मौर्योत्तर काल

धर्म

मौर्य युग बौद्ध धर्म के उत्कर्ष का युग था। मौर्य साम्राज्य के पतन के उपरान्त शुंग और सातवाहन शासकों की धार्मिक नीतियों ने सनातन वैदिक धर्म के पुनरुत्थान का मार्ग प्रशस्त किया किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि बौद्ध या जैन धर्म के अस्तित्व एवं प्रगति पर विराम लग गया। वस्तुत: इस काल-खण्ड में वैदिक धर्म के उत्कर्ष के साथ बौद्ध धर्म भी विकास-पथ पर बढ़ता रहा। कुषाण शासक कनिष्क ने बौद्ध धर्म के उत्थान के लिए अनेक कार्य किए। यहाँ हम इस युग के धार्मिक परिदृश्य पर एक दृष्टि डालने का प्रयास करेंगे।

इस युग में धर्म को प्रभावित करने वाले दो महत्त्वपूर्ण कारक थे–

  1. यज्ञ का महत्त्व घट गया और यज्ञ का स्थान भक्ति ने ले लिया।
  2. एक अन्य धार्मिक और सामाजिक पहलू यह था कि बहुत सारे अनार्य तत्त्वों का आर्य समाज में आत्मसातीकरण हुआ।

बौद्ध धर्म- शुंग वंश के शासन-काल में बौद्ध धर्म को कुछ धक्का लगा। हालाँकि शुंग वंश के अंतर्गत ही भरहुत स्तूप का निर्माण हुआ था। सिनाडर, कुजुल कदफिसस और कनिष्क बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। कनिष्क के शासन-काल में पार्श्व के परामर्श पर चौथा बौद्ध सम्मेलन हुआ। कनिष्क ने पेशावर में स्तूप का निर्माण करवाया। दक्षिण के सातवाहन शासक और पश्चिमी भारत के क्षत्रप भी बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उदाहरण के लिए सातवाहन वशिष्ठ पुत्र पुलुमावी के शासन-काल में अमरावती स्तूप का परिष्कार कर, इसे संगमरमर के टुकड़ों से सजाया गया। पश्चिम भारत में सातवाहन शासकों के द्वारा कई गुफाएँ निर्मित करायी गई। ऐसी गुफाएँ नासिक, कालें भज, गुन्नार, कन्हेरी आदि स्थानों पर बनाई गयीं।

महायान बौद्ध धर्म- महायान बौद्ध धर्म का विकास प्रथम शताब्दी ई. पूर्व में आंध्र प्रदेश में हुआ। कनिष्क के समय इसे मान्यता प्राप्त हुई। प्रथम एवं द्वितीय शताब्दी के दौरान महायान धर्म संपूर्ण दक्षिण भारत में फैल गया। नागार्जुन महायान शाखा के प्रथम प्रवर्तक थे।

महायान मत पहले महासंघिका के द्वारा प्रतिपादित किया गया। इसके अनुसार सभी मनुष्य बुद्धत्व प्राप्ति की आकांक्षा रख सकते हैं और विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरकर बोधिसत्व की प्राप्ति कर सकते हैं। प्रतिभापूर्ण कायों से बोधिसत्व की प्राप्ति होती है जबकि हीनयान का मानना है कि बुद्धत्व प्राप्ति का द्वार सभी लोगों के लिए खोलना उचित नहीं है।

महायान बौद्ध धर्म के अन्तर्गत आने वाली विभिन्न संप्रदायों के प्रमुख केन्द्र इस प्रकार थे-

  • कौशाम्बी – यह थेरावादियों का केंद्र था।
  • मथुरा – यह सर्वास्तिवादियों का केंद्र था।
  • नासिक और कन्हेरी – ये भद्रयानिका के केंद्र थे।

सातवाहनों के शासन-काल में धान्यकटक (अमरावती) बौद्ध धर्म का महत्त्वपूर्ण केद्र था। उत्तर भारत में र्स्थावरवादी अधिक लोकप्रिय थे।

