सिन्धु घाटी सभ्यता

सिन्धु घाटी सभ्यता

विश्व का कौन-सा कोना सर्वप्रथम सभ्यता की प्रथम किरण से प्रकाशित हुआ था, इसका कोई ज्ञान दुर्भाग्यवश प्राप्त नहीं है। हाँ, इतना अवश्य ज्ञात हो। सका है कि सभी सभ्यताएँ नदी घाटियों में ही उदित हुई। भारत में भी सिन्धु नदी की घाटी में एक सभ्यता का जन्म हुआ जिसका ज्ञान हमें लम्बे समय तक नहीं रहा। सिन्धु सभ्यता आद्य-ऐतिहासिक काल की सभ्यता थी। आद्य-ऐतिहासिक काल इसे इसलिए कहा जाता है क्योंकि सिन्धु लिपि को अब तक नहीं पढ़ा जा सका है। यह आश्चर्यजनक सांस्कृतिक उपलब्धियों का प्रतिनिधित्व करता है। यह पुरातन तथा आधुनिक भारतीय सभ्यता के कुछ महत्त्वपूर्ण आयामों के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है। इस सभ्यता का अभिज्ञान पुरातत्त्व विज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण देन है। इस सभ्यता की खोज ने भारतीय सभ्यता के इतिहास को ही बदल दिया है। आर्यों के साहित्यिक वेदों से ही पहली बार हमें भारत के सामाजिक एवं धार्मिक विचारों तथा आर्थिक और राजनैतिक अवस्थाओं का विस्तृत परिचय मिला। फलत: यह अवश्यंभावी था कि व्यावहारिक दृष्टि से भारत का इतिहास इस काल से प्रारम्भ किया जाये और भारतीय संस्कृति की रूपरेखा का आरम्भ आर्य सभ्यता से हो। किन्तु, 1922-23 ई. में होने वाली एक खोज के परिणामस्वरूप इस धारणा में परिवर्तन हुआ। इस धारणा के परिवर्तन का कारण था सिन्धु क्षेत्र में होने वाले उत्खननों के फलस्वरूप एक अत्यन्त पुरातन सभ्यता की खोज। सिन्धु घाटी की सभ्यता इसी खोज का प्रतिफल है।

कालनिर्धारण

एच. हेरास ने नक्षत्रीय आधार पर इसकी उत्पत्ति का काल 6000 ई.पू. माना है। मेसोपोटामिया में 2350 ई.पू. का सरगॉन का अभिलेख मिला है, उसके आधार पर इसकी समयावधि 3250-2750 ई.पू. मानी गयी है। जॉन मार्शल ने 3250-2750 ई.पू. में इसका काल निर्धारित किया है जबकि अर्नेस्ट मैके ने 2800-2500 ई.पू. को इसका काल माना है। माधोस्वरूप वत्स ने 3500-2700 ई.पू. और सी.जे. गैड ने 2300-1750 ई.पू. इसका काल माना है। माटींसर व्हीलर 2500-1500 ई.पू. को इस सभ्यता का काल मानते हैं जबकि फेयर सर्विस 2000-1500 ई.पू. को। रेडियो कार्बन पद्धति के अनुसार, इसका समय 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. माना गया है। इस संदर्भ में ऐसा माना जाता है कि इसका काल लगभग 2600 ई.पू. एवं 1900 ई.पू. के बीच निर्धारण किया जा सकता है।

नामकरण

इसके लिए कई नाम प्रचलित हैं, यथा, सिन्धु घाटी की सभ्यता, सिन्धु सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता और हाल में इसके लिए सिन्धु-सरस्वती सम्पदा जैसे नामकरण पर बल दिया जाने लगा है किन्तु हड़प्पा सभ्यता नाम अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है क्योंकि पुरातात्विक उत्खनन के पश्चात् किसी सभ्यता का नामकरण प्रथम उत्खनित स्थल के आधार पर किया जाता रहा है।

पुरातात्विक स्रोत

हमें पुरातात्विक स्रोत से ही मुख्यतः इस सभ्यता का अभिज्ञान प्राप्त होता है क्योंकि इस सभ्यता के बारे में कोई साहित्य उपलब्ध नहीं है। मुहर, टेरीकोटा फिगर्स (मृण्मूर्तियाँ), चक्र की आकृति, महल और खण्डहर, मेसोपोटामिया से प्राप्त बेलनाकार मुहर, लोथल से प्राप्त एक छोटी बेलनाकार मुहर, 2350 ई.पू. की मेसोपोटामिया की मुहर, मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक वाट और लोथल से प्राप्त हाथी दाँत के माप का पैमाना आदि स्रोत उल्लेखनीय हैं।

उद्भव

इस सभ्यता के उद्भव पर विद्वानों में मतैक्य नहीं है। कुछ विद्वानों ने प्रारम्भ में इसकी उत्पत्ति पश्चिमी एशिया (मेसोपोटामिया) में ढूंढ़ने का प्रयास किया, जबकि कुछ पुराविदों ने इसका उद्गम ईरान-बलूची-सिंध संस्कृतियों से माना है। अर्वाचीन भारतीय पुराविदों ने भारत की ग्रामीण संस्कृतियों में इसका स्रोत ढूंढने का प्रयास किया है। संस्कृति का विकास मेसोपोटामिया में कालक्रम की दृष्टि से हड़प्पा संस्कृति से पहले हुआ था। इसलिए विद्वानों का इसके प्रभाव से प्रभावित होना स्वाभाविक है, पर विद्वानों में इस पर पर्याप्त मतभेद है। इस सभ्यता का विकास मेसोपोटामिया के प्रभाव से हुआ, इस विचार के प्रवर्तक हैं- मॉर्टीमर व्हीलर, गॉर्डन चाइल्ड, लियोनार्ड बूली, डी.डी. कौशांबी, क्रेमर। इनमें कौशांबी का तो यहाँ तक कहना है कि मिश्र, मेसोपोटामिया और सिंधु सभ्यता के जनक एक ही मूल के व्यक्ति थे जबकि क्रेमर के अनुसार लगभग 2400 ई.पू. में मेसोपोटामिया से लोग आए और उन्होंने यहाँ की परिस्थिति के अनुकूल अपनी संस्कृति में परिवर्तन कर सिंधु सभ्यता का निर्माण किया। परन्तु, इसके विपक्ष में भी मत व्यक्त किया जा सकता है। इसके विपक्ष में कहना है कि मेसोपोटामिया में स्पष्ट रूप से पुरोहितों का शासन था, सिन्धु सभ्यता में यह स्पष्ट नहीं है। मेसोपोटामिया की लिपि कीलनुमा लिपि है; जबकि सिन्धु सभ्यता के लोग चित्रलेखात्मक लिपि का प्रयोग करते थे। इसके अतिरिक्त सिंधु सभ्यता में बड़े पैमाने पर पक्की ईंटों का प्रयोग हुआ है; जबकि मेसोपोटामिया में यह बात स्पष्ट नहीं है। इसके अतिरिक्त एक दूसरी विचारधारा भी है जिसका कहना है कि इस सभ्यता की उत्पत्ति ईरानी-बलूची ग्रामीण संस्कृति से हुई है। इसके प्रतिपादक ब्रिजेट एवं रेमण्ड आॉलचिन, फेयरसर्विस, रोमिला थापर का मानना है कि बलूची-ईरानी संस्कृति का भारतीयकरण होता रहा। फेयर सर्विस के अनुसार-धर्म इस संस्कृति का प्रमुख आधार था जिसके कारण इस संस्कृति के नागरीकरण की दिशा में तीव्र विकास हुआ। एक तीसरी विचारधारा भी इस सभ्यता को लेकर है जो मानती है कि देशी प्रभाव (सोथी-संस्कृति) से इस सभ्यता की उत्पति हुई है। अमलानन्द घोष, धर्मपाल अग्रवाल, ब्रिजेट एवं रेमण्ड आॉलचिन भी इसी मत के प्रतिपादक हैं। कुछ विद्वान् सिन्धु घाटी की सभ्यता का विकास भारत की धरती पर मानते हैं। राजस्थान के कुछ भागों से प्राक्-हड़प्पाकालीन मृदभांड प्राप्त हुए हैं। 1953 ई. में सर्वप्रथम अमलानन्द घोष ने बीकानेर क्षेत्र में सोथी संस्कृति की खोज की। धर्मपाल अग्रवाल, ब्रिजेट एवं रेमण्ड ऑलचिन आदि विद्वानों ने यह धारणा प्रकट की है कि सिंधु सभ्यता का प्रारंभिक आधार सोथी संस्कृति में ही खोजा जा सकता है। सिन्धु सभ्यता धर्मपाल अग्रवाल के अनुसार, ग्रामीण सोथी संस्कृति का ही नागरिक रूप है। चार्ल्स मेसन नामक इतिहासकार ने 1826 ई. में हड़प्पा नामक गाँव का दौरा किया। 1872 ई. में कनिंघम महोदय ने इस प्रदेश का दौरा किया। तीसरी सहस्राब्दी ई.पू. के, पूर्व के मध्य बहुत से छोटे-छोटे गाँव बलूचिस्तान एवं अफगानिस्तान में बस गए। बलूचिस्तान में किली गुल मोहम्मद और अफगानिस्तान में मुंडीगाक और बलूचिस्तान के मेहरगढ़ नामक स्थान पर 5000 ई.पू. के लगभग का कृषि का साक्ष्य प्राप्त होता है।

विस्तार

प्रारम्भ में विद्वानों की यह धारणा थी कि यह सभ्यता सिन्धु घाटी तक सीमित है, किन्तु यह तथ्य अब असंगत हो गया है। प्रारम्भ में माना गया था कि हड़प्पा सभ्यता पश्चिम में काठियावाड़ से प्रारम्भ होकर पूर्व में मकरान तक फैली हुई थी जिसके भग्नावशेष सर्वप्रथम मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा दो प्रधान नगरों से प्राप्त हुए थे। किन्तु कुछ समय बाद चालीस से अधिक बस्तियों के अवशेष उत्खनन से प्राप्त हुए जो इस सभ्यता के व्यापक प्रसार को इंगित करते हैं। आलचिन ने सैन्धव सभ्यता के 70 स्थलों का उल्लेख किया था। जम्मू में मांडा और पंजाब में रोपड़ सिंध सभ्यता की उत्तरी सीमा के सूचक है, और बड़गाँव, मनपुर एवं आलमगीरपुर इसका पूर्वीय स्थल है। दक्षिण में गुजरात क्षेत्र में लोथल, रंगपुर, रोजड़ी, प्रभासपट्टन तथा नर्मदा-ताप्ती नदियों के तट पर भगतराव, मालवण, मेघम, तेलोद में सैन्धव अवशेष पाए गए हैं। सिंधु संस्कृति का पश्चिमी स्थल पाकिस्तान से सतुकांगेडोर (सुतकगेन्दर) ईरान की सीमा से 40 कि.मी. पूर्व एवं अरब सागर से लगभग 50 कि.मी. उत्तर की ओर स्थित है। हाल ही में, कच्छ में एक नवीन स्थल से सैन्धव सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। उत्तरी बलूचिस्तान में डाबरकोट और मेहरगढ़ महत्त्वपूर्ण स्थल हैं। रामायण-महाभारत में विवेचित परिचक्रा नगरी पूर्व की ओर बरेली के पास कुछ समय पूर्व प्रकाश में आई है, यहाँ सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। अत: इस सभ्यता का विस्तार पूर्व में बरेली तक हो जाता है। इस सभ्यता के प्रमुख स्थल पाकिस्तान के अंग बन गये थे। भारतीय पुरातत्ववेत्ताओं ने इसे एक चुनौती पूर्ण तथ्य माना एवं सम्पूर्ण भारत में व्यापक सर्वेक्षण किया गया। परिणामत: राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात आदि में सिन्धु सभ्यता से जुड़े अनेक स्थलों को खोज निकाला। राजस्थान में कालीबंगा (गंगानगर जिला) प्रमुख स्थल है जहाँ बी.बी. लाल व बी.के. थापर के उत्खननों से बहुत सी महत्त्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हुई है। इस प्रकार आधुनिक उत्खननों से यह सिद्ध हो जाता है कि यह सभ्यता अत्यन्त सुविस्तृत सभ्यता थी। इस सभ्यता की उत्तरी सीमा पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित रहमान ढेरी तथा दक्षिणी सीमा गुजरात प्रान्त में स्थित भोगत्तार हैं। ये दोनों स्थल एक दूसरे से 1400 कि.मी. की दूरी पर हैं। इसी प्रकार पूरब में इसकी सीमा आलमगीरपुर (मेरठ) से सबसे पश्चिम में स्थित सुत्कागेन-डोर नामक स्थल की दूरी लगभग 1600 कि.मी. है।

