जाति

उत्पति की रूपरेखा

जाति एक वंशगत, अंतर्विवाही और सामान्यतः स्थानीय समूह है। जातियों में परस्पर पारंपरिक संबंध होते हैं और स्थानीय अधिक्रम में इनका एक विशिष्ट स्थान होता है। जातियों के बीच के संबंध अपवित्रता तथा शुचिता की संरचना द्वारा नियंत्रित होते हैं। जाति व्यवस्था धार्मिक आधार पर अंतर्निहित होती है। इसे वंशानुक्रम, अंतर्जातीय और तय मानदंडों वाले समूहों का वर्ग समझा जा सकता है। रीतियों के आधार पर जातियों के बीच भेद होता है। सैद्धांतिक रूप से प्रत्येक हिंदू मुख्य रूप से चार में से किसी न किसी एक वर्ग या जाति से संबंधित होता है। ये जातियां मूल रूप से रंगों पर आधारित थीं। ये थीं- ब्राह्मण (पुरोहित), क्षत्रिय (योद्धा), वैश्य (व्यापारी या बनियों का समूह) और शूद्र (नौकर या गुलाम)। ईसा पूर्व छठी शताब्दी के हिंदू लेखों में भी जाति व्यवस्था का वर्णन मिलता है। इन चार जातियों के अतिरिक्त करीब पांच करोड़ जातियां हैं। लेकिन ये सभी जाति व्यवस्था की अंग हैं। सभी एक जैसे रीति-रिवाजों को मानती हैं। इनके विशेषाधिकार नहीं के बराबर हाते हैं। इनके व्यवसाय भी सम्मानजनक नहीं होते। उप-जातियां भी कई तरह की हैं।

जाति (कास्ट) शब्द पुर्तगाली शब्द कास्टा से लिया गया है, जिसका अर्थ नस्ल (रेस) या वंश या कुल (प्योर स्टॉक) होता है। भारत में जाति व्यवस्था को व्यक्त करने के लिए कोई एक शब्द नहीं है। भिन्न-भिन्न शब्द इस व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं को व्यक्त करते हैं। इनमें से दो, वर्ण और जाति, प्रमुख शब्द हैं। वर्ण व्यवस्था में मुख्य रूप से चार वर्ग हैं। समाज में इनको अलग-अलग प्रतिष्ठा मिली हुई है। इन चार वगों में सबसे नीचे अछूत आते हैं। वस्तुतः जाति स्थानीय स्तर पर परिभाषित समूह हैं, जिसके तहत जातियां व्यवस्थित क्रम में संगठित होती हैं। भारतीय जाति व्यवस्था कभी भी पूरी तरह से स्थाई नहीं रही है।

हिंदू विचारधारा में आध्यात्मिक और सामाजिक नियंत्रण के इस ढांचे में दो मुख्य नीतियां काम करती हैं। वे नीतियां हैं- धर्म और कर्म। धर्म प्राकृतिक और सामाजिक सभी तरह की चीजों की एक व्यवस्था है, जिसमें किसी जाति विशेष के व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार और सामाजिक संबंध शामिल होते हैं, जबकि कर्म की आम अवधारणा पुनर्जन्म से संबंधित है। संक्षेप में जाति व्यवस्था सामाजिक स्तरण का वह रूप है जिसमें जातियां विशुद्ध आनुष्ठानिक नियमों द्वारा पदानुक्रम में एक- दूसरे से व्यवस्थित और अलग होती हैं। जाति व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर आने वाली जाति को अछूत माना जाता है क्योंकि उन्हें धार्मिक शुद्धता प्रदान करने वाले कर्मकांड करने की अनुमति नहीं होती। इस पदानुक्रम व्यवस्था में प्रत्येक जाति अपने से नीचे वाली जाति की तुलना में कर्मकांड के हिसाब से अधिक विशुद्ध होती है। श्रीनिवास के अनुसार प्रभावशाली जाति की छवि के लिए यह जरूरी है कि उस जाति के पास अधिक मात्रा में कृषि भूमि हो,उसके सदस्यों की संख्या ज्यादा हो और स्थानीय स्तर पर उसे उच्च स्थिति प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त पश्चिमी शिक्षा, प्रशासनिक नौकरियां और आय के शहरी स्रोत भी किसी जाति को प्रभावशाली बनाने में अहम् भूमिका निभाते हैं।

वितरण: आज भारत में रहने वाले विभिन्न जाति-समूहों का भौगोलिक वितरण पैटर्न पहचाना नहीं जा सकता क्योंकि स्वतंत्रता पश्चात् से 2011 तक की जनगणना में अनुसूचित श्रेणी को छोड़कर जाति आधारित आंकड़ों के एकत्रीकरण की उपेक्षा की गई। जातियों को अनुसूचित करने की नीति राज्यवार भिन्न-भिन्न हैं।