जैन धर्म- कलिंग का खारवेल नरेश जैन धर्म का महँ संरक्षक था। उसने तथा उसकी रानी नेजैन साधुओं के निर्वाह के लिए प्रभूत दान दिया थाऔर गुहाविहार बनवाए थे। कुशन काल में जैन धर्म मथुरा में लोकप्रिय था। मथुरा मूर्तिकला केंद्र में तीर्थंकरों की मूर्तियां निर्मित की गयीं। तमिल देश में तमिल राजाओं द्वारा कुछ गुफाएं जैन धर्म को अर्पित की गयीं। तमिल राजा नेटुमन अंजी ने दक्षिण के आर्काट जिले के जबाई नामक स्थान पर कुछ गुफाएँ जैनों को अर्पित कीं। सितानवसाल (जिला-पुड्डकोटई) में आम लोगों ने जैन साधुओं के लिए गुफाएँ अर्पित कीं।

जैन धर्म के प्रचार के लिए जैन साधुओं ने राहत सेवा दल संघटित किया। आरंभ में इस सेवा दल का उद्देश्य अकाल और भुखमरी से पीड़ित जैन साधुओं की सेवा करना था। परन्तु धीरे-धीरे यह राहत सेवा दल, धार्मिक सेवा दल में परिवर्तित हो गया और जैन धर्म का प्रचार इसका उद्देश्य हो गया। इस प्रकार का राहत सेवा दल सबसे पहले मौर्य काल में शुरू हुआ था। एक श्वेताम्बर परंपरा के अनुसार खारवेल के शासन-काल में जैन साधु मगध से पूर्वी आंध्र तट की ओर बस गए थे। हाथीगुंफा अभिलेख से भी इसकी पुष्टि होती है। एक अन्य परंपरा के अनुसार जैन मथुरा में बस गये। मथुरा में कंकाली टीले का खंडहर इसका प्रमाण है। कालकाचार्य की कहानी से यह पता चलता है कि प्रथम या द्वितीय शताब्दी में जैन धर्म मालवा की ओर फैल गया। जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि यह प्रारंभिक शताब्दी में गुजरात में फैल गया।

विभिन्न केंद्र- प्रथम और द्वितीय शताब्दी में राजगृह एक महत्त्वपूर्ण केद्र था। इस स्थल से श्वेताम्बर संप्रदाय के ब्रजमुनि का नाम जुड़ा हुआ है। मथुरा और उज्जैन भी महत्त्वपूर्ण केंद्र थे। तक्षशिला में सिरकप बौद्ध केद्र के साथ-साथ जैन केंद्र भी थे। उसी प्रकार भड़ौंच और सोपारा भी महत्त्वपूर्ण केंद्र थे।

