खनिज ईंधन: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस

पेट्रोलियम

पेट्रोलियम शब्द की उत्पत्ति पेट्रा तथा ओलियम से हुई है, जिसमें पेट्रा का अर्थ पर्वत तथा ओलियम का अर्थ तेल होता है, अर्थात् पत्थर से निकला तेल पेट्रोलियम कहलाता है। यह तथा ऑक्सीजन (कम मात्रा में) का सम्मिश्रण है। द्रव पेट्रोलियम को कच्चा तेल, गैस पेट्रोलियम को प्राकृतिक गैस तथा पेट्रोलियम के अर्ध ठोस से ठोस अवस्था में जाने को ऐसफेल्ट (डामर), तारकोल, अलकतरा या बिटुमिन आदि के नाम से जानते हैं।

पेट्रोलियम के उत्पादन का स्रोत हमारी धरती है, जिसके तल से यह प्राप्त किया जाता है। पेट्रोलियम आग्नेय तथा कायान्तरित शैलों से नहीं प्राप्त किया जा सकता, वल्कि वलित पर्वतों के समीप स्थित अवसादी शैलों से प्राप्त किया जाता है। यह पर्वतों के मध्य लम्बी दूरी उर्ध्वाधर तथा धरातलीय अवस्था में तय करती हुई चलती है, जिसे हम विभिन्न उपकरणों के माध्यम से प्राप्त कर लेते हैं। बालू-पत्थर, काला चूना-पत्थर आदि के छिद्रों से इसे आसानी से प्राप्त किया जाता है। वस्तुतः, जीवों, वनस्पतियों के ऊपर निक्षेपण क्रिया तथा आंतरिक ताप एवं दबाव के फलस्वरूप लाखों वर्षों में खजिन तेल का निर्माण होता है।

वितरण: भारत का सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्र हिमालय का पूर्वी भाग असोम है। यह तेल उत्पादक क्षेत्र पूर्वोत्तर असोम से लेकर ब्रह्मपुत्र और सुरमा खाड़ी के समीप तक प्राप्त होता है। 1825 ई. में असोम की ऊपरी पहाड़ियों में तेल क्षेत्र का पता लगाया गया है। 1825 ई. में असोम की ऊपरी पहाड़ियों में तेल क्षेत्र का पता लगाया गया, परन्तु जी.एस.आई. (GSI)के आदेश के अनुसार 1866 ई. से तेल निकालने की प्रक्रिया शुरू हुई। 1866 से 1868 के दौरान माकूम के समीप मैक्केलॉप एंड कंपनी द्वारा तेल कुओं का निर्माण किया गया। यह डिग्बोई तेल क्षेत्र की खोज था, जो भारतीय खनिज तेल उत्पादन के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुआ।

ब्रह्मपुत्र घाटी: डिग्बोई तेल क्षेत्र ऊपरी असम राज्य के लखीमपुर जिले में स्थित है। यहां तेल के भंडार मायोसिन और इयोसिन काल से ही संबंध रखते हैं ।

नहरकटिया तेल क्षेत्र डिग्बोई से 32 किमी. दूर दक्षिण-पश्चिम में दिहांग नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। इस क्षेत्र की खोज 1954-55 में असम ऑयल कम्पनी द्वारा की गई। मायोसिन युग की बरेल श्रेणियों में तेल उत्पादन की प्रक्रिया संघटित है। मोरान डिग्बोई से 40 किमी. दूर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। मोरान क्षेत्र के बप्पापुंग, हुसानपुंग, हुजिरीगंज आदि क्षेत्रों में भी तेल उत्पादन होता है। रुद्रसागर के समीप स्थित नूनमती में 1961 में तेल की खोज की गई।

पश्चिमी अपतटीय तट: बॉम्बे हाई में तेल की खोज के बाद इस क्षेत्र को बेहद महत्व का समझा गया।

