भारतीय नगरों के प्रतिरूप

कार्यात्मक प्रतिरूप

अपने कार्यों के सम्बंध में शहर एवं गांव एक-दूसरे से भिन्नता रखते हैं। गांव मुख्यतः कृषि से सम्बद्ध उत्पादन से जुड़े होते हैं। अधिशेष उत्पादन गांव द्वारा वस्तु विनिमय के निमित्त उपयोग में लाया जाता है। जिस गांव तक अन्य गांवों की पहुंच होती है, वह वस्तु विनिमय का नाभिकीय केंद्र बन जाता है। यह शीघ्र ही कस्बे के रूप में विकसित हो जाता है। जब एक कस्बा अस्तित्व में आता है, तो वह एक या कई कारकों पर आधारित कार्यों को अर्जित कर लेता है। इन कार्यों का पदानुक्रम निम्न प्रकार से होता है-

  1. प्रसंस्करण: यह एक कस्बे का सर्वाधिक मूलभूत कार्य होता है, जिसके अंतर्गत कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण किया जाता है, उदाहरण के लिए-गेहूं का आटे में तथा तिलहन का तेल में सर्वाधिक सुगम पहुंच वाला गांव सामान्यतः प्रसंस्करण केंद्र बन जाता है। संभवतः यह प्राचीनतम कस्बों के उदय का प्रमुख कारण रहा होगा।
  2. व्यापार: प्रसंस्करण के उपरांत, कस्बों का अगला स्तर व्यापार से जुड़ा होता है, जो प्रसंस्करित माल या विनिर्मित उत्पादों के विनिमय केंद्रों के रूप में कार्य करते हैं। ये बाजार साप्ताहिक या दैनिक आधार पर संचालित होते हैं। संपूर्ण भारत में साप्ताहिक बाजारों का आयोजन एक सामान्य विशेषता है। ये केंद्र एक या अधिक वस्तुओं के सम्बंध में विशेषीकृत हो सकते हैं, जैसे- खाद्यान्न, फल व सब्जी, पालतू पशु इत्यादि।
  3. कृषि-उत्पादों का थोक व्यापार: ऐसे शहर नगरों के कार्यात्मक प्रतिरूप में अगले उच्च स्तर का निर्माण करते हैं। परिवहन सुविधा इन शहरों में एक निर्णायक कारक होती है। इन शहरों में प्रसंस्करण कार्यों के अतिरिक्त विनिर्माण गतिविधि एवं अन्य सेवाओं का विकास भी होता है। ये छोटे आकार के शहर सामान्यतः परिक्षिप्त होते हैं। इनमें एक या अधिक वस्तुओं का विशेष स्थान हो सकता है। उदाहरणार्थ, हापुड़ खाद्यान्नों के थोक व्यापार का केंद्र है, जबकि अहमदाबाद सूती वस्त्र, सांगली हल्दी, बंगलौर रेशम तथा गुंटूर तंबाकू के लिए प्रसिद्ध हैं।
  4. सेवाएं: इनके अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, संचार इत्यादि सम्मिलित हैं। ये सेवाएं सामान्यतः गांवों में उपलब्ध नहीं हो सकती। इन सभी कार्यों में प्रशासन सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। एक नगर पंचायत संघ, राज्य सहकारी समिति या एक जिले का मुख्यालय हो सकता है। प्रशासनिक नगरों में कानूनी अदालतें, पुलिस स्टेशन एवं अन्य सरकारी विभाग भी होते हैं। चंडीगढ़ प्रशासनिक नगर का एक अच्छा उदाहरण है।
  5. विनिर्माण एवं खनन: इस प्रकार की गतिविधियां बड़े नगरों के उदय में योगदान देती हैं, क्योंकि इनसे बड़े स्तर पर रोजगार अवसरों का जन्म होता है तथा व्यापार, सेवा, यातायात, सहायक उद्योग जैसी अन्य उपयोगी आर्थिक गतिविधियों का विकास होता है। ये गतिविधियां संलग्न क्षेत्रों से वृहत स्तर पर प्रवासन को आकर्षित करती हैं। टाटा आयरन एंड स्टील वर्क्स के चारों ओर जमशेदपुर का विकास हुआ जबकि कोलार एवं रानीगंज खनन गतिविधियों के फलस्वरूप विकसित हुए।
  6. परिवहन: सभी प्रकार की आर्थिक गतिविधियों तथा नगर के विकास एवं अग्र विस्तार हेतु परिवहन एक मूलभूत आवश्यकता है। इसीलिए अनेक नगर रेलवे स्टेशनों या बंदरगाहों के आस-पास विकसित हुए हैं। दक्षिण भारत में जोलार पेट्टी नामक शहर एक रेलवे जंक्शन के चारों ओर विकसित हुआ है। कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, कांडला, पारादीप इत्यादि नगरों का विकास बंदरगाहों के आस-पास हुआ है।
  7. तीर्थ भ्रमण/पर्यटन: तीर्थ भ्रमण यात्रा एवं अस्थायी निवास से जुड़ी महत्वपूर्ण गतिविधि है। तीर्थस्थलों पर परिवहन एवं यात्री निवास की सुविधाओं का विकास होता है। तिरुपति, हरिद्वार, मथुरा, वाराणसी एवं रामेश्वरम तीर्थ स्थानों के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। दार्जिलिंग, शिमला, ऊटकमंड पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हुए कुछ नगरों में से हैं।
  8. आवासीय सुविधाएं: आवासीय कार्यों व सुविधाओं वाले शहर प्रायः बड़े नगरों के चरों ओर विकसित होते हैं, जहाँ निम्न कीमत वाली भूमि सस्ती मूलभूत सुविधाएं तथा मुख्य नगर के साथ त्वरित सम्पर्क कायम करने वाली परिवहन व्यवस्था उपलब्ध होती है। सोनीपत, फरीदाबाद, नोएडा जैसे नगर दिल्ली के चारों ओर विकसित हुए हैं, जिनमें विनिर्माण गतिविधियों का विकास भी हुआ है।

किसी नगर के कार्य उसकी अवस्थिति, आधारभूत संरचना, सुविधाओं तथा ऐतिहासिक व आर्थिक कारणों पर आधारित होते हैं। अधिप्रभावी कार्य के उस गतिविधि विशेष में संलग्न व्यक्तियों की संख्या के आधार पर पहचाना जा सकता है।

पदानुक्रमिक प्रतिरूप

विभिन्न स्तरों पर नगरों का वितरण इस प्रकार से होता है कि छोटे नगर संख्या में अधिक तथा सघन रूप से स्थापित होते हैं। इनमें से प्रत्येक के कार्यों अथवा संरचना के आधार पर पदानुक्रम को स्पष्ट किया जा सकता है।

संरचनात्मक पदानुक्रम

संपूर्ण विश्व के शहरीकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू नगर प्रणाली के भीतर बड़े एवं छोटे शहरों के विकास का असमान प्रतिरूप मौजूद होना है। प्रत्येक नगर प्रणाली के अंतर्गत कुछ बड़े नगर तथा अनेक छोटे कस्बे विद्यमान होते हैं। बड़े नगरों में कुल शहरी जनसंख्या का अपेक्षाकृत बड़ा भाग रहता है, जबकि संख्या में अधिक होने के बावजूद छोटे नगरों द्वारा कुल शहरी जनसंख्या में अपेक्षाकृत अल्प भागीदारी निभायी जाती है।

दस लाख से अधिक की जनसंख्या वाले नगर भारतीय नगरीय प्रणाली के शीर्ष पर स्थित हैं। इन शहरों में कुल शहरी जनसंख्या का एक-तिहाई से भी अधिक भाग रहता है। इनके बाद एक लाख तक की जनसंख्या वाले प्रथम श्रेणी के नगर तथा मध्यम नगर (द्वितीयक एवं तृतीयक नगर) आते हैं। इन नगरों में एक-चौथाई से अधिक शहरी जनसंख्या निवास करती है। चतुर्थ एवं पंचम श्रेणी के नगर,जिनकी संख्या कुल शहरों की संख्या का 48 प्रतिशत है, संपूर्ण शहरी जनसंख्या के मात्र 105 प्रतिशत भाग का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में स्थित प्रमुख नगरों एवं कस्बे के वितरण प्रतिरूप में उल्लेखनीय असमानता देखी जा सकती है।

कार्यात्मक पदानुक्रम

प्रत्येक प्रमुख कार्य का अपना पृथक् पदानुक्रम होता है। उदाहरणार्थ- प्रशासन की दृष्टि से सबसे निचले स्तर पर राजस्व ग्राम होता है। इसके बाद पंचायत संघ-विकास खंड-तहसील-जिला का स्थान आता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई इत्यादि सरकारी विभाग जिला मुख्यालय पर स्थित होते हैं। जिला मुख्यालय से ऊपर राज्य की राजधानी होती है, जहां राज्यपाल, राज्य विधायिका, उच्च न्यायालय, सचिवालय इत्यादि होते हैं। शीर्ष स्तर पर देश की राजधानी नई दिल्ली हैं, जहां संसद, राष्ट्रपति भवन, संघीय सचिवालय तथा उच्चतम न्यायालय स्थित हैं।

इसी प्रकार व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा, विनिर्माण जैसी अन्य गतिविधियों का अपना विशिष्ट पदानुक्रम होता है, जिसके अंतर्गत निम्नस्तरीय कार्य छोटे कस्बों में तथा उच्चस्तरीय कार्य बड़े शहरों में संचालित किये जाते हैं। प्रत्येक स्तर पर उस विशिष्ट कार्य को समर्थन प्रदान करने के लिए एक सुनिश्चित सीमा के भीतर जनसंख्या का होना जरूरी होता है।

नगर क्षेत्र

एक नगर क्षेत्र, वह क्षेत्र होता है जो एक नगर से कार्यात्मक सम्पर्क रखता है। ये सम्पर्क रोजगार, शिक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य जैसी गतिविधियों से सम्बद्ध हो सकते हैं। इन संपर्कों की मजबूती मुख्यतः परिवहन की लागत एवं यात्रा में लगने वाले समय पर निर्भर होती है। ये सम्पर्क अन्य शहरों के साथ होने वाली प्रतिस्पद्धा पर भी निर्भर करते हैं। एक नगर क्षेत्र की सीमाओं का निर्धारण कई प्रकार से किया जा सकता है-

  1. मुख्य नगर की ओर होने वाले अभिगमक यातायात को मापकर। इस तरीके से नगर क्षेत्र की सीमाएं मुख्य परिवहन मार्गों के आस-पास बह जाएंगीं, जबकि परिवहन सुविधाओं की कमी वाले भागों में सिमट जाएंगीं।
  2. रोजगार प्राप्त व्यक्तियों के आवासीय ठिकानों,कार्यालयों एवं अन्य मुख्य इमारतों व स्थलों की पहचान कर उसका मानचित्रण करके।
  3. विद्यार्थियों, व्यापारियों एवं बाहरी मरीजों के आवासीय पते एकत्रित करके उनके मानचित्रण द्वारा।
  4. शहर को माल की आपूर्ति करने वाले तथा शहर से आने वाले माल को स्वीकार करने वाले स्थानों को चिन्हित करके। आपूर्तिकर्ताओं एवं प्रतिकर्ताओं की उभयनिष्ठता के कारण दो नगर क्षेत्रों की सीमाएं अधिव्याप्त हो सकती हैं।

एक नगर क्षेत्र की सीमा समय के साथ परिवर्तित हो सकती है। उदाहरण के लिए, रेलवे लाइन की स्थापना या तीव्रतर बस मार्ग का निर्माण नगर क्षेत्र की सीमाओं को विस्तार दे सकता है, क्योंकि उस स्थिति में अधिक संख्या में लोग उस क्षेत्र की ओर प्रवासन करेंगे। एक नगर तथा उस आधारित क्षेत्र की जरूरतों के नियोजन में नगर क्षेत्र की सीमाओं की पहचान सहायक सिद्ध होती है।

ग्रामीण-शहरी विच्छेद सीमा

यह एक ऐसा संक्रमण क्षेत्र होता है, जिसमें दूरी बढ़ने के साथ-साथ शहरी प्रभाव क्रमिक रूप से घटता जाता है। शहरी प्रभाव को मूलतः जनसंख्या की रोजगार संरचना से मापा जाता है। यदि जनसंख्या का बहुसंख्यक भाग गैर-कृषि गतिविधियों में संलग्न है, तब उस क्षेत्र को शहरी माना जा सकता है अन्यथा यह एक ग्रामीण क्षेत्र होता है।

ग्रामीण-शहरी विच्छेद सीमा क्षेत्र में ग्रामीण एवं शहरी विशेषताएं आपस में गुंथ जाती हैं। उदाहरण के लिए, फलों व सब्जियों की खेती इस क्षेत्र को ग्रामीण चरित्र प्रदान करती है, जबकि एक कारखाने की अवस्थितिइसे शहरी रूप दे देती है। इस प्रकार यह क्षेत्र एक शहरी-ग्रामीण स्थिरांक को प्रदर्शित करता है।

यदि इस क्षेत्र में शहरी विकास की गति मद्धिम होगी तो इसका भौतिक विस्तार भी धीमा होगा। इस क्षेत्र के विस्तार में परिवहन की निर्णायक भूमिका होती है।

मुख्य शहर के लोग इस विच्छेद सीमा क्षेत्र में बसना पसंद करते हैं क्योंकि यहां शहरी एवं ग्रामीण-दोनों प्रकार के जीवन का आनंद उठाया जा सकता है। धीरे-धीरे इस क्षेत्र की अपनी खुद की आधार संरचना एवं सेवाएं विकसित हो जाती हैं। सस्ते एवं तीव्रतर परिवहन के अतिरिक्त अन्य रियायतें उपलब्ध कराकर इस क्षेत्र की ओर होने वाले प्रवासन को प्रोत्साहित किया जा सकता है, जो मुख्य शहर की भीड़भाड़ को कम करने में सहायक होगा।

भारतीय नगरों की आंतरिक संरचना

स्वतंत्र्योत्तर काल में भारत के बड़े आकार वाले नगरों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इस विकास की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-

  1. मुख्य रेल एवं सड़क मार्गों के साथ-साथ आवासीय कॉलोनियों का विकास।
  2. नगरों द्वारा उपनगरीय क्षेत्र का अभिग्रहण।
  3. मध्यवर्ती स्थानों में उद्योगों का विकास।
  4. औपनिवेशिक काल के दौरान बनाये गये पुराने बंगलों का सरकारी आवासों एवं कार्यालयों में रूपांतरण।
  5. नयी आवासीय कॉलोनियों, औद्योगिक क्षेत्रों एवं उपनगरीय कस्बों का नियोजित विकास।
  6. शहरों के भीतरी भागों में मलिन बस्तियों का विस्तार।

इस पाकर भारतीय नगर विभिन्न कल की इमारतों के सम्मिश्रण हैं, जहाँ भूमि उपयोग की कई श्रेणियां पायी जाती हैं।

इसका सम्बंध प्राचीन किले, महल या धार्मिक स्थल से है, जिसके चारों ओर एक नगर का विकास होता है। भारत में इन क्रोडों की निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं-

  1. यहां सड़कों व गलियों का एक जटिल चक्रव्यूह होता है, जो प्रायः एक अंतिम बिंदु पर समाप्त होता है। क्रोड में यातायात सामान्यतः एक-तरफा होता है।
  2. इमारतें अधिकांशतः पुरानी होती हैं, जो वास्तुशिल्प की विशिष्ट शैलियों को दर्शाती हैं। इन इमारतों में सामान्यतः छोटे उद्यान, छज्जे, अटारी इत्यादि होते हैं। बहुमंजिली इमारतों के निर्माण हेतु ऐसी अनेक इमारतों को तोड़ा जा चुका है।
  3. प्राचीन क्रोड जाति/समुदाय के आधार पर बिखरे होते हैं।
  4. इनमें विशेषीकरण का अभाव होता है तथा यहां भूमि का मिश्रित उपयोग (नीचे दुकान – ऊपर मकान) होता है।
  5. कुछ क्रोडों में थोक गतिविधियां सम्पन्न होती हैं। यहां भीड़भाड़ एवं यातायात गतिरोध की समस्या बनी रहती है। इसी कारण अनेक परिवार बाहरी इलाकों में बसने चले जाते हैं।
  6. इन भागों में आगंतुक व्यापारियों के ठहरने व खाने-पीने के लिए होटलों व रेस्तरांओं का विकास भी किया जाता है।

छावनी एवंरेलवे कॉलोनियां: ये लक्षण भी औपनिवेशिक काल के दौरान उभरकर आये। इन भागों में नियोजित आयताकार सड़क प्रतिरूप तथा रेसकोर्स एवं परेड ग्राउंड के रूप में विशाल खुला स्थान पाया जाता है। इन क्षेत्रों में स्कूल, डाकखाना, अस्पताल जैसी सेवाएं भी उपलब्ध होती हैं। अधिकांश छावनी क्षेत्र अपनी पृथक् पहचान रखते हैं, क्योंकि वे एक पृथक् छावनी बोर्ड के अधीन आते हैं।

रेलतंत्र के परिणाम: भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण रेलमार्गों की शुरूआत के साथ आरंभ हुआ। रेलवे स्टेशन से शहर के मुख्य केंद्र तक जाने वाले सड़क मार्ग का महत्व बढ़ गया। इस मार्ग पर दुकानों एवं होटलों की संख्या बढ़ती चली गयी। उपनगरीयरेलवे स्टेशनों के आस-पास आवासगृहों के संगुच्छ स्थापित हो गये, जिनके स्वामी अधिकांशतः बाहर से आने वाले प्रवासी थे। मध्यवर्ती स्थानों पर मलिन बस्तियां, उद्योग एवं आवासीय संगुच्छ स्थापित हो गये।

नवीनतम विकास: रेलमार्गों की तुलना में उपनगरीय सड़क परिवहन का तेजी से विकास हुआ है। ये उपनगरीय क्षेत्र मुख्य शहर के आस-पास के 50 किमी. क्षेत्र में फैले होते हैं। उन्नीससौतिहत्तर में तेल कीमतों के बढ़ने के परिणामस्वरूप नगरों के क्षैतिज विस्तार में बाधा पहुंची और परिवहन की लागत अत्यधिक बढ़ गयी। लोग अपने-अपने कार्यस्थलों के निकट बसने को वरीयता देने लगे। उस समय उर्ध्वाधर वृद्धिपर एक बढ़ता हुआ दबाव मौजूद था। शहर में खुले स्थानों पर भी इमारतों का निर्माण शुरू हो गया। यह प्रवृति महानगरों एवं औद्योगिक केंद्रों में अधिक देखी गयी।

अनियोजित नगर विकास

एक अनियोजित नगर विकास तब उत्पन्न होता है जब सार्वजनिक परिवहन में सुधार के साथ शहर देश में विस्तार करता है। इसमें नगर का विस्तार क्षेत्र और जनसंख्या दोनों के संदर्भ में होता है। अनियोजित नगर विकास का कारण गांव से शहरों की ओर और साथ ही छोटे कस्बों से बड़े नगरों की ओर प्रवासन तथा जनसंख्या में वृद्धि है। अनियोजित नगर विकास की अवधारणा महत्व की रही है, विशेष रूप से, जैसाकि यह बढ़ते शहरीकरण से जुड़ी समस्या है। विशेष रूप से विकासशील देशों में, अनियोजित नगर विकास बड़े रूप में अनियंत्रित रहा है।

ग्रीन बेल्ट का निर्माण करके अनियोजित नगर विकास को रोका जा सकता है।

जब अनियोजित विकास होता है, तब कृषि योग्य भूमि में स्वाभाविक रूप से कमी होने लगती है; गरीबी, अपराध और शहरीकरण से जुड़े अन्य मामलों में वृद्धि होने लगती है; विशेष रूप से झुग्गी-बस्तियों का विस्तार और पर्यावरणीय ह्रास होता है।

भारत में, अनियोजित नगर विकास मेट्रोपोलिटन नगरों के साथ जुड़ा है जो पूरे देश के गांवों और कस्बों से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। अनियोजित नगर विकास दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, बंगलुरु, कानपूर, इलाहाबाद और अन्य बड़े नगरों के आस-पास देखा जाता है।

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