ब्राह्मण धर्म-शैव उपासना- शिव से प्रथम परिचय सिंधु घाटी की सभ्यता में होता है। वैदिक युग में रुद्र एक साधारण देवता थे। उत्तर वैदिक काल के अन्त में उसका महत्त्व बढ़ गया। बाद में शिव उपासना के साथ भक्ति के तत्त्व भी जुड़ गए। तैत्तरीय संहिता और श्वेताश्वतर उपनिषद् में शिव की चर्चा मिलती है। श्वेताश्वर उपनिषद् में भक्ति का पहला उल्लेख मिलता है। इस ग्रंथ का ऋषि श्वेताश्वर भक्तिपूर्वक रूद्र की शरण लेता है। बौद्ध ग्रंथ निद्देश में शिव उपासकों की भी चर्चा है। सांख्यान, कौशितिकी एवं अन्य ब्राह्मणों में शिव एवं उसके अन्य नाम रुद्र, शिव, महादेव और महेश्वर भी मिलते हैं। कौशितकी ब्राह्मण में ईसन और महादेव की चर्चा है। अथर्ववेद में रूद्र का महत्त्व बढ़ गया। उनके सात नामों का उल्लेख होता है- रूद्र, भव, शर्व, पशुपति, उग्र, महादेव और इषन्। शतपथ एवं कौशितकी ब्राह्मण में उनके आठवें नाम अशनि का भी उल्लेख हुआ। उनके चार नाम दयालु रूप और चार विनाशक रूप को प्रदर्शित करते हैं। पाणिनी ने अष्टाध्यायी में शैव भागवत की चर्चा की है। श्वेताश्वर में रुद्र को परम ब्रह्म का पर्याय बताया गया है। उसमें कहा गया है- जो अपनी शक्ति से संसार पर शासन करता है, जो प्रबन्ध के समय प्रत्येक वस्तु के सामने विद्यमान रहता है तथा उत्पत्ति के समय जो सभी वस्तुओं का सृजन करता है, वह रुद्र है। मेगस्थनीज, डायोनिसस की पूजा का वर्णन करता है। ईसा पूर्व दूसरी सदी में पतंजलि ने शिव भागवतों की चर्चा की है और संकेत किया है कि उस समय शिव की मूर्तिपूजा आरंभ हो चुकी थी। पतंजलि ने शैव भागवत को अयस्स शुलिकाह कहा है (वह जो लोहे का डंडा धारण करता है)। शैव भावगत दंडजिन कहलाते थे। मद्रास के पास गुड्डीमलम एवं मध्यप्रदेश में भिटा से ऐसे लिंग प्राप्त होते हैं जिन पर शिव की आकृति भी मिलती है। महाभारत पाँच दार्शनिक विचारधाराओं में, सांख्य, योग, पांचरात्र और वेद के साथ पाशुवत स्कूल की भी चर्चा करता है। पुराणों के अनुसार पाशुपक्षसम्प्रदाय की प्रवर्तन लकुलीश नामक एक ब्रह्मचारी ने की थी। कहीं लकुलीश के स्थान पर लकुलिन, नकुलीश का प्रयोग हुआ है। उन्हें शिव का अट्ठाइसवाँ और अन्तिम अवतार मान लिया गया है। उनके विचार पाशुपत सूत्र में मिलते हैं। इसके आधार पर चौदहवीं सदी में माधवाचार्य ने सर्वदर्शन संग्रह लिखा। लकुलीश को पंचरात्रविद्या नामक ग्रंथ लिखने का श्रेय दिया जाता है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के मथुरा स्तंभ अभिलेख से लकुलीश के विषय में जानकारी मिलती है। लकुलीश के चार शिष्य थे- कुसिक, मित्र, गर्ग और कौरूस्य। लकुलीश शिव को समस्त सृष्टि का कारण मानते हैं और उन्हें पति कहते हैं। जीवात्मा को पशु माना गया है। पशु 23 भौतिक तत्त्वों के जाल में जकड़ा हुआ है। इनके लिए कला या पाश शब्द का प्रयोग हुआ है। किन्तु पशु का एक गुण विद्या भी है। इसके द्वारा वह कलाओं और पाशों से छुटकारा पाता है। इस मुक्ति के लिए उसे विधि के अनुसार व्रतों का पालन करना पड़ता है और द्वारों से गुजरना होता है। इसी से योग की स्थिति उत्पन्न होती है एवं पशु पति से मिलता है। इसके परिणामस्वरूप दु:खों का अन्त हो जाता है। आगे पाशुपत धर्म से ही कापालिक और कालामुख संप्रदाय का विकास हुआ। कार्यालयों के इष्टदेव भैरव हैं जो शंकर के अवतार माने जाते हैं। इस संप्रदाय के अनुयायी भैरव को ही सृष्टि का सर्जक और संहारक मानते हैं। भवभूति के मालती माधव नामक नाटक से पता चलता है कि श्री शैक नामक स्थान कापालिकों का प्रमुख केन्द्र था। कालामुख सम्प्रदाय के अनुयायी कापालिकों के ही वर्ग के थे। किन्तु वे अधिक अतिवादी थे। नर कपाल में भोजन करना, जल पीना, सुरा पीना तथा नटशव का भस्म शरीर पर लगाना आदि कार्य उनकी अतिमार्गी प्रवृत्ति व्यक्त करते हैं। शैव मत के अन्य सम्प्रदाय कश्मीर शैव, वीर शैव तथा विंगायत है।

