प्रागैतिहासिक काल

प्रागैतिहासिक काल Prehistoric Era

मानव सभ्यता का इतिहास वस्तुतः मानव के विकास का इतिहास है। मनुष्य का पृथ्वी पर कब और कैसे अवतरण हुआ, यह निश्चित और निर्विवादित रूप में आज भी कहना सम्भव नहीं है। लम्बे समय तक अन्धविश्वास और कल्पना के कोहरे में आवृत्त यह प्रश्न अनुतरित रहा। आधुनिक युग में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक आविष्कारों ने प्रकृति के अन्य रहस्यों के उद्घाटन की भाँति मानव के उद्भव और विकास के रहस्यों के उद्घाटन में योग दिया है। इसके परिणामस्वरूप आज मानव के उद्भव और विकास का क्रमबद्ध विवेचन प्रस्तुत किया जा सकता है। मानव सभ्यता के क्रमिक विकास के युगानुगत विवेचन का नाम इतिहास है। मानव सभ्यता का इतिहास सुदूर अतीत में फैला हुआ है। मानव सभ्यता के इतिहास का वह काल-खण्ड जिसके सम्बन्ध में हमारा ज्ञान मूलतया पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधारित है, प्रागैतिहासिक काल कहलाता है। प्रागैतिहासिक शब्द ऐसे काल को ध्वनित करता है जिसका आविर्भाव मानव रूप प्राणियों के आगमन के साथ एवं ऐतिहासिक काल के आगमन के पूर्व हुआ था। इस काल में मनुष्य लेखन-कला से सर्वथा अपरिचित था। इसलिए इतिहासकारों ने इसे प्राक् साक्षर काल भी कहा है। ऐतिहासिक काल से आशय मानव इतिहास के उस काल से है जिसके अध्ययन के लिए हमें उस युग के निश्चित साक्ष्य सुलभ है। प्रागैतिहासिक एवं ऐतिहासिक कालों में कालगत समता नहीं है। मानव इतिहास का 90% भाग प्रागैतिहासिक काल के अन्तर्गत आता है, शेष 10% ऐतिहासिक काल के अन्तर्गत। यहाँ हम इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्रागैतिहासिक काल की मानव सभ्यता को तीन महत्त्वपूर्ण भागों में बाँट सकते हैं-

1. प्रागैतिहासिक काल (मानव इतिहास के प्रारम्भ से लगभग 3000 ई.पू. तक का काल) इतिहास का वह भाग जिसके अध्ययन हेतु केवल पुरातात्विक समग्रियां पलब्ध हैं, प्रागैतिहासिक काल कहलाता है।

2. आद्य ऐतिहासिक काल- (3000 ई.पू. से 600 ई.पू. तक) सिंधु एवं वैदिक सभ्यता इस काल से संबंधित है। इसके अध्ययन हेतु पुरातात्विक एवं साहित्यिक दोनों प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं, परंतु पुरातात्विक साक्ष्यों का ही उपयोग हो पाता है। वैदिक साहित्य इसका अपवाद है।

3. ऐतिहासिक काल- (600 ई.पू. के पश्चात् का काल) इस काल के अध्ययन हेतु पुरातात्विक, साहित्यिक तथा विदेशियों के वर्णन, तीनों प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं। प्रागैतिहासिक काल-यह तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

  • पुरापाषाण काल- 5 लाख ई.पू. से 10 हजार ई.पू. तक।
  • मध्यपाषाण काल- 10 हजार से 6 हजार ई.पू. तक।
  • नवपाषाण काल- 6 हजार ई.पू. के पश्चात्।

पुरापाषाण काल

भारत की पुरापाषाणयुगीन सभ्यता का विकास प्लीस्टोसिन या हिम युग से हुआ। प्लीस्टोसिन काल में पृथ्वी की सतह का बहुत अधिक भाग, मुख्यत: अधिक ऊँचाई पर और उसके आसपास के स्थान पर बर्फ की चादरों से ढका था। आज से 10 लाख वर्ष पूर्व यह ग्रह अत्यन्त ठंडा होने लगा। ध्रुव प्रदेशों में बड़े-बड़े हिमनद प्रचण्ड वेग से नीचे उतरे जो 45° या उससे भी नीचे अक्षांशों तक पहुँच गये। फिर भूमध्य रेखा के निकट ही इसका प्रभाव पृथ्वी और विभिन्न जीवों पर पड़ा।