सिंधु सभ्यता के विकास के चरण

नवपाषाण काल (5500-3500 ई.पू.)- इस काल में बलूचिस्तान और सिंधु के मैदानी भागों में स्थित मेहरगढ़ और किली गुल मुहम्मद जैसी बस्तियाँ उभरीं। खेती की शुरूआत हुई, स्थायी गाँव बसे।

पूर्व हड़प्पा काल (3500–2600ई.पू.)- ताँबा, चाक एवं हल का प्रयोग हुआ। अन्नागारों का निर्माण हुआ। ऊंची-ऊँची दीवारें बनीं। सुदूर व्यापार की शुरूआत हुई।

पूर्ण विकसित हड़प्पा युग (2600-1800 ई.पू.)- सम्पूर्ण विकसित क्षेत्र 12,99,600 वर्ग कि.मी. था। यह पूरब से पश्चिम 1600 कि.मी. एवं उत्तर से दक्षिण 1400 कि.मी. था। हड़प्पा सभ्यता से संबद्ध लगभग 1400 स्थल प्रकाश में आए हैं। इनमें लगभग 6 अथवा 7 स्थलों को नगर का दर्जा दिया जाता हैं। उत्तरी क्षेत्र जम्मू में मांडा, दक्षिण में दैमाबाद, पश्चिम में सुत्कागेडोर और 3 पूरब में आलमगीरपुर इसकी सीमा है। इस सभ्यता के अवशेष पाकिस्तान और भारत के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, उ.प्र. सीमांत, बहावलपुर, राजस्थान, हरियाणा, गंगा-यमुना में दोआब, जम्मू, गुजरात और उत्तरी अफगानिस्तान से प्राप्त हुए हैं।

  1. सिंध- मोहनजोदड़ो चांहुदड़ो, जुडेरजोदड़ो, आमरी, कोटदीजी, अलीमुराद।
  2. पंजाब- हड़प्पा, रोपड, बारा, संघोल।
  3. हरियाणा- राखीगढ़ी, मिताथल, बनवाली।
  4. राजस्थान- कालीबंगा।
  5. जम्मू- मांडा।
  6. गंगा-यमुना, दोआब- आलमगीरपुर, हुलास।
  7. गुजरात- देशलपुर, सुरकोटड़ा, धौलावीरा (कच्छ प्रदेश) काठियावाड्-रंगपुर, रोजदी, लोथल, मालवण (सूरत) भगवतरव।
  8. बलूचिस्तान- सुत्कागेडोर, सुतकाकोह, बालाकोट, डाबरकोट, राणां घुंड।
  9. बहावलपुर- कुडवालाथेर।
  10. अफगानिस्तान- शोर्तुघई।
  11. उ. प्र. सीमाप्रांत।
  12. गोमल घाटी- रहमान ढेरी।

सिन्धु सभ्यता के प्रमुख स्थल

हड़प्पा

हड़प्पा रावी नदी के किनारे पंजाब के माँटगोमरी जिले में स्थित है। इसकी खुदाई दयाराम साहनी के नेतृत्व में (माधोस्वरूप वत्स सहायक) 1921 ई. में हुई। यह शहर विभाजित है, पश्चिमी में गढ़ी है और पूर्वी भाग में निचला शहर है। हड़प्पा में छ:-छ: के दो कतारों में धान्य कोठार मिले हैं। अनाजों के दाबने के लिए एक चबूतरा बना था। इसमें जौ एवं गेहूँ के दाने मिले हैं। दो कतारों में 15 मकान मिले हैं। इनकी पहचान श्रमिक आवास के रूप में हुई है। द. क्षेत्र में एक (सेमेट्री) कब्रिस्तान आर-37 है। हड़प्पा से एक मूर्ति धोती पहने प्राप्त हुई है। यहाँ बालू पत्थर की दो मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। इनसे शरीर संरचना का ज्ञान मिलता है। एक बरतन पर मछुआरे का चित्र बना मिला है। शंख का बना हुआ एक बैल भी मिला है। यहाँ से बना कांसा का एक्का प्राप्त हुआ है। कांस्य दर्पण भी यहाँ से प्राप्त हुए हैं। सिन्धु सभ्यता की अभिलेखयुक्त मुहरें सर्वाधिक हड़प्पा से ही प्राप्त हुई हैं।

मोहनजोदड़ो

यह सिन्ध के लरकाना जिले में स्थित है। यह सिंधु नदी के किनारे अवस्थित है। इसका अर्थ है-मृतकों का टीला। 1922 ई. में इसकी खुदाई राखालदास बैनर्जी के निर्देशन में करायी गई। यहाँ से एक सभागार (एसेम्बली हाल), पुरोहितों का आवास, महाविद्यालय एवं महास्नानागार के प्रमाण मिले हैं। यहाँ सूती कपड़े का साक्ष्य मिला है। मोहनजोदड़ो में 16 मकानों का बैरक मिला है। एक बरैक को मैके ने दुकान कहा है जबकि पिगॉट महोदय ने इन्हें कुली लाइन कहा है। काँसे की एक नग्न नर्तकी की मूर्ति मिली है। यहीं से एक दाढ़ी वाले साधु की मूर्ति प्राप्त हुई है। पशुपति शिव का साक्ष्य भी यहीं मिला है। यहीं कुम्हार के छ: भट्ठों (चिमनी) के अवशेष मिले हैं। हाथी का कपाल खंड मिला है। यहां गले हुए ताँबे का ढेर मिला है। यहाँ से वाट मिला है, जो सेलखड़ी का बना था। राणाघुडई के निम्न धरातल से घोडे के दांत के अवशेष मिले हैं।

चांहुदड़ो (सिन्ध)

एन.जी. मजुमदार के प्रयास से 1931 में इसकी खोज हुई। 1935 में मैके ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। यह स्थल सिंध में मोहनजोदड़ो 130 कि.मी. दक्षिण में स्थित है। यहाँ से मनके बनाने का एक कारखाना प्राप्त हुआ है। उत्तर-हड़प्पा (झूकर एवं झांगर संस्कृति) संस्कृति इस स्थल पर विकसित हुई। इस स्थल पर बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते का साक्ष्य मिला है। सौंदर्य प्रसाधन में लिपस्टिक का प्रमाण मिला है। चांहुदड़ो एकमात्र ऐसा स्थल है जहाँ से वक्राकार ईंटें मिली हैं।

लोथल

यह गुजरात के अहमदाबाद जिले में पड़ता है। यह भोगवा नदी के किनारे अवस्थित है। 1957 में इसकी खोज रंगनाथ राव ने की। इस स्थल का आकार आयताकार है। लोथल के पूर्वी भाग में गोदीवाड़ा (डॉकयार्ड) का साक्ष्य मिला है। यह 214 मीटर × गहराई 3.3 मीटर का है। लोथल में दुर्ग एवं निचले शहर के बीच विभाजन नहीं है। उत्खननों से लोथल की जो नगर-योजना और अन्य भौतिक वस्तुएँ प्रकाश में आयी हैं, उनसे लोथल एक लघु हड़प्पा या मोहनजोदड़ो नगर प्रतीत होता है। अग्निवेदिका का साक्ष्य लोथल से मिलता है। यहाँ चावल का साक्ष्य मिलता है। फारस की एक मुहर प्राप्त हुई है। यहीं घोड़े की लघु मृणमूर्ति प्राप्त हुई है तथा हाथी दांत का एक स्केल प्राप्त हुआ है। तीन युग्मित समाधि (तीनों जुड़े) प्राप्त हुई है। एक मकान से दरवाजा मुख्य सड़क की ओर खुलने का प्रमाण मिलता है। अनाज पीसने की चक्की का साक्ष्य भी मिलता है। लोथल से प्राप्त एक भांड पर ही चालाक लोमड़ी की कथा अंकित है। यहाँ से ममी की आकृति भी प्राप्त हुई है।

कालीबंगा

इसका अर्थ है काले रंग की चूड़ियाँ। घग्गर नदी के तट पर यह राजस्थान के गंगानगर जिले में स्थित है। दुर्गक्षेत्र का आकार वर्गाकार है। इस क्षेत्र के उत्खननकर्ता अमलानन्द घोष (1953) और बी.के. थापर (1960) हैं। पूर्व-हड़प्पा सभ्यता का यहाँ से साक्ष्य भी मिलता है। यहाँ ईंट के चबूतरे पर सात हवन कुड का साक्ष्य मिलता है। कालीबंगा में कच्ची ईंटों का प्रयोग हुआ है। यहाँ जुते हुए खेत का साक्ष्य मिला है। कालीबंगा में अधिक दूरी पर सरसों की फसल बोयी जाती थी तथा कम दूरी पर चना बोया जाता था। यहाँ अलंकृत ईंटों का साक्ष्य मिला है। कालीबंगा में लकड़ी के पाइप का प्रमाण मिला है। कालीबंगा में दोनों खंड दुगों से घिरे थे। यहाँ से प्राप्त बेलनाकार मुहरें मेसोपोटामिया से प्राप्त मुहरों के समरूप थीं।

बनवाली

यह हरियाणा के हिसार जिले में स्थित है। इसकी खोज 1973 ई. में आर.एस. बिष्ट द्वारा की गई। यहाँ से दो सांस्कृतिक अवस्थाएँ प्राप्त हुई हैं। हड़प्पा पूर्व और हड़प्पाकालीन। यहाँ अच्छे किस्म का जौ प्राप्त हुआ है। बनवाली से ताँबे का वाणाग्र प्राप्त हुआ है। यहाँ से हल की आकृति का खिलौना प्राप्त हुआ है। यहाँ नाली पद्धति का अभाव है। यहाँ से ताँबे की कुल्हाड़ी प्राप्त हुई है। बनवाली की नगर-योजना शतरंज के बिसात या जाल के आकार की बनायी गयी थी। सड़कें न तो सीधी मिलती हैं और न एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं। यहाँ से पत्थर एवं मिट्टी के मकानों के साक्ष्य मिलते हैं। यहाँ से सड़कों पर बैलगाड़ियों के पहियों के निशान मिले हैं।

रोपड़

सतलुज नदी के किनारे यह पंजाब में स्थित है। 1953-54 में यहाँ खुदाई यज्ञदत शर्मा  के अन्तर्गत कराई गई। यहाँ से हड़प्पा-पूर्व और हड़प्पाकालीन अवशेष प्राप्त होता है। यहाँ से ताँबे की कुल्हाड़ी प्राप्त हुई है। यहाँ के एक कब्रगाह में आदमी के साथ कुत्ते को दफनाए जाने का भी साक्ष्य मिला है। रोपड़ से संस्कृति के पाँच स्तर प्राप्त हुए हैं जो इस प्रकार हैं- हड़प्पा, चित्रित धूसर मृदभांड, उत्तरी काले पॉलिस वाले, कुषाण, गुप्त और मध्यकालीन मृदभांड।

सुरकोटड़ा

यह गुजरात के कच्छ प्रदेश में स्थित है। उत्खनन का काम जगपति जोशी के अधीन 1964 में किया गया। यहाँ से घोड़े की अस्थियाँ प्राप्त हुई हैं। साथ ही यहाँ एक अनोखे कब्रगाह का साक्ष्य मिला है।

आलमगीरपुर

हिण्डन नदी के किनारे यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित है। इसकी खुदाई यज्ञदत्त शमा ने 1958 में कराई। यह हड़प्पा सभ्यता के अन्तिम चरण को रेखांकित करता है।

रंगपुर

यह गुजरात के काठियावाड़ जिले में स्थित है। यह मादर नदी के समीप है। इसकी खुदाई 1953-54 में रंगनाथ राव के अन्तर्गत करायी गई। यहाँ से उत्तर हड़प्पा संस्कृति का साक्ष्य मिलता है। यहाँ धान की भूसी का साक्ष्य मिला है। यहाँ कच्ची ईंटों का दुर्ग भी मिला है।

अलीमुराद

यह सिंध प्रांत में स्थित है। यहाँ बैल की लघु मृण्मूर्ति मिली है। यहाँ से भी कांसे की कुल्हाड़ी प्राप्त हुई है।

सुत्कोगेडोर

यह स्थल बलूचिस्तान में दाश्क नदी के किनारे स्थित है। इसकी खुदाई 1927 में औरेल स्टाइन के अधीन की गई। यहाँ से परिपक्व हड़प्पा काल का साक्ष्य मिला है। यहाँ से मनुष्य की अस्थि, राख से भरा बर्तन, ताँबे की कुल्हाड़ी और मिट्टी से बनी चूड़ियाँ प्राप्त हुई हैं।

अलाहदिनों

सिंधु नदी और अरब सागर के संगम से 16 कि.मी. उत्तर पूर्व में स्थित है। इसकी खुदाई फेयर सर्विस ने करायी।

कोटदीजी

यह मोहनजोदडो से 50 कि.मी. पूर्व में स्थित है। इसकी खुदाई (1955-57) में एफ.ए. खान ने कराई। इसके अलावा अन्य स्थलों के बारे में भी महत्त्वपूर्ण तथ्य हैं। आमरी में बारहसींगा का नमूना मिला है। सर्वप्रथम सिंधु सभ्यता के लोगों ने ही चाँदी का उपयोग किया। धौलावीरा भारत में स्थित सबसे बड़ा हडप्पा स्थल है। दूसरा बड़ा स्थल राखीगढ़ी है। सम्पूर्ण सिंधु सभ्यता के स्थलों में क्षेत्रफल की दृष्टि से धौलावीरा का स्थान चौथा है।

धौलावीरा

यह स्थल गुजरात के कच्छ जिले के मचाऊ तालुका में मानसर एवं मानहर नदियों के मध्य अवस्थित हैं। इसकी खोज जगपति जोशी ने 1967-68 में की परन्तु इसका विस्तृत उत्खनन रवीन्द्र सिह विष्ट के द्वारा किया गया। यह ऐसा प्रथम नगर है जो तीन भागों में विभाजित था- दुर्गभाग, मध्यम नगर तथा निचला नगर। यहाँ से 16 विभिन्न आकार-प्रकार के जलाशय मिले हैं, जो एक अनूठी जल संग्रहण व्यवस्था का चित्र प्रस्तुत करते हैं। धौलावीरा नगर के दुर्ग भाग एंव मध्यम भाग के मध्य एक भव्य इमारत के अवशेष, चारों ओर दर्शकों को बैठने के लिए बनी हुई सीढ़ियों को, इंगित करते हैं। धौलावीरा से दस बड़े अक्षरों में लिखा एक सूचना पट्ट का प्रमाण मिला है।

कुणाल

हाल में यह स्थल प्रकाश में आया है। यह हरियाणा में स्थित है। यह एक मात्र ऐसा स्थल है, जहाँ से चाँदी के दो मुकुट मिले हैं।

राखीगढ़ी

हरियाणा के हिसार जिले में सरस्वती तथा दुहद्वती नदियों के शुष्क क्षेत्र में राखीगढ़ी, सिन्धु सभ्यता का भारतीय क्षेत्र में धौलावीरा के बाद, दूसरा विशालकाय नगर है। इसका उत्खनन व्यापक पैमाने पर 1997-99 के दौरान अमरेन्द्र नाथ के द्वारा किया गया। राखीगढ़ी से प्राक हड़प्पा एंव परिपक्व हड़प्पा युग इन दोनों कालों के प्रमाण मिले हैं।

नगर-योजना एवं स्थापत्य कला: सिंधु घाटी सभ्यता

उत्कृष्ट नगर नियोजन एवं स्थापत्य कला सिन्धु सभ्यता की प्रमुख विशेषता थी। सैन्धव लोगों का सौन्दर्य बोध उनकी शिल्प कला में सर्वाधिक स्पष्ट रूप से मुखरित हुआ है। इस सभ्यता के अधिक स्पष्ट एवं विपुल रूप में अवशेष मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, चाँहुदड़ो एवं लोथल आदि से प्राप्त हुए हैं। सैन्धव लोग सभ्य, उच्च कोटि के अभियन्ता एवं वास्तुशिल्पज्ञ थे। प्रमुख नगरों का निर्माण उन्होंने नियोजित योजना के आधार पर किया था। सैन्धव जनों ने अपने नगरों के निर्माण में शतरंज पद्धति (चेशबोर्ड) को अपनाया जिसमें सड़के सीधी एवं नगर सामान्य रूप से चौकोर होते थे। सड़कें बिछाने की समस्या मकानों के निर्माण से पहले ही हल कर दी जाती थी। मुख्य मार्ग उत्तर से दक्षिण जाता था एवं दूसरा मार्ग पूरब से पश्चिम उसे समकोण पर काटता था। मोहनजोदड़ो में राजपथ की चौड़ाई दस मीटर थी। सड़क कच्ची थीं। महत्त्वपूर्ण स्थलों का विभाजन था। पश्चिमी भाग में गढ़ी होती थी और पूर्वी भाग में निम्न शहर होता था। सड़कों के जाल बिछे थे। मुख्य मार्ग एक दूसरे को समकोण पर काटता था। सड़के कच्ची होती थीं। एक सड़क को पक्की बनाने की कोशिश केवल मोहनजोदड़ों में की गई थी। सिन्धु सभ्यता के लोग आडम्बर के विशेष प्रेमी नहीं थे। उन्होंने सुन्दरता से अधिक उपयोगिता पर बल दिया था। कालीबंगा का एक फर्श का उदाहरण अपवाद है जिसके निर्माण में अलंकृत ईंटों का प्रयोग किया गया है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के भवनों में स्तम्भों का कम प्रयोग हुआ है। उनके स्तंभ चतुर्भुजाकार या वर्गाकार होते थे, गोलाकार नहीं। कालीबंगा और हड़प्पा में गढ़ी और निचले नगर के बीच खाली जगह होती थी, ऐसा ही मोहनजोदड़ो, गनेरीवाला (बहावलपुर), हड़प्पा (पंजाब), धौलावीरा, राखीगढ़ी में भी देखने को मिलती हैं। सिंधु सभ्यता के क्षेत्रीय विस्तार को ध्यान में रखते हुए जे.पी. जोशी ने तीन आर्थिक क्षेत्र (केन्द्र) निर्धारित किए हैं।

  1. मनसा क्षेत्र (भटिण्डा)
  2. बहावलपुर क्षेत्र (N.W. Frontier)
  3. कच्छ क्षेत्र (गुजरात)।

मोहनजोदड़ो में गढ़ी और निचले नगर के बीच सिंधु नदी की एक शाखा बहती थी। लोथल और सुरकोतड़ा में यह विभाजन नहीं था। एक ही सुरक्षा दीवार से वहाँ गढी एवं निचला नगर घिरे थे। धोलावीरा एक ऐसा शहर है, जिसमें नगर तीन भागों में विभाजित था। बनवाली में नाली नहीं पायी गयी है। एक कुषाणकालीन स्तूप मोहनजोदड़ो के टीले पर मिला है। मकानों का औसत आकार 30 फीट है। ईंटो का आकार 4:2:1 है। लोथल आयताकार चबूतरे पर बसा था। सुत्कोगेडोर में एक विशाल दुर्ग एवं परकोटों से घिरे एक छोटे आवास स्थल का पता चला है। सुक्कुर में पत्थर का औजार बनाने वाली फैक्ट्री मिली है। सुक्कुर से ही चूना पत्थर के कारखाने का साक्ष्य मिला है। मकानों के अलावा सैन्धव के कुएं, अपनी ईंटों की सुदृढ़ चिनाई के लिए प्रसिद्ध हैं। सभ्यता के अन्तिम काल में सम्भवत: पूर्व निर्मित कुओं की मरम्मत करके ही उनका उपयोग किया गया।

उस युग के प्रत्येक कुँए प्रायः अंडाकार होते थे एवं उनके उपरी भाग पर चतुर्दिक दीवार बनी रहती थी। पानी रस्सी से निकाला जाता था, रस्सी के घर्षण के चिह्न कुओं की मुण्डेर पर देखे गये हैं। कुओं के अन्दर सीढ़ियां बनी होती थीं जिनकी सहायता से अन्दर प्रवेश करके सफाई आदि की जाती रही होगी। कुओं के निर्माण में षड्जाकार ईंटें प्रयुक्त की गई थीं। कुओं के पास छोटे-छोटे गड्ढे पाये गये, सम्भवत: घडे रखने हेतु इनका उपयोग किया जाता रहा होगा। इसके अलावा कुछ स्थापत्य कला के प्रसिद्ध उदहारण हैं-

सार्वजनिक भवन- हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा एवं लोथल आदि में दुर्ग या प्राचीर के अवशेष पाये गये हैं। शहर दुर्गीकृत थे अर्थात् सुरक्षा की दृष्टि से प्राचीर से घिरे हुए थे। रावी नदी के निकट हड़प्पा के अवशेष पाये गये हैं। हड़प्पा का पश्चिमी टीला गढी एवं पूर्वी टीला निचला नगर था। गढ़ी आकार में लगभग समानान्तर चतुर्भुज है जो उत्तर से दक्षिण दिशा में 420 मीटर एवं पूर्व से पश्चिम 196 मीटर है। इसकी सर्वाधिक ऊंचाई लगभग 12 से 15 मीटर के बीच है और इसके निर्माण में मिट्टी और कच्ची ईंटों का प्रयोग हुआ है। सर्वप्रथम सुरक्षा के लिए एक सुदृढ़ दीवार बनाई जाती थी। यह दीवार निम्नस्तर पर 12.19 मीटर चौड़ी एवं ऊंचाई पर 10.66 मीटर थी जिसमें क्रमश: ढाल दृष्टिगत होता है। इसका निर्माण कच्ची ईंटों और मिट्टी से किया गया था, किन्तु बाह्य भाग पर पक्की ईंटें लगाई गई। प्रारम्भ में ईंटों की दीवार को सीधे बढ़ाया गया परन्तु बाद में उसे तिर्यक बना दिया गया था। गढ़ी की बाहरी दीवार पर कुछ दूरी से बुर्ज बने थे। उनमें से कुछ दीवार से अधिक ऊंचे थे। गढ़ी का भीतरी मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर की ओर था और पश्चिमी द्वार घुमाव लिए था जिसके साथ ही सीढ़ियाँ भी थीं।

भण्डारण व्यवस्था- हड़प्पा की एक इमारत, जिसे विद्वानों ने अन्नागार की संज्ञा दी है, परिमाण में बड़ी है। इस विशाल अन्नागार का निर्माण खण्डों में किया गया था। ऐसे बारह खण्ड हैं जो छ: छ: की दो पंक्तियों में विभक्त हैं। इन दो पंक्तियों के मध्य सात मीटर की दूरी है। प्रत्येक खण्ड का क्षेत्रफल लगभग 15.24 × 6.10 मीटर है। इन भण्डारगृहों का प्रमुख प्रवेश द्वार रावी नदी की ओर खुलता था, नदी मार्ग से भण्डारों में संग्रहित किया जाने वाला अनाज आता जाता रहा होगा। उक्त भण्डारों के तल तक पहुँचने हेतु एक ढाल युक्त मार्ग बनाया हुआ था। ऐसा भण्डारों में रखी जाने वाली सामग्री के निकालने एवं पहुँचाने में सुगमता की दृष्टि से किया जाता होगा। भण्डारों के फर्श में लकड़ी के शहतीर का उपयोग किया जाता था और इनके बीच में जगह छोड़ी जाती थी जिससे हवा का प्रवेश हो सके एवं जमीन की नमी से अनाज सुरक्षित रहे। फर्श की दरारों में पाया गया गेहूँ एवं जौ का भूसा यह सिद्ध करता है कि इसका उपयोग अनाज को सुरक्षित रखने हेतु किया जाता था। हड़प्पा का यह विशाल भण्डार 168 मीटर लम्बा तथा 134 फीट चौड़ा था। अन्नागार की छत के लिए लकड़ी की लट्ठों (टॉइल्स) का प्रयोग किया जाता था।

चार फीट ऊंचे भाग (चबूतरे) पर मोहनजोदड़ो में हड़प्पा के सदृश अन्नागार के अवशेष मिले हैं। स्नानागार के पश्चिम में पक्की ईंटों से निर्मित यह भवन पूर्व से पश्चिमी 45.72 मीटर लम्बा एवं उत्तर से दक्षिण 22.86 मीटर चौड़ा है। सम्भवत: इसमें 27 खण्ड (ब्लॉक) थे जिनके मध्य रिक्त स्थान छोड़ा गया, जिससे वायु का सुगम संचरण होता रहे। इस भवन का मलवा 1950 ई. में व्हीलर ने हटवाया था, उन्होंने इसे अन्नागार की संज्ञा दी है। इसका ऊपरी भाग लकड़ी से बनाया गया था। दीवारें तिरछी बनाई गई थीं। उत्तर दिशा में चबूतरे की दीवार भी तिरछी थी सम्भवत: भारी अन्न को (बोरे आदि) ऊपर चढ़ाने में ढाल की सुविधा की दृष्टि से ऐसा किया होगा।

वृहत स्नानागार- मोहनजोदड़ो की सबसे महत्त्वपूर्ण इमारत महास्नानागार है। यह बौद्ध स्तूप के लगभग 57.9 मीटर दूर स्थित है। मार्शल के अनुसार, मध्य प्रकाल में उसका निर्माण हुआ। गढ़ी टीले पर स्थित यह वास्तु अवशेष सम्पूर्ण रूप में 180 फीट उत्तर-दक्षिण तथा 108 फीट पूर्व से पश्चिम के विस्तार में फैला हुआ है। पूर्णतः पक्की ईंटों से निर्मित वृहत् स्नानागार मध्य भाग में 39 फीट 3 इंच लम्बा, 23 फीट 2 इंच चौड़ा तथा 8 फीट गहरा है। प्रवेश की सीढ़ियाँ 9 इंच चौडी तथा 8 इंच ऊंची हैं, प्रत्येक सीढ़ी के ऊपर लकड़ी के पटिये आबद्ध किये गये थे। सीढ़ियों की समाप्ति पर 39″ × 16″ क्रमश: चौड़ी एवं ऊंची एक पीठिका है और इसके दोनों ओर सीढ़ियां हैं।

इसका फर्श पूरी तरह समतल नहीं है अर्थात् दक्षिण-पश्चिम की ओर ढाल लिए हुए है। इसी ओर कोने में एक वर्गाकार मोरी (छेद) पानी के निकास हेतु बनाई गई है, सम्भवत: समय-समय पर इसकी सफाई की जाती रही होगी। सीढ़ी के अन्तिम भाग में नीचे नाली 23.5 × 8.26 सेमी. क्रमश: चौड़ी एवं गहरी है। इसके फर्श को जल निरोधक बनाये जाने हेतु बिटुमिन एवं जिप्सम का प्रयोग किया गया। दो इंटों के बीच बहुत कम दूरी पाई गयी। इसकी दीवार में भी तराशी गई ईंटों का प्रयोग किया है एवं इस तरह की एक मीटर मोटी दीवार का निर्माण देखा गया है। इसमें प्रयुक्त ईंटें 25.78 × 12.95 × 5.95 सेमी. या 27.94 × 13.1 × 5.65 से.मी. आकार की हैं। इस दीवार के पिछले भाग में 2.54 से.मी. मोटा बिटुमिन लगाया गया और उसे गिरने से बचाने के लिए उसके पीछे भी पक्की ईंटों की दीवार बनाई गई। मार्शल का कथन है कि उस समय उपलब्ध निर्माण सामग्री से, इससे सुन्दर और मजबूत निर्माण की कल्पना करना कठिन है।

स्नानागार के पूर्व में निर्मित 6-7 कमरों के मध्य एक कक्ष में अण्डाकार कुआ है जिसके पानी से स्नानागार भरा जाता था। इसके तीन ओर कई प्रकोष्ठ या कमरे (दरीचियाँ) बने हुए हैं तथा दक्षिण की ओर एक लम्बा प्रकोष्ठ है जिसके दोनों ओर कमरे हैं। उत्तर की ओर बड़े-बड़े आकार के आठ कक्ष इसी प्रकार हैं। दरीचियों या प्रकोष्ठों के ऊपर एक मंजिल और रही होगी क्योंकि उत्तरी भाग के कमरों के पूर्व में कुछ सीढ़ियों के अवशेष पाये गये हैं। प्रत्येक कक्ष 9.5 फीट लम्बा तथा 6 फीट चौड़ा था। ये कमरे भी पक्की ईंटों से बनाये गये, जिनमें छोटी-छोटी नालियां भी बनी थीं। विद्वानों की मान्यता है कि ऊपर के भाग में सम्भवत: पुजारी वर्ग रहा करता होगा। स्नानागार से सम्बद्ध कक्षों के द्वार बिल्कुल सामने न होकर दायें या बायें की ओर हैं, जिससे आन्तरिक भाग दृष्टिगोचर नहीं हो पाता। सम्भवत: इन कमरों का उपयोग, वस्त्र आदि बदलने के लिए किया जाता होगा।

उक्त स्नानागार में लम्बवत ईंटों की चिनाई जिप्सम एवं बिटुमिन के प्लास्टर के रूप में प्रयोग आदि सैन्धव लोगों के अनुपम वास्तु शिल्प के एक नवीन प्रयोग का द्योतक है। सम्भव है कि महास्नानागार सैन्धव जनों की किसी धार्मिक प्रवृत्ति का परिचायक हो क्योंकि वर्तमान में भी मन्दिरों के साथ या स्वतन्त्र रूप में इस प्रकार के कुण्डों का महत्त्व बना हुआ है।

सभा भवन- मोहनजोदड़ो में स्तूप टीले से कुछ दूर दक्षिण में एल एरिया में एक विशाल भवन था। मैके की धारणा है कि यह शहर के आर्थिक जीवन से सम्बद्ध था। इसे कुछ विद्वानों ने सभा मण्डप अथवा विद्यालय भवन माना है। गढ़ी टीले पर स्थित 27.43 मीटर का यह वर्गाकार भवन जो मूलत: बीस स्तम्भों पर आधारित था, ये स्तम्भ चार पंक्तियों में विभक्त है और प्रत्येक पंक्ति में पांच स्तम्भ हैं इमारत तक पहुँचने के लिए उत्तरी छोर के मध्य से रास्ता था। इसकी फर्श भली-भाँति बिछाई गई ईंटों द्वारा निर्मित की गयी, जो कई भागों में विभक्त थी। इनका उपयोग सम्भवत: बैठने के लिए किया जाता होगा। इस तरह के निर्माण की तुलना मार्शल ने बौद्ध गुहा मन्दिरों से की है जिनमें बौद्ध भिक्षु लम्बी पंक्ति में आसीन होते थे। मैके, इसे शहर के आर्थिक जीवन से जोड़ते हुए बाजार भवन (हाल) मानते हैं, जहाँ पर दुकानें लगाने के लिए स्थायी रूप से स्थान (स्टाल) बनाये गये थे। व्हीलर ने इसके फारसी दरबारे आम जैसी इमारत होने की ओर संकेत किया है। दीक्षित इसे वाद-विवाद स्थल मानते हैं।

लोथल डॉकयार्ड- सैन्धव सभ्यता का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थल लोथल सौराष्ट्र (गुजरात) क्षेत्र में है। यह नगर भी हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के समान सुनियोजित था, सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं। सामान्यतः नगर को दो भागों-गढ़ी एवं निचले नगर के रूप में विभक्त किया जा सकता है। साधारणतया भवन कच्ची ईंटों से निर्मित किये गये परन्तु गोदी (डॉकयार्ड) एवं कुछ महत्त्वपूर्ण भवनों का निर्माण पकाई हुई ईंटों से किया गया। इसके अतिरिक्त स्नानागार एवं नालियाँ आदि के लिए भी पक्की ईंटें उपयोग में लाई गई। लोथल गढ़ी 117 मीटर पूर्व और पश्चिम में तथा 136 मीटर उत्तर तथा 111 मीटर दक्षिण की ओर है। इसमें एक भवन 126×30 मीटर का, ऐसे स्थान पर स्थित था जहाँ से नौकाघाट, भण्डारगृह तथा नावों के गमनागमन पर भली भाँति नियन्त्रण रखा जा सकता था। एस.आर. राव को नगर उत्खनन के दौरान नगर के बाहरी भाग में एक डॉकयार्ड मिला है जो भोगावों एवं साबरमती नदी के तट पर स्थित सैन्धव सभ्यता का प्राचीन बन्दरगाह था।

समाज एवं धर्म- सिन्धु घाटी सभ्यता

समाज

सिंधु सभ्यता में चार प्रजातियों का पता चलता है-

  1. भूमध्यसागरीय,
  2. प्रोटोआस्ट्रेलियाड,
  3. मंगोलाइड,
  4. अल्पाइन

सबसे जयादा भूमध्यसागरीय प्रजाति के लोग थे। सिन्धु का समाज संभवत: चार वर्गों में विभाजित था- योद्धा, विद्वान्, व्यापारी और श्रमिक। स्त्री-मृण्मूर्तियों की संख्या देखते हुए ऐसा अनुमान किया जाता है कि सिंधु सभ्यता का समाज मातृसत्तात्मक था। हड़प्पा सभ्यता के लेाग युद्ध प्रिय कम और शांति प्रिय अधिक थे। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में दो तरह के भवन मिलने के आधार पर लोग कहते हैं कि बड़े घरों में सम्पन्न लोग रहते थे तथा छोटे घरों में मजदूर, गरीब अथवा दास रहते थे अर्थात् समाज दो वर्गों-सम्पन्न एवं गरीब में विभाजित था।

वस्त्राभूषण- अधिक संख्या में पुरुषाकृतियाँ सैन्धव स्थलों से प्राप्त नहीं हुई हैं एवं जो उपलब्ध हुई हैं वे अधिकांशतः खण्डित हैं, अत: उनसे पुरुषों के परिधान पर विशेष प्रकाश नहीं पड़ता। मोहनजोदड़ो से प्राप्त घीया पत्थर की मानव मूर्ति उपलब्ध हुई है जिसे योगी की मूर्ति कहा गया है। इस मूर्ति के अवलोकन से प्रतीत होता है कि पुरुष एक शाल का प्रयोग करते थे जिससे बायें कन्धे को ढकते हुए दाहिने हाथ के नीचे से निकाला जाता था। उपरोक्त शाल पर त्रिखण्डीय अलंकरण देखा जाता है। इस प्रकार के चित्रित वस्त्रों का प्रयोग सम्भवत: अन्य लोगों द्वारा भी किया जाता होगा। स्त्रियों के वस्त्राभूषण के विषय में विपुल संख्या में प्राप्त मृण्मूर्तियों से अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार की मूर्तियों को मातृदेवी की मूर्तियाँ कहा गया है। इनके शरीर का ऊपरी भाग वस्त्रहीन दिखाया गया है और अधोभाग में घुटनों तक का घेरदार वस्त्र मिलता है। थपलियाल एवं शुक्ल के अनुसार, ऐतिहासिक काल में इस तरह के अधोवस्त्र गुप्तकालीन मृण्मूर्तियों एवं अजन्ता की चित्रकला से मिलते हैं। इस घेरदार वस्त्र को कमर पर करधनी द्वारा आबद्ध किया जाता था और सामने अथवा बकसुए द्वारा कसा जाता था। कुछ स्त्री-मूर्तियों के सिर पर आकृति की एक विचित्र शिरोभूषा दिखाई देती है। कुछ आकृतियों के दोनों ओर डलिया जैसी वस्तु रखी दिखाई पड़ती है। स्त्रियों में आकर्षक विन्यास का प्रचलन था। मोहनजोदडो से प्राप्त कांस्य मूर्ति का अत्यन्त आकर्षक है। सैन्धव जन आभूषण प्रिय थे, आभूषणों का एवं पुरुषों द्वारा समान रूप से किया जाता था। बहुमूल्य गुरियों से आभूषणों का उपयोग विशेष रूप से प्रचलित रहा होगा। हड़प्पा से 6 लड़ी का सोने के मनकों का हार मिला है। हड़प्पा से एक बोतल मिली है काले रंग की वस्तु प्राप्त हुई है जो काजल का प्रतीक है।

खानपान- सैन्धव लोगों के खान-पान के विषय में हमें बहुत कम जानकारी है। पुराविदों की मान्यता है कि सैन्धव लोग गेहूँ एवं जौ खाते थे, किन्तु कालीबंगा एवं निकटवर्ती प्रदेश के लोगों को जौ से ही सन्तुष्ट रहना पड़ता था। गुजरात के रंगपुर, सुरकोतदा आदि स्थानों के निवासी चावल और बाजरा खाना पसन्द करते थे। तिल एवं सरसों के तेल एवं सम्भवत: घी का भी प्रयोग किया जाता था।

मनोरंजन- मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु-पक्षियों को आपस में लड़ाना एवं चौपड़ और पासा खेलना इस सभ्यता में मनोरंजन के साधन थे।

अंत्येष्टि- अंत्येष्टि के निम्नलिखित प्रकार थे

  1. पूर्ण समाधिकरण,
  2. आंशिक समाधिकरण और
  3. दाह संस्कार

सबसे अधिक पूर्ण समाधिकरण प्रचलित था। कालीबंगा में छोटी-छोटी गोलाकार कब्रे मिली हैं, जबकि लोथल में युग्म शवाधान का साक्ष्य मिला है। रूपनगर की एक समाधि में मालिक के साथ कुत्ते को दफनाए जाने का साक्ष्य मिलता है। कुत्ता एवं मालिक को साथ दफनाये जाने का साक्ष्य बुर्जहोम में भी मिला है। हड़प्पा की एक कब्र में ताबूत मिला है और सुरकोटड़ा से अनोखी कब्र मिली है।

धर्म

सैन्धव सभ्यता के धार्मिक जीवन का जहाँ तक प्रश्न है, इनके विषय में किसी साहित्य का न मिलना, स्मारकों के अभाव एवं लिपि न पढ़े जाने के कारण कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाती। मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुहर पर योगी की आकृति (संभवत: पशुपति शिव) मिली है। लिंगीय प्रस्तर (शिव लिंग से मिलते-जुलते), मातृ देवी की मृण्मूर्ति जिससे उर्वरता की उपासना तथा मातृदेवी की पूजा के संकेत मिलते हैं। हवन कुडों में होने वाले हवनों (जैसे कालीबंगा) इत्यादि के आधार पर सैन्धव सभ्यता के धार्मिक जीवन के विषय में अनुमान लगाया जाता है। सैन्धव सभ्यता में वृक्ष पूजा (पीपल), पशु पूजा (कुबड वाला पशु) एवं जल पूजां के भी प्रमाण मिले हैं। सिन्धु सभ्यता में मंदिरों का कोई अवशेष नहीं मिला है

मातृदेवी की पूजा- देवियों की पूजासौम्य एवं रौद्र दोनों रूपों में होती थी। बलूचिस्तान स्थित कुल्ली नामक स्थान में नारी मृण्मूर्तियों में सौम्य रूप दिखता है, लेकिन बलूचिस्तान की झौब संस्कृति से प्राप्त मूर्तियाँ रौद्र रूप में दिखती हैं। जिन मृण्मूर्तियों में गर्भणी नारी का रूपाकन है, उन्हें पुत्र प्राप्ति हेतु चढ़ाई गई भेंट मानी जा सकती है। नारी की पूजा कुमारी के रूप में की जाती थी। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मूर्ति में एक देवी के सिर पर पक्षी पंख फैलाये बैठा है। हड़प्पा से प्राप्त एक मुहर के दाहिने भाग में एक स्त्री सिर के बल खड़ी हैं।

पृथ्वी की पूजा- एक स्त्री के गर्भ में एक पौधा प्रस्फुटित होता दिखाया गया है।

शिव की पूजा- मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर में योगी की मुद्रा में एक व्यक्ति का चित्र है। इसके तीन मुख और दो सींग हैं। उसके बांयी ओर बाघ और हाथी तथा दांयी ओर भैंस और गैंडा हैं। आसन के नीचे दो हिरण बैठे हुए हैं। मार्शल का मानना है कि वे पशुपति शिव हैं। सिंधु सभ्यता में शिव की पूजा किरात (शिकारी) रूप में, नागधारी रूप में, धनुर्धर रूप में और नर्तक रूप में होती थी। एक जगह पर एक व्यक्ति को दो बाघों से लड़ते हुए दिखाया गया है, संभवत: वह मेसोपोटामिया के योद्धा गिलगमेश की आकृति है।

प्रजनन शक्ति की पूजा- लिंग पूजा का सर्वाधिक प्राचीन प्रमाण हड़प्पा से मिला है।

पशु पूजा- मुख्य रूप से कुबड वाले सांड की पूजा होती थी। पशु पूजा वास्तविक एवं काल्पनिक दोनों रूपों में होती थी।

वृक्ष पूजा- संभवत: पीपल, नीम और बबूल की पूजा होती थी एवं मुख्य रूप में पीपल और बबूल की पूजा होती थी।

नाग पूजा- कुछ मृदभांडों पर नाग की आकृति मिली हैं। अत: ऐसा अनुमान किया जाता है कि सिंधु सभ्यता में नाग की भी पूजा की जाती थी।

अग्नि पूजा- कालीबंगा, लोथल, बनवाली एंव राखीगढ़ी के उत्खननों से हमें अनेक अग्निवेदियाँ मिली हैं एवं कुछ स्थानों पर उनके साथ ऐसे प्रमाण भी मिले हैं, जिनमें उनके धार्मिक प्रयोजनों के लिए अग्नि के प्रयुक्त होने की संभावना प्रतीत होती है।

सार्वजनिक स्नान एवं जल पूजा- मोहनजोदड़ो से प्राप्त स्नानागार का अनुष्ठानिक महत्व था। वैदिक काल में भी नदी की पूजा होती थी और परवर्ती काल में सिंधु क्षेत्र में जल की पूजा होती थी। इस पूजा से जुड़े हुए लोग दरियापंथी कहलाते थे।

स्वास्तिक एवं ऋग स्तंभ की पूजा- स्वास्तिक एवं ऋग स्तंभ की पूजा भी की जाती थी।

प्रेतवाद- सिंधु सभ्यता के धर्म में हमें प्रेतवाद का भाव मिलता है। प्रेतवाद वह धार्मिक अवधारणा है जिसमें वृक्षों, पत्थरों आदि की उपासना इस भय से की जाती है कि इनमें बुरी आत्मा निवास करती है।

इसके अतिरिक्त सिन्धु अतिरिक्त सिन्धु सभ्यता की धार्मिक भावना में हमें भक्ति धर्म और पुनर्जन्मवाद के बीज भी मिलते हैं।

प्रशासन- सिन्धु घाटी सभ्यता

प्रशासन

प्रामाणिक और सुस्पष्ट साक्ष्यों के अभाव में सिन्धु सभ्यता के अन्य पहलुओं के बारे में निश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि सिन्धु सभ्यता की राजनैतिक व्यवस्था का स्वरूप क्या था? किन्तु इस सभ्यता का सुविशद विस्तार-क्षेत्र तथा सुव्यवस्थित नगर विन्यास योजना (टाउन प्लानिंग) के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिन्धु सभ्यता की राजनैतिक व्यवस्था भी सुगठित और विकसित थी।

सैन्धव सभ्यता के विभिन्न केन्द्रों की ठोस योजना और बस्तियों के निर्माण में एकरूपता के आधार पर वहाँ एक सुदृढ़ राजतंत्र के अस्तित्व की संभावना व्यक्त की जाती रही है। सभ्यता के विभिन्न पक्षों में एक रूढ़िवादिता की झलक भी मिलती है जिसके आधार पर कहा जाता है कि यहाँ राज-तंत्र पर धर्मतंत्र की गहरी पकड़ थी। जो भी पुरातात्विक स्रोत मिले हैं, उससे किसी राजा के होने के संकेत नहीं मिले हैं। किन्तु व्हीलर का मानना है कि सुमेर की भांति पुरोहित वर्ग ही यहाँ का शासक था। हंटर के मुताबिक यहाँ जनतंत्रात्मक शासन पद्धति थी। व्हीलर के अनुसार यहाँ मध्यवर्गीय जनतंत्रात्मक शासन पद्धति थी।

अभी ऐसा कोई आधार नहीं मिल पाया है जिसके आधार पर कहा जा सके कि सैधव सभ्यता एक साम्राज्य का प्रतिनिधित्व करती थी, हड्प्पा एवं मोहनजोदड़ो दो राजधानियाँ थी। मैके महोदय ने एक प्रकार की प्रतिनिध्यात्मक सरकार की कल्पना की है। जर्मन विद्वान् वाल्टर रूबन एवं रूसी विद्वान् वी.वी. स्टुर्ब का मानना है कि सिंधु सभ्यता का प्रशासन गुलामों पर आधारित होता था। स्टुअर्ट पिगॉट का मानना है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सिंधु सभ्यता की दो राजधानियाँ थीं और यहाँ पर संभवत: पुरोहितों का शासन था।

लिपि

1853 ई. में सर्वप्रथम सिंधु लिपि का साक्ष्य मिला। 1923 ई. से यह लिपि संपूर्ण रूप में प्रकाश में आई। इस लिपि में लगभग 64 मूल चिह्न हैं एवं 250-400 तक अक्षर हैं जो सेलखड़ी की आयताकार मुहरों एवं तांबे की गुटिकाओं आदि पर मिलते हैं। लिपि चित्राक्षर थी। यह लिपि बाउसट्रोफेन्डम लिपि कहलाती है। यह दाएँ से बाएँ और पुन: बाएँ से दाएँ लिखी जाती है। यह लिपि अत्यंत छोटे-छोटे अभिलेखों में मिलती है। इस लिपि में प्राप्त सबसे बड़े लेख में लगभग 17 चिह्न थे। विद्वानों ने सैन्धव लिपि पढ़ने के काफी प्रयास किये हैं किन्तु अभी तक विशेष सफलता नहीं मिली है। 1931 ई. में लैंगडन एवं बाद में सी.जे. गैड्स तथा सिडनी स्मिथ ने इन लेखों को संस्कृत भाषा के निकट माना है। प्राणनाथ ने ब्राह्मी लिपि का सैन्धव लिपि से तुलनात्मक अध्ययन कर दोनों के लिपि चिह्नों के ध्वनि निर्धारण करने की चेष्टा की है। 1934 ई. में हण्टर ने सैन्धव लिपि का वैज्ञानिक विश्लेषण कर पढ़ने का प्रयास किया है। द्रविड़ भाषा के अधिक निकट मानते हुए फादर हरास ने सैन्धव लिपि को द्रविड़ भाषा से सम्बद्ध करने का प्रयत्न किया है। स्वामी शकरानन्द ने तान्त्रिक प्रतीकों के आधार पर सैन्धव लिपि को पढ़ने की कोशिश की है। एक भारतीय विद्वान् आई महादेवन ने कम्प्यूटर की सहायता से इसे पढ़ने की कोशिश की। कृष्ण राव ने सैन्धव लेखों की संस्कृत से साम्यता स्थापित की है। डॉ फतेहसिह एवं डॉ. एस.आर. राव ने भी इस दृष्टि से उल्लेखनीय कार्य किया है। हाल ही में बिहार के दो प्रशासक विद्वानों- अरूण पाठक एवं एन. के. वर्मा ने सैन्धव लिपि का संथालों की लिपि से तादात्म्य स्थापित किया है। उन्होंने संथाल (बिहार) आदिवासियों से अलग-अलग ध्वन्यात्मक संकेतों वाली 216 मुहरें प्राप्त की जिनके संकेत चिह्न सिंधु घाटी में मिली मुहरों से काफी हद तक मेल खाते हैं। इसके बावजूद भी सिंधु लिपि को पढ़ पाने में हम असफल हैं।

कृषि, पशुपालन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- सिन्धु घाटी सभ्यता

विज्ञान एवं तकनीक

सैन्धव लोग तकनीकी के क्षेत्र में काफी विकसित थे। यहाँ बड़े पैमाने पर समानांतर फलकों का निर्माण, मनके बनाने की कला, ताम्र और कांस्य वस्तुएं बनाने की कला इत्यादि काफी विकसित थी। मृदभांडों की बहुत थोड़ी प्रतिशत चित्रित हैं। इसमें गाढ़ी लाल चिकनी मिट्टी पर काले रंग के ज्यामितीय पुष्पाकार और प्राकृतिक डिजाइन बनाये गये हैं। मिट्टी के बर्तन भट्ठी में पकाए जाते थे। इस तरह के भट्ठे मोहनजोदडो में 6 एवं हड़प्पा में 14 की संख्या में पाये गये हैं। सिंधु सभ्यता के लोग कांसा बनाना जानते थे। धातुओं की ढलाई का काम जानते थे। उन्हें ग्रहों एवं नक्षत्रों का ज्ञान था। सिंध में सुक्कुर एवं रोहड़ी में पत्थर के उपकरण बनाने के कारखाने के साक्ष्य मिले हैं।

कृषि और पशुपालन

सामान्यत: नवम्बर में सिंधु सभ्यता में फसल बोयी जाती थी और अप्रैल में काटी जाती थी। खेती में पत्थर एवं कांसा के औजार प्रयुक्त किये जाते थे। कालीबंगा में प्राक् हड़प्पा अवस्था के हल से जुते हुए खेत का साक्ष्य मिलता है। बनवाली में मिट्टी के बने हुए हल का एक खिलौना प्राप्त हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्धु सभ्यता में हल लकड़ी के बने होते थे। सर्वप्रथम कपास की खेती सिंधु सभ्यता में ही शुरू हुई। इसलिए यूनानी लोग इसे सिण्डन कहते थे। पेड़-पौधों में पीपल, खजूर, नीम, नींबू एवं केला उगाने के साक्ष्य मिलते हैं।

महत्त्वपूर्ण फसलें- गेहूँ की दो या तीन प्रजातियां प्रचलित थीं-

  1. ट्रिटीकम कम्पेक्टम
  2. ट्रिटिकम स्फेरोकम

जौ की दो प्रजातियां प्रचलित थीं-

  1. होरडियम वल्गैर
  2. हेक्सास्टिकम्

इनके अतिरिक्त राई, मटर, तिल, खजूर, सरसों, कपास, चना। रागी उत्तर भारत के किसी भी स्थल से प्राप्त नहीं होता है। चावल की खेती गुजरात और संभवत: राजस्थान में होती थी। लोथल एवं रंगपुर से मृण्मूर्ति में धान की भूसी लिपटी हुई मिली है। गुजरात के लोग हाथी पालते थे।

सिन्धु सभ्यता में कृषि के साथ पशुपालन का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। उत्खनन में उपलब्ध बहुसंख्यक पशु-अस्थि अवशेषों, मुहरों पर अंकित पशु आकृतियों तथा मिट्टी की असंख्य पशु-मूर्तियों से पशु-पालन के संकेत मिलते हैं। उत्खनन में प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि इस समय लोग दूध देने वाले पशु यथा गाय, भेड़, बकरी आदि के अतिरिक्त भैस, सुअर, हाथी तथा ऊँट आदि पालते थे। पालतू पशुओं में कुबड़दार वृषभ का भी महत्त्व था। ये लोग घोडे से परिचित थे या नहीं, यह कहना कठिन है। लोथल से प्राप्त एक ऋणमयी घोड़े की आकृति से ऐसा प्रतीत होता है कि ये लोग घोड़े से परिचित थे। इसी प्रकार ये लोग कुत्ता, बिल्ली तथा सुअर से भी परिचित थे।

धातु

चांदी का सर्वप्रथम उपयोग संभवत: सिंधु सभ्यता के लोगों ने ही किया। (डॉ. मजूमदार के अनुसार) सोना, तांबा, टिन, सीसा (Lead) आदि मुख्य धातु थे। धातुओं में सबसे अधिक तांबे का उपयोग किया गया है। उपकरणों में धातुओं की अपेक्षा प्रस्तर के उपकरण अधिक बनाये गए।

अर्थव्यवस्था- सिन्धु घाटी सभ्यता

आर्थिक प्रगति

इस सभ्यता की आर्थिक प्रगति के सूचक मृदभांड हैं। लाल चिकनी मिट्टी पर पुष्पाकार ज्यामितीय और प्राकृतिक डिजाइन बनाये जाते थे। हड़प्पा के मृदभांडों पर वृत्त या वृक्ष की आकृति भी मिलती है। सैन्धव नगरों के भग्नावशेषों के अवलोकन से प्रतीत होता है कि अधिकांश लोगों का जीवन सामान्य रूप से समृद्ध था। कृषि एवं पशुपालन सैन्धव अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण अंग थे। हड़प्पा आदि स्थलों से प्राप्त बड़े धान्यागारों से यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि अतिरिक्त अन्न का संग्रह राज्य द्वारा किया जाता रहा होगा। सामान्यत: नगरों में पूरे देश के संसाधन एकत्र हो जाते थे। अतिरिक्त उत्पादन का नियन्त्रण सम्भवत: हड़प्पा समाज में भी शहर के प्रभावशाली लोगों के हाथ में रहा होगा। संसाधनों के एकत्रीकरण की व्यवस्था, सैन्धव नगरों के विकास का एक कारण थी। हड़प्पा सभ्यता के व्यापक विस्तार का कारण, आपसी आर्थिक अन्तर्निर्भरता और व्यापारतन्त्र भी रहा। मूल संसाधनों का अलग-अलग स्थानों पर उपलब्ध होना सिन्धु नदी घाटी के विविध क्षेत्रों को जोड़ने का कारण बना। इनमें कृषि एवं खनिज संसाधन तथा लकड़ी आदि सम्मिलित थे और ये व्यापारिक मागों की स्थापना करके ही प्राप्त किये जा सकते थे। कहा जा सकता है कि सैन्धव नगर आर्थिक गतिविधियों के महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे। सैन्धव सभ्यता एक विकसित नगरीय सभ्यता थी। हड़प्पा, मोहनजोदडो, कालीबंगा एवं लोथल के उत्खनन से प्राप्त अवशेषों के आधार पर विद्वानों ने समाज के विविध व्यावसायिक वर्गों के होने का अनुमान किया है। बढ़ई का अस्तित्व लकड़ी काटने हेतु अवश्य रहा होगा। ईंटों के निर्माण द्वारा कुम्हार जीविकापार्जन करते थे। सैन्धव नगरों के अनुपम नियोजन वास्तु विशेषज्ञ एवं मकानों के निर्माता राजगीरों की कल्पना सहज ही की जा सकती है। सोना, चांदी, तांबा, पीतल आादि धातुओं के आभूषणों, गुड़ियों, मुद्राओं, बर्तनों को देखने से प्रतीत हाता है कि सैन्धव स्वर्णकार अपने कार्य में पर्याप्त निपुण थे। वे धातुओं को गलाना जानते थे। तांबे की गली हुई ढेरी मोहनजोदड़ो में मिली है। चाहुँदड़ो में मैके को इक्के के खिलौने प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा में भी पीतल का एक इक्का पाया गया है। मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा में गाड़ी के पहिये भी उपलब्ध हुए हैं। ये लोग धातुओं के अतिरिक्त शंख, सीप, घोंघा, हाथी दांत आदि के कार्य में निपुण थे। मोहनजोदडो से हाथी दांत का एक पात्र भी मिला है। अनाज को पीसने के लिए चक्कियों और ओखलियों का प्रयोग किया जाता होगा। बैलगाड़ियों का प्रयोग अनाज ढोने के लिए किया जाता था। बैलगाड़ी की आकृति के खिलौने चाहुँदड़ो, हड़प्पा आदि स्थानों से मिले हैं। इस सभ्यता के विविध केन्द्रों से प्राप्त वस्तुओं की एकरूपता तथा किसी एक क्षेत्र विशेष में उपलब्ध सामग्री की अन्य क्षेत्रों में प्राप्ति सुसंगठित अर्थव्यवस्था का प्रतीक है जिसके अन्तर्गत उत्पादित वस्तुओं के सामान्य वितरण में पर्याप्त सुविधा थी।

व्यापार एवं बाह्य देशों से संबंध

अन्य समकालीन सभ्यताओं जैसे मेसोपोटामिया, मिश्र आदि से सैन्धव लोगों का सम्पर्क व्यापारिक तथा सांस्कृतिक दोनों ही प्रकार का था। सैन्धव लोगों के लिए व्यापार का अत्यधिक महत्त्व था। इस दृष्टि से उन लोगों ने बहुत प्रगतिशील नीति अपनाई थी। उन लोगों के विभिन्न देशों से व्यापारिक सम्बन्ध होने के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। सैन्धव स्थलों के उत्खनन से ऐसी पर्याप्त सामग्री मिली है जिनके लिए कच्चा माल आस-पास के क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं था। अत: इसका आयात बाहर से किया जाता रहा होगा। सैन्धव नगरों का व्यापारिक सम्बन्ध मेसोपोटामिया तथा फारस की खाड़ी से था, इस तथ्य के अनेक पुरातात्त्विक प्रमाण मिलते हैं। सैन्धव सभ्यता की वे मुद्राएं सबसे महत्त्वपूर्ण साक्ष्य हैं जो मेसोपोटामिया के विभिन्न नगरों में पाई गई हैं। विद्वानों की मान्यता है कि ये वस्तुत: व्यापार के माध्यम से वहाँ पहुँची थीं। कुछ इतिहासकारों की यह भी धारणा है कि सैन्धव जनों ने सम्भवत: मेसोपोटामिया में व्यापारिक बस्ती की स्थापना की हो। किन्तु, लम्बर्ग कार्लोव्सकी इस मत से सहमत नहीं हैं कि मेसोपोटामिया में सैन्धव लोगों की बस्ती थी। मात्र मुद्राओं की प्राप्ति को उनके अनुसार इस तथ्य का मौलिक आधार नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार सैन्धव नगरों में निर्मित जिस प्रकार की वस्तुएं मेसोपोटामिया में मिली हैं, वे इस तथ्य के लिए पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं करती कि वहाँ सैन्धव व्यापारियों ने बस्ती बसाई थी, इस प्रकार की वस्तुएं सीधे सम्पर्क के बिना बिचौलियों द्वारा वहाँ पहुँचाई जा सकती थीं क्योंकि सैन्धव स्थलों में एक भी मुहर अथवा लेख मेसोपोटामिया का उपलब्ध नहीं हुआ है। दूसरे, मेसोपोटामिया में केवल एक ही ऐसी मुद्रा उम्मा नामक स्थल से मिली है, जिसे निश्चयपूर्वक सैन्धव सभ्यता का कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त सैन्धव स्थलों के उत्खनन में ऐसे भवन के अवशेष नहीं मिले जिन्हें मेसोपोटामिया शैली का कहा जा सके। इतना ही नहीं, मेसोपोटामिया के किसी भी स्थल से सैन्धव उपकरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हुए हैं। किन्तु, अधिकांश विद्वान् लम्बग कार्लोव्सकी के मत का सैन्धव सभ्यताओं के मध्य सम्पर्क को प्रमाणित करते हैं। सैन्धव जनों द्वारा निर्मित अथवा उसके सदृश अनेक मुद्रायें मेसोपोटामिया के विभिन्न स्थलों से मिली हैं। हड़प्पा स्थलों से प्राप्त बेलनाकार मुद्रायें मेसोपोटामिया में निर्मित अथवा उससे प्रेरित मानी जाती हैं। कुछ मुद्रायें, जो बहरीन से प्राप्त हुई हैं उन पर सैन्धव लिपि के चिह्न हैं। इस द्वीप में उपलब्ध अन्य मुद्राओं की तरह कुछ मुहरें दक्षिणी मेसोपोटामिया और एक लोथल से मिली है। हड़प्पाकालीन जो वस्तुएं मेसोपोटामिया से मिली हैं वे दोनों सभ्यताओं के संबंध को दर्शाने के लिए काफी हैं। हड़प्पाकालीन मुहर-मेसोपोटामिया के सूसा और ऊर में मिले हैं। हाल ही में फारस की खाड़ी में फैलका और बहरीन तथा मेसोपोटामिया के निप्पुर में सिंधु सभ्यता की मुहरें पाई गयी हैं जो चौकोर हैं, जिन पर एक सींग वाले पशु की आकृति एवं सिंधु लिपि उत्कीर्ण है। तेल अस्मार (मेसोपोटामिया में) से हड़प्पाकालीन लाल पत्थर का मनका प्राप्त होता है। उसी तरह पक्की मिट्टी की छोटी मूर्ति निप्पुर से प्राप्त होती है। मोहनजोदड़ो में मेसोपोटामिया की एक बड़ी बेलनाकार मुहर प्राप्त हुई है। लोथल से मेसोपोटामिया की एक छोटी बेलनाकार मुहर प्राप्त हुई है। लोथल से तांबे का ढला हुआ धातु पिंड भी मिला है। मेसोपोटामिया से प्राप्त एक कपड़े पर सिंधु सभ्यता की एक मुहर की छाप है। मध्य एशिया में तुर्कमेनिस्तान नामक जगह से सिंधु सभ्यता की कुछ वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। लोथल से मिट्टी की बनी एक नाव की प्रतिमूर्ति मिली है। सिंधु घाटी में मानक माप एवं बाट के प्रयोग का साक्ष्य मिला है। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से धान्य कोठारों का साक्ष्य मिला है। संभवत: कालीबंगा में भी धान्य कोठार मौजूद था। मेसोपोटामिया में स्थित अक्काड़ के प्रसिद्ध सम्राट् सरगौन (2350 ई.पू.) ने यह दावा किया था कि दिलमन, माकन और मेलुहा के जहाज उसकी राजधानी में लंगर डालते थे। दिलमन की पहचान बहरीन से माकन की मकरान (बलूचिस्तान) से और मेलुहा की सिन्धु सभ्यता से की गई है।

बाह्य व्यापार से संबंधित देश- मेसोपोटामिया, ईरान, अफगानिस्तान, बहरीन, ओमान, सीरिया आदि। आयात, अलबस्टर (अर्द्ध कीमती पत्थर)-बलूचिस्तान, राजस्थान, डामर। बिटुमिन-बलूचिस्तान और मेसोपोटामिया। चांदी-अफगानिस्तान और ईरान, मेसोपोटामिया। सोना-अफगानिस्तान और ईरान। पेस्को महोदय (इतिहासकार) का मानना है कि सोना दक्षिण भारत के कोलार से भी मंगाया जाता था। टिन-अफगानिस्तान और ईरान। सीसा-ईरान और अफगानिस्तान। तांबा-राजस्थान (खेत्री) और लाजवर्त। मणि-बदक्शां और शंख और घोंघे-पं. भारत के तट पर फारस की खाड़ी से। फिरोजा-ईरान।

निर्यात- लोथल में बनी सीप की वस्तुएं, हाथी दांत की वस्तुएं, तैयार माल, कपास, अनाजों का निर्यात भी संभवत: किया जाता था। सिंधु घाटी के पक्ष में व्यापार संतुलन था। हड़प्पा में मेसोपोटामिया की वस्तुओं का न पाया जाना, इस तथ्य से स्पष्ट किया जा सकता है कि परंपरागत रूप में मेसोपोटामिया के लोग कपड़े, ऊन, खुशबूदार तेल और चमड़े के उत्पाद बाहर भेजते थे। चूंकि ये चीजें जल्दी नष्ट हो जाती थीं, इसलिए ये हड़प्पा सभ्यता में प्राप्त नहीं होती थीं। विशेषत: अमीर लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाह्य व्यापार को प्रोत्साहन दिया गया था। मुख्य रूप में विलासिता संबंधी सामग्रियों का व्यापार होता था।

महत्त्वपूर्ण बंदरगाह- लोथल, रंगपुर, प्रभासपाटन (सोमनाथ) बालाकोट, सुत्कोगेंडोर एवं सुत्काकोह प्रमुख बंदरगाह नगर थे। बलूचिस्तान आर्थिक रूप से एक सम्पन्न क्षेत्र नहीं था। फिर भी यहाँ के बंदरगाहों की बड़ी अहमियत थी क्योंकि सिंधु एवं गुजरात क्षेत्र के बंदरगाहों के विपरीत ये समुद्री लहरों से ज्यादा सुरक्षित थे। इसलिए बरसात के दिनों में बलूचिस्तान के बंदरगाहों से ही जहाज खुलते थे। लोथल एक ज्वारीय बंदरगाह (Tidal port) था

परिवहन- मोहनजोदड़ो से पाई गई एक मुहर में नाव को चित्रित किया गया है। पक्की मिट्टी से बनी हुई नाव का नमूना लोथल में पाया गया है जिसमें मस्तूल लगाने का छेद बना हुआ है। अंतर्देशीय परिवहन का साधन बैलगाड़ी था। हड़प्पा एवं चाँहुदड़ो से कांसे की गाड़ी के नमूने मिले हैं। हड़प्पा सभ्यता में बैलगाड़ी में प्रयुक्त पहिए ठोस होते थे।

माप-तौल

उत्खनन में प्राप्त कुछ अवशेषों से ऐसा लगता है कि सिन्धु सभ्यता के लोग माप-तौल की प्रक्रिया से भी सुपरिचित थे। ऐसा प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण सिन्धु (होल) में माप-तौल की समान व्यवस्था प्रचलित थी।

सीप का बना मानक बाट मोहनजोदड़ो में मिला है। हाथी दांत का एक स्केल लोथल से प्राप्त हुआ है। फीट (फुट) लगभग 33.5 से.मी. का और क्यूविट 52.05 से.मी. का होता था। उपरी स्तर पर दशमलव प्रणाली, जबकि निचले स्तर पर द्विभाजन प्रणाली थी। गणना में 16 एवं उसके गुणक का प्रयोग होता था। पिगट ने उल्लेख किया है कि ये तौल 1, 2, 3, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 200, 320 तथा 640 के अनुपात में आगे बढ़ते हैं तथा इस प्रक्रिया में 16 तौल की इकाई रहा होगा जो कि 13.64 ग्राम के बराबर है। सीप का एक खण्डित मापदण्ड मोहनजोदडो से भी मिला है। मैके के अनुसार, 16.55 से.मी. लम्बा, 1.55 से.मी. चौड़ा एवं 675 से.मी. मोटा है तथा एक ओर बराबर दूरी पर नौ का निशान अंकित हैं और दो संकेंत के मध्य की दूरी 0.66 से.मी. है। विद्वानों की मान्यता है कि इस प्रकार के मापदण्ड मिश्र, एशिया माइनर, यूनान, सीरिया आदि प्राचीन सभ्यताओं में भी प्रचलित थे। हड़प्पा से तांबे का मापदण्ड मिला है। माधोस्वरूप वत्स ने निवेदन किया है कि 3.75 से.मी. लम्बे मापदण्ड पर 0.93 से.मी. की विभाजक रेखायें अंकित है जो सम्भवत: 51.55 से.मी. के हस्त परिमापन पर आधारित प्रतीत होती है। लोथल से प्राप्त मापदण्ड, मोहनजोदड़ो से प्राप्त मापदण्ड की तुलना में छोटा होते हुए भी अधिक सही लगता है। यह मापदण्ड 128 मिलीमीटर लम्बा है, कुछ भाग टूट गया है, इस पर 27 विभाजक रेखायें 46 मिलीमीटर की दूरी से अंकित हैं एवं दो इकाइयों के मध्य 1.7 मिलिमीटर की दूरी है।

कला और शिल्प- सिन्धु घाटी सभ्यता

मुहर- सिंधु सभ्यता में लगभग 2500 मुहरें प्राप्त हुई हैं। यह प्रायः आयताकार या वर्गाकार है। पशु के चित्र के साथ लिपि वर्गाकार मुहर पर उत्कीर्ण है, जबकि आयताकार मुहर पर केवल लिपि उत्कीर्ण है। अधिकांश मुहरें सेलखड़ी बनी हुई पाई गई हैं। हालांकि डॉ. मजूमदार का मानना है कि ये मुहरें हाथी दांत की बनी होती थीं। इनका प्रयोग दो तरह से होता था। अपनी वस्तुओं की पहचान के लिए संभवतः उच्च वर्ग के लोग इनका व्यापार करते थे। संभवतः सिक्कों की तरह इसका प्रयोग होता था। इन पर एक ऋंगी पशु, भैस, बाघ, बकरी और हाथी की आकृति उकेरी जाती थी। सबसे अधिक संख्या एक ऋंगी पशुओं की है। अनेक तरह के जानवरों के आकार मुहरों पर चित्रलिपि में संकेत चिन्हों के साथ बने होते थे। कुछ मुहरों पर केवल लिपि उत्कीर्ण है जबकि कुछ अन्य पर मानव एवं अर्धमानव आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। कुछ मुहरों पर ज्यामिति से सम्बंधित विभिन्न नमूने बने हैं। दर्शायी गयी पशु आकृति में भारतीय हाथी, सांड, गैंडा और बघ प्रमुख हैं। व्याघ्र चित्रण केवल सिंध प्रदेश के स्थलों में हुआ है। सिंध प्रदेश के बाहर केवल कालीबंगा की मुहर पर ही बघ का चित्रण मिलता है। तिन घड़ियाल एवं एक मछली का चित्र चान्हूँदड़ो की एक मिट्टी की मुद्रा पर बना है। हडप्पा की एक मुद्रा पर एक गरुड़ और एक दूसरी मुद्रा पर एक खरगोश का चित्र है। मोहनजोदड़ो की एक मुद्रा पर पशुपति शिव का चित्र अंकित है। गणेश का भी चित्र है। सिंह का चित्र सिंधु सभ्यता की मुद्रा पर नहीं मिलता है। यह मेसोपोटामिया की मुद्रा पर मिलता है। लोथल की एक मुद्रा पर बीज बोने के यंत्र जैसी आकृति अंकित है। विभिन्न मुद्राओं पर कुछ वृक्षों के चित्र भी अंकित हैं जिनमें पीपल और बबूल प्रमुख हैं। मैके महोदय ने एक वृक्ष की पहचान झंडी से की है। कुछ मुद्राओं पर स्वास्तिक के चिह्न अंकित हैं। लोथल में छोटे आकार की मुद्राएँ साधारण मुद्राओं के साथ प्रारंभ से लेकर अंत तक के चरण में मिलती हैं। आलमगीरपुर से कोई मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है। रोपड़ से एक मुद्रा प्राप्त हुई है। सुरकोटड़ा से भी एक मुद्रा और कालीबंगा से आठ मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। दूसरी ओर हड़प्पा, मोहनजोदड़ो एवं लोथल से विशाल संख्या में मुद्रायें मिली हैं। मोहनजोदड़ो से लगभग 1200 मुहरें मिली हैं। मुहरों का आकार लगभग 1 (एक) सेंटीमीटर से 5 सेंटीमीटर के बीच होता था। सेलखड़ी के अतिरिक्त कांचली मिट्टी, गोमेद और चर्ट आदि की मुद्रा बनायी जाती थी। लोथल और देशलपुर से तांबे की मुद्राएं भी मिली हैं।

मनके (Bead)- हड़प्पा सभ्यता के लोग गोमेद, फिरोजा, लाल पत्थर और सेलखड़ी जैसे बहुमूल्य एवं अर्द्ध कीमती पत्थरों से बने अति सुन्दर मनके का प्रयोग करते थे। मनका बनाने वाली फैक्ट्री का कार्यस्थल चांहुदड़ो और लोथल से उद्घाटित हुए हैं। सोने और चांदी के मनके भी पाए गये हैं। गहनों का ढेर मोहनजोदडो में भी पाया गया है। इसमें सोने के मनके और अन्य आभूषण भी शामिल हैं। इसके अलावा चांदी की थालियां भी पाई गयी हैं।

मृण्मूर्तियाँ (टेराकोटा फिगर्स)- संभवत: खिलौनों या पूज्य प्रतिमाओं के रूप में इनका प्रयोग होता था। इन पर पशुओं, पक्षियों, पुरुषों एवं स्त्रियों के चित्र उकेरे गए हैं। इनमें तीन चौथाई मृण्मूर्तियों पर पशुओं के चित्र मिलते हैं। इनका निर्माण मिट्टी (पक्की हुई) से हुआ है। पशु पक्षियों में बैल, भैसा, भेड़, बकरा, बाघ, सूअर, गैंडा, भालू, बन्दर, मोर, तोता, बत्तख एवं कबूतर की मृण्मूर्तियाँ प्राप्त हुई हुई हैं। इसके अलावा बैलगाड़ी और ठेलागाडी की आकृति भी मिली हैं। टेराकोटा में कुबड़ वाले सांड की आकृति विशेष रूप से मिलती हैं। घोड़े साक्ष्य मोहनजोदड़ो की एक मृण्मूर्ति से मिलता है। कुछ मृण्मूर्तियों में अर्द्धमानव की आकृति भी बनी है अर्थात् कुछ जानवर के मुख मानव के बने हैं। मानव मृण्मूर्तियाँ ठोस हैंपरन्तु पशुओं की खोखली हैं। अधिकतर मृण्मूर्तियाँ हाथ से बनी हैं। किन्तु कुछ सांचे में भी ढाले गए हैं। जल जन्तुओं में घड़ियाल, कछुआ और मछली की मृण्मूर्तियाँ हड़प्पा से प्राप्त होती हैं। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की मृण्मूर्तियों में गाय की आकृति नहीं है। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या अधिक है। यह महत्त्वपूर्ण बात है। रंगनाथ राव ने लोथल से गाय की दो मृण्मूर्तियाँ प्राप्त होने का उल्लेख किया है।

धातु की बनी मूर्तियाँ- अब तक यह मोहनजोदड़ो, चाँहुदड़ो, लोथल एवं कालीबंगा से प्राप्त हुई हैं। कांस्य की एक नग्न नर्तकी की मूर्ति मोहनजोदड़ो एवं चाँहुदड़ो से मिली है। इसके गले में कंठहार सुशोभित था। चाँहुदड़ो और हड़प्पा से कांसे की एक एक्का गाड़ी मिली है। लोथल से तांबे के बैल की आकृति प्राप्त हुई है। कालीबंगा से भी तांबे के बैल की आकृति मिली है।

प्रस्तर कला- प्रस्तर कला में हड़प्पा सभ्यता पिछड़ी हुई थी। उपलब्ध पाषाण मूर्तियाँ, अलबस्टर, चूना पत्थर, सेलखड़ी, बलुआ पत्थर और स्लेटी पत्थर से निर्मित है। सभी मूर्तियां लगभग खंडित अवस्था में प्राप्त हुई हैं।

सिंधु सभ्यता की कला की सीमाएँ- सिन्धु सभ्यता में पायी गयी कलाकृतियों की संख्या सीमित हैं। इनमें अभिव्यक्ति की उतनी विविधता नहीं है जितनी मिस्र और मेसोपोटामिया की समकालीन संस्कृतियों में पाई गयी है।

सिन्धु घाटी सभ्यता का पतन

सैन्धव सभ्यता अपने काल की विकसित नगरीय सभ्यता थी जो बहुत बड़े भू-भाग में फैली हुई थी। विस्तृत क्षेत्र में पनपी यह सभ्यता अपना कोई चिह्न अथवा स्मृति छोड़े बिना कैसे लुप्त हो गई, यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका प्रत्युत्तर हमारे आज के ज्ञान के आधार पर नहीं दिया जा सकता। केवल अनुमान के आधार पर अलग-अलग विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत किये हैं। सामान्यतः किसी भी सभ्यता का पतन एक नहीं अपितु अनेक तथ्यों का परिणाम होता है। जहाँ तक सैन्धव सभ्यता का प्रश्न है, यह सोचना कि इतने विशाल और विविध प्रकार के भौगोलिक क्षेत्र में फैली हुई, दीर्घजीवी, नागरीय सभ्यता का अन्त सर्वत्र किसी एक ही कारण से हुआ हो, सर्वथा अनुपयुक्त होगा। सिंधु सभ्यता के नगर-नियोजन एवं नगर निर्माण में एक ह्रासोन्मुख प्रवृत्ति दिखती है। उदाहरण के लिए पतली विभाजक दीवारों से घरों के आंगन का विभाजन कर दिया गया था। शहर बड़ी तेजी से तंग बस्तियों में बदल रहे थे। विशाल स्नानागार और अन्न भंडार का उपयोग पूर्णत: समाप्त हो गया था। मूर्तियों, लघु मूर्तियों, मनकाओं आदि की संख्या में कमी आई। बहावलपुर क्षेत्र में हाकरा नदी तटों के साथ परिपक्व काल में जहाँ 174 बस्तियाँ थीं, वहाँ उत्तरवर्ती हड़प्पा काल में बस्तियों की संख्या 50 रह गई। जहाँ हड़प्पा, बहावलपुर और मोहनजोदड़ो के त्रिभुज में बस्तियों की संख्या में ह्रास हुआ वहीं गुजरात, पूर्वी पंजाब, हरियाणा और ऊपरी दोआब के दूरस्थ क्षेत्रों में गंगा की बस्तियों की संख्या में वृद्धि हुई। सिंधु सभ्यता के नगरों का पतन स्थूल रूप से लगभग 1800 ई.पू. में हुआ। इस तारीख का समर्थन इस तथ्य से भी होता है कि मेसोपोटामिया साहित्य में 1900 ई.पू. के अंत तक मेलुहा का उल्लेख समाप्त हो गया था।

पतन के कारण

  1. पारिस्थितिक असंतुलन- फेयर सर्विस का मत,
  2. वर्धित शुष्कता और धग्गर का सूख जाना- डी.पी. अग्रवाल, सूद और अमलानन्द घोष का मत,
  3. नदी का मार्ग परिवर्तन- इस विचार के जनक माधोस्वरूप वत्स हैं। डल्स महोदय का मानना है कि धग्गर नदी के मार्ग बदलने का कारण ही कालीबंगा का पतन हुआ है। लेस्ब्रिक का भी यही मानना है।
  4. बाढ़- मोहनजोदड़ो से बाढ़ के चिह्न स्पष्ट होते हैं। मैके महोदय का मानना है कि चाँहुदड़ो भी बाढ़ के कारण समाप्त हुआ, जबकि एस.आर. राव का मानना है कि लोथल एवं भगवतराव में दो बार भीषण बाढ़ आयी।
  5. एक-दूसरे प्रकार का जल प्लावन- मोहनजोदडो, आमरी आदि स्थलों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि सिन्धु सभ्यता में एक दूसरे प्रकार का जल प्लावन भी हुआ है। कुछ स्थलों से रुके जल प्राप्त होते हैं। इस विचार के प्रतिपादक हैं-एम.आर. साहनी। एक अमेरिकी जल वैज्ञानिक आर.एल. राइक्स भी इस मत की पुष्टि करते हैं और यह कहते हैं कि संभवत: भूकंप के कारण ऐसा हुआ।
  6. बाह्य आक्रमण- 1934 में गार्डेन चाइल्ड ने आर्यों के आक्रमण का मुद्दा उठाया और मार्टीमर व्हीलर ने 1946 ई. में इस मत की पुष्टि की। इस मत के पक्ष में निम्नलिखित साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं। बलूचिस्तान के नाल और डाबरकोट आदि क्षेत्रों से अग्निकांड के साक्ष्य मिलते हैं। मोहनजोदड़ो से बच्चे, स्त्रियों और पुरुषों के कंकाल प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद में हरियूपिया शब्द प्रयुक्त हुआ है, इसकी पहचान आधुनिक हड़प्पा के रूप में हुई। इन्द्र को पुरंदर अर्थात् किलों को तोड़ने वाला कहा गया है।

प्रशासनिक शिथिलता- जॉन माशल का मत।

जलवायु में हुए परिवर्तन के कारण यह सभ्यता नष्ट हो गई- ऑरेल स्टाइन का यह मत है।

निष्कर्ष- सिन्धु सभ्यता के पतन के लिए कोई एक कारक उत्तरदायी नहीं हैं, वरन् ऐसा कहा जा सकता है कि अलग-अलग स्थल के पतन के लिए अलग-अलग कारक उत्तरदायी रहे होगें।

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