कश्मीरी शैव सिद्धान्त कापालिक तथा कालामुख सम्प्रदाय जीवन शैली से भिन्न है। इस सम्प्रदाय में ज्ञान और ध्यान को परमब्रह्म की प्राप्ति का प्रधान आधार माना गया है। वीर शैव की अनुयायी लिंगायत या जंगम भी कहलाते हैं। बसव पुराण के अनुसार इस सम्प्रदाय का प्रवर्त्तन अल्लमप्रभु और उनके शिष्य बसव (या बसवण्ण) नामक ब्राह्मण ने किया था। ये लोग निष्काम कर्म में विश्वास करते हैं। लिंगायत लोग शिवलिंग को चाँदी के सम्पुट में बाँध कर अपने गले में लटकाए रहते हैं। शक शासक मोगा की मुद्राओं पर त्रिशूलधारी शिव अंकित है। उसी तरह गंडोफर्निस के कुछ सिक्कों पर त्रिशूलधारी शिव अंकित हैं। पार्थियन शासक गंडोफर्निस के सिक्के पर नन्दी, त्रिशूल और शिव चित्र अंकित है। कुषाण शास वीम कदफिसस के सिक्कों पर नन्दी, त्रिशूल और शिव का चित्र अंकित है। उसने अपने को महेश्वर कहा है। केन उपनिषद् शिव की पत्नी उमा को उच्च स्थान दिया गया है। अथर्वसिरस उपनिषद् में पाशुपत धर्म की चर्चा है। सिकन्दर के इतिहासकारों ने शिव पूजकों की चर्चा और उन्हें शिवई कहा है। अत: पूर्वी भारत में ही नहीं उत्तर भारत में भी धर्म का प्रसार हुआ था। ग्रीक इतिहासकार हेसियस ने कहा है कि वृषभ (बैल) गंधार का देवता था। आगे ह्वेनसांग भी कहता है कि पुष्कलावती के में एक देवता का मन्दिर है जो संभवत: शिव का मन्दिर है। पंतजर अभिलेख (122 ई.) उत्तर पश्चिम के महावन क्षेत्र में एक शिव स्थल की चर्चा करता है।

मार्शल ने प्रथम शताब्दी पूर्व में एक कांस्य मुद्रा तक्षशिला के सिरकाप नामक स्थल से प्राप्त की। इस पर शिव की आकृति है। इंडो-सिथियन (इंडोग्रीक), इंडो पार्थियन तथा कुषाण शासकों के सिक्के पर भी शिव का चित्र है। परन्तु वह भी मानवीय रूप में है। उनके साथ उनका पवित्र बैल नन्दी भी है। कुषाण शासक विमा कदफिसस स्वयं को महेश्वर अथवा महेश का भक्त कहता है। सभी कुषाण शासकों के सिक्के पर शिव को अपनी पत्नी उमा के साथ (जिसे अम्बा या दुर्गा कहा गया है) चित्रित किया गया है।

भागवत धर्म- पाणिनी सबसे पहले इस धर्म की चर्चा करता है। मेगस्थनीज हेराक्लीज की उपस्थिति की बात करता है। छांदोग्य उपनिषद् में यह कहा गया है कि वासुदेव कृष्ण, देवकी के पुत्र और ऋषि घोरा के शिष्य थे।

अनार्य देवता- इस युग में बहुत सारे यक्ष यक्षिणी, नाग और नागिनी की पूजा होती थी। इनके अतिरिक्त हाथी, घोड़े एवं गाय की पूजा भी होती थी। थुरा के कालियादाह नाग की कहानी से ऐसा प्रतीत होता है कि पहले मथुरा नाग पूजा प्रचलित थी। आगे वासुदेव कृष्ण की लोकप्रियता के सामने यह पीछे रह गई। गणेश पूजा पर भी नाग पूजा का प्रभाव है। गणेश को विनायक कहा जाता है। गणेश के अतिरिक्त कुमार कार्तिकेय की पूजा भी प्रचलित थी। गणेश पंचदेवतायन में शामिल थे। इसमें गणेश, विष्णु, शिव, शक्ति और सूर्य हैं। गणेश पूजा की छ: शाखाएँ प्रचलित थीं। अम्बिका के रूप में देवी का उल्लेख वाजसनेय संहिता में हुआ है। उमा शब्द का उल्लेख केन उपनिषद् में हुआ है। पेरीप्लस के अनुसर कन्याकुमारी में शक्ति पूजा कुमारी के रूप में की जाती थी। सातवाहन क्षेत्र में गौरी की पूजा का प्रचलन था। चक्रपूजा एक शाक्त अनुष्ठान है। इसमें नारी के अंग की पूजा चक्र के रूप में की जाती थी। शाक्तों वर्ग थे- 1.कौलिक- ये नारी के अंग की पूजा करते थे और 2.समयी- ये किसी सुंदर स्त्री के अंग की पूजा करते थे। इस युग में एक देवता जियस अम्ब्रियस की चर्चा मिलती है। इनकी पहचान इन्द्र अथवा पार्जन्य से हुई है। सिक्कों से ऐसा प्रमाणित होता है कि कुषाण साम्राज्य में ननैया, मित्र या मिहिर (सूर्य), माओ (चंद्रमा), फारो (अग्नि) जैसे वे दो बीलोनियन तथा ईरानियन देवता की भी पूजा होती थी। पार्थियन शासक गंडोफर्निस ने अपने सिक्के में अपने को देवव्रत या सुदेवव्रत कहा है। तारानाथ के अनुसार अश्वघोष बौद्ध बनने से पहले शिव का भक्त था। साहित्य में शिव के विभिन्न नाम हैं-ईश्वर, महेश्वर, जनाधि और शंकर। शिव के पुत्र कार्तिकेय की पूजा या तो अकेले या फिर स्कध के साथ होती थी। स्कंध, महासेन और कुमार को एक ही माना जा सकता है। किन्तु महाभारत कहता है कि विशाख का जन्म स्कंध के दक्षिण भाग में हुआ है। पतंजलि के अनुसार शिव स्कंद और विशाख की पूजा होती थी। पाशुपत संप्रदाय का उल्लेख महाभारत के नारायणीय खंड में मिलता है। शक्ति (दुर्गा) के सात नाम दिए गए हैं- ब्राह्म, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वराहि, नृसिंही और ऐन्द्रिव (ऐन्द्री)। देवी की अराधना तीन प्रकार से की जाती है- 1. समाधि (ध्यान द्वारा), 2. रहस्यपूर्ण चक्र पूजा और 3. सत्य सिद्धांत के द्वारा।