महाराष्ट्र में, बम्बई उच्च तेल क्षेत्र मुंबई तट से लगभग 184 किमी. की दूरी पर अरब सागर के मध्य स्थित है। बॉम्बे हाई (रत्नागिरी जिला) सबसे बड़ा तेल उत्पादक क्षेत्र है। 1978-79 के दौरान, बॉम्बे हाई से उरन पाइप लाइन बिछाने और उरन से ट्रॉम्बे तक स्थानांतरित लाइन बिछाने का काम संपन्न किया गया था। वर्ष 1978 से तेल और गैस की इन पाइप लाइनों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने का कार्य किया जा रहा है।

गुजरात में, मायोसिन युग (ओलिगोसेंस) की तेल संबंधी मुख्य शैल काम्बो बेसिन में स्थित है। यहां गैस उत्पादक कुओं की अधिकता है। कलील क्षेत्र में नवगांव तथा सानन्द अन्य प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र हैं।

अंकलेश्वर तेल क्षेत्र (जिला भरूच) गुजरात में प्रमुख तेल क्षेत्र है। तेल उत्पादन करने वाली शैल इयोसीन काल की हैं। इस क्षेत्र की खोज 1961 में की गई थी। बॉम्वे हाई के दक्षिण में वेसिन क्षेत्र अवस्थित है।

काम्बे बेसिन का उत्तरी क्षेत्र अहमदाबाद-कालोल का क्षेत्र है, जो कि तेल उत्पादित भी करता है।

आलियाबेत तेल क्षेत्र भावनगर के दक्षिण में अवस्थित है।

पूर्वी तट: इसमें महानदी, गोदावरी, कावेरी और कृष्णा के डेल्टा शामिल हैं जहाँ पूर्वी तट के तेल भंडार प्राप्त होते हैं। रव्वा क्षेत्र में कृष्णा-गोदावरी बेसिन अंतर्निहित दिखाई पड़ते हैं।

हाल ही में शामिल किये गये कुछ तेल क्षेत्र हैं: बॉम्बे हाई बेसिन में दक्षिणी हीरा, नीलम, गंधार फेज-II, पन्ना और मुक्ता हैं।

अन्य: कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं, जो खनिज तेल भंडारों के लिए जाने जाते हैं, किंतु जहां तेल का वाणिज्यिक रूप से उत्पादन शुरू नहीं हो सका है। ऐसे क्षेत्र हैं- राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश, अन्न्द्मन द्वीप समूह, बंगाल हिमालय के गिरीपद, गंगा घाटी तथा त्रिपुरा-नागालैंड वलित पेटी।

तब यहां कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहाँ की भूगर्भिक संरचना तेल भंडारों की उपस्थिति का संकेत देती है। ऐसे क्षेत्रों में केरल-कोंकण क्षेत्र, कच्छ-सौराष्ट्र क्षेत्र तथा महानदी बेसिन शामिल हैं।

अन्वेषण एवं उत्पादन: स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् पेट्रोलियम उद्योग ने अन्वेषण एवं उत्पादन के क्षेत्र में काफी प्रगति की है । तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) और भारतीय तेल निगम (ओआईएल) दो राष्ट्रीय तेल कंपनियां हैं जो देश में कुछ निजी एवं संयुक्त उपक्रम कपनियों के साथ, तेल एवं प्राकृतिक गैस के उत्पादन एवं अन्वेषण में संलग्न हैं।

सरकार द्वारा एक नई एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग नीति की घोषणा की गयी जिसके अंतर्गत सार्वजनिक क्षेत्र की कपनियों को पेट्रोलियम एक्सप्लोरेशन लाइसेंस प्राप्त करने के लिए निजी कंपनियों के साथ प्रतिस्पद्ध करनी पड़ी। नई पॉलिसी के तहत् तेल ब्लॉक की बोलियों के लिए निजी उद्यमों को आकर्षित करने के लिए राजस्व प्रोत्साहन प्रदान किए गए।

