गुप्त वंश के शासक

समुद्रगुप्त: 335-380 ई.

चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद उसका पुत्र समुद्रगुप्त सिंहासनारुढ़ हुआ। वह अपने पिता द्वारा उत्तराधिकारी मनोनीत था। प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि आरम्भ में उसने अपने भाई काचगुप्त और उसके साथियों से उत्तराधिकार के लिए संघर्ष किया था। सम्भवत: वह चन्द्रगुप्त प्रथम का ज्येष्ठ पुत्र नहीं था। वह बचपन से ही विद्यानुरागी, वीर, साहसी, नीति कुशल एवं अस्त्र-शस्त्र विद्या में प्रवीण होने के साथ-साथ प्रतिभा-सम्पन्न एवं होनहार युवक था। गुप्त साम्राज्य की स्थापना का श्रेय तो चन्द्रगुप्त प्रथम को जाता है। लेकिन उसके संवर्द्धन एवं विस्तार का कार्य समुद्रगुप्त ने ही किया। समुद्रगुप्त एक महान् सैनिक था। उसका शासन काल विस्तृत सैनिक अभियानों से भरा हुआ है। समुद्रगुप्त के बहुत से अभिलेख उपलब्ध हैं। इनसे एक ओर तो उसके सैनिक अभियानों की जानकारी मिलती है दूसरी ओर उसकी प्रतिभा व्यक्त होती है।

प्रयाग प्रशस्ति- यह अभिलेख समुद्रगुप्त काल की इतिहास की घटनाओं का दर्पण है। प्रयाग प्रशस्ति समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रची गयी थी जो समुद्रगुप्त का कुमारामात्य एवं सान्धिविग्रहिक था। इस प्रशस्ति के आधार पर कहा जा सकता है कि हरिषेण ने समुद्रगुप्त की प्रेरणा से इस प्रशस्ति का निर्माण किया था। इसमें उसकी विजयों की विस्तृत श्रृंखला की विवेचना मिलती है। साथ ही समुद्रगुप्त के व्यक्तित्व की झलक मिलती है। यह प्रशस्ति इलाहाबाद के किले में स्थित स्तम्भ पर उत्कीर्ण है। इस स्तम्भ के उत्कीर्ण लेखों का यह विरोधाभास है कि अशोक के शान्तिप्रद आचार-उपदेशों के साथ ही समुद्रगुप्त की सैनिक विजयों का भी इसमें वर्णन है।

इसकी रचना समुद्रगुप्त के सांधिविग्रहक, कुमारामात्य, दण्डनायक हरिषेण ने की जो ध्रुवभूति का पुत्र था। मूल अवस्था में वह स्तम्भ कौशाम्बी में स्थित था। वहाँ से दिल्ली के किसी मुस्लिम शासक के समय में वह उठाकर प्रयाग लाया गया। इसे गंगा-यमुना तट स्थित दुर्ग में स्थित किया गया, जहाँ वह आज भी स्थित है। प्रयाग प्रशस्ति से समुद्रगुप्तकालीन राजनैतिक स्थिति का अभिज्ञान होता है, इसलिए इसे गुप्तकाल का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत माना गया |

एरणलेख- मध्य प्रदेश के सागर जिले में एरण नामक ग्राम से गुप्तकालीन अभिलेख मिला है। इसमें एरण प्रदेश को समुद्रगुप्त के अधिकार-क्षेत्र में माना है।

नालन्दा ताम्रफलक- यह लेख साढ़े ग्यारह इंच लम्बे और नौ इंच चौडे ताम्रफलक पर अंकित है। यह नालन्दा के विहार के उत्खनन के दौरान प्राप्त हुआ। समुद्रगुप्त ने अपने शासन के पाँचवें वर्ष में जयभट्ट स्वामी नामक ब्राह्मण को भूमिदान दिया।

गया ताम्रफलक- यह लेख आठ इंच लम्बे और सात इंच से कुछ अधिक चौडे ताम्रफलक के एक ओर अंकित है। इसे कनिंघम ने गया में प्राप्त किया था जिसकी सूचना 1883 ई. में प्रदान की गयी। इसमें उल्लेख है कि समुद्रगुप्त ने नवें वर्ष में गया के अन्तर्गत खेतिक ग्राम निवासी ब्राह्मण गोपदेव स्वामी को भूमिदान दिया है।

मुद्रायें- समुद्रगुप्त की अनेकों मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। बयाना, बनारस, जौनपुर, बोधगया आदि स्थानों से ये मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। इनमें गरुड़, धनुर्धर, परशु, अश्वमेध, व्याघ्र, निहन्ता एवं वीणा से अंकित मुद्राएँ उल्लेखनीय हैं। समुद्रगुप्त की मुद्राओं में विविधता दिखाई देती है। गरुड़, धनुर्धर एवं परशु अंकित मुद्राओं को समुद्रगुप्त ने प्रचलित किया। कई विद्वान् इन मुद्राओं का सम्बन्ध नाग शक्तियों (अच्युत, नागसेन, नागदत्त, नन्दि एवं गणपतिनाग) के उन्मूलन से जोड़ते हैं। अश्वमेध प्रकार की मुद्राएँ उसके दिग्विजय की ओर संकेत करती हैं। इन मुद्राओं से समुद्रगुप्त की अभिरुचियों, तत्कालीन सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति पर प्रकाश पड़ता है। समुद्रगुप्त की प्रत्येक मुद्रा उसके शासन-काल के किसी न किसी पक्ष की अवश्य उजागर करती है। ऐतिहासिक दृष्टि से वे बहुत महत्त्वपूर्ण है। समुद्रगुप्त की राजनैतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों का चित्र ये प्रस्तुत करती हैं। इसके अतिरिक्त समुद्रगुप्त के विजय-अभियान व्यक्तिगत अभिरुचियों, साम्राज्य सीमा, तत्कालीन धार्मिक एवं आर्थिक स्थितियों के परिज्ञान के सन्दर्भ में मुद्रा का महती योगदान है।

काच मुद्राएँ- बयाना, जौनपुर, टाडा आदि स्थलों से काच नामक शासक की मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। इनका आकार .75 से 85 तथा भारत 111 से 118 ग्रेन मिलता है। काच की मुद्राएँ समुद्रगुप्त की मुद्राओं से साम्यता रखती है। इनमें स्वर्ण धातु में मिलावट मिलती है। भाषा और बनावट की दृष्टि से इन्हें समुद्रगुप्त के काल का ही माना जा सकता है।

