शक एवं पार्थियन

शक

प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में उत्तर पश्चिमी भारत में यूनानी राज्य का अन्त हो गया और उसके स्थान पर मध्य एशिया की शक जाति ने अपना आधिपत्य स्थापित किया। शक वंश के उद्भव का इतिहास बड़ा प्राचीन है। द्वितीय शती ईसा पूर्व में संभवत: काफिरिस्तान तथा हजारा क्षेत्र में शकों का राज्य था। फारस के राजा डेरियस (522-486 ई.पू.) के समय शक लोग सोग्डियन के बाहर संभवत: जरसेक्स (जरजेस) या सीर दरिया के मैदानी इलाके में निवास करते थे किंतु प्रथम शती ई.पू. के अन्तिम दशकों में सीगल (सीस्तान) के निवासी बस गये। रैप्सन ने शकों के निवास-स्थान के विषय में तीन स्थापनाएँ की हैं। हेरोडोटस के कथन के आधार पर इन्हें बैक्ट्रियनों का पड़ोसी कहा जा सकता है। दूसरा स्थान फारस या पर्सिया के ड्रेगनियना क्षेत्र में हेलमड नदी के किनारे आधुनिक सीस्तान हो सकता है जिसे शकों का निवास या शकस्तान भी कहा है। तीसरे मत के अनुसार ये लोग समुद्र के किनारे काले सागर के उत्तर में रूसी साम्राज्य के समीप में, बैक्ट्रियन प्रदेश के उत्तरी पश्चिमी भाग में निवास करते थे।

भारत में शक सिदियन के नाम से भी जाने जाते हैं। कुछ ग्रंथों में उनके लिए शक-पह्लव शब्द का प्रयोग किया गया है। इसलिए ऐसा भी माना जाता है कि संभवत: शक और पार्थियन एक ही समूह से संबद्ध थे। माना जाता है कि शक बोलन दरें के रास्ते से भारत आए और निचले सिंधु क्षेत्र में स्थापित हो गए। शकों की पाँच शाखाएँ भारत में शासन करती रहीं। पहली शाखा अफगानिस्तान में स्थापित थी। दूसरी शाखा पंजाब में स्थापित हुई और तक्षशिला उसकी राजधानी हुई। तीसरी शाखा मथुरा में स्थापित हो गई। चौथी शाखा पश्चिम भारत में स्थापित हुई, जो चौथी सदी तक शासन करती रही। पाँचवीं शाखा उत्तरी दक्कन में स्थापित हुई। यूनानी, रोमन और चीनी वृत्तान्त से शकों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। भारतीय ग्रंथों में पतंजलि के महाभाष्य से भी इसके बारे में सूचना प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त पुराणों एवं महाकाव्यों से भी इन पर कुछ प्रकाश पड़ता है। प्रथम शक शासक मोगा या माऊस था। उसका उत्तराधिकारी एजेय था। इसने अन्तिम ग्रीक शासक हेसाट्रेटस को भारत से खदेड़ दिया। पश्चिम भारत का एक महत्वपूर्ण शासक रूद्रामन (130 ई.150 ई.) था। वह दो कारणों से इतिहास में प्रसिद्ध है- (1) उसने सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई। इसका व्यय उसने व्यक्तिगत कोष से दिया, (2) दूसरे, उसने संस्कृत का पहला बड़ा अभिलेख लिखवाया। यह जूनागढ़ अभिलेख के नाम से जाना जाता है।

उज्जैन का प्रथम स्वतंत्र शासक चष्टन था। माना जाता है कि मालवा के एक भारतीय शासक ने 58 ई.पू. में एक शक शासक को पराजित कर विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। इसी के उपलक्ष्य में उसने विक्रम संवत चलाया, जो 57 ई.पू. से शुरू होता है। माना जाता है कि भारत में अभी तक कुल 14 विक्रमादित्य हुए हैं।

पार्थियन

महत्वपूर्ण शासक गण्डोफर्निस था। इसके समय में महत्वपूर्ण इसाई संत टॉमस इजराइल से भारत आए। उसका उत्तराधिकार एबडागासेस था। संभवत: पार्थियनों की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी क्योंकि उसके समय के बहुत कम चांदी के सिक्के प्राप्त होते हैं।