पुराणों में अनेक देवी-देवताओं का उल्लेख हुआ है, किन्तु उनमें पंचदेवताओं की अराधना प्रधान है। पंचदेवों में विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश और सूर्य आते हैं।

मौर्योत्तर काल में सामाजिक स्थिति

शुंग और सातवाहन वंश के शासक ब्राह्मण थे। अतएव उनके शासन-काल के समय में चार वर्णों पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मणों की सर्वश्रेष्ठ स्थिति होना स्वाभाविक था। ब्राह्मणों की सर्वश्रेष्ठता का पक्षपोषण तत्कालीन स्मृतियों से हो जाता है। उदाहरण के लिए मनुस्मृति में स्पष्ट शब्दों में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता की पुष्टि की गई है। मनु के अनुसार ब्राह्मणों को प्राणदण्ड की सजा नहीं दी जा सकती थी। ब्राह्मणों के लिए शूद्र का भोजन वर्जित था। यद्यपि मनु शुद्र अध्यापकों की चर्चा करते हैं किन्तु फिर भी वे शूद्र और दासों में कोई अंतर नहीं देख पाते। मनु ने 7 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है। इसके विपरीत यदि हम मौर्य युग की प्रख्यात विचारक की सुविख्यात रचना अर्थात कौटिल्य के अर्थशास्त्र में शूद्रों के विषय में देखते हैं  तो उसमें स्पष्ट रूप से यह पाते हैं कि कौटिल्य  शूद्रों को दास बनाना वर्जित ठहराते हैं- त्वेवार्यस्य दास भावः। इसी प्रकार याज्ञवल्क्य स्मृति में भी हमें शुद्रों के प्रति उदार दृष्टिकोण दिखलाई पड़ता है। इसके अनुसार शूद्रों को कृषक, कारीगर एवं व्यापारी बनने की स्वीकृति प्रदान की गयी है। मनु ने विपत्ति के समय निर्वाह के लिए 10 ऐसे व्यवसाय बताए हैं जो सभी वर्णों क लोग कर सकते हैं- (1) अध्ययन (2) शिल्पकर्म (3) मज़दूरी (4) सेवा (5) पशुपालन (6) व्यापार (7) कृषि (8) सन्तोष (9) भिक्षा और (10) ब्याज लेना।

सातवाहन युग में अभिजन या सत्ताभोगी दृष्टि से समाज का एक अन्य वर्गीकरण भी दिखलाई पड़ता है। यह वर्गीकरण इस प्रकार है-

  1. प्रथम वर्ग में सामन्त एवं शासक वर्ग के लोग थे जिन्हें महाराजमहारथी तथा महा सेनापति आदि, उपाधियां प्राप्त थीं।
  2. दूसरा वर्ग मंत्री, कोषाध्यक्ष, अन्य उच्च राजपदाधिकारी आदि का था।
  3. तीसरा वर्ग लेखकों, विद्वानों, वैद्यों, ज्योतिषियों आदि का था।
  4. चौथा वर्ग स्वर्णकारों, शिल्पियों एवं कृषकों आदि का था।