भारतीय पुरापाषाण युग को मानव द्वारा प्रयोग किये जाने वाले पत्थर के औजारों का स्वरूप तथा जलवायु में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर तीन अवस्थाओं में बाँटा जाता है। प्रथम अवस्था को आरम्भिक या निम्न पुरापाषाण युग कहा जाता है। इसका काल लगभग 5 लाख ई.पू. से 50 हजार ई.पू. तक माना जाता है। दूसरा काल मध्य पुरापाषाण युग है। इसकी अवधि लगभग 50 हजार ई.पू. से 40 हजार ई.पू. तक निर्धारित की जाती है। तीसरा काल उपरी पुरापाषाण युग था जिसका काल 40 हजार ई.पू. से 10 हजार ई.पू. तक रहा।

निम्न पुरापाषाण युग

इसका अधिकांश भाग हिमयुग से गुजरा है। इस काल के महत्त्वपूर्ण उपकरण हैं-कुल्हाड़ी या हस्त कुठार (Hand Axe), विदारणी (Cleaver) और खंडक चापर (Chopper)। इस समय मानव गंगा और यमुना के मैदान एवं सिंधु के कछारी मैदानों में नहीं बसा था।

भारत के विभिन्न भागों में पाए जाने वाले पूर्व पाषाण काल के उपकरणों को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है- चापर चापिंग पेबुल संस्कृति तथा हैण्ड एक्स संस्कृति। चापर बड़े आकार वाला वह उपकरण है जो पेबुल से बनाया जाता है। पत्थर के वे टुकड़े जिनके किनारे पानी के बहाव के कारण चिकने और सपाट हो जाते हैं, पेबुल कहलाते हैं। निम्न पुरा पाषाणकाल में उपकरण-निर्माण की विधियाँ दो प्रकार की थीं- कोर विधि तथा फ्रेक विधि। किसी पत्थर के टुकडे के आघात द्वारा पृथक किया गया भाग फ्रेक तथा उसका आन्तरिक भाग कोर कहलाता है।

निम्न पुरापाषाण स्थल भारतीय उपमहाद्वीप के लगभग सभी क्षेत्रों में प्राप्त होते हैं। इनमें आसाम की घाटी भी सम्मिलित है। एक महत्त्वपूर्ण निम्न पुरापाषाण स्थल सोहन की घाटी (पाकिस्तान) में मिलता है। यह सोहन सस्कृति के नाम से जाना जाता है। इस युग के महत्त्वपूर्ण स्थल हैं, सोहन की घाटी, बेलन घाटी, आदमगढ़, भीमबेटका, नेवासा आदि। कई स्थल कश्मीर एवं थार मरुभूमि में भी प्राप्त हुए हैं किन्तु निम्न पुरापाषाण युग के औजार कश्मीर में ज्यादा नहीं मिले हैं क्योंकि हिमानी युग में कश्मीर में अत्यधिक ठंड पड़ती थी। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के पास बेलन घाटी तक महत्त्वपूर्ण निम्न पुरापाषाण स्थल था। इसी तरह राजस्थान के मरुभूमि क्षेत्र में डीडवाना, भोपाल के पास भीमबेटका, नर्मदा के पास नरसिंहपुर, महाराष्ट्र में प्रबरा नदी के पास नेवासा, जो गोदावरी नदी के पास भी स्थित है। आंध्र प्रदेश के गीदलूर एवं करीमपुरी आदि महत्त्वपूर्ण स्थल हैं। इनके अतिरिक्त मद्रास एवं कर्नाटक में भी कई स्थल प्रकाश में आये हैं। इस काल के लोगों ने क्वार्टजाइट पत्थरों का प्रयोग किया था। ये लोग शिकारी एवं खाद्य संग्राहक की श्रेणी में आते हैं। इस काल में वे बड़े पशुओं को मारते थे।