पाइपलाइन: पाइपलाइनें गसों एवं तरल पदार्थों को लंबी दूरी तक परिवहन हेतु अत्यधिक सुविधाजनक एवं सक्षम परिवहन प्रणाली है।

तेल क्षेत्रों से अपरिष्कृत तेल को परिष्करणशालाओं तक पहुंचाने के लिए भारत में सर्वप्रथम 1152 किलोमीटर लम्बी पाइप लाइन बिछाई गई और इसकी मान्य क्षमता 40 लाख टन है, जिसकी स्थापना ऑयल इण्डिया लिमिटेड द्वारा की गई। ये पाइप लाइन 1962-64 में नहरकटिया तेल क्षेत्र को गुवाहाटी और बरौनी परिष्करणशाला से जोड़ने के लिए बिछायी गई। अंकलेश्वर-कोयली पाइप लाइन की स्थापना 1965 में की गयी। नवगांव-कलोल-कोयली पाइप लाइन, कलोल-साबरमती पाइप लाइन, कैम्बे-धुर्वा गैस पाइपलाइन, अंकलेश्वर-वड़ोदरा एसोसिएटेड गैस पाइप लाइन और अंकलेश्वर-उत्तरन गैस पाइप लाइन गुजरात में स्थित है। नूनमती-सिलीगुड़ी पाइप लाइन और लकवा-रुद्रसागर-बरौनी पाइप लाइन की स्थापना 1968 में हुई तथा बरौनी-हल्दिया पाइप लाइन की स्थापना 1966 में। 1085 किलोमीटर लम्बी पाइप लाइन कच्छ में स्थित सलाया से कोयली और मथुरा परिष्करणशाला तक बिछी है।

मथुरा से जालंधर (दिल्ली व अम्बाला होकर) तक प्रोडक्ट पाइपलाइन भी बिछायी गयी है। आज, गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (गेल) की रुचि प्राकृतिक गैस, एलपीजी, तरल हाइड्रोकार्बन और पेट्रोकेमिकल जैसे उपयोगिता संवर्द्धित उत्पादों के कारोबार में है। इस कंपनी ने खोज, उत्पादन और नगर गैस वितरण में बेहतरीन काम किया है।

भारत की सबसे लम्बी पाइपलाइन गेल द्वारा हजीरा-बिजाइपुर-जगदीशपुर (एचबीजे) गैस पाइप लाइन बिछायी गयी है। यह गैस पाइप लाइन गुजरात में कवास, राजस्थान में अंता और उत्तर प्रदेश में औरैया से गुजरती है। यह पाइप लाइन बीजापुर, सवाईमाधोपुर, जगदीशपुर, आंवला और शाहजहांपुर के उर्वरक कारखानों से भी होकर गुजरती है।

परिष्करणशाला: तेल कुओं से निकाले गए खनिज तेलों का परिष्करण और संवर्द्धन परिष्करणशालाओं में होता है। परिष्करण का कार्य तीन चरणों में सम्पन्न होता है- प्रथम चरण में एल.पी.जी. गैस प्राप्त होती है, दूसरे चरण में डीजल और केरोसिन तथा तृतीय और अंतिम चरण में फ्यूल, ल्यूब्रिकेंट, बिटुमन एवं पेट्रोलियम कोक प्राप्त होता है।

सभी 18 तेल परिशोधनशालाएं (2011 के अनुसार), एक परिशोधनशाला के सिवाय, सार्वजनिक क्षेत्र में हैं। नीचे तेल परिशोधनशालाएं/पेट्रोरसायन परिसरों का एक सर्वेक्षण दिया गया है। [परिशोधन क्षमता मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष (एमएमटीपीए) में दी गई है जो 2005 के आंकड़ों पर आधारित है, जैसाकि पेट्रोलियम एवं गैस मंत्रालय द्वारा प्रदान किये गये हैं।