इस युग की सामाजिक दृष्टि से अन्य विशेषता, विदेशी जातियों का भारत की सामाजिक व्यवस्था में विलयन का था। भारतीय समाज में यवन, पहलव, शक आदियों के प्रवेश से कुछ समस्याएँ उत्पन्न हो गई थीं। इन जातियों ने भारतीय धमों को अंगीकर कर लिया था। इन लोगों में अधिकांश ने परम्परागत हिन्दू धर्म के किसी न किसी सम्प्रदाय को स्वीकार कर लिया अर्थात् कुछ शैव मतावलम्बी हो गए थे, कुछ ने वैष्णव धर्म को स्वीकार कर लिया था, कुछ ने बौद्ध तथा कुछ ने जैन। तत्कालीन समाज के सूत्रधारों को उनके भारतीय समाज में प्रवेश करने में कोई आपत्ति नहीं थी। उदाहरण के लिए भागवत पुराण में कहा गया है कि ये जातियाँ विष्णु पूजन से पवित्र हो गई हैं और यदि विदेशी जातियाँ विष्णु पूजन करती हैं तो पवित्र हो जाती हैं। इस प्रकार वैष्णव धर्म ने इन जातियों को ब्राह्मणधर्मी सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत समावेश एवं समायोजन का मार्ग बताकर हिन्दू समाज के द्वार उन लोगों के लिए खोल दिए जो मूलतया विदेशी थे किन्तु भारतीय सामाजिक व्यवस्था में आने के लिए इच्छुक थे। प्राचीन भारतीय इतिहास में इस प्रकार के साक्ष्यों का अभाव नहीं है, जब विदेशी जातियों ने भारतीय धर्म को स्वीकार कर भारत की धार्मिक परम्पराओं में अपनी निष्ठा व्यक्त की। ई.पू. और ईसवी सन् की प्रारम्भिक शताब्दियों के भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक साक्ष्य सुलभ हैं। उदाहरण के लिए बसनगर के अभिलेख में यह स्पष्ट है कि यवन राजदूत होलियोडोरस ने भागवत धर्म को अंगीकार कर लिया था और भगवान वासुदेव के सम्मान में एक गरुड़ध्वज समर्पित किया था। इसी प्रकार महाहत्रप सोडास के समय एक अन्य अभिलेख में भगवान वासुदेव के मन्दिर के प्रवेश द्वार और वेदिकाओं के निर्माण का उल्लेख है। कुषाण द्वारा बौद्ध धर्म अपनाए जाने से उनके भारतीय समाज में प्रवेश में किसी प्रकार की समस्या का प्रश्न नहीं था क्योंकि बौद्ध धर्म जाति-वर्ण इत्यादि को अस्वीकार करता है।

जहाँ तक इस युग में स्त्रियों की स्थिति का प्रश्न है, इस युग में समाज में स्त्रियों को सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता था। यद्यपि मनु ने उनके जीवन को काफी प्रतिबन्धित कर दिया था। कन्या, पत्नी और माता के रूप में क्रमश: पिता, पति और पुत्र द्वारा नियन्त्रित और संरक्षित मानी गई। सातवाहन काल में स्त्रियों की पहले की अपेक्षा अधिक अच्छी स्थिति हो गई थी, इसमें कोई सन्देह नहीं। सातवाहन राजाओं द्वारा अपने नाम के साथ माता का नाम जोड़ने की प्रथा, जैसे गौतमीपुत्र शातकर्णी, वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी समाज में स्त्रियों की मान्यता को इंगित करता है। रानी नायनिका ने अपने अल्पव्यस्क पुत्र की संरक्षिका के रूप में शासन चलाया था। गौतमी ने बलश्री को विदुषी और धर्मपरायण कहा है। स्त्री शिक्षा की ओर ध्यान दिया जाता था। बाल्यकाल से ही उनकी शिक्षा का प्रबन्ध किया जाता था। अनेक महिलाएँ शिक्षिका बनकर शिक्षण कार्य द्वारा जीवनयापन करती थीं। ऐसी स्त्रियां उपाध्याया कही जाती थीं। मनु के अनुसार विवाह के अवसर पर कन्या को जो कुछ दिया जाता था अर्थात् पति गृह जाते समय माता-पिता एवं भाई द्वारा दिया धन स्त्री को ही मिलता था, उसे स्त्री धन कहा जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति में स्त्री का हिस्सा होता था एवं इच्छानुसार अपने पास रख सकती थी। मनु ने यह भी निर्देशित किया है कि पति की मृत्यु के बाद नारी को उसकी स्त्री धन से वंचित न किया जाये। एक स्थान पर अपुत्रवती व्यभिचारिणी स्त्री की शुद्धि का उल्लेख कर उसकी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया है। हमें ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं जिनसे स्त्रियों की पर्दा प्रथा सिद्ध होती हो, किन्तु विवाह की अवस्था निरन्तर घटती जा रही थी। संभवत: यह पाश्चात्य आक्रमणकारियों के भारतीय समाज में प्रवेश के प्रयास का परिणाम था। मनु ने 30 वर्ष के पुरुष को 12 वर्ष की कुमारी अथवा 24 वर्ष के पुरुष को आठ वर्ष की बालिका से विवाह की अनुमति प्रदान कर दी। इसका प्रभाव स्त्री शिक्षा पर तो पड़ा ही बल्कि मानसिक विकास पर भी इसका बुरा असर हुआ। वैदिक काल में जिन विशेष परिस्थितियों में तलाक की अनुमति थी उसे भी बुरा समझा जाता था।