मध्य पुरापाषाण काल

इस काल की महत्त्वपूर्ण विशेषता थी, प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल में परिवर्तन। पुरापाषाण काल में क्वार्टजाइट प्रमुख कच्चा माल था जबकि मध्य पुरापाषाण काल में जेस्पर, चर्ट आदि का प्रयोग प्रमुख कच्चे माल के रूप में होने लगा। इस काल में क्रोड उपकरणों की प्रधानता लुप्त हो गई जबकि शल्क विनिर्माण का प्रचलन बढ़ता गया। मध्य पुरापाषाण काल के स्थल प्राय: सम्पूर्ण देश में बिखरे हुए हैं। हालांकि उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में उतने स्थल प्राप्त नहीं होते जितने प्रायद्वीपीय क्षेत्र में प्राप्त हुए हैं। इसका मुख्य कारण पंजाब में उपयुक्त कच्चे माल का अभाव। नेवास (गोदावरी नदी के तट पर) मध्य पुरापाषाण काल की संस्कृति का प्रारूप स्थल है। एच.डी. संकालिया ने इसे प्रारूप स्थल घोषित किया है। इस काल में हमें काटने के औजारों की (Chopper) प्रधानता मिलती है। इस काल में पाए जाने वाले उपकरणों में ‘चापर’, ‘ब्लेड’, बेधक, ‘व्यूरिन’, चान्द्रिक, ‘स्क्रपर’ तथा ‘छिद्रक’ आदि हैं।

उच्च पुरापाषाण काल

इस काल में नमी कम हो गई। इस अवस्था का विस्तार हिमयुग की उस अंतिम अवस्था के साथ रहा जब जलवायु अपेक्षाकृत गर्म हो गयी। इस काल की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  1. इसमें उपकरण बनाने की मुख्य सामग्री लम्बे स्थूल प्रस्तर फलक होते थे।
  2. इस काल के उपकरणों में तक्षणी और खुरचनी उपकरणों की प्रधानता बढ़ती गयी।
  3. इस काल में अस्थि (हड्डी) उपकरणों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण हो गयी।
  4. इस काल में नक्काशी और चित्रकारी दोनों रूपों में कला का विकास हुआ। विंध्य क्षेत्र में स्थित भीमबेटका में विभिन्न कालों की चित्रकारी देखने को मिलती है। प्रथम काल में उत्तर पुरापाषाण काल की चित्रकारी में हरे व गहरे लाल रंग का उपयोग हुआ है।

सोहन नदी घाटी शिवालिक के सामने सोहन नदी घाटी से निम्न पुरापाषाण कालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं। यहाँ 1931-32 के बीच येल कैंब्रिज अभियान दल  के डी. टेरा और पैटर्सन के नेतृत्व में उत्खनन प्रारंभ हुआ, यहाँ से प्राप्त उपकरण फ्लेक तकनीक से बनाए गए। भारत में सबसे पुराने हस्त कुठार, गडाँसा, खंडक की प्राप्ति इस क्षेत्र से हुई है। यहाँ से फलक उद्योग का प्रमाण मिलता है।

भीमबेटका- मध्य प्रदेश के रायसन जिले में स्थित इस पहाड़ी से मनुष्य के गुफावास का प्रमाण मिलता है। यहाँ से प्राप्त 500 गुफा चित्रों में 5 गुफा चित्र पुरापाषाण काल के तथा शेष चित्र मध्यपाषाण काल के हैं। इन गुफा चित्रों की महत्ता को प्रकाश में लाने का श्रेय श्री वाकणकर महोदय को जाता है। भीमबेटका से नीले रंग के कुछ पाषाण-खण्ड मिले हैं। वाकणकर महोदय के अनुसार, इनके द्वारा चित्रकारी के लिए रंग तैयार किया जाता था।

इथनौरा- नर्मदा घाटी क्षेत्र में स्थित यह स्थल मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित है। यह उपरी पुरा पाषाणकालीन स्थल है जिसकी खोज 1987 में की गई। इसी स्थल से भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वप्रथम मानव खोपड़ी की प्राप्ति हुई है जो होमो इरैक्टस समूह से संबंधित है। इससे पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप में कहीं भी पुरापाषाण कालीन मनुष्य का अवशेष नहीं प्राप्त हुआ है। यहाँ पशुओं के जीवाश्म के रूप में हाथी की दो प्रजातियाँ भी प्राप्त हुई हैं।

बेलनघाटी क्षेत्र- उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर और इसके समीपवर्ती क्षेत्रों में विस्तृत बेलनघाटी क्षेत्र में पाषाणयुगीन 44 क्षेत्रों की खोज की गई है। यह भारतीय उपमहाद्वीप का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ से तीनों चरणों के प्रमाण मिले हैं। यहाँ से पाषाण युग के क्रमिक विकास को बताया जा सकता है।

लोंहदाबाद क्षेत्र- यह क्षेत्र ऊपरी पुरापाषाण कालीन स्थल है। यहाँ से 30,000 ई.पू. की मूर्ति प्राप्त हुई है। इस पर विवाद है कि यह मूर्ति है या उपकरण। फिलहाल इसे उपकरण माना गया है।