गुवाहाटी परिष्करणशाला: यह सार्वजनिक क्षेत्र की पहली परिष्करणशाला असम के गुवाहाटी जिले में स्थित नूनमती में है। इसकी स्थापना इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लि. द्वारा की गई। इसका निर्माण रोमानिया सरकार की सहायता से किया गया है। यह 1962 में स्थापित की गयी थी। इसकी उत्पादन क्षमता 1.00 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है।

बरौनी परिष्करणशाला: यह परिष्करणशाला जुलाई 1964 में बिहार में पूर्व सोवियत संघ की सहायता से स्थापित की गयी थी। यह इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड के अधीन है। इसकी उत्पादन क्षमता 6.00 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। वर्ष 1997 में सीसा रहित मीटर स्प्रिट के उत्पादन के लिए उत्प्रेरक सुधार इकाई (सी.आर.यू.) को भी परिष्करणशाला में शामिल किया गया था।

कोयली परिष्करणशाला: इसकी स्थापना गुजरात में अक्टूबर 1965 में पूर्व सोवियत संघ के सहयोग से की गई थी। इस परिष्करणशाला में अंकलेश्वर, कलोल और नवागांव (गुजरात) के तेल क्षेत्रों से कच्चा तेल उपलब्ध कराया जाता है। इसकी उत्पादन क्षमता 13.70 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। यह इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड के अधीन है।

हल्दिया परिष्करणशाला: पश्चिम बंगाल में कोलकाता के निकट हल्दिया स्थान पर इस परिष्करणशाला की स्थापना रोमानिया और फ्रांस की सहायता से की गयी और इसने 1975 से अपना कार्य आरम्भ किया। यहां ल्यूब स्टॉक का भी उत्पादन किया जाता है। इसकी उत्पादन क्षमता 6.00 मिलियन मीट्रिक टन प्रतिवर्ष है। यह इन्डियन ऑइल कारपोरेशन लिमिटेड के अधीन है।

मथुरा परिष्करणशाला: इस परिष्करणशाला ने उत्तर प्रदेश में जनवरी 1982 में एफ.सी. सी.यू. और सल्फर रिकवरी यूनिट को छोड़कर काम शुरू किया। इन यूनिटों ने जनवरी 1983 में काम करना शुरू किया। इसकी वर्तमान उत्पादन क्षमता 8.00 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। यह इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड के अधीन है।

डिग्बोई परिष्करणशाला: यह परिष्करणशाला असम ऑयल कपनी लिमिटेड द्वारा 1901 में डिग्बोई में स्थापित की गई थी। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड ने 1981 में असम ऑयल कपनी के विपणन प्रबंधन और परिष्करणशाला को अधिग्रहीत करके एक अलग विभाग स्थापित किया। यह विभाग परिष्करणशाला और विपणन दोनों की देखभाल करता है। सूक्ष्म रवेदार मोम (वेक्स) के अधिकतम उत्पादन के लिए एक नई सॉल्वेन्ट डिवेक्सिंग यूनिट (एस.डी.यू.) स्थापित की गयी जिसने वर्ष 2003 में कार्य करना शुरू किया। परिष्करणशाला ने डीजल की गुणवत्ता के सुधार हेतु हाइड्रो उपचार संयंत्र भी स्थापित किया। इसकी उत्पादन क्षमता 0.65 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है।

पानीपत परिष्करणशाला: यह परिष्करणशाला हरियाणा के बहोली गांव में 1998 में स्थापित की गई थी। इसकी उत्पादन क्षमता 6.00 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है।

मुंबई परिष्करणशाला: यह 1954 में न्यूयार्क की एस्सी (ESSO) कम्पनी के अधिकार में थी। मार्च 1974 में भारत सरकार ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। अब यह हिन्दुस्तान पेट्रोलियम (एचपीसीएल) के अधीन है।