दिग्विजय- आन्तरिक दृष्टि से अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद समुद्रगुप्त का ध्यान साम्राज्य विस्तार की ओर गया। चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा समुद्रगुप्त को जो राज्य प्रदत्त किया गया था, उसके विस्तार की योजना समुद्रगुप्त ने बनाई। समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का परिज्ञान हमें हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति, एरण के शिलालेख व मुद्राओं से ज्ञात होता है। इसमें उसकी विजयों का विस्तार से विवरण उपलब्ध है। प्रयाग प्रशस्ति में उसकी विजय-नीति का स्पष्ट उल्लेख किया गया है, जिसे निम्न प्रकार से जाना जा सकता है-

  1. ग्रहण मोक्षानुग्रह- इससे तात्पर्य है कि उसने राज्यों को जीतकर, पुराने शासकों को ही लौटा दिये। दक्षिणापंथ के राज्यों के प्रति यह नीति अपनाई गयी थी।
  2. प्रसभोद्धरण- इसका तात्पर्य है कि समुद्रगुप्त ने नये राज्यों को जीतकर बलपूर्वक अपने राज्य में मिला लिया। समुद्रगुप्त ने यह नीति आर्यावर्त के राज्यों के प्रति अपनायी।
  3. परचारकीकरण- इससे तात्पर्य है सेवक बनाना। इस नीति का पालन उसने मध्य भारत के आटविक राज्यों के साथ किया।
  4. करदानाज्ञाकरण प्रणामागमन- इससे तात्पर्य है कर एवं दान देना, आज्ञा का पालन करना। इसके अलावा शासकों को समुद्रगुप्त के पास अभिवादन हेतु आना पड़ता था। यह नीति समुद्रगुप्त ने सीमा स्थित राजाओं व गणराज्यों के प्रति अपनायी।
  5. भृष्टराज्योत्सन्न राजवंश प्रतिष्ठा- इससे तात्पर्य है कि हारे हुए राज्यों को पुन: प्रतिष्ठापित करना।
  6. आत्मनिवेदन कन्योपायान गरुत्मदण्डस्व विषय भुक्ति शासन याचना- इससे तात्पर्य है कि बहुत से शासकों ने समुद्रगुप्त के समक्ष समर्पण किया। कुछ राजाओं ने अपनी कन्याओं का विवाह किया। उन्होंने अपने विषय व भुक्ति (जिला व प्रान्त) में गुप्तों की गरुड़ मुद्रा से अंकित आज्ञा-पत्र की याचना की। इस नीति का पालन उसने विदेशी राजाओं के साथ किया।

उसके विजय अभियानों को हम निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत रख सकते हैं-

आर्यावर्त की विजय- सर्वप्रथम समुद्रगुप्त ने आर्यावर्त की विजय की। प्रयाग प्रशस्ति के कुछ अंशों के नष्ट हो जाने से हमें उसके अभियानों की पूर्ण जानकारी नहीं मिल पाती है। किन्तु उपलब्ध प्रसंग से इंगित होता है कि उसने अच्युत, नागसेन, गणपति नाग और कोतकुल के किसी राजा पर पूर्ण विजय प्राप्त की थी। तदन्तर विजित राजाओं की नामावली दक्षिणापथ के राजाओं से प्रारम्भ होती है।

अच्युत- अच्युत के विषय में अधिक जानकारी नहीं मिलती है। जायसवाल अच्युत तथा नन्दि को एक ही शब्द मानते हैं।

नागसेन- यह नागवंशी नरेश था जो मथुरा में शासन करता था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह पद्मावती का शासक था। बाण ने हर्षचरित में पद्मावती के नागवंशीय शासक नागसेन का उल्लेख किया है।

कोतकुल- कोतकुल के शासक को समुद्रगुप्त ने उसकी ही राजधानी में जाकर परास्त किया। डॉ. जायसवाल की धारणा है कि इस अभियान का युद्ध कौशाम्बी में हुआ था।

उपरोक्त तीनों नरेशों का अधिकार-क्षेत्र व्यापक था। सम्भवत: दिल्ली से ग्वालियर तक का भूभाग उनके अधिकार में था। यह सम्भव प्रतीत नहीं होता कि तीनों नरेशों को एक साथ ही परास्त किया गया होगा।

दक्षिण विजय- आर्यावर्त की प्रथम विजय के बाद समुद्रगुप्त ने दक्षिणी भारत की ओर प्रयाण किया। प्रशस्ति की तेरहवीं पक्ति में उपरोक्त तीन राजाओं की विजय का वर्णन है। उन्नीसवीं व बीसवीं पंक्ति में दक्षिण भारत की विजय का वर्णन है।

कोशल का महेन्द्र- इस शासक का कोई लेख आदि प्राप्त नहीं हुआ है। कोशल से तात्पर्य दक्षिण कोशल से है जिसमें वर्तमान विलासपुर, रायपुर, सम्भलपुर और गंजाम जिले के कुछ प्रदेश शामिल थे।

महाकान्तार का व्याघ्रराज- महाकान्तार मध्य प्रदेश के विस्तीर्ण जंगल के लिए प्रयुक्त हुआ है। जायसवाल महाकान्तार को वर्तमान कंकर एवं बस्तर प्रदेश मानते हैं।

कोरल का मण्टराज- कई इतिहासकारों ने कोरल को केरल माना है। रायचौधरी इस प्रदेश को मध्य प्रदेश में स्थित बताते हैं। विद्वानों ने कोरल को कौराड्, कुराल आदि अलग-अलग ढंग से पढ़ने का प्रयास किया है।

पिष्ठपुर का महेन्द्रगिरी- गोदावली जिले के वर्तमान पीठापुरम से पिष्ठपुर का तादात्म्य किया जाता है। इसका नामोल्लेख पुल्केशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में भी हुआ है। फ्लीट के अनुसार पिष्ठपुर नगर आधुनिक पिट्टापुरम है।

कोट्टूर का स्वामीदत्त- कुछ इतिहासकार स्वामीदत्त को पिष्ठपुर, महेन्द्रगिरि तथा कोट्टूर तीनों का शासक स्वीकार करते हैं।

