श्रमिक विधान का विकास

19वीं शताब्दी में यूरोप में हुये औद्योगीकरण के परिप्रेक्ष्य में, भारत में इस अवधि में विभिन्न कारखानों एवं बागानों में कार्य की दशायें अत्यंत दयनीय थीं। कार्य के घंटे काफी-लंबे थे तथा पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं एवं बच्चों को भी काफी लंबे समय तक काम करना पड़ता था। इन मजदूरों का वेतन भी काफी कम […]

भारत का पड़ोसी देशों के साथ संबंध

भूटान 1816 में असम के अधिग्रहण ने अंग्रेजों को पड़ोसी राज्य भूटान के निकट सम्पर्क में ला दिया। भूटानियों द्वारा समय-समय पर असम एवं बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में की जाने वाली लूटपाट, 1863-64 में लार्ड एल्गिन के प्रतिनिधि  से दुर्व्यवहार एवं उस पर थोपी गयी शर्ते, जिसके कारण अंग्रेजों को असम के सभी महत्वपूर्ण […]

ब्रिटिश शासन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

भारत में प्रारंभिक आक्रमणकारियों और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों में मुख्य अंतर यह था कि अंग्रेजों के अतिरिक्त किसी अन्य प्रारंभिक आक्रमणकारी ने न ही भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना में परिवर्तन किया और न ही धन की निरंतर निकासी का सिद्धांत अपनाया। भारत में ब्रिटिश शासन के फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था, उपनिवेशी अर्थव्यवस्था में रूपांतरित हो गयी तथा […]

भारतीय प्रेस और प्रेस अधिनियमों का इतिहास और विकास

भारत का पहला समाचार-पत्र जेम्स आगस्टस हिक्की ने 1780 में प्रकाशित किया, जिसका नाम था द बंगाल गजट या कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर। किंतु सरकार के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाने के कारण 1872 में इसका मुद्रणालय जब्त गया। जैसे- द बंगाल जर्नल, कलकत्ता क्रॉनिकल, मद्रास कुरियर तथा बाम्बे हैराल्ड इत्यादि। अंग्रेज अधिकारी इस बात से भयभीत थे […]

भारत में ट्रेड यूनियनों का विकास

भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के प्रारंभ में भारत में आधुनिक उद्योग-धंधों की नीव पड़ी। 1853 के पश्चात भारतीय संचार साधनों में मशीनों का प्रयोग होने लगा। रेल लाइनों के बिछानों तथा इंजन के लिये कोयला निकालने में हजारों श्रमिकों की रोजगार मिला। यह भारतीय श्रमिक वर्ग का प्रारंभिक काल था। […]

भारत में शिक्षा का विकास

प्रारंभिक 60 वर्षों तक ईस्ट इंडिया कंपनी एक विशुद्ध व्यापारिक कंपनी थी। उसका उद्देश्य व्यापार करके केवल अधिक से अधिक लाभ कमाना था तथा देश में शिक्षा को प्रोत्साहित करने में उसकी कोई रुचि नहीं थी। इन वर्षों में शिक्षा के प्रोत्साहन एवं विकास हेतु जो भी प्रयास किये गये, वे व्यक्तिगत स्तर पर ही […]

भारत में अंग्रेजी शासन की सामाजिक एवं सांस्कृतिक नीति

1813 तक अंग्रेजों ने भारत के सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन में अहस्तक्षेप की नीति अपनायी, किंतु यूरोप में 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में हुये महत्वपूर्ण परिवर्तनों के प्रकाश में ब्रिटेन के हितों एवं विचारधाराओं में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुये फलतः 1813 के पश्चात अंग्रेजों ने भारतीय समाज एवं देश के सांस्कृतिक वातावरण में परिवर्तन […]

भारत में सिविल सेवाओं का विकास

लार्ड कार्नवालिस (गवर्नर-जनरल, 1786-93) पहला गवर्नर-जनरल था, जिसने भारत में इन सेवाओं को प्रारंभ किया तथा उन्हें संगठित किया। उसने भ्रष्टाचार को रोकने के लिये निम्न कदम उठाये- वेतन में वृद्धि। निजी व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध। अधिकारियों द्वारा रिश्वत एवं उपहार इत्यादि लेने पर पूर्ण प्रतिबंध। वरिष्ठता (seniority) के अधर पर तरक्की (Promotion) दिए जाने […]

कंपनी प्रशासन के अधीन संविधान का विकास

1773 से 1858 तक बक्सर के युद्ध (1764) के पश्चात, 12 अगस्त 1765 को क्लाइव ने तत्कालीन मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय से एक फरमान द्वारा बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) प्राप्त कर ली। इसके बदले ईस्ट इंडिया कंपनी ने बादशाह को 26 लाख रुपये वार्षिक देना स्वीकार किया। अवध का नवाब शुजाउद्दौला […]

भारतीय रियासतें, एकीकरण एवं विलय

भारतीय रियासतों की संख्या 562 थी तथा इनके अंतर्गत 7,12,508 वर्ग मील का क्षेत्र था। इन भारतीय रियासतों में से कुछ रियासतें तो अत्यंत छोटी थीं, जैसे- बिलबारी, जिसकी जनसंख्या केवल 27 थी तथा वार्षिक आय मात्र 8 रु.। जबकि कुछ रियासतें अत्यंत बड़ी थीं, जैसे- हैदराबाद (लगभग इटली के बराबर) जिसकी जनसंख्या 1 करोड़ […]

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