विशाखापट्टनम परिष्करणशाला: यह 1957 में आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम् में कालटेक्स कम्पनी द्वारा स्थापित की गयी थी। मई 1978 में भारत सरकार ने इसे अपने अधिकार में लेकर हिन्दुस्तान पेट्रोलियम (एचपीसीएल) को सौंप दिया।

भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल): रिफायनरी, मुंबई में 1955 में बर्मा शेल रिफायनरी लिमिटेड द्वारा स्थापित की गयी थी। 1976 में भारत सरकार ने इसे अपने अधिकार में लेकर इसका नाम भारत रिफायनरीज लिमिटेड कर दिया गया। अगस्त 1977 में, कम्पनी की स्थायी नाम भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड दिया गया। इसकी वर्तमान शोधन क्षमता 12.00 एमएमटीपीए है।

चेन्नई पेट्रोलियम निगम लिमिटेड (सीपीसीएल): तमिलनाडु के मनाली में स्थित पूर्व मद्रास परिष्करणशाला लिमिटेड के रूप में जानी जाती है। इसका गठन 1965 में भारत सरकार (जीओआई), एएमओसीओ और नेशनल ईरानियन ऑयल कम्पनी (एनआईओसी) के मध्य एक संयुक्त उद्यम के रूप में किया गया। 1985 में, एएमओसीओ ने भारत सरकार और एनआईओसी की शेयरधारिता प्रतिशत के पक्ष में विनिवेश किया। भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के एक भाग के रूप में, 2000-01 में इण्डियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) ने भारत सरकार से इक्विटी हासिल कर ली। वर्तमान में आईओसी की शेयरधारिता 51.88 प्रतिशत है। जबकि एनआईओसी की 15.40 प्रतिशत है। 2001 में सीपीसीएल आईओसी की एक सहायक कम्पनी बन गई। मनाली परिष्करणशाला की शोधन क्षमता 10. 50 एमएमटीपीए है।

कावेरी बेसिन रिफाइनरी: नागपट्टिनम (तमिलनाडु), सीपीसीएल के अधीन है। इसकी शोधन क्षमता 1.00 एमएमटीपीए है।

कोच्चि परिष्करणशाला लिमिटेड: यह संयुक्त क्षेत्र में 1963 में स्थापित की गयी थी। कोचीन परिष्करणशाला लिमिटेड का गठन सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के रूप में भारत सरकार, संयुक्त राज्य अमेरिका और कलकत्ता की डंकन ब्रदर्स फिलिप्स पेट्रोलियम कंपनी के मध्य एक समझौते के तहत् किया गया। मार्च 1989 में फिलिप्स पेट्रोलियम कपनी ने अपनी इक्विटी को शेयरों के विनिवेश द्वारा वापस ले लिया। वर्तमान में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के पास कुल शेयरों का सर्वाधिक हिस्सा, शेष हिस्से में केरल सरकार, वित्तीय संस्थान और जनता की भागीदारी है। इसकी शोधन क्षमता 9.50 एमएमटीपीए है। बोंगाईगांव परिष्करणशाला: यह असम में कई चरणों में बनायी गयी थी। 1974 में, असम में बोंगाईगांव रिफायनरी एण्ड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (बीपीआरपीएल) की स्थापना का उद्देश्य रिफायनरी और जेलिन के पेट्रोकेमिकल्स काम्प्लेक्स को सुसंगत बनाने के लिए शामिल किया गया। इसकी शोधन क्षमता 2.35 एमएमटीपीए है।

नुमालीगढ़ परिष्करणशाला: जो असम समझौता रिफायनरी के नाम से लोकप्रिय है को 1985 में भारत सरकार द्वारा की गई वचनबद्धता को पूरा करने के क्रम में ऐतिहासिक असम समझौता करके असम के गोलाघाट जिले में नुमालीगढ़ में एक आधारभूत परिष्करणशाला के रूप में स्थापित किया गया था।