अनुसूचित जाति की अवधारणा

अनुसूचित जाति एक राजनीतिक-कानूनी पद है जिसे 1927 में साइमन कमीशन द्वारा उछाला गया। औपनिवेशिक काल के दौरान, अनुसूचित जाति को विभिन्न रूप से प्रस्तुत किया गया। डा. भीमराव अम्बेडकर ने इन्हें वंचित वर्ग कहा। इस शब्द का प्रयोग लोगों के उन वर्गों और श्रेणियों के लिए किया गया जो निर्धन, शोषित और सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से दबे-कुचले थे। गांधीजी ने इन्हें हरिजन (ईश्वर के बच्चे) कहा। लेकिन भारत सरकार अधिनियम, 1935 के लागू होने पर, इन्हें सामान्यतः अनुसूचित जातियों के तौर पर संदर्भित किया गया। इन्हें दलित के तौर पर भी इंगित किया गया। स्वतंत्रता पश्चात्, भारत के संविधान में अनुच्छेद 341 के तहत् सामाजिक समूहों को विशेषीकृत करने का प्रावधान किया गया जिन्हें भारत सरकार और राज्यों द्वारा, अनुसूचित जाति के तौर पर देखा गया।

अनुच्छेद 341(1) के अनुसार- राष्ट्रपति, किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में और जहां वह राज्य है वहां उसके राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चात् लोक अधिसूचना द्वारा, उनजातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भागों या उनके यूथों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए, यथास्थिति, उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में अनुसूचित जातियां समझा जाएगा।

संसद, विधि द्वारा, किसी जाति, मूलवंश या जनजाति को अथवा जाति, मूलवंश या जनजाति के भाग या उसमें के यूथ को खण्ड (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अनुसूचित जातियों की सूची में सम्मिलित कर सकेगी या उसमें से अपवर्जित कर सकेगी, किंतु जैसा ऊपर कहा गया है उसके सिवाय उक्त खण्ड के अधीन निकाली गई अधिसूचना में किसी पश्चातवर्ती अधिसूचना द्वारा परिवर्तन नहीं किया जाएगा।

भारत के राष्ट्रपति ने देश में अनुसूचित जातियों के नाम विशेषीकृत करने के लिए समय-समय पर आदेश पारित किए। पूर्व में, इन समूहों को रीति-रिवाजों के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाता था। अब अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने का मापदंड सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ापन है जो छुआछूत के बदनुमा दाग से बाहर निकलता है।

चमार, भंगी, बगदिस, राजबंसी, महार, मालास और मगीदास, चेरुमंस, पुलायंस, शनास, थियांस और दुसादस कुछ मुख्य जातियां हैं जिन्हें अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल किया गया है।

यहां यह उल्लेख किया जा सकता है कि जातियों को अनुसूचित करने की नीति राज्यवार भिन्न-भिन्न हैं। 1950 में आरक्षण नीति को प्रस्तुत करने के साथ, जाति सामाजिक गतिशीलता का एक शक्तिशाली उपकरण बन गया। यहां तक कि आज भी, अधिकाधिक जातियां स्वयं के लिए अनुसूचित जाति के दर्जे की मांग कर रही हैं।

वितरण

अनुसूचित जातियां मुख्य रूप से भारत के कछारी और तटीय मैदानों में पायी जाती हैं, क्योंकि ये अधिकतर कृषि गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। (इसके विपरीत, जनजाति समूह कछारी मैदानों में नहीं पाए जाते।)

एजाजुद्दीन अहमद ने अपनी पुस्तक सोशल ज्योग्राफी में देश के विभिन्न क्षेत्रों एवं राज्यों में अनुसूचित जातियों के वितरण में बेहद अंतर की व्याख्या की है। उन्होंने उल्लेख किया है कि ये जातियां अपने आर्थिक एवं जीवन के अन्य क्षेत्रों में उच्च जातियों पर निर्भर थी, और समय के साथ इस निर्भरता में कोई कमी नहीं आई है।

कृषि प्रकारों के उत्पादन में वृद्धि के साथ ये जाति समूह कृषि से जुड़ गए। वास्तव में, ये श्रम की आपूर्ति का मुख्य जरिया थे। इसने अनुसूचित जातियों के उत्तरी भारत के मैदानी राज्यों और प्रायद्वीपीय राज्यों के तटीय मैदानों पर इनके घनिष्ठ केन्द्रीकरण को भी उजागर किया है।

औद्योगिकीकरण के बढ़ने के साथ, अनुसूचित जातियां विभिन्न प्रकार के उद्योगों में चले गए, विशेष रूप से सूती कपड़ा उद्योग और चमड़ा उद्योग में इनका गमन हुआ। इसने इनका जमाव ऐसे उद्योगों से सम्बद्ध शहरों में किया।

