कांग्रेस का सूरत विभाजन

स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रथम चरण में जबकि क्रांतिकारी आतंकवाद धीरे-धीरे गति पकड़ रहा था, दिसम्बर 1907 में कांग्रेस का सूरत विभाजन हुआ। इसका प्रमुख कारण कांग्रेस में दो विपरीत विचाराधाराओं का उदय था ।

1905 में जब कांग्रेस का अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में बनारस में संपन्न हुआ तो उदारवादियों एवं उग्रवादियों के मतभेद खुलकर सामने आ गये। इस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक ने नरमपंथियों की ब्रिटिश सरकार के प्रति उदार एवं सहयोग की नीति की कटु आलोचना की। तिलक की मंशा थी कि स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन का पूरे बंगाल तथा देश के अन्य भागों में तेजी से विस्तार किया जाये, तथा इसमें अन्य संस्थाओं (यथा-सरकारी सेवाओं, न्यायालयों, व्यवस्थापिका सभाओं इत्यादि) को सम्मिलित कर इसे राष्ट्रव्यापी आंदोलन का स्वरूप दिया जाये जबकि उदारवादी इस आंदोलन को केवल बंगाल तक ही सीमित रखना चाहते थे तथा अन्य संस्थाओं को इस आंदोलन में सम्मिलित करने के पक्ष में नहीं थे। उग्रवादी चाहते थे कि बनारस अधिवेशन में उनके प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाये जबकि उदारवादियों का मत था कि बंगाल विभाजन का विरोध संवैधानिक तरीके से किया जाये तथा उन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ असहयोग करने की नीति का समर्थन नहीं किया।

अंततः बीच का रास्ता निकालते नीतियों तथा बंगाल विभाजन की आलोचना की गयी तथा स्वदेशी एवं बहिष्कार टल गया।

उदारवादियों एवं उग्रवादियों में अंतर
उदारवादी (नरमपंथी)उग्रवादी (अतिवादी)
सामाजिक आधार-जमींदार एवं शहरों के उच्च माध्यमवर्गीय लोगों के बीच।सामाजिक आधार-शहरों के शिक्षित एवं निम्न मध्यवर्गीय लोगों के बीच।
सैद्धांतिक प्रेरणास्रोत- पाश्चात्य उदार विचार एवं यूरोपीय इतिह्रास।सैद्धांतिक प्रेरणास्रोत- भारतीय इतिह्रास, सांस्कृतिक विरासत एवं परम्परागत हिन्दू मूल्य
ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास।ब्रिटिश न्यायप्रियता में कोई विश्वास या निष्ठा नहीं
इनका विश्वास था कि ब्रिटेन के साथ राजनीतिक सम्बंध भारत के सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक हितों के लिये लाभप्रद होंगे।इनका मानना था की ब्रिटेन के साथ राजनितिक सम्बन्ध रहने से भारत का आर्थिक शोषण जारी रहेगा।
ब्रिटिश ताज के प्रति पूर्ण निष्ठा।इनका विश्वास था की ब्रिटिश ताज भारतीय निष्ठा के प्रति अयोग्य है।
इसका मानना कि सरकार विरोधी आन्दोलन मध्यवर्गीय शिक्षित वर्ग तक ही सीमित रहना चाहिए क्योंकि जनसामान्य अभी राजनीतिक कार्यों में सक्रिय भागीदार निभाने के लिए तैयार नहीं है।इन्हें जनसामान्य की शक्ति एवं त्याग की भावना में पूर्ण निष्ठा थी।
सरकारी सेवाओं में भारतीयों की सहभागिता बढ़ाने एवं संवैधानिक सुधारों की मांग की।भारतीय दुर्दशा को दूर करने हेतु स्वराज्य की मांग की।
केवल संवैधानिक दायरे में रहकर लक्ष्य पाने में विश्वास रखते थे।आवश्यकता पड़ने पर लक्ष्य की प्राप्ति के लिए असंवैधानिक तरीकों- जैसे बहिष्कार एवं अहिंसात्मक प्रतिरोध से परहेज नहीं
पाश्चात्य शिक्षा एवं सभ्यता के समर्थक ।भारतीय समारोहों के आयोजन तथा प्रेस, शिक्षा एवं भारतीय साहित्य के समर्थक।

 दिसम्बर 1906 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कलकत्ता में हुआ। इस अधिवेशन में तत्कालीन साम्प्रदायिक दंगों एवं क्रांतिकारी आतंकवाद तथा उग्रवादियों की लोकप्रियता में वृद्धि के कारण उदारवादियों का प्रभाव कम हो गया।

इस अधिवेशन में उग्रवादी, बाल गंगाधर तिलक या लाल लाजपत राय को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, जबकि नरमपंथियों ने इस पद हेतु डा. रासबिहारी घोष का नाम प्रस्तावित किया। अंत में दादा भाई नौरोजी सर्वसम्मति से अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये तथा ब्रिटेन या अन्य उपनिवेशों की तरह ‘स्वराज्य’ या ‘स्वशासन’ को कांग्रेस ने अपना लक्ष्य घोषित किया। स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के समर्थन में भी एक प्रस्ताव पारित किया गया। इस अधिवेशन में प्रथम बार ‘स्वराज्य’ शब्द का उपयोग किया गया किंतु इसकी स्पष्ट व्याख्या नहीं की गयी जिससे बाद में इस विषय पर उदारवादियों एवं उग्रवादियों में बहस छिड़ गयी। कलकत्ता अधिवेशन की उपलब्धियों से उत्साहित होकर उग्रवादियों ने अहिंसात्मक प्रतिरोध तथा शिक्षा संस्थाओं, व्यवस्थापिका सभाओं एवं नगर निकायों इत्यादि का बहिष्कार करने की मांग प्रारंभ कर दी। कलकत्ता अधिवेशन में उदारवादियों के प्रस्तावों को ज्यादा महत्व न मिलने के कारण भी उनमें निराशा बढ़ी। धीरे-धीरे दोनों पक्षों में मतभेद बढ़ने लगे। उग्रवादियों का मानना था कि इस समय भारतीयों में अभूतपूर्व उत्साह है तथा स्वतंत्रता आन्दोलन को पूर्णरूपेण प्रारंभ करने का उपयुक्त समय है। उनका मत था कि अब वह समय आ गया है, जब ब्रिटिश शासन पर आघात किया जाये तथा उसे जड़ से उखाड़ फेंका जाये। उन्होंने निष्कर्ष निकला की उदारवादी इस कार्य के लिए अनुपयुक्त हैं तथा उन्हें स्वतंत्रता अभियान से अलग कर दिया जाये।

दूसरी ओर उदारवादियों ने भी निष्कर्ष निकाला कि इस समय उग्रवादियों के साम्राज्यवाद विरोधी अभियान से उनका जुड़ना उचित नहीं है, क्योंकि वे ब्रिटिश सरकार को हटाने पर तुले हुए हैं। उदारवादी यह विश्वास करने लगे कि निकाय सुधारों के द्वारा प्रशासन में भारतीयों की भागेदारी का उनका स्वप्न पूरा हो जायेगा। नरमपंथियों ने तर्क दिया कि अतिवादियों के दबाव में कांग्रेस को जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जिससे भारतीय हितों को नुकसान पहुंचे। उदारवादी, अतिवादियों के साथ किसी प्रकार का सहयोग या सम्बंध नहीं चाहते थे।

उदारवादी यह अनुमान नहीं लगा सके की सरकार द्वारा काउंसिल सुधारों का वास्तविक उद्देश्य अतिवादियों को उदारवादियों से पृथक करना है न कि उदारवादियों को उपहार देना। अतिवादियों ने भी नरमपंथियों के हर कदम का गलत अनुमान लगाया। दोनों ही पक्ष इस बात की महत्ता से परिचित नहीं हो सके कि भारत जैसे विशाल औपनिवेशिक देश को विदेशी शासन से मुक्ति दिलाने के लिये विशाल राष्ट्रवादी आंदोलन एवं आपसी एकता अत्यंत आवश्यक है।

अतिवादी चाहते थे कि 1907 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन नागपुर (मध्य प्रांत) में आयोजित किया जाये तथा बाल गंगाधर तिलक या लाला लाजपत राय इसके अध्यक्ष चुने जायें। साथ ही यहां स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन तथा राष्ट्रीय शिक्षा के पूर्ण समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया जाये। दूसरी ओर उदारवादी चाहते थे कि 1907 का अधिवेशन सूरत में आयोजित किया जाये तथा किसी हालत में तिलक को अध्यक्ष न बनने दिया जाये। उन्होंने मेजबान प्रांत के नेता को कांग्रेस का अध्यक्ष न चुने जाने की वकालत की, क्योंकि सूरत, तिलक के गृह प्रांत बम्बई के अंतर्गत आता था। उन्होंने रासबिहारी घोष को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने तथा स्वदेशी, बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा के प्रस्ताव को वापस लेने की जोरदार मांग की। इस समय दोनों ही पक्षों ने अड़ियल रुख अपना लिया तथा समझौते की किसी भी संभावना से इंकार कर दिया। इन परिस्थितियों में कांग्रेस में विभाजन सुनिश्चित हो गया। चूंकि इस समय कांग्रेस में उदारवादियों का वर्चस्व था फलतः उन्होंने ब्रटिश शासन की सीमा में रहते हुये स्वराज्य या स्वशासन की मांग की तथा संवैधानिक तरीके से ही आंदोलन जारी रखने का निर्णय लिया।