मंगलौर रिफायनरी: पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड कर्नाटक में एक संयुक्त उद्यम कंपनी के रूप में हिन्दुस्तान पेट्रोलियम निगम लिमिटेड, मुंबई और इंडियन रेयॉन तथा औद्योगिक लिमिटेड गुजरात के सह प्रमोटरों के साथ स्थापित की गई। 1996 में इसे रिफायनरी का दर्जा दिया गया। इसकी उत्पादन क्षमता 11.82 एमएमटीपीए है।

ताटीपाका परिष्करणशाला: आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में ताटीपाका में स्थित है। यह ओएनजीसी की मिनी रिफायनरी है। इसकी तेल शोधन क्षमता 0.066 एमएमटीपीए है।

रिलायस पेट्रोलियम लिमिटेड: एकमात्र निजी क्षेत्र की रिफायनरी है। इसे जुलाई 1999 में गुजरात में मोतीखवड़ी, लालपुर तालुका और जामनगर जिलों में 27 एमएमटीपीए तेलशोधन क्षमता के साथ अधिकार दिया गया। वास्तव में यह एक एकीकृत जटिल रिफायनरी एवं पेट्रो रसायन है।

प्राकृतिक गैस

प्राकृतिक गैस का उपयोग ऊर्जा उत्पादन और नाइट्रोजिन्स उर्वरकों की तैयारी में होता है।

प्राकृतिक गैस का 1960 से असम और गुजरात में उपयोग किया जा रहा है। 1970 के उत्तरार्द्ध में बॉम्बे हाई तेल क्षेत्र के विकास के साथ और फिर 1980 के उत्तरार्द्ध में जब पश्चिमी अपतट में दक्षिण बेसिन तेल क्षेत्र को तेल उत्पादन के अंतर्गत लाया गया, तब प्राकृतिक गैस के उत्पादन और उपयोगिता में भारी वृद्धि हुई। अब, गैस का सबसे अधिक उत्पादन पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र से हो रहा है। आमतौर पर प्राकृतिक गैस कच्चे तेल के साथ सहयोगी के रूप में पायी जाती है। गुजरात में खम्भात गैस क्षेत्र है, हालांकि, यह एक गैर-संबद्ध गैस का एक स्रोत है।

तटवर्तीय क्षेत्रों में असम (मोराह और नहरकटिया) में प्रमुख स्रोत हैं। गैस के अन्य उत्पादक राज्य आंध्र प्रदेश और गुजरात हैं। हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा, ज्वालामुखी और त्रिपुरा में बारामुरा श्रेणियों के क्षेत्रों में भी कम मात्रा में गैस उत्पादित की जा रही है। तमिलनाडु के तंजावुर जिले में भी प्राकृतिक गैस है। राजस्थान, पंजाब में फिरोजपुर जिले, पश्चिम बंगाल में मिदनापुर जिले और जम्मू-कश्मीर में प्राकृतिक गैस की खोज की गई है। यह अरुणाचल प्रदेश के नाम-चिक, मियो पुंग और लापतांग पुंग में निस्यंदन के रूप में उपलब्ध है।

ऑयल इंडिया लिमिटेड (ओआईएल) असम और राजस्थान राज्यों में कार्यरत है, जबकि तेल और प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र तथा अन्य राज्यों में कार्यरत इंडिया लिमिटेड (गेल) द्वारा किया जाता है। ओआईएल द्वारा उत्पादित गैस का विपणन राजस्थान को छोड़कर इसके द्वारा ही किया जाता है। राजस्थान में यह विपणन गेल (जीएआईएल) द्वारा किया जाता है। केयर्न इनर्जी द्वारा लक्ष्मी फील्ड से गैस उत्पादन और गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (जीएसपीसीएल) द्वारा हजीरा फील्ड से गैस उत्पादन की इनके द्वारा सीधे तौर पर बाजार द्वारा निर्धारित कीमतों पर बेचा जाता है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज, एक निजी स्वामित्व की भारतीय कंपनी, ने वर्ष 2002 में कृष्णा गोदावरी बेसिन में एक बड़े प्राकृतिक गैस के भंडार की खोज के बाद प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में एक बड़ी भूमिका निभाई है।