अनुसूचित जातियों की जनसंख्या

2011 की जनगणना के आकलन पर अनुसूचित जातिकी कुल जनसंख्या 201.4 मिलियन है। इसमें 153.9 मिलियन ग्रामीण क्षेत्रों में और 47.5 मिलियन शहरी क्षेत्रों में है। अनुपात के संदर्भ में अनुसूचित जाति की संख्या कुल जनसंख्या का 16.6 प्रतिशत है। विगत् जनगणना (2001) के अनुसार यह प्रतिशत 16.2 था। इस प्रकार इसमें विगत दशक के दौरान 0.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी रही है। अनुसूचित जाति की जनसंख्या का सर्वाधिक अनुपात पंजाब में (31.9 प्रतिशत) और सर्वाधिक न्यून मिजोरम में (0.1 प्रतिशत) दर्ज किया गया है। अनुसूचित जाति की जनसंख्या में 34.8 मिलियन तक की वृद्धि हुई है। यह 20.8 प्रतिशत की दशकीय वृद्धि दर्शाता है। अनुसूचित जातियों की सर्वाधिक जनसंख्या उत्तर प्रदेश में (41.4 मिलियन) और न्यूनतम मिजोरम (1,218) में दर्ज की गई है।

लिंग संरचना के दृष्टिकोण से, पुरुष अनुसूचित जातियों की जनसंख्या 103.5 मिलियन (ग्रामीण-79.1 मिलियन और शहरी-24.4 मिलियन) है। महिला अनुसूचित जातियों की संख्या 97.8 मिलियन (ग्रामीण-74.7 मिलियन और शहरी-23.1 मिलियन) है।

अनुसूचित जातियों का कल्याण एवं विकास

सरकार ने अनुसूचित जातियों के शैक्षणिक विकास के लिए कई स्कीमों को शामिल किया है। अनुसूचित जाति/जनजातियों के विद्यार्थियों के लिए मैट्रिक के बाद छात्रवृति योजना का उद्देश्य अनुसूचित जाति के उन विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता प्रदान करना है जोमैट्रिककेबाद यासेकेंडरी के बाद की शिक्षा के लिए अध्ययनरत हैं, ताकि वह अपनी शिक्षा पूरी कर सकें।

बाबूजगजीवन राम छात्रावास योजना का उद्देश्य अनुसूचित जाति के बालक और बालिकाओं को छात्रावास की सुविधा मुहैया करना है जो माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं। इस योजना के तहत नए छात्रावासों के निर्माण तथा वर्तमान छात्रावासों के विस्तार के लिए राज्य विश्वविद्यालयों/संस्थानों को पात्रता के आधार पर केंद्रीय सहायता दी जाती है, जबकि एनजीओ (गैर-सरकारी संगठन) और निजी क्षेत्र के डीम्ड विश्वविद्यालयों की केवल मौजूदा छात्रावास सुविधाओं के विस्तार के लिए सहायता मिल सकती है।

1 अप्रैल, 2010 से लागू राजीव गांधी राष्ट्रीय फेलोशिप योजना के अंतर्गत विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और वैज्ञानिक संस्थाओं में एम. फिल, पी.एच.डी. व समकक्ष शोध डिग्रियों में शोध अध्ययन के लिए अनुसूचित जातियों के विद्यार्थियों को वित्तीय सहायता दी जाती है। इस योजना को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के माध्यम से लागू किया जा रहा है।

अनुसूचित जाति उपयोजना (एससीएसपी) के लिए विशेष केंद्रीय सहायता एक केंद्रीय प्रक्षेत्र की योजना है। जिसकी शुरुआत 1980 में की गई। इसके तहत् राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को उनकी अनुसूचित जाति उपयोजना के लिए शत-प्रतिशत अनुदान दिया जाता है। इस सहायता का मुख्य उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली अनुसूचित जातियों के परिवारों के आर्थिक विकास के लिए परिवार केंन्द्रित योजनाओं को बढ़ावा देना है।

इस योजना की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • इस योजना के तहत् राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को अनुसूचित जाति उपयोजना को लागू करने के लिए अतिरिक्त कोषों को प्रदान किया जाता है।
  • अनुसूचित जाति की आबादी के आर्थिक विकास पर मुख्य जोर दिया जाता है ताकि उन्हें स्वरोजगार व प्रशिक्षण के जरिए गरीबी रेखा के ऊपर लाया जाए।
  • इस योजना के तहत् परियोजना लागत का 50 प्रतिशत सब्सिडी (आर्थिक सहायता) राशि के तौर पर प्रदेय है, जिसमें प्रति लाभार्थी 10,000 रु. अधिकतम ही दिया जा सकता है।
  • राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को निर्गत कुल राशि का 10 प्रतिशत (दस प्रतिशत) हिस्सा उन गांवों के ढांचागत विकास पर खर्च किया जा सकता है, जिसकी कुल आबादी में अनुसूचित जाति की संख्या 50 प्रतिशत या इससे अधिक हो।
  • राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा विशेष केंद्रीय सहायता का 15 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए उपयोग में लाया जाता है।
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