बोरी- महाराष्ट्र के पुणे में स्थित इस पुरापाषाण कालीन स्थल की खोज 1988 में की गई। इस क्षेत्र में ज्वालामुखी उद्गार स्तरों की प्राप्ति हुई है और इन दोनों स्तरों से उपकरणों की प्राप्ति हुई। यहाँ से भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने उपकरण की प्राप्ति हुई है। यह क्षेत्र पुरा पाषाण काल को लगभग 12 लाख वर्ष पूर्व ले जाता है।

अतिरमपक्कम मद्रास के निकट स्थित अतिरमपक्कम निम्न पुरापाषाणिक स्थल है। सोहन घाटी की तरह यहाँ से भी निम्न पुरापाषाणकाल का तकनीकी विकासक्रम प्राप्त होता है। लेकिन सोहन घाटी के उपकरण फ्लेक निर्माण विधि से बनाए जाते थे, जबकि अतिरमपक्कम के उपकरण कोर निर्माण तकनीक से। यहाँ उपकरण एचूंलियन टाइप या एवीविले टाइप के होते हैं।

पल्लवरम- मद्रास के निकट स्थित पल्लवरम भारत का सबसे पहला स्थल है जहाँ से पाषाणकालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं। यह भारत में खोजा गया, पहला पुरा पाषाण-कालीन स्थल है। 1867 में राबर्ट बूस फूट और ओल्ड हेम को यहाँ से हस्तकुठार की प्राप्ति हुई है।

मच्छुतावी-चिन्तामनुगावी पहाड़ी- आंध्रप्रदेश में स्थित कुरनूल प्राचीनतम पुरापाषाण कालीन स्थल है। यहाँ से प्राप्त उपकरण क्वार्टजाइट, कैल्सेडोनी, सैडस्टोन, फ्लिट और चर्ट से बने हैं। फ्लिट और चर्ट मिलने से इस धारणा का खण्डन हुआ है कि निम्न पुरापाषाण कालीन मनुष्य फ्लिट और चर्ट का प्रयोग नहीं करते थे। यहाँ से पशुओं के हड्डी के उपकरण प्राप्त हुए हैं। यह कई पुरानी धारणाओं का खण्डन करता है। छनी प्रस्तर भी सर्वप्रथम यहीं से प्राप्त हुआ है।

मध्यपाषाण काल Mesolithic Age

ऊपरी पु.पा. काल का अंत लगभग 9000 ई.पू. के आसपास हिमयुग के साथ ही हुआ। अत: इस काल में जलवायु गर्म व शुष्क हो गयी। पेड़, पौधों, जीव-जंतुओं की स्थिति में भी परिवर्तन आ गया। एक दृष्टि से मध्यपाषाण काल, पुरापाषाण काल एवं नवपाषाण काल के मध्य संक्रमण को रेखांकित करता है। इस काल में भी मनुष्य मुख्यतः शिकारी एवं खाद्य संग्राहक ही रहा, परन्तु शिकार करने की तकनीकी में परिवर्तन आ गया। अब वह न केवल बड़े जानवर अपितु छोटे-छोटे जानवरों का भी शिकार करने लगा। अब वह मछलियाँ पकड़ने लगा तथा पक्षियों का शिकार करने लगा। पशुपालन का प्रारम्भिक साक्ष्य भी इसी काल में मिलता है। मध्य प्रदेश में आदमगढ़ और राजस्थान में बागोर पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। इसका समय लगभग 5000 ई. पू. हो सकता है। इस काल का एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है- प्रक्षेपास्त्र तकनीकी के विकास का प्रयास। यह निश्चय ही महान् तकनीकी क्रांति थी। इसी काल में सर्वप्रथम तीर-कमान का विकास हुआ। मध्य पाषाण काल के उपकरण छोटे से बने हुए हैं। यह सूक्ष्म उपकरण आकार में (काफी) छोटे हैं। इनकी 1 से 8 से.मी. के मध्य है। ये माइक्रोलिथ्स (microliths) के नाम से जाने जाते हैं। इस काल के महत्त्वपूर्ण उपकरण थे- ब्लेड (फलक), नुकीले क्रोड, त्रिकोण, नवचंद्राकार आदि। इनके अलावा इस काल में पुरापाषाण काल के कुछ औजार जैसे तक्षणी व खुरचनी, यहाँ तक कि गडाँसा भी प्रचलन में रहे।