विधवाओं के पुनर्विवाह पर रोक के साथ सती प्रथा का आविर्भाव हुआ। महाभारत के कुछ उल्लेखों और यवन लेखकों द्वारा कुछ वास्तविक घटनाओं की चर्चा से स्पष्ट है कि इस काल में यह प्रथा प्रचलित थी। अरिस्टोबुलस ने इस विषय में कुछ छान-बीन कर लिखा है कि कुछ अवस्थाओं में स्त्रियाँ से अपने पति की चिता पर जल मरती हैं। जो ऐसा नहीं करती वे समाज हेय दृष्टि से देखी जाती हैं। यद्यपि आरम्भिक धर्मशास्त्रों में इस प्रथा को मान्यता नहीं दी गयी है तथापि इससे स्पष्ट होता है कि क्रूर प्रथा को जनता प्रोत्साहित करती थी।

ब्राह्मण एवं बौद्ध साहित्यिक ग्रंथों से दास प्रथा के प्रचलन की जानकारी मिलती है। मनु ने शूद्रों से दास कर्म करवाये जाने का उल्लेख किया है। उसने सात प्रकार के दासों का जिक्र किया है- ध्वजाहत (युद्ध में जीता गया), भक्तदास (भोजन हेतु बना दास), गृहज (दासी पुत्र), क्रीत (मूल्य देकर क्रय किया। हुआ), दत्तिम (किसी द्वारा दिया हुआ), पैत्रिक (पैतृक रूप से चला आ रहा), दण्डदास (दण्ड या ऋण न चुका पाने के कारण)। महाभाष्य में दो प्रकार के दासों का जिक्र आया है-क्रीत एवं परिक्रीत। परिक्रीत दास निश्चित अवधि के लिए निश्चित द्रव्य के आधार पर परिचारक के रूप में रखे जाते थे एवं क्रीत दासों को सुनिश्चित धन से क्रय किया जाता था जो उतना धन लौटाये जाने पर स्वतंत्र हो जाता था। स्मृत्तियों में दासों के प्रति उदार व्यवहार और मुक्ति के नियम दिये गये हैं।

इस तरह मौर्योत्तर काल को सामाजिक परिवर्तनों एवं समन्वय का युग कहा जा सकता है। उत्तर भारत दक्षिण से जुड़ने लगा और सांस्कृतिक दृष्टि से एकता के सूत्र में परिबद्ध होने लगा। इस काल में न केवल विविध जातियों और धर्मावलम्बियों का भारतीय समाज में विलीनीकरण संभव हुआ बल्कि भारत ने एक राष्ट्र के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना विशिष्ट स्थान बना लिया।