एरन्डाल्लक का दमन- फ्लीट के अनुसार एरन्डपल्ल खानदेश का एरण्डडौल था। एलन और वाई.आर. गुप्ता इसका समर्थन करते हैं। एरण्डपल्ल का उल्लेख कलिंग के देवेन्द्रवर्मन के सिद्धान्तम्, ताम्रशासन में हुआ है और वह कलिंग में था।

कांची का विष्णुगोप- विष्णुगोप नामक राजा कांची का शासक था। कांची प्राचीन काल में पल्लवों की राजधानी थी। यह चेगलपुट जिले का सुप्रसिद्ध कांचीपुरम (कांजीवरनम्) है।

अवमुक्त का नीलाय- अवमुक्त का शासक नीलराज था। यह राज्य सम्भवतः कांची और वेंगी के मध्य स्थित था।

वेंगी का हस्तिवर्मन- वेगी का समीकरण कृष्णा गोदावरी के बीच एल्लोर के समीप स्थित वेंगी अथवा पेड्डवेगी के साथ किया जा सकता है। यहाँ का शासक हस्तिवर्मन था।

पल्लक का उग्रसेन- इस शासक के सन्दर्भ में भी इतिहासकारों में मतभेद पाये जाते हैं। रायचौधरी के अनुसार पालक सम्भवत: गुण्टुर अथवा नौलोर स्थित पलक्कउ अथवा पालत्कट है। पल्लक को पल्लव लेखों में उल्लेखित पालक भी माना गया है जो नैलोर जिले में कृष्णा के दक्षिण में स्थित था।

देवराष्ट्र का कुबेर- फ्लीट वार्इ.आर. गुप्ता ने देवराष्ट्र को महाराष्ट्र माना है। लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। डुब्रियल के अनुसार विजगापट्टम (विशाखापत्तनम) जिले के कासिमकोट से प्राप्त ताम्रशासन मे देवराष्ट्र का उल्लेख एक प्रदेश के रूप में किया गया है।

कुस्थलपुर का धन्जय- कुरुस्थलपुर की भी समुचित पहचान नहीं हो सकी है। डॉ. बार्नेट ने कुस्थलपुर को उत्तरी अकट से पोलूर के निकट कुट्टालुर माना है। आयंगर ने इस प्रदेश को कुशस्थली नदी के आस-पास माना है।

आर्यावर्त की विजय- समुद्रगुप्त को उत्तरी भारत में पुन: लड़ाई लड़नी पड़ी थी। इस युद्ध में आर्यावर्त के नौ राजा थे। इन्होंने समुद्रगुप्त की अनुपस्थिति में एक संघ बना लिया था। इसके कुछ शासक तो वे थे जिन्हें समुद्रगुप्त प्रथम आर्यावर्त अभियान में परास्त कर चुका था। समुद्रगुप्त को दक्षिणापथ से लौटते ही निम्न शासकों से युद्ध करना पड़ा।

रुद्रदेव- इतिहासकारों ने इस रुद्रदेव का तादात्म्य वाकाटक वशीय रुद्रसेन प्रथम से किया है।

मतिल- उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर से कुछ मुहरें प्राप्त हुई हैं जिन पर मतिल नाम है। कुछ इतिहासकारों ने इस मतिल का तादात्म्य मतिल से किया है।

नागदत्त- इसके नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह भी नाग वंश से सम्बन्धित रहा होगा। मथुरा से प्राप्त कुछ सिक्कों पर दत्त उत्कीर्ण है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इसका शासन मथुरा के आसपास रहा होगा।

चन्द्रवर्मन- चन्द्रवर्मन का तादात्म्य बंगाल के बांकुरा जिले के सिसुनिया नामक स्थान से प्राप्त शिलालेख में वर्णित चद्रवर्मन से किया गया है। इस लेख में उसे पुष्करण नामक स्थान का शासक बताया गया है।

गणपतिनाग- इसके नाम से विदित होता है कि यह नागवंशीय शासक था। नारवार बेसनगर से इसके सिक्के प्राप्त हुए हैं। नन्दि-यह भी नागवंशीय नरेश था। पुराणों में नन्दिशस: और शिशुनन्दि को मध्यभारत का नागवंशीय नरेश बताया गया है लेकिन पुराणों की सूची में जिन राजाओं का उल्लेख है वे बहुत पहले के हैं। नन्दि की समुचित पहचान नहीं की जा सकी है।

बलवर्मा- कुछ इतिहासकारों ने इसका तादात्म्य हर्षवर्धन के समकालिक असम शासक भास्करवर्मन के पूर्वज से किया है।

आर्यावर्त के इन नौ शासकों को पुराणों के नव नाग भी कहा गया है। इस सम्भावना की ऐतिहासिक साक्ष्यों से पुष्टि होना आवश्यक है। ज्ञातव्य है कि गुप्तों का राजकीय चिह्न गरुड था और गरुड़ पक्षी सांपों का शत्रु माना जाता है।

आटविक- समुद्रगुप्त ने मध्यभारत के आटविक राज्यों के विरुद्ध भी अभियान किये। आटविक का सामान्य अर्थ है वनवासी। आटविक से तात्पर्य जंगली प्रजातियों से लगाया जा सकता है। समुद्रगुप्त द्वारा इन राज्यों की विजय की पुष्टि उसके एरण अभिलेख से होती है। फ्लीट के अनुसार आटविक राज्य उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से लेकर मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले तक फैले हुए थे।

प्रत्यंत राज्य- समुद्रगुप्त द्वारा लगातार अर्जित विजयों से वह अत्यन्त शक्तिशाली हो गया था। सीमान्तप्रदेशों के राजतंत्रात्मक व गणतंत्रात्मक राज्य भी उससे भयभीत होने लगे थे। वे समुद्रगुप्त के प्रति स्वयं ही आत्मसमर्पित हो गये थे।

समतट- बराहमिहिर ने बृहत्संहिता में भारत के पूर्वी भाग को समतट कहा है। ह्वेनसांग ने भी अपनी यात्रा विवरण में इसे ताम्रलिप्ति से पूर्व समुद्रतटवर्ती प्रदेश बताया है।

डवाक- फ्लीट् के अनुसार यह बंगलादेश का आधुनिक ढाका है। भण्डारकर ने इसे चटगांव और त्रिपुरा का पर्वतीय भूभाग बताया है।

कामरूप- कामरूप का आधुनिक नाम असम है। असम के गौहाटी जिले व उसके आसपास का क्षेत्र इसमें शामिल किया जा सकता है। यहाँ पर वर्मन वंश के शासकों का राज्य था।