महत्त्वपूर्ण स्थल (बस्तियाँ)

मध्यपाषाण स्थल-राजस्थान, दक्षिणी उ.प्र. मध्य व पूर्वी भारत में तथा दक्षिणी भारत में कृष्णा नदी से दक्षिण तक पाये जाते हैं। 1970-77 के दौरान गंगा के मैदान में मध्यपाषाणकालीन संस्कृति से संबद्ध स्थल प्रकाश में आए हैं। कुछ अन्य प्रमुख स्थल हैं-पं. बंगाल में वीरभानपुर, गुजरात में लगनज, तमिलनाडु में टेरीसमूह, म.प्र. में आदमगढ़ तथा राजस्थान में बागोर, गंगा द्रोणी में सराय नाहरराय एवं महादाहा दो महत्त्वपूर्ण स्थल हैं। ये (सराय नाहरराय एवं महादाहा) भारत के सबसे पुराने मध्यपाषाण कालीन स्थल हैं। ये पहले ऐसे स्थल हैं जहाँ से स्तम्भगर्त का साक्ष्य मिलता है अर्थात इस काल में लोगों ने झोपड़ियाँ निर्मित की थीं और इनमें निवास किया होगा। पुरापाषाण कालीन लोग शैलाश्रयों में निवास करते थे। मानवीय आक्रमण या युद्ध का प्रारम्भिक साक्ष्य सराय नाहरराय से प्राप्त हुआ है।

यद्यपि मध्यपाषाण काल में पशुओं की आर्थिक उपयोगिता को ध्यान में रखकर पशुपालन प्रारंभ नहीं हुआ था और यह प्रवृत्ति आगे चलकर नवपाषाण काल में देखने को मिलती है। तथापि मध्य प्रदेश के आदमगढ़ और राजस्थान के बागौर से पशुपालन का प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त होता है जो मध्यपाषाणकालिक स्थल हैं। इससे पता चलता है कि पशुपालन की शुरूआत मध्यपाषाण काल के अंत तक हो चुकी थी। सर्वप्रथम आदमगढ़ से कुत्ते का साक्ष्य प्राप्त हुआ है जो 6000 ई.पू. का है।

इसी प्रकार मध्यपाषाण काल में मकान और बस्ती का साक्ष्य नहीं मिलता है। अपवाद स्वरूप आदमगढ़ और बागौर जैसे स्थलों पर मकान बनाने का प्रयास किया गया। बागौर में मकान बनाने का सबसे पुराना साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ 5500 ई.पू. के लगभग फर्श के साथ मिट्टी की दीवार खड़ी करने का प्रयास किया गया है।

अग्नि का उपयोग मध्यपाषाण काल को पुरापाषाण काल से अलग करता है। गुजरात स्थित लंघनाज और उत्तर प्रदेश स्थित सराय नाहरराय एंव महादाहा से गर्त चूल्हे का साक्ष्य प्राप्त हुआ है जिसमें पशुओं की हड्डियाँ जली हुई अवस्था में प्राप्त हुई हैं। स्पष्ट है कि 9000-4800 ई. पू. के दौरान भोजन को आग में पकाने की कला की शुरूआत यहीं से हुई। सराय नाहरराय से एक ही क्रम में आठ गर्त चूल्हों की प्राप्ति हुई है जो सामूहिक जीवन पद्धति का संकेत देता है।

शवाधान तरीका मध्यपाषाण काल को विशिष्ट पहचान देता है क्योंकि पुरापाषाण काल में इसका साक्ष्य नहीं प्राप्त होता। यथापि मध्यपाषाण काल में शवाधान की विधि का संस्कृति के रूप में उद्भव नहीं हुआ, तथापि एकल, सामूहिक और एक जगह से युगल शवाधान का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। इस तरह के प्रमाण लंघनाज, सराय नाहरराय, लखेड़िया और महादाहा से प्राप्त हुआ है।

प्रमुख मध्यपाषाण कालिक क्षेत्र- यहाँ यह ध्यातव्य है कि केरल और उत्तर पूर्वी राज्यों में न तो निम्न पुरापाषाणिक स्थल प्राप्त हुए हैं और न ही मध्य पाषाणिक स्थल।

साँभर झील निक्षेप- राजस्थान में स्थित साँभर झील निक्षेप के कई मध्य सै 7000 ई.पू. के लगभग विश्व के सबसे पुराने वृक्षारोपण का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।