दिसंबर 2006 में, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक नई नीति जारी की जिसने पाइप लाइन प्रोजेक्ट में 100 प्रतिशत अंशधारिता धारण करने के लिए विदेशी निवेशकों, निजी घरेलू कंपनियों तथा राष्ट्रीय तेल कंपनियों को क्षुनमति प्रदान की। जबकि गेल (जीएआईएल) के प्राकृतिक गैस के पारेषण और वितरण में प्रभुत्व को विधि द्वारा सुनिश्चित नहीं किया गया है, फिर भी इसके वर्तमान प्राकृतिक गैस अवसंरचना के कारण यह इस क्षेत्र में निरंतर एक प्रमुख खिलाड़ी बनी रहेगी।

पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र में उत्पादित गैस महाराष्ट्र में उरन तथा आशिक रूप से हजीरा, गुजरात में लाई जाती है। उरन में लाई जाने वाली गैस मुम्बई में तथा इसके आस-पास के क्षेत्र में उपयोग में लाई जाती है। हजीरा में लाई जाने वाली गैस कटु होती है जिसे गैस में मौजूद सल्फर को हटाकर मृदुल बनाया जाता है। गैस को मृदुल करने के पश्चात्, गैस को आंशिक रूप से हजीरा पर इस्तेमाल किया जाता है और शेष गैस को हजीरा-बीजाईपुर-जगदीशपुर (एचबीजे) पाइपलाइन में भेज दिया जाता है। गुजरात, असम इत्यादि में उत्पादित आधी एलपीजी का स्रोत, वर्तमान में प्राकृतिक गैस है। अभी एलपीजी धुलियाजन (असम), बीजाईपुर (मध्य प्रदेश), हजीरा और वगोडिया (गुजरात), उरन (महाराष्ट्र) पाटा (उत्तर प्रदेश और नागापट्टनम (तमिलनाडु) में पायी जाने वाली गैस से प्राप्त की जाती है। वर्ष 1998-99 में लक्वा (असम) और उस्सर (महाराष्ट्र) में दो नए संयंत्र स्थापित किए गए थे।

प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में वृद्धि करने के लिए हाल ही में किए गए उपायों में शामिल हैं-

  1. भारतीय परिवारों को गैस की आपूर्ति तथा वाहनों के लिए संपीडित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) देने हेतु मुंबई में गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (गेल) तथा ब्रिटिश गैस के बीच संयुक्त उपक्रम और दिल्ली में गेल तथा भारत पेट्रेलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के बीच संयुक्त उपक्रम,
  2. ओएनजीसी द्वारा पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र में गैस फ्लैरिंग रिडक्शन प्रोजेक्ट शुरू करना और असम तथा महाराष्ट्र में एलपीजी के नए संयंत्र स्थापित करना
  3. गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (गेल) द्वारा हजीरा-बीजाईपुर-जगदीशपुर (एचबीजे) पाइपलाइन की क्षमता विस्तार।

गैस के फैल जाने का समाधान क्यों किया जाना चाहिए- प्राकृतिक गैस फैल जाती है। क्योंकि-

  1. आवश्यक संपीडन एवं परिवहन सुविधाओं का अभाव;
  2. सुरक्षापूर्ण संचालन के लिए खास तकनीकी जरूरतें;
  3. अलग-थलग स्थान पर गैस की उपलब्धता जिसे आर्थिक रूप से परिवहन नेटवर्क के साथ नहीं जोड़ा जा सकता;
  4. उपभोक्ताओं द्वारा गैस न उठाना।
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