नेपाल- समुद्रगुप्त के साम्राज्य की उत्तरी सीमा पर नेपाल राज्य स्थित था, हो सकता है। प्राचीन काल में यह इतना विस्तृत राज्य नहीं रहा हो। नेपाल के शासक का नाम प्रयाग प्रशस्ति में नहीं है।

कर्तृपुर- कर्तृपुर का तादात्म्य जिले के करतारपुर और कटरिया तक के भूभाग में स्थापित किया जाता है। इसकी पहचान के सन्दर्भ में विभिन्न प्रकार के मत व्यक्त किये जाते रहे हैं। स्मिथ इस प्रदेश के अन्तर्गत कुमायूँ, गढ़वाल और कांगड़ा के प्रदेशों को सम्मिलित मानते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार मुल्तान और लोहिनी के मध्य स्थित खरोर नामक स्थान कर्तृपुर था।

समुद्रगुप्त ने उत्तर, दक्षिण तथा पूर्वी भाग में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के पश्चात् पश्चिमी भारत की ओर ध्यान दिया। पश्चिमी भारत में उस समय अनेक गणतंत्रात्मक जातियों का अस्तित्व था। ये गणराज्य अत्यन्त प्राचीन थे। सिकन्दर के आक्रमणों का मुकाबला इन्होंने वीरता से किया था।

मालव- सिकन्दर के आक्रमण के समय यह जाति पंजाब के कुछ भागों पर शासन कर रही थी। ग्रीक इतिहासकारों ने इन्हें मल्लोई जाति से सम्बद्ध किया है। लेकिन मल्लोई जाति का शुद्ध समवर्ती मल्ल होगा।

आर्जुनायन- पाणिनि की अष्टाध्यायी में इनका उल्लेख मिलता है। बृहतसंहिता के अनुसार ये भारत के उत्तरी भाग में निवास करती थी। इनके सिक्के आगरा, भरतपुर, अलवर आदि स्थानों से मिले हैं। इनका सम्बन्ध पंजाब की पंडोई जाति से भी माना गया है। इनका शासन आगरा और मथुरा के पश्चिम, दिल्ली-जयपुर आगरा के त्रिकोण के बीच के क्षेत्र पर था।

यौधेय- पाणिनि ने इनका उल्लेख किया है। इसे आयुधजीवी संघ में बताया है जिसका तात्पर्य है कि इनका प्रमुख कार्य युद्ध करना था। इनके प्राचीनतम सिक्के दूसरी-पहली सदी ई.पू. के हैं।

मद्रक- मद्र देश का उल्लेखनीय उपनिषद व पाणिनि की अष्टध्यायी में हुआ है। शाकल इनकी राजधानी थी जो रावी और चिनाब के मध्य स्थित थी। शाकल का तादात्म्य पाकिस्तान के सियालकोट से किया जाता है।

आभीर- आभीरों का उल्लेख अष्टाध्यायी व महाभारत में हुआ है। ये पश्चिमी क्षत्रपों की सेना में सेनानायक पदों पर थे और परवर्ती काल में वे मध्य प्रदेश में बस गये थे, जिसके कारण झांसी और विदिशा के बीच का भूभाग अहीरवाद कहलाता है।

प्रार्जुन- कौटिल्य के अर्थशास्त्र में प्रार्जुनों का उल्लेख हुआ है। डॉ. स्मिथ ने इनका निवास-स्थान मध्य भारत का नरसिंह जिला बताया है।

सनकानिक- चन्द्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरी लेख में सनकानिक महाराज का उल्लेख गुप्तों के सामन्त के रूप में हुआ है। इसका निवास स्थान भिलसा था।

काक- काक सनकानिकों के पड़ोसी थे जो भिलसा के निकट राज्य करते थे। राखालदास बनर्जी ने इनकी पहचान कश्मीर के काकों से की है।

खर्परिक- इनकी समुचित पहचान नहीं हो सकी है। कई इतिहासकार इनका स्थान मध्य प्रदेश के दमोह जिले में मानते हैं। समुद्रगुप्त से कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित करने वाली विदेशी शक्तियों में देवपुत्रशाही-शाहानुशाही, शक, मुरुंड आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। देवपुत्रशाही-शाहानुशाही कुषाण वंश के प्रतीत होते हैं जिनका राज्य उत्तर पश्चिम में कायम था। देवपुत्र कनिष्क की उपाधि थी।

विदेशी शासकों के अन्तर्गत दूसरा नाम शकों का आया है। गुप्तों से मध्य तथा पश्चिमी भारत में शकों का शासन था। ये क्षत्रप कहलाते थे तथा इनकी राजधानी उज्जैयनी थी। कई इतिहासकार अभिलेख में वर्णित शकों को चेष्टन व रुद्रदामन का वंशज मानते हैं। शक नरेशों का एक लेख सांची के समीप मार्शल द्वारा खोज निकाला गया है। इसके अनुसार शकों का राज्य मध्य भारत में विद्यमान था।

शकों के बाद मुरुण्ड नाम मिलता है। संस्कृत में इसको स्वामिन कहा गया है। खोह अभिलेख में मुरुण्ड स्वामिनी नामक स्त्री का उल्लेख मिलता है। जैन ग्रन्थों में मुरुण्ड के राजा को कान्यकुब्ज का शासक कहा गया है जो पाटलिपुत्र में रहता था। सम्भवतः मुरुण्ड जाति समुद्रगुप्त के साम्राज्य के पश्चिमोत्तर भाग पर शासन करती होगी। समुद्रगुप्त के समुद्र पार के मित्रों में प्रयाग प्रशस्ति में सिंहल का उल्लेख है। सिंहल तथा सर्वद्वीपों के शासकों ने भी पश्चिमोत्तर भारतीय शासकों की भांति आत्मनिवेदन किया। समुद्रगुप्त का समकालीन सिंहल शासक मेघवर्ण था। महावंश के विवरण से स्पष्ट है कि मेघवर्ण ने गुप्त सम्राट् से बोध गया में मठ निर्माण करने की आज्ञा प्राप्त करने के उद्देश्य से दूत मण्डल भेजा। समुद्रगुप्त ने इसकी अनुमति तत्काल दी और सिंहल नरेश ने एक आलीशान विहार का निर्माण करवाया। ह्वेनसांग के भारत आने तक इसका आकार विशाल हो गया था। ह्वेनसांग लिखता है कि सिंहल नरेश ने भारत नरेश को भेंट में अपने देश के समस्त रत्न दे दिये थे। प्रयाग प्रशस्ति में सर्वद्वीपों का भी उल्लेख हुआ है। इन राज्यों ने भी दूत मण्डल और उपहार भेजकर समुद्रगुप्त से कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित किये होंगे। सर्वद्वीप वे छोटे द्वीप थे जिनका भारतीयकरण हो। चुका था और वहाँ पर भारतीय संस्कृति का प्रसार था। इनकी पहचान मलाया, जावा, सुमात्रा से की जा सकती है। प्राचीन भारतीयों ने इन प्रदेशों में अपने उपनिवेश और राज्य स्थापित कर लिए थे। इन द्वीपों पर भारतीय संस्कृति का पूर्ण प्रभाव था। कम्बोडिया में गुप्तकालीन मूर्तियाँ व मन्दिर प्राप्त हुए हैं।

प्रयाग प्रशस्ति से स्पष्ट है कि समुद्रगुप्त का साम्राज्य अत्यन्त विकसित था। समुद्रगुप्त का प्रभाव अफगानिस्तान, एशिया, सिंहल और दक्षिणी-पूर्वी एशिया के द्वीप समूह तक फैल गया था। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल उसके प्रत्यक्ष शासन के अन्तर्गत थे। आटविक राज्यों ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। दक्षिणापथ के राज्य उसके अप्रत्यक्ष शासन में थे। पूर्वी प्रान्त राज्य व गणराज्य उसके अधिराज्य थे। उत्तरी व पश्चिमी भारत का बहुत-सा भाग, जबलपुर, मध्य भारत का पठार भी इसके साम्राज्य में सम्मिलित थे। समुद्रगुप्त के साम्राज्य की भूमि अत्यन्त उपजाऊ थी। समुद्रगुप्त के द्वारा धारण किए जाने वाले विरुदों (उपाधियों) से भी उसके उत्कृष्ट विजेता होने की पुष्टि होती है। उसे हमेशा अपने बाहुबल एवं पराक्रम का ही सहारा रहता था। उसने पराक्रमांक की उपाधि धारण कीउसकी गरुड़ मुद्रा के ऊपर श्री विक्रम की उपाधि मिलती है।

समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ का सम्पादन किया। उसके सिक्के व अभिलेखों से इस बात की पुष्टि हो जाती है। अभिलेख में समुद्रगुप्त को चिरोत्सन्नअश्वमेधहता कहा गया है। इसका अर्थ है – दीर्घकाल से बंद अश्वमेध को पुनर्प्रचलित करने वाला। समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ अत्यन्त व्यापक रूप में किया था और सम्भवतः भूल जा चुके कमाँ को भी उन्होंने फिर से उसमें सम्मिलित करने का प्रयत्न किया था।

समुद्रगुप्त एक विजेता ही नहीं वरन् कुशल प्रशासक व कूटनीतिज्ञ था। उसने अपने विशाल साम्राज्य को संगठित करते हुए अपनी कूटनीतिज्ञता का परिचय दिया। उसने दक्षिणापथ के नरेशों के राज्यों को न छीन कर अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। वह इस बात से परिचित था कि पाटलिपुत्र में रहकर दूरस्थ भागों पर प्रत्यक्ष रूप से शासन करना असम्भव है। विभिन्न प्रकार के राज्यों के प्रति उसकी विभिन्न नीतियाँ उसकी सूक्ष्मदर्शिता एवं बुद्धिमत्ता को प्रकट करती हैं। देश व काल की परिस्थितियों के अनुरूप उसकी नीतियाँ व्यवहारिक थीं। समुद्रगुप्त ने बहुत सी उपाधियाँ धारण की थीं। इनमें पराक्रमांक उल्लेखनीय है। उसके सिक्कों पर समर-शत-वितत विजयी उत्कीर्ण मिलता है। समुद्रगुप्त द्वारा विशाल साम्राज्य के निर्माण से उसके सैन्य कौशल का बोध होता है। समुद्रगुप्त के सिक्कों पर श्री विक्रम, व्याघ्र, पराक्रम, अश्वमेध पराक्रम, सर्वराजोच्छेता, अप्रतिरथ जैसे विभिन्न प्रकार के विरुद मिलते हैं। इससे समुद्रगुप्त की वीरता का परिचय मिलता है। समुद्रगुप्त का यश, विजयों की व्यापक श्रृंखला व उसकी विशिष्ट नीतियाँ उसकी महानता सिद्ध करती हैं। कई इतिहासकार समुद्रगुप्त की तुलना नेपोलियन से करते हैं।

समुद्रगुप्त कलात्मक अभिरुचि वाला शासक था। अभिलेखों व सिक्कों से उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों की जानकारी मिलती है। उसके दरबार में बहुत से कवि थे। स्वयं समुद्रगुप्त के लिए कविराज की उपाधि मिलती है। प्राचीन काल में कविराज की उपाधि अत्यन्त महान् व्यक्ति को प्रदान की जाती थी। राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इस सन्दर्भ में लिखा है, कृष्णचरित नामक काव्य का रचयिता समुद्रगुप्त को माना गया है। इस ग्रन्थ के आन्तरिक साक्ष्य से इसकी पुष्टि होती है। सम्भव है कृष्ण-चरित का समुद्रगुप्त गुप्तवंशीय समुद्रगुप्त ही हो। कतिपय विद्वान् इस मत से सहमत नहीं है। स्वयं समुद्रगुप्त के लिए कविराज की उपाधि मिलती है। लेकिन उनकी कोई रचना अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। समुद्रगुप्त महान् संगीतज्ञ भी था। उसकी तुलना बृहस्पति, तुम्बरु, नारद जैसे संगीतकारों से की गयी है। स्पष्ट है कि वह वीणावादन में प्रवीण था। समुद्रगुप्त के वीणावादक सिक्कों से भी उसका संगीत प्रेम झलकता है। हरिषेण कहता है कि- इसने अपनी गान्धर्व कला से देवताओं के गरु तुम्बरु तथा नारद को लज्ज्ति कर दिया। वह काव्य व शास्त्रों के अध्ययन में भी रुचि रखता था। उसकी तीव्र बुद्धि कठिन शास्त्रों को भी समझ लेती थी। हरिषेण ने उसे शास्त्र तत्वार्थभर्तु कहा है। कला के प्रति भी समुद्रगुप्त की अभिरुचि थी। उसके समय शुद्ध सोने के सिक्के प्रचलित किये गये। इनका कलात्मक स्वरूप भी उत्कृष्ट है। पूर्व प्रचलित मिश्रित स्वर्ण मुद्रा का उसने त्याग कर दिया। स्वर्ण मुद्राओं के प्रचलन से गुप्त साम्राज्य की भौतिक उन्नति का बोध होता है। वह धार्मिक-प्रवृत्ति या सहिष्णु व्यक्ति था। उसके दानपत्रों व अभिलेखों से लगता है कि उसका झुकाव ब्राह्मण कर्म की तरफ था लेकिन अन्य धमाँ के प्रति भी सहिष्णु था।

रामगुप्त- समुद्रगुप्त न केवल गुप्त राजवंश परम्परा प्रत्युत भारत का एक महान् सम्राट् है। जैसा कि डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है- समुद्रगुप्त की प्रारम्भिक स्थिति चाहे जो भी रही हो वह गुप्त राजवंश का एक महान् सम्राट् था। इसी प्रकार स्मिथ ने लिखा है- समुद्रगुप्त अद्भुत व्यक्तिगत क्षमता का व्यक्ति था। उसमें असाधारण विभिन्न गुण थे। वह एक वास्तविक व्यक्ति, एक विद्वान्, एक कवि, एक संगीतज्ञ तथा सेनानायक था। इस प्रसंग हरिषेण की प्रयाग-प्रशस्ति में उत्कीर्ण निम्नांकित पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं— जिस प्रकार शिव की जटाजूट रूपी अंतर्गगुहा के बंधन से उन्मुख होने के पश्चात् गंगा का पवित्र जल तीनों ही लोकों को पवित्र करता हैं, ठीक उसी भाँति उस सम्राट् का संचित विमल यश, दान-परायणता, बाहुबल एवं शास्त्र-ज्ञान के उत्कर्ष द्वारा अनेक भागों से शान्तिपूर्वक ऊपर उठता हुआ तीनों लोकों को पवित्र करता है।

काफी समय 1923 ई. तक यही मान्यता थी कि समुद्रगुप्त के पश्चात् चन्द्रगुप्त द्वितीय शासक बना। गुप्तवंशावलियों में भी समुद्रगुप्त के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम आता है। किन्तु 1923 में सिलवां लेवी के माध्यम से विशाखदत्त के देवीचन्द्रगुप्तम नामक संस्कृत नाटक के प्रकाश में आने पर राम गुप्त का अस्तित्व स्वीकार किया जाने लगा।

चन्द्रगुप्त द्वितीय: 380-413 या 415 ई.

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को भारत के महानतम सम्राटों में से एक माना जाता है। उसकी महानता की अभिव्यक्ति कई क्षेत्रों में मुखरित हुई है। वह क्षेत्र चाहे साम्राज्य के विस्तार का हो, चाहे शासन की सुव्यवस्था का हो, चाहे सामाजिक समृद्धि का हो अथवा साहित्य और कला के उत्कर्ष का। चन्द्रगुप्त द्वितीय या चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का व्यक्तित्व और कृतित्व सर्वत्र उच्चतम शिखर पर दिखाई पड़ता है। जहाँ उसके साम्राज्य के विस्तार का प्रश्न है उसकी गणना भारत के सुप्रसिद्ध विजेताओं में की जाती है। उसको अपने पिता से एक विशाल साम्राज्य मिला था। उसने इस साम्राज्य की न सुरक्षा की प्रत्युत उसका अच्छा विस्तार भी किया। चन्द्रगुप्त द्वितीय का सबसे प्रबल शत्रु गुजरात और काठियावाड़ का शक शासक था। उसने शक शासक रूद्रसिंह तृतीय को पराजित कर उसके राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया। इससे गुप्त साम्राज्य की सीमाएँ पश्चिम में अरब सागर तक पहुँच गई। इसके परिणामस्वरूप भारत के पश्चिमी देशों से सांस्कृतिक और व्यापारिक सम्बन्धों के विकास को नए आयाम मिले। उसने पश्चिमोत्तर के छोटे-छोटे राज्यों का अंत कर उत्तर भारत के पश्चिमी भाग में गुप्त साम्राज्य की सीमा का विस्तार किया। यद्यपि महरौली के लोह स्तम्भ में जिस चन्द्र का उल्लेख किया गया है। उस पर इतिहासकार एक मत नहीं हैं, फिर भी यह कहा जा सकता है कि उन्होंने उत्तर-पश्चिम में वाह्लीक पर भी विजय स्थापित कर ली थी। यहाँ वाह्लीक से तात्पर्य बैक्ट्रिया (बल्ख) से नहीं बल्कि वाह्लीक जाति से है। उसके विजय-अभियानों में बंग विजय भी शामिल है। कुछ विद्वानों के अनुसार चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) ने दक्षिणपथ पर पुनर्विजय प्राप्त कर गुप्तवंश पर आधिपत्य स्थापित किया था। इन सामरिक विजयों के अतिरिक्त चन्द्रगुप्त अनेक शक्तिशाली राजवंशों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। इन विविध विजयों से चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को महान सेनानी और महान विजेता कहा गया है। उसका साम्राज्य पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में कश्मीर की दक्षिणी-पश्चिमी सीमा से लेकर दक्षिण-पश्चिमी में गुजरात और काढियावाड़ तक फैला हुआ था।

एक महान् विजेता होने के साथ चन्द्रगुप्त द्वितीय एक कुशल शासक भी था। उसने शासन की सुव्यवस्था की दृष्टि से विशाल गुप्त साम्राज्य को कई प्रान्तों में विभाजित कर दिया था (प्रान्तों को मुक्ति कहते थे)। प्रान्तों को जिलों में विभाजित कर दिया जाता था। जिला को विषय कहते थे। शासन में शीर्ष पर सम्राट् था जो समस्त सैविक और शासकीय शक्तियों का सर्वोच्च पदाधिकारी था। उसकी सहायता के लिए एक मंत्रि परिषद् होती थी। महाराजाधिराज, महाराज, परम भट्टारक, परम भागवत आदि उसकी विविध उपाधियाँ थीं।

गुप्त साम्राज्य में चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। भारत की साहित्यिक परम्परा में विक्रमादित्य का उल्लेखनीय स्थान है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में भी भारतीय धर्म, कला, संस्कृति आदि विभिन्न क्षेत्रों में उन्नति हुई।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन-काल के कई अभिलेख उपलब्ध हुए हैं जिनमें से कई तिथियुक्त भी हैं। काल क्रम की दृष्टि से मथुरा का स्तम्भ लेख सबसे पहला है। संस्कृत भाषा में लिखा हुआ यह पहला प्रमाणिक गुप्त लेख है जिसमें तिथि का उल्लेख हुआ है। अभिलेखों में परमभृट्टारक एवं महाराज की उपाधियाँ प्रयुक्त मिलती हैं। पाशुपत धर्म की लोकप्रियता का बोध होता है और पाशुपति धर्म के लकुलीश सम्प्रदाय की मथुरा में लोकप्रियता ज्ञात होती है।

आचार्य लकु लश भगवान शिव का अंतिम अवतार था। इस आचार्य के प्रमुख शिष्यों में से कुशिक भी एक था। उसने धर्म का प्रचार-प्रसार मथुरा में किया। इस परम्परा के आचार्यों को भगवान् की उपाधि प्रदान की जाती थी और उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके सम्मान में गुरु-मन्दिर में प्रतिमा स्थापित की जाती थी।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के दो लेख उदयगिरी (पूर्वी मालवा) से प्राप्त हुए हैं। एक लेख मध्य प्रदेश में दीदारगंज के उत्तर पूर्व में स्थित साँची से मिला है। चन्द्रगुप्त को देवराज से सम्बोधित किया गया है। इस अभिलेख में चन्द्रगुप्त के सेनापित आम्रकार्दव द्वारा काकनादबोट के बौद्ध संघ को भिक्षुकों के भोजन और प्रकाश की व्यवस्था के निमित्त ईश्वरवासक गाँव तथा 25 दीनारों के दान का उल्लेख हुआ है। गुप्तकालीन सांस्कृतिक जीवन की झांकी इसमें प्राप्त होती है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में गुप्त मुद्रा कला अत्यधिक विकसित हुई। उसने समुद्रगुप्त कालीन मुद्राओं के आदर्श पर सिक्कों को प्रचलित किया तथा कई मौलिक प्रकार की मुद्राएँ प्रचलित कीं। उसकी विभिन्न प्रकार की मुद्राओं (धनुर्धर, सिंह-हन्ता, राजा-रानी, छत्र, पर्यक, अश्वारुढ़ आदि) से उसके व्यक्तित्व, उपलब्धियों एवं साम्राज्य-विस्तार आदि विषयों पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। चन्द्रगुप्त द्वितीय प्रथम गुप्तकालीन शासक था जिसने चाँदी के सिक्के प्रचलित किये। रजत मुद्राएँ उसके राज्य की पश्चिमी सीमा को समझने में उपयोगी हैं। मुद्राओं से उसके साम्राज्य की समृद्धि, शान्ति तथा सांस्कृतिक प्रगति की जानकारी भी मिलती है। उसकी बहुत-सी ताम्र मुद्राएँ भी उपलब्ध हुई हैं।

साहित्यिक विकास की दृष्टि से भी चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल अत्यन्त समृद्ध है। यद्यपि कालिदास की तिथि अभी तक विवादास्पद है लेकिन अधिकांश विद्वान् इस मत को ही मानते हैं कि कालिदास चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपाधि) का ही समकालीन था। साहित्यिक साधनों में हम कालीदास की रचनाओं को रख सकते हैं जैसे रघुवंश, कुमारसंभव, मेघदूत, ऋतुसंहार, विक्रमोर्वशीय, मालविकाग्निमित्रम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्।

गुप्तकालीन वंशावलियों में समुद्रगुप्त के पश्चात् चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम आता है। गुप्तकालीन अभिलेखों में वर्णन आया है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय को समुद्रगुप्त ने अपना उत्तराधिकारी चुना। उसके लिए तत्परिगृह शब्द का प्रयोग मिलता है। इससे तात्पर्य है उसके पिता द्वारा ग्रहण किया हुआ।

स्कन्दगुप्त: 455-467 ई.

स्कन्दगुप्त कुमारगुप्त का पुत्र था। स्कन्दगुप्त एक वीर व पराक्रमी योद्धा था। इसने सम्भवतः कुमारगुप्त के पश्चात् शासक बनने की कोशिश की।

स्कन्दगुप्त के शासन-काल की बहुत सी घटनाएँ उल्लेखनीय हैं। उसने पुष्यमित्रों, म्लेच्छों तथा हूणों के साथ संघर्ष करके उन्हें पराजित किया। भितरी व जूनागढ़ अभिलेख में इसका उल्लेख है। भीतरी अभिलेख में कहा गया है कि अपने पिता के समय में, अपने वंश का भाग्य पुन: स्थापित करने के लिए ने एक रात पृथ्वी पर व्यतीत की और शत्रुओं को पराजित कर गुप्तों की मर्यादा को फिर से प्रतिष्ठापित किया। जूनागढ़ अभिलेख में भी कहा गया है कि अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् स्कन्दगुप्त ने पराक्रम से अपने शत्रुओं को पराजित किया और सभी दिशाओं में समुद्र तथा पृथ्वी को विजित किया जिसके चारों ओर समृद्ध राज्य थे। म्लेच्छ देशों में शत्रुओं के अभियान को जड़ से उखाड़ कर उसने घोषणा करवाई कि उसने विजय प्राप्त कर ली है। दोनों अभिलेखों से विदित हो जाता है कि स्कन्दगुप्त ने पुष्यमित्रों, म्लेच्छों तथा हूणों के साथ संघर्ष किया।

भीतरी अभिलेख के अनुसार स्कन्दगुप्त ने शक्तिशाली हूणों का सामना कर उन्हें पराजित कर पृथ्वी को हिला दिया। जूनागढ़ अभिलेख में कहा गया है कि स्कन्दगुप्त ने मानदर्प से अपने फणों को उठाने वाले सर्परूपी नरपतियों का दमन किया। उन्होंने म्लेच्छ देश से अपने शत्रुओं के दर्प को भग्न कर उन्हें अपनी विजय स्वीकार करने पर बाध्य किया। इस प्रकार उन्होंने समस्त पृथ्वी और अपने शत्रुओं के गर्व पर विजय प्राप्त की। कई इतिहासकार यह मानते हैं कि म्लेच्छों के साथ युद्ध का तात्पर्य भितरी अभिलेख से स्पष्ट रूप से उल्लेखित हूणों के साथ हुए युद्धों से है। कुछ का मानना है कि जूनागढ़ उल्लेखित म्लेच्छ हूण नहीं हैं। वे सम्भवत: किदार कुषाण हैं। आर्य-मंजूश्री-मूलकल्प से पता चलता है कि अपने युवराज काल में स्कन्दगुप्त ने पुष्यमित्रों पर विजय प्राप्त की और दूसरी महत्वपूर्ण विजय उसने हूणों पर प्राप्त की थी। इस ग्रन्थ से यह भी संकेत मिलता है की हूणों की संख्या विशाल थी जबकि स्कन्दगुप्त की छोटी। इतना होने पर भी विजय स्कन्दगुप्त को मिली। स्कन्दगुप्त ने पश्चिमी सीमा की सुरक्षा की ओर समुचित तरीके से ध्यान दिया। योग्य राज्यपालों की नियुक्ति की। 461 ई. के कहोम स्तम्भ लेख में गुप्तकालीन शान्ति की अवस्था का वर्णन है। इस समय तक गुप्त साम्राज्य विदेशी आक्रमणकारियों के भय से पूर्णतः मुक्त हो चुका था। इतिहासकारों के मध्य यह विवाद का विषय बना हुआ है कि स्कन्दगुप्त साम्राज्य की सुरक्षा प्रदान कर पाया अथवा नहीं। कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि इन युद्धों ने गुप्त साम्राज्य को जर्जरित कर दिया तथा स्कन्दगुप्त के समय से ही गुप्तों के साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो गया। यह धारणा युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होती क्योंकि स्कन्दगुप्त ने अपने अन्तिम समय तक उत्तराधिकार में प्राप्त गुप्त साम्राज्य को अक्षुण रखा।

स्कन्दगुप्त की सफलताओं का आधार उसकी प्रशासनिक व्यवस्था थी। उसने पश्चिमोत्तर सीमा का पूरा महत्त्व समझा और उसकी रक्षा का समुचित प्रबन्ध किया। स्कन्दगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में सौराष्ट्र (काठियावाड़) से लेकर पूर्व में बंगाल और उत्तर भारत के मध्यप्रदेश तक फैला हुआ था। वह एक विशाल साम्राज्य का मालिक था। उसका साम्राज्य विभिन्न प्रान्तों में विभाजित था।

गिरनार पर्वत पर सुदर्शन झील की मरम्मत करवाने में स्कन्दगुप्त ने तत्परता दिखाई। गुप्त संवत् 136 (455 ई.) में अधिक वर्षा के कारण सुदर्शन झील टूट गयी। पलाशिनी आदि नदियाँ जो निकटतम उर्जयत और खेतक नामक पर्वतों से निकल कर सुदर्शन झील में गिरती थीं, वे समुद्र की ओर बह निकलीं। स्कन्दगुप्त ने असीम धन खर्च कर दो महीने के भीतर ही दरार को बन्द कर बांध को पुनः बनवा दिया। स्कन्दगुप्त ने इसकी मरम्मत के लिए सौराष्ट्र के राज्यपाल पर्णदत्त को आज्ञा दी। पर्णदत्त ने यह उत्तरदायित्व अपने पुत्र चक्रपालित को सौंपा जिसने इस झील पर नया बांध बनाने के साथ एक विष्णु मन्दिर भी बनवाया। इसके अवशेष हमें प्राप्त नहीं हैं। यह बांध 100 हाथ लम्बा, 68 हाथ चौड़ा और 7 पुरिसा ऊँचा था। जूनागढ़ अभिलेख में सुदर्शन झील के निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी वर्णन है। उसके निर्माण में स्कन्दगुप्त की लोककल्याणकारी भावना विदित हो जाती है।

स्कन्दगुप्त ने तीन प्रकार की मुद्राएँ चलाई- धनुर्धर प्रकार, राजा और लक्ष्मी प्रकार एवं अश्वारोही प्रकार। पश्चिमी एवं मध्य भारत में चाँदी की मुद्राएँ भी प्रचलित कीं। स्कन्दगुप्त की मुद्राएँ शुद्ध सोने की नहीं हैं। उनमें अन्य धातु की मिलावट है। उसकी मुद्राओं से स्कन्दगुप्त के व्यक्तित्व के साथ-साथ तत्कालीन समाज के विभिन्न पक्षों की जानकारी मिलती है। मुद्राओं की धातु में मिलावट से यह अनुमान किया जाता है कि स्कन्दगुप्त के समय में गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था में गिरावट आने लगी थी। सिक्कों पर उसका विरुद विक्रमादित्य अंकित है। वेदी छाप प्रकार की रजत मुद्राओं पर विक्रमादित्य की उपाधि भी मिलती है। हो सकता है अपने पितामह के अनुकरण में ही यह मुद्रा धारण की हो। काहौम अभिलेख में उसे शक्रोपम कहा गया है।

स्कन्दगुप्त ने अपने पूर्वजों की भाँति धार्मिक सहिष्णुता का परिचय दिया। उसने भितरी (गाजीपुर) में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करवायी। सौराष्ट्र में चक्रपालित ने सुदर्शन झील के तट पर विष्णु के मन्दिर का निर्माण कराया। उसके अभिलेखों में परम भागवतो महाराजाधिराज श्रीस्कन्दगुप्तः का उल्लेख है। वह स्वयं वैष्णव था फिर भी वह जैन और बौद्ध धमों का समान रूप से पालन करता था। उसके साम्राज्य में सभी सम्प्रदायों को धार्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त थी।

स्कन्दगुप्त एक महान् विजेता, राष्ट्र का मुक्तिदाता, गुप्त साम्राज्य के विलुप्त गौरव की पुनस्थापना करने वाला उदार शासक था।

स्कन्दगुप्त का अन्तिम समय शान्तिपूर्ण ढंग से व्यतीत हुआ। कई इतिहासकार यह मानते हैं कि स्कन्दगुप्त के अन्तिम काल में, गुप्त साम्राज्य में पृथकतावादी प्रवृत्तियों का विकास होने लगा था। यह तो स्पष्ट है कि स्कन्दगुप्त ने अपनी जीवितावस्था तक गुप्त साम्राज्य की एकता बनाए रखी।