इसके पश्चात सरकार ने अतिवादियों पर सुनियोजित हमले प्रारम्भ कर दिये। 1907 से 1911 के मध्य सरकार विरोधी आंदोलन को कुलचने के लिये पांच नये कानून बनाये गये। इन कानूनों में राजद्रोही सभा अधिनियम 1907, भारतीय समाचार पत्र अधिनियम 1908, फौजदारी कानून (संशोधित) अधिनियम 1908 तथा भारतीय प्रेस अधिनियम 1910 प्रमुख थे। मुख्य अतिवादी नेता बालगंगाधर तिलक को गिरफ्तार कर मांडलय जेल (बर्मा) भेज दिया गया। इसी समय विपिनचंद्र पाल तथा अरविंद घोष ने सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया तथा लाला लाजपत राय विदेश चले गये। अतिवादी आंदोलन को आगे जारी रखने में असफल रहे। उदारवादियों की लोकप्रियता भी कम हो गयी तथा वे युवाओं का सहयोग या समर्थन प्राप्त करने में नाकाम रहे।

1908 के पश्चात कुछ समय के लिये राष्ट्रीय आंदोलन का उन्माद ठंडा पड़ गया। इसमें दुबारा तेजी तब आयी जब 1914 में तिलक जेल से रिहा हुये।

सरकार की रणनीति

कांग्रेस के प्रारंभिक वर्षों में उसके प्रति सरकार का रुख सहयोगात्मक रहा। इस समय कांग्रेस में उदारवादियों का वर्चस्व था। उदारवादियों ने प्रारम्भ से ही उग्र-राष्ट्रवाद से स्वयं को दूर रखना प्रारंभ कर दिया था, जिसका आभास 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक से मिलना प्रारंभ हो गया था। इस समय भी कांग्रेस के प्रति सरकार का उदार रुख यथावत बना रहा क्योंकि अंग्रेजों के दृष्टिकोण से कांग्रेस, साम्राज्यवाद विरोधी तत्वों के विरुद्ध थी तथा राष्ट्रवादी एवं उदार शिक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करती थी।

किंतु बाद के वर्षों में स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन के उभरने से कांग्रेस के प्रति सरकार सरकार का मोह भंग हो गया तथा उसने राष्ट्रवादियों के प्रति अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन कर लिया।

सरकार की इस नीति को तिन प्रमुख शब्दों अवरोध,सांत्वना एवं दमन के रूप में समझा जा सकता है। अपनी इस रणनीति के प्रथम चरण में सरकार ने उदारवादियों को डराने हेतु आतिवादियों के साधारण दमन की नीति अपनायी। द्वितीय चरण में सरकार एवं उदारवादियों के मध्य कुछ मुद्दों पर सहमति हुयी तथा सरकार ने उदारवादियों को आश्वासन दिया कि यदि वे अतिवादियों से खुद को अलग रखें तो भारत में और संवैधानिक सुधार संभव हो सकते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य उदारवादियों को अतिवादियों से पृथक करना था। इस प्रकार उदारवादियों को अपने पक्ष में करने पश्चात सरकार के लिये अतिवादियों के दमन का मार्ग आसान हो गया। किंतु बाद में उदारवादी भी सरकार की उपेक्षा के शिकार बन गये।

दुर्भाग्यवश जबकि राष्ट्रवादियों में समन्वय की अत्यंत आवश्यकता थी, उदारवादी तथा अतिवादी दोनों ही अंग्रेजों की रणनीति के शिकार हो गये तथा वे सरकार की वास्तविक मंशा को नहीं समझ सके। कांग्रेस का सूरत विभाजन अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश सरकार की इसी रणनीति का प्रतिफल था, जिसके तहत नरमपंथी तथा अतिवादी एक-दूसरे से दूर होते गये तथा उनके मतभेद सूरत अधिवेशन में खुलकर सामने आ गये।

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