लंघनाम- गुजरात के मेहसाना जिले में स्थित इस नगर की खोज एच. डी. सांकालिया द्वारा 1941 में की गई। यह माइक्रोलिथ इंडस्ट्रियल साइट है जहाँ 13,000 से ज्यादा उपकरण प्राप्त हुई हैं। यहाँ से 15 मानव कंकाल भी प्राप्त हुए हैं जिसकी औसत आयु (164-174 सेमी) से इनके भूमध्य सागरीय प्रजाति के होने का संकेत मिलता है। यहाँ से एकल शवाधान का साक्ष्य प्राप्त हुआ है (पूर्व-पश्चिम दिशा में)।

सराय नाहरराय- उत्तर प्रदेश में स्थित इस स्थल से ग्यारह मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं जिससे प्रतीत होता है कि यहाँ काकेशस प्रजाति और प्रोटो-नोर्डिक रेस (Proto-Nordic Race) के लोग रहते थे। यहीं से क्रम में आठ चूल्हे प्राप्त हुए हैं जिन्हें सामुदायिक चूल्हा कहा गया है। सराय नाहरराय की रेडियो कार्बन तिथि ई.पू., 8395 पाई गई है।

महादाहा- यह स्थल उत्तर प्रदेश में स्थित है। मध्यपाषाण कालिक स्थलों में सर्वाधिक 28 कंकालों की प्राप्ति यहीं से हुई है। सराय नाहरराय की तरह प्रोटो-नोर्डिक प्रजाति के लोग यहाँ रहते थे। यहाँ से एकल, युगल और सामूहिक-तीनों प्रकार के शवाधान के साक्ष्य मिलते हैं।

भीमबेटका- पुराने मध्य प्रदेश के रायसेन जिला में स्थित भीमबेटका से मानवीय क्रियाकलापों से संबधित गुफा चित्रकारी के सर्वाधिक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यहाँ से प्राकृतिक या अनुकरणात्मक और संकेतात्मक दोनों प्रकार के चित्र प्राप्त हुए हैं। यहाँ की गुफाओं पुरापाषाणिक और मध्यपाषाणकालिक दौर के दो कंकाल प्राप्त हुए हैं जिनमें से एक बच्चे के गले में पड़ा ताबीज, जादू-टोने में, इनके विश्वास का प्रतीक है। यहाँ से सामुदायिक जीवन के संकेत मिलते हैं।

वीरभानपुर- पश्चिम बंगाल स्थित इस स्थल से लंघनाज के बाद सर्वाधिक उपकरण प्राप्त हुए हैं।

टेरी टेला या टेरी समूह- यह स्थल तमिलनाडु में स्थित है। टेरी टेला का अर्थ होता है बालू का टीला। यहाँ से मध्यपाषाण काल के ग्यारह बालू के टीले प्राप्त हुए हैं। यहाँ से फ्लिंट और चर्ट निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं।

नवपाषाण काल Neolithic Period

इस काल का आधारभूत तत्त्व है- खाद्य उत्पादन तथा पशुओं को पालतू बनाये जाने की जानकारी का विकास। नियोलिथिक शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सर जॉन लुबाक ने 1865 ई. में किया था। नवपाषाण काल की अग्रलिखित महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ हैं- कृषि कार्य का प्रारम्भ, पशुपालन का विकास, पत्थर के औजारों का घर्षित एवं पॉलिशदार उपकरणों का निर्माण तथा ग्राम समुदाय का प्रारम्भ।

विश्वस्तरीय संदर्भ में नवपाषाण युग की शुरूआत लगभग 9000 ई.पू. में मानी जाती है परन्तु भारत में बलूचिस्तान के मेहरगढ़ से कृषि का प्रारम्भिक साक्ष्य मिलता है। यह लगभग 7000 ई.पू. पुराना है। प्राय: ऐसा माना जाता था कि हस्त निर्मित मृदभांडों की उपस्थिति सर्वप्रथम खाद्य उत्पादक बस्तियों का अनिवार्य लक्षण थी परन्तु नवीन अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि बहुत से क्षेत्रों में आरभिक खाद्य उत्पादक स्थलों पर मृदभांड के साक्ष्य नहीं मिलते। इन्हें मृदभांड पूर्वनवपाषाण स्थल कहा जाता है। उसी तरह हाल तक यह विचार था कि सर्वप्रथम पश्चिम एशिया में कृषि व पशुपालन की शुरूआत हुयी और वहीं से विसरण (Diffusion) द्वारा विश्व के अन्य क्षेत्रों में इसका प्रसार हुआ। परन्तु अब यह धरना अपरिवर्तित हो गयी है और ऐसा मन जाने कागा है कि विभिन्न क्षेत्रों में इसका विकास स्वतंत्र रूप में हुआ है।

भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि का प्राचीनतम प्रमाण नवपाषाण काल में मिलता तो है, पर यहाँ कृषि की विशिष्ट तकनीक का प्रमाण नहीं मिलता है। यहाँ दो तकनीक से खेती की जाती थी जिसकी शुरूआत सर्वप्रथम अफ्रीका से हुई। गेहूँ और जो आयातित श्रेणी में आता है, जबकि रागी और धान निर्यातित श्रेणी में। इसी प्रकार पशुपालन नवपाषाण कालीन अर्थव्यवस्था का आधार बन गया। नागार्जुनकोंडा से घोड़ा, गधा, खच्चर जैसे मालवाहक पशुओं का प्रमाण मिला है।

नवपाषाण युग के लोगों के द्वारा व्यवहार में लाए गए कुल्हाड़ियों के आधार पर बस्तियों के तीन भाग निर्धारित किए गए-

  1. उत्तर पश्चिमी,
  2. उत्तर पूर्वी
  3. दक्षिणी।

उत्तर पश्चिमी- कश्मीर एक महत्त्वपूर्ण नवपाषाण स्थल है। कश्मीर में बुर्जहोम एवं गुफाक्कराल ये दो महत्त्वपूर्ण स्थल हैं। कश्मीर के स्थलों की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ निम्न हैं- गर्त्तनिवास, मृदभांडों की विविधता, पत्थर व हड्डियों के भिन्न औजारों का प्रयोग तथा सूक्ष्म पाषाण (माइक्रोलिथ) उपकरणों का अभाव।

बुर्जहोम में भूमि के नीचे निवास का साक्ष्य मिलता है। यहाँ के लोग शिकार करते व मछली पकड़ते थे परन्तु संभवतः यहाँ के लोग कृषि से भी परिचित थे। यहाँ से प्राप्त सबसे महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है- पालतू कुत्ते का मालिक के शव के साथ दफनाया जाना। उत्तर पश्चिम में मेहरगढ़ भी एक महत्त्वपूर्ण नवपाषाण कालिक स्थल है। यहाँ गेहूँ की तीन व जौ की दो किस्में प्राप्त हुयी हैं। यहाँ के लोग संभवत: खजूर का भी उत्पादन करते थे। यहाँ के लोग कच्ची ईंटों के आयताकार मकान में रहते थे।

उत्तर पश्चिम में स्वात घाटी में सरायखोला एक महत्त्वपूर्ण स्थल था। बेलनघाटी में कुछ महत्त्वपूर्ण नवपाषाण कालीन स्थल निम्नलिखित हैं- कोल्डीहवा, चौपानीमांडो और महागरा। कोल्डीहवा से वन्य एवं धान की इस प्रजाति का नाम ऐरिजा सेरिवा था। कृषिजन्य दोनों प्रकार के चावल के साक्ष्य मिलते हैं। इनकी कालावधि 6000 ई.पू. से 5000 ई.पू. निर्धारित की गयी है। उसी तरह चौपानीमांडो से संसार में मृदभांड के प्रयोग के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं। मध्य गंगा घाटी में भी कुछ महत्त्वपूर्ण नवपाषाण स्थल प्राप्त हुए हैं, जो निम्न हैं- चिरांद (छपरा), चैचर, सेनुआर, तारादीह आदि। इसी तरह पूर्वी भारत में असम, मेघालय व गारो की पहाड़ी में कुछ नवपाषाण कालीन स्थल मिले हैं।

दक्षिण भारत में कुछ नवपाषाण स्थल निम्न हैं, कर्नाटक में मस्की, ब्रह्मगिरि, हल्लूर, कोडक्कल, पिकलीहल, संगेनकलन, तेकलकोट्टा तथा तमिलनाडु में पय्यमपल्ली और आध्रप्रदेश में उत्नूर।

मेहरगढ़- वर्तमान पाकिस्तान में स्थित इस स्थल के उत्खनन से तीन सांस्कृतिक कारण इस स्थल को नवपाषाण कालीन मेहरगढ़ कहा गया। यह भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीनतम कृषक बस्ती थी और यहाँ 6000 ई.पू. के लगभग कृषि का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ से गेहूँ, जौ और मसूर की खेती का साक्ष्य मिला है।