मौर्योत्तर काल में राजनीतिक व्यवस्था

शुंग-सातवाहन-शक युगीन सभ्यता के मुख्य पहलू

मौर्योत्तर युग में भारत के राजनैतिक परिदृश्य पर तीन राजवंशों का प्रभुत्व दिखलाई पड़ता है। ये राजवंश है शुंग, सातवाहन तथा शक राजवंश। यह युग राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा साहित्य, कला और संस्कृति की दृष्टि से अपने पूर्ववर्ती युग से कई अर्थों में भिन्न है। राजनैतिक दृष्टि से उस काल-खण्ड में तीन प्रसिद्ध और शक्तिशाली राजवंशों का उत्कर्ष हुआ। शुंग सातवाहन तथा शक राजवंश थे। इन तीनों राजवंशों ने शक्तिशाली किन्तु लोक कल्याणकारी शासन-व्यवस्था की स्थापना की। शुंग राजवंश का संस्थापक पुष्यमित्र शुंग था। उसने मगध साम्राज्य के विघटन पर एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की। उसके शासन-काल में विदेशी आक्रमणकारियों का प्रतिरोध हुआ तथा वैदिक धर्म का पुनरुत्थान हुआ। शुगों ने उत्तर भारत के एक विशाल भू-भाग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। सातवाहन वंश का उद्भव और उत्थान दक्षिण भारत में हुआ। सिमुक इस राजवंश का संस्थापक था। शातकर्णी, गौतमीपुत्र शातकर्णी और यज्ञ श्री शातकर्णी इस राजवंश के सुविख्यात शासक थे। कुषाण साम्राज्य का सबसे प्रतापी सम्राट् कनिष्क था। उसने एक सुव्यवस्थित शासन की स्थापना की।

राजनैतिक व्यवस्था

मौर्योत्तर युग की राजनैतिक व्यवस्था मौर्य काल की राजनैतिक व्यवस्था का प्रति रूप था। मगध के सम्राटों के शासन की संरचना इस समय भी एकतंत्रात्मक थी। किन्तु इस काल-खण्ड में साम्राज्य अनेक राजनैतिक इकाइयों, जनपदों, प्रदेशों या क्षेत्रों में विभाजित था। उन्होंने मगध सम्राट् के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया था। मगध सम्राट् जनपदों के धर्म, आचार-व्यवहार, सामाजिक व्यवस्था इत्यादि में कोई हस्तक्षेप नहीं करता था। इन जनपदों से मगध-सम्राट् कर या बलि वसूल किया करते थे। प्रत्येक जनपद का एक केन्द्रीय नगर होता था जिसे पुर कहा जाता था। इसके अभिजन (श्रेष्ठ नागरिक) जनपद सभा में एकत्रित हुआ करते थे। अधिकांश जनपदों में यह सभाएँ किसी न किसी रूप में विद्यमान थीं। रूद्रदामा के शिलालख में पौर जानपदों का उल्लेख इस तथ्य का एक प्रबल साक्ष्य है। इसी प्रकार कलिंग सम्राट् खारवेल ने भी पौर जानपदों का उल्लेख हाथी गुम्फा अभिलेख में किया था। जहाँ तक सम्राट् का प्रश्न है सम्राट् राजनैतिक व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी होता था। समस्त राजनैतिक व्यवस्था का वह सूत्राधार होता था किन्तु राजा स्वेच्छाचारी नहीं होता था। वह सुस्थापित परम्पराओं द्वारा निर्देशित तथा नियंत्रित होता था। इन परम्पराओं का संकलित स्वरूप मनुस्मृति में उपलब्ध था। मनुस्मृति में राजा को देवताओं यथा इन्द्र, वायु, यम्, सूर्य, अग्नि, वस्त्र, चन्द्रमा, कुबेर आदि के अंशों का प्रतीक माना गया है। जिस प्रकार राजा ईश्वरीय है, उसी प्रकार दंड भी ईश्वरीय है। जो परम्परागत धर्म और व्यवहार चले आते हैं वही दण्ड है, वही वस्तुत: दैवी है। दण्ड जिस प्रकार प्रजा को दण्डित करता है उसी प्रकार राजा भी दण्ड के अधीन है। जो राजा परम्परागत धर्म और व्यवहार के अनुसार चलता वह उन्नति करता है, जो राजा कामी, विषयी और अनाचारी होता है वह दण्ड द्वारा समस्त कर देता है। शासन-कार्य में राजा को सहायता देने के लिए मंत्रि परिषद् माल विकाग्नि मित्रम् के अनुसार राजा (शुंगवंशी अग्निमित्र के संदर्भ में) युद्ध और सन्धि के प्रत्येक विषय पर अमात्य परिषद् से परामर्श लेता था।

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *