसाररसंन्द्रमगलरतिशास्त्ररसकच्छा पुट और सिद्धनागार्जुन। अब तक जो चिकित्सा प्रणाली थी उसका आधार काष्ठ था। नागार्जुन ने रस चिकित्सा का आविष्कार किया। उसने यह अवधारणा प्रदान की कि सोना, चाँदी, तांबा, लौह आदि खनिज धातुओं में भी रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है। पारद (पारे) की खोज उसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आविष्कार था जो रसायन और आयुर्वेद के इतिहास की एक युगान्तकारी घटना थी। वाग्भट्ट ने भी आयुर्वेद के ऊपर प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांग-हृदय की रचना की। धन्वंतरि भी आयुर्वेद का प्रसिद्ध विद्वान् था। इसे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की राजसभा का सदस्य माना गया। यह बहुमुखी व्यक्तित्व व असाधारण प्रतिभा का धनी था। धन्वंतरि को कई नामों से संबोधित किया गया है जैसे आदि देव, अमरवर, अमृतयोनि, अब्ज आदि। धन्वन्तरि को देवताओं का वैद्य कहा गया है। कहा जाता है कि धन्वंतरि समुद्र मंथन के फलस्वरूप अमृत हाथ में लिये हुए समुद्र से निकले थे। कुछ विद्वान् यह मानते हैं कि सुश्रुत संहिता के उत्तरवर्ती भाग की रचना किसी और लेखक ने की थी। नागार्जुन को भी इसका श्रेय दिया जा सकता है।

प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों ने अश्व, गज, गौ, मृग, शेर, भालू, गरुड़, हंस, बाज आदि से संबंधित विस्तृत अध्ययन किया। विभिन्न ग्रन्थों में इनका विवरण उपलब्ध है। पालकाप्य कृत गजचिकित्सा, बृहस्पति कृत गजलक्षण आदि ग्रन्थ पशु-चिकित्सा पर हैं। वाग्भट्ट भी गुप्तकालीन रसायन-शास्त्री था जिसका ग्रन्थ रसरत्न समुच्चय भी उल्लेखनीय है।

गुप्त काल में साहित्य

गुप्तकाल में ही अधिकांश पुराणों का संकलन हुआ। प्रारम्भ में पुराण रचना से चारण लोग जुड़े हुए थे। उन चारणों में लोमहर्ष और उसके पुत्र उग्रसर्व प्रमुख हैं। अधिकांश पुराणों से वे जुड़े हुए थे, किन्तु आगे चलकर पुराण रचना का कार्य ब्राह्मणों के हाथों में चला गया।

गुप्त काल में संस्कृत भाषा और साहित्य का अप्रतिम विकास हुआ। संस्कृत का प्रयोग शिलालेख, स्तम्भलेख, दान-पत्र लेख आदि में हुआ। इसी भाषा में इस युग के महान् कवियों और साहित्यकारों ने अपनी अनेक कालजयी रचनाओं का प्रणयन किया।

इस काल में एक ओर प्रतिभाशाली सम्राट् हुए, तो दूसरी ओर कवि, गद्यकार, वैज्ञानिक एवं नाट्य ग्रन्थों के प्रणेता भी आविर्भूत हुए। गुप्तकालीन साहित्य को निम्नांकित कोटियों में विभाजित किया जा सकता है प्रशस्तियाँ, काव्यग्रन्थ, नाटक, नीतिग्रन्थ, स्मृतिग्रन्थ, कोश, व्याकरण, दर्शनग्रन्थ और विज्ञान।

प्रशस्तियाँ- गुप्त सम्राटों की उपलब्धियाँ शिलाओं, स्तम्भों तथा सिक्कों से विदित होती हैं। हरिषेण ने प्रयाग प्रशस्ति की रचना की। इसमें समुद्रगुप्त की उपलब्धियों का वर्णन है। हरिषेण की शैली आलंकारिक थी। उसने गद्य-पद्य दोनों को अपनाया है। इस अभिलेख की कई पंक्तियाँ खंडित हो चुकी हैं। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का परराष्ट्र मंत्री वीरसेन भी कवि था। इसने उदयगिरी के शैवलेख की रचना की थी। गिरनार पर्वत और भीतरी स्तंभ पर स्कंदगुप्त की विजय और उपलब्धियाँ अंकित हैं। मंदसौर का सूर्य मंदिर अभिलेख कुमारगुप्त द्वितीय के शासनकाल का है। इसकी रचना वत्सभट्टि ने की थीं। वेदभी रीति में निबद्ध यह शैली कहीं-कहीं कालिदास की शैली का स्मरण कराती है। अभिलेख के प्रारंभिक भाग में लाट प्रदेश (दक्षिणी गुजरात) की प्राकृतिक छटा का निरूपण है। इसमें मालवा के दशपुर नगर का भी सजीव चित्रण मिलता है। वत्सभट्टि द्वारा इस नगर में निवास करने वाली पट्टवाय श्रेणी (बुनकर समिति) के आदेश के कारण इस प्रशस्ति का निर्माण किया गया। वासुल ने मंदसौर नरेश यशोवर्मन की उपलब्धियों का वर्णन मन्दसौर के स्तम्भ लेख में किया है। इस प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि यशोवर्मन जो प्रारम्भ में गुप्तों का सामन्त था, ने अपनी शक्ति में अभिवृद्धि कर ली थी और स्वतंत्र शासक बन गया था। काव्यमय शैली सिर्फ अभिलेखों में ही दिखाई नहीं देती वरन् सिक्कों पर भी देखी जाती है।

काव्यग्रन्थ और नाटक- संस्कृत साहित्य में ही नहीं, अपितु समस्त भारतीय साहित्य में कालिदास का सर्वाधिक महत्त्व है। कालिदास के स्थान, काल एवं वंश की जानकारी नहीं मिलती लेकिन उसकी रचनाओं को विद्वानों ने भास के बाद की रचना माना है। उसने सम्भवत: अपनी कृतियों का सृजन चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) की राजधानी (उज्जैन) में किया होगा। कालिदास का उज्जैन के प्रति लगाव यह सूचित करता है कि चन्द्रगुप्त के संरक्षण में उन्होंने अपना काफी समय व्यतीत किया था। कालिदास एक कवि और नाटककार दोनों दृष्टियों से सफल और बेजोड़ हैं। कालिदास के चार काव्य (ऋतुसंहार, मेघदूत, कुमारसंभव एवं रघुवंश) तथा तीन नाटक (मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीय, अभिज्ञानशकुन्तलम्) अब तक प्राप्त हुए हैं। ऋतुसंहार उनकी प्रथम रचना लगती है जिसे उन्होंने यौवनावस्था में लिखा होगा। कुछ विद्वान् ऋतुसंहार को अत्यन्त सामान्य और नैतिक गुणों से रहित रचना मानते हैं। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि युवावस्था एवं प्रौढ़ावस्था की रचनाओं में अन्तर होना स्वाभाविक था। पाश्चात्य साहित्यकार जैसे वर्जिल, गेटे, टेनिसन की रचनाओं में यह बात देखी जाती है। इससे छ: ऋतुओं का वर्णन मिलता है और कवि ने इसके द्वारा प्रकृति का श्रृंगारिक, सहज एवं स्वाभाविक वर्णन किया है। सम्पूर्ण काल में युवक-युवतियों के प्रेम के साथ, ऋतुओं के परिवर्तन के सम्बन्धों को दर्शाया गया है।

मेघदूत- एक गीतिकाव्य है, जो अपनी कोटि की सर्वोत्तम रचना मानी जाती है। यह कालिदास की काव्य कला का सुन्दर उदाहरण है, जिसमें प्रकृति के सौंदर्य का भी चित्रण किया गया है। हिमालय की सुन्दर छटा व बसन्त ऋतु का वर्णन मिलता है। ऋतुसंहार की तुलना में मेघदूत निसन्देह प्रौढ़कालीन रचना है। कर्त्तव्य से च्युत होने पर स्वामी (शिव) द्वारा एक वर्ष के लिए निर्वासित यक्ष को वर्षा काल में अपनी पत्नी का स्मरण आता है और वह जाते हुए मेघ से अपनी भार्या के पास समाचार ले जाने का अनुरोध करता है। कुमारसंभव के बारे में इतिहासकार अनुमान लगाते हैं कि इसका प्रणयन संभवत: कुमारगुप्त के जन्म के अवसर पर हुआ था। कुमारसंभव में 17 सर्ग हैं जिनमें शिवपार्वती के विवाह, कार्तिकेय के जन्म तथा उसके द्वारा तारकासुर के वध की कथा का वर्णन है।

रघुवंश- कालिदास का सर्वोत्तम महाकाव्य है जिसमें इक्ष्वाकुवंशीय राजाओं का वर्णन है। इसमें 19 सर्ग हैं-राजा दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम के वंशजों के चरित्र का वर्णन किया गया है। रघुवंश में सभी प्रधान रसों (शांत, वीर, श्रृंगार आदि) का समावेश है। मालविकाग्निमित्रम् को ऐतिहासिक नाटक कहा जा सकता है। इसमें शुंगवंशीय राजा अग्निमित्र तथा मालविका की प्रेम कथा का वर्णन है। प्रसंगवंश पुष्यमित्र शुंग के यवन युद्ध एवं उर्वशी की प्रणय कथा का वर्णन मिलता है। अभिज्ञानशाकुन्तलम् समस्त संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट नाटक है। समस्त संस्कृत साहित्य ही नहीं, यदि इसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ रचना कहा जाय तो असंगत न होगा। इस प्रसंग में एक विद्वान् के यह विचार उल्लेखनीय हैं कि काव्य में नाटक मनोरम होते हैं और नाटकों में सर्वाधिक मनोरम अभिज्ञानशकुन्तलम् है। इसमें सात अंक हैं जिनमें दुष्यंत व शकुन्तला की प्रणय कथा का चित्रण है। इसमें प्रेम, करुणा, सहिष्णुता जैसे मानवीय गुणों पर अधिक जोर दिया गया है। कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि कालिदास ने कुन्तलेश्वर दौत्य नामक ग्रन्थ की भी रचना की। परन्तु दुर्भाग्यवश इसकी कोई भी कृति अभी प्राप्त नहीं हुई है। यह भी कहा गया है कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने कालिदास को अपने नाती प्रवरसेन द्वितीय का शिक्षक नियुक्त किया था। इसी वाकाटक नरेश ने सेतुबंध की रचना की। भास संस्कृत नाट्य परम्परा के प्रथम नाटककार हैं। भास के रचना-काल के विषय में मत-भेद है किन्तु अधिकांश विद्वान् उन्हें इसी युग से सम्बन्धित मानते हैं। स्वप्नवासवदत्ता भास की अनुपम रचना है। इसके अतिरिक्त प्रतिभा नाटक, पञ्चरात्र,  प्रतिज्ञा सौगंधरायण उसकी अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। महा महोपाध्याय गणपति शास्त्री ने 1912 में भास के 12 नाटकों का प्रकाशन किया था। शूद्रक का मृच्छकटिकम् भी गुप्त युग का प्रमुख नाटक है। इसका नायक चारूदत्त एक युवा ब्राह्मण है जो सार्थवाह है और उज्जैयनी की वेश्या बसन्तसेना पर आसक्त है। इस नाटक में समकालीन समाज एवं संस्कृति का यथार्थ चित्रण मिलता है। इस ग्रन्थ में तत्कालीन न्यायिक प्रक्रिया का भी चित्रण हुआ है। शूद्रक की लेखनी यथार्थवादी व चित्रात्मक है। उसने राज, किया है। मुद्राराक्षस व देवीचन्द्रगुप्तम् का लेखक विशाखदत्त भी गुप्तकाल से सम्बद्ध है। इसे चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन माना गया है। देवीचन्द्रगुप्तम की मूल पांडुलिपि उपलब्ध नहीं हुई है। इसके कुछ अंश नाट्य दर्पण में व श्रृंगारप्रकाश में मिलते हैं। इसमें रामगुप्त नामक गुप्त नरेश का शक शासक द्वारा पराजित होना, अपनी पत्नी ध्रुवस्वामिनी को समर्पित करने के लिए बाध्य होना, चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा शकराज की हत्या करना, रामगुप्त का वध कर ध्रुवदेवी के साथ विवाह आदि घटनाओं का वर्णन मिलता है। इस प्रकार देवीचन्द्रगुप्त एक ऐतिहासिक नाटक है। मुद्राराक्षस   भी ऐतिहासिक नाटक है। इसमें चाणक्य का कूटनीतिक कौशल दिखाई देता है।

स्मृति ग्रन्थ- गुप्त काल में मनुस्मृति के आधार पर बाद की प्रमुख स्मृतियों (याज्ञवल्क्य, नारद, बृहस्पति और कात्यायन) का निर्माण हुआ। यद्यपि इन स्मृतियों का काल निर्धारण कठिन है, फिर भी अधिकतर इतिहासकारों की यही मान्यता है कि इनको इसी काल में लेखबद्ध किया गया। मनुस्मृति का महत्त्व स्मृति साहित्य में सर्वाधिक है। अन्य स्मृतियों की रचना इसी को आधार बनाकर की गई। याज्ञवल्क्य स्मृति का महत्त्व व्यवहारिक दृष्टि से अधिक है। इसमें कहीं कहीं मनुस्मृति से साम्य और कहीं-कहीं विरोध भी मिलता है। मनु के समय की सामाजिक अवस्था में इस समय तक काफी परिवर्तन आ गये थे। इन परिवर्तनों को पुन: संगठित रूप प्रदान करने के लिए याज्ञवल्क्य स्मृति का प्रणयन किया गया। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्म, वर्ण, आश्रम, विधि, समाज, प्रायश्चित, राज्यशास्त्र भ्रूण विज्ञान आदि सभी पक्षों से संबंधित विवरण मिलता है। इस ग्रन्थ की वैज्ञानिकता व पक्षपात रहित दृष्टिकोण के कारण इस ग्रन्थ को संपूर्ण भारत में मान्यता प्राप्त हुई। हिन्दू विधि का दायभाग तो आज भी इसकी प्रमुख टीका मिताक्षरा पर आधारित है। नारद, बृहस्पति व कात्यायन की स्मृतियों में नारद स्मृति ही पूर्ण रूप से प्राप्त हुई है। इसे जाली ने संपादित किया। बृहस्पति व कात्यायन की स्मृतियाँ, स्मृतियों के टीकाकारों व निबन्धकारों के उद्धरणों के रूप में थी।

मनु व याज्ञवल्क्य की तुलना में नारद स्मृति में व्यवहार (कानूनी) व न्यायिक विचारों की प्रधानता है। व्यवहार सम्बन्धी विवरण तो पूर्णता लिए दिखता है, अन्य विषयों पर नारद ने प्रसंगवश ही विचार व्यक्त किये हैं। नारद, बृहस्पति व कात्यायन तीनों स्मृतियों में कानून के दोनों पक्षों दीवानी व फौजदारी का विवेचन किया गया है। नारद स्मृति में न्यायशासन, कचहरी का संविधान, प्रमाणों का स्वरूप, गवाह, व्यवहार के अठारह शीर्षक आदि का उल्लेख है।

बृहस्पति स्मृति की रचना चौथी शताब्दी ईसवी तक हो चुकी थी। बृहस्पति मनु व याज्ञवल्क्य से परिचित थे और उनका काल 200 ई. से 400 ई. के मध्य माना जा सकता है। बृहस्पति स्मृति को सात भागों में विभाजित आपद्धर्मकाण्ड, प्रायश्चित काण्ड। स्मृति का अधिकांश भाग व्यवहार से संबधित है। बृहस्पति ही प्रथम कानून निर्माता थे जिन्होंने दीवानी व फौजदारी मुकदमों में स्पष्ट विभाजन किया। उन्होंने मुकदमों के दो प्रकार बताए हैं- अर्थसमुद्भव या दीवानी व हिंसा समुद्भव या फौजदारी। धन सम्बन्धी मुकदमों की संख्या चौदह है और हिंसा से संबंधित मुकदमों की चार। याज्ञवल्क्य व नारद की तरह बृहस्पति ने कुल, श्रेणी, गण आदि कई प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख किया है। बृहस्पति ने चार प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख किया है-प्रतिष्ठित, अप्रतिष्ठित, मुद्रता और शासिता। न्यायिक प्रक्रिया के प्रारम्भ से अंत तक बृहस्पति इतना विस्तार से बताते हैं कि उनकी तुलना आधुनिक न्यायशास्त्री से की जा सकती है।

कात्यायन स्मृति में व्यवहार के चार अंग- धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन, न्यायभवन, सभासद, वादी, वादी को परखने के तरीके, प्रतिवादी, गाही, प्लैन्ट की विशेषता और दोष, कानून के अठारह शीर्षकों, उत्तर के विभिन्न प्रकार, दिव्य, लिखित प्रमाण आदि का उल्लेख हुआ है। कात्यायन ने स्त्री-धन के कई प्रकार बताये हैं।

नीति ग्रन्थ- गुप्त काल में कामदक ने कामन्दकीय नीतिसार की रचना की। कामंदक के राजनैतिक विचारों का आधार कौटिलीय अर्थशास्त्र है। कामंदक के ग्रन्थ से तत्कालीन राज्य व्यवस्था व प्रशासन की रूपरेखा प्राप्त होती है। हितोपदेश व पंचतंत्र की रचना भी गुप्त काल में हुई। इनमें कहानियों के माध्यम से नीति का उपदेश दिया गया है। चतत्र के लेखक विष्णु शर्मा हैं। संसार की अधिकांश भाषाओं में इस गन्थ का अनुवाद हो चुका है। पंचतत्र वर्तमान में भी एक लोकप्रिय ग्रन्थ है।

कोश और व्याकरण- प्राचीन काल से ही भारत में कोश निर्माण की परम्परा चली आ रही है। यास्ककृत निघंटु और निरुक्त से वैदिक साहित्य के अध्ययन में सहायता मिलती है। गुप्त काल में अमरसिंह ने अमरकोश की रचना की। गुप्तकाल में भट्टि, भौमक आदि व्याकरण के विद्वान् थे। भर्तृहरि भी इसी काल में हुए। नीति, श्रृंगार और वैराग्य शतक एक महत्त्वपूर्ण रचना है। चन्द्रगोमिन ने चन्द्रव्याकरण की रचना की। इसका शैली पाणिनि की अष्टाध्यायी से पृथक् है। इसका एक अनुवाद तिब्बती भाषा में प्राप्त हुआ है।

दर्शन ग्रन्थ- गुप्तकाल में दर्शन से संबंधित भी बहुत से ग्रन्थों का प्रणयन हुआ। इस समय तक ब्राह्मण व बौद्ध दर्शन का विकास हो चुका था। दोनों सम्प्रदायों के लोगों में शास्त्रार्थ होता था। सांख्य दर्शन से संबंधित ईश्वर कृष्ण की सांख्यकारिका भी गुप्त युग की रचना है। बहुत से दार्शनिक ग्रन्थों पर महाभाष्य लिखे गये हैं। पतंजलि के महाभाष्य पर भी टीका लिखी गयी। जैमिनी के पूर्व मीमांसा तथा बादरायण के उत्तरमीमांसा पर भाष्यों की रचना हुई। दिङनाग ने प्रमाणसमुच्चय और न्यायप्रवेश आदि ग्रन्थ लिखे। उद्योत्तकर ने न्यायभाष्य पर न्यायवार्तिक नामक टीका लिखी। वैषेशिक दर्शन-पद्धति पर आचार्य प्रशस्तपाद ने पदार्थ धर्मसंग्रह नामक ग्रन्थ लिखा है। चन्द्र ने दशपदार्थ शास्त्र की रचना की।

गुप्तकाल में बौद्ध धर्म की दो शाखाएँ और उनकी दो-दो उपशाखाएँ विकसित हुई। हीनयान की शाखाएँ थीं- थेरवाद (स्थविरवाद) और वैभाषिक (सर्वास्तिवाद) और महायान की थीं-माध्यमिक और योगाचार। असंग जो योगाचार से सम्बद्ध वज्रछेदिका टीकायोगाचार भूमिशास्त्र नामक ग्रन्थ लिखे थे। बसुबंधु ने अभिधर्मकोश की रचना की। बुद्धघोष ने विशुद्धिमग्ग नामक ग्रन्थ रचा जिसमें शील, समाधि आदि की विवेचना की गयी है।

बौद्ध ग्रन्थ विनयपिटक पर समंतपासादिका टीका की रचना की गई। बुद्धघोष ने सुमंगलविलासिनी की भी रचना की। यह दीघनिकाय से संबंधित सुवर्णप्रमासराष्ट्रपाल परिपृच्छा आदि बौद्ध कृतियों का भी निर्माण किया गया। बहुत से जैनग्रन्थ भी गुप्तकाल में लिखे गये। जैनाचार्य सिद्धसेन ने तत्त्वानुसारिणी तत्त्वार्थटीका नामक ग्रन्थ की रचना की। गुप्त काल में शैव नाय्यारों और वैष्णव आलवारों ने तमिल भाषा में बहुत से भक्ति से संबंधित-पदों की रचना की। तमिल के साथ-साथ अपभ्रंश व प्राकृत भाषा का भी विकास हुआ। प्राकृत भाषा के सेतुबंध व गौडवहों भी गुप्तकालीन ग्रन्थ है। सेतुबंध प्रवरसेन का लिखा हुआ है, गौड्वहो का लेखक वाक्पनतिराज है।

गुप्त काल में कला

गुप्त काल (319-550 ई.) भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग (गोल्डन पीरियड) कहलाता है। इतिहासकारों ने इसे क्लासिकल युग भी कहा है। इस युग में साहित्य और कला का विकास अप्रतिम विकास हुआ। यहाँ हम कला और साहित्य के विकास के मुख्य पक्षों से अवगत होने का प्रयास करेंगे।

स्तूप तथा गुहा स्थापत्य- गुप्त सम्राटों के राजत्व काल में स्तूप तथा गुहा स्थापत्य का अच्छा विकास हुआ। जहाँ तक स्तूपों का प्रश्न है, उस युग में दो युग-प्रसिद्ध स्तूपों का निर्माण हुआ। ये स्तूप है- सारनाथ का धमत्व स्तूप तथा राजगृह स्थित जरासंघ की बैठक धमेत्व स्तूप 128 फुट ऊँचा है। जिसका निर्माण बिना किसी चबूतरे के समतल धरातल पर किया गया है। इसके चारों कोने पर बौद्ध मूर्तियाँ रखने के लिए ताख बनाए गए हैं जहाँ तक गुहा स्थापत्य का प्रश्न है।

यह युग परम्परागत गुहा वास्तु के चरम विकास का द्योतक है। पांचवीं शताब्दी ईसवी से लेकर 750 ई. तक, ईसा पूर्व की अंतिम सदियों की अपेक्षा अधिक संख्या में गुहाओं का निर्माण हुआ। महायान युग में निर्मित गुहायें अधिक विशाल, विस्तृत अलंकृत तथा संख्या में अधिक हैं। इस काल में चैत्य गृहों की अपेक्षा विहार निर्माण पर अधिक जोर दिया गया है। इस समय की बौद्ध गुहायें अजन्ता, एलोरा, औरंगाबाद एवं बाघ की पहाड़ियों में निर्मित हुई।

अजन्ता गुहा वास्तु का विकास-क्रम सर्वाधिक लम्बा है। यहाँ ईसा की प्रारम्भिक सदियों से 750 ई. तक लगभग 30 गुहाओं का निर्माण हुआ, जिनमें 3 चैत्य गृह एवं शेष विहार हैं। अजन्ता की लगभग 29-30 गुहाओं में से पाँच प्रारम्भिक काल की है। तीन चैत्यगृहों में से 2 चैत्य गृह (नौ एवं दस) हीनयान युग में उत्कींण किये गये। विद्वानों की मान्यता है कि 20 विहार एवं एक चैत्यगृह पांचवीं सदी ई. से सातवीं सदी ई. के मध्य निर्मित हुए। गुहा संख्या 19 एवं 26 चैत्य हैं, अन्य विहार हैं। हीनयान चैत्य के साथ जो विहार बने थे, उनकी उपयोगिता कालान्तर में समाप्त हो गई। महायान युग के चैत्य तथा विहार मिश्रित तैयार हुए जिनका क्षेत्रफल पहले से बड़ा था। इनका आकार-प्रकार बढ़ाया गया। विहार संख्या 7, 11, 6 का निर्माण दूसरे क्रम में हुआ था। संख्या 15 से 20 तक के विहार बनावट में सर्वोत्तम माने जाते हैं। सोलह एवं सत्रह भित्तिचित्र के लिए सुप्रसिद्ध हैं, जिन्हें देखने के लिए संसार के लोग आते हैं। अजन्ता गुहायें अपनी विशिष्टता के कारण बरबस लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करती हैं।

अजन्ता एवं अन्य स्थलों की गुहाओं को भीतर से चट्टान खण्ड को काटकर स्तूप निर्माण किये गये हैं, स्तूप हर्मिका एवं छत्रयुक्त है। महायान काल में निर्मित गुहाओं में महात्मा बुद्ध एवं बोधिसत्वों की प्रतिमाओं का अंकन मिलता है। गुप्त काल से पूर्व की हीनयान गुहाओं में बुद्ध मूर्तियों का अंकन नहीं देखा जाता। बुद्ध को प्रतीकों के माध्यम से ही अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया। महायान गुहाओं में बुद्ध एवं बोधिसत्वों के अतिरिक्त यक्ष, यक्षिणी, विविध देवताओं एवं नाग प्रतिमाओं का उत्कीर्णन हुआ है। प्रारम्भिक गुहाओं के स्थापत्य में जहाँ सादगी देखी जाती है वहीं गुप्तकालीन गुहा मंदिरों के निर्माण में अलंकरण एवं सजावट की प्रमुखता है। हीनयान विहार चैत्य के साथ सम्बद्ध होने से छोटे होते थे, किन्तु महायान विहारों की विशालता के कारण स्तम्भों का निर्माण आवश्यक हो गया।

महायान विहारों में भिक्षुओं के निवास का प्रावधान था। अत: तीन ओर कोठरियाँ निर्मित की गयीं जिनमें भिक्षुओं के शयन हेतु प्रस्तर चौकियाँ बनाई गई। तदनुसार विहार के प्रारूप में परिवर्तन किये गये। भिक्षुओं के लिए कोठरियों से बाहर पूजा की व्यवस्था भी जरूरी थी। इसलिए केन्द्रीय कमरे में बुद्ध की प्रतिमा स्थापित की गई। इसके अतिरिक्त दीवारों को भी विविध अलंकरणों द्वारा अलंकृत किया गया। भस्मपात्र की पूजा का समापन हो गया एवं ब्राह्मण मत की भक्ति भावना का बौद्ध मत में प्रवेश हुआ।

विहार- वास्तुकला की दृष्टि से महायान गुहायें विशिष्ट हैं जिन्हें विहार या संघाराम की संज्ञा दी गई। अजन्ता, एलोरा, बाघ एवं औरंगाबाद आदि के विहार इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं, जिनका निर्माण भिक्षुओं के निवास के लिए किया गया। गुप्तकाल में विहार योजना में सतत् परिवर्तन एवं परिष्कार लक्षित होता है। केवल आकृति में ही नहीं बल्कि तल विन्यास की दृष्टि से इस युग में दो तीन तल के विहारों का निर्माण किया गया। एक पहाड़ी में दो या तीन तले गुहाओं का निर्माण तकनीकी दृष्टि से अपने आप में एक उपलब्धि है। तिथिक्रम की दृष्टि से प्राचीनतम विहार अजन्ता की पहाड़ी में निर्मित किये गये।