चौपानी मांडो- बेलनघाटी क्षेत्र में स्थित कोल्डीहवा से नवपाषाणिक और मांडो से विश्व का प्राचीनतम मृदभांड 7000 ई.पू. के लगभग प्राप्त हुआ है। यह नवपाषाण काल की तिथि को कुछ पीछे ले जाता है।

महगढ़ा- बेलनघाटी क्षेत्र में स्थित इस स्थल से पशुपालन का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। यहाँ से पशुओं का विशाल बाड़ा मिला है जिसमें तीन बहुत बड़े दरवाजे हैं तथा 28 स्तंभगर्त्त। इसमें बीस से अधिक पशु बाँधे जाते रहे होंगे।

चिराँद- बिहार के छपरा जिला में स्थित यह स्थल नवपाषाण काल और ताम्रपाषाणिक संस्कृति के तीसरे चरण से संबद्ध है। इसका काल-निर्धारण (2500-1400 ई.पू.) किया गया है। कालखण्ड और अस्थि-उपकरण की दृष्टि से इसका बुर्जहोम से साम्य है। यहाँ से पाषाण और पशु-श्रृंगों से निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं। यह उत्तम कृषक बस्ती थी जहाँ से गेहूँ, जौ और धान की खेती के प्रमाण मिले हैं।

डेओजली हेडिंग- यह स्थल मेघालय में स्थित है। यहाँ से तथा मेघालय के अन्य स्थलों-सरूतरू एंव मइक डोला और असम से ढ़लवे जगह पर मकान बनाने के प्रयास किये जाने का संकेत मिलता है। यहाँ से झूम की खेती का प्राचीनतम प्रमाण मिला है। यहीं ढलवे जगह पर खेती प्रारंभ हुई थी।

ब्रझगिरि- इस जगह पर उत्खनन 1947 में मार्टिमर ह्वीलर (Martimer wheeler) के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ। यह स्थल तीन सांस्कृतिक चरणों से सम्बद्ध है- नवपाषाण काल, मध्य पाषाण काल और आंध्र-सातवाहन चरण। यहाँ से 1500 ई.पू. के लगभग रागी और कुल्थी की खेती का प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ से कलश शवाधान के साथ-साथ इस बात का साक्ष्य भी प्राप्त हुआ है कि छोटे बच्चे को आवासीय स्थल में या उसके करीब दफनाया जाता था।

उत्नूर और पय्यमपल्ली- उत्नूर आंध्र प्रदेश में स्थित है और पय्यमपल्ली तमिलनाडु में। दोनों जगह से कपड़े के निर्माण और कपड़े के उपयोग का प्रथम साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ से हड्डी का बना हुआ सूआ मिला है जो वस्त्र निर्माण में उपयोगी था।

नागार्जुनकोंडा- आंध्र प्रदेश में स्थित नागार्जुनकोंडा बुर्जहोम और गुफक्कराल के अतिरिक्त गर्त्तनिवास का साक्ष्य एकमात्र स्थल है। यह स्थल भी ब्रह्मगिरि (1500 ई.पू.) का समकालीन था और इसी समय में यहाँ रागी और कुल्थी की खेती की जाती थी। ब्रह्मगिरि की तरह यहाँ भी छोटे बच्चे को आवासीय स्थल या उसके करीब दफनाने का साक्ष्य मिला है। यहाँ से मालवाहक पशुओं यथा घोड़ा, गधा, खच्चर का प्रमाण भी मिला है।

दक्षिण भारत में प्रयुक्त होने वाली पहली फसल रागी थी। नवपाषाण काल में कृषि यहाँ गौण ही थी। दक्षिण भारत में नवपाषाण 2000 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक जारी रही। नवपाषाण काल में कृषि उपकरण में खन्ती एवं कुदाल का प्रयोग होता था।

ताम्रपाषाण काल में कृषि कार्य पूर्णत: स्थापित हो गया। ताम्रपाषाण एवं सिन्धु घाटी सभ्यता दोनों में पत्थर के उपकरणों का ही अधिक प्रयोग हुआ। ताम्रपाषाण काल तकनीकी दृष्टि से काँस्ययुग से प्राचीन है परन्तु कुछ ताम्रपाषाणकालिक स्थल काँस्ययुग से प्राचीन थे, कुछ उसके समकालीन थे एवं कुछ परवर्ती थे।

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