बौद्ध गुहा स्थापत्य के अतिरिक्त ब्राह्मण परम्परा में भी स्थापत्य की अभिव्यक्ति का अवसर मिला। विदिशा के पास प्रदयगिरि की कुछ गुफाओं का निर्माण भी इसी युग में हुआ। यहाँ की गुफाएँ भागवत तथा शैव धर्मों से सम्बन्धित हैं। उदयगिरि पहाड़ी से चन्द्रगुप्त द्वितीय के विदेश सचिव वीरसेन का एक लेख मिलता है। जिससे विदित होता है कि उसने यहाँ एक शैव गुहा का निर्माण करवाया था। यहाँ की सबसे प्रसिद्ध बाराह-गुहा है। जिसका निर्माण भगवान विष्णु के सम्मान में किया गया था। गुहा के द्वार-स्तम्भों को देवी देवताओं तथा द्वारपालों की मूर्तियों से अलंकृत किया गया है।

मन्दिर-निर्माण कला

गुप्तकाल से पूर्व मन्दिर वास्तु के अवशेष नहीं मिलते। मन्दिर निर्माण का प्रारम्भ इस युग की महत्त्वपूर्ण देन कही जा सकती है। इस काल में मन्दिर वास्तु का विकास ही नहीं हुआ बल्कि इसके शास्त्रीय नियम भी निर्धारित हुए। मन्दिर निर्माण के उद्भव का सम्बन्ध व्यक्तिगत देवता की अवधारणा से है। भारत में देवपूजा की परम्परा बहुत प्राचीन रही है। प्राय: इसके उद्भव को प्रागार्थ (अनार्य) परम्परा में खोजने का प्रयत्न किया गया है।

इत्सिंग ने श्री गुप्त द्वारा ‘मि-लि-क्या-सी-क्या-पोनो’ (सारनाथ) में चीनी यात्रियों के लिए मन्दिर बनाये जाने का उल्लेख किया है। इसी तरह चन्द्रगुप्त द्वितीय के मंत्री शाब (वीरसेन) द्वारा उदयगिरि गुहा में भगवान शिव के लिए गुहा मन्दिर बनवाये जाने का विवेचन आया है। कुमारगुप्त के मिलसद अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने कार्तिकेय के मन्दिर का निर्माण करवाया। उसके मन्दसोर अभिलेख से भी सूर्य मन्दिर निर्माण करवाये जाने एवं मन्दिरों के जीर्णोद्धार की जानकारी मिलती है।

गुप्तकालीन मन्दिरों के अवशेष अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हैं, जैसे-सांची, शंकरमढ़, दहपर्वतया (आसाम), भीतरी गाँव, अहिच्छत्र, गढ़वा, सारनाथ, बौद्धगया आदि। इन मन्दिरों को गुप्तकालीन स्वीकार किये जाने का एक आधार तो कुछ मन्दिर स्थलों से अभिलेखों की प्राप्ति रहा है।

प्रारूप की दृष्टि से एक गर्भ के मन्दिर धीरे-धीरे पंचायतन शैली में परिवर्तित हुए अर्थात् इस प्रक्रिया में पाँच देवों के गृह की स्थापना की गई। साधारणतः मन्दिर वर्गाकार हैं। इस विकास प्रक्रिया के प्रमाण भूमरा एवं देवगढ़ के मंदिर हैं। आयताकार योजना वाले मंदिर अवश्य ही दक्षिण के चैत्य गुहाओं से सम्बद्ध रहे होंगे। वस्तुत: पंचायतन योजना वर्गाकार मंदिर का विकसित रूप है। इस प्रक्रिया में गर्भ गृह के चारों ओर चार अतिरिक्त देवालय बनाये गये। भूमरा के गर्भगृह के सामने चबूतरों के दोनों कोनों पर देवालय बने हैं। पृष्ठ भाग में गर्भगृह हैं तथापि इन्हें इसी शैली में रखा जाता है। यह मन्दिर देवगढ़ से पूर्ववर्ती है।

प्रारम्भिक मंदिर शिखर- रहित अर्थात् सपाट छत से आवृत्त थे किन्तु सपाट छत क्रमश: ऊंची उठती गई और गर्भगृह के ऊपर पिरामिडाकार स्वरूप बनता गया। इस प्रक्रिया में कई तल वाले शिखर का विकास हुआ। इस तरह मंदिर का स्वरूप सप्त एवं नवप्रासाद के रूप में परिवर्तित हुआ। शिखर मूलतः गर्भ पर बनी ऐसी वास्तुरचना है जो क्रमश: कई तल, गवाक्ष, कर्णश्रृंग, शुकनाशा, आमलक, कलश, बीजपूरक, ध्वजा से युक्त होता है। इन तत्त्वों के साथ शिखर की रचना पीठायुक्त अथवा ऊपर की ओर क्रमश: तनु होते हुए भी कोणाकार हो सकती है। संभवत: शिखर का विकास मानव निर्मित कई मजिलों के प्रासादों के अनुकरण पर हुआ होगा। शिखर प्रासाद के विभिन्न तल ऊपर की ओर छोटे होते गये। इसका सर्वोत्तम उदाहरण नाचनाकुठारा का मंदिर है जिसमें प्रथम कक्ष पर दूसरे एवं तीसरे कक्ष (या खण्ड) दिखाई देते हैं। संभवत: इसी से आगे शिखर विकास का प्रारम्भ हुआ और आगे जाकर शिखर की बनावट में अनेक तत्त्व जुड़ते गये।

शंकरगढ़- जबलपुर में तिगवां से तीन मील पूर्व में कुण्डाग्राम में लाल पत्थर का एक छोटा शिव मंदिर प्राप्त हुआ है।

मुकुंददर्रा- राजस्थान के कोटा जिले में एक पहाड़ी दर्रा, जिसे मुकुन्ददर्रा कहा जाता है, में एक छोटे सपाट छतयुक्त स्तम्भों पर खड़ा मंदिर अवस्थित है।

तिगवा- पत्थर से निर्मित एक वर्गाकार सपाट छत का मंदिर है जिसके सामने चार स्तम्भों पर मण्डप स्थित है।

भूमरा- सतना (मध्य प्रदेश) में भूमरा नामक स्थान में शिवमंदिर का निर्माण पाँचवीं शताब्दी के मध्य में हुआ माना जाता है।

नाचना कुठारा- भूमरा के निकट अजयगढ़ के पास नाचना कुठारा में पार्वती मंदिर स्थित है।

देवगढ़- देवगढ़ (ललितपुर) झाँसी के पास गुप्तकाल के बचे हुए उत्कृष्ट मंदिर में से है, जिसका विस्मयकारी अलंकरण मन मोह लेता है।

भीतरगाँव- कानपुर के निकट दक्षिण में भीतरगाँव का विष्णु मंदिर ईंटों से निर्मित किया गया। इसका महत्त्व ईंट का प्राचीनतम मंदिर होने में ही नहीं है वरन् इस बात में भी है कि उसमें शिखर है।

मूर्तिकला

मूर्ति निर्माण के क्षेत्र में इस काल में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। गुप्तकाल में तीन प्रकार की मूर्तियों का निर्माण किया गया-पत्थर, धातु एवं मिट्टी। इस काल में मूर्तिकला के दो महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि गुप्त साम्राज्य के विकास के आरम्भिक दिनों में मथुरा मूर्ति-कला का प्रमुख केन्द्र था। यह एक मान्य तथ्य है कि प्रथम कुमारगुप्त के शासन काल में बनी बुद्ध की मूर्ति, जो मानकुंवर से प्राप्त हुई है, मथुरा से निर्यात की हुई है। मथुरा के बाद काशी-सारनाथ गुप्त कला का केन्द्र रहा है और साथ ही यह भी कहा जाता है कि मथुरा कला की ही एक धारा नयी ताजगी लेकर यहाँ फूटी है। वस्तुतः मथुरा कला शैली के विकास से बहुत पहले से ही काशी प्रदेश इस कला का केन्द्र रहा है।

सारनाथ में प्राप्त मूर्तियों में बौद्ध, ब्राह्मण और जैन प्रतिमाएँ सम्मिलित की जाती हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या बौद्ध मूर्तियों की है। संख्या की दृष्टि से दूसरे स्थान पर ब्राह्मण देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं और सबसे कम जैन मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। गुप्तकालीन मूर्तियों का विशेष महत्त्व मथुरा, सारनाथ, सुल्तानगंज और अनेक अन्य स्थलों से अनंत मात्रा में उपलब्ध गुप्त भारतीय शैली में निर्मित नमूनों से है।

इस काल से पूर्व अर्थात् कुषाणकालीन मूर्तियों में विदेशी आदशों का प्रभाव देखा जाता है। कहा गया है कि संघटी की चुन्नटें गांधार-शैली ने उन्हें दी थीं। उन्होंने उसे स्वीकार किया पर इस रूप से उन्होंने नये सिरे से उन्हें साधा कि चुन्नटें तो गायब हो गयीं पर उनकी लहरियाँ शरीर से एकाकार होकर उसमें समा गयीं और लगने लगा कि तन उनके भीतर से झलक रहा है, परिधान का मात्र आभास रह गया। अब तन परिधान से अधिक महत्त्व का हो गया। ध्यातव्य है की मथुरा केंद्र की बनी हुई मूर्तियों मूर्तियों को छोड़कर गुप्तकालीन किसी बुद्ध प्रतिमा में वस्त्रों में चुन्नटें नहीं देखि जाती। यह भी देखा गया है कि इस काल की मूर्तियों की भौहें तिरछी न होकर सीधी प्रदर्शित की गयीं हैं। कलाकारों ने भावों की अभिव्यक्ति के लिए विभिन्न मुद्राओं का सहारा लिया है।

प्रतिभा-निर्माण के शास्त्रीय नियमों का निर्धारण किया गया। तदनरूप मूर्तियों के वक्षस्थल विकसित बनाये गये और सुदृढ़ कंधों को प्रमुखता से उभारा गया। मूर्ति निर्माण हेतु प्रयुक्त किये जाने वाले पत्थरों के विषय में जैसा पहले उल्लेख किया गे की मथुरा कला की अभिव्यक्ति बलुआ लाल पठार द्वारा की गयी। गुप्तकाल तक भी इसी पठार का उपयोग स्थानीय कलाकारों द्वारा किया जाता रहा किन्तु सारनाथ में मूर्ति निर्माण हेतु चुनर के सफ़ेद बालूदर पठार का प्रयोग किया गया।

सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की एक खड़ी मूर्ति तांबे की है जिसकी लम्बाई 7½ फीट है। महात्मा बुद्ध के शीश पर कुंचित केश हैं परन्तु उसके चारों ओर प्रभामण्डल नहीं है। बुद्ध पारदर्शक वस्त्र से आवृत हैं तथा दायाँ हाथ अभयमुद्रा में, बायां हाथ आधा नीचे की ओर झुका हुआ है। अंगुलियों के बीच कुछ वस्तुएँ दिखाई देती हैं। मथुरा से प्राप्त विष्णु मूर्ति अपनी स्वाभाविकता और भावुकता में सारनाथ के महात्मा बुद्ध की मूर्ति से समता रखती है। भगवान विष्णु रत्नजड़ित मुकुट पहने हैं, कानों में आभूषण हैं, उनके सुगठित शरीर में पूरा अनुपात है और मुख पर आध्यात्मिक आभा और शांति विद्यमान है।

देवगढ़ के मंदिर से अनेक सुन्दर मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। यहाँ से प्राप्त महत्त्वपूर्ण मूर्तियों में शेष विष्णु की मूर्ति का उल्लेख किया जा सकता है। भगवान ने सिर पर किरीट मुकुट, कानों में कुण्डल, गले में हार, केयूर, बनमाला एवं हाथों में कंकण धारण किये हैं। पैरों की ओर लक्ष्मी बैठी हैं। नाभि से निकले कमल पर शिव-पार्वती हैं।

उदयगिरी पहाड़ी पर उत्कीर्ण, विष्णु का वाराह अवतार बड़ा ही सजीव है। इसमें पृथ्वी को ऊपर की ओर उठाते दिखाये गये हैं। एक वाराह मूर्ति एरण से भी प्राप्त हुई है जिसका निर्माण मातृविष्णु के अनुज धन्यविष्णु ने करवाया था। गुप्त कलाकारों ने बुद्ध एवं विष्णु के अतिरिक्त शिव मूर्तियाँ भी निर्मित कीं। गुप्तकालीन अनेक एकमुखी तथा चतुर्मुखी शिवलिंग प्राप्त हुए हैं। इनमें करमदण्डा, मथुरा, सारनाथ, खोह, विलसद उल्लेखनीय हैं। इस काल की अनेक जैन मूर्तियाँ भी मिली हैं। मथुरा से प्राप्त प्रतिमा में महावीर को पद्यासन में ध्यानमुद्रा में बैठे दर्शाया गया है।

चित्रकला

प्रस्तर मूर्तियों के अतिरिक्त इस काल में पकी हुई मिट्टी की भी छोटी-छोटी मूर्तियाँ बनाई गई। इस प्रकार की मूर्तियाँ विष्णु, कार्तिकेय, दुर्गा, गंगा, यमुना आदि की हैं। ये भृण्मूर्तियाँ पहाड़पुर, राजघाट, मीटा, कौशाम्बी, श्रावस्ती, अहिच्छल, मथुरा आदि स्थानों से प्राप्त हुई हैं। ये मूर्तियाँ सुडौल, सुन्दर और आकर्षक हैं।

मानवजाति के इतिहास में संभवत: कला की दृष्टि से अभिव्यक्ति की यह परम्परा सबसे प्राचीन है। चित्रकला के द्वारा एक तलीय द्विपक्षों में भावों की अभिव्यक्ति होती है। चित्र लिखना मानव स्वभाव का स्वाभाविक परिणाम है। इस दृष्टि से चित्र मनुष्य के भावों की चित्रात्मक परिणति हैं।

प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर अनुमान किया जाता है कि शुंग सातवाहन युग में इस कला का विकास हुआ जिसकी चरम परिणति गुप्त काल में हुई। वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार, ‘गुप्त युग में चित्र-कला अपनी पूर्णता को प्राप्त हो चुकी थी।’ अजन्ता की गुहा संख्या 9-10 में लिखे चित्र संभवत: पुरातात्विक दृष्टि से ऐतिहासिक काल में प्राचीनतम हैं। समय के परिप्रेक्ष्य में, अजन्ता की गुहा संख्या 16 में अंकित वाकाटक शासक हरिषेण का अभिलेख महत्त्वपूर्ण है।

बौद्ध चैत्य एवं विहारों में आलेखित चित्रों का मुख्य विषय बौद्ध धर्म से सम्बद्ध है। भगवान बुद्ध को बोधिसत्व या उनके पिछले जन्म की घटनाओं अथवा उन्हें उपदेश देते हुए अंकित किया है। अनेक जातक कथाओं के आख्यानों का भी चित्रण किया गया जैसे शिवविजातक, हस्ति, महाजनक, विधुर, हस, महिषि, मृग, श्याम आदि। बुद्ध जन्म से पूर्व माया देवी का स्वप्न, बुद्ध जन्म, सुजाता द्वारा क्षीर (खीर) दान, उपदेश राहुल का यशोधरा द्वारा समर्पण आदि बुद्ध के जीवन से सम्बद्ध चित्रों का विशेष रूप से आलेखन किया गया।

अजन्ता में पहले सभी गुफाओं में चित्र बनाए गए थे। समुचित संरक्षण के अभाव में अधिकांश चित्र नष्ट हो गए तथा अब केवल छ: गुफाओं (1–2, 9-10 तथा 16-17) के चित्र बचे हुए हैं। इनमें से सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी के भित्ति-चित्र गुप्तकालीन हैं।

सामान्यतः अजन्ता चित्रों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-कथाचित्र, प्रतिकृतियाँ (या छवि चित्र) एवं अलंकरण के लिए प्रयुक्त चित्र। गुप्तकालीन चित्रों में कुछ चित्र बहुत ही प्रसिद्ध हैं।

बाघ चित्रकला- यह चित्रकला आवश्यक रूप में गुप्त काल की ही है, जहाँ पर अजंता चित्रकला के विषय धार्मिक हैं, वहीं पर बाघ चित्रकला का विषय लौकिक है। संगीतकला का भी गुप्त काल में विकास हुआ। वात्सायन के कामसूत्र में संगीत कला की गणना 64 कलाओं में की गई है। माना जाता है कि समुद्रगुप्त एक अच्छा गायक था। मालविकाग्निमित्र से ज्ञात होता है कि नगरों में कला भवन थे।

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